जानिए क्यों है खास साल का अंतिम चंद्र ग्रहण!!

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इस साल का अंतिम चंद्र ग्रहण 19 नवंबर 2021 दिन शुक्रवार को कार्तिक मास की पूर्णिमा को लगने जा रहा है। यह चंद्र ग्रहण बेहद खास है क्योंकि यह साल का ही नहीं बल्कि पूरी सदी का सबसे लंबी अवध‍ि का चंद्र ग्रहण होगा।

ज्योति शास्त्रों के अनुसार यह उपच्छाया चंद्र ग्रहण है जिसे खंडग्रास और आंशिक चंद्र ग्रहण भी कहा जाता है। भारत में यह अंतिम चंद्र ग्रहण उपच्छाया ग्रहण के रूप में दिखाई देगा, इसलिए यहां इसका सूतक मान्य नहीं होगा।

चंद्र ग्रहण की शुरुआत 19 नवंबर को दोपहर 12 बजकर 48 मिनट से होगी और यह 4 बजकर 17 मिनट तक दिखाई देगा।

इसकी अवध‍ि 3 घंटे 28 म‍िनट और 24 सेकंड्स की होगी और चांद का लगभग 97 फीसदी हिस्सा लाल दिखाई देगा। चंद्रमा और धरती के बीच अध‍िक दूरी के कारण यह ग्रहण लंबी अवध‍ि का होने वाला है।

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580 साल बाद सबसे लंबा आंशिक चंद्र ग्रहण

नासा के अनुसार ये मौका 580 साल बाद आया है। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में ये सबसे लंबा आंशिक चंद्र ग्रहण देखा जा सकेगा। इससे पहले इतना लंबा चंद्र ग्रहण 18 फरवरी 1440 को हुआ था और अब संभवत: 8 फरवरी, 2669 में होगा।

यह चंद्र ग्रहण भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में दिखाई देगा। वहीं विदेशों में अमेरिका, उत्तरी यूरोप, पूर्वी एशिया, ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत महासागर क्षेत्र में दिखाई देगा।

“केदारनाथ धाम” परिपूर्ण है अलौकिक सौंदर्य से

हिमालयी राज्य उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ धाम विश्व की आस्था एवं आध्यात्मिक चेतना का पर्याय है, जहां के कण-कण में भगवान शंकर की उपस्थिति का आभास होता है।

यह स्थान धार्मिक महत्व के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जाना जाता है। मन्दिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है 1.गर्भ गृह  2.मध्यभाग  2. सभा मण्डप।

गर्भ गृह के मध्य में भगवान श्री केदारेश्वर जी का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग स्थित है जिसके अग्र भाग पर गणेश जी की आकृति और साथ ही माँ पार्वती का श्री यंत्र विद्यमान है।

ज्योतिर्लिंग पर प्राकृतिक यगयोपवित और ज्योतिर्लिंग के पृष्ठ भाग पर प्राकृतिक स्फटिक माला को आसानी से देखा जा सकता है। श्री केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग में नव लिंगाकार विग्रह विधमान है इस कारण इस ज्योतिर्लिंग को नव लिंग केदार भी कहा जाता है

आदि शंकराचार्य ने करवाया था जीर्णोधार

सर्वप्रथम आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोधार करवाया था। इसी रुद्र रूप की परिकल्पना के कारण इस सम्पूर्ण क्षेत्र को रुद्रप्रयाग कहा गया है।

केदारनाथ धाम के कपाट अप्रैल-मई माह में विधि-विधान से घोषित तिथि के उपरांत खुलते हैं तथा दीपावली के पश्चात बंद कर दिए जाते हैं।

शीतकाल में 6 माह भगवान केदारनाथ की चल-विग्रह डोली एवं दंडी ऊखीमठ में पूजा-अर्चना हेतु स्थापित की जाती है। इस धाम का तापमान शीत ऋतु में शून्य से बहुत नीचे पहुंच जाता है।

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मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं

हिमालय के केदार शृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें दर्शन दिए तथा नर-नारायण के आग्रह से भगवान शिव ज्योर्तिलिंग स्वरूप में वहीं पर विराजमान हो गए।

पंच केदार की कथा

इसी क्रम में पुराणों में वर्णित पंच केदार की कथा के के अनुसार महाभारत के युद्ध में विजयी होने के उपरांत पांडव अपने भ्रातृहत्या की हत्या के पाप से मुक्त होना चाहते थे

इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे।

भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे और उनकी परीक्षा लेने के लिए अंर्तध्यान होकर केदार जा बसे।  दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए।

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बैल का रूप धारण किया

भगवान शिव ने पांडवों को आता देख बैल का रूप धारण कर लिया और पशुओं के झुंड में जा मिले। तब पांडवों ने भगवान के दर्शन पाने के लिए एक योजना बनाई और भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर अपने दोनों पैर केदार पर्वत के दोनों ओर फैला दिए।

कहा जाता है कि अन्य सब पशु तो भीम के पैरों के नीचे से निकल गए लेकिन शंकर जी रूपी बैल पैरों के नीचे से निकलने को तैयार नहीं हुआ।

जब भीम ने उस बैल को जबरदस्ती पकड़ना चाहा तो भोलेनाथ विशाल रूप धारण कर धरती में समाने लगे। उसी क्षण भीम ने पूरी ताकत से भैंस की पीठ का भाग कस कर पकड़ लिया।

उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ।

अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मद्महेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है।

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डायबिटीज के लिए वरदान है हल्दी, जाने कैसे करें इसका सेवन!

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भारतीय रसोई में हल्दी का इस्तेमाल व्यंजनों का स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। एक ओर यह जहां खाने का स्वाद और रंग बढ़ा देती है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य की समस्याओं के लिए वरदान है हल्दी।

100 से अधिक रासायनिक यौगिकों वाली हल्दी को ‘भारतीय केसर‘ या ‘सुनहरा मसाला‘ भी कहा जाता है। हल्दी इसमें करक्यूमिन सक्रिय यौगिक होता है जो कई बीमारियों से लड़ने में सबसे अधिक मददगार है। वहीं, कई अध्ययन का मानना है कि हल्दी डायबिटीज मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

हल्दी की जड़ों का अर्क लें

यह सबसे आसान तरीकों में से एक है जिससे आप डायबिटीज को कंट्रोल कर सकते हैं। हल्दी की जड़ के अर्क का सेवन इंसुलिन प्रतिरोध को कम करता है जिससे शुगर लेवल नहीं बढ़ता। यह बीटा कोशिकाओं के कार्य में भी सुधार करता है, जो मधुमेह के लिए फायदेमंद हैं।

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हल्दी वाला दूध पीएं

शोध के अनुसार, हल्दी वाला दूध ना सिर्फ तनाव को कम करता है बल्कि इससे टाइप-2 मधुमेह का खतरा भी कम होता है। ध्यान रखें कि इसके लिए गुनगुने दूध का ही इस्तेमाल करें।

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हल्दी और काली मिर्च पाउडर

गर्म दूध में हल्दी, काली मिर्च पाउडर व शहद डालकर पीएं। काली मिर्च में पिपेरिन तत्व होता है जो हल्दी के साथ मिलकर खून नली को साफ करता है। इससे खून में शुगर लेवल नहीं बढ़ता।

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हल्दी और आंवला

आंवले में विटामिन-सी होता है, जो कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल रखता है। वहीं, दोनों में में क्रोमियम भी होता है, जो कार्ब्स को पचाने में मदद करता है, जिससे ब्लड में शुगर कंट्रोल रहता है। इसके लिए हल्दी और आंवला पाउडर को गुनगुने पानी में मिक्स करके पीएं।

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हल्दी और अदरक

सर्दियों में अदरक का सेवन फायदेमंद होता है क्योंकि इसकी तासीर गर्म होता है। वहीं, शुगर कंट्रोल करने के लिए आफ अदरक – हल्दी का काढ़ा या चाय बनाकर पी सकते हैं।

14 नवंबर को हर साल डायबिटीज दिवस मनाया जाता है, जिसका मकसद लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करना है।

चलिए इस मौके पर जानते हैं कि डायबिटीज मरीजों को इसका प्रयोग कैसे करना चाहिए…

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हल्दी और दालचीनी

Turmeric boon for diabetes know how use

1 गिलास दूध में चुटकीभर हल्दी, थोड़ा-सा गुड़ और दालचीनी पाउडर उबालें। इसे नाश्ते से पहले पीएं। इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट्स और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण शुगर कंट्रोल में रखेंगे। टाइप-2 डायबिटीज मरीजों के लिए भी इसका सेवन फायदेमंद है।

अजीबोग़रीब :- ऐसी लत जिससे छुटकारा पाने के लिए एक शख्स ने महिला को दी थप्पड़ मारने की नौकरी

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सोशल मीडिया की हर किसी को जैसे मानो इन दिनों लत सी लग गई हो। वो चाहे कहीं रास्ते में हों या घर पर, काम कर रहे हों या खाली बैठे हों, उनका फेसबुक खुला ही रहता है। लाइफ में क्या चल रहा है लोग उसे फेसबुक पर जरूर शेयर करते हैं।

आज की हमारी यह पोस्ट एक ऐसे बिज़नस मेन के बारे में है जिसने फेसबुक की लत से छुटकारा पाने के लिए एक महिला को नौकरी पर रखा।

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इसी आदत से छुटकारा पाने के लिए एक शख्स ने 2012 से एक महिला को काम पर रखा है। ये शक्स जैसे ही फेसबुक खोलता है तो उसे महिला थप्पड़ मारती है।

फेसबुक की लत छुड़ाने वाली इस अजीबोगरीब नौकरी पर एलन मस्क ने ट्वीट किया,

मस्क के रिएक्शन से वायरल हई खबर

अब एलन मस्क ने इस वीडियो पर रिएक्शन देते हुए दो इमोजी पोस्ट किए। इस पर मनीष सेठी ने भी लिखा कि ‘इस तस्वीर में जो लड़का है वह मैं ही हूँ। एलन मस्क के रिएक्शन के बाद अब शायद मेरी पहुंच और ज्यादा हो जाए’।

इस बिज़नस मेन का नाम मनीष सेठी है। मनीष सेठी ने 2012 से ही महिला को नौकरी पर रखा है, सेठी ने महिला को कहा था कि “अगर मैं अपना समय बर्बाद करूं तो आपको मुझे रोकना होगा और जरुरत पड़ी तो मुझे थप्पड़ भी मारना होगा“।

थप्पड़ मारने का काम करने वाली महिला का नाम कारा है। इस काम के लिए कारा को 8 डॉलर (करीब 600 रुपए) प्रति घंटे मिलते हैं।

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थप्पड़ वाले प्रयोग से काम की क्षमता 98% हुई

मनीष ने कहा कि वह 9 साल से फेसबुक की लत को छुड़ाने के लिए थप्पड़ वाला प्रयोग कर रहे हैं। मनीष ने ये भी बताया कि कारा के थप्पड़ मारने से उनके काम करने की क्षमता भी बढ़ी है।

पहले ज्यादातर दिनों में उनकी औसतन काम करने की क्षमता लगभग 35-40% थी। जब से कारा उनके पास बैठी तो काम की क्षमता बढ़कर 98% हो गई।

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बॉलीवुड के इन 12 सितारों का नाम दर्ज़ है गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड् में

हिन्दी सिनेमा, जिसे बॉलीवुड के नाम से भी जाना जाता है, हिन्दी भाषा में फ़िल्म बनाने का उद्योग है। बॉलीवुड में कई ऐसे स्टार्स हैं जिन्होंने अपनी दमदार एक्टिंग के ज़रिए कई बड़े-बड़े अवॉर्ड हासिल किए हैं।

लेकिन क्या आपको पता है कि बॉलीवुड में ऐसे भी कई स्टार्स हैं, जिनका नाम गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल किया गया है। अगर नहीं, तो चलिए आपको बताते हैं उन स्टार्स के बारे में जिनका नाम गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।

अमिताभ बच्चन

बॉलीवुड के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन के लाखों फैंस हैं लेकिन उनमें से कई यह बात नहीं जानते होंगे कि बिग बी का नाम गिनीज बुक में भी दर्ज है। दरअसल अमिताभ बच्चन 13 मशहूर सिंगर्स के साथ ‘श्री हनुमान चालीसा‘ गाने वाले इकलौते एक्टर का खिताब उनके नाम है।

अमिताभ बच्चन ने इसे कुमार सानू, कैलाश खेर, शान, शंकर महादेवन, सोनू निगम, सुखविंदर सिंह, उदित नारायण, आदेश श्रीवास्तव, अभिजीत, बाबुल सुप्रियो और हंसराज हंस जैसे सिंगर्स के साथ गाया है।

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कटरीना कैफ

कटरीना का नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में 2013 में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली बॉलीवुड अभिनेत्री के रूप में  नाम दर्ज हुआ था। कटरीना ने 2013 में 63.75 करोड़ रूपए की कमाई थी।

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अभिषेक बच्चन

अभिषेक बच्चन ने फ़िल्म दिल्ली 6 के प्रमोशन के दौरान अपने प्राइवेट जेट से 12 घंटे में 1800 किलोमीटर तक ट्रेवल किया, जिसके चलते उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल हुआ।

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कुमार सानू

बॉलीवुड में 90 के दशक में बेहद प्रसिद्ध रहे गायक कुमार सानू ने 1 दिन में 28 गाने गाए थे। इस वजह से उनका नाम भी गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल हुआ। कुमार ने 1993 में ऐसा किया था। उन्होंने बॉलीवुड को कई हिट गाने दिए हैं।

शाहरुख खान

साल 2013 में शाहरुख बी-टाउन के सबसे ज्यादा कमाई करने वाले एक्टर बन गए थे, जिसके बाद उनका नाम गिनीज बुक में दर्ज हुआ। उस साल उन्होंने करीब 220 करोड़ रुपए कमाए थे।

आशा भोंसले

सात दशकों से बॉलीवुड में सक्रिय आशा भोंसले के नाम सबसे ज्यादा गाना गाने का रिकॉर्ड है। आशा ने 11 हजार से ज़्यादा सोलो, डुएट और कोरस गाने गाए हैं। यह गाने 20 भाषाओं के हैं।

इसी वजह से उनका नाम गिनीज बुक में दर्ज है। आशा के गाए गानों में ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ ‘दम मारो दम’ यादगार गाने हैं।

सोनाक्षी सिन्हा

सोनाक्षी सिन्हा 2016 में नेल पेंटिंग कॉम्पीटिशन में शामिल हुई थीं। इसमें एक साथ 1328 महिलाओं ने हिस्सा लिया था। इंटरनेशनल वीमेन्स डे पर यह एक रिकॉर्ड बना, जिसमें सोनाक्षी भी शामिल हुईं। उनका नाम 1328 गर्ल के बीच नेल पॉलिश सबसे पहले और सबसे ज्यादा बार लगाने के चलते दर्ज हुआ था।

समीर अंजाना

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे ज्यादा गाने लिखने का रिकॉर्ड समीर अंजाना के पास है। जिन्होंने 3500 से भी ज़्यादा गाने अलग अलग भाषाओं मे लिखे हैं।

ललिता पवार

बॉलीवुड में महिला अभिनेत्रियों मे ललिता पवार ने 70 वर्षो तक काम किया। उन्होंने 700 से भी ज़्यादा फ़िल्में की है। सबसे लंबे समय तक बॉलीवुड मे काम कर ललिता पवार का नाम गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।

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अशोक कुमार

बॉलीवुड में लीड एक्टर के तौर पर सबसे लंबे समय तक काम करने का वर्ल्ड रिकॉर्ड अशोक कुमार के नाम दर्ज है। अशोक कुमार सिल्वर स्क्रीन के पहले सुपरस्टार थे।

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कपूर फैमिली

पृथ्वीराज कपूर, राज कपूर से लेकर रणबीर कपूर तक कपूर फैमिली से अब तक 25 कलाकार बॉलीवुड का हिस्सा बन चुके हैं जो कि वाकई में एक बड़ी उपलब्धि है और पहली बार ऐसा हुआ है।

इसी के कारण इस फैमिली का नाम गिनिज बुक में शामिल है जो कि इससे पहले कभी नहीं देखने को मिला। साल 1929 से चल रहा ये सिलसिला आज भी जारी है।

कहो ना… प्यार है फिल्म के लिए सर्वाधिक पुरस्कार

साल 2000 में रिलीज हुई इस फिल्म में मशहूर एक्टर ऋतिक रोशन और अमीषा पटेल ने अपना डेब्यू किया था। जिसे राकेश रोशन ने डायरेक्ट किया था।

अपनी पहली ही फिल्म से इन सितारों ने गिनिज बुक में नाम दर्ज हो गया था। बता दें कि उस समय इस रोमांटिक फिल्म ने कुल 92 पुरस्कार जीते थे और उन्हें 2002 के संस्करण में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया।

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डर या फोबिया जानिए क्या है इन दोनों में अंतर?

प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी चीज से डर लगता है। बल्कि दूसरे शब्दों में कहें तो, डर हम सभी के अंदर पाया जाता है। ये किसी में कम और किसी में ज्यादा हो सकता है, लेकिन जब डर जरुरत से ज्यादा बढ़ जाए तो एक गंभीर मानसिक विकार का रूप ले लेता है, इसी को फोबिया कहते हैं।

वैसे, ये जानना भी महत्वपूर्ण है कि हर डर, फोबिया नहीं होता है जैसे अगर कोई इंसान अंधेरे से इसलिए डरता है कि न दिखने के कारण ​कहीं ठोकर न लग जाए। तो ये डर है। कई लोग डर और फोबिया को एक ही मानते हैं, लेकिन दोनों में काफी फर्क है।

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आज इस पोस्ट के माध्यम से हम जानेंगे डर और फोबिया के बीच क्या अंतर है, तो चलिए जानते हैं :-

क्या होता है फोबिया में

‘फोबिया‘ ग्रीक शब्द Phobos से निकला है। जो व्यक्ति किसी तरह के फोबिया से ग्रस्त होता है, उसे धड़कन तेज होने, सांस लेने में तकलीफ, पसीना अधिक आने की समस्या होती है। उसे फोबिक स्थिति से तुरंत बाहर आने की जरूरत होती है और कभी-कभी ऐसे व्यक्ति को मरने का भी डर लगने लगता है।

फोबिया और डर के बीच में अंतर

फोबिया और डर, दोनों में काफी अंतर है। डर एक भावनात्‍मक रेस्पांस है, जो आमतौर पर किसी से धमकी मिलने या डांट पड़ने पर होता है। ये बेहद सामान्‍य बात है और कोई बीमारी नहीं है। लेकिन फोबिया, डर का खतरनाक और अलग ही लेवल है। फोबिया में डर इतना ज्यादा होता है कि इंसान इसे खत्म करने के लिए अपनी जान पर भी खेल सकता है।

ऐसे में क्या करें

यदि आपको लगता है कि आपको फोबिया है, तो इसके इलाज के लिए विभिन्न प्रकार की औषधियाँ उपलब्ध है जो काफी प्रभावी है। तथापि इसके लिए मनोवैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियाँ भी काफी आवश्यक एवं लाभदायक पाई गई है। यहाँ ध्यान देने की बात है कि इसका इलाज स्वयं दवाई लेकर नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे समस्या बढ़ सकती है।

जानिए कौन है तुलसी गौड़ा, जिन्हें कहा जाता है “वन की देवी”

तुलसी गौड़ा कर्नाटक की हलक्की जनजाति (Halakki Indigenous) से हैं और वह बेहद गरीब परिवार से आती हैं। प्रकृति से अपार प्रेम करने वाली तुलसी अपना ज्यादातर वक्त जंगलों में ही बिताती आई हैं।

जंगल में रहने के साथ-साथ उन्हें जड़ी – बूटियों का अच्छा-खास ज्ञान भी हो गया है साथ ही वृक्षारोपण करने पर उनका जोर रहा है। इसका नतीजा हुआ कि उन्होंने 30 हजार से ज्यादा पेड़-पौधा लगाकर एक पूरा जंगल खड़ा कर दिया।

पर्यावरणविद् तुलसी गौड़ा को उम्र और अनुभव के साथ प्रकृति की इतनी जानकारी हो गई कि उन्हें ‘जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया’ तक कहा जाना लगा।

करीब 10 साल की उम्र से वह पर्यावरण संरक्षण का काम कर रही हैं और अपना पूरा जीवन उन्होंने प्रकृति की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया है। नंगे पैर रहने वाली और जंगल से जुड़ी तमाम जानकारियां रखनी वालीं तुलसी गौड़ा हजारों पेड़-पौधे लगा चुकी हैं।

पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा राष्ट्रपति भवन में सम्‍मानित की गईं कर्नाटक की 70 वर्षीय आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा का नाम अब दुनिया आदर से ले रही है। उन्‍हें पर्यावरण की सुरक्षा में उनके योगदान के लिए सरकार द्वारा पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

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‘जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया’ और ‘वन देवी’ जैसे नामों से प्रसिद्ध तुलसी आज तक हज़ारों पौधे लगा चुकी हैं और वन विभाग की नर्सरी की देखभाल करती हैं। अपने काम और पद्मश्री सम्मान मिलने के अलावा एक और वजह से तुलसी गौड़ा सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

दरअसल, सोमवार 8 नवंबर को जब तुलसी गौड़ा राष्ट्रपति से सम्मान लेने पहुंचीं तो उन्होंने पारंपरिक पोशाक पहन रखी थी और वे नंगे पैर थीं। उसी दौरान उनकी एक तस्वीर खिंच गई जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

इसमें पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ‘वन देवी’ को प्रणाम करते दिख रहे हैं। इस तस्वीर के वायरल होते ही कई लोगों ने इस तस्वीर पर प्रतिक्रिया दी हैं जैसे:

वायरल वीडियो :- कपिल शर्मा ने अपने हेयर ड्रेसर से की मस्ती, देखें मजेदार वीडियो

“द कपिल शर्मा” शो को लेकर चर्चा में रहने वाले कपिल शर्मा ने एक मस्ती भरा वीडियो अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया है जिसमें वह अपने हेयर ड्रेसर के साथ मस्ती करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। उनके इस वीडियो पर फैन्स भी फनी कमेंट्स कर रहे हैं।

वह सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं। वह अपनी प्रोफेशनल लाइफ से लेकर पर्सनल लाइफ के मोमेंट्स फैंस के साथ सोशल मीडिया पर शेयर करते रहते हैं।

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इस वीडियो में वह काफी फनी मूड में दिखाई दे रहे हैं उन्होंने यह फनी वीडियो रविवार को शेयर किया था। कपिल के हेयर ड्रेसर उनका हेयर स्टाइल कर रहे हैं और साथ ही कपिल एक्टिंग कर रहे हैं। वीडियो में कपिल हेयर ड्रेसर से मस्ती करने के बाद हंसते हुए फनी पोज दे रहे हैं।

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कपिल ने वीडियो शेयर करने के साथ कैप्शन में लिखा “ऑन पब्लिक डिमांड, इंस्टाग्राम ट्रेंडिंग“। कपिल शर्मा के वीडियो पर कई हस्तियों ने हंसी का रिएक्शन दिया है। कॉमेडी किंग के शो “द कपिल शर्मा” में भी वह सेलिब्रिटिज से लेकर दर्शकों संग मस्ती करते हुए दिखाई देते हैं।

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जानिए लोटस टेम्पल से जुड़े दिलचस्प तथ्य

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भारत की राजधानी दिल्ली में घूमने के लिए बहुत सी जगह हैं। यहां पर खासतौर पर आपको ऐतिहासिक स्थल व मंदिर देखने को मिलेेंगे। इन स्थलों को देखने के लिए दुनियाभर से लोग आते हैं। दिल्ली में मौजूद एक ऐसा स्मारक है जो हर किसी को आश्चर्यचकित कर देता है और वह है लोटस टेम्पल। कमल के आकार का यह भव्य भवन हर किसी को अपने इतिहास और संरचना से हैरान कर देता है।

आज इस लेख के माध्यम से हम जानेगें इस खूबसूरत और भव्य लोटस टेम्पल के बारे में, तो चलिए जानते हैं:-

कमल के फूल जैसे आकार के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर का निर्माण कार्य 13 नवम्बर 1986 में संपन्न हुआ था। इस मंदिर का उद्घाटन 24 दिसम्बर 1986 में हुआ था और आम लोगों के लिए इस मंदिर को 1 जनवरी 1987 को खोला गया था।

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कमल जैसी आकृति होने के कारण ही इसे कमल मंदिर या लोटस टेम्पल कहा जाता है। यह मंदिर बहाई धर्म के लोगों की आस्था और श्रद्धा के सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है।

तेहरान के पर्शियन बहा-उल्लाह ने बहाई धर्म की स्थापना की थी। अधिकतर लोगों का यह सवाल रहता है कि कमल मंदिर में आखिर किस भगवान की पूजा होती है।

दरअसल इस टेम्पल में किसी भी विशेष धर्म के भगवान की पूजा नहीं होती है। यह एक बहाई उपासना मंदिर है जिसे बहाई धर्म के लोगों द्वारा बनवाया गया था।

कमल मंदिर में किसी भी भगवान की मूर्ति नहीं है क्योंकि बहाई धर्म के लोग किसी एक भगवान में विश्वास नहीं करते, बहाई धर्म के लोगों का मानना है कि भगवान केवल एक है जो पूरे विश्व का रचयिता है इसलिए कमल मंदिर में आने वाले पर्यटक केवल इसकी वास्तुकला का दीदार करने और यहां पर मेडिटेशन, प्रार्थना के लिए आते हैं अर्थात लोटस टेम्पल में किसी भी धर्म के लोगों के जाने की मनाही नहीं है प्रत्येक धर्म के लोग यहां पर जाकर कमल मंदिर में घूम सकते हैं और प्रार्थना कर सकते हैं।

यह मंदिर खूबसूरती और वास्तुकला का इतना बेहतरीन नमूना है कि इसे बीसवीं सदी का ताजमहल भी कहा जाता है और अभी तक वास्तु कला के क्षेत्र में कमल मंदिर को सैकड़ों अवार्ड मिल चुके है।

आपको बता दें कि लोटस टेंपल को कनाडा के एक पर्सियन आर्किटेक्ट फरीबॉर्ज सहबा ने डिजाइन किया था और कमल मंदिर को बहाई धर्म के लोगो द्वारा एशिया महाद्वीप का मदर टेंपल भी कहा जाता है।

लोटस टेम्पल के बारे में दिलचस्प तथ्य

  • लगभग क्षेत्रफल 26 एकड़ (10.5 हेक्टेयर , 105,000 वर्ग मीटर) क्षेत्र में फैले इस मंदिर में अन्दर जाने के लिए 9 दरवाजे भी बनाये गये हैं।
  • इस मंदिर को करीब 700 इंजिनियर, तकनीशियन, (Technician) कामगार और कलाकारों ने मिलकर पूरा किया था।
  • इसे बनाने में इस्तेमाल किये गए मार्बल को विशेष रूप से ग्रीस से आयत किया गया था।
  • इस मंदिर में 27 खड़ी मार्बल की पंखुड़ियाँ भी बनी हुई है, जिसे 3 और 9 के आकार में बनाया गया है और इसके हॉल में लगभग 2400 लोग एकसाथ बैठकर प्रार्थना कर सकते है।
  • इन पंखुड़ियों के शेल्स के निर्माण में स्टील को गेल्वनाइज्ड किया गया है ताकि उसे जंग से बचाया जा सके।
  • इसकी लम्बाई लगभग 34 मीटर है और यह 9 तालाब से घिरा भी हुआ है।
  • यहाँ दो छोटे सभागार भी हैं, जिसमें करीब 70 सीटें है।
  • यह मंदिर अपने शांत वातावरण के लिए जाना जाता है, इसलिए यहाँ शोर मचाना मना है।
  • यहाँ पर रोजाना लगभग 10 से 12 हजार लोग दर्शन (प्रार्थना) करने के लिए आते है।
  • यहाँ पर हर घण्टे में 5 मिनट के लिए प्रार्थना सभाए आयोजित की जाती है।
  • देश की राजधानी दिल्ली में स्थित कमल मंदिर विश्व के उन 7 प्रार्थना स्थलों में से एक है, जो बहाई धर्म का पालन करते हैं। बहाई धर्म के बाकी मंदिर सिडनी, पनामा, अपिया, कम्पाला, फ्रैंकफर्ट और विलेमेट आदि शहरों में स्थित हैं।
  • आप यहाँ मंगलवार से रविवार तक किसी भी दिन जा सकते है। इस मंदिर में सोमवार को अवकाश रहता है।
  • इस मंदिर का खुलने का समय गर्मियों में सुबह 9:30 बजे और बंद होने समय शाम को 6:30 बजे है। जबकि सर्दियों में यह सुबह 10:00 से शाम के 5:00 बजे तक खुलता है।

उंमगोट – भारत की सबसे साफ नदी

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हमारे देश में नदियों की हालत बहुत अच्छी नहीं है। अधिकतर नदियां बेहद गंदी नजर आती हैं। यूं तो सरकार नदियों की साफ-सफाई के लिए अक्सर कोई न कोई प्रोजैक्ट शुरू करती रही है लेकिन इन सबके बावजूद नदियों की सफाई का काम आज तक पूरा नहीं हो सका है।

हजारों करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी गंगा सहित हमारी अधिकतर नदियों की हालत वैसी की वैसी है। हालांकि, इसकी जिम्मेदार केवल सरकार ही नहीं बल्कि लोग भी हैं। अगर हम लोग नदियों में कचरा फेंकना बंद कर दें तो ये नदियां हमेशा साफ रहेंगी।

नदियों को साफ कैसे रखना है यह हमें मेघालय के लोगों से सीखना चाहिए। मेघालय की उमंगोट नदी को देश की सबसे साफ नदी कहा जाता है। इस नदी का पानी इतना साफ है कि उसमें कांच की तरह आर-पार दिखता है। पानी के नीचे का एक-एक पत्थर क्रिस्टल की तरह साफ नजर आता है।

इसमें कचरा तो दूर की बात है धूल का एक कण भी दिखाई नहीं देता। इसमें चलने वाली नाव को देख कर तो ऐसा लगता है मानो वह किसी कांच के ऊपर या हवा में तैर रही हो। यह खूबसूरत नदी मेघालय की राजधानी शिलांग से 95 किलोमीटर दूर भारत-बंगलादेश सीमा के पास स्थित पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले के दावकी कस्बे से बहती है।

इस इलाके में रहने वाले खासी आदिवासी समुदाय के लोग इस नदी की हर दिन सफाई करते हैं। दरअसल, यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। इनका मानना है कि सफाई उनके संस्कारों में है।

उमंगोट नदी 3 गांवों दावकी, दारंग और शेंनान्गडेंग से होकर बहती है। इन 3 गांवों में करीब 300 घर हैं और सभी मिलकर इस नदी की सफाई करते हैं। गंदगी फैलाने पर 5000 रुपए तक जुर्माना वसूला जाता है। महीने में 3 से 4 दिन ‘कम्युनिटी डे‘ के होते हैं।

इसी दिन गांव के हर घर से कम से कम एक व्यक्ति नदी की सफाई के लिए आता है। उमंगोट नदी साफ ही नहीं है, बल्कि उसके आस-पास का नजारा भी बेहद खूबसूरत है। हरे-भरे जंगलों के बीच स्थित इस नदी की तुलाना लोग स्वर्ग में बहने वाली नदी से भी करते हैं।

नवम्बर से अप्रैल तक यहां भारी संख्या में पर्यटक आते हैं। इस दौरान पर्यटक यहां बोटिंग का लुत्फ उठाते नज़र आते हैं जबकि मानसून के सीजन में बोटिंग बंद रहती है। इस नदी से कुछ ही दूरी पर स्थित मावलिननॉन्ग गांव को भी एशिया के सबसे साफ गांव का दर्जा हासिल है।

अंग्रेजों ने इस नदी पर एक ब्रिज भी बनवाया है। इस नदी में बड़ी संख्या में मछलियां भी मिलती हैं। इस बेहद साफ नदी जैसा अद्भुत नजारा देश की किसी भी अन्य नदी में देखने को नहीं मिलता है।

गंगा और यमुना नदी की हालत तो सभी ने देखी ही होगी और कई लोगों का कहना है कि नदियां कभी साफ नहीं हो सकती लेकिन मेघालय के लोगों इसे गलत साबित कर दिखाया है।

पंजाब केसरी से साभार