अम्बेडकर जयंती: जाति व्यवस्था का कड़वा सच दिखाती हैं ये फिल्में

बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती हर साल 14 अप्रैल को पूरे देश में मनाई जाती है। भारत का संविधान बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। उन्होंने संविधान समिति का नेतृत्व किया और स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में कार्य किया।

उन्होंने अपने पूरे जीवन में शोषितों के लिए आवाज उठाना जारी रखा। उन्होंने जाति व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने और भारत में सभी को समान नागरिकता का अधिकार दिलाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

आज उनकी जयंती पर हम बात करेंगे उन फिल्मों की जो जाति व्यवस्था और दलितों पर आधारित हैं, तो चलिए जानते हैं:-

बैंडिट क्वीन

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यह एक दलित लड़की की कहानी है जिसे लगातार बलात्कार और मानसिक हमलों का शिकार होना पड़ता है। इसके बाद वह हथियार उठा लेती है और डकैत बन जाती है।

यह फिल्म भारत की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक मानी जाती है। सीमा बिस्वास ने फिल्म में फूलन देवी का किरदार निभाया था। फिल्म का निर्देशन शेखर कपूर ने किया था।

आर्टिकल 15

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यह फिल्म काफी हद तक जातिगत भेदभाव के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में आयुष्मान एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में नजर आए थे जो दो दलित लड़कियों की हत्या की जांच करता है।

इस दौरान उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट रही थी। फिल्म का निर्देशन अनुभव सिन्हा ने किया था।

आरक्षण

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जैसा कि नाम से पता चलता है, फिल्म आरक्षण प्रणाली के बारे में बनाई गई थी। फिल्म का निर्देशन प्रकाश झा ने किया था। इस फिल्म में सैफ अली खान, अमिताभ बच्चन, दीपिका पादुकोण, मनोज वाजपेयी जैसे सितारों ने काम किया था।

मांझी

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फिल्म मांझी नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के करियर की बेहतरीन फिल्मों में से एक है। इस फिल्म में उनकी एक्टिंग की काफी तारीफ हुई थी। फिल्म एक दलित व्यक्ति की कहानी है जिसकी पत्नी को हर दिन पहाड़ों पर चढ़ना पड़ता है।

एक दिन वह पहाड़ से फिसल जाती है और उसकी मृत्यु हो जाती है। इसके बाद मांझी खुद पहाड़ के बीच से रास्ता बनाता है। इस फिल्म को बेस्ट मोटिवेशनल फिल्म कहा जाता है।

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भगवान महावीर जी के बारे में कुछ विशेष बातें

14 अप्रैल को भगवान महावीर स्वामी को जयंती है। सम्पूर्ण मानव समाज को अन्धकार से प्रकाश की ओर लाने वाले महापुरुष भगवान श्री महावीर स्वामी का जन्म 599 वर्ष पूर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी तिथि को बिहार में लिच्छिवी वंश में हुआ था l

उनके पिता का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम त्रिशिला देवी था। जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर श्री महावीर स्वामी की जयंती चैत्र महीने की शुक्ल-त्रयोदशी को मनाई जाती है।

  • भगवान महावीर का जन्म एक राजपरिवार में हुआ था। बचपन में भगवान महावीर स्वामी का नाम वर्द्धमान था। उनके परिवार में ऐश्वर्य, धन-संपदा की कोई कमी नहीं थी l वे मनचाहा उपभोग भी कर सकते थे, परन्तु युवावस्था में क़दम रखते ही वे संसार की माया-मोह, सुख-ऐश्वर्य और राज्य को छोड़कर सन्यासी हो गए।
  • राजकुमार वर्द्धमान के माता-पिता जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे। वर्द्धमान सबसे प्रेम का व्यवहार करते थे। उन्हें इस बात का अनुभव हो गया था, कि इन्द्रियों का सुख, विषय-वासनाओं का सुख, दूसरों को दुःख पहुँचा कर ही पाया जा सकता है। महावीर जी जब 28 वर्ष के थे तब इनके माता-पिता का देहान्त हो गया।
  • तीस वर्ष की आयु मे महावीर स्वामी ने पूर्ण संयम रखकर अध्ययन-यात्रा पर निकल गये। अधिकांश समय वे ध्यान में ही मग्न रहते। हाथ में ही भोजन कर लेते थे l गृहस्थों से कोई चीज नहीं माँगते थे। धीरे-धीरे उन्होंने पूर्ण आत्मसाधना प्राप्त कर ली।
  • इसके पश्चात साढ़े बारह वर्ष की कठिन तपस्या और साधना के बाद ऋजुबालुका नदी के किनारे महावीर स्वामी जी को शाल वृक्ष के नीचे वैशाख शुक्ल दशमी के दिन केवल ज्ञान- केवल दर्शन की उपलब्धि प्राप्त हुई l

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  • वर्द्धमान महावीर ने 12 साल तक मौन तपस्या की और तरह-तरह के कष्ट झेले। अन्त में उन्हें ‘केवलज्ञान’ प्राप्त हुआ। केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद जनकल्याण के लिए उपदेश देना शुरू किया। महावीर जी अर्धमागधी भाषा में उपदेश देने लगे ताकि जनता उसे भलीभाँति समझ सके।
  • भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में अहिंसा, सत्य, और ब्रह्मचर्य पर सबसे अधिक जोर दिया। त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था। भगवान महावीर ने श्रमण और श्रमणी, श्रावक और श्राविका, सबको लेकर चतुर्विध संघ की स्थापना की। उनका मानना था कि जीवन का एक ही लक्ष्य होना चाहिए वह है  ” समानता”। देश के भिन्न-भिन्न भागों में घूमकर भगवान महावीर ने अपना पवित्र संदेश फैलाया।
  • भगवान महावीर ने 72 वर्ष की आयु में पावापुरी (बिहार) में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को मोक्ष प्राप्त किया। इनके मोक्ष दिवस पर घर-घर दीपक जलाकर दीपावली मनाई जाती है।
  • यदि हम भगवान महावीर के उपदेशों का सच्चे मन से पालन करने लगें और यह जान लें कि संसार के सभी छोटे-बड़े जीव हमारी ही तरह हैं, हमारी आत्मा का ही स्वरूप हैं। तो हमारा जीवन सफल हो जाए।
  • जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, वर्द्धमान ने कठोर तप द्वारा अपनी समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर विजेता कहलाए l इन्द्रियों को जीतने के कारण उन्हें जितेन्द्रिय भी कहा जाता था। यह कठिन तप पराक्रम के समान माना गया, इसलिए वे ‘महावीर’ कहलाए। उन्हें ‘वीर’  ‘अतिवीर’ और ‘सन्मति’ भी कहा जाता है।

डॉ. बी.आर अम्बेडकर के बारे में कुछ रोचक तथ्य

डॉ. बी.आर अम्बेडकर को भारतीय संविधान के रचयिता के रूप में जाना जाता है, उन्होंने देश के लिए एक ऐसा संविधान तैयार किया जो सभी जाति और धर्म के लोगों की रक्षा करे।

उनकी सोच और उनके व्यक्तित्व के पीछे उनके अपने सिद्धांत थे, जिन्होंने न सिर्फ उन्हें एक सफल इंसान बनाया बल्कि हर ऊंचाई को छूने में मदद भी की।

डॉ भीमराव का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू गांव में हुआ था। वे अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे।

  • डॉ. अम्बेडकर का वास्तविक सरनेम अंबाडवेकर था। लेकिन उनके शिक्षक, महादेव अम्बेडकर, जो उन्हें बहुत मानते थे, उन्होंने स्कूल रिकार्ड्स में उनका नाम अम्बेडकर कर दिया।
  • डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर विदेश जाकर अर्थशास्त्र में पी एच डी की डिग्री प्राप्त करने वाले पहले भारतीय थे।
  • बाबा साहेब ने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में 8 वर्ष में समाप्त होने वाली पढाई केवल 2 वर्ष 3 महीने में पूरी कर ली थी l इसके लिए उन्होंने प्रतिदिन 21-21 घंटे पढ़ाई की थी|
  • डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर 64 विषयों में मास्टर थे| वे हिन्दी, पाली, संस्कृत, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, मराठी, पर्शियन और गुजराती जैसे 9 भाषाओँ के जानकार थे| इसके अलावा उन्होंने लगभग 21 साल तक विश्व के सभी धर्मों की तुलनात्मक रूप से पढाई की थी|
  • डॉ. बी.आर अम्बेडकर एकमात्र ऐसे भारतीय हैं जिनकी प्रतिमा लन्दन संग्रहालय में कार्ल मार्क्स के साथ लगी हुई है।
  • भारतीय तिरंगे में “अशोक चक्र” को जगह देने का श्रेय भी डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर को जाता है।
  • मध्य प्रदेश और बिहार के बेहतर विकास के लिए बाबा साहेब ने 50 के दशक में विभाजन का प्रस्ताव रखा था, परन्तु सन 2000 में जाकर यह विभाजन किया गया और छत्तीसगढ़ और झारखण्ड का गठन हुआ।
  • विश्व का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय “राजगृह” में है जिसमें 50,000 से भी अधिक किताबें है।
  • डॉ. बाबा साहेब द्वारा लिखी गई पुस्तक “वेटिंग फॉर अ वीसा” कोलंबिया विश्वविद्यालय में टेक्स्टबुक है। कोलंबिया विश्वविद्यालय ने 2004 में विश्व के शीर्ष 100 विद्वानों की सूची बनाई थी और उसमे पहला नाम डॉ. भीमराव अम्बेडकर का था|
  • डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर का 8,50,000 समर्थको के साथ बौद्ध धर्म में दीक्षा लेना विश्व में ऐतिहासिक था, क्योंकि यह विश्व का सबसे बडा धर्मांतरण था।
  • बाबा साहेब को बौद्ध धर्म की दीक्षा देने वाले महान बौद्ध भिक्षु “महंत वीर चंद्रमणी” ने उन्हें “इस युग का आधुनिक बुद्ध” कहा था।
  • डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म छोड़ते समय 22 वचन लिए थे, उन्होंने कहा था ” मैं राम और कृष्ण जो भगवान् के अवतार माने जाते हैं की कभी पूजा नहीं करूँगा”l
  • लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से “डॉक्टर ऑल सायन्स” (Doctor All Science) नामक अनमोल डॉक्टरेट पदवी प्राप्त करने वाले बाबा साहेब विश्व के पहले और एकमात्र महापुरूष हैं। कई छात्रों ने इसके लिए प्रयास किये परन्तु वे अब तक सफल नहीं हो सके हैं|
  • विश्व में हर जगह बुद्ध की बंद आंखो वाली प्रतिमाएं एवं पेंटिग्स दिखाई देती है लेकिन बाबा साहेब जो उत्तम चित्रकार भी थे, उन्होंने सर्वप्रथम बुद्ध की ऐसी पेंटिंग बनाई थी जिसमें बुद्ध की आंखे खुली थी।

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  • विश्व में जिस नेता के ऊपर सबसे अधिक गाने और किताबें लिखी गई है वह डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर हैं|
  • गवर्नर लॉर्ड लिनलिथगो और महात्मा गांधी का मानना था कि बाबा साहेब हजारों विद्वानों से भी अधिक बुद्धिमान हैं|
  • पीने के पानी के लिए सत्याग्रह करने वाले बाबा साहेब विश्व के प्रथम और एकमात्र सत्याग्रही थे|
  • 1954 में काठमांडू, नेपाल में आयोजित “जागतिक बौद्ध धर्मपरिषद” में बौद्ध भिक्षुओं नें डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर को बौद्ध धर्म की सर्वोच्च उपाधि “बोधीसत्त्व” प्रदान की थी| उनकी प्रसिद्ध किताब “दि बुद्ध अण्ड हिज् धम्म” भारतीय बौद्धों का “धर्मग्रंथ” है।
  • डॉ. बी.आर अम्बेडकर भगवान बुद्ध, संत कबीर और महात्मा फुले इन तीनों महापुरूषों को अपना गुरू मानते थे।
  • दुनिया में सबसे अधिक स्टेच्यु बाबा साहेब के ही हैं। उनकी जयंती भी पूरे विश्व में मनाई जाती है।
  • ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा किए गए “द मेकर्स ऑफ़ द यूनिवर्स” नामक सर्वेक्षण के आधार पर पिछले 10 हजार वर्षो के शीर्ष 100 मानवतावादी विश्व मानवों की सूची बनाई गई थी जिसमें चौथा नाम डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर का था|
  • 1950 में बाबा साहेब का पहला स्टेच्यु उनके जीवित रहते बनाया गया था। यह कोल्हापूर शहर में  है।

“बैलेंसिंग रॉक” जिसे बड़े से बड़ा भूकंप भी नहीं हिला पाया, जाने क्या है रहस्य

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दुनिया में बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो हर किसी को हैरत में डाल देती हैं। मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक ऐसा ही बैलेंसिंग रॉक है जिसे देखकर हरकोई हैरान रह जाता है। इस पत्थर का संतुलन ऐसा है कि सबसे बड़े भूकंप के झटके भी उसे  हिला नहीं पाए हैं।

इस पत्थर को देखने के लिए यहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। खासकर छुट्टियों के दिनों में यहां पर्यटकों की काफी भीड़ रहती है। वर्षों से यह पत्थर एक ही स्थान पर टिका हुआ है।

कई विशेषज्ञों ने भी इसके रहस्य को सुलझाने की कोशिश की है, लेकिन उनका जवाब यही होता है कि यह पत्थर गुरुत्वाकर्षण बल के कारण टिका हुआ है।

इस पोस्ट में आज हम इसी रहस्य्मय पत्थर के बारे में बताने जा रहे हैं, तो चलिए जानते हैं

ये पत्थर कभी नहीं हिलता

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22 मई 1997 के भूकंप ने जबलपुर में भारी तबाही मचाई। भूकंप के झटकों से कई इमारतें धराशायी हो गईं। 40 लोगों की मौत हो गई थी।

पूरे शहर में केवल एक बैलेंसिंग रॉक थी, जो भूकंप से प्रभावित नहीं हुई थी। 1997 में आए भूकंप की तीव्रता 6.2 थी। लेकिन यह पत्थर अपनी जगह से नहीं डगमगाया। यही कारण है कि इसे बैलेंसिंग रॉक कहा जाता है।

कहाँ हैं ये बैलेंसिंग रॉक

जबलपुर शहर ग्रेनाइट चट्टानों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। शहर ग्रेनाइट चट्टानों से घिरा हुआ है। इन ग्रेनाइट चट्टानों के बीच में मदन महल की पहाड़ियों में रानी दुर्गावती का किला स्थित है। बैलेंस रॉक रानी दुर्गावती के किले के पास स्थित है। इस बैलेंस रॉक को देखने के लिए देश भर से लोग आते हैं।

यह एशिया की तीन संतुलन चट्टानों में शामिल है।

जबलपुर स्थित बैलेंस रॉक एशिया की तीन बैलेंस रॉक्स में से एक है। इस बैलेंस रॉक को देखने के लिए दुनिया भर से लोग जबलपुर आते हैं और इसे देखकर हैरान रह जाते हैं।

एक चट्टान दूसरी चट्टान के ऊपर संतुलित है। वर्षों से यह चट्टान उसी तरह एक और चट्टान के ऊपर बनी हुई है, जो आज तक प्राकृतिक आपदा से हिली तक नहीं है।

लगता है गिर जाएगा

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बैलेंसिंग रॉक एक ऐसा पत्थर है, जो देखने में ऐसा लगता है कि यह कभी भी गिर सकता है। जिन्हें इस पत्थर के बारे में पता नहीं है, वे पास जाने से भी डरते हैं।

बैलेंसिंग रॉक दूसरे पत्थर के कुछ ही हिस्सों पर टिकी हुई है लेकिन आंधी हो या तूफान यह पत्थर ज़रा भी नहीं हिलता । पुरातत्वविद भी आज तक इसके रहस्य को नहीं सुलझा पाए हैं। उनका कहना हैं कि इन चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ज़माने से हुआ होगा। जबलपुर के आसपास कई संतुलन चट्टानें हैं।

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वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने की ऐसी सनक, जिसे देखकर आप हैरान रह जाएंगे

दुनिया में कुछ लोग वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के चक्कर में कुछ ना कुछ ऐसा कर देते हैं जिसके बारे में जानकर लोग हैरान हो जाते हैं या फिर ऐसे लोगों को आप सनकी भी सकते हैं।

आज हम आपको एक ऐसी महिला के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे कान छिदवाने का शौक है। दरअसल शौक नहीं आप इसे सनक कह सकते हैं यह महिला चाहती है कि उसके कान में छेद इतने बड़े जाए कि विश्व रिकॉर्ड बन जाए। इसके लिए वह अपने कानों के छेदों को खींचती रहती हैं। सही में सनकी है!

आज इस पोस्ट में हम आपको इसी महिला के बारे में बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं :-

वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने की सनक

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दरअसल इस महिला का नाम बियांका फेरो है और वह वर्ल्ड रिकॉर्ड बना कर अपनी पहचान बनाना चाहती है। इसके लिए वह अपने कान के छेद खींचती रहती है।

13 साल की उम्र में उन्होंने अपने कान के छेद को खींच कर बड़ा करना शुरू कर दिया था। अब तक उसके कान के छेद 3.3 इंच लंबे हो चुके हैं। बियांका 24 साल की हैं और अमेरिका के न्यू जर्सी में रहती हैं। वह पेशे से टैटू आर्टिस्ट हैं।

बियांका को बॉडी मॉडिफिकेशन का बहुत शौक है। स्कूल में उन्हें मोटा कहकर सभी बहुत चिढ़ाते थे। बाद में उसने खुद से प्यार करना सीखा और दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिए अपने कानों के छेद को बड़ा करना शुरू कर दिया। वह कई बार कान छिदवा चुकी है।

बियांका का कहना है कि वह अपने कान के जरिए वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाना चाहती हैं। उसने अब तक अपने कान का छेद 3.3 इंच लंबा कर लिया है। विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए उन्हें अपना कान 4.1 इंच तक बढ़ाने होंगे।

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इसके लिए बियांका हर संभव कोशिश कर रही है। बियांका को पूरी उम्मीद है कि भविष्य में एक दिन ऐसा आएगा जब उसकी मेहनत रंग लाएगी और वह विश्व रिकॉर्ड बनाने में सफल होगी। इसके अलावा बियांका ने अपने शरीर पर कई टैटू भी बनवाए हैं।

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गर्मी को मात देने के लिए बेहद फायदेमंद है ये पेय पदार्थ, आप भी जरूर ट्राय करें

गर्मियों में हमें अपने शरीर का खास ख्याल रखना पड़ता है। सही खान-पान से लेकर जीवनशैली में बदलाव गर्मियों के हानिकारक प्रभावों से हमें बचा सकते हैं। भीषण गर्मी में चलते रहने और अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए हाइड्रेटेड रहना सबसे महत्वपूर्ण कारक है।

वैसे तो प्यास बुझाने के लिए पानी सबसे महत्वपूर्ण पेय है, लेकिन आप गर्मियों में अन्य पेय पदार्थों को भी आजमा सकते हैं जो न केवल आपकी प्यास को संतुष्ट करते हैं बल्कि आपके शरीर को भी ठंडा रखते हैं।

इस पोस्ट में हम जानेगें गर्मी को मात देने के लिए कुछ बेहतरीन पेय पदार्थों के बारे में तो चलिए जानते हैं (वीडियो भी देखें):-

आम पन्ना

आम पन्ना एक तरोताज़ा कर देने वाला पेय है जिसे हर आयु वर्ग के लोग चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए पी सकते हैं। यह पेय कच्चे आम से बनाया जाता है।

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यह बहुत ही स्वादिष्ट होता है और आपको भीषण गर्मी से लड़ने में मदद करता है। इसलिए, यदि आपकी यात्रा करने की कोई योजना है तो आप निश्चित रूप से इस अद्भुत पेय को अपने साथ ले जा सकते हैं।

छाछ

छाछ में हमारे शरीर को अत्यधिक गर्मी में भी ठंडा रखने के लिए आवश्यक प्रोबायोटिक्स, विटामिन और खनिज होते हैं। रोजाना या दिन में दो बार छाछ पीने से आपके शरीर को ठंडक मिल सकती है। अपनी ऊर्जा को बहाल करने और अपने शरीर को स्वाभाविक रूप से ठंडा करने के लिए एक गिलास ठंडा छाछ जरूर पिएं।

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गन्ने का जूस

गर्मी के दिनों में एक गिलास गन्ने के जूस से बेहतर और क्या हो सकता है? इसका स्वाद बहुत ही अद्भुत होता है। हालांकि, इसके स्वाद के अलावा और भी इसमें कई गुण हैं जैसे कि यह स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है और कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन, फास्फोरस आदि का एक बड़ा स्रोत है।

तरबूज़ का जूस

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आम के अलावा, तरबूज एक और ऐसा फल है जो गर्मी की मात देने के लिए एक अच्छा स्त्रोत है। आमतौर पर तरबूज में 92% पानी होता है, जो डिहाइड्रेशन को रोकने और शरीर को ठंडा रखने में मदद करेगा।

तरबूज विटामिन-बी का अच्छा स्रोत है, जो शरीर में ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाने का काम करता है। तरबूज जरूरी विटामिन, जैसे बी6 से समृद्ध होता है, जो ऊर्जा के अच्छे स्रोत माने जाते हैं।

अगर तरबूज या इसके जूस का नियमित रूप से सेवन किया जाए तो यह आपके शरीर की गर्मी को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।

जलजीरा

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गर्मी के मौसम में झटपट तैयार होने वाला चटपटा पेय ‘जलजीरा’ उत्तर भारत का बहुत पॉपुलर ड्रिंक है। जिसे कुछ जगहों पर शिकंजी भी कहा जाता है।

बर्फ, नींबू और मसालों सी बना जलजीरा ड्रिंक पेट को ठंडा तो रखता ही है, साथ ही पाचन और इम्यूनिटी को भी बढ़ाता है।

यह उत्तर भारत में विशेष रूप से लोकप्रिय है जहां अक्सर सड़कों पर विशाल मिट्टी के मटके के साथ ठेले, पुदीने की पत्तियों और बूंदी से सजा हुआ ठंडा जल जीरा बेचते हैं।

ठंडाई

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ठंडाई काफी लोकप्रिय पारंपरिक पेय है जो उत्तर भारतीय राज्यों जैसे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, यूपी, आदि में प्रसिद्ध है। भीषण गर्मी में ठंडाई के ताज़ा स्वाद से बेहतर कुछ नहीं है।

कोकम शरबत

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कोकम न केवल आपकी प्यास बुझाने में मदद करता है, बल्कि यह निर्जलीकरण और सनस्ट्रोक को भी रोकता है, जिसकी गर्मियों में बहुत आवश्यकता होती है।

कोकम में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटीऑक्सिडेंट और एंटी-एजिंग गुण होते हैं और यह शरीर की गर्मी को कम करने में भी मदद करता है, जिससे गर्मियों के लिए ठंडा और ताज़ा कोकम शरबत एक बेहतरीन विकल्प बन जाता है।

जिगरथंडा

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जिगरथंडा जिसका शाब्दिक अर्थ है “ठंडा दिल” एक ऐसा पेय है जो बहुत सी चीजों का मिश्रण है। तमिलनाडु के दक्षिण भारतीय शहर मदुरै में विशेष रूप से प्रसिद्ध यह पेय आम तौर पर तैयार किया जाता है। इसमें ढेर सारी आइसक्रीम, ठंडी बासुंदी, मलाई वाला दूध और बादाम, गोंद, चाइना ग्रास और रूट सिरप शामिल हैं।

पनाकम

पनाकम एक ताज़ा मसालेदार पेय है जो गुड़, पानी, काली मिर्च, अदरक पाउडर और इलायची और नींबू के साथ बनाया जाता है।

पनाकामी श्री राम नवमी उत्सव के लिए बनाया जाने वाला एक विशेष पेय है। इसे गर्मियों के लिए कूलिंग ड्रिंक के रूप में भी बनाया जा सकता है। पनाकम को पनागम या पनका के नाम से भी जाना जाता है।

सोलकढ़ी

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सोलकढ़ी वैसे तो एक प्रकार का पेय है, लेकिन आमतौर पर इसे चावल के साथ खाया जाता है या कभी-कभी भोजन के बाद या साथ में पिया जाता है।

यह गोवा, दक्षिणी महाराष्ट्र और उत्तरी कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों में काफी लोकप्रिय है। सोलकढ़ी नारियल के दूध के रूप में ताजे नारियल के तरल अर्क से तैयार की जाती है। इससे आपके पाचन तंत्र क्रिया सही रहती है।

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ये है दुनिया का सबसे अनोखा फूल, जिस पर कभी नहीं बैठता भंवरा

फूल न केवल अपनी सुगंध के लिए बल्कि अपनी सुंदरता के लिए भी जाने जाते हैं। पूजा से लेकर घर की साज-सज्जा तक में फूलों का प्रयोग किया जाता है।

हमारे आसपास कई तरह के फूल वाले पौधे होते हैं, जो देखने में बेहद खूबसूरत लगते हैं। इन्हें देखने के बाद आंखों को एक अलग ही ठंडक मिलती है और सारी थकान भी दूर हो जाती है।

फूल सिर्फ इंसानों को ही नहीं बल्कि जानवरों को भी बहुत पसंद होते हैं इसलिए फूलों के ऊपर तितलियां और भँवरे मँडराते रहते हैं।

अब तक हम फूलों को उनकी सुंदरता, सजावट और सुगंध से पहचानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया में एक ऐसा फूल है, जिस पर कभी भंवरा नहीं बैठता? जी हां, हमारे चारों ओर एक ऐसा फूल है, जिस पर शायद हमने कभी ध्यान नहीं दिया होगा, आइए जानते हैं उस फूल के बारे में…

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चंपा के फूल पर नहीं बैठते हैं भँवरे

अक्सर आपने देखा होगा कि भँवरे ज्यादातर फूलों पर पाए जाते हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि भँवरे कभी भी चंपा के फूलों पर नहीं बैठते हैं।

चंपा के फूलों की एक अलग महक होती है और इसके फूलों में पराग नहीं होता है, जिससे भँवरे उनके आसपास नहीं भटकते हैं। भँवरे ही नहीं, मधुमक्खियां भी चंपा के फूलों के पास नहीं आतीं।

चंपा के फूलों की खास बातें

चंपा के फूलों की खास बात यह है कि इनके पौधे हमेशा हरे रहते हैं। साथ ही चंपा के फूल सुंदर, सुगंधित और हल्के सफेद-पीले रंग के होते हैं। ये फूल मुख्य रूप से 5 प्रकार के होते हैं और सभी फूल बहुत सुगंधित होते हैं।

चंपा के फूलों के उपयोग

चम्पा के फूलों का प्रयोग प्रायः पूजा में किया जाता है। इतना ही नहीं चंपा के फूलों का तेल और इत्र भी बनाया जाता है। इसके फूलों और पेड़ों का उपयोग औषधि के रूप में भी किया जाता है। कहा जाता है कि चंपा का पौधा वास्तु की दृष्टि से सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।

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काली माँ के इस मंदिर में प्रसाद के रूप में मिलते है “noodles” जाने क्या है वजह?

भारत संस्कृति और धर्मों में अपनी विविधता के लिए प्रसिद्ध है, जहां हर कोई अपनी परंपराओं को अपने अनोखे तरीके से मनाता है। मंदिरों में ज्यादातर प्रसाद में लड्डू या कोई अन्य मिठाई मिलती है। लेकिन क्या आपने कभी noodles को मंदिरों में प्रसाद के रूप में देखा है? अगर नहीं तो चलिए जानते इस पोस्ट के माध्यम से,

दरअसल पश्चिम बंगाल के कोलकाता में एक है मंदिर जिसे ‘चाइनीज़ काली मंदिर‘ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर कोलकाता के मथेश्वरतला रोड पर टंगरा क्षेत्र में स्थित है, जिसे ‘चाइना टाउन‘ भी कहा जाता है। यहाँ प्रसाद के रूप में लड्डू या मिठाई नहीं चढ़ाते, बल्कि चाइनीज फूड आइटम्स दी जाती है।

यह मंदिर भारत के अन्य मंदिरों की तरह ही दिखता है जो चीज इसे अद्वितीय बनाती है वह है प्रसाद जो पहले देवी को चढ़ाया जाता है और बाद में भक्तों के बीच वितरित किया जाता है। इस मंदिर में चीनी व्यंजन जैसे नूडल्स, चॉप सूई, फ़्राईड राइस और कई अन्य व्यंजन भी देवी काली को चढ़ाए जाते हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार 60 वर्षों तक, मंदिर के निर्माण से पहले यहां कोई मंदिर नहीं था, सिर्फ एक पेड़ था जिसके नीचे कुछ पत्थर पड़े थे तथा इन पत्थरों पर सिंदूर लगाकर लोग पूजा करते थे।

समय के साथ इस स्थान में बदलाव आया और यहां माँ काली की प्रतिमा स्थापित कर एक मंदिर बना दिया गया। 60 साल पुराने इस मंदिर की एक खास बात ये भी है कि यहां हिंदू धर्म के लोगों के अलावा चीनी लोग भी आते हैं। लगभग 20 साल पहले, बंगाली और चीनी समुदाय के लोगों ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था ।

कहा जाता है कि एक 10 वर्षीय चीनी लड़का गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था और कोई इलाज काम नहीं कर रहा था। जब उसके बचने की कोई उमींद नहीं रही तो उसके माता-पिता ने उसे पेड़ के नीचे लिटा दिया और कई रातों तक प्रार्थना की।

लड़का चमत्कारिक रूप से ठीक हो गया और यह आध्यात्मिक स्थल हिंदुओं के साथ-साथ चीनी समुदाय का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

किसी ने अपने टैलेंट तो किसी ने अपनी खासियत से बनाए वर्ल्ड रिकॉर्डस

कुछ लोगों में अनोखा टैलेंट होता है और कुछ चीजों की खासियत उन्हें दुनिया में फेमस बना देती है। आज कुछ वर्ल्ड रिकॉर्डस के बारे में हम आपको इस पोस्ट के माध्यम से बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं:-

जियाना शाह

इंदौर की 6 साल की जियाना शाह ने 2021 में 9 मिनट 31 सेकंड में 195 देशों की जानकारी देकर अपने नाम तीन खिताब किए।

पहली कक्षा में पढ़ने वाली और इन तमाम रिकॉर्ड को दर्ज कराने वाली जियाना दुनिया की पहली ऐसी बच्ची है जिसने 6 साल की उम्र में 9 मिनट 31 सेकंड के अंदर 195 देशों के बारे में बताया।

जियाना ने न सिर्फ देशों के राष्ट्रीय ध्वज को पहचाना, बल्कि देश का नाम, उस देश की राजधानी, मुद्रा, भाषा, देश का प्रसिद्ध पर्यटनस्थल या लैंडमार्क और महाद्वीप के बारे में भी बताया।

दुनिया की सबसे बड़ी ड्रॉइंग

कोरोनाकाल में उदयपुर (राजस्थान) के एक कलाकार रवि सोनी ने दुनिया की सबसे बड़ी ड्रॉइंग बनाकर नया कीर्तिमान रचा और इस तरह उन्होंने इटली के आर्टिस्ट के सबसे बड़े चित्र के वर्ल्ड रिकॉर्ड को तोड़ दिया।

रवि सोनी द्वारा बनाई गई ड्रॉइंग का साइज 6781 वर्ग फीट है, जो ‘ट्री ऑफ लाइफ‘ की थीम पर आधारित है। रवि ने कल्पवृक्ष के पेड़ से प्रेरित होकर अपनी ड्रॉइंग का विषय ‘जीवन का वृक्ष‘ रखा।

26 नवंबर 2021 को शहर के महाराणा भूपाल स्टेडियम में बास्केटबॉल मैदान में अपनी ड्रॉइंग बनाने का काम उन्होंने शुरू किया और 5 दिनों की मेहनत के बाद 30 नवंबर 2021 को उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी ड्रॉइंग पूरी की।

सबसे ज़्यादा अंडे तोड़ने का रिकॉर्ड

दुनिया में लोग मशहूर होने के लिए क्या कुछ नहीं करते। बात जब रिकॉर्ड बनाने या तोड़ने की हो तब तो लोग कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहते हैं ऐसा ही एक रिकॉर्ड रॉस मैककर्डी ने अंडे तोड़कर बनाया है। अंडे तोड़ना आर्ट का एक फॉर्म है।

अगर आप गलत तरीके से तोड़ेगें तो ब्रेकफास्ट में एगशेल्स भी खाने पड़ेंगे। साल 2011 में अमेरिका के रॉस मैककर्डी ने एक हाथ से एक मिनट में सबसे ज्यादा अंडे तोड़ने का रिकॉर्ड बनाया। उन्होंने 32 अंडे तोड़े।

दुनिया का सबसे ज़्यादा ऊंचाई पर बना रेस्त्रां

चीन ने शंघाई शहर में दुनिया का सबसे ज्यादा ऊंचाई पर रेस्त्रां बनाकर बुर्ज खलीफा का रिकॉर्ड तोड़ दिया। शंघाई में बने शंघाई टॉवर में 120वीं मंजिल पर J Hotel बनाया गया है। इस होटल में बना Jin Restaurant जमीन से 556.36 मीटर की ऊंचाई पर बना है।

इससे पहले दुनिया के सबसे ज्यादा ऊंचाई पर बने रेस्त्रां का वर्ल्ड रिकॉर्ड दुबई के ‘एटमॉरिफयर’ होटल के नाम था। इसकी ऊंचाई 441.3 मीटर है। इसे 2011 में खोला गया था। इस होटल को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल किया गया है।

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जानिए अनोखी रैसे मछली के बारे में रोचक तथ्य

पानी के अंदर कई प्रकार के अजब अनोखे प्राणी पाए जाते हैं। इन्हीं में एक है (Wrasse) रैसे मछली। दरअसल इस मछली को आमतौर पर उनके मोटे होंठों के लिए जाना जाता है और उनके अनोखे होंठों के कारण, उन्हें जर्मनी में लिप-फिश के रूप में जाना जाता है। आज इस पोस्ट में हम जानेंगे इस अनोखी मछली के बारे में कुछ रोचक तथ्य, तो चलिए जानते हैं :-

  • मछली की यह प्रजाति ज्यादातर चमकीले रंग की होती है। इसकी लगभग 500 से ज्यादा प्रजातियां मौजूद हैं। ये मछली मांसाहारी होती है और छोटे जीवों का शिकार करती है जैसे छोटी मछली, घोंघा, केकड़ा, झींगा आदि।
  • ये ज्यादातर तटीय क्षेत्रों, चट्टानी तटों, कोरल रीफ्स, ज्वारीय ताल और रेतीले समुद्री सतह में निवास करती है। लॉयन फिश, डॉग फिश और शार्क आदि मछलियां इन्हें अपना भोजन बनाती हैं।
  • नेपोलियन रैसे अक्सर लाल सागर, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बाहरी बाहरी ढलानों पर पाई जाती हैं। इसे दिन में चट्टान पर घूमते हुए देखा जा सकता है और रात में चट्टान की गुफा में बसा हुआ देखा जा सकता है।

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  • यह 7 फीट की लंबाई तक बढ़ सकती है और इसका वजन 420 पाउंड तक हो सकता है। हालांकि, अधिकांश नर मछली औसतन 6 फीट की लंबाई तक बढ़ते हैं, जबकि मादा की 3 फीट तक की लंबाई होती हैं। अपने विशाल आकार के बावजूद, यह आसानी से डर जाता है।

हम्पहेड रैसे

रैसे परिवार की सबसे बड़ी प्रजाति हम्पहेड रैसे की है। यह 2 मीटर तक लम्बी और वजन में लगभग 100 किलो तक हो सकती है। फीमेल, मेल से बड़ी होती है। यह ज्यादातर प्रशांत महासागर के कैरोलाइन द्वीप में पाई जाती है। यह ब्राइट ब्लू और ग्रीन कलर की सुंदर मछली है।

लेपर्ड रैसे

लेपर्ड रैसे को गिनी फाउल रैसे और ब्लैकस्पॉट रैसे के नाम से भी जाना जाता है। फीमेल सफेद होती है, जिनमें कई काले या भूरे रंग के धब्बे या डॉट्स होते हैं और मेल में नारंगी-लाल रंग के तथा हरे धब्बे होते हैं। यह कोरल रीफ्स की  सतह से 30 मीटर की गहराई पर रहती है।

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शिपहेड रैसे

शिपहेड रैसेस ज्यादातर जापान और चीन में पाई जाती हैं। इसके अलावा ये दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया में भी पाई जाती हैं। इनकी लंबाई 100 सेमी तक हो सकती है और वजन करीब 14 किलो तक। जापान में यह कोबुदाई (kobudai) के नाम से प्रसिद्ध है।

रॉकमूवर रैसे

इसे ड्रैगन रैसे के नाम से भी जाना जाता है और यह एक आकर्षक मछली है। यह रेत के अंदर से तैरते हुए कंकड़ और रेत को मूव करती है। यह इंडो-पेसिफिक रीजन के आसपास कोरल रीफ्स में पाई जाती है। यह करीब 10 इंच तक बढ़ सकती है।

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