महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कौन थे?

द्वापर युग यानि महाभारत काल में कई महान धनुर्धर हुए। सामान्यत: अर्जुन और कर्ण को महाभारत काल के दो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है। वहीं पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, एकलव्य, अभिमन्यु, बर्बरीक, जरासंध, शिशुपाल, सात्यक़ी आदि को भी उत्तम कोटि का धनुर्धर माना जाता है।

लेकिन, अधिकतर पाठक शायद यह नहीं जानते हैं कि महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कौन थे? इसीलिए आज हम अपने पाठकों के लिए यह रोचक तथ्य लेकर आये हैं। दरअसल महाभारत के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कोई ओर नहीं बल्कि द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण थे।

सामान्यत: अर्जुन को महाभारत काल का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना जाता है। यदि श्रीकृष्ण के ईश्वरीय अवतार को भुला दिया जाए तो अर्जुन ही सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माने जाते हैं।

चौंक गये न! जी हाँ हम भी चौंक गये थे जब पहली बार हमने यह तथ्य पढ़ा। लेकिन इसके बाद की गयी खोजबीन के इस बात की पुष्टि हो गयी कि यह तथ्य सोलह आने सच है। इसके साथ ही साथ हम अपने पाठकों के लिए श्रीकृष्ण और लक्ष्मणा के विवाह का रोचक विवरण भी लेकर आये हैं।

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सोलह कलाओं के स्वामी, महारथी श्रीकृष्ण ही महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ राजा, सेना-नायक, योद्धा और धनुर्धर थे। अपने जीवन काल में उन्होंने न केवल अधर्म को रोका बल्कि पापियों को परलोक पहुँचाने में भी देरी नहीं की।

तो आइये आगे जानते हैं कि इंटरनेट और अन्य स्त्रोतों से इकट्ठी की हुई जानकारी से कैसे हमने इस तथ्य की पुष्टि की।

श्रीमदभगवत गीता में उल्लेख मिलता है कि एक बार द्रुपद देश की राजकुमारी व युधिष्ठिर की पत्नी द्रौपदी श्रीकृष्ण की नगरी द्वारिका आई हुई थी । द्रौपदी श्रीकृष्ण की मुँहबोली बहन थी। जब द्रौपदी द्वारिका आई हुई थी तो उनकी भेंट लक्ष्मणा से हुई। लक्ष्मणा श्रीकृष्ण की छठी पत्नी थी जिनके विवाह का प्रसंग भी बहुत रोचक है।

श्रीकृष्ण – लक्ष्मणा का विवाह

लक्ष्मणा मद्र-देश के शक्तिशाली और प्रतापी राजा बृहत्सेन की पुत्री थी। उनको माद्री व् मद्रा नाम से भी पुकारा जाता था। लक्ष्मणा अद्भुत सौंदर्य और सर्वगुणों से संपन्न थी। उनकी सुन्दरता और स्वभाव की कीर्ति हजारों मीलों तक फैली हुई थी। हर राज्यके राजा और राजकुमार लक्ष्मणा के दर्शन करना चाहते थे और उनको अपनी रानी बनाना चाहते थे।

हरिवंश पुराण में लक्षमणा को चारुहंसनि कहा गया है जिसका अर्थ है कि, उनकी प्यारी सी मुस्कान तीनों लोकों के समस्त हृदयोंको जीतनेका सामर्थ्य रखती थी।

मद्रराज्य में नारद मुनि का आना जाना रहता था। नारद मुनि भगवान विष्णु का गुणगान गाया करते और उनके सौंदर्य, वीरता और धर्म-कर्म के रोचक क़िस्सों को सुनाया करते थे। जब नारद मुनि ने उन्हें बताया कि श्रीकृष्ण जी भगवान नारायण के अवतार हैं तो यह जानकर लक्ष्मणा मन ही मन श्रीकृष्ण से प्रेम करने लगी। उम्र के साथ साथ उनका प्रेम बढ़ता चला गया।

बृहत्सेन ने लक्ष्मणाको बड़े ही प्यार और नाजों से पाला था। जिस प्रकार हर पिता अपनी लाड़ली बेटी को एक सर्वश्रेष्ठ वर ढूंढ़ना चाहता है, ठीक उसी तरह राजा बृहत्सेन भी लक्ष्मणा के लिए सर्वश्रेष्ठ वर चाहते थे। इस कठिन चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने लक्ष्मणा का कठिन स्वयंवर* रचा।

तो हम बता रहे थे कि जब द्रौपदी द्वारिका आई हुई थी तो उनकी भेंट लक्ष्मणा से हुई। श्रीमदभगवत गीता के इस प्रसंग में लक्ष्मणा अपने स्वयंवर का रोचक प्रसंग द्रौपदीजी को सुना रही हैं। उनका वार्तालाप इस प्रकार से है ।

ज्ञात्वा मम मतं साध्वि पिता दुहितृवतसल्य: ।
बृहत्सेन इति ख्यातस्तत्रोपायंचीकरत ॥ŚB 10.83.18॥

लक्ष्मणा कहती है, मेरे पिता बृहत्सेन स्वभाव से ही मुझ यानि अपनी बेटी पर दयालु थे और वह मेरे मन की बात जानते थे, इसलिए मेरे हित के लिए, हे साध्वी (द्रौपदी )! उन्होंने मेरी इच्छा को पूरा करने की व्यवस्था की।

यथा स्वयंवर राज्ञि मत्स्य: पार्थेप्सया कृत:
अयं तु बहिराच्छन्नो दृश्यते स जले परम् ॥19॥

हे रानी! जैसे कि आपके स्वयंवर में एक मछली का उपयोग किया गया था ताकि अर्जुन उसको भेद कर आपको प्राप्त करे, इसी तरह मेरे स्वयंवर में भी एक मछली इस्तेमाल की गई थी। हालाकिं इसे चारों ओर से ढका गया था और केवल इसके प्रतिबिम्ब को नीचे पानी के बर्तन में देखा जा सकता था।

श्रुत्वैतत् सर्वतो भूपा आययुर्मत्पितु: पुरम् ।
सर्वास्‍त्रशस्‍त्रतत्त्वज्ञा: सोपाध्याया: सहस्रश: ॥ 20 ॥

यह सुन कर हजारों की संख्या में धनुष-बाण चलाने वाले दक्ष राजा महाराजा, और अन्य हथियार चलाने और बनाने वाले भी अपने आचार्यों के साथ चारों दिशाओं से मेरे पिता के राज्य में आये।

पित्रा सम्पूजिता : सर्वे यथावीर्य यथावय:
आददु सशरं चापं वेध्दुम पर्षदि मध्दिय:॥ 21 ॥

अर्थात मेरे पिता ने प्रत्येक राजा को उसकी शक्ति और वरिष्ठता के अनुसार उचित सम्मान दिया। फिर जिन लोगों का मन मुझ पर स्थिर था, उन्होंने धनुष और तीर उठाया और एक एक करके सभा के बीच में लक्ष्य भेदने की कोशिश की।

आदाय व्यसृजन् केचित् सज्यं कर्तुमनीश्वरा: ।
आकोष्ठं ज्यां समुत्कृष्य पेतुरेकेऽमुना हता: ॥ २२ ॥

उनमें से कुछ ने धनुष उठाया लेकिन इसे प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सके इसलिए उन्होंने निराशा में एक तरफ फैंक दिया। कुछ लोग प्रत्यंचा को धनुष की नोक की ओर खींचने में कामयाब रहे, लेकिन हाथ छूटने पर धनुष ने उन्हें जमीन पर पटक दिया।

सत्यं कृतवापरे वीरा मगधम्बष्ठचेदिया:
भीमो दुर्योधन: कर्णों नाविद्सतदवस्थितिम॥ 23 ॥

जरासंध, शिशुपाल, भीम, दुर्योधन, कर्ण** और अम्बाह के राजा – ये कुछ योद्धा धनुष पर बाण चढ़ाने में सफल रहे, लेकिन उनमें से कोई भी लक्ष्य नहीं प्राप्त सका। (ये राजा शारीरिक रूप से बहुत मजबूत थे, लेकिन वे इतने निपुण नहीं थे कि वे लक्ष्य को पा सकें)

मत्स्य भासं जले वीक्ष्य ज्ञात्वा चतदस्थिति
पार्थे यतोअसृजद बाणं नाच्छिन्त पस्पृशे परमे॥ 24 ॥

तब अर्जुन ने पानी में मछली के प्रतिबिम्ब को देखा और इस पर निशाना साधा। जब उसने ध्यान से अपने तीर को छोड़ा तो तीर ने लक्ष्य को नहीं भेदा बल्कि उसे हल्का-सा छू कर निकल गया।

श्रीधर महाराज की व्याख्या के अनुसार यद्यपि अर्जुन अन्य राजाओं की तुलना में अधिक दक्ष तीरंदाज़ थे लेकिन उनकी शारीरिक शक्ति इस कार्य को पूरी सटीकता के साथ करने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

राजन्येषु निवृत्तेषु भग्नमानेषु मानिषु ।
भगवान् धनुरादाय सज्यं कृत्वाथ लीलया ॥ २५ ॥
तस्मिन् सन्धाय विशिखं मत्स्यं वीक्ष्य सकृज्जले ।
छित्त्वेषुणापातयत्तं सूर्ये चाभिजिति स्थिते ॥ २६ ॥

जब सारे दंभी राजाओं ने हार मान ली और उनका गर्व चूर-२ हो गया तो उस देवत्व और सर्वोच्च व्यक्तित्व ने धनुष उठाया, आसानी से प्रत्यंचा चढ़ाई और उस पर अपना तीर लगाया। जैसे ही सूर्य अभिजीत नक्षत्र से गुजरा, उन्होंने (श्रीकृष्ण ने) मछली को केवल एक बार पानी में देखा और फिर उसे तीर से भेद कर जमीन पर ला पटका।

(प्रत्येक दिन सूर्य एक बार चंद्र नक्षत्र अभिजीत से होकर गुजरता है, जो विजय के लिए सबसे शुभ माना जाता है। जैसा कि श्रीविष्णुनाथ चक्रवर्ती द्वारा बताया गया है, इस दिन अभिजीत का मुहूर्त खड़ी दोपहर के समय आया जिससे लक्ष्य को देखने में और भी कठिनाई हुई होगी। इससे भगवान कृष्ण की महानता का ही पता चलता है।)

आगे लक्ष्मणा द्रौपदी को बताती है कि,

दिवि दुन्दुभ्यो नेवुर्जय शब्दयुता भुवि।
देवाश्च कुसुमसरान मुमुचुरहरषविछला :॥ 27 ॥

अर्थात, ढोल नगाड़े बजने लगे और आसमान नगाड़ों की आवाज से गूंजने लगा। लोग जोर-जोर से जय हो ! जय हो ! कहकर लोग चिल्लाने लगे। आसमान से देवता लोग फूलों की बारिश करने लगे।

मेरे द्वारा सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण को चुनने से वहां उपस्थित कई राजा लिप्सा और ईर्ष्या से भरकर झगड़ालू हो गए। वह राजा श्री कृष्ण द्वारा मुझे अपने सोने के रथ पर लेजाते हुए ऐसे देख रहे थे जैसे जंगल के जानवर एक सिंह को भयातुर और क्रोधित होकर देखते हैं।

गाँव से शिकार करके निकलते सिंह के पीछे जैसे कुत्ते पीछे-२ चलते हैं, वैसे ही कुछ राजाओं ने भगवान कृष्ण का पीछा किया तो कुछ ने मार्ग में उनको रोकने की भी चेष्टा की। लेकिन उनके धनुष “सारंग” से निकले बाणों ने उनके कुत्सित इरादों और शरीरों को छिन्न-भिन्न कर दिया और वे बाणों से बिंधे धरती पर लोटते नज़र आए।

इस प्रकार श्रीलक्ष्मणा और द्रौपदी के मध्य हुए वार्तालाप से प्रामाणित होता है कि महाभारत के समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण थे। हालाँकि उन्होंने युद्ध में धनुष-कला का अधिक उपयोग नहीं किया क्योंकि उनके पास इससे भी घातक और अचूक अस्त्र सुदर्शन-चक्र था।

* – स्वयंवर प्राचीन काल की एक विवाह प्रथा थी जिसमें वधू को मनचाहा वर चुनने का अवसर दिया जाता था। स्वयंवर में वर प्रतिभागी एक निश्चित प्रतियोगिता में हिस्सा लेते थे और वधू प्रतियोगिता जीतने वाले के गले में वरमाला डालकर उसको अपना वर स्वीकार करती थी।
** – कुछ बुद्धिजीवी कर्ण को महाभारत काल का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर मानते हैं लेकिन महाभारत को अच्छे से जानने वाले जानते हैं कि कर्ण कई बार अर्जुन से आमने-सामने की लड़ाई में हार चुके थे। कुछ लोग तो कर्ण की बड़ाई को लेकर यहाँ तक मानते हैं कि द्रौपदी का पहला प्रेम कर्ण थे न कि अर्जुन। हालाँकि उनके पास प्रस्तुत करने के लिए कोई साक्ष्य भी नहीं है। लेकिन हमारे पास ऐसे ओछे लेखकों के लिए प्रमाण सहित एक उत्तर है  प्रमाण सहित: क्या सचमुच में कर्ण से प्रेम करती थीं द्रौपदी?? जिसे आप इस लेख के माध्यम से पढ़ सकते हैं।

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