जानिए काली गाजर को खाने के चमत्कारी फायदों के बारे में!!

सर्दियों का मौसम आ गया है और इस मौसम में बाजार में गाजर खूब मिलती है, चाहें वो लाल गाजर हो या फिर काली गाजर।

काली गाजर जिसे देसी गाजर भी कहा जाता है विशेष रूप से लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है और कई तरह के विशिष्ट स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करती है।

इसमें शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाया जाता है जो सूजन (इन्फ्लेमेशन) से लड़ने और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों में लाभ देने के लिए जानी जाती है।

इस गाजर का काला या गहरा बैंगनी रंग, एंथोस्यानिन्स की उपस्थिति से आता है जो कि एक शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट है और यह एंटीऑक्सिटेंड ब्लूबेरीज, ब्लैकबेरीज, और काले अंगूर में भी पाया जाता है।

आज की इस पोस्ट में हम काली गाजर के चमत्कारी फायदों के बारे में, आइए जानते हैं

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वजन कम करने में मददगार

गाजर में कैलोरी कम होती है, जिस वजह से इसे वजन कम करने के लिए अनुकूल आहार माना जाता है। काली गाजर में घुलनशील फाइबर होता है, जो भूख को कम करने में मदद करता है।

दरअसल, इस गाजर के सेवन से पेट भरा-भरा सा लगता है, जिस कारण लोग कम खाना खाते हैं। इस वजह से इसे वजन घटाने में कारगर माना जाता है।

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ब्लड शुगर को कम करता है

इसमें पाया जाने वाला एंथोसायनिन दिल का ख्याल रखने के साथ ही ब्लड शुगर को भी कम करने में मददगार है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, काली गाजर का जूस पीने से हाई ब्लड प्रेशर, हाई ब्लड शुगर और हृदय की मांसपेशियों में जकड़न की समस्या को दूर होती है।

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आँखों के लिए है सही

यह आँखों के लिए भी सही माना जाता है। कहा जाता है कि काली गाजर में भरपूर मात्रा में आयरन मौजूद रहता है, जो आँखों के लिए सही है।

आँखों की रोशनी या फिर किसी अन्य आँखों की समस्या के लिए काली गाजर को कारगर माना जाता है। मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट से बचने के लिए भी काली गाजर का सेवन करना बेस्ट है।

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पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद

सर्दियों के मौसम में काली गाजर खाने से पाचन तंत्र सही रहता है। कहा जाता है कि इसमें फाइबर से भरपूर होती है, जिसके सेवन से पेट से जुड़ी समस्याओं को भी दूर किया जा सकता है। आप इसको ऐसे ही या हवाला या किसी अन्य डिश को बनाकर भी सेवन कर सकती हैं।

स्किन के लिए फायदेमंद

स्किन से संबंधित समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए रोजाना काली गाजर का सेवन करें। इसका सेवन स्किन के लिए काफी फायदेमंद होता है।

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कैंसर से लड़ने में मददगार

हेल्थ एक्सपर्टेस के अनुसार, काली गाजर में पाए जाने वाला एंटीऑक्सीडेंट कैंसर जैसी घातक बीमारी से लड़ने में भी मदद करता है।

महिलाओं को काली गाजर का सेवन ज़रूर करना चाहिए, क्योंकि इससे ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बहुत हद तक कम हो जाता है।

कोलेस्ट्राल लेवल नियंत्रित रहता है

काली गाजर को आप चाहे कच्चा खाएं या हलवा बनाकर यह बहुत फायदेमंद होता है। यह आपके कोलेस्ट्रॉल लेवल को बढ़ने नहीं देता है। इसका जूस पीना भी लाभदायक है।

रात को भोजन के समय आप काली गाजर का जूस पी सकते हैं। यह आपके दिल का भी ख्याल रखता है। इसमें एंथोसायनिन नामक तत्व भरपूर मात्रा में होता है, जो दिल की बीमारियों के खतरे को कम करता है।

इससे जुड़े एक अध्ययन के मुताबिक, रोजाना 0.2 मिलीग्राम एंथोसायनिन के सेवन से दिल की बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।

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त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद है गुलाब की पंखुड़ियां!!

सर्दियों का मौसम सबसे से ज़्यादा असर हमारी त्वचा पर ही डालता है। इस मौसम में अपनी त्वचा को मॉइस्चराइज करना बहुत आवश्यक होता है क्योंकि आमतौर पर बहुत से लोग अपनी त्वचा को बहुत शुष्क होने का अनुभव करते हैं।

अगर आप मौसम के रूखेपन से बचना चाहते हैं तो गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह त्वचा को चमकदार और स्वस्थ बनाती हैं, इनमें एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो त्वचा को ताजगीभरा रखने के साथ-साथ रक्तसंचार में भी सुधार करते हैं।

आज इस पोस्ट के माध्यम से हम जानेगें गुलाब की पंखुड़ियों के फायदों के बारे में, तो चलिए जानते हैं,

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रूखी त्वचा के लिए

गुलाब की पंखुड़ियों को गुलाब जल या दूध में मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें। अब 1 चम्मच पेस्ट में एक चम्मच शहद अच्छी तरह से मिला लें। पैक को चेहरे पर लगाकर 20 मिनट के लिए छोड़ दें। इसके बाद गुनगुने पानी से चेहरा धो लें।

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तैलीय त्वचा के लिए

संतरे के छिलकों को सुखाकर पीस लें। अब एक कटोरी में 2 चम्मच संतरे का पाउडर, 2 चम्मच गुलाब की पंखुड़ियों का पेस्ट और 1 चम्मच शहद डालकर मिला लें। इसे चेहरे व गर्दन पर लगाएं और 20 मिनट बाद गुनगुने पानी से धो लें।

सामान्य त्वचा के लिए

1 चम्मच गुलाब की पंखुड़ियों के पेस्ट को 1 चम्मच एलोवेरा जैल में मिला लें। इस पेस्ट को चेहरे पर 15 से 20 मिनट के लिए लगाएं और सामान्य पानी से चेहरा धो लें। यह पैक सामान्य व मिली-जुली त्वचा वालों के लिए बढ़िया है।

निखार के लिए

गुलाब की पंखुड़ियों का पेस्ट 2 चम्मच, 1 चम्मच नींबू का रस, 1 चम्मच चंदन पाउडर और 1 चुटकी हल्दी मिलाएं। अब इस पेस्ट को चेहरे व गर्दन पर लगाएं और 15-20 मिनट बाद ठंडे पानी से धो लें। सप्ताह में 3 दिन इसका इस्तेमाल करें।

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मुंहासों से रक्षा

पुरुष और महिलाएं दोनों ही कील-मुंहासों से परेशान रहते हैं। लेकिन गुलाब से बना फेस पैक इस परेशानी को कम कर सकता है। इसके एंटी-बैक्टीरियल और एंटी इंफ्लेमेटरी गुण मुहांसों को बढ़ने से रोकते हैं।

पोषण के लिए

गुलाब में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स चेहरे की मांसपेशियों को कसते हैं, त्वचा की कोशिकाओं को पोषण देते हैं।

सनबर्न में सहायक

गुलाब जल में प्रभावी एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। जो त्वचा पर सन प्रोटेक्टिंग एजेंट की तरह काम करते हैं। इससे बना फेस पैक त्वचा को सूरज के हानिकारक प्रभावों से बचाता है। साथ ही गुलाबजल फ्री रैडिकल्स के असर को कम करके सनबर्न से भी राहत दिलाता है।

चमक के लिए

गुलाब त्वचा पर निखार लाने में सहायक होता है। एक शोध के अनुसार गुलाब में वाइटनिंग गुण होते हैं जिससे चेहरे की रंगत में निखार लाया जा सकता है।

अतिरिक्त तेल को करे दूर

मुल्तानी मिट्टी और गुलाब जल से बना फेस पैक त्वचा क्लेन्जर के रूप में काम करता है। ये त्वचा से ब्लैक और वाइट हैड्स को हटाकर, बंद रोमछिद्रों को खोलने में मदद करता है।

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जाने विश्व में नए वर्ष की ‘अनोखी परम्पराएं’

अंतर्राष्ट्रीय मानक समय के अनुसार लगभग 3,15,56,000 सैकेंड का समय एक वर्ष के बराबर होता है। इसे 8760 घंटे या 5,25,600 मिनट के बराबर मान सकते हैं। प्रायः इस समय के बाद ही नए वर्ष का आगमन होता है तथा फिर एक बार समय की सुइयां अपनी गिनती अविराम रूप से शुरू कर देती हैं।

विश्व भर में एक और नव वर्ष का आयोजन धूमधाम से करने की तैयारियां लगभग पूर्ण हो चुकी हैं। हालांकि, दुनिया भर में इसे मनाने का अलग अलग तरीका सदियों से प्रचलित है। कुछ लोग इसे त्यौहार के रूप में मनाते हैं तो कुछ पारम्परिक तरीके से मनाते हैं।

चलिए जानते हैं इस पोस्ट के माध्यम से:-

दिवाली जैसी रौनक

जापान में नव वर्ष को भारत के दीपावली त्यौहार की तरह मनाते हैं। इस दिन लोग अपने घरों एवं गली-मोहल्लों की सफाई तथा मकानों का रंग-रोगन करते हैं।

गृहणियां अपने घरों की सजावट आकर्षक ढंग से करती हैं तथा लोग सज-धज कर संगीत की लय पर नाचते-गाते हैं। जापानी लोग मानते हैं कि नव वर्ष के दिन उपहार प्राप्त होने पर वर्ष भर उपहार मिलेंगे। इसी प्रकार वे लोग पुराने वर्षों के कर्जा को नव वर्ष के दिन चुका देना अच्छा मानते हैं।

घर में आने वाला पहला पुरुष

स्कॉटलैंड में नए साल के जश को ‘हॉगमैनी‘ पुकारा जाता है। ‘फर्स्ट फुटिंग‘ यानी पहला कदम इस समारोह का एक पारम्परिक हिस्सा है।

यह तब होता है जब आप दोस्तों या परिवार के पास आधी रात के तुरंत बाद जाते हैं ताकि उनसे मिलने और नए साल में उनके घर जाने वाले पहले व्यक्ति बन सकें।

मान्यता के अनुसार नए साल में आपसे मिलने वाला पहला व्यक्ति लंबा, काले बालों वाला होना चाहिए। आने वाला ‘ब्लैक बन‘- एक तरह की ब्रैड उपहार के रूप में लाता है ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि जिस घर में आप जा रहे हैं, वहां रहने वाले लोग आने वाले वर्ष में भूखे न रहें।

आने वाले महीनों में घर गर्म रहे यह सुनिश्चित करने के लिए कोयला भी ले जाया जाता है। नए साल से पहले लोगों द्वारा अपने घरों को साफ करना और चिमनी में जमा पुरानी राख को निकालने की भी परम्परा है। यह नव वर्ष का स्वागत करने के लिए पुराने साल को साफ करने का प्रतीक है।

ठंडे पानी में छलांग

दुनिया के कई ठंडे देशों में नव वर्ष के दिन बर्फीले पानी में डुबकी लगाने की परम्परा है। उत्तर अमरीका में ‘पोलर बियर क्लब‘ ने सर्दियों के महीनों में बर्फीले पनी में डुबकी लगाने की इस परम्परा को लोकप्रिय बनाने में खूब मदद की है।

1903 में ‘कोने आइलैंड पोलर बियर क्लब‘ की स्थापना करने वाले बर्नार्ड मैकफैडेन का मानना था कि सर्दियों के दौरान समुद्र में डुबकी लगाना सहनशक्ति, पौरुष और प्रतिरक्षा के लिए वरदान हो सकता है।

इस क्लब ने सन् 1903 में पहली बार बर्फीले पानी में डुबकी लगाने वाले इवेंट की शुरूआत की थी। आज कनाडा से लेकर नीदरलैंड तक 1 जनवरी को लोग सामूहिक रूप से बर्फीले पानी में उतरते हैं।

कड़कड़ाती ठंड के बावजूद बर्फीले पानी में नहाना किसी कमजोर दिल और कमजोर शरीर वाले इंसान के लिए नहीं है। हालांकि, साल के पहले दिन हजारों साहसी लोग समुद्र और नदियों के माइनस तापमान वाले पानी में डुबकियां लगाते हैं।

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पीले रंग का उत्सव

पेरू में पीले रंग को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है और लोग अक्सर नव वर्ष की पूर्व संध्या पर पीले रंग के अंडरवियर पहनते हैं ताकि नए साल में भाग्य उनके साथ बना रहे।

देश भर में लगने वाले मेलों में पुरोहित विशेष अनुष्ठान करते हैं जिनमें पीले फूलों की भक्तों पर बौछार की जाती है अथवा उनके शरीर पर से गिनी पिग को गुजारा जाता है।

इसके अलावा आधी रात को हजारों लोग सड़क पर उतरते हैं और आतिशबाजियां जलाते हैं। दावत में सबसे पहले पेरू वासी 12 अंगूर खाते हैं।

गुलाबों की परेड

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‘रोज परेड‘ यानी गुलाबों की परेड की शुरूआत 1890 में अमरीकी राज्य कैलिफोर्निया के पासाडेना में शुरू की गई थी। इसका मकसद शहर को प्रसिद्धि प्रदान करना था।

टूर्नामेंट ऑफ रोजेज एसोसिएशन ने पूर्वी तट के दोस्तों को यहां के गर्म मौसम में विभिन्न खेल खेलने के लिए आमंत्रित किया। सर्दियों के मौसम में भी इलाके में खिलने वाले तरह-तरह के ताजे फूलों को परेड की झांकियों में दिखाया जाता है।

धन का शुद्धिकरण

जापान में यह भी माना जाता है कि नव वर्ष के दौरान मंदिर में पवित्र जल में नोटों को धोने से धन की वृद्धि होती है। राजधानी टोक्यो के दक्षिण में स्थित कामाकुरा नामक स्थान के जेनियाराई-बेटेन मंदिर में भी बड़ी संख्या में लोग अपने साथ नोटों को मंदिर के पवित्र जल से शुद्ध करते हुए नए साल का जश्न मनाते हैं।

सूमो पहलवानों का अनुष्छन

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जापान में ही एक और रिवाज है कि सूमो ग्रैंड चैम्पियंस नए साल का जश्न मेइजी जिंगू श्राइन में अनुष्ठान के साथ मनाते हैं।

जापान की राजधानी टोक्यो में स्थित मेइजी जिंगू श्राइन में सूमो ग्रैंडचैम्पियन ‘दोह्यो-इरी‘ नामक अंगूठी शुद्धिकरण अनुष्ठान के दौरान विशेष प्रकार के नृत्य का प्रदर्शन करते हैं।

जमीन में स्वर्ण मुद्राएं गाड़ना

यूनान में लोग रात को 12 बज कर 1 मिनट पर गिरजाघरों के पीछे जमीन में स्वर्ण मुद्राएं गाड़कर उस पर सौभाग्य के जन्म का प्रतीक एक वृक्ष का पौधा लगाते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि इससे वर्ष भर समृद्धि बनी रहेगी।

अफ्रीकी देशों में

अफ्रीकी देशों में नव वर्ष का नजारा अलग होता है। लोग 31 दिसम्बर को आग बुझा देते हैं तथा वर्ष के प्रथम दिन फिर जलाते हैं और इसके बाद खुशी एवं उत्साह से नव वर्ष का स्वागत करते हैं।

दक्षिण अफ्रीका में ‘जूलू‘ जाति के लोग इस दिन अपने बेटे-बेटियों की शादी धूमधाम से करते हैं तथा शादी के बाद नवविवाहित जोड़ा निहत्थे खूखार सांड से लड़ कर अपने साहस एवं पराक्रम का परिचय देता है।

नव वर्ष असीम सम्भावनाएं पेश करता है तथा विश्व भर के लोग अगले वर्ष में शुभ कार्यों की प्रतीक्षा में तथा बीते वर्ष को भुलाने की परम्परा को अपने-अपने ढंग से निभाते हैं।

पंजाब केसरी से साभार

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एक ऐसा देश जहाँ मर्दों को दो शादियां करना है जरुरी, नहीं तो….

दुनिया के हर देश में शादी से जुड़ी अलग-अलग रीति रिवाज होते हैं। यदि हम भारत की बात करें तो यहाँ एक व्यक्ति को केवल एक ही शादी करने की इजाजत है। यदि वह दूसरी शादी करना भी चाहे तो उसे पहली पत्नी से तलाक लेना होता है। वहीं दूसरी ओर एक देश ऐसा भी है, जहाँ दो शादियां न करने पर सजा हो जाती है।

जी हाँ, आज इस पोस्ट में आपको एक ऐसे ही अजीबो गरीब देश के बारे में बताने जा रहे हैं, जहाँ एक मर्द को दो शादियां करनी ही पड़ती हैं, तो चलिए जानते हैं :-

A country where men have to have two marriages is necessary, otherwise...

कहाँ है यह अजीबो-गरीब नियम

यह अजीबो-गरीब नियम और कानून अफ्रीकी देश इरीट्रिया में है। जहां एक पुरूष को दो शादियां करनी पड़ती है। अगर कोई पुरूष इस बात से इंकार कर देता है तो उसे जेल में डाल दिया जाता है।

जेल तक तो ठीक है लेकिन सजा के तौर पर उसे उम्र कैद की सजा भी दी जा सकती है। वहीं अगर कोई महिला अपने पति को ऐसा करने से रोकती है तो फिर उस महिला को भी सजा दी जाती है।

क्यों करनी पड़ती हैं दो शादियां

इरीट्रिया की सरकार के अनुसार सभी मर्दों को दो शादियां करना जरूरी है, इस फैसले के पीछे सरकार का कहना है कि इरीट्रिया कई बार गृह युद्धों का शिकार चुका है जिसकी वजह से यहां पुरूषों की संख्या महिलाओं की अपेक्षा कम होती जा रही है।

इरीट्रिया में 1998 से 2000 के बीच हुए गृहयुद्धों में करीब 150,000 इरीट्रियन सैनिक मारे जा चुके हैं। उस समय इस देश की जनसंख्या चार मिलियन थी। गृहयुद्ध के बाद यहां लगातार पुरूषों की जनसंख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है।

इस कारण से वहां लड़कियों के मुकाबले लड़कों की संख्या काफी कम है। सरकार का मानना है कि महिलाएं अकेले या फिर बिना शादी के अपने जीवन को नहीं बिता सकती।

ऐसे में महिलाओं की सुरक्षा और देश की घटती आबादी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने ऐसा फैसाल किया है।

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सेहत के लिए बेहद जरूरी है संतुलित आहार!!

संतुलित आहार में ऐसे खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए जिनमें विटामिन, मिनरल और पोषक तत्व उच्च मात्रा में हों और वसा तथा शूगर कम मात्रा में हों।

आज इस पोस्ट में हम कुछ खाद्य पदार्थ बताने जा रहे हैं जो संतुलित भोजन का अभिन्न हिस्सा हैं, जिन्हें रोज के भोजन में शामिल कर शरीर को जरूरी पोषक तत्व दिए जा सकते हैं।

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फल

फलों में न केवल पोषक तत्वों की उच्च मात्रा होती है बल्कि ये जल्दी पचने वाले, आसानी से उपलब्ध भी हो जाते हैं। भूख लगने पर बिना झंझट तुरंत इन्हें खाया जा सकता है।

फलों को मौसम के अनुरूप ही खाएं जिससे केवल स्वाद ही न मिले बल्कि आपको ताजे और शरीर को फायदा पहुंचाने वाले फल मिल सकें।

सब्जियां

सब्जियां खनिज और विटामिन पाने का सबसे आसान तरीका है। ऐसे में रोज के भोजन में ज्यादा से ज्यादा सब्जियों को शामिल करें।

हरी पत्तेदार सब्जियों के साथ विभिन्न रंगों की सब्जियों से आपको अलग-अलग पोषक तत्व मिल जाते हैं। पालक, बींस, ब्रोकली आदि ज्यादा से ज्यादा खाएं।

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अनाज

सफेद चावल और सफेद ब्रैड यानी कि मैदा से बने खाद्य पदार्थों की जगह ब्राऊन राइस और ब्राऊन ब्रैड आदि को अपने खाने में शामिल करें। साबुत अनाज, जैसे दलिया आदि भी शरीर को बेहद फायदा पहुंचाता है। साबुत दालें भी रोजाना खानी चाहिएं।

प्रोटीन

बींस प्रोटीन के प्राथमिक स्रोत हैं जो शरीर की मांसपेशियों को मजबूत बनाते हैं साथ ही दिमाग को भी तेज बनाते हैं। लो फैट मीट जैसे चिकन, मछली आदि भी स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर होते हैं। दालें, सूखे, मेवे, टोफू, पनीर आदि भी प्रोटीन के अच्छे स्रोत हैं।

डेयरी उत्पाद

डेयरी उत्पादों में कैल्शियम, विटामिन ‘डी’ और अन्य पोषक तत्व होते हैं। वसा भी डेयरी उत्पादों में अधिक होती है, ऐसे में लो फैट दूध और अन्य उत्पादों जिनमें वसा की मात्रा कम हो, का इस्तेमाल किया जा सकता है।

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वसा और कम मीठा

वसा और चीनी दोनों ही शरीर को ऊर्जा देते हैं लेकिन जब हम उन्हें जरूरत से ज्यादा खाते हैं तो हमारे शरीर में ज्यादा मात्रा में ऊर्जा जमा हो जाती है, इतनी कि हम उसे खर्च नहीं कर पाते।

इसी का नतीजा है कि शरीर में वसा एकत्र होने लगती है और शरीर मोटा होने लगता है। इस वजह से शरीर में टाइप 2 डायबिटीज, हृदय संबंधी रोग, कैंसर और स्ट्रोक जैसी बीमारियां हो जाती हैं।

महिलाओं के लिए पौष्टिक आहार

महिलाओं की पौष्टिकता संबंधी आवश्यकताएं पुरुषों से भिन्न होती हैं। उनको अपने काम व मासिक धर्म की वजह से भोजन में अधिक लौह तत्व व अन्य पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है।

उन्हें अपने सही स्वास्थ्य के लिए भोजन में संतुलित मात्रा में सभी प्रकार के भोज्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए व विभिन्न पौष्टिक आहार बनाकर खाने चाहिएं। कई सारी पौष्टिक रेसिपीज हैं जिन्हें हम घर में आसानी से उपलब्ध चीजों से बना सकते हैं।

प्रतिदिन हमें भोजन में दाल, चावल, सब्जी, रोटी इत्यादि के साथ-साथ दही, दूध, घी, मक्खन, सलाद व फल का भी सेवन करना चाहिए। इसी तरह ऊपर दिए गए खाद्य उत्पादों को भी खाने में प्रयोग करना चाहिए।

पंजाब केसरी से साभार

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जानिए ‘ओक ट्री’ से जुड़े 20 रोचक तथ्य!!

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धरती पर सबसे पुराने वृक्षों की बात आए तो ओक ट्री पहले नंबर पर आता है। Oak tree यानि ओक के पेड़ को हिंदी में शाहबलूत, बलूत या बाँज कहा जाता है। इसका वानस्पति नाम Quercus है। ये पेड़ मनुष्यो के साथ साथ जानवरों के लिए भी काफी फलदाई है।

पहले के जमाने में मनुष्य ओक ट्री से ही अपने रहने का घर बनाते थे और जानवर इसी पेड़ की पत्ती को खाकर अपना जीवनयापन करते हैं। ये पेड़ दिखने में काफी विशाल व आकर्षक होते हैं।

आज इस लेख में हम आपको ओक ट्री के बारे में 20 रोचक तथ्य बताने जा रहें हैं, तो चलिए जानते हैं:-

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  • ओक का पेड़ (Oak Tree) अमेरिका, यूरोप और एशिया के कई देशों में पाया जाता है। भारत में भी हिमालय क्षेत्र में ओक ट्री मिलता है।
  • दुनियाभर में इसकी कई प्रजातियां पायी जाती हैं। मुख्य प्रजातियों में काला ओक, सफेद ओक, लाल ओक, इंग्लिश ओक आदि हैं। एक अनुमान के अनुसार पृथ्वी पर ओक की 600 के करीब प्रजातियां हैं।
  • ओक का पेड़ एक विशाल पेड़ होता है। इसकी ऊंचाई करीब 70 फीट तक होती है और फैलाव बहुत ज्यादा होता है। इसकी शाखाओं की लंबाई करीब 130 फीट तक चली जाती है। यह पेड़ बरगद की तरह फैलता है।
  • ओक के पेड़ की पत्तियों के किनारों पर दांते या खांचे बने होते हैं। इसकी पत्तियां चौड़ी होती हैं। प्रजाति के अनुसार पत्तियों की बनावट में कुछ अंतर हो सकता है।
  • ओक ट्री की खासियत उस पर लगने वाले फल भी हैं। ये फल नट्स की तरह होते हैं, जो ओक के पेड़ पर रहने वाले जीवों का भोजन भी है। ओक के फल में एक बीज होता है, जो एक बाहरी मोटी परत से ढंका रहता है।
  • ओक ट्री में एंटीसेप्टिक गुण होते है। चोट लगने या घाव होने पर ओक की छाल लगाने से बैक्टेरिया खत्म हो जाते है।
  • बसंत ऋतु में इस पेड़ में दो तरह के विशेष फूल लगते हैं, एक नर फूल होता है व दूसरा मादा फूल होता। ओक के पेड़ों में उनकी शाखा के एक भाग में नर फूल व उसी शाखा के दूसरे भाग में मादा फूल होता है।
  • आपको जानकर हैरानी होगी कि ओक का पेड़ एक दिन में करीब 185 लीटर पानी सोक लेता है। इसलिए यह पेड़ वही पर लगता है जहां पानी भरपूर हो।
  • शुरुआत में फल हरा, लेकिन पकने पर लाल और हल्के पीले रंग का हो जाता है। यह भी बड़ी रोचक बात है कि ओक के पेड़ पर फल करीब 20 साल बाद आते हैं।
  • ओक का पेड़ कुछ देशों का राष्ट्रीय वृक्ष भी है। इन देशों में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, साइप्रस, जर्मनी इत्यादि देश आते हैं।
  • आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया का सबसे पुराना पेड़ ओक का ही है। अमेरिका में द ग्रेट ओक ट्री (The Great Oak Tree) नामक पेड़ है, जो करीब 2 हजार साल पुराना माना जाता है।
  • यह पेड़ बहुत खूबसूरत होता है क्योंकि इसकी बनावट और पत्तियां दिखने में सुंदर होती है। इसी कारण ओक वृक्ष को बाग बगीचों और सड़कों के किनारे लगाया जाता है।
  • 19 वीं शताब्दी के मध्य तक ब्रिटिश शाही नौसेना के जहाजों का निर्माण ओक से किया जाता था। वर्तमान समय में इसका उपयोग फर्नीचर बनाने में किया जाता है।
  • कुछ वाद्य यंत्रों में भी इसकी लकड़ी का उपयोग होता है, क्योंकि यह काफी कीमती व मजबूत होता है, यामहा के ड्रम को बनाने के लिए ओक की लकड़ी का उपयोग किया जाता है।
  • ग्रीक के पौराणिक कथा में, ओक के पेड़ को देवताओं के राजा ज़ीउस के लिए एक पवित्र पेड़ की मान्यता प्रदान किया गया है।
  • इस पेड़ पर एक साल में लगभग 2000 फल उग आते हैं। इसके 10,000 एक्रोन के फलों में से केवल कुछ फल ही ऐसे होते है जिनसे ओक पेड़ उग जाये। ज्यादातर फल पक्षियों वह जानवरों द्वारा खा लिये जाते हैं।

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  • इसका फल पकने के बाद लाल रंग का और बीच बीच में पीला होता है। इसके फल पकने के बाद काफी मीठे (sweet) होते हैं लेकिन कुछ प्रजातियों के फल पकने के बाद कड़वे भी हो जाते हैं। फलों की विशेषता में छुपी एक ये भी है कि इस पेड़ के फल खाने के अलावा टैनिन बनाने के काम मे भी आता है जो चमड़े को पकाने में काम में लिया जाता है।
  • भारत के उत्तराखंड राज्य में इस पेड़ का महत्व कुछ ज्यादा ही है वहां के लोग इसको green gold यानी कि हरा सोना के नाम से पुकारते हैं

जानिए सांता की सवारी ‘रेंडियर’ के बारे में 10 रोचक तथ्य !!

रेंडियर या कैरिबू पृथ्वी से सुदूर-उत्तर के बर्फ़ीले आर्कटिक और उपार्कटिक इलाक़ों में मिलने वाली एक हिरण की नस्ल है। जब क्रिसमस की बात होती है तो सबसे पहले ध्यान में आता है रेंडियर, क्योंकि सांता की सवारी तो यही है न!

आज इस पोस्ट में हम आपको रेंडियर से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में बताने जा रहें चलिए जानतें हैं:-

रोचक तथ्य

  1. रेंडियर अमेरिका और कैनेडा में ‘कैरिबू’ नाम से प्रचलित है। बाकी स्थानों पर ‘रेंडियर‘ के नाम से जाना जाता है।
  2. इनके खुर (Hooves) गर्मियों में जब ज़मीन नर्म होती है, तब फैलते हैं और सर्दियों में ज़मीन सख्त होने पर सिकुड़ (Srink) जाते हैं।
  3. रेंडियर की नाक पूरी तरह से बालों से ढंकी होती है। इनकी नाक की विशेषता यह है कि ये हवा को फेफड़ों में जाने से पहले गर्म करती है।
  4. ये नाक से लेकर पैरों के नीचे तक बालों से ढंके होते हैं, जो जमी हुई ज़मीन और बर्फ पर चलते समय इनको अच्छी पकड़ देते हैं।
  5. फीमेल रेंडियर एक बार में ज़्यादातर एक ही बच्चे को जन्म देती है। जन्म के समय इनका वजन 3 से 9 किलो तक हो सकता है।
  6. हिरणों की सबसे छोटी प्रजाति दक्षिणी पुडु (Southern pudu) है। इसका वजन 9 किलो के आसपास होता है और पूरी तरह से विकसित होने पर यह लगभग 36 सेंटीमीटर तक लंबे होते हैं।
  7. हिरणों की सबसे बड़ी प्रजाति मूस या एल्क (Moose or Elk) है। इसकी लंबाई करीब 2 मीटर तक होती है और वजन लगभग 820 किलो तक हो सकता है।
  8. रेंडियर हिरण की ऐसी प्रजाति है जिसे पालतू बनाया जाता है। उनका अधिकतर इस्तेमाल बोझ उठाने, दूध, मीट आदि के लिए किया जाता है। साथ ही इनकी खालों (Skin) का इस्तेमाल भी कई चीजों को बनाने में किया जाता है।
  9. रेंडियर का रंग और आकार स्थान के अनुसार अलग-अलग होता है। मेल और फीमेल दोनों के सींग होते हैं, पर मेल रेंडियर के सींग बड़े होते हैं। कुछ प्रजाति ऐसी भी हैं जिनमें फीमेल के सींग नहीं होते।
  10. रेंडियर का जीवनकाल लगभग 15 से 20 साल तक का होता है।

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कोई भी चीज़ जो जगह घेरती हो और जिसका कोई आकार या पिंड हो, हम उसे पदार्थ कहते हैं। लोहा, सोना, चांदी, पानी, आक्सीजन आदि ये सब पदार्थ हैं। आमतौर पर धातुएं – ठोस, पानी तरल तथा ऑक्सीजन-गैसीय अवस्था में पाई जाती हैं लेकिन ये सभी पदार्थ इन तीनों में से किसी भी अवस्था में हो सकते हैं जैसे कि ठोस, तरल या गैस।

पदार्थ आधारभूत इकाइयों से मिल कर बना होता है जिसे मॉलिक्यूल्स कहा जाता है जो आगे खुद छोटी इकाइयों में बंटे होते हैं जिन्हें अणु या एटम कहा जाता है।

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ठोस अवस्था

ठोस अवस्था में किसी तत्व के मालिक्यूल्स एक-दूसरे के बहुत करीब होते हैं। उनके बीच की आकर्षण शक्ति बहुत शक्तिशाली होती है। इसी कारण ठोस पदार्थ की आकृति, आकार तथा घनत्व निर्धारित होते हैं और उन्हें आसानी से दबाया नहीं जा सकता।

तरल अवस्था

तरल अवस्था में पदार्थ के मालिक्यूल्स एक-दूसरे के इतने करीब नहीं होते और इसी के साथ उनमें खिंचाव की शक्ति भी तुलाना में कम होती है। परिणामस्वरूप तरल उसी पात्र की आकृति ग्रहण कर लेते हैं जिसमें उन्हें रखा जाता है लेकिन उनका भार वही रहता है।

गैसीय अवस्था

गैसीय अवस्था में मालिक्यूल्स एक-दूसरे से बहुत दूर होते हैं तथा उनमें खिंचाव की शक्ति बहुत कम होती है। इसका परिणाम यह होता है कि न तो इनकी आकृति और न ही भार एक जैसा रहता है। यह उस पात्र की आकृति प्राप्त कर लेता है जिसमें इसे रखा जाता है तथा इसे आसानी से दबाया जा सकता है।

ब्रह्मांड में पाए जाने वाले सभी तत्व इन उपरोक्त अवस्थाओं में पाए जा सकते हैं यानी ठोस, तरल तथा गैस में। उदाहरण के लिए पानी जो सामान्यतः तरल अवस्था में होता है बर्फ के रूप में जमने पर ठोस अवस्था प्राप्त कर लेता है और जब उसे वाष्पीकृत किया जाता है तो यह गैस का रूप लेता है।

इसी तरह से सामान्य स्थितियों में ऑक्सीजन एक गैस है लेकिन इसको ठंडा करके तरल या ठोस अवस्था में बदला जा सकता है।

पदार्थ की इन तीन अवस्थाओं के अतिरिक्त एक चौथी अवस्था भी है प्लाज्मा। पदार्थ के मालिक्यूल तथा अणु इस अवस्था में आयनीकृत (आयोनाइन्ड) होते हैं। इस अवस्था में पॉजिटिव तथा नेगेटिव दोनों तरह के आयन होते हैं।

फ्लोरेसैंटट्यूब में चमकदार पदार्थ प्लाज्मा अवस्था होती है जो रेडियो तरंगों को प्रतिबिंबित करता है। आमतौर पर तापमान को कम करने से तत्व ठोस अवस्था में आ जाता है तथा तापमान को उच्च दर्जे तक बढ़ाने से गैसीय अवस्था में पहुंच जाता है।

पंजाब केसरी से साभार

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जानिए कैसे शुरू हुई सांता की परम्परा

माना जाता है कि 25 दिसम्बर को क्रिसमस के अवसर पर बच्चों के प्यारे सांता क्लॉज दुनिया भर में घूम कर बच्चों को गिफ्ट्स बांटते हैं। हो…हो…हो…कहते हुए लाल-सफेद कपड़ों में बड़ी-सी सफेद दाढ़ी और बालों वाले सांता क्लॉज बच्चों के चेहरे पर खुशियां बिखेरने के लिए आते हैं।

कंधे पर तोहफों से भरी पोटली, हाथ में क्रिसमस बैल लिए सांता का इंतजार हर बच्चे को रहता है। सांता की तरह उनका इतिहास भी बहुत निराला है।

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कैसे शुरू हुई सांता की परम्परा

सांता क्लॉज के संबंध में कहा जाता है कि वह रेडियरों से खींची जाने वाली स्लेज पर सवार होकर किसी बर्फीले स्थान से आते हैं। वह चिमनियों के रास्ते घरों में प्रवेश करके सभी बच्चों को उपहार देते हैं।

सांता क्लॉज की परम्परा की शुरूआत संत निकोलस ने चौथी-पांचवीं सदी में हुई थी। वह बच्चों और नाविकों से बेहद प्यार करते थे। उनका उद्देश्य था कि क्रिसमस और नववर्ष के दिन गरीब-अमीर सभी प्रसन्न रहें।

उनका जन्म तीसरी सदी में तुर्किस्तान के मायरा नामक शहर में हुआ था। वह एक रईस परिवार से थे। निकोलस जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। उनकी दयालुता के किस्से लम्बे अर्से तक कथा-कहानियों के रूप में चलते रहे हैं।

संत निकोलस के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कोंस्टेंटाइन प्रथम के सपने में आकर 3 सैनिक अधिकारियों को मृत्युदंड से बचाया था। 17वीं सदी तक इस दयालु बुजुर्ग का नाम संत निकोलस के स्थान पर ‘सांता क्लॉज‘ हो गया।

यह नाम डेनमार्क वासियों की देन है। वहां के लोग संत निकोलस को ‘सेन्टरी क्लॉज’ पुकारते थे। आगे चलकर इसी का परिवर्तित रूप ‘सांता क्लॉज‘ यूरोपीय चर्च प्रधान देशों में प्रचलित हुआ।

आधुनिक युग में क्रिसमस के अवसर पर सांता क्लॉज का महत्व इतना अधिक बढ़ गया है कि उन्हें ‘क्रिसमस का पिता‘ (फादर ऑफ क्रिसमस) और ‘फादर ऑफ जनवरी‘ तक कहा जाता है।

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सांता के रॅडियर

सांता क्लॉज के रेडियरों के नाम हैं- ‘रुडोल्फ, डेशर, डांसर, प्रेन्सर, विक्सन, डेंडर, ब्लिटजन, क्युपिड और कोमेट‘। आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर सांता के रेडियर उड़ते कैसे होंगे!

क्रिसमस और सांता क्लॉज से कई मान्यताएं जुड़ी हैं। कहा जाता है कि बरसों पहले जब सांता क्लॉज ने रेडियरों पर झिलमिलाती हुई ‘मैजिक डस्ट’ डाली तो वे फुर्र से उड़ गए।

‘मैजिक डस्ट’ छिड़कने से रेडियर क्रिसमस लाइट की स्पीड से उड़ने लगते ताकि सांता हर बच्चे के पास पहुंचकर उन्हें गिफ्ट दे सकें। मान्यता है कि बच्चे गहरी नींद में सो जाते हैं, तो सांता तोहफा रखकर अगले बच्चे के घर निकल जाते हैं।

कैसे बना सांता का हुलिया

आजकल जिस रूप में हम सांता को देखते हैं, शुरूआती दौर में उनका हुलिया ऐसा नहीं रहा होगा तो फिर लाल और सफेद रंग के कपड़े पहने लंबी दाढ़ी और सफेद बालों वाले सांता का यह हुलिया आखिर आया कहां से?

दरअसल, 1822 ईस्वी में क्लीमेंट मूर की कविता ‘नाइट बिफोर क्रिसमस‘ में छपे सांता के कार्टून ने दुनिया भर का ध्यान खींच लिया।

फिरथामस नस्ट नामक पॉलिटिकल काटनिस्ट ने हार्पर्स वीकली के लिए एक कार्टून तैयार किया था, जिससे सफेद दाढ़ी वाले सांता क्लॉज को यह लोकप्रिय शक्ल मिली।

धीरे-धीरे सांता की शक्ल का उपयोग विभिन्न ब्रांड्स के प्रचार के लिए किया जाने लगा। आज के जमाने के सांता का अस्तित्व 1930 में आया। हैडन संडब्लोम नामक एक कलाकार कोका-कोला की एड में सांता के रूप में 35 वर्षों तक दिखाई दिया।

सांता का यह नया अवतार लोगों को बहुत पसंद आया और आखिरकार इसे सांता के नए रूप के साथ स्वीकार किया गया। जो आज तक लोगों बीच काफी मशहूर है।

पंजाब केसरी से साभार

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जानिए क्यों सजाते हैं क्रिसमस ट्री

यहाँ पर होती है दुनिया सबसे अजीबो गरीब प्रतियोगिता!!

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प्रतियोगिता लोगों को अपने जीवन में विपरीत स्थितियों का सामना करने के लिए तैयार करती है और चुनौती और परिवर्तन की सूरत में डटकर मुकाबला करना सिखाती है।

यूँ तो दुनिया में बहुत सी प्रतियोगिताएं होती रहती है जिनमें से कुछ बेहद अजीबोगरीब भी होती हैं। आज की इस पोस्ट में आपको बताने जा रहें ऐसी प्रतियोगिता के बारे में, जो शायद न आपने कभी देखी होगी न कभी उसके बारे में सुना होगा, तो चलिए जानते हैं

कहाँ होती है ये प्रतियोगिता

हर कोई खूबसूरत दिखना चाहता है लेकिन क्या हो अगर लोग खूबसूरत की बजाय बदसूरत दिखने की होड़ में शामिल हो जाएं। ऐसा ही कुछ देखने को मिला स्पेन के ट्क्नॉस शहर में।

दरअसल यह स्पेन के ट्क्नॉस शहर के एक उत्सव में अजीबोगरीब प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इस प्रतियोगिता में लोगों को अपने चेहरे को बदसूरत व भद्दा दिखाना होता है लेकिन शर्त ये है कि इसके लिए उन्हें किसी तरह के मेकअप करने की इजाजत नहीं होती, बल्कि केवल अपने चेहरे के हाव-भावों व अंगों के सहारे ही उन्हें ऐसा करना होता है।

नौ दिन तक चलने वाला यह उत्सव ट्क्नॉस के बिलबाओ सिटी हॉल में आयोजित किया गया था। इस प्रतियोगिता को “कॉन्कुर्सो डे फिओस” के नाम से जाना जाता है। यह उत्सव पहली बार 1978 में आयोजित किया गया था।

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