महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कौन थे?

द्वापर युग यानि महाभारत काल में कई महान धनुर्धर हुए। सामान्यत: अर्जुन और कर्ण को महाभारत काल के दो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है। वहीं पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, एकलव्य, अभिमन्यु, बर्बरीक, जरासंध, शिशुपाल, सात्यक़ी आदि को भी उत्तम कोटि का धनुर्धर माना जाता है।

लेकिन, अधिकतर पाठक शायद यह नहीं जानते हैं कि महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कौन थे? इसीलिए आज हम अपने पाठकों के लिए यह रोचक तथ्य लेकर आये हैं। दरअसल महाभारत के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कोई ओर नहीं बल्कि द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण थे।

सामान्यत: अर्जुन को महाभारत काल का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है। यदि श्रीकृष्ण के ईश्वरीय अवतार को भुला दिया जाए तो अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माने जाते हैं।

चौंक गये न! जी हाँ हम भी चौंक गये थे जब पहली बार हमने यह तथ्य पढ़ा। लेकिन इसके बाद की गयी खोजबीन के इस बात की पुष्टि हो गयी कि यह तथ्य सोलह आने सच है। इसके साथ ही साथ हम अपने पाठकों के लिए श्रीकृष्ण और लक्ष्मणा के विवाह का रोचक विवरण भी लेकर आये हैं।

सोलह कलाओं के स्वामी, महारथी श्रीकृष्ण ही महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ राजा, सेना-नायक, योद्धा और धनुर्धर थे। अपने जीवन काल में उन्होंने न केवल अधर्म को रोका बल्कि पापियों को परलोक पहुँचाने में भी देरी नहीं की।

तो आइये आगे जानते हैं कि इंटरनेट और अन्य स्त्रोतों से इकट्ठी की हुई जानकारी से कैसे हमने इस तथ्य की पुष्टि की।

श्रीमदभगवत गीता में उल्लेख मिलता है कि एक बार द्रुपद देश की राजकुमारी व युधिष्ठिर की पत्नी द्रौपदी श्रीकृष्ण की नगरी द्वारिका आई हुई थी । द्रौपदी श्रीकृष्ण की मुँहबोली बहन थी। जब द्रौपदी द्वारिका आई हुई थी तो उनकी भेंट लक्ष्मणा से हुई। लक्ष्मणा श्रीकृष्ण की छठी पत्नी थी जिनके विवाह का प्रसंग भी बहुत रोचक है।

श्रीकृष्ण – लक्ष्मणा का विवाह

लक्ष्मणा मद्र-देश के शक्तिशाली और प्रतापी राजा बृहत्सेन की पुत्री थी। उनको माद्री व् मद्रा नाम से भी पुकारा जाता था। लक्ष्मणा अद्भुत सौंदर्य और सर्वगुणों से संपन्न थी। उनकी सुन्दरता और स्वभाव की कीर्ति हजारों मीलों तक फैली हुई थी। हर राज्यके राजा और राजकुमार लक्ष्मणा के दर्शन करना चाहते थे और उनको अपनी रानी बनाना चाहते थे।

हरिवंश पुराण में लक्षमणा को चारुहंसनि कहा गया है जिसका अर्थ है कि, उनकी प्यारी सी मुस्कान तीनों लोकों के समस्त हृदयोंको जीतनेका सामर्थ्य रखती थी।

मद्रराज्य में नारद मुनि का आना जाना रहता था। नारद मुनि भगवान विष्णु का गुणगान गाया करते और उनके सौंदर्य, वीरता और धर्म-कर्म के रोचक क़िस्सों को सुनाया करते थे। जब नारद मुनि ने उन्हें बताया कि श्रीकृष्ण जी भगवान नारायण के अवतार हैं तो यह जानकर लक्ष्मणा मन ही मन श्रीकृष्ण से प्रेम करने लगी। उम्र के साथ साथ उनका प्रेम बढ़ता चला गया।

बृहत्सेन ने लक्ष्मणाको बड़े ही प्यार और नाजों से पाला था। जिस प्रकार हर पिता अपनी लाड़ली बेटी को एक सर्वश्रेष्ठ वर ढूंढ़ना चाहता है, ठीक उसी तरह राजा बृहत्सेन भी लक्ष्मणा के लिए सर्वश्रेष्ठ वर चाहते थे। इस कठिन चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने लक्ष्मणा का कठिन स्वयंवर* रचा।

तो हम बता रहे थे कि जब द्रौपदी द्वारिका आई हुई थी तो उनकी भेंट लक्ष्मणा से हुई। श्रीमदभगवत गीता के इस प्रसंग में लक्ष्मणा अपने स्वयंवर का रोचक प्रसंग द्रौपदीजी को सुना रही हैं। उनका वार्तालाप इस प्रकार से है ।

ज्ञात्वा मम मतं साध्वि पिता दुहितृवतसल्य: ।
बृहत्सेन इति ख्यातस्तत्रोपायंचीकरत ॥ŚB 10.83.18॥

लक्ष्मणा कहती है, मेरे पिता बृहत्सेन स्वभाव से ही मुझ यानि अपनी बेटी पर दयालु थे और वह मेरे मन की बात जानते थे, इसलिए मेरे हित के लिए, हे साध्वी (द्रौपदी )! उन्होंने मेरी इच्छा को पूरा करने की व्यवस्था की।

यथा स्वयंवर राज्ञि मत्स्य: पार्थेप्सया कृत:
अयं तु बहिराच्छन्नो दृश्यते स जले परम् ॥19॥

हे रानी! जैसे कि आपके स्वयंवर में एक मछली का उपयोग किया गया था ताकि अर्जुन उसको भेद कर आपको प्राप्त करे, इसी तरह मेरे स्वयंवर में भी एक मछली इस्तेमाल की गई थी। हालाकिं इसे चारों ओर से ढका गया था और केवल इसके प्रतिबिम्ब को नीचे पानी के बर्तन में देखा जा सकता था।

श्रुत्वैतत् सर्वतो भूपा आययुर्मत्पितु: पुरम् ।
सर्वास्‍त्रशस्‍त्रतत्त्वज्ञा: सोपाध्याया: सहस्रश: ॥ 20 ॥

यह सुन कर हजारों की संख्या में धनुष-बाण चलाने वाले दक्ष राजा महाराजा, और अन्य हथियार चलाने और बनाने वाले भी अपने आचार्यों के साथ चारों दिशाओं से मेरे पिता के राज्य में आये।

पित्रा सम्पूजिता : सर्वे यथावीर्य यथावय:
आददु सशरं चापं वेध्दुम पर्षदि मध्दिय:॥ 21 ॥

अर्थात मेरे पिता ने प्रत्येक राजा को उसकी शक्ति और वरिष्ठता के अनुसार उचित सम्मान दिया। फिर जिन लोगों का मन मुझ पर स्थिर था, उन्होंने धनुष और तीर उठाया और एक एक करके सभा के बीच में लक्ष्य भेदने की कोशिश की।

आदाय व्यसृजन् केचित् सज्यं कर्तुमनीश्वरा: ।
आकोष्ठं ज्यां समुत्कृष्य पेतुरेकेऽमुना हता: ॥ २२ ॥

उनमें से कुछ ने धनुष उठाया लेकिन इसे प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सके इसलिए उन्होंने निराशा में एक तरफ फैंक दिया। कुछ लोग प्रत्यंचा को धनुष की नोक की ओर खींचने में कामयाब रहे, लेकिन हाथ छूटने पर धनुष ने उन्हें जमीन पर पटक दिया।

सत्यं कृतवापरे वीरा मगधम्बष्ठचेदिया:
भीमो दुर्योधन: कर्णों नाविद्सतदवस्थितिम॥ 23 ॥

जरासंध, शिशुपाल, भीम, दुर्योधन, कर्ण** और अम्बाह के राजा – ये कुछ योद्धा धनुष पर बाण चढ़ाने में सफल रहे, लेकिन उनमें से कोई भी लक्ष्य नहीं प्राप्त सका। (ये राजा शारीरिक रूप से बहुत मजबूत थे, लेकिन वे इतने निपुण नहीं थे कि वे लक्ष्य को पा सकें)

मत्स्य भासं जले वीक्ष्य ज्ञात्वा चतदस्थिति
पार्थे यतोअसृजद बाणं नाच्छिन्त पस्पृशे परमे॥ 24 ॥

तब अर्जुन ने पानी में मछली के प्रतिबिम्ब को देखा और इस पर निशाना साधा। जब उसने ध्यान से अपने तीर को छोड़ा तो तीर ने लक्ष्य को नहीं भेदा बल्कि उसे हल्का-सा छू कर निकल गया।

श्रीधर महाराज की व्याख्या के अनुसार यद्यपि अर्जुन अन्य राजाओं की तुलना में अधिक दक्ष तीरंदाज़ थे लेकिन उनकी शारीरिक शक्ति इस कार्य को पूरी सटीकता के साथ करने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

राजन्येषु निवृत्तेषु भग्नमानेषु मानिषु ।
भगवान् धनुरादाय सज्यं कृत्वाथ लीलया ॥ २५ ॥
तस्मिन् सन्धाय विशिखं मत्स्यं वीक्ष्य सकृज्जले ।
छित्त्वेषुणापातयत्तं सूर्ये चाभिजिति स्थिते ॥ २६ ॥

जब सारे दंभी राजाओं ने हार मान ली और उनका गर्व चूर-२ हो गया तो उस देवत्व और सर्वोच्च व्यक्तित्व ने धनुष उठाया, आसानी से प्रत्यंचा चढ़ाई और उस पर अपना तीर लगाया। जैसे ही सूर्य अभिजीत नक्षत्र से गुजरा, उन्होंने (श्रीकृष्ण ने) मछली को केवल एक बार पानी में देखा और फिर उसे तीर से भेद कर जमीन पर ला पटका।

(प्रत्येक दिन सूर्य एक बार चंद्र नक्षत्र अभिजीत से होकर गुजरता है, जो विजय के लिए सबसे शुभ माना जाता है। जैसा कि श्रीविष्णुनाथ चक्रवर्ती द्वारा बताया गया है, इस दिन अभिजीत का मुहूर्त खड़ी दोपहर के समय आया जिससे लक्ष्य को देखने में और भी कठिनाई हुई होगी। इससे भगवान कृष्ण की महानता का ही पता चलता है।)

आगे लक्ष्मणा द्रौपदी को बताती है कि,

दिवि दुन्दुभ्यो नेवुर्जय शब्दयुता भुवि।
देवाश्च कुसुमसरान मुमुचुरहरषविछला :॥ 27 ॥

अर्थात, ढोल नगाड़े बजने लगे और आसमान नगाड़ों की आवाज से गूंजने लगा। लोग जोर-जोर से जय हो ! जय हो ! कहकर लोग चिल्लाने लगे। आसमान से देवता लोग फूलों की बारिश करने लगे।

मेरे द्वारा सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण को चुनने से वहां उपस्थित कई राजा लिप्सा और ईर्ष्या से भरकर झगड़ालू हो गए। वह राजा श्री कृष्ण द्वारा मुझे अपने सोने के रथ पर लेजाते हुए ऐसे देख रहे थे जैसे जंगल के जानवर एक सिंह को भयातुर और क्रोधित होकर देखते हैं।

गाँव से शिकार करके निकलते सिंह के पीछे जैसे कुत्ते पीछे-२ चलते हैं, वैसे ही कुछ राजाओं ने भगवान कृष्ण का पीछा किया तो कुछ ने मार्ग में उनको रोकने की भी चेष्टा की। लेकिन उनके धनुष “सारंग” से निकले बाणों ने उनके कुत्सित इरादों और शरीरों को छिन्न-भिन्न कर दिया और वे बाणों से बिंधे धरती पर लोटते नज़र आए।

इस प्रकार श्रीलक्ष्मणा और द्रौपदी के मध्य हुए वार्तालाप से प्रामाणित होता है कि महाभारत के समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण थे। हालाँकि उन्होंने युद्ध में धनुष-कला का अधिक उपयोग नहीं किया क्योंकि उनके पास इससे भी घातक और अचूक अस्त्र सुदर्शन-चक्र था।

* – स्वयंवर प्राचीन काल की एक विवाह प्रथा थी जिसमें वधू को मनचाहा वर चुनने का अवसर दिया जाता था। स्वयंवर में वर प्रतिभागी एक निश्चित प्रतियोगिता में हिस्सा लेते थे और वधू प्रतियोगिता जीतने वाले के गले में वरमाला डालकर उसको अपना वर स्वीकार करती थी।
** – कुछ बुद्धिजीवी कर्ण को महाभारत काल का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर मानते हैं लेकिन महाभारत को अच्छे से जानने वाले जानते हैं कि कर्ण कई बार अर्जुन से आमने-सामने की लड़ाई में हार चुके थे। कुछ लोग तो कर्ण की बड़ाई को लेकर यहाँ तक मानते हैं कि द्रौपदी का पहला प्रेम कर्ण थे न कि अर्जुन। हालाँकि उनके पास प्रस्तुत करने के लिए कोई साक्ष्य भी नहीं है। लेकिन हमारे पास ऐसे ओछे लेखकों के लिए प्रमाण सहित एक उत्तर है  प्रमाण सहित: क्या सचमुच में कर्ण से प्रेम करती थीं द्रौपदी?? जिसे आप इस लेख के माध्यम से पढ़ सकते हैं।

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तुलसी की पत्तियां तोड़ते समय न करें ये गलतियां

हिंदू धर्म से जुड़े लोग घर, आंगन में तुलसी का पौधा जरूर लगाते हैं क्योंकि इससे घर में नैगेटिव एनर्जी का वास नहीं होता।

सिर्फ धार्मिक ही नहीं यह पौधा औषधीय गुणों से भी भरपूर होता है इसलिए लोग तुलसी की पत्तियों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन तुलसी की पत्तियों को तोड़ते समय अक्सर लोग गलतियां करते हैं, जैसे शाम के समय तुलसी तोड़ना।

मान्यताओं के अनुसार, सायंकाल के समय राधा रानी का रूप मानी जाने वाली तुलसी माता लीला करती हैं। अगर पत्तियों की ज्यादा आवश्यकता हो तो तोड़ने से पहले पौधे को हिला जरूर लें।

तुलसी को खींचकर या नाखूनों से तोड़ना भी वर्जित है। वहीं अगर आप औषधि के रूप में इसका सेवन कर रहे हैं तो पत्तियों को चबाएं न जीभ पर रखकर चूसें क्योंकि शास्त्रों के अनुसार, तुलसी एक वृक्ष नहीं बल्कि राधा रानी का अवतार है।

तुलसी क्यों है फायदेमंद

वास्तु 10 दिशाओं और 9 ग्रहों पर आधारित है। तुलसी मरकरी यानी बुध ग्रह को प्रभावित करती है। ऐसा इसलिए क्योंकि सिर्फ तुलसी और गंगाजल में ही मरकरी पाया जाता है। मरकरी टैम्प्रेचर को कंट्रोल करने के साथ वातावरण को भी शुद्ध करने का काम करता है।

तुलसी के प्रकार

1. राम तुलसी (ब्राइट ग्रीन के पत्ते)

2. शाम तुलसी (छोटे डार्क ग्रीन कलर के पत्ते)

3. काली तुलसी (छोटे डार्क पत्ते)

आमतौर पर घरों में राम व शाम तुलसी पाई जाती है, जिसे उत्तर, उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पूर्व में रखना चहिए। वहीं काली तुलसी को औषधीय के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिसे दक्षिण पश्चिम दिशा में रखना सही होता है।

तो चलिए अब जानते हैं कि कहां और किस जगह पर होनी चाहिए तुलसी:-

तुलसी रखने की सही दिशा कौन सी? तुलसी के पौधे को न सिर्फ लक्ष्मी माता का स्वरूप माना जाता है बल्कि यह विष्णु को भी बेहद सर्वप्रिय है।

वास्तु के अनुसार इसे उत्तर, उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पूर्व में रखें। इसके अलावा तुलसी को भूलकर भी पूर्व और उत्तर पश्चिम दिशा में न लगाएं।

रोजाना जल दें

रविवार को छोड़कर महिलाओं को रोज तुलसी को जल देना चाहिए। इसके घर में सुख संपदा, शांति बनी रहती है और पैसों की कमी भी नहीं होती।

ऐसे दें जल

तुलसी को जल देने के लिए कांसे के लोटे का इस्तेमाल करें। साथ ही महिलाएं शाम के समय तुलसी के सामने दीया जलाएं। इससे घर में सुख शांति बनी रहेगी।

बैडरूम में न लगाएं

तुलसी का पौधा बहुत पवित्र होता है इसलिए इसे कभी भी बैडरूम में नहीं लगाना चाहिए।

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यह हैं दुनिया के सबसे महंगे मशरूम

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मशरूम की सब्जी हर कोई खाना पसंद करता है। मशरूम खाने में स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है।

एंटी-ऑक्सीडेंट्स, प्रोटीन, विटामिन डी, सेलेनियम और जिंक से भरपूर मशरूम का इस्तेमाल कई दवाइयां बनाने के लिए भी किया जाता है।

वास्तव में दुनिया भर में मशरूम की कई किस्में पाई जाती हैं, और उनमें से कुछ की कीमत सामान्य होती है लेकिन कुछ  मशरूम की कीमत 8-10 लाख रुपये प्रति किलोग्राम है।

जी हाँ कई मशरूम इतने दुर्लभ होते हैं कि उनकी कीमत लाखों में होती है। ये मशरूम न केवल विदेशों में बल्कि भारत में भी पाए जाते हैं, जो बहुत महंगे लेकिन शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं।

आइए जानें दुनिया के सबसे महंगे मशरूम के बारे में, जिन्हें खरीदने के लिए लाखों रुपए खर्च पड़ते हैं।

यूरोपियन वाइट ट्रफल

यूरोपियन वाइट ट्रफल मशरूम को दुनिया का सबसे महंगा मशरूम माना जाता है। हालाँकि यह एक प्रकार का कवक है, यह दुनिया के सबसे दुर्लभ मशरूमों में से एक है।

अगर हम कीमत की बात करें तो ये 7-9 लाख रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिकती हैं जबकि इस मशरूम की खेती नहीं की जाती, यह पुराने पेड़ों पर एक कवक के रूप में बढ़ता है। इसके अलावा, पूरी दुनिया में इसकी बहुत मांग है और कीमत बहुत अधिक है।

ब्लैक ट्रफ़ल

व्हाइट ट्रफल्स के बाद, ब्लैक ट्रफल्स सबसे महंगे मशरुम के रूप में जाना जाता है। सफेद ट्रफ़ल्स की तरह, काले ट्रफ़ल्स बहुत दुर्लभ और महंगे हैं।

ब्लैक ट्रफल को एक शानदार खाद्य पदार्थ के रूप में माना जाता है। इन मशरूम को खोजने के लिए ट्रेंड डॉग्स का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी कीमत 1 लाख रुपये से लेकर 2 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक है।

मात्सुतके

यह एक जापानी मशरूम है, जिसे मात्सुतके मशरूम कहा जाता है, और यह इसकी सुगंध के लिए प्रसिद्ध है। यह मशरूम हल्के भूरे रंग के होते हैं। ये मशरूम बहुत स्वादिष्ट होते हैं। यह लगभग 3 से 5 लाख रुपये प्रति किलो में मिलता है।

मोरालेस या गुच्छी

मोरालेस या गुच्छी मशरूम दुनिया के सबसे महंगे मशरूमों में से एक है। गुच्छी मशरूम कई औषधीय गुणों से भरपूर होती है। इसका औषधीय नाम मार्कुला एस्क्यूपलेटा है।

हालांकि यह देशभर में इसे स्पंज और मोरालेस मशरूम के नाम से भी जाना जाता है। यह हिमालय में पाए जाने वाले जंगली मशरूम की एक प्रजाति है। बाजार में इसकी कीमत 25 से 30 हजार रुपये प्रति किलो है।

चैंटरलेस

महंगे मशरूमों में नाम चैंटरलैस का नाम भी शामिल हैं। यह मशरूम यूरोप और यूक्रेन में समुद्र तट के पेड़ों के आसपास पाया जाता है। ये मशरूम विभिन्न रंगों में आते हैं और इनकी कीमत 30,000 रुपये से 40,000 रुपये प्रति किलोग्राम है।

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महाशिवरात्रि – जानें इस वर्ष राशियों पर कैसा होगा असर

महाशिवरात्रि हिन्दुओं और भगवान शिव का एक प्रमुख त्यौहार है। इस वर्ष महाशिवरात्रि पर्व 11 मार्च 2021 को गुरुवार के दिन है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ।

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था।

साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से इस महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत सहित पूरी दुनिया में महाशिवरात्रि का पावन पर्व बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है|

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस बार महाशिवरात्रि पर शिव योग के साथ घनिष्ठा नक्षत्र होगा और चंद्रमा मकर राशि में विराजमान रहेंगे।

तो आइये जानते हैं इस वर्ष किस राशि पर रहेगी महादेव की अपार कृपा :-

जानें राशियों पर कैसा होगा असर

मेष राशि:- आपके आर्थिक पक्ष में मजबूती आएगी। परिवार के वरिष्ठ सदस्य, बड़े भाइयों से मतभेद न पैदा होने दें। विद्यार्थियों अथवा प्रतियोगिता में बैठने वाले छात्रों के लिए ग्रह गोचर और अनुकूल रहेगा।

वृष राशि:- शैल पर्वत पर स्थित मल्लिकार्जुन वृष राशि के स्वामी हैं। इस राशि के व्यक्तियों को मल्लिकार्जुन का दर्शन करना चाहिए लेकिन जो लोग मल्लिकार्जुन का दर्शन करने नहीं जा सकते उनके लिए शिव की कृपा पाने का सबसे आसान तरीका है महाशिवरात्रि के दिन किसी भी शिवलिंग की पूजा गंगाजल से करें। शिवलिंग पर आक का फूल और पत्ता चढ़ाएं।

मिथुन राशि:- मिथुन राशि के स्वामी बुध माने जाते हैं। मिथुन जातक भगवान शिव को धतूरा, भांग अर्पित कर सकते हैं, साथ ही इस राशि के जातक गन्ने के रस से शिवजी का अभिषेक करें और ॐ भुतेश्वराय नमः मंत्र का जाप करें।

कर्क राशि:- अपनी सेहत को लेकर सावधान रहें। मौसम परिवर्तन से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं। जमीन से जुड़े मामलों में दिक्कतें आ सकती हैं। आर्थिक तंगी से बचें।

सिंह राशि:- सिंह राशि के स्वामी सूर्य हैं। भगवान शिव की आराधना में सिंह जातकों को कनेर के लाल रंग के पुष्प चढ़ाने चाहिए। इसके साथ ही शिवालय में भगवान श्री शिव चालीसा का पाठ भी करना चाहिए। यह पूजन आपके लिए अति लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

कन्या राशि:- बुध का यह गोचर आपके लिए लाभकारी हो सकता है। इस अवधि में आपको स्वास्थ्य लाभ मिलेगा। पुरानी बीमारियां ठीक होने लगेंगे। आसपास के शत्रुओं से सतर्क रहें। सोच-समझकर काम करेंगे तो अच्छा रहेगा।

तुला राशि:- इस राशि के स्वामी शुक्र माने जाते हैं इसलिए दही से शिवजी का अभिषेक करें और शांति से शिवाष्टक का पाठ करें।

वृश्चिक राशि:- इस राशि के लोग दूध और घी से शिवजी का अभिषेक करें। वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल हैं। भोले भंडारी की पूजा आपको गुलाब के फूलों व बिल्वपत्र की जड़ से करनी चाहिए। इस दिन रूद्राष्टक का पाठ करने से आपकी राशि के अनुसार सौभाग्यशाली परिणाम मिलने लगते हैं और ॐ अन्गारेश्वराय नमः मंत्र का जाप करें।

धनु राशि:- आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। मित्र और भाई-बहन आपकी मदद करेंगे। जो निर्णय लेंगे उसी में पूर्णरूप से सफल रहेंगे। धर्म-कर्म के मामलों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगे और दान पुण्य भी करेंगे।

मकर राशि:- आपकी आर्थिक तरक्की होगी। अपनी वाणी कुशलता एवं सौम्य स्वभाव के बल पर विषम परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त कर लेंगे। परिवार में सुख-शांति बनी रह सकती है।

कुंभ राशि:- कुंभ राशि के स्वामी भी शनि हैं। कुंभ जातकों को गन्ने के रस से शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिए, साथ ही धन लाभ पाने के लिये शिवाष्टक का पाठ आपको करना चाहिए। जल्द ही अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। इस राशि के लोग दूध, दही, शक्कर, घी, शहद सभी से शिवजी का अभिषेक करें और ॐ शिवाय नमः मंत्र का जाप करें।

मीन राशि:- मीन राशि के स्वामी बृहस्पति हैं। मीन जातकों को पंचामृत, दही, दूध एवं पीले रंग के फूल शिवलिंग पर अर्पित करने चाहिए। घर में सुख समृद्धि व धनधान्य में वृद्धि के लिए पंचाक्षरी मंत्र नम: शिवाय का चंदन की माला से 108 बार जाप करें।

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महिलाओं के बारे में कुछ रोचक तथ्य

महिलाएं भगवान् द्वारा बनाई सबसे अदभुत रचना है। किसी भी देश की महानता और संस्कृति में महिलाओं का विशेष स्थान होता है और वेदों में भी महिलाओं को विशेष दर्जा प्राप्त है।

आज हम आपको महिलाओं से जुड़ी कुछ रोचक बातें बताने जा रहे हैं जिनको जानकर आप हैरान हो जायेंगे। तो आइये जानते हैं महिलाओं के बारे में कुछ रोचक तथ्य :-

  • महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज्यादा रंग दिखाई देते हैं। न्यूकासल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का मानना है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों को कम रंग दिखाई देते हैं।
  • जब एक महिला एक पुरुष के प्रति आकर्षित होती है, तो वह सामान्य से अधिक ऊँचे पिच में बात करती है।
  • “मैं क्या पहनूँ” यही सोचने में महिलाएं अपने जीवन का एक साल बिता देती हैं।
  • क्या आप जानते हैं दुनिया की पहली कम्प्यूटर प्रोग्रामर एक महिला थी।
  • फिजिकल डिफरेंस की वजह से महिलाओं का सिर्फ दिमाग का आकार छोटा होता है पर उसमें निहित कोशिकाएं बराबर ही होती हैं। पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मस्तिष्क नौ प्रतिशत छोटा होता है। इसका यह मतलब नहीं है कि उनकी बुद्धि छोटी होती है। यह मामला बराबर का होता है।
  • अमेरिका में 30% बिज़नेस की मालिक महिलाएं हैं।
  • महिलाएं झूठ बोलना कतई पसंद नहीं करती, खास तौर से रिलेशनशिप के मामलों में।
  • महिलाओं को डेट्स बहुत याद रहती है। उनकी दोस्ती किससे, किस दिन, कब, कहां और क्यों हुई, सारा लेखा जोखा उनके पास रहता है। अगर आप कभी उनसे कोई बात करें तो वह गड़े मुर्दे उखाड़ देगी, ऐसी बातें याद दिलाएगी जो आपको याद ही न हों।
  • 80% महिलाएं अपने दर्द को व्यक्त करने के लिए चुप्पी का उपयोग करती हैं।
  • महिला और पुरुष समान मात्रा में भावनाओं का अनुभव करते हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि महिलाएं अपनी भावनाओं को पुरुषों की तुलना में ज़्यादा दिखाती है।
  • एक रिसर्च के मुताबिक जीभ से चाटने से लेकर खाना खाते वक्त महिलाएं अपने जीवनकाल में करीब दो किलोग्राम लिपस्टिक खा जाती हैं। एक लिपस्टिक 2.5 ग्राम की होती है तो करीब 800 लिपस्टिक का मटीरियल महिलाओं के पेट में पाया जा सकता है।
  • महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण पुरुषों से अलग होते हैं। डिप्रेशन, मोटापा आदि की बात की जाए तो वह भी महिलाओं में ज़्यादा होने की संभावना होती है। इसका कारण प्रेग्नेंसी, खुद पर ध्यान ना देना या हॉर्मोन में बदलाव कुछ भी हो सकता है। मोटापा, डिप्रेशन आदि के कारण महिलाओं में दिल की बीमारी का खतरा ज़्यादा बढ़ जाता है।
  • महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक बुरे और अधिक भावनात्मक सपने आते हैं।
  • सीबीएस डेट्रायट के एक शोध से पता चला है कि महिलाओं को मासिक धर्म में ऐंठन और हार्ट अटैक का दर्द बराबर हो सकता है। इस स्थिति को डिसमेनोरिया (Dysmenorrhea) के नाम से जाना जाता है।
  • महिलाएं जिन्हें पसंद करती हैं उनके खिलाफ एक शब्द भी सुनना पसंद नहीं करती।
  • महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक बोलने वाला माना जाता है। यह कोई नई बात नहीं लग रही पर क्या आप जानते हैं कि महिलाएं पुरुष की तुलना में एक ही दिन में करीब 13 हजार शब्द ज़्यादा बोलने की सक्षम होती हैं।
  • लड़कियां जिससे प्यार करती हैं उसके बारे में हर मिनट सोचती रहती हैं।
  • अगर कोई भी लड़की स्पेशियली आपके लिए कुछ पका कर लाये , तो समझ लीजिए कि आप उसके लिए बेहद खास हैं।
  • महिलाएं इतनी ज़्यादा संवेदनशील होती हैं कि अगर कोई लड़का बेहद सेंटीमेंटल बात कह दे, तो वह उसे जिंदगी भर नहीं भूलती।

अजब – गजब:- एक ही पेड़ पर 8 तरह के फल, जानें कुछ रोचक बातें

आपने अलग-अलग तरह के फल खाएं होंगे, लेकिन शायद आपने कभी एक ही पेड़ में लगे 8 तरह के फल नहीं खाएं होंगे। आज हम आपको जिस फल के बारे में बताने जा रहे हैं उसका नाम है “फ्रूट सैलड ट्री”l

‘फ्रूट सैलड ट्री” जैसा नाम से ही स्पष्ट है। जिस तरह सैलड में कई सब्जियां होती हैं, ठीक इसी तरह फ्रूट सैलड ट्री पर कई तरह के फल उगते हैं। इस पर 6 से 8 तरह के एक ही प्रजाति के फल उग सकते हैं।

जैसे खट्टा फल नींबू, संतरा, चकोतरा आदि। अभी इस तरह के पेड़ पर अलग-अलग प्रजाति के फल जैसे सेब और केला एक साथ नहीं उगाया जा सकता है। आइए इस फ्रूट के बारे में जानते हैं…

जेम्स और केरी वेस्ट का था आइडिआ

1990 के शुरुआती दशक में ऑस्ट्रेलिया के जेम्स और केरी वेस्ट ने यह आइडिया पेश किया था। पहले फ्रूट सैलड ट्री को ऑस्ट्रेलिया में ही सफलतापूर्वक उगाया गया था।

बाद में ऑस्ट्रेलिया से ये पेड़ दुनिया के अन्य हिस्सों में पहुंचे। फ्रूट सैलड ट्री को खुले मैदान में या फिर गमले में उगाया जा सकता है।

चार प्रकार के फ्रूट सैलेड ट्री

मुख्य रूप से फ्रूट सैलड ट्री चार प्रकार के होते हैं। जिनके नाम स्टोन फ्रूट (stone fruit), सिट्रस फ्रूट (citrus fruit). मल्टि ऐपल (multi apple) और मल्टि नाशी (multi nashi) है।

स्टोन फ्रूट ट्री में बेर, खूबानी, आडू और शफतालू को उगाया जा सकता है। गर्म जलवायु में इसकी पैदावार अच्छी होती है। सिट्रस फ्रूट सैलड ट्री पर ।

नींबू, संतरा, चकोतरा, टैंगलो, पोमेलो, मैंडरिन आदि के फल उगाए जा सकते हैं। मल्टि ऐपल ट्री में तरह के सेब जैसे हरे, पीले और लाल सेब की पैदावार हो सकती है। मल्टि नाशी ट्री में कई तरह की नाशपाती की पैदावार हो सकती है।

इस ट्री के फायदे

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि छोटी सी जगह में आप कई फ्रूट उगा सकते हैं लेकिन इसमें एक खामी भी है। खामी यह है कि इसमें अलग प्रजाति के फल जैसे सेब और केला की एक साथ पैदावार नहीं हो सकती।

कैसे उगाया जाता है ये पेड़

इसे रात भर में एक बाल्टी पानी में भिगोकर रखा जाता है। उसके बाद आप इसे किसी खुली जगह या फिर गमले में भी लगा सकते हैं।

ठंड और गर्मी के मौसम में साल में दो बार उसमें खाद डाली जाती है। पेड़ रोपने के 6 से 18 महीने के अंदर पेड़ पर फल लगने शुरू हो जाते हैं।

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पेड़ अपनी पत्तियां क्यों गिराते हैं, जानिए क्या है कारण

पतझड़ी पेड़ अपनी पत्तियां गर्मी के सूखे दिनों में पानी बचाने के मकसद से गिराते हैं। हमारे यहां पतझड़ का मौसम करीब तीन महीने का रहता है। अलग-अलग पेड़ों के लिए पतझड़ का समय भी अलग-अलग होता है।

कुछ पेड़ों के लिए पतझड़ बीत चुका है तो कुछ के लिए अभी चल रहा है। इतना ही नहीं, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी पतझड़ का मौसम अलग-अलग समय आता है। कहीं सितंबर से नवंबर तक चलता है तो कहीं फरवरी से शुरू होकर अप्रैल-मई तक।

सवाल यह उठता है कि आखिर पेड़ अपनी पत्तियों को गिराते ही क्यों है? क्या इसमें भी उनका कोई फायदा होता है? गर्मियों से पहले पतझड़ी पेड़ अपनी पत्तियों को आने वाले गर्मी के सूखे दिनों में पानी बचाने के मकसद से गिराते हैं, वहीं ठंडे देशों के पतझड़ी पेड़ ऐसा सर्दी के दिनों में बर्फबारी से होने वाले नुकसान से बचने के लिए करते हैं।

पत्तियों के गिरने की शुरुआत उनके पीले पड़ने से होती है। सभी जानते हैं कि पेड़ अपना भोजन पत्तियों से बनाते हैं। जब पत्तियां गिरने लगती हैं तो उस समय भोजन निर्माण की प्रक्रिया भी रुक जाती है।

इस प्रक्रिया में कई पत्तियां अपना नाइटोजन और कार्बन निकालकर प्रोटीन के रूप में जड़ों और छाल में जमा कर देती हैं। यही संग्रहित प्रोटीन बाद में नाइट्रोजन के स्रोत के रूप में नई पत्तियों और फूलों के विकास के काम में आता है।

यह भी देखा गया है कि कई पतझड़ी पेड़ तभी फूलते हैं, जब वे पत्ती विहीन अवस्था में होते हैं, जैसे अमलतास, सेमल और टेसू।

पत्तियां नहीं होने से फूल दूर से ही स्पष्ट नजर आने लगते हैं और इसलिए कीट-पतंगे और पक्षी उनकी ओर ज़्यादा आकर्षित होते हैं।

सवाल यह भी है कि क्या वास्तव में पतझड़ी पेड़ों में हर साल प्रति पेड़ लाखों-करोड़ों नए पत्ते उगाना, कुछ महीने उनका उपयोग करना और फिर उन्हें त्याग देना उचित है?

विकासवादियों के अनुसार दुनिया में पतझड़ी पेड़ 10 करोड़ वर्ष पूर्व ही आए हैं, जबकि चीड़ और देवदार जैसे सदाबहार पेड़ 17 करोड़ वर्षों से यहां राज कर रहे हैं।

अतः पतझड़ी पेड़ प्रकृति के नए आविष्कार हैं जो विपरीत परिस्थितियों के लिए ज्यादा अनुकूलित हैं। चीड़ और देवदार जैसे सदाबहार पेड़ अपनी पत्तियां नहीं गिराते और उन्हें इसका भारी नुकसान भी उठाना पड़ता है,

जैसे बर्फबारी के दौरान उनकी ऊपरी शाखाएं टूट जाती हैं और उन पर पत्तियां खाने वाले शाकाहारियों का भी दबाव बढ़ जाता है, क्योंकि पतझड़ी पेड़-पौधे तो अपनी पत्तियां पहले ही गिरा चुके होते हैं।

आर्थिक दृष्टि से भी अहम है पतझड़ का मौसम

उपग्रह इस मौसम में जो चित्र भेजते हैं। उनमें पुथ्वी कछ ज्यादा ही रंगीन नजर आती है। इन चित्रों में गहरे, हरे, पीले, लाल व भूरे रंग के बदलाव की स्पष्ट तरंगें देखने को मिलती हैं।

रंग परिवर्तन की यह लहर दक्षिण यूरोप में 60 से 70 किलोमीटर प्रति दिन की रफ्तार से चलती है और सारा क्लोरोफिल देखते-देखते दो-तीन सप्ताह में नष्ट हो जाता है।

पत्तियों से जब क्लोरोफिल टूटता है तो वे पत्तियां पीली, नारंगी या लाल दिखाई देने लगती हैं। उनका पीलापन कैरोटीन और लाल रंग एंथोसाइन जैसे पदार्थों के कारण होता है।

यूरोपीय देशों में प्रकृति के इस बदले हुए रूप को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। पूर्वी उत्तरी अमेरिका में तो पतझड़ पर पर्यटन से अरबों डॉलर की कमाई होती है।

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धरती को नुकसान पंहुचा रहे “मांसाहारी “

6 करोड़ लोग प्रति वर्ष भूख से मर जाते हैं। क्या इसका कारण हमारे द्वारा खाया जाने वाले मांस है? जरा निम्नलिखित तथ्यों पर गौर करें..

80 प्रतिशत मक्का, मांस के लिए पाले जाने वाले पशुओं द्वारा खा लिया जाता है जबकि केवल 20 प्रतिशत मनुष्यों के खाने के लिए छोड़ा जाता है।

20 शाकाहारियों का पेट उतनी जमीन से भरा जा सकता है जितनी कि 1 मांसाहारी की भूख मिटाने के लिए जरूरत होती है। लगभग 5.45 किलो गेहूं से बनाई जा सकती हैं 12 ब्रैड तथा केवल 1 मांसाहारी हैमबर्गर।

1 किलो पशु प्रोटीन प्राप्त करने के लिए मुर्गियों को 5 किलो पौध प्रोटीन खिलाया जाता है। मांस केंद्रित भोजन के समर्थन में फसल उगाने के लिए 26 करोड़ एकड़ अछूते जंगल साफ कर दिए गए।

विश्व के पैट्रोलियम भंडार केवल 13 वर्षों तक बचे रहेंगे अगर सभी मनुष्य मांसाहारी होंगे लेकिन यदि सभी मनुष्य शाकाहारी हों तो 260 वर्षों तक।

5000 गैलन (लगभग 18927 लीटर) पानी का इस्तेमाल मात्र 1 पाऊंड (लगभग 454 ग्राम) बीफ तैयार करने के लिए किया जाता है।

1पाऊंड सेबों के लिए केवल 49 गैलन (लगभग 18550 लीटर) पानी की जरूरत है। पशुधन में मात्र 1 जानवर इतना पानी पी जाता है, जो 1 युद्धपोत के पानी की आपूर्ति के लिए पर्याप्त होता है।

इंसानी शरीर शाकाहार के लिए ही बना है, ये हैं इसके प्रमाण

पैतृक वंशानुक्रम

हमारे सबसे करीबी पूर्वज यानी कि प्राइमेट्स (नर-वानर या मनुष्य सदृश्यजानवर) शाकाहारी हैं। हमारी जैविक व्यवस्था इस संबंधमें परिवर्तित नहीं हुई है। अभी भी मनुष्य उन प्राइमेट्स जैसा दिखाई देता है, जिनसे इसका विकास हुआ है।

पालन-पोषण

हमारे पूर्वजों ने अपने बच्चों को फल चुनना और तोड़ना सिखाया न कि शिकार करना। यह अभी तक भी हमारे पालन-पोषण का काफी हद तक तरीका बना हुआ है।

सहज प्रवृत्ति

हम कच्चे मांस की बजाय फलों की खुशबू की ओर अधिक आकर्षित होते हैं।

जबड़े

मनुष्य शाकाहारी जीवों की तरह अपने जबड़े दाएं-बाएं तथा ऊपर-नीचे चला सकता है।
मांसाहारी जीव अपने जबड़े केवल ऊपर-नीचे चला सकते हैं।

आहार नली

मनुष्य की पाचन नलीशाकाहारी जीवों की तरह लंबी होती है, हमारी रीढ़ से कई गुना लंबी। शाकाहारी जीवों की आहार नली इससे कहीं कम लंबाई की होती है।

गाय : रीढ़ से 16 गुना, सिंह : रीढ़ से 3 गुना, मनष्य : रीढ़ से 12 गना

दांत

मनुष्य में शाकाहारियों की तरह कैनाइन्स (कुत्ते जैसे तीखे दांत) तथा इनसिजर्स (कृतक) की बजाय मोलार्स (चबाने वाले दांत) अधिक होते हैं, ताकि वे रेशेदार शाकाहारी चीज़ों को पीस सकें। मांसाहारी जीवों में मांस को चीरने-फाड़ने के लिए कैनाइन्स तथा इनसिजर्स अधिक होते हैं।

लार

मनुष्य की लार क्षारीय होती है, जैसे कि शाकाहारी जीवों की । मांसाहारी जीवों की लार अम्लीय होती है।

रात्रि दृष्टि (नाइट विजन)

मांसाहारी जीवों की रात्रि दृष्टि बहुत तेज होती है, ताकि अंधेरे में शिकार करने में उन्हें मदद कर सके। मनुष्य को शिकार करने की जरूरत नहीं होती और न ही वह करता है।

शाकाहारी जीवों की तरह मनुष्य खुद को पसीना बहा कर ठंडा करते हैं, जबकि मांसाहारी जीव हांफ कर खुद को ठंडा करते हैं।

पानी पीने का तरीका

सभी शाकाहारी जीवों की तरह मनुष्य पानी को अपने होंठों से खींच कर या चूस कर पीते हैं। मांसाहारी जीव अपनी जीभ में लपेट कर पानी को अपने मुंह में डालते हैं। यह एक और प्रमाण है इंसानी शरीर शाकाहार के लिए ही बना है।

गंगाजल के ये चमत्कारी टोटके खोल देंगे किस्मत के ताले

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ या किसी भी धार्मिक काम में गंगाजल को विशेष महत्व होता है। लोग किसी शुभ दिन व खास मौके पर गंगा नदी में स्नान करने जाते हैं।

मान्यता है कि इससे जीवन की परेशानियां दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुराणों के अनुसार, गंगाजल को अमृत माना जाता है।

ऐसे में ज्योतिष व वास्तुशास्त्र के अनुसार, कुछ उपाय या टोटके करने से जीवन की समस्याएं दूर होकर मनोकामनाओं को पूरा किया जा सकता है। तो आइए जानते हैं उन टोटकों के बारे में…

  • जो लोग अच्छी नौकरी की तलाश में हैं वे गंगाजल से जुड़ा यह उपाय कर सकते हैं। इसके लिए पीतल के लोटे में गंगाजल भरकर शिव जी को चढ़ाएं। बाद में उसमें बिल्वपत्र और कमल पुष्प डालकर महादेव को अर्पित करें। इससे कारोबार व नौकरी से जुड़ी परेशानी दूर होकर घर में सुख-समृद्धि व शांति का वास होगा।
  • भगवान शिव जी को गंगाजल अतिप्रिय  है। ऐसे में ज्योतिष व वास्तु शास्त्र के अनुसार, नियमित रूप से भोलेनाथ को गंगाजल चढ़ाना चाहिए। इससे जीवन की परेशानियां दूर होकर सुख मिलता है साथ ही मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • वास्तु शास्त्र के अनुसार घर पर गंगाजल रखने से कर्ज से मुक्ति मिलने के साथ आय के नए स्त्रोत बनते हैं। इसके लिए गंगाजल को पीतल की बोतल में डाल उसे अपने कमरे के उत्तर-पूर्व कोण में रखें। माना जाता है कि इससे कर्ज से परेशानी दूर होकर जीवन में खुशहाली आती है।
  • पुराणों के अनुसार गंगा जल को घर पर हमेशा रखना चाहिए। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने के साथ सुख-समृद्धि व शांति बनी रहती है। घर में खुशियों का आगमन होने के साथ अन्न व धन की बरकत बनी रहती है।
  • जिन घरों में लोग अक्सर बीमार रहते हैं उन्हें रोजाना गंगाजल का सेवन करना चाहिए। मान्यता है कि इससे इससे सेहत में सुधार होने के साथ बीमारियां दूर रहती है।

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ऐतिहासिक धरोहर है ‘अग्रसेन की बावड़ी’

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भारत की राजधानी दिल्ली का बहुत ही अद्भुत और गौरवशाली इतिहास रहा है। दिल्ली के संदर्भ में कहा जाता है कि यह नगर 7 बार उजड़ा है और 7 बार बसा है फिर भी आज दिल्ली अपने समृद्ध इतिहास से सम्पन्न है।

शहर की बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच में आप गर्व से इठलाती प्राचीन व मध्यकालीन इमारतों को आराम से देख सकते हैं जिन्हें भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने आने वाली पीढ़ियों के लिए संजो कर रखा है।

कई इमारतें ऐसी भी हैं जिनके आज केवल अवशेष देखने को मिलते हैं परंतु इन्हें भी संरक्षित रखा गया है। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने दिल्ली शहर में 1200 धरोहर स्थल घोषित किए हैं जोकि विश्व के किसी भी अन्य शहर की तुलना में कहीं ज्यादा हैं।

इन्हीं धरोहरों में से एक है ‘अग्रसेन की बावड़ी’। दिल्ली के दिल में स्थित यह बावली मशहूर पर्यटन स्थल तो है ही परंतु यह प्राचीन भारतीय वर्षा जल संरक्षण परम्परा का भी अप्रतिम उदाहरण है।

माना जाता है कि इस बावड़ी का निर्माण महाभारत काल में करवाया गया था परंतु इसके पुनः जीर्णोद्धार का कार्य महाराजा अग्रसेन द्वारा 14वीं शताब्दी में करवाया गया।

यह बावड़ी इस बात को सिद्ध करती है कि प्राचीन भारत तकनीकी रूप से सशक्त था और उस समय के लोग यह भी समझते थे कि हम बारिश के पानी को ऐसे ही बहने नहीं दे सकते, इसे संरक्षित करने के लिए इन बावड़ियों का निर्माण किया गया।

ये बावड़ियां एक जमाने में पेयजल का मुख्य स्रोत हुआ करती थीं। घर के नल में आसानी से जल उपलब्ध होने से यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि हम अपनी इन अनमोल धरोहरों को नगण्य रूप में देखें।

ये बावड़ियां जल संकट के इस युग में भी हमें इतिहास से परिचित कराते हुए जल संरक्षण के प्रति जागरूक होने की प्रेरणा देती हैं।

प्रत्येक नागरिक को अपने इस इतिहास पर गौरवान्वित होना चाहिए और इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाते हुए वर्षा जल संरक्षण की पद्धति को अपनाना चाहिए।

युवाओं के आकर्षण का केंद्र

यह बावड़ी अपने ऊपरी तल पर 60 मीटर लम्बी व भूतल पर 15 मीटर चौड़ी है। इस बावली में कुल 105 सीढ़ियां हैं जिनकी सहायता से नीचे के जल तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।

इस बावड़ी के निर्माण में लाल बलुए पत्थर का प्रयोग किया गया है तथा इसकी स्थापत्य शैली उत्तरकालीन तुगलक व लोदी काल से मेल खाती है। कनॉट प्लेस के हैली रोड पर स्थित यह बावली खास तौर पर युवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र है।

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