- क्या आपको पता है कि ना तो मगरमच्छ अपनी जुबान हिला सकते हैं और न ही कुछ चबा सकते है. मगरमच्छ का पाचक रस इतना ताकतवर होता है कि वह एक लोहे की कील को हजम कर सकता है.
- समुद्र में पाए जाने वाले केकड़ों का दिल उसके सिर में होता है.
- दक्षिण अफ्रीका में पाया जाने वाला कोबरा वृक्ष इतना खतरनाक होता है कि अगर कोई व्यक्ति उस पेड़ के पास जाता है तो पेड़ उसे डालियाँ से जकड़ लेता है और तब तक नही छोड़ता जब तक वो व्यक्ति के मृत्यु ना हो जाए.
- टाइटैनिक जहाज की चिमनिया इतनी बड़ी थी कि इनमें से दो ट्रेने गुजर सकती थी.
- दुनिया भर में 30 प्रतीशत लोग अभी भी ऐसे हैं जिन्होंने अभी तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं किया है.
- शहद एक मात्र ऐसा खाद्य पदार्थ है जो कि हजारों सालों तक खराब नही होता.
- ’TYPEWRITER’ सबसे लंम्बा शब्द है जो कि keyboard पर एक ही लाइन पर टाइप होता है. क्या आपको पता था? 🙂
- यदि हम दोनों हाथों को फैलाए तो हमारे हाथों की लम्बाई हमारे शरीर की लम्बाई के बराबर होगी.
- पूरी दुनिया में लोग अपने पालतु जानवरों (कुत्ता और बिल्ली) की खुराक पर लगभग हर साल 3 लाख 57 अरब रूपए खर्च करते हैं.
- 1672 में वान गुएरिके ने बिजली का अविष्कार किया था.
- रूस विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जिसका एक भाग में शाम और एक भाग में दिन होता है.
- अगर हम एक घंटे से ज्यादा हेडफोन का उपयोग करते हैं तो हमारे कानो में जीवाणुयों की तादाद लगभग 700 गुना बढ़ जाती है.
- ’Uncopyrightable’ अंग्रेज़ी का 15 अक्षरो वाला एकमात्र शब्द है जिसमे कोई भी अक्षर दुबारा नही आता.
- अकसर आपने देख होगा कि एक आदमी 7 दिनो के लिए कही घर से बाहर घुमने जाता है तो वह कम से कम 5 सूट ही पैक करता है. लेकिन दूसरी तरफ जब एक महिला 7 दिन के लिए घर से बाहर किसी उत्सव या टूर पर जाती है तो वह अपने साथ कम से कम 21 सूट पैक करती है क्योकि वह यह नही जानती कि हर दिन उसे क्या पहनने को दिल करेगा.
- दुनिया का सबसे पहला कैमरा 1894 में बना था उस कैमरा में फोटो खीचने के लिए लगभग 8 घंटे इसके सामने बैठना पड़ता था.
जानिए कुछ रोचक और मजेदार तथ्यों के बारे में….
जानिए टेलीविजन के आविष्कार और इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्य
टेलीविजन को विज्ञान का अद्भुत आविष्कार कहा जाता है। इसे हिंदी में दूरदर्शन और संक्षिप्त में टी.वी. (TV) कहते हैं। ‘टेलीविजन’ लैटिन तथा यूनानी शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ होता है “दूर दृष्टि”। ‘टेली’ (Tele) का अर्थ है ‘दूरी पर’ तथा ‘विजन'(vision) का अर्थ है ‘देखना’ अर्थात जो दूर की चीजों का दर्शन कराए, वह है टेलीविजन।
आज दूर घटित घटनाओं को घर बैठे देख पाना टेलीविजन का ही कमाल है। इससे हम घर में बैठ कर दुनिया के किसी भी कोने में घटी घटना के प्रत्यक्षदर्शी बन जाते हैं।
यदि यह कहा जाए कि आधुनिक युग में टेलीविजन लोगों के मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय साधन है तो ग़लत नहीं होगा। इसके द्वारा प्रत्येक वर्ग तथा क्षेत्र के लोगों के लिए अनेक प्रकार के मनोरंजक व शिक्षाप्रद कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं जिनके द्वारा मनोरंजन के अतिरिक्त हमें देश की सामाजिक, राजनीतिक व अन्य समस्याओं का पता चलता है।
आज इस पोस्ट में हम जानेगें टी.वी. के अविष्कार एवं इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में, तो चलिए शुरू करते हैं :
आविष्कार
यह संचार का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम है जिसका आविष्कार जॉन लोगी बेयर्ड ने 1925 में लंदन में किया था। जॉन बचपन के दिनों में बीमार रहा करते थे, इसलिए स्कूल नहीं जा पाते थे।

वह सोचा करते थे कि एक दिन ऐसा भी आएगा, जब लोग हवा के माध्यम से तस्वीरें भेज सकेंगे। उन्होंने वर्ष 1924 में बक्से, बिस्कुट के टिन, सिलाई की सूई, कार्ड और पंखे की मोटर का इस्तेमाल कर पहला टेलीविजन बनाया था।
इसके बाद दुनिया के पहले कामकाजी टेलीविजन का निर्माण 1927 में फिलो फार्न्सवर्थ ने किया, जिसे 1 सितम्बर, 1928 को जनता के सामने पेश किया गया। जॉन लोगी बेयर्ड ने कलर टेलीविजन का आविष्कार 1928 में किया।
पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग शुरूआती टी.वी. के साथ जॉन लोगी बेयर्ड 1940 में हुई और लोगों ने 1960 के दशक में उसे अपनाना शुरू कर दिया था। टेलीविजन शब्द का सर्वप्रथम उपयोग रूसी साइंटिस्ट कांस्टेंटिन परस्कायल ने किया।

पहला टी.वी.
वैसे तो अमरीका में 1941 से ही टी.वी. लांच हो गया था जो ब्लैक एंड व्हाइट था। इसके एक दशक बाद 1953 में अमरीका में ही सबसे पहले रंगीन टेलीविजन की शुरूआत हुई।
भारत में टी.वी.
वहीं भारत में पहली बार टेलीविजन की शुरूआत 15 सितम्बर, 1959 को हुई। इस ब्लैक एंड व्हाइट स्क्रीन वाले टी.वी. का प्रारंभ में उपयोग शिक्षा एवं ग्रामीण विकास को ध्यान में रखकर किया गया। आरंभ में इसका नाम ‘टेलीविजन इंडिया‘ रखा गया।
1975 में ‘टेलीविजन इंडिया’ का नाम बदलकर ‘दूरदर्शन’ कर दिया गया, जो इतना लोकप्रिय हुआ कि यह नाम टी.वी. का ही पर्याय बन गया।
11 जुलाई, 1962 से सैटेलाइट प्रसारण की शुरूआत हुई, जिससे अमेरिका और यूरोप के बीच लाइव कार्यक्रमों का आदान-प्रदान हुआ।
15 अगस्त, 1965 को दूरदर्शन से सर्वप्रथम समाचार बुलेटिन की शुरूआत हुई। अगस्त 1975 में भारत में सैटेलाइट की सहायता से 2400 गांवों में सेवा आरंभ की गई।
15 अगस्त, 1982 को भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कर कमलों से कलर टेलीविजन की शुरूआत हुई। भारत में दूरदर्शन के विकास के साथ-साथ धारावाहिकों के प्रकाशन, उनके प्रस्तुतीकरण में काफी तेजी आई।
ब्लैक एंड व्हाइट टी.वी. से कलर टी.वी., केबल टी.वी. से सैटेलाइट ब्रॉडकास्टिंग से इस फील्ड में अभूतपूर्व विकास हुआ। शुरूआत में कई प्रोग्राम एक निश्चित दिन, निश्चित समय निश्चित शीर्षक के अंतर्गत प्रसारित होने लगे।
तब दर्शक टी.वी. देखने के लिए अत्यधिक उत्साहित रहते और कार्यक्रम तथा फिल्में देखने के लिए सभी में होड़ रहती। टी.वी. हमेशा से मनोरंजन का सबसे सस्ता साधन रहा है।
हालांकि, तकनीकी परिवर्तन से मोटा भारी-भरकम टी.वी. हल्का तथा पतला होता चला गया और स्क्रीन का आकार बढ़ता चला गया। आज एल.ई.डी. से लेकर प्लाज्मा स्क्रीन तक टी.वी. के ही रूप हैं जो अब इंटरनैट के साथ जुड़ कर स्मार्ट भी बन चुके हैं।
वर्ल्ड टेलीविजन डे की घोषणा
टेलीविजन से विश्व पर पड़ने वाले प्रभाव और उसके बढ़ते योगदान से होने वाले परिवर्तन को ध्यान में रखकर 17 दिसम्बर, 1996 को सयुक्त राष्ट्र सभा ने 21 नवम्बर को वर्ल्ड टेलीविजन डे के रूप मनाने की घोषणा की।
रिमोट कंट्रोल का आविष्कार
टी.वी. के रिमोट कंट्रोल का आविष्कार यूजीन पोली ने किया था। उनका जन्म 1915 में शिकागो में हुआ था। वह जैनिथ इलैक्ट्रॉनिक्स में काम करते थे। वर्ष 1955 में उन्होंने फ्लैश मैटिक का आविष्कार किया था।
पंजाब केसरी से साभार
फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलने में बेहद उपयोगी है ‘छाया-संवाद’ तकनीक!
हिंदी माध्यम से पढ़ें वाले छात्रों और नौकरी तलाशने वाले लोगों के लिए अंग्रेजी किसी काल्पनिक प्रेत-बाधा से काम नहीं है। दरअसल किसी भी बड़ी और साख वाली कम्पनी में नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी बोलचाल एक जरूरी मांग होती है। धारा-प्रवाह अंग्रेजी बोलने में असमर्थता के चलते अन्यथा काबिल युवा भी ऐसे लोग बड़ी IT कम्पनी या किसी बड़ी MNC कम्पनी में नौकरी नहीं पा पाते।
आज इस पोस्ट के माध्यम से हम आपके साथ कुछ बहुत ही उपयोगी और लाभ दायक टिप्स और तकनीक शेयर करने वाले हैं जिनका अभ्यास करके आप न केवल अंग्रेजी अच्छे से समझ पाएंगे बल्कि इंग्लिश बोलने में होने वाली हिचक भी दूर होगी। तो चलिए जानते हैं ये टिप्स और तकनीक।
छाया संवाद तकनीक
छाया संवाद (speech shadowing; स्पीच शैडोइंग) भाषा सीखने की एक उन्नत तकनीक (advanced technique) है। इसका सरल सा मंत्र है : आप किसी व्यक्ति को बोलते हुए सुनते हैं और वह व्यक्ति जो कहता है उसे आप वास्तविक काल (real time) में दोहराते हैं, कम से कम देरी के साथ। यह तकनीक से बहुत काम समय में ही मौखिक प्रवाह ( oral frequency) के सुधार में अंत्यंत उपयोगी है।
कैसे करें स्पीच शैडोइंग तकनीक से अभ्यास
जैसे कि आप जानते होंगे शैडो का मतलब है छाया। छाया संवाद इसका सीधा सा अर्थ जो आप सुनते है उसको उसी समय दोहराना। इसके लिए ऐसा करें।
अपना पसंदीदा अंग्रेजी भाषा का टीवी शो या फिल्म देखें। जैसे ही फिल्म का कोई पात्र बोलता है, और जैसे ही आप उन्हें सुनते हैं उसी क्षण जोर से वही शब्द दोहराएं जो वह कह रहा है। दूसरे शब्दों में, रीयल-टाइम में उनके संवाद को ‘छाया’ दें। हर शब्द या ध्वनि के सही होने की चिंता न करें – ध्यान से सुनने, तेज़ी से बोलने और गति बनाए रखने पर ध्यान दें। फिल्म समाप्त होने के बाद, ठीक उसी फिल्म को दोहराएं और दोबारा करें। और फिर से।
इस तकनीक के माध्यम से, अपने आप को तेज गति से बोलने के लिए मजबूर करने से, आपका मस्तिष्क आप जो सुन रहे हैं, उसके लिए अति-ग्रहणशील(hyper-receptive) हो जाता है, और आप न केवल शब्दों को तेजी से और तेज़ी से समझ पाएंगे, बल्कि अनजाने में उन विभक्तियों और मौखिक बारीकियों की भी नकल कर रहे होंगे जो आमतौर पर एक गैर मातृ भाषायी व्यक्ति के लिए करना मुश्किल होता है।
यह तकनीक अनिश्चितता या आत्मविश्वास की कमी के कारण होने वाली हकलाहट को भी ठीक कर देती है। इस तरह से अभ्यास करने पर अंग्रेजी फिल्म के कलाकार आपके बोलने वाले साथी बन जाते हैं।
इंटरव्यू से पहले करें यह अभ्यास
आपके अगले इंग्लिश-प्रधान इंटरव्यू से ठीक पहले यह सही अभ्यास होगा। YouTube पर कुछ साक्षात्कार (interview) अभ्यास वीडियो देखें और उस पूरे वार्तालाप को छायांकित करें।
एक ही डायलॉग का बार-बार बोलने का अभ्यास करें। आप पाएंगे कि इससे न केवल आपको बेहिचक अंग्रेजी बोलने में मदद मिलेगी बल्कि सक्रिय रूप से सुनने और प्रतिक्रिया करने की आपकी क्षमता में भी उल्लेखनीय सुधार होगा।
हमें आशा है कि यह लेख अंग्रेजी बोलचाल के सुधार में आपकी मदद करेगा। कृपया इस पोस्ट को अपने मित्रों और शुभ चिंतकों के साथ भी शेयर करें।
रात में पेड़ के नीचे क्यों नहीं सोना चाहिए जानिए क्या है कारण?
हम पेड़-पौधों के बिना धरती पर जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। पेड़ न सिर्फ हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन देते हैं, बल्कि प्रदूषण से भी बचाते हैं। गर्मी के मौसम में तेज चिलचिलाती धूप में चलते हुए पेड़ की छांव मिल जाए तो कोई भी एक पल के लिए ठहर जाता है। बहुत से लोग पेड़ के नीचे सो भी जाते हैं।
लेकिन आपने कई बार सुना होगा कि पेड़ के नीचे रात को नहीं सोना चाहिए। इस बात को लेकर कई अंधविश्वास की कहानियां प्रचलित हैं लेकिन इसका असल कारण क्या है ये आज हम आपको इस पोस्ट के माध्यम से बताने जा रहे हैं, तो चलिए शुरू करते हैं :

दरअसल पेड़ों द्वारा दिन के समय ऑक्सीजन छोड़ने और कार्बन डाइऑक्साइड लेने की प्रक्रिया चलती रहती है, लेकिन रात के समय अधिकतर पेड़ों द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं।
दिन में जहां पेड़ों से ऑक्सीजन मिलती है वहीं रात के समय पेड़ों से कार्बन डाई ऑक्साइड मिलती है। ऐसी स्थिति में अगर आप रात के समय पेड़ के नीचे सोते है तो कार्बन डाईऑक्साइड की वजह से व्यक्ति का दम घुटने लगता है। कई केस में तो व्यक्ति की मौत भी हो जाती है। यही कारण है कि रात में पेड़ के नीचे नहीं सोना चाहिए।
पेड़ सांस लेने के लिए अपनी पत्तियों में मौजूद बहुत ही छोटे छिद्रों का प्रयोग करते हैं, इन छिद्रों को स्टोमेटा कहते हैं। पेड़-पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में भोजन तथा ऑक्सीजन बनाते हैं, इसे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया कहते हैं। रात में प्रकाश संश्लेषण नहीं होता है, जिसके कारण रात में ऑक्सीजन का निर्माण नहीं हो पाता है।
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फिटनेस टिप्स : अत्यधिक एक्सरसाइज हो सकती है नुकसानदायक
हम सभी जानते हैं कि एक्सरसाइज (व्यायाम) स्वस्थ जीवन शैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न केवल मोटापे को दूर करने में मदद करता है, बल्कि यह आपकी हड्डियों को भी मजबूत करता है और आपके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज करने की आदत के कई साइड इफेक्ट हो सकते हैं। जी हाँ एक्सपर्ट्स यह सुझाव देते हैं कि बहुत अधिक व्यायाम आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
इस पोस्ट में हम जानेंगे अत्यधिक एक्सरसाइज करने से किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है:
हर वक्त थकान महसूस होना
चाहें आप कितनी भी ज्यादा नींद लें या कितना भी रेस्ट कर लें अत्यधिक एक्सरसाइज बॉडी में थकान पैदा करती है। लगातार व्यायाम शरीर से कैलोरी को बर्न करता है और शरीर अपनी एनर्जी को स्टोर नहीं कर पाता है।
ऐसे में हमेशा ओवर एक्सरसाइजिंग से बचना चाहिए। ज्यादा वर्कआउट करने से सिर में दर्द, चक्कर आने, भूख न लगने जैसी समस्याएं हो जाती हैं।

ज्यादा व्यायाम यानी रोगों को बुलावा
सामान्य से अधिक एक्सरसाइज करने से शरीर के लिए जरूरी प्रोटीन और कैलोरी में कमी आने लगती है जिससे जोड़ों व मांसपेशियों पर दबाव पड़ने से इनकी कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होकर कमजोर हो जाती हैं।
इससे बार-बार फ्रेक्चर या चोट लगने का खतरा रहता है। साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। अत्यधिक वर्कआउट से मांसपेशियों की कोशिकाओं में से मायोग्लोबिन (मांसपेशियों में पाया जाने वाला पदार्थ) निकलने लगता है जिससे किडनी फेल हो सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
व्यायाम को अक्सर रात को अच्छी नींद लेने का एक प्रभावी तरीका माना जाता है। एक स्वस्थ व्यायाम दिनचर्या, शरीर को उचित मात्रा में थका देती है जिससे अच्छी नींद आती है।
हालांकि, अधिक व्यायाम करने से तनाव पैदा करने वाले हार्मोन बढ़ सकते है जिससे नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है। शरीर में उच्च कोर्टिसोल का स्तर नींद की कमी के साथ तनाव, चिंता, मूड विकार जैसी समस्याओं का कारण बन सकता है।
कितना समय सही रहता है एक्सरसाइज के लिए
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक शरीर को स्वस्थ और फिट बनाए रखने कि लिए हर हफ्ते कम से कम 150 मिनट एक्सरसाइज जरूर करना चाहिए।
यदि आप काफी लंबे समय से व्यायाम करते आ रहे हैं तो इस समय को बढ़ाकर 250 मिनट किया जा सकता है, फिटनेस लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इतने व्यायाम को ठीक माना जाता है।
हालांकि शरीर के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए व्यायाम की भी एक सीमारेखा होनी आवश्यक है। अत्यधिक एक्सरसाइज करना कई समस्याओं का कारण बन सकता है।
जानिए अजवाइन के फायदे, नुकसान और उपयोग
अजवाइन एक भारतीय मसाला है। अनेक प्रकार के गणों से भरपुर अजवाइन पाचक, रुचि कारक, तीक्षण, पित्तकारक तथा शूल, वात, कफ तथा कृमि का नाश करने वाली होती है। अजवाइन की पत्ती में एंटी बैक्टीरियल गुण है जोकि संक्रमण से लड़ने में मदद करता है।
आमतौर पर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं जैसे अपच, पेट फूलना और पेट के दर्द के लिए एक औषधि के रूप में उपयोग किया जाता है।
इसके बीजों में कार्मिनेटिव, एंटीमाइक्रोबियल और लीवर प्रोटेक्टिव गुण होते हैं। यह रक्तचाप कम करने और ब्रोन्कोडायलेटरी (पदार्थ जो फेफड़ों में वायु प्रवाह को बढ़ाता है) गुणों के लिए भी जाना जाता है।
इस पोस्ट में हम आपको इसके फायदे, नुकसान और उपयोग के बारे में बताने जा रहे हैं, तो चलिए शुरू करते हैं:-
गैस और कब्ज
गैस और कब्ज की समस्या किसी को भी हो सकती है। ऐसे में अजवाइन इस समस्या के लिए असरदार साबित हो सकती है। इसमें एंटीस्पास्मोडिक और कार्मिनेटिव गुण पाए जाते हैं, जो गैस के प्रभाव को कम करने के लिए दवाई का काम करती है।
साथ ही, इसमें थाइमोल नामक कंपाउंड भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जिसका उपयोग गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल की बीमारियों से राहत पाने के लिए किया जाता है।

अस्थमा के लिए
अजवाइन का ब्रोन्कोडायलेटिंग प्रभाव फेफड़ों में ब्रोन्कियल नलियों को फैलाता है और हल्के अस्थमा के मामले में राहत देता है। यह बढ़े हुए कफ को संतुलित करता है।
अजवाइन बलगम को आसानी से बाहर निकालने में मदद करता है और क्रोनिक ब्रोंकाइटिस और अस्थमा को काफी हद तक ठीक करने में मदद करता है।
किडनी स्टोन के लिए
अजवाइन में एंटीलिथियाटिक गुण होते हैं और यह किडनी स्टोन बनने के जोखिम को कम करता है। एक अध्ययन में कहा गया है कि अजवाइन के बीजों में मौजूद एंटीलिथियाटिक प्रोटीन कैल्शियम ऑक्सालेट और कैल्शियम फॉस्फेट दोनों को जमा होने से रोकता है और किडनी में पथरी बनने से रोकता है।
सर्दी, फ्लू और वायरल इन्फेक्शन
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फार्मेसी एंड लाइफ साइंस द्वारा किए गए एक वैज्ञानिक रिसर्च में पाया गया है कि अजवाइन के बीज में लगभग 50% थाइमोल मौजूद होता है, जिसे मुख्य तौर पर एंटीबैक्टीरिया के रूप में जाना जाता है।
इसके अलावा, थाइम शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को भी बढ़ाने का काम कर सकता है, जिससे जुकाम, फ्लू और अन्य वायरल इन्फेक्शन को दूर रखा जा सकता है।
वजन कम करने में सहायक
भुनी हुई अजवाइन खाने के फायदे शरीर के वजन को कम करने के लिए हो सकते हैं। एक शोध के अनुसार, अजवाइन को भूख को शांत रखने और मोटापे को कम करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे वजन कम होता है।
नुकसान
वैसे तो अजवाइन खाने के फायदे कई होते हैं, लेकिन कई बार अजवाइन खाने के नुकसान भी हो सकते हैं, जो इस प्रकार हैं:
- गर्भवती महिलाओं को ज्यादा मात्रा में अजवाइन का सेवन नहीं करना चाहिए, इसकी तासीर गर्म होती है। इसकी वजह से शरीर में गर्मी बढ़ सकती है, जिसके कारण स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, इसलिए गर्भवती महिलाओं को जितना हो सके अजवाइन के सेवन को अधिक मात्रा में अवॉयड करना चाहिए।
- अजवाइन में रक्त को पतला करने का गुण होता है और यह रक्त के थक्के को धीमा कर सकता है। इसलिए, यह सलाह दी जाती है कि अजवाइन या इसके सप्लीमेंट्स के साथ-साथ ब्लड क्लॉटिंग को धीमा करने वाली दवाओं से भी परहेज करें। ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे रक्तस्राव की संभावना बढ़ सकती है
- लीवर की बीमारी के रोगियों को इसका उपयोग सावधानी से करना चाहिए क्योंकि इससे स्थिति और खराब हो सकती है।
उपयोग
- अजवाइन, सेंधा नमक, सेंचर नमक, हींग और सूखे आंवले को बराबर मात्रा में लेकर अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 1 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम शहद के साथ चाटने से खट्टी डकारें आना बंद हो जाती है।
- एसिडिटी की तकलीफ है तो थोड़ी अजवाइन और जीरा एक साथ भून लें। फिर इसे पानी में उबाल कर छान लें। इसमें चीनी मिलाकर पिएं एसिडिटी से राहत मिलेगी।
- अजवाइन, सोंठ पाऊडर और काला नमक 2-2 और 1 के अनुपात में मिलाएं। भोजन करने के बाद एक चम्मच चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लें तो पेट दर्द व गैस की समस्या में आराम मिलेगा।
- इसके तेल की कुछ बूंदें गुनगुने पानी में मिलाकर कुल्ला करने से मसूड़ों की सूजन कम होती है। भुनी हुई इसका मंजन करने से मसूढ़ों के रोग मिट जाते हैं।
- जोड़ों के दर्द में सरसों के तेल में अजवाइन डालकर अच्छे से गर्म करें व छान लें। इससे जोड़ों की मालिश करें। इससे दर्द से आराम होगा।
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डायबिटीज :- जानिए लक्षण और उपचार
डायबिटीज एक ऐसा विकार है जिसमें शरीर की ग्लूकोज (शुगर) को ऊर्जा में बदलने की क्षमता प्रभावित होती है। ग्लूकोज ही हमारे शरीर का प्रमुख ईंधन होता है, भोजन का पाचन होने के बाद यह वसा, प्रोटीन या कार्बोहाइड्रेट में बदलता है।
कार्बोहाइड्रेट के पाचन के बाद यह ग्लूकोज में बदलता है और यह तब रक्त में पहुंचता है जहां से इसका इस्तेमाल शरीर की विभिन्न कोशिकाओं द्वारा ऊर्जा के लिए किया जाता है।
इस ग्लूकोज को रक्त से कोशिकाओं में पहुंचाने के लिए एक महत्वपूर्ण हार्मोन – इंसुलिन की आवश्यकता होती है। इंसुलिन का उत्पादन अग्नाशय (पैंक्रियाज, जो इंसुलिन बनाता है) में मौजूदा बीटा कोशिकाओं द्वारा होता है लेकिन मधुमेह ग्रस्त लोगों में यह प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
डायबिटीज उस स्थिति में होता है जबकि हमारी पैंक्रियाज में पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बनता, जो कि टाइप 1 डायबिटीज कहलाता है या जो इंसुलिन बनता भी है वह दोषपूर्ण होता है जो कि ग्लूकोज को कोशिकाओं में पहुंचाने में असमर्थ होता है, इसे टाइप 2 डायबिटीज कहते हैं।

टाइप 1 डायबिटीज आमतौर से बच्चों और युवाओं में होती है, हालांकि यह किसी भी उम्र में हो सकती है।
टाइप 2 डायबिटीज ज्यादा आम है। यह मोटे तौर पर वयस्कों को अपना शिकार बनाती है, हालांकि हाल के वर्षों में देखा गया है कि यह बच्चों को भी अपनी चपेट में लेने लगी है।
अन्य प्रकार की डायबिटीज
LADA (लेटेंट ऑटोइम्यून मधुमेह जो वयस्कों में पाई जाती है),
MODY (मैच्योरिटी ऑसैट डायबिटीज जो युवाओं को प्रभावित करती है) और
GDM (गैस्टेशनल डायबिटीज मेलाइटस)।
लक्षण
धुंधला दिखना, सामान्य से अधिक प्यास लगना, बार-बार पेशाब जाना, घाव का देरी से भरना, बिना किसी कारण थकान बनी रहना, तेजी से वजन गिरना, नपुंसकता, हाथों या पंजों का सुन्न पड़ना या उनमें झनझनाहट महसूस करना। इनमें से एक या अधिक लक्षण हैं, तो आपको अपने डॉक्टर से सलाह कर अपने खून की जांच करवानी चाहिए।
उपचार
पोषक तत्वों वाली सेहतमंद और संतुलित खुराक का सेवन करें, नियमित व्यायाम, ब्लड ग्लूकोज पर नजर रखना तथा डॉक्टर की दी दवाओं का समय से प्रयोग जरूरी है।
डायबिटीज रोगियों के लिए सैल्फ केयर दिनचर्या का हिस्सा होना चाहिए यानी आपको अपनी सेहत की देखभाल की जिम्मेदारी खुद लेनी चाहिए। हालांकि, आप देखभाल के लिए अन्य लोगों की भी सहायता ले सकते हैं।
जानिए टाइगर स्नेक से जुड़े कुछ रोचक तथ्य, जिसके डंक से बच पाना है मुश्किल
टाइगर स्नेक दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया का एक बड़ा और अत्यधिक विषैला सांप है। टाइगर स्नेक का नाम उनकी बाघ जैसी धारियों के नाम पर रखा गया है। हालाँकि, कुछ टाइगर स्नेक में धारियाँ नहीं होती हैं। टाइगर स्नेक दुनिया के सबसे जहरीले सांपों में से एक है। ये पानी में भी आसानी से तैर सकते हैं।
जब उन्हें खतरा महसूस होता है, तो वे खुद को जमीन से ऊपर उठा लेते हैं और अपने सिर और गर्दन को लगभग एक कोबरा की तरह चपटा कर लेते हैं।

यह स्नेक आम तौर पर लगभग 1 मीटर लंबे होते हैं लेकिन 1.5 मीटर तक बढ़ सकते हैं। उनका सिर उनकी गर्दन से थोड़ा चौड़ा और अलग होता है। टाइगर स्नेक के शरीर का रंग ग्रे-ब्राउन और काला होता है और इसका निचला भाग हल्का पीला या नारंगी होता है।
खुराक
इसके आहार में खाद्य स्रोतों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल होती है। वे मुख्य रूप से मेंढक खाते हैं, लेकिन वे अन्य सरीसृपों (reptiles), पक्षियों, छोटे स्तनधारियों और मछलियों का भी सेवन करते हैं।
आवास
टाइगर स्नेक कई प्रकार के आवासों में पाए जा सकते हैं। ये अक्सर खाड़ियों, नदियों या दलदलों के पास देखे जाते हैं। ये आमतौर पर जमीन पर रहने वाले सांप होते हैं, लेकिन उन्हें छोटे पेड़ों और झाड़ियों पर चढ़ते हुए भी देखा गया है।
यह सांप गर्म रातों में अधिक सक्रिय रहता है। टाइगर स्नेक ठंडे महीनों को बिलों में बिताते हैं। इसके सामान्य आवास में ऑस्ट्रेलिया के तटीय क्षेत्र शामिल हैं।
अगर इनके प्रजनन की बात करें तो टाइगर सांप एक समय में 20 से 30 जीवित बच्चों को जन्म देते हैं। वे आमतौर पर वसंत ऋतु में संभोग करते हैं और गर्मियों में बच्चों को जन्म देते हैं।

टाइगर स्नेक के जहर में शक्तिशाली न्यूरोटॉक्सिन, कोगुलेंट, हेमोलिसिन और मायोटॉक्सिन होते हैं। इसके काटने के बाद 30 मिनट से 24 घंटे के अंदर व्यक्ति की मौत हो जाती है।
इसके लक्षणों में पैर और गर्दन में दर्द, झुनझुनी, सुन्नता और पसीना आना शामिल है, इसके बाद सांस लेने में कठिनाई और पक्षाघात (लकवा) की काफी तेजी से शुरुआत होती है।
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दुनिया में एक से बढ़कर एक अजीबोगरीब और खतरनाक चीज़ें हैं। जिनके बारे में सुनकर हम हैरानी में पड़ जाते हैं। हमने अपने कई लेखों के माध्यम से धरती पर मौजूद कई रहस्यमयी व अजीबोगरीब चीज़ों के बारे में आपको बताया है। साथ ही कई रोचक तथ्यों को भी आपके सामने रखा है।
आज की इस पोस्ट में हम आपको एक ऐसे ही अजीबोगरीब पौधे के बारे में बताने जा रहे हैं जो बेहद खतरनाक हैं, तो चलिए जानते हैं :-
दरअसल हम आज जिस पौधे के बारे में बात करने जा रहे हैं उसे जिमपाई जिमपाई के नाम से जाना जाता है। यह पौधा ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी वर्षावनों में पाया जाता है।

इसे कई नामों से जाना जाता है, जैसे स्टिंगिंग ब्रश, मलबेरी-लिव्ड स्टिंगर, द सुसाइड प्लांट और मूनलाइटर। यह बिछुआ परिवार ‘उर्टिकेसी’ से संबंध रखता है। इस पौधे का वैज्ञानिक नाम डेंड्रोक्नाइड मोरोइड्स है।
क्यों कहा जाता है “सुसाइड प्लांट”

दिखने में तो यह साधारण पौधे जैसा होता है। लेकिन अगर इसके कांटे इंसान को चुभ जाएं, तो इससे असहनीय दर्द होता है, जो लगातार कुछ घंटों से लेकर 2 दिनों तक भी रह सकता है।
इसका डंक आपको एक ही साथ गर्म एसिड से जलने और बिजली के झटके दे सकता है। कहा जाता है कि यह पौधा लोगों को तड़पाकर खुदकुशी के लिए मजबूर कर देता है और इसलिए इसे ‘सुसाइड प्लांट‘ भी कहते हैं।

इसे भले ही दुनिया के ज़हरीले पौधों की सूची में रखा गया है, लेकिन इसके फल इंसानों के खाने के लिए सुरक्षित है, लेकिन शर्ते है कि कांटें पूरी तरह से हटे हुए हों।
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जानिए बेहद प्यारी नस्ल बुलडॉग के बारे में रोचक तथ्य
बुलडॉग मास्टिफ प्रकार के कुत्तों की एक ब्रिटिश नस्ल है। इसे अंग्रेजी बुलडॉग या ब्रिटिश बुलडॉग के रूप में भी जाना जाता है। बुलडॉग कुत्तों की नस्ल एक बहुत ही प्रसिद्ध और पसंद की जाने वाली प्रजाति है। इस नस्ल के कुत्तों का स्वभाव बहुत ही शांतिपूर्ण होता है। यह आकार में छोटे और बेहद प्यारे होते है।
मुख्य रूप से यह अपने आकार और स्वरुप के वजह से पूरे विश्व में इतने ज्यादा लोकप्रिय हैं एवं पसंद किये जाते हैं। बुलडॉग नस्ल के कुत्ते, इंसानों के साथ बहुत जल्दी घुल मिल जाते हैं।
इसी वजह से ज्यादातर लोग बुलडॉग को पालना पसंद करते हैं। इस लेख में हम जानेंगे इस प्यारी नस्ल से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में, तो चलिए जानते हैं :-

आकार
इस नस्ल के कुत्ते मध्यम आकार के होते हैं इनके माथे के अगले हिस्से पर खाल की मोटी परत होती है, साथ ही गोल, काली आंखें, तथा गले के नीच लटकती खाल और मुड़े होंठ, छोटे बाल तथा नुकीले दांत होते हैं।
इसका रंग लाल, हल्का पीला, सफ़ेद, ब्रिन्डल (लहरों अथवा पट्टियों के रूप में मिश्रित रंग) तथा इन सभी के साथ चितकबरे रंग में भी पाए जाते हैं।
एक वयस्क नर बुलडॉग का वजन 50 पौंड (23 किलोग्राम) होता है, जबकि वयस्क मादा का वजन लगभग 40 पौंड (18 किलोग्राम) होता है।
भोजन
अन्य किसी भी नस्ल की तरह ही बुलडॉग को एक उच्च गुणवत्ता वाले भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन की मात्रा इसके आकार उम्र पाचन प्रक्रिया और दैनिक गतिविधि पर निर्भर करता है।
बुलडॉग के उचित स्वास्थ्य के लिए सही भोजन का चुनाव बहुत जरुरी होता है। एक सही और उच्च गुणवत्ता वाला भोजन बुलडॉग के विकास दर को सुनिश्चित करता है तथा उसे सेहतमंद बनाये रखने में सहायक होता है। बुलडॉग को दिन में कम से कम दो से तीन बार भोजन देने की आवश्यकता होती है।
भोजन में पशु चिकित्सक एक बढ़िया डॉग फ़ूड देने की सलाह देते हैं जिसमें की सभी पोषक तत्व संतुलित मात्रा में उपस्थित होते हैं।

बुलडॉग स्वास्थ्य
वैसे तो यह एक स्वस्थ्य नस्ल है लेकिन बाकी अन्य नस्लों की तरह ही बुलडॉग भी कुछ बिमारियों से ग्रसित होते हैं सभी बुलडॉग्स में यह बीमारियों देखने को नहीं मिलती है लेकिन इन सभी बिमारियों के प्रति जागरूक रहना बेहद जरुरी होता हैं।
बुलडॉग में हिप डिस्प्लेसिया (hip dysplasia) होने वाली एक ऐसी समस्या है जिसमें कूल्हे की हड्डी प्रभावित होती है जिसके कारण पिछले पैरो में लंगड़ापन जैसी समस्या होती है।
आँखों का सूखापन – यह अधिकांश बुलडॉग्स नस्लों में पाए जाने वाली समस्याओं में से एक है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें कि प्राकृतिक रूप से आंसुओ का निर्माण नहीं होता है जिसके परिणाम स्वरुप आँखों में रूखापन, धुंधला दिखना आदि समस्याएँ पैदा होती हैं
बुलडॉग क्लब इस प्रजाति की औसत आयु 8 से 12 वर्ष आंकता हैं, हालांकि ब्रिटेन में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार यह 6.5 वर्ष मानी गयी है।
सर्वेक्षण में पता चला कि इसकी मृत्यु के प्रमुख कारण ह्रदय सम्बन्धी रोग (20%), कैंसर (18%) तथा अधिक आयु (9%) थे। जिनकी मृत्यु अधिक आयु के कारण हुई, उनकी औसत आयु 10 से 11 वर्ष रही।
कीमत
भारत में बुलडॉग की कीमत 10 हज़ार रुपये से शुरू होकर 60 हज़ार तक है।
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