OMG : गले लगाने के इतने सारे फायदे!

अक्सर हम सभी अपने दोस्तों या करीबियों को खुशी या गम के मौके पर गले लगाते हैं। गले लगाने से हमें इमोशनली सपोर्ट मिलता है। लेकिन साथ ही यह हमारे तनाव को भी कम करता है। गले लगाना एक सुकून भरा एहसास है।

स्टडी के अनुसार आप जिस व्यक्ति के सबसे ज़्यादा करीब होते हैं, उससे 20 सेकंड का हग आपकी सभी समस्याओं को हल कर सकता है। यकीन नहीं हो रहा न, लेकिन ये सच है। तो चलिए जानते हैं गले लगाने के फायदों के बारे में:

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गले लगाने के फायदे

  • कई रिसर्च में भी पाया गया है कि जब दो लोग एक दूसरे को गले लगाते हैं तो दोनों के शरीर में ऑक्सिटोसिन रिलीज होता है। जिससे हम रिलैक्स महसूस करते हैं। यही वजह है कि प्यार जताने के लिए हग करना एक कारगर तरीका माना गया है।
  • शोध बताते हैं इसे लव हार्मोन के रूप में भी जाना जाता है, यह एक अच्छे मूड को बढ़ावा देता है और अकेलेपन की भावना को कम करता है।
  • नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी की रिसर्च बताती है कि इससे दिल की धड़कन सामान्य हो जाती है। रिसर्च के मुताबिक 10 मिनट तक हाथ पकड़ने से लेकर 20 सेकंड तक हग करने से ऑक्सीजन और ब्लड सर्कुलेशन एकदम सही रहता है। गले लगाने से ब्लड सर्कुलेशन में तेजी आती है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह सही रहता है।
  • स्टडी के मुताबिक अपने करीबी को गले लगाने से आपका डर भी काफी कम हो जाता है। जब आपको बहुत अधिक आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है तो आपको अपने पार्टनर को गले लगाना चाहिए, यह आत्मविश्वास बढ़ाने का एक शानदार तरीका है।

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  • गले लगाने से प्यार का अहसास होता है। जब आप किसी के गले लगते है तो इससे मूड भी बूस्ट होता है। रूठे हुए को गले लगाने से गिले शिकवे भी दूर हो जाते हैं और रिश्ते में खुशियां आ जाती हैं। 5-10 सेकेंड तक हग करने से मूड रिफ्रेश हो जाता है और दिमाग काफी फ्रेश महसूस करने लगता है।

आर्थिक लाभ चाहते हैं तो घर में जरूर लेकर आएं फेंगशुई कछुआ

फेंगशुई चीन का वास्तु शास्त्र है। इस में भवन निर्माण और भवन में रखी जाने वाली पवित्र वस्तुओं के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है। फेंग और शुई का शाब्दिक अर्थ है वायु और जल। यह शास्त्र भी पंचतत्वों पर ही आधारित है।

वास्तु शास्त्र की ही तरह फेंगशुई में भी घर और आस-पास की चीजों के बारे में बताया जाता है। इसमें उन चीजों के बारे में बताया जाता है जिन्हें घर पर रखने से गुड लक आ सकता है।

फेंगशुई के अनुसार किसी भी घर में ‘ची’ अर्थात् ‘प्राण ऊर्जा’ का प्रवेश तभी होगा जब उसका मुख्य द्वार सही होगा। फेंगशुई द्वारा बताए गए विभिन्न उपायों को अपनाकर सौभाग्य की प्राप्ति की जा सकती है।

फेंगशुई में कछुए का विशेष महत्व माना गया है। घर या ऑफिस में कछुआ रखना बहुत ही शुभ माना जाता है। यह कछुआ धन के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है।

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हम आज कई घरों और कई जगहों पर फेंगशुई के कछुए का इस्तेमाल देख सकते हैं। वास्तु शास्त्र की तरह फेंगशुई में भी बताया गया है कि घर में रखी चीजों का प्रभाव लोगों के जीवन पर भी पड़ता है।

फेंगशुई के अनुसार कुछ चीजें घर में सकारात्मक ऊर्जा का वातावरण बनाती हैं। कछुआ उनमें से एक है। हिंदू धर्म में कछुए को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जहां कछुआ होता है, वहां लक्ष्मी का आगमन होता है।

कछुआ जिन घरों में रहता है वहां धन, वैभव और ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं होती है, लेकिन इसे रखने के कुछ नियम होते हैं, जिन्हें जानना बेहद जरुरी है। आज इस पोस्ट में हम इन्हीं नियमों के बारे में बताने जा रहे हैं, तो चलिए जानते हैं:

कार्यों में सफलता

फेंगशुई में कहा गया है कि घर या ऑफिस में कछुआ रखना शुभ होता है, लेकिन इसे रखने के कुछ खास नियम हैं, जिनका पालन करना बेहद जरूरी है। फेंगशुई में कछुए को निश्चित स्थान पर रखना चाहिए।

दिशा और स्थिति के आधार पर इसे रखना सबसे अच्छा होता है। फेंगशुई में कछुए को सकारात्मक ऊर्जा और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है। घर या ऑफिस में फेंगशुई का कछुआ रखा जाए तो मान-सम्मान बढ़ता है और करियर में तरक्की होती है।

जिन लोगों ने नया व्यापार शुरू किया है उन्हें अपने ऑफिस या दुकान में चांदी का फेंगशुई कछुआ रखना चाहिए। यह बहुत शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इसे रखने से व्यापार तेजी से बढ़ता है।

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नियम

  • यदि उत्तर दिशा में फेंगशुई कछुआ रखा जाए तो धन लाभ होता है और शत्रुओं का नाश होता है।
  • व्यापारियों को अपनी दुकान के मुख्य द्वार पर कछुए का चित्र लगाना चाहिए। ऐसा करने से धनलाभ मिलता है और रुके हुए काम जल्दी होने लगते हैं। परिवार में शांति बनी रहती है। यह घर की नकारात्मक उर्जा भी दूर करता है।
  • घर में कोई व्यक्ति यदि रोग ग्रस्त है तो घर की दक्षिण-पूर्व दिशा में कछुआ स्थापित करना चाहिए। कछुआ किसी भी धातु, कांच, मिट्टी, क्रिस्टल या लकड़ी से बना हो सकता है। ये जीवन में शांति, सद्भाव, दीर्घायु और पैसा प्रदान करता है।
  • घर या दफ्तर के पूर्वोत्तर या दक्षिण-पश्चिम दिशा में मिट्टी से बने कछुए रखें, यह शुभ परिणाम देगा।
  • फेंगशुई के अनुसार यदि आप लकड़ी से बना हुआ कछुआ लाते हैं तो उसे पूर्व दिशा या दक्षिण-पूर्व में रखा जाना चाहिए। यह आपको अवश्य सफलता दिलाएगा।
  • यदि करियर में तरक्की चाहते हैं, तो काले रंग के कछुए को अपने कार्य स्थल की उत्तर दिशा में रखें।

इन मंदिरों की वजह से दुनिया भर में मशहूर है मैक्लॉडगंज

घूमने फिरने का शौकीन तो हर कोई होता है नई जगह देखना किसे पंसद नहीं होता ऐसे में अगर बात हिमाचल में घूमने की हो तो सबसे पहले दिमाग में ख्याल मंदिरों का आता है।

हिमाचल में बहुत से धार्मिक स्थल हैं। आज की इस पोस्ट में हम आपको मैक्लॉडगंज जो कि एक हिल स्टेशन है के प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं, तो चलिए शुरू करते हैं:

धर्मशाला के इस लोकप्रिय हिल स्टेशन को लिटिल ल्हासा या ढासा के नाम से भी जाना जाता है। मैक्लॉडगंज वह जगह है, जहां पर 1959 में बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा अपने हजारों अनुयाइयों के साथ तिब्बत से आकर बसे थे। यह स्थान विशेष रूप से दलाई लामा मंदिर या सुगलगखंग मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।

तिब्बत की राजधानी ल्हासा की तर्ज पर इस जगह को मिनी ल्हासा भी कहा जाता है। यहां की सबसे मशहूर जगह दलाई लामा का मंदिर और उस से सटी नामग्याल मोनेस्ट्री है।

प्रकृति प्रेमी, ट्रेकर्स और शांति चाहने वालों को यह स्थान पसंद आएगा। यहां आपको नामग्याल मठ, नेचुंग मठ, नड्डी व्यूपॉइंट और मिनिकियानी पास जैसी कई अद्भुत आकर्षक जगहों पर घूमने का मौका मिलेगा।

दलाई लामा मंदिर

Dalai-Lama-Temple

यहां का सबसे प्रमुख आकर्षण दलाई लामा का मंदिर है जहां शाक्य मुनि, अवलोकितेश्वर एवं पद्मसंभव की मूर्तियां विराजमान हैं। नामग्याल मोनेस्ट्री भी मशहूर है। यहां भारत और तिब्बत की संस्कृतियों का संगम देखने को मिलता है।

तिब्बती संस्कृति और सभ्यता को प्रदर्शित करता एक पुस्तकालय भी स्थित है। मार्च से जुलाई के बीच यहां ज्यादा संख्या में सैलानी आते हैं। इन दिनों यहां का मौसम बेहद सुकून भरा होता है।

प्राचीन भागसूनाग मंदिर

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देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश के मनोहारी पर्यटक स्थल धर्मशाला के ऊपरी हिस्से मैक्लॉडगंज से भी करीब दो किलोमीटर ऊपर है प्राचीन मंदिर भागसूनाग है।

मेकलॉडगंज के आस-पास बने मंदिर लोगों को खासे आकर्षित करते हैं। यहां से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर भागसूनाग मंदिर स्थित है। यह भव्य तो नहीं, लेकिन प्रसिद्ध जरूर है।

ये 5 फूड आइटम्स न सिर्फ इम्युनिटी के लिए अच्छे हैं बल्कि तेजी से वजन घटाने में भी मदद करते हैं

सर्दी का मौसम आ चूका है और इस मौसम में तापमान के नीचे जाते ही लोगों को कई तरह की परेशानियां होने लगती हैं। इनमें से सबसे आम है खांसी, जुकाम, बुखार। ये तभी होता है जब हमारी इम्युनिटी कमजोर होती है।

ऐसे में डायट में बदलाव जरूरी है। हमारी रसोई में आसानी से मिलने वाली कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो हमारी इम्युनिटी के साथ साथ वजन घटाने में भी मदद करती हैं।

इस पोस्ट में हम आपको घर में आसानी से मिलने वाली चीज़ों से होने वाले डबल फायदे के बारे में बताने जा रहे हैं तो चलिए शुरू करते हैं :

दालचीनी

Cinnamon

आयुर्वेद में दालचीनी का उपयोग इसके कीटाणुनाशक, जलनरोधी और जीवाणुरोधी गुणों के लिए किया जाता है। जब वजन घटाने की बात आती है, तो यह मीठा सुगंधित मसाला चयापचय को बढ़ाता है, रक्त शर्करा के स्तर और कोलेस्ट्रॉल को कम करता है।

सुबह सबसे पहले दालचीनी का पानी पीने से भूख कम करने, खराब कोलेस्ट्रॉल कम करने और चयापचय को बढ़ावा देने में मदद मिलती है।

काली मिर्च

Black pepper

आयुर्वेद के अनुसार काली मिर्च वजन घटाने के लिए एक असरदार एजेंट मानी जाती है। यह शरीर में अवरोधों को कम करता है, चयापचय को उत्तेजित करते हुए परिसंचरण और पाचन में सुधार करता है। यह शरीर को डिटॉक्स करने में भी मदद करता है और वसा को जमा होने से रोकता है।

अदरक

Ginger

आयुर्वेद का यह जादुई मसाला मेटाबोलिज्म को 20 प्रतिशत तक बढ़ा देता है, आंत के स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद करता है, वसा को पिघलाता है और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है।

इसके एंटीऑक्सीडेंट और जलनरोधी गुण पाचन में मदद करते हैं, जबकि इसके भूख को कम करने वाले गुण यह सुनिश्चित करते हैं कि आप अपनी पसंदीदा चीजों को नहीं खाएंगे। इस मसाले का नियमित सेवन न केवल वजन कम करने में मदद कर सकता है बल्कि समग्र स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है।

नींबू

Lemon

नींबू में उच्च मात्रा में विटामिन सी और घुलनशील फाइबर होते हैं जो उन्हें कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं। नींबू आपके हृदय रोग, एनीमिया, गुर्दे की पथरी, पाचन संबंधी समस्याओं और कैंसर के जोखिम को कम कर सकता है। नींबू को खाने में शामिल करना न सिर्फ इम्युनिटी को बढ़ता है बल्कि तेजी से वजन घटाने में मदद करता है।

शहद

Honey

सोने से ठीक पहले शहद का सेवन करने से नींद के शुरुआती घंटों में अधिक कैलोरी बर्न करने में मदद मिल सकती है। शहद में आवश्यक हार्मोन भूख को दबाते हैं और बहुत आसान तरीके से वजन घटाने में सहायता करते हैं।

यह पेट की चर्बी को कम करने में भी मदद करता है, जो हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर के बढ़ते जोखिम से जुड़ा हुआ है।

क्या है एड्स होने के कारण और बचाव के तरीके

‘विश्व एड्स दिवस‘ पूरी दुनिया में 1 दिसंबर को मनाया जाता है। एड्स विश्व की पहली ऐसी बीमारी थी जिसके लिए सन् 1988 में पूरी दुनिया ने एक साथ होने के लिए 1 दिसंबर का चुना।

AIDS को शुरुआत में होमोसेक्सुअल आदमियों की एक बीमारी समझा जाता था। इस बीमारी को AIDS नाम सन 1982 में मिला था।

अमेरिकन हेल्थ और ह्यूमन विभाग ने 29 अप्रैल 1984 को AIDS होने के कारण के तौर पर ‘रेट्रोवायरस‘, जिसे बाद में HIV (Human Immunodeficiency Virus) नाम दिया गया।

WHO (World Health Organization) की एक रिपोर्ट के अनुसार इस बीमारी का पहला केस 1981 में सामने आया था और तब से लेकर अब तक करीब 39 मिलियन लोग इस बीमारी का शिकार हो चुके हैं।

वैज्ञानिकों दवारा भी अनेक खोजें और सालों से चल रही रिसर्च से भी इस बीमारी का कोई इलाज नहीं निकला।

बचाव ही उपचार है: विश्व एड्स दिवस पर सभी लोगों के लिए एक मौका है कि हम एचआईवी एड्स के बारे में जानें व इस लाइलाज बीमारी के बारे में लोगों को जागरूक करें। जिससे इस खतरनाक बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सके।

एड्स फैलने के कारण

  • असुरक्षित यौन संबंध इसका सबसे प्रमुख कारण है, इससे एड्स के वायरस एड्स ग्रस्त व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में तुरंत प्रवेश कर जाते हैं।
  • बिना जाँच किया गया खून मरीज को देना भी एड्स फैलने का माध्य होता है। खून के द्वारा इसके वायरस सीधे दूसरे व्यक्ति के खून में पहुँच जाते हैं और बीमारी जल्दी घर कर लेती है। आज के समय में एड्स जाँच केन्द्र देश के गिने-चुने स्थानों पर ही हैं, कितने लोग अपना टेस्ट करवा कर खून दान करते होंगे?
  • नशीले पदार्थ लेने वाले लोग भी एड्स ग्रस्त होते हैं, वे एक-दूसरे की सिरींज-निडिल का इस्तेमाल करते हैं, उनमें कई एड्स पीड़ित होते हैं और बीमारी फैलाने का एक कारण बनते हैं।
  • यदि माँ एड्स से संक्रमित है, तो होने वाला शिशु भी संक्रमित ही पैदा होता है। इस प्रकार ट्रांसप्लांटेशन संक्रमण से भी एड्स लगभग 60 प्रतिशत तक फैलता है। बाकी बचा 40 प्रतिशत माँ के दूध से शिशु में पहुँच जाता है।

 लक्षण

  • एड्स के कोई खास लक्षण नहीं होते, सामान्यतः अन्य बीमारियों में होने वाले लक्षण ही होते हैं, जैसे- वजन में कमी होना, 30-35 दिन से ज्यादा डायरिया रहना, लगातार बुखार बना रहना प्रमुख लक्षण होते हैं।
  • एचआईवी नामक वायरस सीधे श्वेत कोशिकाओं को कमज़ोर कर शरीर के अंतस्थ में उपस्थित आनुवंशिक तत्व डीएनए में प्रवेश कर जाता है, जहाँ ये कई गुना बढ़ जाते है। इन विषाणुओं की बढ़ती हुई संख्या दूसरी श्वेत कणिकाओं को कमज़ोर करती है।

एड्स से सुरक्षा

यदि देखा जाए तो एचआईवी से बचाव बहुत आसान है। केवल इससे समझने की जरूरत है जैसे :-

  • अपने पार्टनर या जीवनसाथी के प्रति वफादार रहें।
  • असुरक्षित तथा अवैध यौन संबंधों से बचें।
  • आप यदि अपने पार्टनर के अलावा किसी और के साथ यौन सम्बन्ध रखते है तो नॉनक्सीनल-9 युक्त कंडोम का इस्तेमाल करें।
  • यदि आप को कभी लगे की आपको किसी प्रकार की बीमारी या रोग हो गया है तुरंत जांच कराएं, फिर पूरा इलाज करवाएं।
  • हमेशा डिस्पोजेबल सिरींज व सुइयों का इस्तेमाल करें, किसी भी सुई को एक बार इस्तेमाल करने के बाद दोबारा प्रयोग में न लाया जाए।
  • यदि किसी को खून चढ़ाने की जरूरत पड़ जाए, तो खून चढाने से पहलेखून की एचआईवी जांच करवा लें, और जब यह रिपोर्ट न आ जाए उसके बाद ही खून किसी दूसरे के शरीर में चढ़ाये।

दवाएं

  • यह बीमारी हो जाने पर इससे छुटकारा पाने लिए कुछ ऐसी दवाएं बनाई गई है, जिससे इस बीमारी की रोकथाम की जा सकती है, हालाँकि अभी तक ऐसी कोई दवाई नहीं बनी है, जिससे इस बीमारी को पूरी तरह से ख़त्म किया जा सके।
  • एड्स का इलाज समय रहते अगर करवा दिया जाये तो इसकी रोकथाम की जा सकती है, ज्यादा देरी होने पर इलाज संभव नहीं होता। इसका मुख्य कारण यह भी है की इसकी दवाइयां बहुत महंगी होती है।
  • एड्स को रोकने के लिए कुछ ऐसी दवाएं बनाई गई हैं जो इस वायरस की बढ़ती गति को कम कर सकें। इसके इलाज के लिए मरीज़ डॉक्टर से सलाह करके दवाइयों का सेवन करें।

प्राचीन हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार 10 शक्तिशाली हथियार जिनके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे

हम बचपन से ही हिंदू पौराणिक कथाएं सुन कर बड़े हुए हैं। इनमें वीर योद्धाओं की गाथाएं, शानदार उपदेश, देवताओं और असुरों के बीच लड़ाई का ज़िक्र मिलता है।

देवी-देवताओं से जुड़ी कहानियां ज्यादातर बुराई पर अच्छाई की जीत के बारे में होती हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं में लड़ाइयों का चित्रण बहुत विस्तृत है।

देवों, देवियों और असुरों से जुड़ी कहानियाँ युद्ध और संघर्षों से भरी हैं। महाभारत व् अन्य युद्धों में उपयोग किए जाने वाले 1000 से अधिक प्रकार के हथियार हैं। हथियार अलग-अलग कहानियों में अलग-अलग होते हैं जो शक्तिशाली लड़ाइयों के समान रोमांचकारी भी होते हैं।

इस पोस्ट में हम 10 शक्तिशाली हथियारों के बारे में बताने जा रहे हैं :-

त्रिशूल

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भगवान शिव द्वारा चलाया जाने वाला तीन भाले वाला हथियार “त्रिशूल” सबसे शक्तिशाली हथियारों में से एक है जिसे शिव स्वयं नियंत्रित कर सकते हैं। शिव को छोड़कर कोई अन्य इस त्रिशूल को रोक या नियंत्रित नहीं कर सकता। यह त्रिशूल किसी भी अलौकिक हथियार को समाप्त कर सकता है।

पाशुपतास्त्र

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार पाशुपतास्त्र भगवान शिव और भगवान विष्णु के हथियारों के बाद सबसे शक्तिशाली हथियार है। ये सबसे ताकतवर और विनाशकारी हथियार है। महाभारत महाकाव्य में अर्जुन ने इसे भगवान शिव से प्राप्त किया था, लेकिन कभी भी उपयोग में नहीं आया।

सुदर्शन चक्र

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भगवान विष्णु की तर्जनी पर देखा जाने वाला 108 नुकीले किनारों वाला घूमता हुआ डिस्क जैसा हथियार सुदर्शन चक्र है। इसे अज़वार के नाम से भी जाना जाता है।

यह सूर्य की किरणों के अंश और शिव के त्रिशूल से बना है। देवताओं के वास्तुकार विश्वकर्मा द्वारा निर्मित किया गया यह अस्त्र भगवान शिव ने विष्णु को उपहार में दिया था।

ब्रह्माण्ड अस्त्र

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ये भगवान ब्रह्मा द्वारा बनाया गया दूसरा शक्तिशाली हथियार है। ऐसा माना जाता है कि इसमें ब्रह्मा के चार सिर होते हैं, जो हिंदुओं के चार पवित्र ग्रंथ वेद के प्रतीक हैं। कहते हैं इस हथियार का इस्तेमाल भारी तबाही लाता है।

ये हथियार ब्रह्मास्त्र को निगल भी सकता है और इसे बेअसर कर सकता है। कहा जाता है कि विश्वामित्र के सभी दैवीय हथियारों के हमले के बचाव में ब्रह्मऋषि वशिष्ठ ने इसका इस्तेमाल किया था।

ब्रह्मशिरा

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इसे ब्रह्मास्त्र से भी 4 गुना ज्यादा घातक माना जाता है। ब्रह्मशिरा का उपयोग करने पर बड़े पैमाने पर विनाश हो सकता है और यह भूमि को दशकों तक बंजर बना सकता है।

रामायण में, इंद्रजीत (मेघानंद) ने इसका इस्तेमाल 670 मिलियन वारनों को मारने के लिए किया था। महाभारत युद्ध में अश्वत्थामा ने इस अस्त्र का प्रयोग किया था।

भार्गवस्त्र

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भार्गवास्त्र भगवान् विष्णु के अवतार परशुराम द्वारा बनाया गया अस्त्र था उनके आलावा भार्गवास्त्र को अन्य कोई योद्धा नहीं चला सकता था। जब कर्ण ने परशुरामजी से शिक्षा प्राप्त कर ली थी तो इस शिक्षा के दौरान परशुराम ने कर्ण को परशु (शस्त्र) को छोड़ अपने सभी अस्त्र सिखाये थे जिनमें भार्गवास्र भी शामिल था। यह अस्त्र इतना शक्तिशाली है कि इंद्रास्त्र से भी अधिक शक्तिशाली अस्त्रों को परास्त कर सकता है।

नारायणास्त्र

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नारायण अस्त्र हिंदू पौराणिक कथाओं के सबसे घातक और शक्तिशाली हथियारों में से एक है, जिसका इस्तेमाल भगवान विष्णु ने अपने नारायण अवतार में किया था। नारायणास्त्र जब उपयोग किया जाता है, तो लाखों तीर बनते हैं और एक डिस्क जैसा हथियार होता है। जिसे बहुत विनाशकारी माना जाता है।

वज्रायुध

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वज्रायुध या वज्र भगवान इंद्र का व्यक्तिगत हथियार है, जिससे बिजली निकलती थी। इसका निर्माण महर्षि दधिची की अस्थियों से किया गया था। इस अस्त्र का उपयोग का करके ही देवराज इंद्र ने वृत्रासुर नामक दैत्य का वध किया था।

तीन बान

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ये महाभारत के योद्धा और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने भगवान शिव से वरदान में प्राप्त किए थे। ये बेहद शक्तिशाली हथियार था। कहते हैं इन बाणों के सहारे बर्बरीक महज़ एक मिनट में महाभारत का युद्ध ख़त्म कर सकते थे। मगर भगवान श्रीकृष्ण के चलते ऐसा नहीं हो पाया था।

ब्रह्मास्त्र

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ब्रह्मास्त्र हिंदू लोककथाओं में मौजूद घातक हथियारों में से एक है। कहा जाता है कि ब्रह्मास्त्र अत्यधिक एकाग्रता और ध्यान के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है या केवल एक गुरु द्वारा दिया जा सकता है।

ये बहुत विनाशकारी हो सकता है और साथ ही ये रक्षा में अन्य अलौकिक हथियारों का मुकाबला कर सकता है। इसका संचालन अलौकिक मंत्रो के साथ किया जाता था।

कहते हैं इस हथियार का इस्तेमाल विश्वामित्र ने वशिष्ठ के खिलाफ, श्रीराम ने रावण के खिलाफ और अर्जुन ने अश्वत्थामा के खिलाफ किया था।

क्यों लगाया जाता है माथे पर तिलक, क्या है इसका महत्व?

सनातन धर्म में पूजा-पाठ के बाद माथे पर तिलक लगाने का बड़ा महत्व है। प्रत्येक देवता के लिए अलग-अलग रूपों में तिलक का प्रयोग किया जाता है। भगवान विष्णु की पूजा में पीले चंदन का तिलक लगाया जाता है और भगवान महादेव की पूजा में भस्म का तिलक लगाया जाता है।

पूजा पाठ में जिस चंदन या कुमकुम से देवताओं का श्रृंगार किया जाता है, उसका तिलक हम बाद में प्रसाद के रूप में लगाते हैं। इस पोस्ट में जानेंगे कि क्यों लगाया जाता हैं तिलक और क्या है इसका धार्मिक महत्व, चलिए शुरू करते हैं:

नियम

प्रतिदिन प्रात:काल उठकर स्नान आदि करके घर के पूजा स्थान पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके दोनों भौंहों के बीच तिलक लगाना चाहिए। तिलक हमेशा रिंग फिंगर से लगाना चाहिए। तिलक कभी भी अनामिका, मध्यमा या अंगूठे से नहीं लगाना चाहिए।

तिलक लगाने का अपना ही धार्मिक महत्व है। पूजा में प्रयोग होने वाला तिलक केवल माथे पर ही नहीं बल्कि सिर, गर्दन, दोनों भुजाओं, ह्रदय, नाभि, पीठ आदि पर भी लगाया जाता है। माथे पर तिलक लगाने से मन शांत और स्थिर रहता है। साथ ही हमें सकारात्मक ऊर्जा का अहसास होता है।

Why is Tilak applied on the forehead

प्रत्येक दिन के अनुसार किस प्रकार का तिलक लगाएं

  • सोमवार का दिन महादेव को समर्पित है। इस दिन महादेव के साथ चंद्र देव की भी पूजा की जाती है। इस दिन सफेद चंदन का तिलक लगाना चाहिए।
  • मंगलवार का दिन मारुति नंदन हनुमान जी को समर्पित है। इस दिन लाल चंदन का सिंदूर लगाना चाहिए।
  • प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी की कृपा पाने के लिए सिंदूर का तिलक लगाना चाहिए।
  • गुरुवार का दिन भगवान विष्णु को समर्पित है। भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए इस दिन पीले चंदन या केसर का तिलक लगाना चाहिए।
  • मां दुर्गा की कृपा पाने के लिए शुक्रवार के दिन रोली, लाल चंदन का तिलक लगाना चाहिए।
  • शनिवार का दिन शनि देव को समर्पित है। इस दिन शनिदेव की कृपा पाने के लिए भस्म का तिलक लगाएं।
  • रविवार के दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है। इस दिन उनकी कृपा पाने के लिए लाल चंदन या रोली का तिलक लगाना चाहिए।

ऐसा चमत्कारी मंदिर जहां शरीर पर मिट्टी लगाते ही दूर हो जाते हैं सारे रोग!

आपने बहुत से ऐसे देवी – देवताओं के मंदिर देखे होंगे, जिनमें तरह-तरह के देवी देवताओं की मूर्तियां रखी होती हैं। लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, जहाँ की केवल मिट्टी लगाने से ही सारे रोग दूर हो जाते हैं जी हाँ आज हम आपको इस पोस्ट में इसी चमत्कारी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, तो चलिए शुरू करते हैं:

कहाँ पर स्थित है ये मंदिर

दरअसल उत्तर प्रदेश हमीरपुर जिले के झलोखर गांव का प्राचीन मंदिर जो मां भुनेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर को भुइयांरानी के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर लाखों श्रद्धालुओं के आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है।

मंदिर के नाम पर यहां नीम के पेड़ के नीचे एक चबूतरा बना हुआ है और चबूतरे पर कुछ मूर्तियां रखी हुई हैं। लेकिन भक्तों की आस्था यहां की मिट्टी से जुड़ी है।

यहां के लोगों का मानना है कि इस स्थान की मिट्टी को पूरे शरीर में लगाने से हड्डी से जुड़े सारे रोग, यहां त​क कि गठिया की समस्या भी ठीक हो जाती है।

यहाँ के स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग 200 वर्ष पूर्व एक नीम के पेड़ से एक मूर्ती निकली थी जिसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आने लगे।

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लोगों ने यहाँ की मिट्टी को तिलक के रूप में लगाया तो उनके शरीर के सारे दर्द चमत्कारी रूप से दूर हो गए। बस यहीं से मां भुवनेश्वरी का चमत्कार शुरू हो गया था।

बताया जाता है कि गठिया रोग से पीड़ित लोगों को पहले मंदिर के पास बने सरोवर में स्नान करना पड़ता है, फिर मंदिर के पीछे नीम के पेड़ के नीचे पड़ी मिट्टी लगाकर लोग गठिया रोग से छुटकारा पाते हैं। इस सरोवर का इतिहास भी सैकड़ों साल पुराना है। यह सरोवर भीषण गर्मी में भी पानी से भरा रहता है।

मंदिर की मिट्टी के चमत्कार से वैज्ञानिक भी हैरान

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करें तो भुवनेश्वरी मंदिर की मिट्टी के जांच कई बार वैज्ञानिकों ने करनी चाही पर यह पता नहीं लगा सके कि इस मिट्टी में कौन ऐसे तत्व छिपे हैं जिसकी वजह से मिट्टी शरीर पर लगते ही सभी शारीरिक दर्द या कष्ट खत्म कर देती है।

 

जानिए अंजीर से होने वाले 5 स्वास्थ्य लाभ

सुपर फ्रूट फिग, जिसे हिंदी में अंजीर भी कहा जाता है, ताजा और सूखा दोनों तरह से खाया जा सकता है। अंजीर के पेड़ का भोजन और औषधीय दोनों के स्रोत के रूप में एक लंबा इतिहास रहा है।

अंजीर कैल्शियम, आयरन, पोटेशियम, मैग्नीशियम, विटामिन ए और विटामिन सी सहित कई आवश्यक पोषक तत्वों का एक बड़ा स्रोत है।

आज इस पोस्ट में हम आपको बताने जा रहे हैं अंजीर के 5 स्वास्थ्य लाभों के बारे में तो चलिए जानते हैं :

Fig health benefits

उच्च रक्तचाप में कमी

उच्च रक्तचाप से हृदय रोग और स्ट्रोक होने की सम्भावना रहती है। बहुत अधिक मात्रा में सोडियम खाना और शरीर को पर्याप्त पोटेशियम नहीं मिल पाना इसका एक कारण है।

अंजीर में भरपूर मात्रा में पोटेशियम होता है। इसके सेवन से उच्च रक्तचाप को नियंत्रित किया जा सकता है। अंजीर की उच्च फाइबर सामग्री शरीर को अतिरिक्त नमक से फ्लश करने में मदद करती है।

पाचन में सुधार करता है

फाइबर का सेवन बढ़ाने से डायरिया और कब्ज सहित कई तरह की पाचन समस्याओं में मदद मिल सकती है। फाइबर में उच्च होने के अलावा, अंजीर प्रीबायोटिक्स का एक बड़ा स्रोत है, जो पूरे पाचन तंत्र के स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है।

नींद में सुधार करता है

मेलाटोनिन नींद-जागने के चक्र को विनियमित करने के लिए जिम्मेदार है और अनिद्रा के उपचार में सहायता करता है। अंजीर मस्तिष्क में सेरोटोनिन के स्तर को भी बढ़ाता है जो तनाव और चिंता को कम करता है और आपकी नींद की गुणवत्ता को बढ़ाता है।

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बालों के विकास को बढ़ावा देता है

इस में विटामिन सी, मैग्नीशियम और विटामिन ई जैसे पोषक तत्व होते हैं। यह बालों के विकास को बढ़ाने में सहायक होते है। ये पोषक तत्व स्कैल्प में ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ावा देते हैं और बालों के विकास में तेजी लाने में मदद करते है।

कील-मुंहासों को दूर करता है

अध्ययनों से पता चला है कि अंजीर में मुंहासे रोधी गुण होते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, इस पौधे के फल और पत्तियों में मुंहासे रोधी गुण होते हैं जो लगभग जेनेरिक दवाओं के बराबर होते हैं।

माल्टीज़ नस्ल के कुत्ते होते हैं बेहद प्यारे जाने कैसे करें देखभाल

माल्टीज़ बहुत ही प्यारी नस्ल के कुत्ते होते हैं। इस नस्ल के कुत्तों को लोग अधिकतर स्टेटस सिंबल के तौर पर रखना पसंद करते हैं। माल्टीज़ नस्ल के कुत्तों की ऊंचाई ज्यादा नहीं होती है। इस नस्ल के कुत्ते “टॉय ब्रीड” के सबसे पुराने कुत्तों में से हैं।

इन कुत्तों की एक विशेषता इनके मुलायम बाल हैं। यह कुत्ते बहुत समझदार और सुरक्षात्मक होते हैं। यह नस्ल काफी साफ़ सुथरी होती है। इन्हें गंदगी बिल्कुल पसंद नहीं होती।

इनका इतिहास 2000 वर्षों से अधिक पुराना है। प्राचीन ग्रीस, रोम और मिस्र के कई लेखकों, चित्रकारों और कलाकारों ने अपने कामों में उनके नाम का इस्तेमाल किया, लेकिन इस कुत्ते की नस्ल की सटीक उत्पत्ति अज्ञात है।

कुछ लोगों का मानना है कि माल्टीज़ की उत्पत्ति एशिया में हुई थी। कुछ लोगों के अनुसार, इसकी उत्पत्ति भूमध्य सागर में आइल ऑफ माल्टा में हुई थी जबकि कुछ का मानना है कि कुत्ते का विकास इटली में हुआ था।

आज इस पोस्ट में हम जानेंगे माल्टीज़ डॉग ब्रीड की देखभाल कैसे करें:-

Maltese breed dogs are very cute, know how to care

इनका खान पान

माल्टीज़ को कितनी मात्रा में खिलाया जाना चाहिए यह कुत्ते की उम्र, गतिविधि स्तर और चयापचय पर निर्भर करता है। माल्टीज़ को अपने भोजन में बहुत अधिक पोषण की आवश्यकता होती है।

उसे वह भोजन खिलाना चाहिए जिसमें मांस प्राथमिक घटक के रूप में हो क्योंकि मांस प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत है जो विकास के लिए आवश्यक है। एक औसत माल्टीज़ कुत्ते के लिए अनुशंसित दैनिक मात्रा एक दिन में 1/4 से 1/2 कप उच्च गुणवत्ता वाला सूखा भोजन है।

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आकर एवं जीवन काल

एक मॉल्टीज डॉग की जीवन अवधि 12 से लेकर 15 साल तक की हो सकती है। नर मॉल्टीज का आकार 21-25 cm तक होता है जबकि मादा मॉल्टीज का साइज़ में 20-23 cm तक होता है। इनका वजन 3.6 किलोग्राम (8 पौंड) तक होता है।

स्वास्थ्य

माल्टीज़ गोल, काली आँखों वाला एक नाजुक कुत्ता है। यह पूरी तरह से रेशमी, लंबे, सपाट और सफेद बालों से ढका होता है, जिसे अगर पूरी लंबाई तक बढ़ने दिया जाए तो यह लगभग जमीन पर लटक जाते हैं।

इसका कोट, जिसे आसान रखरखाव के लिए काटा जा सकता है, को प्रतिदिन कंघी करने की आवश्यकता होती है और विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है।

अगर इनके स्वास्थ्य की बात करें तो यह बहरेपन, शेकर सिंड्रोम और दंत समस्याओं से पीड़ित हो सकते है। यह पेटेलर लक्सेशन, हाइड्रोसिफ़लस, ओपन फॉन्टानेल, हाइपोग्लाइसीमिया, डिस्टिचियासिस, एंट्रोपियन, हाइपोथायरायडिज्म और पोर्टकावल शंट जैसे मामूली स्वास्थ्य समस्याओं से भी ग्रस्त हो सकते हैं।

इनमें से कुछ मुद्दों की पहचान करने के लिए आप पशुचिकित्सक से इनके घुटने, आंख और थायराइड की जाँच करवाएं।

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कीमत

छोटे, मुलायम और प्यारे होने के कारण अधिकतर महिलाओं की पहली पसंद माल्टीज़ नस्ल के कुत्ते होते हैं। इस बेहद ही प्यारे कुत्ते को अपने घर का हिस्सा बनाने के लिए आपको औसत 30000 रुपए से 1.2 रुपये लाख तक खर्चने होंगे।

यदि आपके पास माल्टीज़ नस्ल का कुत्ता है या यदि आप इसे खरीदना चाहते हैं तो यह किताब आपकी मदद कर सकती है। देखें किताब