आखिर क्यों होती है ओलावृष्टि, जानिए क्या है इसका कारण!

आपने देखा होगा कि बारिश के दौरान कई बार बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े भी गिरने लगते हैं, जिन्हें हम ओले कहते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि ये ओले कैसे बनते हैं और फिर अचानक जमीन पर क्यों गिरने लगते हैं? आइए जानते हैं आखिर क्यों होती है ओलावृष्टि क्या है इसके पीछे का कारण।

जैसे कि आप सब जानते हैं कि जब पानी का तापमान 0 डिग्री सेल्सियस होता है, तब पानी बर्फ बन जाता है। ऐसे ही जब आसमान में तापमान शून्य से कई डिग्री कम हो जाता है तो वहां हवा में मौजूद नमी ठंडी बूंदों के रूप में जम जाती है। धीरे-धीरे ये बर्फ के गोलों का रूप धारण कर लेती है, जिन्हें ओले कहते हैं।

समुद्र तटीय वाले हिस्से जैसे मुंबई, तेलंगाना आदि जगहों पर ओले नहीं गिरते हैं। जिन जगहों पर मौसम में ज्यादा नमी रहती है या फिर तापमान गर्म रहता है, ऐसी जगहों पर ओलावृष्टि ना के बराबर होती है।

एक बार ओले जब बड़े आकार में बदल जाते हैं, तो पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण इन्हें धरती की सतह पर ले आता है, जिसे ओले गिरना या ओलावृष्टि कहते हैं, आमतौर पर यह तेज आंधी के साथ होती है।

ओलावृष्टि में सबसे ज्यादा नुकसान फसलों को होता है। इसके अलावा इमारतों की कांच की खिड़कियां, बाहर रखी कांच की चीजें, विमान और कारों को नुकसान होने का खतरा रहता है।

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ये हैं भारत के सबसे ऊंचे शिवलिंग, जानिए क्या है इनकी खासियत !!!

महादेव !! भगवान शिव का दूसरा नाम है, क्योंकि उन्हें सभी हिंदू देवताओं में सबसे दिव्य माना जाता है। भारत के लगभग हर राज्य में भगवान शिव की पूजा की जाती है। उन्हें योगियों का देवता माना जाता है, साथ ही शिव त्रिमूर्ति के तीसरे देवता भी हैं।

इसमें ब्रह्मा को सृष्टि का निर्माता, विष्णु को रक्षक या पालनहार और शिव को संहारक या विनाश का देवता कहा जाता है। कई सदियों से लोग शिवलिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा करते आ रहे हैं। शिव लिंगम का अर्थ “शिव का प्रतीक” है।

शिवलिंग की पूजा न केवल भारत और श्रीलंका में बल्कि रोम और दुनिया के अन्य हिस्सों में भी की जाती है। चलिए आज इस लेख के माध्यम से भारत के सबसे ऊंचे शिवलिंग के बारे में जानते हैं –

भोजेश्वर मंदिर, मध्य प्रदेश

भोजपुर का भोजेश्वर मंदिर भारत के सबसे बड़े शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है, 18 फीट ऊंचे शिवलिंग को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित एक ही चट्टान से तैयार किया गया है।

भोजपुर शिव मंदिर मध्य प्रदेश के सबसे अद्भुत मंदिरों में से एक है। यह बेतवा नदी के तट पर स्थित है। माना जाता है कि भोजेश्वर मंदिर का निर्माण 118 शताब्दी के भोजपुर में परमार राजा “भोज” द्वारा किया गया था।

कोटिलिंगेश्वर मंदिर, कर्नाटक

कोटिलिंगेश्वर मंदिर में दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग है जिसकी ऊंचाई 108 फीट है और यह कर्नाटक में स्थित है। भगवान कोटिलिंगेश्वर मंदिर विभिन्न देवताओं के ग्यारह छोटे मंदिरों और नंदीश्वर की एक लंबी मूर्ति के साथ कोटिलिंगेश्वर समर्पित है।

इस विशाल शिवलिंग के ठीक सामने नंदी की एक मूर्ति है जो 35 फीट लंबी है। नंदी को 60 फुट लंबे, 40 फुट चौड़े और 4 फुट ऊंचे चबूतरे पर स्थापित किया गया है।

सिद्धेश्वर नाथ मंदिर, अरुणाचल प्रदेश

जीरो शहर भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश में स्थित है और कई वर्षों से विश्व धरोहर स्थल के लिए एक पसंदीदा शहर रहा है।

जीरो का सिद्धेश्वर नाथ मंदिर भगवान शिवलिंग और उनके परिवार की मेजबानी करता है, जिसकी लंबाई 25 फीट और चौड़ाई 22 फीट है। इस मंदिर में भगवान गणेश और देवी पार्वती की सुंदर मूर्तियां भी हैं।

अमरेश्वर महादेव मंदिर, मध्य प्रदेश

यह मंदिर मध्य प्रदेश के अनूपपुर में स्थित है और इसमें 11 फीट लंबा शिवलिंग है। यह शिवलिंग एक ही चूने के पत्थर से बना हुआ है।

अमरेश्वर मंदिर एक अनूठा स्थान है क्योंकि यहां एक ही स्थान पर आपको 12 ज्योतिर्लिंग देखने को मिल जाएंगे। अमरेश्वर महादेव मंदिर बहुत ही सुंदर और  शांत जगह है और यहां का झरना इस जगह की खूबसूरती को और बढ़ा देता है। यह स्थान नर्मदा नदी का उद्गम स्थल भी है।

बृहदेश्वर मंदिर, तमिलनाडु

बृहदेश्वर मंदिर तमिलनाडु के तंजावुर शहर में स्थित है, जिसे भारत के सबसे बड़े मंदिर के रूप में जाना जाता है। मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है जिसे महान जीवित चोल मंदिरों के रूप में भी जाना जाता है।

ब्रगदेश्वर मंदिर में शिवलिंग तमिलनाडु में सबसे बड़ा है और इसकी ऊंचाई 13.5 फीट है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर नंदी की मूर्ति भी स्थापित है।

हरिहर धाम मंदिर, झारखंड

हरिहर धाम मंदिर में शिवलिंग 65 फीट की ऊंचाई के साथ दुनिया में सबसे ऊंचा शिवलिंग है। झारखंड के गिरिडीह में लगभग 25 एकड़ भूमि के साथ विशाल शिव लिंग का निर्माण किया गया है।

यह मंदिर एक प्रमुख पर्यटन स्थल भी है और पूरे भारत से भक्त हर साल श्रावण पूर्णिमा पर भगवान शिव की पूजा करने के लिए इस स्थान पर आते हैं। इसके अलावा हरिहर धाम कई वर्षों से हिंदू विवाहों के लिए एक लोकप्रिय स्थान बन रहा है।

अमरनाथ मंदिर, जम्मू और कश्मीर

अमरनाथ गुफा मंदिर जम्मू और कश्मीर में स्थित है, जो 3,888 मीटर की ऊंचाई पर भगवान शिव को समर्पित है। इसे हिंदू धर्म के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक माना जाता है।

जुलाई-अगस्त में श्रावणी मेला के त्यौहार के आसपास गुफा बर्फीले पहाड़ों ये घिरी हुई होती है। 40 मीटर (130 फीट) ऊंचे शिवलिंग को आइस लिंगम के रूप में जाना जाता है। शिवलिंग की ऊंचाई में हर साल बदलाव देखा जा सकता है।

महेश्वरम श्री शिव पार्वती मंदिर, केरल

इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने तिरुवनंतपुरम जिले के चेकल में महेश्वरम श्री शिव पार्वती मंदिर की 111.2 फीट की संरचना को प्रमाणित करने के बाद केरल के इस शिव लिंगम को दुनिया का सबसे ऊंचा शिवलिंग कहा जाता है।

बेलनाकार संरचना में आठ मंजिल हैं, जिनमें से छह मानव शरीर के चक्रों या ऊर्जा केंद्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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जानिए मानव शरीर कितनी गर्मी सहन कर सकता है?

अप्रैल से जुलाई तक गर्मी लोगों को जमकर परेशान करती है। सीधे धूप और गर्मी के सम्पर्क में आने से हमारे शरीर का तापमान बढ़ जाता है। हीट स्ट्रोक और लू और इससे भी ज़्यादा गंभीर स्थिति हाइपर थर्मिया शरीर के तापमान बढ़ने के हाई रूप हैं जिससे मौत भी हो सकती है।

इस पोस्ट के माध्यम से हम देखेंगे कि हमारे शरीर में तापमान सहने की क्या क्षमता है। साथ ही यह भी जानेंगे की गर्मियों में शरीर के तापमान को संतुलन में बनाए रखने के लिए किन बातों पर अमल करना ज़रूरी है।

गर्मियों में आपको खूब पानी पीना चाहिए। जिससे शरीर के अंदर का तापमान सही बना रहता है। हालांकि, यह सवाल भी मन में आता है कि मानव शरीर कितना तापमान झेल सकता है।

सामान्य रूप से शरीर का तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस होता है। लगभग 25/35 से 42/48 डिग्री सेंटीग्रेड तक का तापमान शरीर बर्दाश्त कर सकता है।

गर्मी हो या सर्दी हमारे शरीर के अंदर का तंत्र हमेशा शरीर का तापमान 37.5 डिग्री सेल्सियस बनाए रखने के लिए काम करता है। वहीं, मस्तिष्क के पिछले हिस्से को हाइपोथैलेमस कहा जाता है जो शरीर के अंदर के तापमान को नियंत्रित करता है।

पसीना आना, मुंह से सांस लेना, गर्म होने पर किसी खुली और हवादार जगह पर जाना, ये सब एक तरह से शरीर के अंदर बने वो सिस्टम है जिससे शरीर अपना तापमान नियंत्रित रखता है। अक़्सर तापमान बढ़ने पर हमारी धमनियाँ (Blood vessels) भी चौड़ी हो जाती हैं ताकि खून ठीक से शरीर के हर हिस्से तक पहुँच सके।

मानव शरीर 37.5 डिग्री सेल्सियस में काम करने के लिए बना है। लेकिन उससे दो-चार डिग्री ऊपर और 2-4 डिग्री नीचे तक के तापमान को एडजस्ट करने में शरीर को दिक़्क़त नहीं आती।

शरीर कितनी गर्मी सहन कर सकता है यह बाहरी तापमान के अलावा और भी कई चीजों पर निर्भर करता है, जैसे-

  • आप कितने समय से उस तापमान के संपर्क में हैं।
  • मौसम में नमी कितनी होती है।
  • शरीर से पसीना या पानी कैसे निकल रहा है।
  • आपकी शारीरिक गतिविधि क्या है।
  • आपने कैसे कपड़े पहने हैं?

ये चीजें के शरीर बढ़े हुए तापमान को संतुलित करने में भी मदद करती हैं। नमी के कारण शरीर से बहुत अधिक पसीना निकलता है। ऐसे में आपको खूब पानी पीना चाहिए। ज्यादा पसीना आने से पानी की कमी होने लगती है।

यदि शरीर लंबे समय तक सूर्य की किरणों के संपर्क में रहता है, तो इससे बुखार या हर्पीज थर्मिया जैसी स्थिति हो जाती है। अगर बाहर का तापमान धीरे-धीरे बढ़ता है, तो शरीर उसके साथ तालमेल बिठा लेता है, लेकिन अगर अचानक तापमान बढ़ जाता है, जिससे परेशानी होती है।

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800 साल पुराने इस महादेव मंदिर में सूर्य की किरणें करती हैं शिवजी का अभिषेक

हमारे देश में अनेक शिव मंदिर हैं और सभी का अलग-अलग महत्व भी है। ऐसा ही एक मंदिर दक्षिण गुजरात के वलसाड जिले में अब्रामा गांव में स्थित है। इसे तड़केश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाता है।

मान्यता है कि ये मंदिर करीब 800 साल पुराना है। भोलेनाथ के इस मंदिर पर शिखर का निर्माण संभव नहीं है, इसलिए सूर्य की किरणें सीधे शिवलिंग का अभिषेक करती हैं। आज हम इस पोस्ट के माध्यम से जानेगें इस आलौकिक मंदिर के बारे में तो चलिए जानते हैं :-

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1994 में हुआ था पुनर्निर्माण

1994 में मंदिर का पुनर्निर्माण कर 20 फुट के गोलाकार आकृति में खुले शिखर में किया गया। शिव भक्त-उपासक हर समय यहां दर्शन कर धर्मलाभ अर्जित करने आते रहते हैं। श्रावण माह व महाशिव रात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है।

पौराणिक मान्यता

800 वर्ष पुराने इस अलौकिक मंदिर के बारे में उल्लेख मिलता है कि एक ग्वाले ने पाया कि उसकी गाय हर दिन झूड से अलग होकर घने जंगल में जाकर एक जगह खड़ी होकर अपने आप दूध की धारा प्रवाहित करती है।

ग्वाले ने अब्रामा गांव लौटकर ग्रामीणों को उसकी सफेद गाय द्वारा घने वन में एक पावन स्थल पर स्वत: दुग्धाभिषेक की बात बताई। शिव भक्त ग्रामीणों ने वहां जाकर देखा तो पवित्र स्थल के गर्भ में एक पावन शिला विराजमान थी फिर शिव भक्त ग्वाले ने हर दिन घने वन में जाकर शिला अभिषेक-पूजन शुरू कर दिया।

ग्वाले की अटूट श्रद्धा पर शिवजी प्रसन्न हुए। शिव जी ने ग्वाले को स्वप्न दिया और आदेश दिया कि घनघोर वन में आकर तुम्हारी सेवा से मैं प्रसन्न हूँ। अब मुझे यहां से दूर किसी पावन जगह ले जाकर स्थापित करो। ग्वाले ने ग्रामीणों को स्वप्न में मिले आदेश की बात बताई।

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ग्वाले की बात सुनकर सारे शिव भक्त ग्रामीण वन में गए। पावन स्थल पर ग्वाले की देख-रेख में खुदाई की तो यह शिला सात फुट की शिवलिंग स्वरूप में निकली। फिर ग्रामीणों ने पावन शिला को वर्तमान तड़केश्वर मंदिर में विधि-विधान से प्रतिष्ठित किया। साथ ही चारों ओर दीवार बना कर ऊपर छप्पर डाला।

ग्रामीणों ने देखा कि कुछ ही वक्त में यह छप्पर स्वत: ही सुलग कर स्वाहा हो गया। ऐसा बार-बार होता गया, ग्रामीण बार-बार प्रयास करते रहे। ग्वाले को भगवान ने फिर स्वप्न में बताया मैं तड़केश्वर महादेव हूँ।

मेरे ऊपर कोई छप्पर-आवरण न बनाएं। फिर ग्रामीणों ने शिव के आदेशानुसार शिवलिंग का मंदिर बनवाया लेकिन शिखर वाला हिस्सा खुला रखा ताकि सूर्य की किरणें हमेशा शिवलिंग पर अभिषेक करती रहें। तड़के का अभिप्राय धूप है जो यहां शिव जी को प्रिय है।

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शिवलिंग पर शमी पत्र चढ़ाने से प्रसन्न होते हैं भोलेनाथ!

हिंदू धर्म में जिस प्रकार तुलसी के पौधे की काफी मान्यता है और हर घर में इसकी पूजा की जाती है। उसी प्रकार एक और पौधा है जिसे हिंदू धर्म में काफी शुभ माना जाता है और ये है शमी पौधा, शास्त्रों के मुताबिक शमी पत्र का विशेष महत्व है और इसे घर में लगाना बेहद ही शुभ माना जाता है।

​कहा जाता है कि शमी का पौधा भगवान शिव का प्रिय है और भगवान शिव पर जल अर्पित करते समय जल में शमी का फूल या पत्ती डालने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। आज इस पोस्ट में हम भगवान शिव को शमी पत्र चढ़ाने के सही नियम के बारे में जानेंगे, तो चलिए शुरू करते हैं :-

सावन का महीना भगवान शिव का महीना माना जाता है। सच्चे मन और पूरी श्रद्धा से की गई पूजा से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

इस पूरे महीने में पूजा का फल कई गुना होता है। सावन में किसी भी दिन भगवान शिव को शमी के पत्ते चढ़ाए जा सकते हैं। लेकिन अगर सावन के सोमवार को शमी पत्र का भोग लगाया जाए तो भक्त को तुरंत भगवान की कृपा मिलती है।

शमी का पेड़ आपको शनि के प्रकोप से भी बचाता है। शमी के पौधे को घर के ईशान कोण यानी पूर्वोत्‍तर कोने में लगाना सबसे लाभकारी माना जाता है।

ऐसे चढ़ाएं शमीपत्र

सोमवार को स्न्नान करके शिव मंदिर में जाकर पूर्व या उत्तर दिशा की और मुख करके तांबे के पात्र में गंगाजल सफेद चंदन,चावल आदि मिलाकर शिवलिंग पर अभिषेक करें। अभिषेक करते समय ‘ऊं नमः शिवाय‘ मंत्र का उच्चारण करें।

जब अभिषेक कर लें, तब शिव जी को बिल्व पत्र, सफेद वस्त्र, जनेऊ, चावल, प्रसाद के साथ शमी के पत्ते भी अर्पित करें। शमी के पत्ते अर्पित करते समय हो सके तो इस मंत्र का उच्चारण करें।

अमंगलानां च शमनीं शमनीं दुष्कृतस्य च।
दु:स्वप्रनाशिनीं धन्यां प्रपद्येहं शमीं शुभाम्।।

Lord Shiva wallpapers

क्यों शुभ माना जाता है भोलेनाथ को शमी पत्र चढ़ाना ?

पौराणिक मान्यताओं में शमी का वृक्ष बड़ा ही मंगलकारी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शमी का पेड़ बहुत ही शुभ होता है। जब भगवान श्री राम रावण का वध करके लंका से लौटे तो उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा की।

इसके साथ ही एक अन्य कथा के अनुसार महाभारत में जब पांडवों को गुमनामी दी गई तो उन्होंने अपने शस्त्र शमी वृक्ष में छिपा दिए। भोलेनाथ के साथ-साथ गणेश जी और शनिदेव, दोनों को ही शमी बहुत प्रिय है इसलिए शमी का बहुत महत्व है।

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अजीब परंपरा: जहां बेटी को अपने ही पिता से करनी होती है शादी

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बाप-बेटी का रिश्ता बहुत ही पवित्र और अनमोल रिश्ता होता है। भारत जैसे देश में बेटियां लक्ष्मी का रूप होती हैं और पिता बड़े गर्व से उनका पालन-पोषण करते हैं और फिर बड़ी धूमधाम से उनका विवाह कर घर से विदा कर देते हैं।

लेकिन हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश में एक ऐसी जनजाति है, जहां बेटी की शादी उसके पिता से होती है। यह कुप्रथा आज भी इस समाज में प्रसिद्ध है। तो आइए जाने इस पोस्ट के माध्यम से बांग्लादेश की इस अजीब परंपरा के बारे में,

आज भी समाज में कई ऐसी कुरीतियां प्रचलित हैं जो बहुत ही हैरान कर देने वाली हैं। इसी तरह बांग्लादेश में भी एक ऐसी ही परंपरा है जिसमें बेटी को अपनी ही बेटी से शादी करनी पड़ती है। दरअसल बांग्लादेश की मंडी जनजाति में लड़की की शादी पिता से होती है और इसके पीछे का लॉजिक भी बड़ा अजीब है।

बांग्लादेश की मण्डी जनजाति की इस प्रथा के अनुसार ऐसा तब किया जाता है जब किसी महिला का पति बहुत की कम उम्र में गुजर जाये तो उसकी दूसरी शादी परिवार के ही किसी युवक से करा दी जाती है।

ऐसे में महिला के यदि कोई पहले से बेटी होती है तो युवक उस बेटी का भी पति माना जाता है। महिला की बेटी जब कुछ बड़ी हो जाती है तो उसे अपने मां के दूसरे पति को अपना पति मानना पड़ता है।

इसके पीछे लॉजिक ये है कि कम उम्र का पति अपनी पत्नी और बेटी दोनों की लंबे समय तक हिफाजत कर सकता है। आज भी इस कुप्रथा को माना जाता है।

द गार्डियन के मुताबिक 30 साल ‌की ओरोला डालबोट के पिता की मृत्यु तब हो गई थी जब वो बहुत छोटी थी। उसकी मां ने दूसरी शादी कर ली। जब वह 3 साल की थी, तो उसकी शादी उसके दूसरे पिता से कर दी गई। ओरोला कहती हैं कि दूसरे पिता का नाम नॉटेन था।

ओरोला अपने दूसरे पिता को काफी पसंद करती थी। वो उसकी काफी केयर करता था। ओरोला कहती हैं जब वह बड़ी हुई, तो उसे पता चला कि वह जिसे अपना पिता मानती थी, वह वास्तव में उसका पति है। ये सुनते ही ओरोला के कदमों तले जमीन खिसक गई।

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बेहद फायदेमंद है हमारे शरीर के लिए गिलोय, जानिए इसके चमत्कारी फायदों के बारे में

कुछ औषधियां में ऐसे दैवीय गुण होते हैं जो कई तरह के गंभीर रोगों को आसानी से ठीक करने में आपकी मदद कर सकते हैं। गिलोय एक ऐसी औषधि है, जिसका सेवन वर्षों से कई तरह के स्वास्थ्य लाभों के लिए किया जाता रहा है।

खासकर कोरोना के दौरान गिलोय के काढ़े का सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए भी किया जाता था।

आयुर्वेद में गिलोय को एक चमत्कारी औषधि के रूप में वर्णित किया गया है, इसे ‘अमृता‘ के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है ‘जीवन का अमृत‘। आइए जानते हैं गिलोय के सेवन से होने वाले फायदों के बारे में।

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मानसून में गिलोय का सेवन करने के फायदे

मानसून का मौसम आ गया है और इस मौसम में कई बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। खासकर मानसून के मौसम में लोग मच्छर जनित बीमारियों जैसे मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया से प्रभावित होते देखे जाते हैं।

आयुर्वेद के जानकारों का कहना है कि गिलोय के नियमित सेवन से न सिर्फ लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है बल्कि इन बीमारियों के इलाज के तौर पर गिलोय का सेवन करने से भी फायदा होता है।

गिलोय के कैंसर रोधी गुण

गिलोय के लाभों को जानने के लिए किए गए प्रयोगशाला अध्ययनों से पता चलता है कि इसमें एंटीऑक्सिडेंट प्रभाव होते हैं, जिसका अर्थ है कि यह कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव क्षति से बचाने में मदद कर सकता है।

ऐसे में गिलोय का नियमित सेवन करने वाले लोगों में ब्रेस्ट और प्रोस्टेट जैसे कई प्रकार के कैंसर होने का खतरा भी अन्य लोगों की तुलना में काफी कम होता है। गिलोय के कुछ यौगिकों को कैंसर रोधी गुणों के लिए भी जाना जाता है।

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सर्दी और फ्लू का इलाज

इस का सेवन एलर्जी के खिलाफ आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने में भी मदद कर सकता है। जुकाम और बुखार से पीड़ित 75 लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि गिलोय के सेवन से इन समस्याओं के लक्षणों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

जिन लोगों को मौसम में बदलाव के साथ सर्दी-जुकाम होने लगता है, उनके लिए गिलोय का काढ़ा नियमित रूप से लेना फायदेमंद हो सकता है।

बुढ़ापा रोधी जड़ी-बूटियाँ

अध्ययनों में गिलोय को एक प्रभावी एंटी-एजिंग जड़ी बूटी के रूप में वर्णित किया गया है। फ्लेवोनोइड्स से भरपूर, यह दवा कोशिका क्षति को कम करके नई कोशिकाओं के विकास को बढ़ावा देने में मदद करती है।

यह त्वचा को पोषण देता है और उम्र बढ़ने के संकेतों को कम करने के लिए शरीर में कोलेजन के उत्पादन को बढ़ाता है। इस का सेवन आपको उम्र बढ़ने के संकेतों से लंबे समय तक दूर रखने में मदद करता है।

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दूर दूर से लोग देखने आते हैं इस खूबसूरत रिवर्स वॉटरफॉल को, जानिए क्या है खासियत

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मानसून कई लोगों के लिए सबसे पसंदीदा मौसमों में से एक है। जहां मौसम में हरियाली पनपती है, वहीं सुरम्य परिदृश्य देखने लायक होते हैं।

भारत में हजारों वाटरफॉल है। वाटरफॉल को झरना और जल प्रपात भी कहते हैं। बारिश में इन झरनों को देखना बहुत ही शानदार होता है। ऐसा ही एक खूबसूरत झरना महाराष्ट्र में भी है और इस झरने की खास बात यह है कि, उल्टा बहता है।

प्रकृति के इस नज़ारे को देखने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं। आज इस पोस्ट में हम रिवर्स जलप्रपात के रूप में जानी जाने वाली शानदार प्राकृतिक रचना के बारे में बताने जा रहे हैं, तो चलिए जानते हैं :-

कहाँ पर है झरना

नानेघाट पश्चिमी घाट में दक्कन के पठार में कोंकण तट और प्राचीन शहर जुन्नार के बीच एक पहाड़ी दर्रा है। यह मुंबई से लगभग तीन घंटे की दूरी पर है।

मानसून के दौरान यहां आना सबसे बेहतर माना जाता है। क्योंकि, रिवर्स वॉटरफॉल की अजीब प्रक्रिया इसी वक्त देखी जाती है और इस दौरान यहां हवाएं भी काफी तेज चलती है।

 

अक्सर ऐसी हैरत में डाल देने वाली चीजों को देखकर हम उसे चमत्कार या जादू समझने लगते हैं, पर हर किसी चीज के पीछे कुछ न कुछ वैज्ञानिक कारण तो होता ही है।

इस झरने के पीछे का कारण है कि जैसा हमें मालूम है कि ऊंचाई पर हवा तेज चलती है, यहां इस पहाड़ से टकराकर हवा ऊपर की और उठ जाता है।

जब हवा का ऊपर की ओर लगने वाला बल गुरुत्वाकर्षण बल के बराबर या अधिक हो जाता है तो पानी ऊपर की ओर उठ जाता है।

ये है दुनिया का सबसे छोटा बॉडी बिल्डर, बनाया वर्ल्ड रिकॉर्ड

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छोटी हाइट अक्सर आपके लिए परेशानी खड़ी कर देती है। कम कद के लोगों को समाज में हीन भावना से देखा जाता है। लोग कम कद की महिलाओं या पुरुषों का मजाक भी उड़ाते हैं, जिससे उन्हें शर्मिंदगी भी महसूस होती है, लेकिन एक भारतीय बॉडी बिल्डर ने अपनी कम हाइट को अपना हथियार बनाकर सफलता का नया कीर्तिमान रच दिया।

उन्होंने साबित कर दिया कि कद में छोटा या बड़ा होना किसी व्यक्ति के हौसले को कम नहीं कर सकता। इस बॉडी बिल्डर का नाम प्रतीक विट्ठल मोहिते है।

26 साल के प्रतीक विट्ठल को शरीर से कुदरत ने भले ही परफेक्ट न बनाया हो, लेकिन उन्होंने अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना लिया और दुनिया के सबसे छोटे बॉडी बिल्डर बन गए।

इतना ही नहीं प्रतीक विट्ठल का नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज हो चुका है। आइए जानते हैं इस बॉडी बिल्डर की हाइट और उनकी सफलता के बारे में।

कितनी है ऊंचाई ?

प्रतीक विट्ठल मोहिते की हाइट महज 3 फीट 4 इंच है। कभी लोग इस छोटी कद की वजह से उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन उन्होंने अपनी कमी को मजबूत किया और दुनिया भर में मशहूर हो गए। प्रतीक ने मन में ठान लिया था कि वह कुछ कर के दिखाएंगे और अपने मामा को देखकर ही वर्कआउट करने लगा।

चौथी बार मिली सफलता

प्रतीक ने अपने दोस्त के कहने पर वर्ल्ड रिकॉर्ड के नाम अपने नाम दिया था। उन्होंने 3 बार पहले भी अपना नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज कराने की कोशिश की थी, लेकिन हर बार उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया।

तीन बार रिजेक्ट होने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और चौथी बार पूरी तैयारी के साथ अपना नाम भेज दिया। उनका नाम चौथी बार स्वीकार किया गया और उन्होंने विश्व रिकॉर्ड भी बना लिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रतीक ने 16 साल की उम्र में वर्कआउट करना शुरू कर दिया था। महाराष्ट्र के रहने वाले प्रतीक विट्ठल मोहिते हेल्दी ब्रेकफास्ट के साथ स्पेशल डाइट फूड जरूर शामिल करते हैं। साथ ही वह दोपहर में दो घंटे जिम भी जाते हैं। वह अपना दिन 30 मिनट की लंबी दौड़ के साथ समाप्त करता है।

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नूडल्स से बना डाला स्कार्फ, इस वीडियो को देखकर सोच में पड़ जाएंगे आप!

वायरल वीडियो बुनाई दुनिया की सबसे लोकप्रिय और सबसे पुरानी कलाओं में से एक है और घर की महिलाओं के लिए अपने और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए ऊनी स्वेटर बुनना काफी आम था।

हालांकि वर्तमान समय में व्यस्त और व्यस्त कार्यक्रम के कारण लोगों ने बाजार से रेडीमेड ऊनी स्वेटर और अन्य चीज़े खरीदना शुरू कर दिया है।

COVID-19 महामारी के समय में बुनाई के प्रति प्रेम को थोड़ी प्रमुखता मिली है क्योंकि लोग अपने घरों के अंदर रहने के लिए मजबूर थे और वे इस अवधि में कुछ रचनात्मक करना चाहते थे।

आपने अपनी माँ या दादी द्वारा बुना हुआ स्वेटर पर आकर्षक डिज़ाइन और सुंदर पैटर्न देखे होंगे लेकिन क्या आपने कभी नूडल्स बुनाई करने के बारे में सुना है? सुनने में अविश्वसनीय और अजीब लगता है लेकिन वास्तव में इस वीडियो में नूडल्स से बुनाई की जा रही है और उसी का वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहा है।

क्लिप को मूल रूप से वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म टिकटॉक पर पोस्ट किया गया था, लेकिन अब इसे ट्विटर सहित अन्य सभी प्लेटफॉर्म पर शेयर किया जा रहा है।

ट्विटर पर इस वीडियो को @mixiaoz नाम के अकाउंट पर शेयर किया गया है। इसे माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट पर 7 मिलियन से अधिक बार देखा जा चुका है, इसे 82K से अधिक बार रीट्वीट किया गया है और इसे 379K से अधिक लाइक्स मिले हैं।

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