जानिए कौन है तुलसी गौड़ा, जिन्हें कहा जाता है “वन की देवी”

तुलसी गौड़ा कर्नाटक की हलक्की जनजाति (Halakki Indigenous) से हैं और वह बेहद गरीब परिवार से आती हैं। प्रकृति से अपार प्रेम करने वाली तुलसी अपना ज्यादातर वक्त जंगलों में ही बिताती आई हैं।

जंगल में रहने के साथ-साथ उन्हें जड़ी – बूटियों का अच्छा-खास ज्ञान भी हो गया है साथ ही वृक्षारोपण करने पर उनका जोर रहा है। इसका नतीजा हुआ कि उन्होंने 30 हजार से ज्यादा पेड़-पौधा लगाकर एक पूरा जंगल खड़ा कर दिया।

पर्यावरणविद् तुलसी गौड़ा को उम्र और अनुभव के साथ प्रकृति की इतनी जानकारी हो गई कि उन्हें ‘जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया’ तक कहा जाना लगा।

करीब 10 साल की उम्र से वह पर्यावरण संरक्षण का काम कर रही हैं और अपना पूरा जीवन उन्होंने प्रकृति की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया है। नंगे पैर रहने वाली और जंगल से जुड़ी तमाम जानकारियां रखनी वालीं तुलसी गौड़ा हजारों पेड़-पौधे लगा चुकी हैं।

पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा राष्ट्रपति भवन में सम्‍मानित की गईं कर्नाटक की 70 वर्षीय आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा का नाम अब दुनिया आदर से ले रही है। उन्‍हें पर्यावरण की सुरक्षा में उनके योगदान के लिए सरकार द्वारा पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

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जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया’ और ‘वन देवी’ जैसे नामों से प्रसिद्ध तुलसी आज तक हज़ारों पौधे लगा चुकी हैं और वन विभाग की नर्सरी की देखभाल करती हैं। अपने काम और पद्मश्री सम्मान मिलने के अलावा एक और वजह से तुलसी गौड़ा सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

दरअसल, सोमवार 8 नवंबर को जब तुलसी गौड़ा राष्ट्रपति से सम्मान लेने पहुंचीं तो उन्होंने पारंपरिक पोशाक पहन रखी थी और वे नंगे पैर थीं। उसी दौरान उनकी एक तस्वीर खिंच गई जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

इसमें पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ‘वन देवी’ को प्रणाम करते दिख रहे हैं। इस तस्वीर के वायरल होते ही कई लोगों ने इस तस्वीर पर प्रतिक्रिया दी हैं जैसे:

वायरल वीडियो :- कपिल शर्मा ने अपने हेयर ड्रेसर से की मस्ती, देखें मजेदार वीडियो

द कपिल शर्मा” शो को लेकर चर्चा में रहने वाले कपिल शर्मा ने एक मस्ती भरा वीडियो अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है जिसमें वह अपने हेयर ड्रेसर के साथ मस्ती करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। उनके इस वीडियो पर फैन्स भी फनी कमेंट्स कर रहे हैं।

वह सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं। वह अपनी प्रोफेशनल लाइफ से लेकर पर्सनल लाइफ के मोमेंट्स फैंस के साथ सोशल मीडिया पर शेयर करते रहते हैं।

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इस वीडियो में वह काफी फनी मूड में दिखाई दे रहे हैं उन्होंने यह फनी वीडियो रविवार को शेयर किया था। कपिल के हेयर ड्रेसर उनका हेयर स्टाइल कर रहे हैं और साथ ही कपिल एक्टिंग कर रहे हैं। वीडियो में कपिल हेयर ड्रेसर से मस्ती करने के बाद हंसते हुए फनी पोज दे रहे हैं।

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कपिल ने वीडियो शेयर करने के साथ कैप्शन में लिखा “ऑन पब्लिक डिमांड, इंस्टाग्राम ट्रेंडिंग“। कपिल शर्मा के वीडियो पर कई हस्तियों ने हंसी का रिएक्शन दिया है। कॉमेडी किंग के शो “द कपिल शर्मा” में भी वह सेलिब्रिटिज से लेकर दर्शकों संग मस्ती करते हुए दिखाई देते हैं।

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जानिए लोटस टेम्पल से जुड़े दिलचस्प तथ्य

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भारत की राजधानी दिल्ली में घूमने के लिए बहुत सी जगह हैं। यहां पर खासतौर पर आपको ऐतिहासिक स्थलमंदिर देखने को मिलेेंगे। इन स्थलों को देखने के लिए दुनियाभर से लोग आते हैं। दिल्ली में मौजूद एक ऐसा स्मारक है जो हर किसी को आश्चर्यचकित कर देता है और वह है लोटस टेम्पल। कमल के आकार का यह भव्य भवन हर किसी को अपने इतिहास और संरचना से हैरान कर देता है।

आज इस लेख के माध्यम से हम जानेगें इस खूबसूरत और भव्य लोटस टेम्पल के बारे में, तो चलिए जानते हैं:-

कमल के फूल जैसे आकार के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर का निर्माण कार्य 13 नवम्बर 1986 में संपन्न हुआ था। इस मंदिर का उद्घाटन 24 दिसम्बर 1986 में हुआ था और आम लोगों के लिए इस मंदिर को 1 जनवरी 1987 को खोला गया था।

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कमल जैसी आकृति होने के कारण ही इसे कमल मंदिर या लोटस टेम्पल कहा जाता है। यह मंदिर बहाई धर्म के लोगों की आस्था और श्रद्धा के सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है।

तेहरान के पर्शियन बहा-उल्लाह ने बहाई धर्म की स्थापना की थी। अधिकतर लोगों का यह सवाल रहता है कि कमल मंदिर में आखिर किस भगवान की पूजा होती है।

दरअसल इस टेम्पल में किसी भी विशेष धर्म के भगवान की पूजा नहीं होती है। यह एक बहाई उपासना मंदिर है जिसे बहाई धर्म के लोगों द्वारा बनवाया गया था।

कमल मंदिर में किसी भी भगवान की मूर्ति नहीं है क्योंकि बहाई धर्म के लोग किसी एक भगवान में विश्वास नहीं करते, बहाई धर्म के लोगों का मानना है कि भगवान केवल एक है जो पूरे विश्व का रचयिता है इसलिए कमल मंदिर में आने वाले पर्यटक केवल इसकी वास्तुकला का दीदार करने और यहां पर मेडिटेशन, प्रार्थना के लिए आते हैं अर्थात लोटस टेम्पल में किसी भी धर्म के लोगों के जाने की मनाही नहीं है प्रत्येक धर्म के लोग यहां पर जाकर कमल मंदिर में घूम सकते हैं और प्रार्थना कर सकते हैं।

यह मंदिर खूबसूरती और वास्तुकला का इतना बेहतरीन नमूना है कि इसे बीसवीं सदी का ताजमहल भी कहा जाता है और अभी तक वास्तु कला के क्षेत्र में कमल मंदिर को सैकड़ों अवार्ड मिल चुके है।

आपको बता दें कि लोटस टेंपल को कनाडा के एक पर्सियन आर्किटेक्ट फरीबॉर्ज सहबा ने डिजाइन किया था और कमल मंदिर को बहाई धर्म के लोगो द्वारा एशिया महाद्वीप का मदर टेंपल भी कहा जाता है।

लोटस टेम्पल के बारे में दिलचस्प तथ्य

  • लगभग क्षेत्रफल 26 एकड़ (10.5 हेक्टेयर , 105,000 वर्ग मीटर) क्षेत्र में फैले इस मंदिर में अन्दर जाने के लिए 9 दरवाजे भी बनाये गये हैं।
  • इस मंदिर को करीब 700 इंजिनियर, तकनीशियन, (Technician) कामगार और कलाकारों ने मिलकर पूरा किया था।
  • इसे बनाने में इस्तेमाल किये गए मार्बल को विशेष रूप से ग्रीस से आयत किया गया था।
  • इस मंदिर में 27 खड़ी मार्बल की पंखुड़ियाँ भी बनी हुई है, जिसे 3 और 9 के आकार में बनाया गया है और इसके हॉल में लगभग 2400 लोग एकसाथ बैठकर प्रार्थना कर सकते है।
  • इन पंखुड़ियों के शेल्स के निर्माण में स्टील को गेल्वनाइज्ड किया गया है ताकि उसे जंग से बचाया जा सके।
  • इसकी लम्बाई लगभग 34 मीटर है और यह 9 तालाब से घिरा भी हुआ है।
  • यहाँ दो छोटे सभागार भी हैं, जिसमें करीब 70 सीटें है।
  • यह मंदिर अपने शांत वातावरण के लिए जाना जाता है, इसलिए यहाँ शोर मचाना मना है।
  • यहाँ पर रोजाना लगभग 10 से 12 हजार लोग दर्शन (प्रार्थना) करने के लिए आते है।
  • यहाँ पर हर घण्टे में 5 मिनट के लिए प्रार्थना सभाए आयोजित की जाती है।
  • देश की राजधानी दिल्ली में स्थित कमल मंदिर विश्व के उन 7 प्रार्थना स्थलों में से एक है, जो बहाई धर्म का पालन करते हैं। बहाई धर्म के बाकी मंदिर सिडनी, पनामा, अपिया, कम्पाला, फ्रैंकफर्ट और विलेमेट आदि शहरों में स्थित हैं।
  • आप यहाँ मंगलवार से रविवार तक किसी भी दिन जा सकते है। इस मंदिर में सोमवार को अवकाश रहता है।
  • इस मंदिर का खुलने का समय गर्मियों में सुबह 9:30 बजे और बंद होने समय शाम को 6:30 बजे है। जबकि सर्दियों में यह सुबह 10:00 से शाम के 5:00 बजे तक खुलता है।

उंमगोट – भारत की सबसे साफ नदी

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हमारे देश में नदियों की हालत बहुत अच्छी नहीं है। अधिकतर नदियां बेहद गंदी नजर आती हैं। यूं तो सरकार नदियों की साफ-सफाई के लिए अक्सर कोई न कोई प्रोजैक्ट शुरू करती रही है लेकिन इन सबके बावजूद नदियों की सफाई का काम आज तक पूरा नहीं हो सका है।

हजारों करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी गंगा सहित हमारी अधिकतर नदियों की हालत वैसी की वैसी है। हालांकि, इसकी जिम्मेदार केवल सरकार ही नहीं बल्कि लोग भी हैं। अगर हम लोग नदियों में कचरा फेंकना बंद कर दें तो ये नदियां हमेशा साफ रहेंगी।

नदियों को साफ कैसे रखना है यह हमें मेघालय के लोगों से सीखना चाहिए। मेघालय की उमंगोट नदी को देश की सबसे साफ नदी कहा जाता है। इस नदी का पानी इतना साफ है कि उसमें कांच की तरह आर-पार दिखता है। पानी के नीचे का एक-एक पत्थर क्रिस्टल की तरह साफ नजर आता है।

इसमें कचरा तो दूर की बात है धूल का एक कण भी दिखाई नहीं देता। इसमें चलने वाली नाव को देख कर तो ऐसा लगता है मानो वह किसी कांच के ऊपर या हवा में तैर रही हो। यह खूबसूरत नदी मेघालय की राजधानी शिलांग से 95 किलोमीटर दूर भारत-बंगलादेश सीमा के पास स्थित पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले के दावकी कस्बे से बहती है।

इस इलाके में रहने वाले खासी आदिवासी समुदाय के लोग इस नदी की हर दिन सफाई करते हैं। दरअसल, यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। इनका मानना है कि सफाई उनके संस्कारों में है।

उमंगोट नदी 3 गांवों दावकी, दारंग और शेंनान्गडेंग से होकर बहती है। इन 3 गांवों में करीब 300 घर हैं और सभी मिलकर इस नदी की सफाई करते हैं। गंदगी फैलाने पर 5000 रुपए तक जुर्माना वसूला जाता है। महीने में 3 से 4 दिन ‘कम्युनिटी डे‘ के होते हैं।

इसी दिन गांव के हर घर से कम से कम एक व्यक्ति नदी की सफाई के लिए आता है। उमंगोट नदी साफ ही नहीं है, बल्कि उसके आस-पास का नजारा भी बेहद खूबसूरत है। हरे-भरे जंगलों के बीच स्थित इस नदी की तुलाना लोग स्वर्ग में बहने वाली नदी से भी करते हैं।

नवम्बर से अप्रैल तक यहां भारी संख्या में पर्यटक आते हैं। इस दौरान पर्यटक यहां बोटिंग का लुत्फ उठाते नज़र आते हैं जबकि मानसून के सीजन में बोटिंग बंद रहती है। इस नदी से कुछ ही दूरी पर स्थित मावलिननॉन्ग गांव को भी एशिया के सबसे साफ गांव का दर्जा हासिल है।

अंग्रेजों ने इस नदी पर एक ब्रिज भी बनवाया है। इस नदी में बड़ी संख्या में मछलियां भी मिलती हैं। इस बेहद साफ नदी जैसा अद्भुत नजारा देश की किसी भी अन्य नदी में देखने को नहीं मिलता है।

गंगा और यमुना नदी की हालत तो सभी ने देखी ही होगी और कई लोगों का कहना है कि नदियां कभी साफ नहीं हो सकती लेकिन मेघालय के लोगों इसे गलत साबित कर दिखाया है।

पंजाब केसरी से साभार

जानिए कहानी पटाखों की!!

हर साल दिवाली पर पटाखों पर प्रतिबंध को लेकर बहस शुरू हो जाती है। इस बार भी लोगों को ‘ग्रीन क्रैकर्स‘ चलाने के लिए ही प्रोत्साहित किया जा रहा है जो पर्यावरण को आम पटाखों जितना नुक्सान नहीं पहुंचाते और ध्वनि प्रदूषण भी कम करते हैं परंतु क्या आप जानते हैं कि सबसे पहले पटाखे कैसे बने और भारत में इनका उपयोग कब शुरू हुआ था।

यूं बने पटाखे

इतिहास में पटाखों का पहला प्रमाण चीन में मिलता है जहां बांस को लगातार गर्म करने पर वह धमाके के साथ फटता था। इसके बाद पटाखों का आविष्कार एक दुर्घटना के कारण चीन में ही हुआ। मसालेदार खाना बनाते समय एक रसोइए ने गलती से साल्टपीटर‘ (पोटैशियम नाईट्रेट)आग पर डाल दिया।

इससे उठने वाली लपटें रंगीन हो गई जिससे लोगों की उत्सुकता बढ़ी। फिर मुख्य रसोइए ने ‘साल्टपीटर‘ के साथ कोयले व सल्फर का मिश्रण आग के हवाले कर दिया जिससे काफी तेज आवाज के साथ रंगीन लपटें उठीं।

बस, यहीं से आतिशबाजी यानी पटाखों की शुरूआत हुई। कुछ चीनी रसायनशास्त्रियों ने चारकोल, सल्फर आदि मिलाकर कच्चा बारूद बनाया और कागज में लपेटकर फायर पिल’ बनाई।

ये कागज के बम थे जिनका उपयोग वे दुश्मनों को डराने के लिए करते थे। कागज के पटाखे इजाद करने के 200 साल बाद चीन में हवा में फूटने वाले पटाखों का निर्माण शुरू हो गया। इन पटाखों का उपयोग युद्ध के अलावा आतिशबाजी के रूप में एयर शे के लिए होने लगा।

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यूरोप में पटाखे

यूरोप में पटाखों का चलन 1258 ईस्वी में शुरू हुआ था। यहां सबसे पहले पटाखों का उत्पादन इटली ने किया। जर्मनी के लोग युद्ध के मैदानों में इन बमों का इस्तेमाल करते थे। इंगलैंड में पहली बार इनका उपयोग समारोहों में किया गया।

महाराजा चार्ल्स (पंचम) अपनी हरेक विजय का जश्न आतिशबाजी करके मनाते थे। इसके बाद 14वीं सदी के शुरू होते ही लगभग सभी देशों ने बम बनाने का काम शुरू कर दिया।

अमरीका में इसकी शुरूआत 16वीं शताब्दी में सेना ने की थी। पश्चिमी देशों ने हाथ से फैंके जाने वाले बम बनाए। बंदूकें और तोप भी इसी कारण बनी थीं।

भारत में पटाखे

बारूद की जानकारी भारतीयों को बहुत पहले से थी। ईसा पूर्व काल में रचे गए चाणक्य के अर्थशास्त्र में एक ऐसे चूर्ण का जिक्र है जो तेजी से जलता और तेज लपटें पैदा करता था। इसे एक नलिका में डाल दिया जाए तो पटाखा बन
जाता था।

बंगाल के इलाके में बारिश के मौसम के बाद कई इलाकों में सूखती हुई जमीन पर ही लवण की एक परत बन जाती थी। हालांकि, इसका अधिक उपयोग नहीं किया गया।

भारत में मुगलों के दौर में पटाखे खूब इस्तेमाल होने लगे। तब शादी या दूसरे जश्न में भी आतिशबाजी होती थी। अंग्रेजों के शासन के दौरान भी उत्सवों में आतिशबाजी करना काफी लोकप्रिय हुआ।

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19वीं सदी में पटाखों की मांग बढ़ने का ही नतीजा था कि कई फैक्टरियां लगीं। भारत में पटाखों की पहली फैक्टरी 19वीं सदी में कोलकाता में लगी। बाद में भुखमरी और सूखे की समस्या से जूझ रहे शिवकाशी (तमिलनाडु) के 2 भाई शणमुगा और पी. नायर नाडर कोलकाता की एक माचिस फैक्टरी में नौकरी के लिए पहुंचे।

वहां के कामकाज को समझने और सीखने के बाद इन्होंने शिवकाशी लौट कर अपनी खुद की फैक्टरी शुरू की। शिवकाशी का शुष्क मौसम पटाखे बनाने के लिए बहुत फायदेमंद साबित हुआ। आज शिवकाशी ही देश में पटाखे बनाने का सबसे बड़ा केन्द्र है।

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अब ग्रीन पटाखों से दिवाली

दिवाली पर पटाखों की वजह से होने वाले प्रदूषण के कारण कुछ सालों से इन्हें कम चलाने को प्रोत्साहित किया जा रहा है और इन पर बैन भी लग रहा है।

इसे देखते हुए अब कई प्रकार के ग्रीन पटाखे बाजार में मिलने लगे हैं जो आम पटाखों से होने वाले प्रदूषण को कम करते हैं और साथ ही हानिकारक कैमिकल और ध्वनि प्रदूषण भी कम फैलाते हैं।

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जानिए क्या है कलर ब्लाइंडनेस के कारण, लक्षण और बचाव के तरीके !!

कलर ब्लाइंडनेस एक ऐसी स्थिति है जिसमें कुछ रंगों में अंतर करने की क्षमता सामान्य से कम हो जाती है। जिसमें आपकी आँखें उस तरह से रंग नहीं देख पाती हैं, जैसी होनी चाहिए। इसका अर्थ है कि कलर ब्लाइंडनेस से पीड़ित व्यक्ति को लाल, हरे, नीले या इनका मिश्रण देखने में परेशानी होती है।

ऐसा बहुत कम होता है कि किसी व्यक्ति की रंग देखने की क्षमता ही चली जाए (इसे मोनोक्रोमसी कहते हैं)। बहुत से लोगों का यह मानना हैं कि कलर ब्लाइंडनेस से पीड़ित व्यक्ति को केवल काले और सफेद रंग ही दिखते हैं परन्तु यह एक गलत धारणा है।

कलर ब्लाइंडनेस के कई अलग-अलग प्रकार और स्तर हैं। भारत में कलर ब्लाइंडनेस का प्रचलन पुरुषों में 8% और महिलाओं में केवल 0.5% है।

हम रंग कैसे देखते हैं?

मानवीय आँख रेटिना (आँख के अंदर की ओर झिल्ली) को हल्का सा उत्तेजित करके रंग देखती है। रेटिना रॉड और कॉन्स कोशिकाओं से बनी होती है।

रॉड कोशिकाएं :-रॉड कोशिकाएं रेटिना के घेरे में स्थित होती हैं। यह हमें रात को देखने में मदद करती हैं, लेकिन यह रंगों में अंतर नहीं कर सकती।

कॉन्स कोशिकाएं : कॉन्स कोशिकाएं रेटिना के केंद्र में स्थित होती हैं, यह रात में देखने में मदद नहीं करती हैं, लेकिन दिन के समय के दौरान रंगों को समझने में सक्षम होती हैं। कॉन्स कोशिकाओं को तीन प्रकार में विभाजित किया जाता है:

1. एल-कॉन कोशिकाएं जो लाल रौशनी को महसूस करती हैं।

2. एम-कॉन कोशिकाएं जो हरी रौशनी को महसूस करती हैं।

3. एस-कॉन कोशिकाएं जो नीली रौशनी को महसूस करती हैं।

कलर ब्लाइंडनेस का निदान स्वयं किया जा सकता है। यह तब होता है जब रंग महसूस करने वाली कॉन कोशिकाएं मस्तिष्क को संकेत नहीं भेज पाती हैं। यह आमतौर पर या तो पारिवारिक कारणों की वजह से होता है या ऑप्टिक तंत्रिका या रेटिना के रोगों द्वारा होता है। यह समस्या एक्स-क्रोमोजोम से जुड़ी है और लगभग हमेशा एक मां से अपने बेटे में होती है।
कलर ब्लाइंडनेस उम्र बढ़ने, आँख की समस्याओं (जैसे मोतियाबिंद, ग्लूकोमा), आंखों की चोटों, कुछ दवाइयों के दुष्प्रभावों के कारण हो सकता है। पारिवारिक कारणों से हुआ कलर ब्लाइंडनेस जीवन भर रहता है।

लाल-हरा रंगों का कलर ब्लाइंडनेस पारिवारिक कारणों से होता है। यह सबसे आम प्रकार का कलर ब्लाइंडनेस है।

कलर ब्लाइंडनेस के प्रकार

कलर ब्लाइंडनेस तीन प्रकार का होता है जिसमें से प्रत्येक के उप-प्रकार हैं:-

लाल-हरा कलर ब्लाइंडनेस पारिवारिक कारणों से हुए कलर ब्लाइंडनेस का सबसे सामान्य प्रकार लाल कॉन या हरे कॉन रंगद्रव्य की क्षति या कम कार्य कर पाने के कारण होता है। लाल-हरा कलर ब्लाइंडनेस चार प्रकार का होता है :-

1. प्रोटेनॉम्ली (Protanomaly) – यह कलर ब्लाइंडनेस लाल कॉन रंगद्रव्य के आसामान्य होने के कारण होता है। इस प्रकार के कलर ब्लाइंडनेस में लाल, नारंगी और पीले रंग हरे दिखते हैं और रंग चमकदार नहीं होते हैं। यह स्थिति सौम्य होती है और आमतौर पर दैनिक जीवन पर इसका असर नहीं होता है।

2. प्रोटेनॉपिआ (Protanopia) – इस कलर ब्लाइंडनेस में लाल कॉन रंगद्रव्य काम करना बंद कर देते हैं और लाल रंग काला दिखाई देता है। नारंगी, पीले और हरे रंग के कुछ प्रकार सभी पीले रंग के रूप में दिखाई देते हैं।

3. ड्यूटेरानॉम्ली (Deuteranomaly) – यह कलर ब्लाइंडनेस का सबसे आम प्रकार है। इसमें हरा कॉन रंगद्रव्य असामान्य होता है। इसमें पीला और हरा रंग लाल दिखाई देते है और बैंगनी और नीले रंग को पहचानना मुश्किल होता है। यह स्थिति सौम्य होती है और आमतौर पर दैनिक जीवन पर इसका भी असर नहीं होता है।

4. ड्यूटेरानॉपिआ (Deuteranopia) – इस कलर ब्लाइंडनेस में हरे कॉन रंगद्रव्य काम करना बंद कर देते हैं। वे लाल रंगों को भूरा-पीला और हरे रंग को गहरा पीला जैसा देखते हैं।

नीला-पीला कलर ब्लाइंडनेस

नीला-पीला कलर ब्लाइंडनेस लाल-हरे कलर ब्लाइंडनेस से दुर्लभ है। इसमें नीले कॉन रंगद्रव्य (ट्राइटन) या तो होते ही नहीं हैं या सीमित कार्य करते हैं। नीले-पीले कलर ब्लाइंडनेस के दो प्रकार होते हैं।

1. ट्राइटोनॉमलि (Tritanomaly) – इसमें नीले कॉन रंगद्रव्य कम कार्य करते हैं। इसमें नीला रंग हरा दिखाई देता है और गुलाबी से पीले और लाल में फरक करना मुश्किल हो सकता है।

2. ट्राइटेनॉपिआ(Tritanopia) – ट्राइटेनॉपिआ से ग्रस्त लोगों में नीली कॉन कोशिकाओं की कमी होती है। इसमें नीला रंग हरा दिखाई देता है और पीला रंग बैंगनी या हल्के भूरे रंग का दिखता है।

पूर्ण कलर ब्लाइंडनेस (मोनोक्रोमसी)

पूर्ण कलर ब्लाइंडनेस (मोनोक्रोमैसी) वाले लोगों को रंग बिल्कुल दिखाई नहीं देते हैं और उनकी दृष्टि की स्पष्टता भी प्रभावित हो सकती है। मोनोक्रोमसी दो प्रकार के होते हैं।

1. कॉन मोनोक्रोमसी (Cone monochromacy) – इसमें तीन कॉन सेल रंगद्रव्य में से दो या तीनों काम नहीं करते। लाल कॉन मोनोक्रोमसी, हरी कॉन मोनोक्रोमसी और नीली कॉन मोनोक्रोमसी होती है। कॉन मोनोक्रोमसी वाले लोगों को रंगों में भेद करने में परेशानी होती है क्योंकि मस्तिष्क को विभिन्न प्रकार के कॉन से आए संकेतों की ज़रुरत होती है रंगों को देखने के लिए जब केवल एक प्रकार का कॉन काम करता है तो यह तुलना संभव नहीं होती है।

2. रॉड मोनोक्रोमसी (Rod monochromacy) – यह जन्म से मौजूद होता है। इसमें कॉन कोशिकाओं में से कोई भी कार्यात्मक रंगद्रव्य नहीं होता है। रॉड मोनोक्रोमसी वाले लोगों को दुनिया काले, सफेद और ग्रे रंग में दिखती है। रॉड मोनोक्रोमसी वाले लोग प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते है जिसे फोटोफोबिक कहते है।

कलर ब्लाइंडनेस के लक्षण

1. सामान्य तरीके से रंगों और रंगों की चमक को देखने में समस्या।

2. सामान्य रंगों के बीच अंतर को बताने में असमर्थता।

अक्सर, कलर ब्लाइंडनेस के लक्षण बहुत आम होते हैं कुछ लोगों को पता ही नहीं चलता कि उन्हें इसकी समस्या है। जब कोई बच्चा रंगों को सीख रहा होता है, तो माता-पिता को कलर ब्लाइंडनेस के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गंभीर परिस्थितियों में पाए जाने वाले अन्य लक्षण निम्नलिखित हैं:-

1. कुछ रंगों को पहचानने में असमर्थता।

उदाहरण के लिए लाल और हरे रंगों के बीच के अंतर न बता पाना लेकिन नीले और पीले रंगों में आसानी से बता देना।

2. केवल कुछ रंगों को देख पाना।

3. केवल काले, सफेद, और ग्रे रंग देख पाना (दुर्बल मामलों में)।

4. कुछ रंगों में फर्क करने की कम क्षमता।

5. पढ़ने में कठिनाई।

6. पलकों का गिरना।

7. एक रंग के कुछ प्रकारों को ही देखा पाना।

8. कई रंग देखने में कठिनाई।

9. रंगों के नाम गलत बताना।

10. दृष्टि में दोहरापन (डिप्लोपिआ)।

11. आँख में दर्द होना।

12. आँखों की गतिविधि में तीव्रता।

13. कभी-कभी, दृष्टि की कमज़ोर होना।

कलर ब्लाइंडनेस के कारण

यदि आपकी आँखें सामान्य हैं, तो आप अलग-अलग रंगों में अंतर कर सकते हैं लेकिन अगर आपकी कॉन कोशिकाओं में एक या अधिक प्रकाश-संवेदनशील रसायनों की कमी होती है, तो आप केवल दो प्राथमिक रंग देख सकते हैं। कलर ब्लाइंडनेस होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:-

1. पारिवारिक विकार

पारिवारिक कारणों से होने वाली रंग दृष्टि की समस्याएं महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में अधिक सामान्य होती हैं। सबसे आम कलर ब्लाइंडनेस लाल-हरे रंग की होती है जबकि नीले-पीले रंग की कलर ब्लाइंडनेस बहुत कम होती है।

कोई भी रंग न देख पाने की संभावनाएं बहुत कम होती हैं। पारिवारिक विकार के कारण आपको हल्के, मध्यम या गंभीर स्तर का विकार हो सकता है।

पारिवारिक विकार के कारण हुई कलर ब्लाइंडनेस आमतौर पर दोनों आँखों को प्रभावित करती है और इसकी तीव्रता आपके जीवनकाल में नहीं बदलती।

2. रोग

कुछ ऐसी परिस्थितियां जो कलर ब्लाइंडनेस का कारण बन सकती हैं, वह हैं सिकल सेल एनीमिया, मधुमेह, आँख की मैक्युलर डिजनरेशन (मैक्यूला का व्यपजनन), अल्जाइमर रोग, ग्लूकोमा, पार्किंसंस रोग, शराब की पुरानी लत और ल्यूकेमिया। इसमें एक आँख दूसरे की तुलना में अधिक प्रभावित हो सकती है और कलर ब्लाइंडनेस का इलाज किया जा सकता अगर उससे जुड़ी बीमारी का इलाज हो।

3. कुछ दवाएं जो हृदय की समस्याएं, उच्च रक्तचाप, स्तंभन दोष, संक्रमण, तंत्रिका संबंधी विकार और मनोवैज्ञानिक समस्याओं का इलाज करती हैं, कलर ब्लाइंडनेस भी कर सकती हैं।

4. उम्र का बढ़ना आपकी उम्र बढ़ने के साथ-साथ रंगों को देखने की आपकी क्षमता धीरे-धीरे कम होती है। रसायन कार्यस्थल में कुछ रसायनों के संपर्क में आना जैसे कार्बन डाइसल्फाइड और उर्वरक, कलर ब्लाइंडनेस कर सकते हैं।

कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) से बचाव

कलर ब्लाइंडनेस का निदान आमतौर पर एक नियमित आँख के परीक्षण के दौरान हो जाता है इसलिए बच्चों का 4 साल की उम्र में कलर ब्लाइंडनेस का परीक्षण किया जाना चाहिए। यह रोका नहीं जा सकता है, लेकिन इससे स्वास्थ्य के लिए कोई खतरा नहीं होता है।

इससे असुविधा हो सकती है लेकिन रोज़मर्रा की जिंदगी पर इससे कोई बाधा नहीं होती। कलर ब्लाइंडनेस के अधिकांश मामले पारिवारिक कारणों के कारण होते हैं इसलिए, इन्हें रोका नहीं जा सकता।

हालांकि, बच्चों में कलर ब्लाइंडनेस काशीघ्र निदान इसकी प्रकृति और गंभीरता को समझने में मदद कर सकता है। अगर आप दृष्टि की कमी से सम्बंधित कोई दवा ले रहे हैं तो आपकी दृष्टि की नियमित जाँच होनी चाहिए।

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मानवीय आँखों से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

अलग दिखने का ऐसा जुनून, जिसे देखकर आप दंग जायेंगे

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आज कल लोग अलग करने या दिखने के लिए कुछ भी करते हैं। कोई अपने कपड़ों और लुक के साथ एक्सपेरिमेंट करते हैं तो कोई अपने हेयर स्टाइल साथ।

आज की हमारी इस पोस्ट में हम आपको एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने सबसे अलग दिखने के चकर में अपने सिर के सारे बाल हटवा दिए, तो चलिए जानते हैं :-

मशहूर मैक्सिकन रैपर (Mexican Rapper) डैन सुर ने अपने सिर से सारे बाल हटवा दिए और उसकी जगह सोने की चेन लगवा ली है। इन्होंने लाइम लाइट में आने के लिए ऐसा काम किया है जो आज तक किसी ने नहीं किया होगा। डैन सुर (Dan Sur) नाम के इस रैपर की फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो भी रही है।

 

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डैन सुर ने इंस्टाग्राम पर अपने नए लुक की फोटो पोस्ट की है। जिसमें उसके चेहरे पर गोल्ड की चेन लटकते दिख रही है। रैपर ने ऑपरेशन के जरिए खोपड़ी में सोने की चेन का गुच्छा लगवाया है।

एक मीडिया संस्थान से बात करते हुए डैन सुर ने बताया कि वो कुछ अलग करना चाहते थे। उनका कहना है कि बालों को तो हर कोई रंगवाता है और उनकी नकल भी हरकोई कर लेता है।

डैन ने कहा कि उनके सिर में एक हुक को लगाया गया है ये सोने के चेन उसी हुक की सहायता से दूसरी हुक के साथ एक के बाद एक करके जुड़े हुए हैं। रैपर का दावा है कि इस नए लुक से उन्हें म्यूजिक करियर में मदद मिलेगी।

वहीं डैन ने यह भी दावा किया है कि वो अपने सिर में सोने की चेन लगवाने वाले दुनिया के पहले इंसान हैं। रैपर ने ये भी बताया कि उन्होंने अपने दांतों में भी सोना लगवाया है। जिस कारण उनके नए लुक के फोटो और वीडियो जमकर वायरल हो रहे हैं ।

ये विशालकाय पेड़ है पूरे जंगल के समान

बरगद एक दीर्घजीवी और विशालकाय पेड़ होता है, जिसे हिंदू परंपरा के अनुसार पूज्यनीय माना जाता है। वैसे तो बरगद के पेड़ दुनियाभर में पाए जाते हैं, लेकिन दुनिया का सबसे विशालकाय जो बरगद का पेड़ है, वह भारत में ही है।

इसका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। इस पेड़ को ‘द ग्रेट बनियन ट्री‘ के नाम से जाना जाता है। यह पेड़ 250 साल से भी ज्यादा पुराना है। आइए जानते हैं इस विशालकाय पेड़ के बारे में:-

कहां है यह पेड़

बरगद का यह विशालकाय पेड़ कोलकाता के आचार्य जगदीशचंद्र बोस बॉटनिकल गार्डन में है। वर्ष 1787 में जब इस बॉटनिकल गार्डन की स्थापना की गई थी, उस समय इस बरगद की उम्र 15 से 20 साल थी। इस हिसाब से आज इस बरगद की उम्र लगभग 250 साल से भी अधिक होगी।

85 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियां

‘द ग्रेट बनियन ट्री‘ दुनिया का सबसे चौड़ा पेड़ है। यह 14,500 वर्ग मीटर में फैला है। इसकी सबसे ऊंची शाखा की लंबाई या कह सकते हैं इस पेड़ की ऊंचाई लगभग 24 मीटर है।

इसकी 3000 से अधिक जटाएं हैं, जो अब जड़ों में तब्दील हो चुकी हैं। इस वजह से इसे दुनिया का सबसे चौड़ा पेड़ या ‘वॉकिंग ट्री‘ भी कहा जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस एक पेड़ पर पक्षियों की 85 से ज्यादा प्रजातियां निवास करती हैं।

कितने क्षेत्र में फैला है यह यह बरगद

पहली बार देखने पर तो यह एक जंगल की तरह नज़र आता है। दरअसल, इसके पेड़ की शाखाओं से निकली जटाएं पानी की तलाश में नीचे ज़मीन की ओर बढ़ती गईं और बाद में जड़ के रूप में पेड़ को पानी और सहारा देने लगीं। वर्तमान में यह लगभग 18.918 वर्ग मीटर से भी अधिक क्षेत्र में फैला है।

गिनीज बुक में भी दर्ज है इसका नाम

इस पेड़ की विशालता को देखते हुए इसका नाम ‘गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स‘ में भी दर्ज किया गया है। भारत सरकार ने साल 1987 में इसके सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। यही नहीं, यह ‘बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया‘ का प्रतीक चिन्ह भी है।

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ये है समुद्री खीरा, जानिए कुछ दिलचस्प तथ्य!!

समुद्री खीरा (sea cucumber), दरअसल इसका खीरे से कोई लेना देना नहीं है। यह एक जीव है और इसे ‘समुद्री खीरा’ इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह खीरे की तरह दिखता है।

यह सॉफ्ट स्किन और ट्यूब जैसी बॉडी वाला जीव है। इसका समुद्री ईकोसिस्टम में महत्वपूर्ण रोल है। यह पोषक तत्वों को रिसाइकल करता है, साथ ही समुद्र में बढ़े एसिड की मात्रा को भी कम करता है।

समुद्री खीरे की मांग चीन और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में बहुत अधिक है, क्योंकि इनका उपयोग दवाइयां बनाने में भी किया जाता है। सी कुकुंबर की करीब 1200 प्रजातियां पाई जाती हैं। यह अलग-अलग रंगों और आकार के हो सकते हैं।

कुछ दिलचस्प तथ्य

  • सी कुकुंबर रात में एक्टिव होता है। ये समुद्र तल में पाए जाते हैं।
  • इनकी लंबाई करीब 3 से 12 इंच तक हो सकती है।
  • यह स्टार फिश की तरह एक कोशीय जीव है यानी इनमें हड्डियां नहीं होती हैं।
  • जहां एक किलो कुकुंबर की कीमत 20 से 30 रुपए होती है, वहीं समुद्री खीरे की एक किलो की कीमत लाख रुपए तक होती है। यही वजह है कि इनका अवैध शिकार भी बहुत अधिक में होता है।
  • IUCN (The International Union for Conservation of Nature) की रेड लिस्ट में ब्राउन समुद्री खीरा (लुप्तप्राय), ब्लैकस्पॉटेड सी कुकुंबर, नीला समुद्री खीरा आदि शामिल हैं।

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विदेशी जगहों से कम नहीं लगती भारत की ये 10 जगहें !!

भारत में ऐसी कई जगहें हैं जो बिल्कुल विदेशी जगहों की तरह लगती हैं और आप जब भारत की इन शानदार जगहों को देखेंगे तो हैरान रह जाएंगे। इस आर्टिकल में हम आपको ऐसे ही कुछ जगहों के बारे में बताएंगे जो हूबहू विदेशी जगहों की तरह दिखती हैं। तो चलिए जानते हैं :-

जैसलमेर में थार रेगिस्तान – अफ्रीका में सहारा रेगिस्तान

सहारा रेगिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान है और हर पर्यटक अपनी जिन्दगी में एक बार सहारा रेगिस्तान की रोमंचक यात्रा का अनुभव अवश्य करना चाहता है।

लेकिन क्या आप जानते हैं ‘द ग्रेट इंडियन डेजर्ट’ के रूप में लोकप्रिय थार रेगिस्तान, अपने अंतहीन टीलों और अनगिनत सितारों से भरी तारों वाली रातों के लिए मशहूर है जोकि सहारा रेगिस्तान से कुछ कम नहीं लगता।

थार रेगिस्तान भारत का मुख्य रेगिस्तान है जहाँ आप रात में केम्पिंग के साथ दिन के समय में ऊंट सफारी और जीप सफारी करके थार रेगिस्तान में सहारा रेगिस्तान को महसूस कर सकते हैं। अगर आप रेगिस्तान की सुंदरता को देखना चाहते हैं तो थार रेगिस्तान एक अच्छा विकल्प है।

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अंडमान और निकोबार द्वीप समूह – फी फी थाईलैंड

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह कई मायनों में थाईलैंड के फी फी द्वीप समूह से मिलता जुलता हैं। यह स्थान अपनी साहसिक गतिविधियों जैसे स्कूबा डाइविंग, सर्फिंग, नौकायन, स्नोर्कलिंग और कई अन्य के लिए जाना जाता है। अगर आप इस तरह की गतिविधि करने के इच्छुक हैं, तो आप इन्हें अंडमान निकोबार में भी कर सकते हैं।

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चित्रकूट वॉटरफॉल – नियाग्रा फॉल्स

चित्रकोट फॉल्स को भारत के नियाग्रा फॉल्स के रूप में जाना जाता है, और यह असल में, नियाग्रा फॉल्स का एक छोटा वर्जन भी है। नियाग्रा फॉल्स संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा की सीमा पर स्थित है, जो 176 फीट की ऊंचाई से गिरता है।

इसकी की तुलना में चित्रकोट से लगभग 100 फीट की ऊंचाई से पानी गिरता है, जबकि मानसून के दौरान यह 150 मीटर तक हो जाता है जो कि एक बेहद खूबसूरत नज़ारा है।

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केरल में एलेप्पी – वेनिस इटली

जब बात भारतीय डेस्टिनेशन और उनके विदेशी जगहों जैसी दिखने की बात आती है, तो केरल का अलाप्पुझा भी इस लिस्ट में जरूर आता है। आलाप्पुड़ा (Alappuzha), जो पहले आलेप्पी (Alleppey) कहलाया जाता था, भारत के केरल राज्य के आलाप्पुड़ा ज़िले में स्थित एक नगर है।

जिस तरह से वेनिस प्राकृतिक नहरों और कैनाल का घर है, उसी तरह से अलाप्पुझा भी अपने खूबसूरत बैकवॉटर राइड्स और स्वादिष्ट सीफूड के लिए जाना जाता है।

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कश्मीर की गुलमर्ग घाटी और स्विट्ज़रलैंड

गुलमर्ग का खूबसूरत शहर, जोकि श्रीनगर से 52 किमी दूर है। यहां का एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण गुलमर्ग गोंडोला है, जो एशिया की सबसे ऊंची और सबसे लंबी केबल कार परियोजना है।

गुलमर्ग की सुंदरता और इसकी बर्फ से ढकी चोटियां एकदम स्विट्जरलैंड की तरह दिखती हैं। अगर आप भारत में रहकर विदेशी जगह का लुत्फ उठाना चाहें, तो गुलमर्ग से बेहतर आपके लिए कुछ नहीं हो सकता है।

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भारत में पॉन्डिचेरी शहर – फ्रांस में फ्रेंच टाउन

फ्रांस की राजधानी पेरिस बहुत ही खूबसूरत जगह है। इसे ‘सिटी ऑफ लव‘, ‘सिटी ऑफ लाइट्स‘, ‘फैशन सिटी‘ और न जाने कितने खूबसूरत उपनाम दिए गए हैं। इस देश की अपनी बात ही अलग है।

वहीं भारत के पुदुच्चेरी, (पहले पॉन्डिचेरी) में आपको फ्रांस की झलक जरूर मिलेगी। इस स्थान की खास बात यह है कि यह स्थान करीबन 300 वर्षों तक फ्रांसीसी अधिकार में रहा है, जिसके कारण आज भी यहां फ्रांसीसी वास्तुशिल्प और संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।

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वैली ऑफ़ फ्लावर्स उत्तराखंड – एंटेलोप घाटी संयुक्त राज्य अमेरिका  

अगर आप कैलिफोर्निया की खूबसूरत एंटीलोप घाटी को देखना चाहते हैं। तो आपको इसके लिए कैलिफ़ोर्निया जाने की जरूरत नहीं है बल्कि आप भारत में ही एंटीलोप घाटी की मनमोहक सुन्दरता को महसूस कर सकते हैं, उत्तराखंड में स्थित “वैली ऑफ़ फ्लावर्स” में फूलों की लाखों प्रजातियाँ पाई जाती है। जिसे एंटीलोप घाटी के पर्यावाची के रूप में भी जाना जाता है।

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खज्जियार हिमाचल प्रदेश – स्विट्जरलैंड

खज्जियार हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत वादियों में बसा एक अद्भुत हिल स्टेशन है यह “मिनी स्विट्जरलैंड” के नाम से बहुत प्रसिद्ध है। खज्जियार में आप जैसे ही प्रवेश करते हैं आपको सबसे पहले घास का मैदान दिखाई देगा।

यह घास का मैदान आपको असल स्विट्जरलैंड की याद जरूर दिलायेगा। इसके चारों तरफ घिरे देवदार के पेड़ों की झील के नीले पानी में बहुत ही सुंदर परछाइयां दिखती हैं। जो हूबहू स्विट्जरलैंड जैसे ही दिखाई देती है

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कूर्ग, कर्नाटक – स्कॉटलैंड

आधिकारिक तौर पर कूर्ग को कोडागु के रूप में जाना जाता है, लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इस स्थान को भारत के स्कॉटलैंड के रूप में भी जाना जाता है। वजह तो कई हैं, लेकिन सबसे अहम वजह है यहां के हरे भरे परिदृश्य। देश में कॉफी का सबसे बड़ा उत्पादक होने के नाते, यह हिल स्टेशन देश भर से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

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लक्षद्वीप  – मालदीव

मालदीव खास कर सेलिब्रिटीज के बीच बहुत ही लोकप्रिय है। इसका कारण है कि वहां का क्रिस्टल क्लीयर पानी, सुंदर बीच और शानदार रिजॉर्ट्स। वहीं भारत का लक्षद्वीप एकदम मालदीव जैसा ही है। नीला पानी, समृद्ध समुद्री जीवन, सुंदर परिदृश्य, प्राकृतिक सुंदरता और मनमोहक वातावरण मालदीव की तरह मनोरम और रोमांचकारी है।

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