जीवों में भी होता है ‘सिक्स्थ सेंस’

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हम अक्सर कॉमन सैंस और ‘सिक्स्थ सैंस’ की बातें करते रहते हैं। इंसान के पास ये दोनों होती हैं। जानवरों में ‘कॉमन सैंस की बात तो रिसर्च का विषय है लेकिन यह सच है कि कई जीव- जंतु हालात को इंसान से भी ज्यादा जल्दी समझते और उसी तरह व्यवहार करते हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि सभी जीव- जंतुओं में ‘सिक्सथ सैंस’ यानी छठी इंद्रिय होती है। यहां आपको हम कुछ खास जीवों के बारे में बता रहे हैं। माना जाता है कि इनमें कमाल की ‘सिक्सथ सैंस’ होती है। आइये जानते हैं :-

कुत्ते :- कुत्ते के सूंघने के साथ ही सुनने की शक्ति हमसे से कई गुना अधिक होती है। इसी तरह कुत्ते जैसे दिखने वाले कुछ और जानवर इंसानों की तुलना में बेहद पतली आवाज सुन लेते हैं इसीलिए कुत्ते का विस्फोटक या नशीली चीजों का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

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डॉल्फिन :- डॉल्फिन समुद्र के भीतर रहते हुए अपने ध्वनि पैदा करने वाले अंग पानी के अंदर की साजिशों के साथ ही भोजन की पड़ताल करने में सक्षम हो जाती है। इसके लिए डॉल्फिन हाई फ्रीक्वैसीं वाले शोर- शराबे जैसी आवाज निकालती है।

इसका उसे फायदा यह होता है कि इस आवाज में एक खास ढंग की भाषा होती है। यह हम इंसानों को समझ में नहीं आती।

चमगादड़ :- चमगादड़ परिंदों की तरह उड़ने वाले स्तनपायी में भी यह इंद्रियां पाई जाती हैं। इनके भीतर राडार की तरंग छोड़ने वाली इंद्रियां होती हैं जिनके जरिए वह अपना भोजन प्राप्त कर लेते हैं और यही इंद्रियां इन्हें आगे आने वाली किसी खतरे से बचाती भी हैं।

चमगादड़ अंधे होते हैं। इन्हें जीवन जीने के लिए आंखों की कोई जरूरत नहीं होती। यह छठी इंद्रिय के जरिए अपनी जरूरतें पूरी कर लेते हैं।

कबूतर :- कबूतरों की बनावट तीन लैवल वाले जटिल पैटर्न से होती है। इससे वे खराब हालात का को भांपने में सक्षम होते हैं। इसका फायदा वे इलाकों की पहचान में भी करते देखे गए हैं।

सांप :- जहरीले सांपों की जातियों में भी ‘सिक्सथ सैंस’ होता है। इससे वह बिलों की गहराई को सूंघ लेते हैं। ऐसा वे अपनी नाक और आंख जैसी दिखने वाली जगह के बीच मौजूद छठी इंद्रिय की मदद से करते हैं। दरसल, सांपों की आंखें नहीं होती, बल्कि उनमें मौजूद इंफ्रारैड जैसी छठी इंद्रिय काम करती है।

इसी से वे रात में भी शिकार करते हैं। यह इंद्रियां कितनी संवेदनशील होती है कि अगर कोई बिल के मुहाने पर पहुंच जाए तो वह पड़ताल कर लेते हैं कि वह कितनी दूर और किस तरह का शिकार है।

मकड़ी :- सभी मकड़ियों में खास ‘रिसैप्टर’ अंग होते हैं जिन्हें ‘सिल्ट सेसिला’ कहते हैं। यह सैंस उनकी अस्थियों में लगे होते हैं। इससे मकड़ी अपने शिकार के आकार, भार आदि की पहचान कर पाती हैं।

मकड़ी के जाल में कोई जीव फंसता है तो पहले से वह तय कर लेती है कि उस पर हमला करना ठीक होगा या नहीं। कीड़े के उड़ने की गति और हवा के बहने की रफ्तार भी मकड़िया अपने सैंसरों से करती हैं।

बत्तख :- बतख जैसे जलीय जीवों में उनके पंखों के ठीक भीतर इलैक्ट्रासैप्टर्स’ लगे होते हैं। इनकी मदद से वे इलैक्ट्रिकल फील्ड का पता लगा लेते हैं। ऐसा वे तब करते हैं जब उन्हें आभास होता है कि आस – पास उनका शिकार मौजूद है इसलिए बतख जाति के ये जीव तैरने के दौरान अपने सिर को बाएं दाएं छुपाते रहते हैं।

इसकी बदौलत उनमें सुनने की शक्ति बढ़ती है लेकिन कोई चीज उन से टकराती है तो वह ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं और अपने को बचाने के काम में लग जाते हैं।

बिल्लियां :- बिल्लियों के बारे में तो वैज्ञानिकों का दावा है कि उनमें किसी नेचुरल डिजास्टर या मौसम बदलावों को काफी पहले ही समझने की क्षमता होती है। ऐसे मौकों पर वे भी अजीब हरकतें करती हैं।

भीषण तूफान ज्वालामुखी के विस्फोटों, भूकंप यहां तक कि हवाई झंझावातों से पहले ही बिल्लियों को इनके आने की सुगबुगाहट होने लगती है।

साल्मन मछली :- यह मछली उन समुद्री जीवो में शामिल हैं जो अपने जीवन की सुरक्षा और खानपान के लिए अपनी छठी इंद्रिय का प्रयोग करती है। समुद्री कछुए जिन तटों पर पैदा होते हैं उन्हें कभी नहीं भूलते, वे चाहे जितनी दूर की यात्रा कर लें, लौट कर आते वे अपने जन्म स्थान पर ही हैं।

किसी इसी तरह कई जानवर अपना भोजन पाने के लिए काफी दूर निकल जाते हैं और उसे पाने के बाद धरती के मैग्नेटिक फील्ड के जरिए वहीं वापस आ जाते हैं जहां से वे भोजन की तलाश में चले थे।

पंजाब केसरी से साभार….।

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