जानें फ्रूट्स खाने का सही समय!!

जब बात हेल्दी डाइट की आती है तो उसमें फ्रूट्स को जरूर शामिल किया जाता है। इसका कारण यह है कि मिनरल्स, विटामिन्स और फाइबर से भरपूर फलों में ढेर सारे पोषक तत्व होते हैं, कैलोरीज की मात्रा भी बेहद कम होती है।

फलों में नैचरल शुगर होता है जिसे हेल्दी माना जाता है और बिना किसी साइड इफेक्ट के आप आराम से फल खा सकते हैं लेकिन फलों के सेवन को लेकर कई तरह के मिथक भी होते हैं।

जैसे- फल खाली पेट खाना चाहिए या नहीं, फल को भोजन के साथ खाना चाहिए या नहीं, रात में सोने से पहले फल खाना चाहिए या नहीं?

आज हम इस लेख में बात करने जा रहे हैं फ्रूट्स खाने के सही समय की, तो चलिए जानते हैं :-

दिन का समय फल खाने के लिए सबसे अच्छा समय है।

आपने कई लोगों को यह कहते सुना होगा कि सुबह की तुलना में दिन का समय फल खाने के लिए सबसे अच्छा होता है लेकिन इस दावे को साबित करने के लिए कोई वैज्ञानिक तथ्य मौजूद नहीं है।

लेकिन इसके पीछे ये तर्क दिया जाता है कि दिन के समय शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है और फल में नैचरल शुगर की मात्रा अधिक होती है और इसलिए अगर इसे दिन के समय खाया जाए तो यह ब्लड शुगर लेवल को बढ़ाकर पाचन तंत्र को उत्तेजित करता है।

सोने से पहले

सोने से पहले या फिर बीच रात में अगर कुछ स्नैकिंग करने का मन हो तो प्रोसेस्ड फूड की जगह फ्रूट्स खाना एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है।

अमेरिका के नैशनल स्लीप फाउंडेशन की मानें तो सोने से ठीक पहले अगर एक केला खाया जाए तो नींद अच्छी आती है और रात में पैरों में होने वाली ऐंठन की समस्या भी दूर होती है क्योंकि केले में पोटैशियम होता है।

इसके अलावा ऐप्रिकॉट्स और डेट्स जैसे फल जिनमें मैग्नीशियम अधिक होता है, अगर इनका सेवन सोने से पहले किया जाए तो शरीर रिलैक्स हो जाता है और नींद अच्छी आती है।

खाली पेट फल खाना चाहिए

बहुत से लोगों का यह मानना है कि अगर खाली पेट फल खाया जाए तो वह ज्यादा फायदेमंद होता है। इसके पीछे ये तर्क दिया जाता है कि अगर फल को भोजन के साथ खाया जाए तो पाचन की प्रक्रिया धीमी हो जाती है और इस वजह से पेट में गैस, पेट फूलना और बदहजमी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं।

हालांकि फ्रूट्स में फाइबर होता है और पचने में देर लगने की वजह से फल खाने के बाद लंबे समय तक भूख नहीं लगती, जिससे आप बाइंज इटिंग करने से बच जाते हैं।

लिहाजा आप खाली पेट फल खा सकते हैं इसमें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर आप भोजन के साथ या भोजन के बाद फल खाते हैं तो उसमें भी कोई हानि नहीं है।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि फल खाने का कोई फिक्स टाइन नहीं होता। फल हेल्दी, पोषक तत्वों से भरपुर और वेट लॉस में मदद करने वाले होते हैं इसलिए इन्हें आप दिन के किसी भी समय खा सकते हैं।

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जानिए रंगों से कैसे करें बालों का बचाव!

होली का त्यौहार देश में बेहद ही धूमधाम से मनाया जाता है। धुलण्डी के दिन रंगों से खेलना लोगों को काफी अच्छा लगता है। हालांकि, रंगों का असर आपकी त्वचा और बालों पर पड़ता है।

रंग ना सिर्फ बालों को रूखा और बेजान बनाते है, बल्कि इसके कारण डेंड्रफ, खुजली और बाल टूटने जैसी समस्या भी आने लगती है। ऐसे में अक्सर लोग होली खेलने से बचते हैं।

जिन लोगों के बाल हल्के और ड्राई होते है, वह तो होली पर घर से बाहर निकलना भी पसंद नहीं करते क्योंकि होली पर रंग-गुलाल बालों में डाल दिया जाता है। इस वजह से बाल रूखे और बेजान हो जाते हैं।

इस लेख में हम आपको बताएंगे कि कैसे हम रंगों से बालों का बचाव कर सकते हैं:-

  • रंग-गुलाल खेलने के बाद शैम्पू के बाद कंडीशनर का उपयोग करना बेहद जरूरी है। इससे बालों को रंगों के दुष्प्रभावों से बचाने में मदद मिलती है।
  • बाल धोने के बाद हेयर सीरम या हेयर क्रीम का प्रयोग करें। तेल लगाना हो तो दो छोटे चम्मच जैतून का तेल या एक छोटा चम्मच सरसों का तेल और एक छोटा चम्मच कैस्टर ऑयल मिलाकर बालों की जड़ों में अच्छी तरह से मसाज करें।
  • बालों को सामान्य तापमान वाले साफ़ पानी से धोएं। पानी ठंडा न हो इसका ख्याल रखें। इससे जड़ों में चिपका रंग काफ़ी हद तक निकल जाएगा। इसके बाद सौम्य शैम्पू से बालों को अच्छी तरह से धो लें।
  • बालों से रंग निकालने के लिए हेयर पैक लगाना अच्छा उपाय है। एक बड़ा चम्मच दही, एक बड़ा चम्मच बेसन और थोड़ा-सा नींबू का रस मिलाकर पैक तैयार कर लें। इसे बालों में लगाकर कुछ देर मसाज करें और फिर सौम्य शैम्पू से धो लें।
  • गुनगुने तेल से बालों की मालिश करें। फिर बाल धाएं। डेंड्रफ है तो तेल में नींबू का रस मिलाकर मसाज करें। इससे रंग जल्दी निकलेगा और डेंड्रफ से भी राहत मिलेगी।
  • होली खेलने से पहले बालों में कोकोनट मिल्क लगाएं। यदि पहले नहीं लगा पाए हैं तो शैम्प करने के एक घंटे पहले लगाएं और फिर सौम्य शैम्पू से बाल धो लें।

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पांच पहाड़ियों से घिरा हुआ है खूबसूरत राजगीर, जानिए क्या है खासियत!

बिहार में मौजूद सबसे खूबसूरत ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों में एक है राजगीर। यह पांच पहाड़ियों से घिरा हुआ है और इसकी खूबसूरती बारिश के मौसम में काफी बढ़ जाती है।

पटना से लगभग 100 किलोमीटर दूर नालंदा जिले में पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच मौजूद राजगीर में हिंदू, जैन और बौद्ध तीनों धर्मों के धार्मिक स्थल मौजूद हैं।

यह सिर्फ धार्मिक कारणों के लिए ही फेमस नहीं है, बल्कि एक खूबसूरत हेल्थ रेसॉर्ट के रूप में भी फेमस है। आज हम राजगीर की खूबसूरती के बारे में बात करने जा रहे हैं। तो चलिए जानते हैं :-

भीम और जरासंध के बीच यहाँ हुई थी कुश्ती

राजगीर का संबंध द्वापर काल से हैं। आपने महाभारत में भीम और जरासंध की लड़ाई के बारे में तो जरूर सुना होगा। मगध के शासक जरासंध की राजधानी राजगीर ही थी।

भीम और जरासंध के बीच जिस अखाड़े में कुश्ती हुई थी, वह आज भी राजगीर में मौजूद है। राजगीर में हिंदू, जैन और बौद्ध तीनों धर्मों के धार्मिक स्थल मौजूद हैं।

राजगृह है पूराना नाम

मगध साम्राज्य की पुरानी राजधानी रही राजगीर का पूराना नाम राजगृह था। इस खूबसूरत और बेहद पुराने शहर में विश्व शांति स्तूप से लेकर घूमने की ढेर सारी जगहें मौजूद हैं। यहां मौजूद ब्रह्माकुंड और सप्तधाराओं में स्नान करने का विशेष महत्व है।

राजगीर में कुल 22 कुंड और 52 धाराएं

यहाँ कुल 22 कुंड और 52 धाराएं मौजूद हैं, जो इस स्थान की खूबसूरती को कई गुणा बढ़ा देती हैं। राजगीर के 22 कुंडों में ब्रह्माकुंड, सप्तधारा, व्यास, अनंत, मार्कंडेय, गंगा-यमुना, काशी, सूर्य, चंद्रमा, सीता, राम-लक्ष्मण, गणेश, अहिल्या, नानक, मखदुम, सरस्वती, अग्निधारा, गोदावरी, वैतरणी, दुखहरनी, भरत और शालीग्राम कुंड शामिल हैं।

औषधीय गुणों से युक्त हैं राजगीर के कुंड

राजगीर के सभी 22 कुंडों के पानी को पवित्र और औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है। यहां आने वाले लोग इन कुंडों में स्नान करते हैं।

दर्शनीय स्थल

राजगीर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में विश्व शांति स्तूप, सोन भंडार, जरासंध का अखाड़ा, बिंबिसार की जेल, नौलखा मंदिर, जापानी मंदिर, बाबा सिद्धनाथ मंदिर, जैन मंदिर, गृद्धकूट पर्वत, लाल मंदिर, घोड़ा कटोरा डैम, वेणुवन, सुरक्षा दीवार, जेठियन बुद्ध पथ, सप्तवर्णी गुफा आदि शामिल हैं।

480 एकड़ में हो रहा है सफारी का निर्माण

राजगीर के स्वर्णगिरि और वैभवगिरि पर्वत के बीच 480 एकड़ भूमि पर जू सफारी का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है।  इसके बाद पर्यटक खुले में घूमते हुए शेर, भालू, बाघ और चीता सहित अन्य जानवरों को देख सकेंगे।

जू सफारी के होंगे पांच हिस्से

राजगीर में निर्माणाधीन जू सफारी के पांच हिस्से होंगे। इसमें हिरण, भालु, तेंदुआ, बाघ और शेर को रखा जाएगा। जू सफारी में जानवर खुले क्षेत्र में रहेंगे और दर्शक बंद गाड़ी में बैठ कर जानवरों को देखेंगे।

जू सफारी में जानवरों को डबल प्रोटेक्शन में रखा जाएगा। भालू सफारी करीब 20 हेक्टेयर इलाके में बन रही है, जहां यहां नर और मादा भालुओं को देखा जा सकेगा।

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ऐसी बिल्डिंग जिसके बीच में से गुजरता है हाईवे जानिए क्या है खासियत

जानिए ट्रैन के डिब्बे के पीछे क्रॉस का निशान क्यों होता है?

बहुत से लोग ट्रैन से यात्रा करते हैं और यात्रा के दौरान आपने ट्रेन में या ट्रेन के बाहर बहुत से साइन (निशान) देखें होंगे। ऐसा ही एक साइन ट्रेन के अंतिम डिब्बे के पीछे बना होता है।

हम इस निशान को अक्सर देखते हैं, हालांकि ज्यादातर लोगों को इसका मतलब नहीं पता होगा। आपको बता दें कि भारत में चलने वाली हर पैसेंजर ट्रेन के पीछे सफेद या फिर पीले रंग से यह निशान बना रहता है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हर ट्रेन के पीछे यह निशान क्यों होता है?

अगर नहीं, तो चलिए जानते हैं कि ट्रैन के अंतिम डिब्बे पर क्रॉस का निशान क्यों होता है :-

दरअसल, ट्रेन में सभी डिब्बे एक-दूसरे से कनेक्ट रहते हैं। अगर इनके जुड़ने में कोई दिक्कत आ गई तो ट्रेन के कई डिब्बे ट्रेन से निकलकर पीछे छूट सकते हैं।

ऐसे में दूसरी गाड़ी को उस लाइन पर जाने की परमिशन नहीं दी जाती है। इस वजह से ट्रेन के लास्ट डिब्बे में सफेद या पीले रंग से क्रॉस का निशान बनाया जाता है ताकि ट्रेन के कर्मचारियों को यह पता चल सके कि ट्रेन स्टेशन से पूरी तरह से जा चुकी है या पूरी तरह से ट्रेन आ चुकी है। हर स्टेशन पर रेल कर्मचारी ट्रेन की चैकिंग करता है।

ट्रेन के लास्ट डिब्बे में क्रॉस के अलावा और भी कई निशान होते हैं, जैसे बिजली का एक लैंप भी जरूर होता है। यह लैंप हर थोड़ी देर बाद चमकता है।

पुराने समय में यह लैंप तेल से जलाया जाता था, लेकिन अब यह बिजली से जलाया जाता है, क्योंकि रात के समय क्रॉस का निशान नहीं दिखता है।

यही नहीं, इन सबके अलावा ट्रेन के लास्ट डिब्बे में LV भी लिखा होता है जिसका फुलफॉर्म Last Vehicle होता है। इसका मतलब हुआ कि यह ट्रेन का अंतिम डिब्बा या बोगी है।

अगर स्टेशन पर पहुंची ट्रेन में क्रॉस के निशान वाला डिब्बा या LV लिखा हुआ डिब्बा नहीं दिखाई देता है तो इसका मतलब है कि ट्रेन पिछले स्टेशन से पूरी नहीं आई है।

ट्रेन के कुछ डिब्बे ट्रेन से अलग होकर पीछे रह गए हैं। इस स्थिति में रेल कर्मचारी आपातकालीन कार्यवाही शुरू कर देते हैं। इस तरह से हम कह सकते हैं कि ट्रेन के आखिर में क्रॉस या LV लिखा होना जरूरी है।

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अद्वितीय है हमारा दिमाग ,जाने कुछ आश्चर्यजनक तथ्य!!

हमारा दिमाग एक केंद्रीय अंग है, जो सारे मानव शरीर की यांत्रिकी को नियंत्रित करता है। मानव दिमाग अद्वितीय है। यह हमें बोलने, कल्पना करने तथा समस्याओं का समाधान करने की शक्ति देता है।

निगरानी के अतिरिक्त दिमाग के जिम्मे कई अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य हैं। यह शरीर के तापमान, रक्तचाप, हृदय गति तथा श्वसन प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।

यह आपकी पांच इंद्रियों (सैंसिज, यानी देखना, सुनना, सूंघना, स्वाद व छुअन के माध्यम से आपके आसपास की दुनिया के बारे में सूचनाओं की बाढ़ को अंगीकार करता है।

जब आप चलते हैं, बात करते हैं, खड़े होते या बैठते हैं, यह आपकी शारीरिक क्रियाशीलता संभालता है। यह आपको सोचने, सपने देखने की शक्ति, विवेक तथा भावनाओं का अनुभव कराता है।

ये सभी कार्य दिमाग जैसे एक ऐसे अंग द्वारा समन्वित, नियंत्रित तथा विनियमित किए जाते हैं, जो गोभी के छोटे फूल के आकार का होता है।

हमारा दिमाग, मेरुदंड (रीढ़) तथा परिधीय तंत्रिकाएं एक पेचीदा, एकीकृत या समन्वित सूचना प्रसंस्करण एवं नियंत्रण प्रणाली बनाती हैं, जिसे आपकी केद्रीय तंत्रिका प्रणाली के तौर पर जाना जाता है।

मिलकर, वे आपके जीवन के सभी सचेत तथा अचेतन पहलुओं को नियंत्रित करते हैं। दिमाग तथा तंत्रिका प्रणाली के वैज्ञानिक अध्ययन को ‘न्यूरोसाइंस’ या ‘न्यूरोबायोलॉजी‘ कहा जाता है।

मानव दिमाग के बारे में कुछ आश्चर्यजनक तथ्य

  • दिमाग की ओर जाने वाले तथा वहां से आने वाले तंत्रिका आवेग 170 मील प्रति घंटा की रफ्तार से यात्रा करते हैं।
  • दिमाग दिन के मुकाबले रात को कहीं अधिक सक्रिय होता है।
  • खुद दिमाग को दर्द महसूस नहीं होता।
  • हमारे खून में दाखिल होने वाली ऑक्सीजन के 20 प्रतिशत का हमारा दिमाग इस्तेमाल करता है।
  • मानव दिमाग की कोशिकाएं ‘इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ से भी पांच गुना अधिक सूचनाएं अच्छे से संभाल सकती हैं।

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क्यों कहा जाता है जयपुर को पिंक सिटी, जाने कुछ रोचक तथ्य

जयपुर राजस्थान राज्य की राजधानी है। जयपुर भारत का एक ऐतिहासिक और खूबसूरत शहर है जो अपने भवनों की प्रमुख रंग योजना के कारण ” पिंक सिटी ” के रूप में भी जाना जाता है।

यह शहर पर्यटकों, संस्कृति, साहित्यिक कलाकारों, इतिहास प्रेमियों, वास्तुकला के प्रति उत्साही, कला, फ़ोटोग्राफ़ी के लिए बहुत प्रसिद्ध है।

इस शहर की स्थापना सवाई जयसिंह ने की थी इसलिए इस शहर को जयपुर नाम दिया गया था। 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि करने के बाद जयपुर में आधुनिक बदलावों की शुरुआत हुई।

क्यों कहा जाता है जयपुर को पिंक सिटी ?

जयपुर शहर का रंग पहले पीला और सफेद हुआ करता था और इसे केवल जयपुर ही कहा जाता था। सवाई राम सिंह I के शासन के दौरान, 1876 में एचआरएच अल्बर्ट एडवर्ड प्रिंस ऑफ वेल्स (जो बाद में किंग एडवर्ड VII, भारत के सम्राट बने) के स्वागत के लिए शहर को गुलाबी रंग में रंगा गया।

कहा जाता है कि गुलाबी रंग मेहमानों के स्वागत को दर्शाता है, इसलिए जयपुर के महाराजा राम सिंह ने मेहमानों के स्वागत के लिए पूरे शहर को गुलाबी रंग में रंग दिया।

उसके बाद से जयपुर पिंक सिटी कहलाने लगा। कहा जाता है कि जयपुर की ऐतिहासिक इमारतों के निर्माण में गुलाबी पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था इसलिए भी जयपुर को गुलाबी नगरी कहा जाता है।

गुलाबी नगरी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

  • महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 18 नवंबर 1727 को जयपुर शहर की स्थापना की थी।
  • जयपुर के आकर्षणों में से एक है सिटी पैलेस। यहाँ आप आर्ट गैलरी, म्यूज़ियम, आँगन, बगीचा और विशाल महल, दीवान-ऐ-ख़ास, दीवान-ऐ-आम, सात मंज़िला चन्द्रमहल, गोविन्द देव मंदिर, म्यूज़ियम, राजस्थानी शैली की चित्रकारी और कारीगरी आदि को देख सकते हैं।
  • जंतर मंतर विश्व की सबसे बड़ी वेधशाला है। इसका निर्माण महाराजा जय सिंह द्वितीय के समय में कराया गया था। धुपघड़ी वेधशाला, यहाँ खगोलीय वेधशाला दुनिया की सबसे बड़ी वेधशालायों में से है। इस स्थल पर आप इस वेधशाला का जी भरकर लुफ्त उठा सकते हैं साथ ही यह भी जान सकते हैं कि कैसे नक्षत्रों व सितारों की गतिविधियों का पुरातन में पता लगाया जाता था।
  • नाहरगढ़ किले से पूरा जयपुर शहर दिखाई देता हे। इस किले का निर्माण 1734 में करवाया गया था। फिल्म ‘रंग दे बसंती’ और शुद्ध देशी रोमांस, फिल्म के लिए भी कुछ सीन यहीं पर फिमाए गए हैं।
  • महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के शासनकाल के दौरान बने सवाई मानसिंह स्टेडियम में लगभग 30,000 लोगों के बैठने की क्षमता है और उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों की मेजबानी की है।
  • जवाहर सर्किल एशिया का सबसे बड़ा सर्कुलर पार्क है, जिसे हाइवे ट्रैफिक सर्किल पर विकसित किया गया है। यह जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर सांगानेर हवाई अड्डे के पास मालवीय नगर के साथ स्थित है।
  • हवा महल जयपुर का प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है। महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने इस महल को 1799 में बनवाया था । हवा महल में कुल 953 खिड़कियाँ बनाई गई थी, ताकि हवा आसानी से आ-जा सके इसलिए ये महल विश्व भर में हवा महल के नाम से जाना जाता है। इस महल की जालीनुमा खिडकियों से ठंडी हवाएं आतीं है, इसलिए इसको ‘पैलेस ऑफ़ विंड्स’ भी कहा जाता था।

  • कहा जाता है कि इस महल में से राजघराने की महिलाएं ठंडी हवा का लुफ्त उठाती थीं और बहार होने वाली गतिविधियों पर अपनी कड़ी दृष्टि रखती थीं। यह महल मधुमक्खी के छत्ते जैसा प्रतीत होता है। इसकी महीन नक्काशी इसे जयपुर की शान बनाती है।
  • जयपुर के आलीशान इमारतों में केंद्रीय संग्राहलय (अल्बर्ट म्यूज़ियम) का नाम भी जुड़ा हुआ है। यहाँ इस महल की नक्काशी, हस्तकला आदि को आप करीब से महसूस कर सकते हैं देख सकते हैं।
  • जयपुर स्थित चांदपोल, सूरजपोल, अजमेरी गेट, सांगानेरी गेट, छोटी चौपड़, बड़ी चौपड़, चौड़ा रास्ता सभी एक दूसरे से चोरस रास्तों से जुड़े हुए हैं।
  • जयपुर के आमेर किले में हाथी की सवारी की जाती हे। जो पर्यटक में बहुत ज्यादा प्रसिद्ध हे।

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भारत के 10 भुतहा रेलवे स्टेशन, जिनका नाम सुनते ही रूह कांप जाती है

जब कभी भूत प्रेत की चर्चा होती है तो हमारे के दिमाग में सबसे पहले पूराने किलों और इमारतों के बारे में ख्याल आता है लेकिन आज हम इस लेख में भुतहा रेलवे स्टेशनों के बारे में बात करने जा रहे हैं।

भारतीय रेलवे का इतिहास 200 साल पुराना है। कई रेलवे स्टेशनों को हॉन्टेड घोषित किया गया है, ऐसा इसलिए क्योंकि लोगों ने यहां असाधारण गतिविधियां होते हुए देखी हैं। तो चलिए जानते हैं इन में से कुछ भुतहा रेलवे स्टेशनों के बारे में :-

रवीन्द्र सरोबर मेट्रो स्टेशन, पश्चिम बंगाल

कोलकाता में रवीन्द्र सरोबर मेट्रो स्टेशन एक लोकप्रिय स्टेशन है जिसका उपयोग कई यात्रियों द्वारा दैनिक आधार पर किया जाता है। इस मेट्रो स्टेशन को लेकर कई भूतिया कहानियां फेमस हैं।

यहां रात साढ़े 10:30 बजे अंतिम मेट्रो चलती है उसके बाद स्टेशन वीरान हो जाता है। कई बार लोगों ने महसूस किया है कि यहां अचानक ही कोई साया ट्रैक के बीच प्रकट होता है और पलक झपकते गायब हो जाता है।

बेगुनकोडोर स्टेशन, पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में स्थित बेगुनकोडोर रेलवे स्टेशन भूतिया कहानियों के कारण 42 सालों तक बंद था। साल 1960 में खुले इस स्टेशन पर शाम ढलने के बाद लोग आज भी जाने से डरते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां के स्टेशन मास्टर ने एक रात पटरियों के बीच एक लड़की के साये को देखा था। इसके कुछ दिनों के बाद स्टेशन मास्टर और उसके परिवार की मौत हो गई थी।

उसके बाद लगातार यह औरत सफेद साड़ी पहन स्टेशन पर नाचती ही नजर आती है और जब कोई रेल इस स्टेशन से गुजरती है तो यह आत्मा उसके साथ दौड़ती है इसलिए लोगों ने यहाँ पर आना छोड़ दिया है। रेलवे विभाग ने इस स्टेशन को संवेदनशील मानते हुए बंद कर दिया है और फिर साल 2009 में इसे खोला गया।

द्वारका सेक्टर 9 मेट्रो स्टेशन, दिल्ली

दिल्ली के द्वारका सेक्टर 9 मेट्रो स्टेशन के बारे में लोगों का कहना है कि यहां रात को अक्सर ही गाड़ियों के पीछे एक महिला का साया दिखाई देता है।

कुछ राहगीरों ने उनके दरवाजे पर दस्तक देने और एक अज्ञात शरीर (संस्था) द्वारा थप्पड़ खाने की शिकायत भी की है। इस असामान्य गतिविधि के कारण कई दुर्घटनाएं भी हुई हैं। यही वजह है कि लोग देर रात इस मेट्रो स्टेशन पर जाने से कांपते हैं।

नैनी रेलवे स्टेशन, उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में स्थित नैनी रेलवे स्टेशन के बारे में कहा जाता है कि यहां पर अक्सर रात के समय स्टेशन और रेलवे ट्रैक पर कुछ अजीब सी चीजें देखने को मिलती हैं।

ऐसी कहा जाता है कि स्टेशन के पास स्थित नैनी जेल में बहुत सारे फ्रीडम फाइटर्स बंद थे, जिन्हें बहुत टॉर्चर किया जाता था और बाद में उनकी मृत्यु हो गई थी।

कहा जाता है कि यहाँ स्वतंत्रता सेनानियों की आत्माएं यहां बसती हैं। आत्माओं को हानिरहित माना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है।

लुधियाना रेलवे स्टेशन, पंजाब

लुधियाना स्टेशन के एक काउंटर के बारे में लोगों का कहना है कि उन्होंने वहां पैरानॉर्मल ऐक्टिविटीज महसूस किया है। ऐसा माना जाता है कि यहां के रिजर्वेशन काउंटर पर एक सुभाष नाम का व्यक्ति बैठता था।

वह काम से बेइंतहा प्यार करता था। इसी वजह से उसकी मौत के बाद उस कमरे में जो भी काम करने के लिए गया, उसे बहुत परेशानियों से जूझना पड़ा।

एमजी रोड मेट्रो स्टेशन, गुड़गांव

यह देश का पहला भूतिया मेट्रो स्टेशन है। लोगों का कहना है कि लगभग 40 वर्षीय महिला का बच्चा स्टेशन पर खो गया था और अचानक बच्चे को ढूंढते-ढूंढते यह महिला मेट्रो ट्रेन के नीचे आ गयी थी। तब से इस औरत की आत्मा यहां पर खुले बालों में बदहवास हालत में घूमती हुयी नजर आती है।

यात्रियों ने अक्सर इस स्टेशन पर असाधारण गतिविधियों को महसूस किया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस किसी को ये आत्मा दिखती है, उसे सिर्फ मेट्रो ट्रेन के शीशे में ही नजर आती है।

चित्तूर रेलवे स्टेशन, आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश के इस स्टेशन को लेकर भी कई भूतिया कहानियां प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि स्टेशन पर आरपीएफ और टीटीई ने मिलकर सीआरपीएफ के एक जवान की खूब पिटाई कर दी थी जिससे उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद से उस सीआरपीएफ जवान की आत्मा न्याय के लिए स्टेशन भर भटकती रहती है।

बरोग स्टेशन, शिमला

चीड़ और देवदार के जंगलों से घिरा हुआ बड़ोग हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित है। इसकी खूबसूरती किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकती है।

बड़ोग रेलवे स्टेशन और सुरंग की कहानी बेहद डरावनी है। बताया जाता है कि इस स्टेशन के पास एक लंबी सुरंग है। जिसके निर्माण के निर्माण दौरान रेलवे के ही एक इंजिनियर ने आत्महत्या कर ली थी।

जिसके बाद उसकी आत्मा इस स्टेशन के आसपास भटकती है. बताया जाता है कि कई बार गुफा के अंदर किसी की कराहने की आवाज आती है।

मुलुंड रेलवे स्टेशन, मुंबई

मुंबई के मुलुंड स्टेशन के बारे में भी यात्रियों और स्थानीय लोगों का दावा है कि उन्हें यहां रात में किसी के चीखने, चिल्लाने और रोने की आवाजें सुनाई देती हैं।

ऐसा भी कहा जाता है कि यहां उन लोगों की आत्माएं हैं, जो रेलवे ट्रैक को पार करते समय किसी हादसे का शिकार हो गए थे।

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त्रिपुरा में बसी है खूबसूरत “डमबूर झील”

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त्रिपुरा एक बेहद शांत और खूबसूरत स्थान है। यहां घने जंगल, कई खूबसूरत महल, प्राचीन मंदिर और बौद्ध मठ के साथ-साथ कई झीलें भी मौजूद हैं, जिनकी सुंदरता को देखकर सभी प्राकृतिक सौंदर्य से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। इन्हीं में से एक है “डमबूर झील” जो बेहद खूबसूरत है ।

आज हम आपको त्रिपुरा की सबसे खूबसूरत झीलों में से एक “डमबूर झील” के बारे में बताने जा रहे हैं। तो चलिए जानते हैं इस झील के बारे में :-

डमबूर झील अमरपुर में स्थित है

डमबूर झील त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से लगभग 120 किलोमीटर दूर अमरपुर सब डिवीजन में स्थित है।

डमरू के आकार की है ये झील

इसका आकार डमरू की तरह है और इसलिए इसे भगवान शिव के डमरू के नाम पर डमबूर झील का नाम दिया गया है।

यह 41 वर्ग किमी में फैली है

लगभग 41 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली इस झील की सुंदरता बेमिसाल है। प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं है। यह झील खूबसूरत पहाड़ियों से घिरी हुई है। इस झील में 48 छोटे द्वीप भी हैं।

दो नदियों का संगम

यह झील पर्यटकों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र है। यह स्थान दो नदियों ‘राइमा और साइमा’ का संगम भी है। गोमती नदी इस झील के पास से निकलती है, जो कई जिलों से होकर गुजरती है और बांग्लादेश में मेघना नदी में मिलती है।

झील के पास एक हाइडल प्रोजेक्ट मौजूद है

इस स्थान पर एक हाइडल प्रोजेक्ट भी है, जिसे गोमती हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट के रूप में जाना जाता है।

हर साल मेले का आयोजन

गोमती नदी के उद्गम को तीर्थमुख के नाम से भी जाना जाता है। यहां हर साल 14 जनवरी को पौष संक्रांति मेला आयोजित किया जाता है, जो काफी प्रसिद्ध है।

गोमती वाइल्डलाइफ सेंचुरी

गोमती वाइल्डलाइफ सेंचुरी भी झील के पास स्थित है, जहां आप कई तरह के जानवरों और पक्षियों को देख सकते हैं।  इस झील में आपको हाथी, हिरण, सांभर बाइसन सहित कई अन्य जंगली जानवर आसानी से देखने को मिल जाएंगे।

जंगली जानवरों के अलावा यहां आप प्रवासी पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों को देख सकते हैं, जो ज्यादातर सर्दी के मौसम में दिखाई देते हैं।

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जानिए हींग के सेवन से होने वाले कुछ चमत्कारी फायदे !

हींग का उपयोग मसाले के रूप में हर घर की रसोई में होता है। अपनी तीखी महक के लिए पहचाना जाने वाला हींग खाने का स्वाद ही नहीं बढ़ाता, बल्कि कई व्यंजनों का असली स्वाद हींग के बगैर आ ही नहीं सकता।

खाना पकाने में हींग को लगभग हर सब्जी में मिलाया जाता है और इसका उपयोग रोज किया जाता है। बस एक चुटकी हिंग आपके खाने का स्वाद बदल देती है, यही वजह है कि हिंग को खाना पकाने की रानी भी कहा जाता है,

लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह हींग आपके स्वास्थ्य को कई तरह से फायदा पहुंचा सकती है। आइए जानते हैं हींग के सेवन से होने वाले चमत्कारी फायदों के बारे में :-

कान के दर्द से राहत दिलाता है

हींग में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीबायोटिक गुण होते हैं, जो कान के दर्द से राहत दिलाने का काम करते हैं। कान के दर्द के लिए इस्तेमाल करने के लिए एक कटोरी में दो चम्मच नारियल का तेल डालें और फिर इसमें एक चुटकी हिंग मिलाएं,

धीमी आंच पर गर्म करें और गैस से हटा दें। ठंडा होने पर इसकी कुछ बूँदे कान में डालें। इससे कान के दर्द में बहुत राहत मिलती हैं।

पेट से संबंधित समस्याओं में राहत

पेट दर्द और गैस की शिकायत बहुत आम है। खाना पकाने में हिंग का उपयोग पेट से संबंधित समस्याओं जैसे पेट दर्द, गैस, अपच, आंतों की समस्याओं से छुटकारा दिलाता है।

सिर दर्द के लिए असरदार

हिंग सिर दर्द का इलाज है। हींग में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो खोपड़ी की नसों में सूजन को कम करने और सिरदर्द से राहत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हींग सर्दी और खांसी में कारगर है

सर्दियों में लोगों को सर्दी और खांसी की बड़ी समस्या होती है। हींग में मौजूद एंटीवायरल तत्व सर्दी और खांसी से राहत दिलाने का काम करते हैं।

ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखता है

हिंग ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी मदद करता है। हींग में मौजूद कोमोरिंस तत्व खून को पतला करता है और शरीर में रक्त संचार को बढ़ाता है।

डायबिटीज में उपयोगी

यह ब्लड शुगर लेवल को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खाना पकाने में इसका नियमित उपयोग मधुमेह रोगियों को राहत देता है।

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महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कौन थे?

द्वापर युग यानि महाभारत काल में कई महान धनुर्धर हुए। सामान्यत: अर्जुन और कर्ण को महाभारत काल के दो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है। वहीं पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, एकलव्य, अभिमन्यु, बर्बरीक, जरासंध, शिशुपाल, सात्यक़ी आदि को भी उत्तम कोटि का धनुर्धर माना जाता है।

लेकिन, अधिकतर पाठक शायद यह नहीं जानते हैं कि महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कौन थे? इसीलिए आज हम अपने पाठकों के लिए यह रोचक तथ्य लेकर आये हैं। दरअसल महाभारत के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कोई ओर नहीं बल्कि द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण थे।

सामान्यत: अर्जुन को महाभारत काल का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है। यदि श्रीकृष्ण के ईश्वरीय अवतार को भुला दिया जाए तो अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माने जाते हैं।

चौंक गये न! जी हाँ हम भी चौंक गये थे जब पहली बार हमने यह तथ्य पढ़ा। लेकिन इसके बाद की गयी खोजबीन के इस बात की पुष्टि हो गयी कि यह तथ्य सोलह आने सच है। इसके साथ ही साथ हम अपने पाठकों के लिए श्रीकृष्ण और लक्ष्मणा के विवाह का रोचक विवरण भी लेकर आये हैं।

सोलह कलाओं के स्वामी, महारथी श्रीकृष्ण ही महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ राजा, सेना-नायक, योद्धा और धनुर्धर थे। अपने जीवन काल में उन्होंने न केवल अधर्म को रोका बल्कि पापियों को परलोक पहुँचाने में भी देरी नहीं की।

तो आइये आगे जानते हैं कि इंटरनेट और अन्य स्त्रोतों से इकट्ठी की हुई जानकारी से कैसे हमने इस तथ्य की पुष्टि की।

श्रीमदभगवत गीता में उल्लेख मिलता है कि एक बार द्रुपद देश की राजकुमारी व युधिष्ठिर की पत्नी द्रौपदी श्रीकृष्ण की नगरी द्वारिका आई हुई थी । द्रौपदी श्रीकृष्ण की मुँहबोली बहन थी। जब द्रौपदी द्वारिका आई हुई थी तो उनकी भेंट लक्ष्मणा से हुई। लक्ष्मणा श्रीकृष्ण की छठी पत्नी थी जिनके विवाह का प्रसंग भी बहुत रोचक है।

श्रीकृष्ण – लक्ष्मणा का विवाह

लक्ष्मणा मद्र-देश के शक्तिशाली और प्रतापी राजा बृहत्सेन की पुत्री थी। उनको माद्री व् मद्रा नाम से भी पुकारा जाता था। लक्ष्मणा अद्भुत सौंदर्य और सर्वगुणों से संपन्न थी। उनकी सुन्दरता और स्वभाव की कीर्ति हजारों मीलों तक फैली हुई थी। हर राज्यके राजा और राजकुमार लक्ष्मणा के दर्शन करना चाहते थे और उनको अपनी रानी बनाना चाहते थे।

हरिवंश पुराण में लक्षमणा को चारुहंसनि कहा गया है जिसका अर्थ है कि, उनकी प्यारी सी मुस्कान तीनों लोकों के समस्त हृदयोंको जीतनेका सामर्थ्य रखती थी।

मद्रराज्य में नारद मुनि का आना जाना रहता था। नारद मुनि भगवान विष्णु का गुणगान गाया करते और उनके सौंदर्य, वीरता और धर्म-कर्म के रोचक क़िस्सों को सुनाया करते थे। जब नारद मुनि ने उन्हें बताया कि श्रीकृष्ण जी भगवान नारायण के अवतार हैं तो यह जानकर लक्ष्मणा मन ही मन श्रीकृष्ण से प्रेम करने लगी। उम्र के साथ साथ उनका प्रेम बढ़ता चला गया।

बृहत्सेन ने लक्ष्मणाको बड़े ही प्यार और नाजों से पाला था। जिस प्रकार हर पिता अपनी लाड़ली बेटी को एक सर्वश्रेष्ठ वर ढूंढ़ना चाहता है, ठीक उसी तरह राजा बृहत्सेन भी लक्ष्मणा के लिए सर्वश्रेष्ठ वर चाहते थे। इस कठिन चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने लक्ष्मणा का कठिन स्वयंवर* रचा।

तो हम बता रहे थे कि जब द्रौपदी द्वारिका आई हुई थी तो उनकी भेंट लक्ष्मणा से हुई। श्रीमदभगवत गीता के इस प्रसंग में लक्ष्मणा अपने स्वयंवर का रोचक प्रसंग द्रौपदीजी को सुना रही हैं। उनका वार्तालाप इस प्रकार से है ।

ज्ञात्वा मम मतं साध्वि पिता दुहितृवतसल्य: ।
बृहत्सेन इति ख्यातस्तत्रोपायंचीकरत ॥ŚB 10.83.18॥

लक्ष्मणा कहती है, मेरे पिता बृहत्सेन स्वभाव से ही मुझ यानि अपनी बेटी पर दयालु थे और वह मेरे मन की बात जानते थे, इसलिए मेरे हित के लिए, हे साध्वी (द्रौपदी )! उन्होंने मेरी इच्छा को पूरा करने की व्यवस्था की।

यथा स्वयंवर राज्ञि मत्स्य: पार्थेप्सया कृत:
अयं तु बहिराच्छन्नो दृश्यते स जले परम् ॥19॥

हे रानी! जैसे कि आपके स्वयंवर में एक मछली का उपयोग किया गया था ताकि अर्जुन उसको भेद कर आपको प्राप्त करे, इसी तरह मेरे स्वयंवर में भी एक मछली इस्तेमाल की गई थी। हालाकिं इसे चारों ओर से ढका गया था और केवल इसके प्रतिबिम्ब को नीचे पानी के बर्तन में देखा जा सकता था।

श्रुत्वैतत् सर्वतो भूपा आययुर्मत्पितु: पुरम् ।
सर्वास्‍त्रशस्‍त्रतत्त्वज्ञा: सोपाध्याया: सहस्रश: ॥ 20 ॥

यह सुन कर हजारों की संख्या में धनुष-बाण चलाने वाले दक्ष राजा महाराजा, और अन्य हथियार चलाने और बनाने वाले भी अपने आचार्यों के साथ चारों दिशाओं से मेरे पिता के राज्य में आये।

पित्रा सम्पूजिता : सर्वे यथावीर्य यथावय:
आददु सशरं चापं वेध्दुम पर्षदि मध्दिय:॥ 21 ॥

अर्थात मेरे पिता ने प्रत्येक राजा को उसकी शक्ति और वरिष्ठता के अनुसार उचित सम्मान दिया। फिर जिन लोगों का मन मुझ पर स्थिर था, उन्होंने धनुष और तीर उठाया और एक एक करके सभा के बीच में लक्ष्य भेदने की कोशिश की।

आदाय व्यसृजन् केचित् सज्यं कर्तुमनीश्वरा: ।
आकोष्ठं ज्यां समुत्कृष्य पेतुरेकेऽमुना हता: ॥ २२ ॥

उनमें से कुछ ने धनुष उठाया लेकिन इसे प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सके इसलिए उन्होंने निराशा में एक तरफ फैंक दिया। कुछ लोग प्रत्यंचा को धनुष की नोक की ओर खींचने में कामयाब रहे, लेकिन हाथ छूटने पर धनुष ने उन्हें जमीन पर पटक दिया।

सत्यं कृतवापरे वीरा मगधम्बष्ठचेदिया:
भीमो दुर्योधन: कर्णों नाविद्सतदवस्थितिम॥ 23 ॥

जरासंध, शिशुपाल, भीम, दुर्योधन, कर्ण** और अम्बाह के राजा – ये कुछ योद्धा धनुष पर बाण चढ़ाने में सफल रहे, लेकिन उनमें से कोई भी लक्ष्य नहीं प्राप्त सका। (ये राजा शारीरिक रूप से बहुत मजबूत थे, लेकिन वे इतने निपुण नहीं थे कि वे लक्ष्य को पा सकें)

मत्स्य भासं जले वीक्ष्य ज्ञात्वा चतदस्थिति
पार्थे यतोअसृजद बाणं नाच्छिन्त पस्पृशे परमे॥ 24 ॥

तब अर्जुन ने पानी में मछली के प्रतिबिम्ब को देखा और इस पर निशाना साधा। जब उसने ध्यान से अपने तीर को छोड़ा तो तीर ने लक्ष्य को नहीं भेदा बल्कि उसे हल्का-सा छू कर निकल गया।

श्रीधर महाराज की व्याख्या के अनुसार यद्यपि अर्जुन अन्य राजाओं की तुलना में अधिक दक्ष तीरंदाज़ थे लेकिन उनकी शारीरिक शक्ति इस कार्य को पूरी सटीकता के साथ करने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

राजन्येषु निवृत्तेषु भग्नमानेषु मानिषु ।
भगवान् धनुरादाय सज्यं कृत्वाथ लीलया ॥ २५ ॥
तस्मिन् सन्धाय विशिखं मत्स्यं वीक्ष्य सकृज्जले ।
छित्त्वेषुणापातयत्तं सूर्ये चाभिजिति स्थिते ॥ २६ ॥

जब सारे दंभी राजाओं ने हार मान ली और उनका गर्व चूर-२ हो गया तो उस देवत्व और सर्वोच्च व्यक्तित्व ने धनुष उठाया, आसानी से प्रत्यंचा चढ़ाई और उस पर अपना तीर लगाया। जैसे ही सूर्य अभिजीत नक्षत्र से गुजरा, उन्होंने (श्रीकृष्ण ने) मछली को केवल एक बार पानी में देखा और फिर उसे तीर से भेद कर जमीन पर ला पटका।

(प्रत्येक दिन सूर्य एक बार चंद्र नक्षत्र अभिजीत से होकर गुजरता है, जो विजय के लिए सबसे शुभ माना जाता है। जैसा कि श्रीविष्णुनाथ चक्रवर्ती द्वारा बताया गया है, इस दिन अभिजीत का मुहूर्त खड़ी दोपहर के समय आया जिससे लक्ष्य को देखने में और भी कठिनाई हुई होगी। इससे भगवान कृष्ण की महानता का ही पता चलता है।)

आगे लक्ष्मणा द्रौपदी को बताती है कि,

दिवि दुन्दुभ्यो नेवुर्जय शब्दयुता भुवि।
देवाश्च कुसुमसरान मुमुचुरहरषविछला :॥ 27 ॥

अर्थात, ढोल नगाड़े बजने लगे और आसमान नगाड़ों की आवाज से गूंजने लगा। लोग जोर-जोर से जय हो ! जय हो ! कहकर लोग चिल्लाने लगे। आसमान से देवता लोग फूलों की बारिश करने लगे।

मेरे द्वारा सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण को चुनने से वहां उपस्थित कई राजा लिप्सा और ईर्ष्या से भरकर झगड़ालू हो गए। वह राजा श्री कृष्ण द्वारा मुझे अपने सोने के रथ पर लेजाते हुए ऐसे देख रहे थे जैसे जंगल के जानवर एक सिंह को भयातुर और क्रोधित होकर देखते हैं।

गाँव से शिकार करके निकलते सिंह के पीछे जैसे कुत्ते पीछे-२ चलते हैं, वैसे ही कुछ राजाओं ने भगवान कृष्ण का पीछा किया तो कुछ ने मार्ग में उनको रोकने की भी चेष्टा की। लेकिन उनके धनुष “सारंग” से निकले बाणों ने उनके कुत्सित इरादों और शरीरों को छिन्न-भिन्न कर दिया और वे बाणों से बिंधे धरती पर लोटते नज़र आए।

इस प्रकार श्रीलक्ष्मणा और द्रौपदी के मध्य हुए वार्तालाप से प्रामाणित होता है कि महाभारत के समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण थे। हालाँकि उन्होंने युद्ध में धनुष-कला का अधिक उपयोग नहीं किया क्योंकि उनके पास इससे भी घातक और अचूक अस्त्र सुदर्शन-चक्र था।

* – स्वयंवर प्राचीन काल की एक विवाह प्रथा थी जिसमें वधू को मनचाहा वर चुनने का अवसर दिया जाता था। स्वयंवर में वर प्रतिभागी एक निश्चित प्रतियोगिता में हिस्सा लेते थे और वधू प्रतियोगिता जीतने वाले के गले में वरमाला डालकर उसको अपना वर स्वीकार करती थी।
** – कुछ बुद्धिजीवी कर्ण को महाभारत काल का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर मानते हैं लेकिन महाभारत को अच्छे से जानने वाले जानते हैं कि कर्ण कई बार अर्जुन से आमने-सामने की लड़ाई में हार चुके थे। कुछ लोग तो कर्ण की बड़ाई को लेकर यहाँ तक मानते हैं कि द्रौपदी का पहला प्रेम कर्ण थे न कि अर्जुन। हालाँकि उनके पास प्रस्तुत करने के लिए कोई साक्ष्य भी नहीं है। लेकिन हमारे पास ऐसे ओछे लेखकों के लिए प्रमाण सहित एक उत्तर है  प्रमाण सहित: क्या सचमुच में कर्ण से प्रेम करती थीं द्रौपदी?? जिसे आप इस लेख के माध्यम से पढ़ सकते हैं।

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