सांप के काटने से मरी हुई महिला तंत्र-मंत्र से होगी जिंदा!!

आने वाली पूर्णिमा की रात को ‘धरती का सबसे बड़ा चमत्कार‘ होने वाला है. यह दावा हम नहीं कर रहे बल्कि कानपुर के चौबेपुर उपनगर में गाजीपुर गांव के लोगों के बीच कुछ ऐसी ही चर्चा का बाजार गर्म है.

आपने हिंदी फिल्मों में देखा होगा कि एक सांप किसी व्यक्ति को काट लेता है. बाद में कोई तांत्रिक या सपेरा बीन बजा कर सांप को बुला लेता है और सांप उस व्यक्ति का सारा ज़हर चूस लेता है और व्यक्ति फिर से जिंदा हो जाता है. कुछ ऐसा ही मामला चौबेपुर के गाजीपुर गांव में देखने को मिला है.

यहाँ एक मृत महिला को जिंदा करने के लिए कुछ दिनों से तंत्रमंत्र हो रहा है. काला जादू, तंत्र-मंत्र, टोटके जैसी बातों पर लोगों को यकीन और चर्चा करते हुए अपने देखा-सुना होगा. लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि तंत्र-मंत्र से मरा हुआ व्यक्ति जिंदा हो सकता है?

बात कुछ दिन पहले की है जब गांव में रहने वाली महिला शकुंतला देवी ने  गलती से एक सांप को मार डाला. संयोग कहें या कुछ और, इसके ठीक 2 दिन बाद ही शकुन्तला को एक सांप ने काट लिया.

घटना का पता चलने पर लोग उसे हॉस्पिटल ले गए, लेकिन डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया. इसकी सूचना गाँव वालों को मिलते ही लोगों में सांप द्वारा साथी सांप की मौत का बदला लेने की चर्चा होने लगी. इसी बीच गांव वालों ने एक बंगाली तांत्रिक को बुलाया.

तांत्रिक ने घर वालों को और गांव वालों को यह विश्वास दिलाया की वह तंत्र मंत्र से महिला को जिंदा कर देगा और काटने वाले सांप को भी मार डालेगा. लोगों ने उस पर यकीन कर लिया और इसके बाद तांत्रिक ने मृत महिला को जिंदा करने के लिए तंत्रमंत्र शुरू कर दिए.

सात फुट गड्ढे में लाश रखकर हो रहा तंत्र मंत्र

बंगाली तांत्रिक ने मृत महिला को जिंदा करने के लिए उसके घर के बाहर सात फीट का गड्ढा खुदवाया. इसमें मृत महिला की लाश को रखकर कपड़े से ढक दिया गया. गौरतलब है कि तांत्रिक लाश के पास बैठ कर रोज पूजा कर रहा है.

शंकुन्तला देवी की लाश के लिए किया गया गड्ढा जहाँ पर तंत्र-मंत्र हो रहा है, इनसेट में शंकुन्तला देवी की फोटो

दिलचस्प बात तो यह है कि हर रोज सुबह और शाम, कपड़े को हटाकर महिला के लिए ”खाना” रखा जाता है. इसके साथ ही खाने की दो और थालियाँ लगवाई जाती हैं, जिसे बाद में ले जाकर जंगल में रख दिया जाता है.

बदला लेने के लिए नागिन ने काटा

जब लोगों ने तांत्रिक से इस सारे मामले के बारे में पूछा तो तांत्रिक ने कहा कि एक नाग की मौत का बदला लेने के लिए नागिन ने महिला को काटा है. वह  पूर्णिमा के दिन तंत्र-मंत्र से नागिन को बुलाकर उससे महिला के ज़हर को चुसवा कर उसका जहर उतरवा देगा.

मृतका के भाई के घर पहुंचने पर हुआ खुलासा

महिला का भाई उसके घर पहुंचा तो उसे इस सारे मामले का पता चला जिसे देखकर वह हैरान रह गया. उसने हालाँकि इसका विरोध किया लेकिन महिला के परिजनों ने उसे वहां से भगा दिया.

भाई का कहना है कि उसकी बहन की मौत हो गई है. मृत महिला के पति यानी उसके जीजा ने घर के बाहर सात फीट गहरे गड्ढे में उसकी लाश को रखा है और वहां एक तांत्रिक पूजा कर रहा है.

क्या आपको क्या लगता है कि बंगाली तांत्रिक, मृत महिला को जिंदा कर पाएगा? आज के इस तकनीकी युग में भी अंधविश्वास, काला जादू पर विश्वास करना चाहिए? प्लीज अपनी राय हमारे साथ जरुर शेयर करें… 

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हेयर केयर टिप्स : जानिए कैसे करें बालों की सही देखभाल?

महिला हो या पुरुष, बाल दोनों के लुक को प्रभावी बनाते हैं। ऐसे में बालों की ठीक से देखभाल करने की जरूरत है। लेकिन कई कारणों से लोगों के बाल झड़ने लगते हैं या सफेद होने लगते हैं।

बालों की देखभाल की दिनचर्या के लिए, लोगों के मन में अक्सर यह सवाल होता है कि उन्हें अपने बालों को कितनी बार धोना चाहिए।

कहा जाता है कि ज्यादा बाल धोने से बालों की नमी खत्म हो जाती है और वह खराब हो जाते हैं। वहीं बाल न धोने से भी बाल झड़ने लगते हैं।

ऐसे में लोग इस बात को लेकर असमंजस में रहते हैं कि हफ्ते में कितनी बार और कब बालों को धोना चाहिए। गर्मी के दिनों में लोग अपने बाल बहुत जल्दी धोते हैं।

पुरुष हमेशा नहाते समय शैंपू करते हैं। ऐसे में बाल धोने से पहले यह जान लें कि आपको हफ्ते में कितनी बार अपने बाल धोने चाहिए और बालों को धोने का सही तरीका क्या है?

आपको यह भी पता होना चाहिए कि आपके बाल गंदे हैं या नहीं ताकि आप अपने बालों को अपने हिसाब से धो सकें।

गंदे बालों की पहचान कैसे करें?

अगर आपकी स्कैल्प ऑयली है तो अक्सर बाल धोने के एक दिन बाद आपके बालों में तेल दिखने लगता है। इससे बाल चिपचिपे दिखने लगते हैं। ऐसा होने पर आपको अपने बालों को धोना चाहिए।

अगर बालों में स्कैल्प की त्वचा निकलने लगे या सिर खुजलाने के बाद नाखूनों में गंदगी दिखाई देने लगे तो समझ लें कि आपके बाल गंदे हैं और उन्हें धोने की जरूरत है।

अगर आप लंबे समय से अपने बाल नहीं धो रहे हैं तो बालों में गांठें बनने लगती हैं। अगर बाल जरूरत से ज्यादा उलझने लगें तो आपको बालों को शैंपू कर लेना चाहिए।

बालों को रोजाना धोने से बाल झड़ सकते हैं या रूखे और बेजान हो सकते हैं। इसलिए बालों को ज्यादा देर तक धोए बिना न छोड़ें।

अगर आप अपने बालों को रोजाना नहीं धोना चाहते हैं लेकिन कुछ ही समय में आपके बाल ऑयली लगने लगते हैं, तो आप ड्राई शैम्पू का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन हर समय इसका इस्तेमाल न करें।

बालों को न तो ज्यादा धोना चाहिए और न ही कम। बालों को इतना धोएं कि सिर में तेल की मात्रा नियंत्रित रहे, वह बढ़ न सके।

जाने बालों के टाइप के हिसाब से कब करना है हेयर वॉश

रूखे बाल

अगर आपके बाल रूखे हैं तो हफ्ते में दो या तीन बार से ज्यादा हेयर वॉश नहीं करना चाहिए। बाल धोने के बाद जड़ों में नारियल का तेल लगाएं। गरम ऑलिव ऑयल से बालों को मसाज करें और इसे आधे घंटे के लिए प्लास्टिक से कवर कर दें। फिर शैंपू से बाल धो लें।

ऑयली बाल

अगर आपके बाल ऑयली हैं तो बाल धोने के अगले ही दिन से उनमें तेल लगने लगता है। ऐसे में अगर आपके ऑयली बाल हैं तो हफ्ते में 5 दिन भी बाल धो सकते हैं लेकिन कंडीशनर का इस्तेमाल न करें।

नमी के लिए बालों में थोड़ा-सा सनफ्लावर ऑयल लगाएं। पतले दांत वाली कंघी की बजाय मोटे दांत वाली कंघी का इस्तेमाल करें, इससे बाल आसानी से सुलझ जाएंगें और टूटेंगे भी नहीं। बालों को ब्रश करने के लिए सॉफ्ट ब्रिसल वाला हेयर ब्रश व कंघी का इस्तेमाल करें।

घुँघराले बाल

फ्रिज़ी बालों को हफ्ते में दो से तीन बार धोया जा सकता है। अधिक धोने से घुंघराले बाल अधिक रूखे हो जाते हैं। घुँघराले बालों को ज्यादा धोने से वे फ्रिज़ी और डैमेज हो सकते हैं। इसलिए घुंघराले बालों को हफ्ते में सिर्फ दो-तीन बार ही धोना चाहिए।

बालों की नमी बनाए रखने के लिए हर बार बाल धोने के बाद कंडीशनर लगाएं। पतले दांत वाली कंघी का इस्तेमाल न करें। ऐसे बालों के लिए मोटे दांत वाली कंघी बेस्ट होती है। बालों को नैचुरल तरी़के से सूखने दें।

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OMG: ये है दुनिया के सबसे खतरनाक बीच, जहां जाने पर कांप जाती है रूह

समुद्र की लहरों के साथ मस्ती करने की हर किसी की ख्वाहिश होती है। इसलिए लोग बीच पर जाना पसंद करते हैं। दुनिया में कई खूबसूरत बीच हैं लेकिन आज हम आपको एक ऐसी खतरनाक बीच के बारे में बताने जा रहे हैं जहां जाने से हर कोई डरता है तो चलिए जानते हैं :-

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न्यू स्मिर्ना बीच फ्लोरिडा

हम जिस बीच के बारे में बात करने जा रहे हैं वह न्यू स्मिर्ना, फ्लोरिडा, यूएसए में स्थित है। न्यू स्मिर्ना बीच को दुनिया का सबसे खतरनाक और अजीबोगरीब कहा जाता है। बताया जाता है कि अमेरिका के इस बीच पर शार्क ने सौ से ज्यादा लोगों पर हमला किया है।

वहीं, अमेरिका के इस समुद्र में और भी कई खतरनाक जीव रहते हैं। इस वजह से हर कोई इस बीच पर जाने से डरता है। अमेरिका के इस समुद्र तट का नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में “द शार्क कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड ” के रूप में दर्ज है।

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दुनिया की सबसे “जवान” जनजाति, हुंजा

दुनिया में बहुत सी जनजातियां पाई जाती हैं. ऐसी ही एक जनजाति हुंजा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में गिलगित-बाल्टिस्तान के पहाड़ों स्थित हुंजा घाटी में पाई जाती है.

हुंजा भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा के पास पड़ता है. इस गांव को युवाओं का नखलिस्तान भी कहा जाता है. हुंजा गांव के लोगों की औसत उम्र 110-120 साल है.

इस जनजाति की खास बात यह है कि यहां के लोग बहुत खूबसूरत और जवान-जवान से दिखते हैं. खासकर औरतें, जो कि 65 साल तक जवान रहती हैं और वे इस उम्र में भी तक संतान को जन्म दे सकती हैं.hunza-caste-women-up-to-65-yearsहुंजा गांव हिमालय की पर्वतमाला पर स्थित हैं. इसे दुनिया की छत के नाम से भी जाना जाता है. यह भारत के उत्तरी छोर पर स्थित है जहां से आगे पर भारत, पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान की सीमाएं मिलती है.
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हुंजा जनजाति की जनसंख्या लगभग 87 हजार है. यह जनजाति और उनकी जीवन शैली सैकड़ों साल पुरानी लगती है. हुंजा जनजाति के लोग बिना किसी समस्या के कई सालों तक जीवित रहते हैं.

कहते हैं इनमें से कई लोग तो 165 साल तक जिंदा रहते हैं. हुंजा जनजाति की खास बात यह है कि यहां के लोग बहुत कम बीमार पड़ते है. ट्यूमर जैसी बीमारी का तो उन्होंने कभी नाम भी नहीं सुना.
children-of-hunza-tribeइन लोगों को देखकर आप ये अंदाजा लगा सकते हैं कि खानपान और अच्छी जीवन शैली लोगों के जीवन को प्रभावित करती है. हुंजा के लोग खूब खुमानी खाते हैं. कुछ लोग इन लोगों को किसी यूरोपीय नस्ल से जोड़ते हैं. वास्तव में यहाँ के लोग गोरे-चिट्टे, जवान, हंसमुख और आसपास की आबादी के बिल्कुल अलग दिखते हैं.
hunza-village-peopleहुंजा के लोग शून्य के भी नीचे के तापमान पर बर्फ के ठंडे पानी में नहाते हैं. ये लोग वही खाना खाते हैं जो ये खुद उगाते हैं जैसे कि खुमानी, मेवे, सब्जियां और अनाज में जौ, बाजरा और कूटू.

ये कम खाते हैं और पैदल ज्यादा चलते हैं. रोजाना 15 से 20 किलोमीटर तक चलना और टहलना उनकी जीवन शैली में शामिल होता है. साथ ही साथ हँसना भी उनकी जीवन शैली का हिस्सा है.

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रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

रवींद्रनाथ टैगोर एक महान कवि, संगीतकार, लेखक और चित्रकार थे। रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता में जोरासंको हवेली में हुआ था l रवींद्रनाथ टैगोर को गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने अपनी पहली कविता मात्र आठ साल की उम्र में लिखी थी।

टैगोर की शादी 1883 में मृणालिनी देवी के साथ हुई थी। उनकी पत्नी ने बाद में उच्च शिक्षा प्राप्त की और इंग्लैंड जाकर पढ़ाई की। उन्होंने कुछ किताबों का अनुवाद भी किया।

रवींद्रनाथ टैगोर ने भारत के वायसराय लार्ड कर्जन की नीति ‘डिवाइड एंड रूल’ के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत कोलकाता से 16 अक्टूबर 1905 में की थी। 7अगस्त 1941 को कोलकाता में उनकी मृत्यु हो गई।

आइये जानते हैं रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य के बारे में

  • रवींद्रनाथ टैगोर पहले ऐसे शख्स थे जिनकी रचनाओं को दो देशों में राष्ट्रगान के रूप में गाया जाता है। इनमें एक है भारत का “जन गण मन” और दूसरा है बांग्लादेश का “अमार शोनार बांग्ला”। परन्तु बहुत से लोग यह नहीं जानते हैं कि उन्होंने श्रीलंका के लिए भी राष्ट्रगान “श्रीलंका मठ” लिखा था जिसे 1951 में सिंहली में अनुवादित कर वहां का राष्ट्रगान बना दिया गया।
  • टैगोर की लोकप्रिय किताबों में से एक ‘द किंग ऑफ द डार्क चैंबर‘ है। जिसकी बीते साल अमेरिका में सात सौ डॉलर (करीब 45 हजार रुपये) में नीलामी हुई थी। ये किताब 1916 में मैकमिनल कंपनी ने प्रकाशित की थी, जो टैगोर के हिंदी में लिखे नाटक ‘राजा’ का अंग्रेजी अनुवाद है। इस नाटक की कहानी एक रहस्यमय राजा से जुड़ी है।
  • रवींद्रनाथ टैगोर पहले भारतीय थे जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था। उन्हें 1913 में उनकी रचना “गीतांजली” के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था। टैगोर की विश्व प्रसिद्ध रचना “गीतांजली” 157 कविताओं का कलेक्शन है और यह 1910 में प्रकाशित हुई थी।
  • रवींद्रनाथ टैगोर की 3,500 कविताओं का एक डिजिटल संग्रह भी है। खास बात यह है कि इस संग्रह में ऐसी 15 कविताएं मौजूद हैं, जिनका पाठ खुद टैगार ने किया था। 245 कविताओं का पाठ वक्ताओं ने किया है।
  • रवींद्रनाथ नाथ टैगोर ने विभीन्न शैलियों पर काम किया था उन्हीने उपन्यास, लघु कथाएँ, कविताएं, निबंध, छंद, नाटक, गीत, और बहुत सी अन्य चीजें लिखीं। माना जाता है कि उन्होंने लगभग सभी प्रकार की शैलियों पर काम किया था ।
  • गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर चित्र बनाने में भी पारंगत थे, उन्होंने 60 साल की उम्र के दौरान चित्र बनाने शुरू किए थे।
  • पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में कला और साहित्य का एक अलग रूप दिखता था। इससे टैगोर का गहरा नाता था। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां उनके पिता ने 1863 में ब्रह्मा समाज आश्रम और विद्यालय के रूप में एक आश्रम की स्थापना की थी फिर यहीं पर रवींद्रनाथ टैगोर ने विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। रवींद्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन में “विश्व-भारती” स्कूल के निर्माण में अपना नोबेल पुरस्कार निवेश किया था।
  • टैगोर को एक बार अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने घर पर आमंत्रित किया था। दोनों ने धर्म और विज्ञान के बारे में बात की और उनकी बातचीत को “नोट ऑन द नेचर ऑफ रियलिटी” में प्रलेखित किया गया है।
  • उनकी कई प्रदर्शनियां यूरोप, रूस और अमेरिका में लगी है।
  • इंग्लैंड के राजा जॉर्ज पंचम ने साहित्य के क्षेत्र में उनके महान योगदान के लिए 1915 में रवींद्रनाथ टैगोर को “शूरवीर” की उपाधि दी थी। हालांकि 1919 में जलियांवाला बाग में हुए दुखद हत्याकांड के बाद, उन्होंने अपना खिताब त्याग दिया था।
  • उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन सहित दर्जनों देशों की यात्राएं की थी।
  • गांधी जी को “महात्मा” कहने का श्रेय भी रवींद्रनाथ टैगोर को ही दिया जाता है।
  • रवींद्रनाथ टैगोर, देवेन्द्रनाथ टैगोर के पुत्र थे, जिन्होंने बंगाल पुनरुत्थान करने में एक महान भूमिका निभाई थी। इसी तरह रवींद्रनाथ टैगोर ने भी बंगाली कला, साहित्य, संगीत और रंगमंच के पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत के इस मंदिर में आज भी धड़कता है भगवान कृष्ण का दिल

भारत में रहस्यमय मंदिरों की कोई कमी नहीं है। आज हम आपको एक ऐसे रहस्यमयी मंदिर के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं, जिसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे। दरअसल जिस मंदिर के बारे में हम बात करने जा रहे हैं वहां भगवान कृष्ण का दिल धड़कता है और वह मंदिर ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर है।

तो चलिए जानते हैं इस रहस्यमयी मंदिर के बारे में:-

पुरी के जगन्नाथ मंदिर में कृष्ण भाई बलदाऊ और बहन सुभद्रा के साथ मौजूद हैं। यह मंदिर अपने आप में कई रहस्य समेटे हुए है। उन्हीं में से एक है मूर्तियों के भीतर मौजूद ब्रह्म पदार्थ, इसे कृष्ण के हृदय भाग से जोड़कर देखा जाता है।

ऐसा माना जाता है कि जब कृष्ण का अंतिम संस्कार किया गया था, तो पूरा शरीर पांच तत्वों में विलीन हो गया था, लेकिन दिल अभी भी एक सामान्य इंसान की तरह धड़कता है और यह अभी भी जगन्नाथ की लकड़ी की मूर्ति में मौजूद है, जिसे बाद में ब्रह्म पदार्थ कहा गया। कहा जाता है कि भगवान श्री जगन्नाथ की मूर्ति नीम की लकड़ी से बनाई गई है।

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12 साल बाद कड़ी सुरक्षा के बीच बदली जाती है मूर्ति

हर 12 साल में जगन्नाथ जी की मूर्ति बदली जाती है। ऐसा करते हुए पुरे शहर बिजली काट दी जाती है। पूरे शहर में कहीं भी रोशनी नहीं होती। इस दौरान कोई भी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता है।

यहां तक ​​कि मूर्ति बदलते समय पुजारी की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है। पुरानी मूर्ति से एक पदार्थ निकालकर नई मूर्ति पर लगाया जाता है, यह ब्रह्म पदार्थ है। पुजारी को इसे हटाते समय दस्ताने भी पहनने होते हैं।

पुजारी उस पदार्थ को पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति में डालता है। हजारों साल से चल रही इस प्रक्रिया को आज तक किसी ने खुली आंखों से नहीं देखा।

इस प्रक्रिया को पूरा करने वाले पुजारियों के अनुसार, हाथों में उछलकर ब्रह्म पदार्थ को जीवित खरगोश की तरह महसूस किया जाता है। ब्रह्म पदार्थ के लिए मान्यता है कि यदि कोई इसे देखेगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी।

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जगन्नाथ से जुड़े कुछ रहस्य

  • इस मंदिर का झंडा जो रोज बदला जाता है, हमेशा हवा के विपरीत दिशा में फहराता है। वैसे आमतौर पर दिन के समय हवा समुद्र से धरती की तरफ चलती है और शाम को धरती से समुद्र की तरफ, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां यह प्रक्रिया उल्टी है। अब ऐसा क्यों है, ये रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया है।
  • जगन्नाथपुरी मंदिर समुद्र तट पर है, मंदिर में सिंह द्वार है। कहा जाता है कि सिंहद्वार तक लहरों की आवाज सुनाई देती है। लेकिन जैसे ही सीढ़ियां अंदर जाती हैं आवाज बंद हो जाती है।
  • आमतौर पर मंदिरों के ऊपर से पक्षी गुजरते ही हैं या कभी-कभी उसके शिखर पर भी बैठ जाते हैं, लेकिन इस मंदिर के ऊपर से कभी पक्षी उड़ते नहीं दिखते। इस कारण से मंदिर के ऊपर से हवाई जहाज, हेलीकॉप्टर उड़ाने की अनुमति भी नहीं है।
  • जगन्नाथ मंदिर की छाया आज तक किसी ने नहीं देखी, उसे जमीन पर कभी कोई नहीं देख पाता।
  • जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र लगा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे किसी भी दिशा से खड़े होकर देखें, पर ऐसा लगता है कि चक्र का मुंह आपकी ही तरफ है।

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Mothers Day 2022: कैसे हुई मदर्स डे की शुरुआत, जानिए कुछ रोचक तथ्य

मदर्स डे हर साल मई के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। यह दिन मां के प्यार और स्नेह को समर्पित है। इस साल मदर्स डे 8 मई को मनाया जाएगा।

माताएँ अपने बच्चों के जीवन में भिन्न होती हैं और विभिन्न प्रकार की भूमिकाएँ निभाती हैं। आप जानते हैं कि यह माँ ही है जो हमसे सच्चा प्यार करती है। हमारी सफलता के लिए प्रार्थना करती है। मां के आशीर्वाद से हम जीवन की परेशानियों और कठिनाइयों को दूर कर सकते हैं।

परिस्थिति कैसी भी हो, माँ हमारे लिए उसे संभालना जानती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस खास दिन की शुरुआत कब हुई और क्यों मनाया जाता है, आइए जानें।

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कैसे हुई इस दिन की शुरुआत

मदर्स डे जैसे खास दिन की शुरुआत एना जार्विस नाम की एक अमेरिकी महिला ने की थी। उन्हें अपनी मां से बहुत लगाव था। उनकी मां उनके लिए प्रेरणा थीं। अपनी माँ की मृत्यु के बाद, अन्ना ने शादी नहीं करने का फैसला किया।

माँ के गुजर जाने के बाद एना ने माँ से प्यार जताने के लिए मदर्स डे की शुरूआत की। तब से हर साल मई माह के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है। इस दिन को यूरोप में मदरिंग संडे कहा जाता है।

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मदरिंग सन्डे समारोह, अन्ग्लिकान्स सहित, लितुर्गिकल कैलेंडर का हिस्सा है, जो कई ईसाई उपाधियों और कैथोलिक कैलेंडर में लेतारे सन्डे, चौथे रविवार लेंट में वर्जिन मेरी और “मदर चर्च” को सम्मानित करने के लिए मनाया जाता हैं।

परम्परानुसार इस दिन प्रतीकात्मक उपहार देने तथा कुछ परम्परागत महिला कार्य जैसे अन्य सदस्यों के लिए खाना बनाने और सफाई करने को प्रशंसा के संकेत के रूप में चिह्नित किया गया था।

रविवार को ही क्यों मनाया जाता है मदर्स डे

एना जार्विस ने भले ही इस दिन की नींव रखी हो, लेकिन मदर्स डे की औपचारिक शुरुआत शुरूआत 9 मई 1914 को अमेरिकी प्रेसिडेंट वुड्रो विल्सन ने एक लॉ पास कर की थी।

जिसमें लिखा था कि मई महीने के हर दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाएगा। इसके बाद ही मदर्स डे अमेरिका, भारत और कई देशों में मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाने लगा। मदर्स डे बस एक जरिया देता है कि आप मां के लिए अपनी तरफ से कुछ कर सकें।

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भारत में मातृ दिवस का इतिहास

भारत में इस दिन की शुरुआत बहुत पहले हो गई थी या यूँ कहें कि प्राचीन काल से ऐसा नहीं हुआ है। लेकिन कुछ दशक पहले से इस दिन को बेहद खास तरीके से मनाया जाता है।

इस दिन लोग अपनी मां के साथ अलग-अलग तरह से समय बिताते हैं। कई लोग इस दिन मां को कई तरह के तोहफे भी देते हैं।

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अफ्रीका के 10 सबसे घातक और जहरीले सांप!

अफ्रीकी महाद्वीप में दुनिया के सबसे खतरनाक और जहरीले सांप पाए जाते हैं। अफ्रीकी महाद्वीप को दुनिया के अधिकांश अद्भुत स्तनधारियों के लिए जाना जाता है।

उप-सहारा अफ्रीका के कुछ हिस्सों में दुनिया की सबसे जहरीली सांप प्रजातियां भी हैं और उनमें से कुछ को दुनिया में खतरनाक जहरीले सांपों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

आज इस पोस्ट में हम आपको अफ्रीका के शीर्ष 10 सबसे जहरीले और खतरनाक सांपों के बारे में कुछ रोचक और आश्चर्यजनक तथ्य बताने जा रहे हैं, तो चलिए जानते हैं :-

ब्लैक माम्बा

ब्लैक माम्बा (डेंड्रोस्पिस पॉलीलेपिस) अफ्रीका का सबसे बड़ा विषैला सांप है, जिसकी लंबाई औसतन 2.5 मीटर (8 फीट) तक होती है, लेकिन यह 4.5 मीटर (14 फीट) तक लंबी हो सकती है।

यह बेहद आक्रामक है, और प्रहार करने में ज़रा भी संकोच नहीं करता। यह बहुत तेज और चुस्त होते हैं और उपयुक्त सतहों पर कम दूरी के लिए 16 किमी. प्रति घंटा (10 मील प्रति घंटा) की गति से आगे बढ़ सकता है।

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इसकी त्वचा का रंग स्लेटी (ग्रे) से गहरे भूरे रंग में तब्दील हो जाता है। किशोर(अल्पायु) काला माम्बा वयस्कों की तुलना में अधिक पतले होते हैं तथा वे उम्र के साथ काले हो जाते हैं। यह सवाना, वुडलैंड, चट्टानी ढलान तथा कुछ क्षेत्रों, घने जंगलों में निवास करती है।

इसका जहर एक अत्यंत शक्तिशाली न्यूरो और कार्डियो-टॉक्सिक मिश्रण है, जो एक घंटे के भीतर किसी की भी जान ले सकता है। यह मोल, चूहे, पक्षी, गिलहरी और अन्य छोटे स्तनधारियों को अपना भोजन बनता है।

मोजाम्बिक स्पिटिंग कोबरा

मोजाम्बिक स्पिटिंग कोबरा को अफ्रीकी महाद्वीप के सबसे घातक सांपों में से एक माना जाता है। मोज़ाम्बिक स्पिटिंग कोबरा (नाजा मोसाम्बिका) अफ्रीका के मूल निवासी हैं यह स्पिटिंग कोबरा की एक अत्यधिक विषैली प्रजाति है।

यह बड़े पैमाने पर अंगोला, बोत्सवाना, मलावी, मोज़ाम्बिक, नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका, तंजानिया, जाम्बिया और ज़िम्बाब्वे में पाया जाता है। ये सांप रंग में स्लेट से नीला, जैतून या ऊपर से काला होता है।

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इनकी गर्दन पर काली पट्टियों के साथ और भूरे या काले रंग के धब्बेदार या धारियां या कभी-कभी गले पर गुलाबी या पीली पट्टियां होती हैं।

वयस्कों की औसत लंबाई 90 सेमी – 105 सेमी (3-3½ फीट) के बीच होती है। लेकिन वास्तव में मापा गया सबसे बड़ा स्पिटिंग कोबरा 154 सेमी (5 फीट) नर स्पिटिंग कोबरा था।

यह सांप अपने शरीर के दो-तिहाई हिस्से को भी ऊपर उठा सकता है और 3 मीटर तक की दूरी पर बड़ी सटीकता के साथ अपने न्यूरोटॉक्सिक जहर को थूक / स्प्रे कर सकता है।

पफ एडर

पफ एडर (बिटिस एरीटेन्स) अफ्रीका में किसी भी अन्य सांप प्रजाति की तुलना में अधिक मानव मृत्यु के लिए जिम्मेदार है। यह प्रजाति महाद्वीप के सभी सर्पदंशों का लगभग 60% है।

यह अफ्रीकी महाद्वीप पर सबसे आम और व्यापक साँप प्रजाति है और रेगिस्तानी क्षेत्रों और वर्षावनों को छोड़कर पूरे अफ्रीका में मोरक्को और पश्चिमी अरब के सवाना और घास के मैदानों में पाई जाती है।

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पफ एडर कैटरपिलर की चाल के समान ही चलता है। वे अच्छे तैराक और पर्वतारोही होते हैं। जब यह सांप परेशान होता है तो जोर जोर से फुफकारता है और एक तंग कुंडल बनाता है।

एक बार में काटने से यह 100 और 350 मिलीग्राम साइटोटोक्सिक जहर के बीच इंजेक्ट कर सकता है, जबकि मानव के लिए घातक खुराक लगभग 100 मिलीग्राम है।

गैबून वाइपर

गैबून वाइपर, (बिटिस गैबोनिका), जिसे गैबॉन वाइपर भी कहा जाता है, और अत्यंत विषैला होता है। यह आमतौर पर मध्य और पश्चिमी अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय जंगलों में पाया जाने वाला सांप है।

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यह अफ्रीका का सबसे भारी विषैला सांप है, जिसका वजन से 10 किलो तक हो सकता है, और यह 2 मीटर (लगभग 7 फीट) की लंबाई तक बढ़ता है।

इस सबसे भारी वाइपरिड में बड़ा त्रिकोणीय सिर, विशाल आकार का शरीर और दुनिया में सबसे लंबे नुकीले ज़हर के दांत होते हैं।

मिस्र का कोबरा

इसके सामान्य नाम के सुझाव के बावजूद, मिस्र के कोबरा (नाजा हाजे) के लिए एकमात्र निवास स्थान नहीं है। यह प्रजाति आमतौर पर मिस्र में पाई जाती है, लेकिन वास्तव में यह अफ्रीकी कोबरा में सबसे व्यापक है।

उनका औसत आकार 1.5 से 2 मीटर के बीच है, हालांकि कुछ नमूनों की लंबाई 2.5 मीटर (8 फीट) से अधिक हो सकती है। मिस्र के कोबरा मुख्य रूप से उभयचर, पक्षियों, कृन्तकों और सरीसृपों को खाते हैं।

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मिस्र के कोबरा के जहर को उत्तरी फिलीपीन कोबरा और केप कोबरा के ठीक बाद किसी भी कोबरा प्रजाति का तीसरा सबसे जहरीला जहर माना जाता है।

वास्तव में, इसका जहर इतना शक्तिशाली है कि यह एक वयस्क हाथी को सिर्फ 3 घंटे में और एक इंसान को 15 मिनट में मार सकता है।

सॉ-स्केल्ड वाइपर

अफ्रीकी भूमध्य रेखा के उत्तर में पाए जाने वाले सॉ-स्केल्ड वाइपर (एचिस कैरिनैटस) छोटे लेकिन शातिर रूप से आक्रामक और आसानी से उत्तेजित स्वभाव वाले सांप हैं।

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वयस्क सॉ-स्केल्ड वाइपर लगभग 20 से 30 इंच की लंबाई तक पहुंचते हैं। वर्तमान में मान्यता प्राप्त 5 उप-प्रजातियां हैं।यह बिग फोर भारतीय सांपों का सबसे छोटा सदस्य है जो भारत में सबसे अधिक सर्पदंश और मौतों के लिए जिम्मेदार है।

इस सांप का जहर हीमोटॉक्सिक और बहुत शक्तिशाली होता है, कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका जहर भारतीय कोबरा की तुलना में 5 गुना अधिक जहरीला होता है, और रसेल वाइपर की तुलना में 16 गुना अधिक जहरीला होता है।

केप कोबरा

केप कोबरा को पूरे अफ्रीका में कोबरा की सबसे खतरनाक प्रजातियों में से एक माना जाता है। केप कोबरा (नाजा नीविया) अत्यधिक न्यूरोटॉक्सिक विष को सभी अफ्रीकी कोबरा में सबसे शक्तिशाली माना जाता है। इसे कभी-कभी पीला कोबरा भी कहा जाता है।

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केप कोबरा रंग में व्यापक रूप से भिन्न होते हैं, पीले से सुनहरे भूरे रंग से लेकर गहरे भूरे और यहां तक ​​​​कि काले भी। केप कोबरा की एक मध्यम आकार की प्रजाति है।

परिपक्व नमूने आम तौर पर लगभग 1.2 से 1.4 मीटर (3.9 से 4.6 फीट) लंबे होते हैं, लेकिन लंबाई में 1.6 मीटर (5.2 फीट) तक बढ़ सकते हैं। नर मादा से थोड़े बड़े होते हैं। इस सांप के काटने के 2 से 5 घंटे के बीच में मनुष्य की मृत्यु हो जाती है

बूमस्लैंग

अफ्रीका के जंगलों में पेड़ों पर पाया जाने वाला बूमस्लैंग सांप, जिसका वैज्ञानिक नाम ‘डिस्फोलिडस टाइपस’ है, बेहद खूबसूरत और आकर्षक हरे, पीले, भूरे और गुलाबी रंग की त्वचा वाला और बड़ी-बड़ी आंखों वाला, दिखने में बेहद मासूम लेकिन अत्यंत जहरीला होता है।

“बूमस्लैंग” नाम अफ्रीकी शब्द “ट्री स्नेक” से आया है, यह एक “पेड़ पर निवास” करने वाली प्रजाति है। गैबून वाइपर की तरह ही बूमस्लैंग के ज़हर के दांत बहुत नुकीले और लंबे होते हैं, और यह काटने के लिए अपना मुंह पूरे 180 डिग्री पर खोल सकता है।

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बूमस्लैंग सांप का जहर हिमोटॉक्सिन श्रेणी का होता है। हिमोटॉक्सिन का मतलब है कि इस सांप के जहर से व्यक्ति के शरीर में खून का थक्का बनने की प्रक्रिया बंद हो जाती है।

यहां तक कि व्यक्ति के शरीर के सभी छिद्रों और खुले अंगों से खून की धार बहने लगती है। इसके अलावा सिरदर्द, बेहोशी, निद्रा, मानसिक विक्षप्ति जैसे लक्षण भी सामने आने लगते हैं और आखिरकार व्यक्ति की दर्दनाक मृत्यु हो जाती है।

बूमस्लैंग सांप का एक बूंद जहर 400 से 500 लोगों की जान लेने के लिए पर्याप्त होता है। बूमस्लैंग नर काले या नीले रंग के किनारों के साथ हल्के हरे रंग के होते हैं, लेकिन वयस्क मादा भूरे रंग की हो सकती हैं।

ग्रीन मांबा

ग्रीन माम्बा विष संरचना में ब्लैक माम्बा के समान है। लेकिन यह विषाक्त के रूप में केवल दसवां हिस्सा है। यह प्रजाति चमकदार हरे रंग के साथ भिन्न होती है और औसत आकार लगभग 15.9 फीट (1.8 मीटर) होता है।

इसमें चमकीले हरे रंग के ऊपरी हिस्से और पीले-हरे रंग के अंडरपार्ट्स के साथ एक पतला निर्माण है। वयस्क महिला की औसत लंबाई लगभग 2 मीटर (6 फीट 7 इंच) होती है, और नर थोड़ा छोटा होता है।

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यह ब्लैक माम्बा की तुलना में बहुत शर्मीला और बहुत कम आक्रामक होता है, और मुख्य रूप से स्थलीय के बजाय अधिक वृक्षारोपण होता है।

ग्रीन माम्बा की दो प्रजातियां हैं, पश्चिमी ग्रीन माम्बा (डेंड्रोस्पिस विरिडिस) जो कि पश्चिम अफ्रीका के मूल निवासी हैं, और पूर्वी ग्रीन माम्बा (डेंड्रोस्पिस एंगुस्टिसेप्स) दक्षिणी अफ्रीका के पूर्वी हिस्से में पाए जाते हैं।

ग्रीन माम्बा सांप पेड़ पर रहने वाली सांप की प्रजातियां हैं, जो पूर्वी और पश्चिमी अफ्रीका के तटीय क्षेत्रों में रहते हैं। पश्चिमी हरी माम्बा और पूर्वी हरी माम्बा दो अत्यधिक विषैली लम्बी प्रजातियाँ और अत्यंत फुर्तीले साँप हैं।

बुश वाइपर

बुश वाइपर अफ्रीका के सबसे खूबसूरत और बेहद खतरनाक सांपों में से एक है, जो उप-सहारा अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका में पाया जाता है।

यह छोटा आकार का अर्बोरियल पिट वाइपर सांप अत्यधिक जहरीला होता है, लेकिन इसमें रंगों और पैटर्न की अद्भुत विविधता होती है।

बुश वाइपर (एथेरिस स्क्वैमिगेरा), को कभी-कभी लीफ वाइपर या ग्रीन बुश वाइपर भी कहा जाता है, यह एक वृक्षीय सांप है जो कांगो बेसिन, युगांडा, केन्या में अफ्रीका के वर्षा-वनों और वुडलैंड्स निवासों में रहता है।

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यह अत्यधिक विषैला होता है लेकिन अपेक्षाकृत निष्क्रिय होता है, फिर भी छेड़छाड़ होने पर यह अपना बचाव करता है। यह अक्सर छोटे कृन्तकों, मेंढकों और छिपकलियों को खिलाने के लिए जमीन पर आती हैं। यह भी पढ़ें :-

अजब गजब : इस गांव के लोग कई कई दिन सोए रहते हैं, वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

दुनिया में बहुत से लोग अक्सर नींद न आने की शिकायत करते हैं, लेकिन आज हम आपको एक ऐसी जगह के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं, जहां लोगों को कभी भी नींद आ जाती है। यहां के लोगों को बैठते, बात करते और यहां तक ​​कि चलते-फिरते भी नींद आ जाती है। तो चलिए जानते हैं इस अजीबो गरीब गांव के बारे में:-

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कहाँ पर है ये गांव

दरअसल कजाकिस्तान में स्थित इस अनोखे गांव का नाम कालाची है जहां लोग एक-दो दिन नहीं बल्कि कई हफ्तों तक सोए रहते हैं। यही कारण है कि इस गांव को ‘स्लीपी हॉलो‘ गांव के नाम से जाना जाता है।

यहां के लोग ज्यादातर सोते हुए देखे जाते हैं। उनकी सोने की आदतों के कारण इन ग्रामीणों पर कई बार शोध भी किया जा चुका है।

इस गांव के लोग घर, ऑफिस या किसी भी दुकान पर कभी भी सो जाते हैं। लोग सड़क पर चलते हुए भी सो जाते हैं और वे सड़क के किनारे सो जाते हैं। इस दौरान वह कई कई दिनों तक सोए रहते हैं और हैरानी वाली बात तो यह है कि उन्हें उठने के बाद उन्हें कुछ भी याद नहीं रहता।

दरअसल यहां के लोग नींद की अजीब समस्या से पीड़ित है। इस रोग की वजह से इन्हें कहीं भी नींद आ जाती है और ये सो जाते हैं। हैरत की बात यह है कि इन्हें नहीं पता होता कि सोने के बाद यह उठेंगे भी या नहीं।

कलाची गांव की कुल आबादी 810 है जिसमें करीब 25 फीसदी यानी की 200 लोग इस गंभीर समस्या से पीड़ित हैं। सोने की समस्या की वजह से एक व्यक्ति की जान तक चली गई थी।

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वैज्ञानिकों द्वारा इस बीमारी को लेकर अध्ययन करने के बाद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस गांव में कार्बन मोनोऑक्साइड और हाईड्रोकार्बन की मात्रा बहुत ज्यादा है जिसकी वजह से लोगों को उतनी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जितनी आवश्यकता होती है।

जिस वजह से लोग बेहोश हो जाते हैं। हालांकि रिपोर्ट्स के मुताबिक अब गांव के लोगों को इस तरह की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है।

वर्तमान में 120 परिवार कालाची में रह रहे हैं और सामान्य रूप से सो रहे हैं और किसी अजीब विकार के किसी भी प्रकरण का सामना नहीं कर रहे हैं।

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अजीबोगरीब परंपरा : इस जनजाति में परिवार के सदस्य की मृत्यु होने पर काट दी जाती है महिलाओं की उंगली

दुनिया में कई ऐसी मान्यताएं और रीति-रिवाज सदियों से चले आ रहे हैं, जो आज के समय में थोड़े अजीब लगते हैं। आज भी पूरी दुनिया में ऐसी कई परंपराओं का पालन किया जाता है जिनका कोई औचित्य नहीं है।

शहरी लोगों को ये मान्यताएं, रीति-रिवाज भले ही अजीब लगें, लेकिन आदिवासी जनजातियों के लिए ये मान्यताएं बेहद खास हैं।

आज हम आपको इंडोनेशिया की एक आदिवासी जनजाति की अजीबोगरीब परंपरा के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे जानने के बाद आप भी हैरान रह जाएंगे।

तो चलिए जानते हैं:

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस जनजाति में जब परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो परिवार की महिला के हाथ की उंगली का ऊपरी हिस्सा काट दिया जाता है।

दरअसल दानी नाम की इस जनजाति द्वारा अपने पूर्वजों की आत्मा को शांति देने के लिए यह परंपरा निभाई जाती है। इस परम्परा को इकिपलिन कहा जाता है।

इसके साथ ही उंगली काटने से यह भी पता चलता है कि मरने वाले का दर्द उंगली के दर्द से ज्यादा कुछ नहीं है और वह जीवन भर उनके साथ रहेगा।

आमतौर पर उंगली के ऊपरी हिस्से को काटने के लिए स्टोन ब्लेड का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन कुछ मामलों में, उंगली बिना ब्लेड के काट दी जाती है।

उसके लिए उंगली रस्सी से कसकर बांध देते हैं, जिससे रक्त का संचार बंद हो जाता है तो उंगली अपने आप गिर जाती है। कटी हुई उंगली को या तो दबा दिया जाता है या जला दिया जाता है।

सरकार ने सालों पहले लगा दिया था प्रतिबंध

एक रिपोर्ट के अनुसार इस आदिवासी जनजाति में निभाई जाने वाली इस प्रथा पर इंडोनेशियाई सरकार ने कई साल पहले प्रतिबंधित लगा दिया था।

लेकिन कई बुजुर्ग महिलाओं की उंगलियों को देखकर कहा जा सकता है कि वे इसका पालन करती हैं और आज भी यह माना जाता है कि यह मान्यता इस क्षेत्र में जारी है।

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