जानिए लता मंगेशकर के बारे में कुछ अनसुने तथ्य

लता मंगेशकर की जादुई आवाज़ का हर कोई कायल है। कहा जाता था कि भारत रत्न लता मंगेशकर के कंठ में स्वयं सरस्वती का वास है। जितनी मीठी आवाज़ उनकी 14 वर्ष की आयु में थी, वही मिठास उनके आखिरी गाने तक कायम रही।

वे दुनिया भर में अपनी इस खासियत के लिए मशहूर रहीं। आज इस पोस्ट में हम जानेगें उनकी ज़िंदगी के अनसुने तथ्य:-

  • उनके पिता दीनानाथ और मां शेवांति ने उनका नाम हेमा रखा था लेकिन पांच साल की उम्र होने पर उनके पिता ने उनका नाम बदलकर लता रख दिया।
  • कहा जाता है कि लता दीदी मानती थीं कि उनकी आवाज सबसे ज्यादा सायरा बानो पर अच्छी लगती है।
  • कहा जाता है कि राजकपूर की 1978 की बेहतरीन फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ लता मंगेशकर के जीवन से प्रेरित थी और वह उन्हें इस फिल्म में एक्टिंग करवाना भी चाहते थे।
  • उनको पहला ब्रेक गाने के लिए नहीं, बल्कि एक नाटक में एक्टिंग के लिए मिला था।
  • लता मंगेशकर ने फिल्मों के लिए पहला गाना गया था, ‘नाचू या गड़े, खेलू सारी मणि हौस भारी‘। यह गाना 1942 की एक मराठी फिल्म “किटी हसाल” का था। लेकिन, फिल्म के आखिरी कट में इसे हटा दिया गया था।
  • उनका पहला गाना जो रिलीज हुआ वह था ‘नैथली चैत्राची नवलाई‘। यह सॉन्ग मराठी फिल्म ‘पाहिली मंगलागौर‘ में रखा गया था।
  • लता ने दस फिल्मों में काम भी किया जिनमें ‘पाहिली मंगलागौर‘, ‘बड़ी मां‘ और ‘जीवन यात्रा‘ प्रमुख हैं।
  • वे “आनंदअघन” के नाम से गाने भी कंपोज किया करती थीं। बंगाली भाषा में ‘तारे आमी चोखने देखिनी‘ और ‘आमी नी‘ गाने उन्होंने ही कंपोज किए थे।
  • उन्होंने ‘रामराम पाहुने‘ जैसी पांच मराठी फिल्मों में भी गाने कंपोज किए।
  • लता ने ‘वडाल‘ (मराठी), ‘झांझर‘, ‘कंचन‘ और ‘लेकिन‘ (हिंदी) फिल्में प्रोड्यूस भी कीं। हिंदी के अलावा उन्होंने बंगाली, मराठी, पंजाबी, गुजराती, तमिल और मलयालम भाषाओं में भी गाने गाए हैं।
  • लता के कंपोज किए बंगाली गाने “किशोर कुमार” ने गाए थे।
  • लता को गाने के अलावा फोटो खिंचवाने का भी बहुत शौक है।
  • लता मंगेशकर एक कार्यकाल के लिए यानी 1999 से 2005 तक राज्यसभा की सांसद भी रह चुकी थीं। उन्हें 1999 में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था। हालांकि, उन्होंने इस कार्यकाल पर नाखुशी जताई और दावा किया था कि उन्होंने अनिच्छा से संसद की सदस्यता स्वीकारी थी।
  • सात दशक से भी ज्यादा के अपने शानदार करियर में लता को एक से बढ़कर एक भारतीय संगीतकार और संगीत निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला था, लेकिन उन्होंने ओपी नैय्यर साहब के साथ कभी काम नहीं किया था।
  • गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में 1974 से 1991 तक लता मंगेशकर का नाम दुनिया की सबसे ज्यादा गाने गाने वालीं सिंगर के तौर पर दर्ज है।
  • पिछले कई वर्षों से अपनी अधिक उम्र और खराब स्वास्थ्य की वजह से लता मंगेशकर गायिकी से दूर हो गई थीं। उन्होंने अपना पिछला और आखिरी गाना सात साल पहले 2015 में रिकॉर्ड किया था।

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ये हैं 90 के दशक में दूरदर्शन पर आने वाले मशहूर सीरियल, जिन्हें देखने के लिए लोग अपना काम तक छोड़ देते थे

भारतीय टेलीविज़न का इतिहास बहुत पुराना है। हमारे देश में एक दौर ऐसा भी था, जब घर की छत पर लगा एंटीना प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। जब घर में रखे टेलीविज़न के आसपास एक पूरा परिवार साथ बैठकर कुछ हल्के-फुल्के कार्यक्रमों से अपना मनोरंजन करता था। उस दौर में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले पांच भारतीय टीवी सीरियल ऐसे हैं, जो बहुत मशहूर थे जिन्हें देखने के लिए लोग अपना काम तक छोड़ देते थे। तो चलिए जानते हैं :-

शक्तिमान

शक्तिमान उस दौर का ऐसा शो था जिसने सबसे ज़्यादा बच्चों को अपना दीवाना बनाया। अभिनेता मुकेश खन्ना के जीवंत अभिनय ने इस किरदार को अमर कर दिया।

शो के खत्म होने के बाद छोटी-छोटी मगर मोटी बातें खूब पसंद किया जाता था। शक्तिमान को भारत का पहला सुपरहीरो भी कहा जाता था। यह एक खास तरह से हाथ घुमाकर आसमान में उड़ जाया करता था।

चंद्रकांता

1994 में शुरू किए गए इस शो में विजयगढ़ की राजकुमारी चंद्रकांता और नौगढ़ के राजकुमार वीरेंद्र सिंह की कहानी को काफी कलात्मक ढंग से दिखाया गया था। इस सीरियल में क्रूर सिंह का अभिनय करने वाले अखिलेश मिश्र को तो बाद में बॉलीवुड ने हाथों-हाथ लिया।

उन्होंने 100 से अधिक फिल्मों का काम किया प्रकाश झा कि फिल्मों अपहरण, राजनीति आदि में उनके किरदार बहुत सराहा भी गया। एक और सितारा इस सीरियल में था, जो अब लोगों का चहेता बना हुआ है, उसका नाम है इरफान खान। लोगों को सीरियल देखने के लिए बड़ी बेसब्री से रविवार की सुबह का इंतजार रहता था।

चित्रहार

चित्रहार दुनिया में टेलीविजन इतिहास का यह सबसे लंबा प्रसारित होने वाला प्रोग्राम था। यह सन् 1960 के दशक में शुरू हुआ था और 1970 के दशक तक आते-आते लोकप्रियता के चरम पर पहुंच गया। हर शुक्रवार को प्राइम टाइम में तकरीबन 30 मिनिट तक चलने वाले इस कार्यक्रम में बॉलीवुड के नये पुराने गीत बजाए जाते थे।

एक दौर में जबकि भारत में रेडियो अपनी लोकप्रियता के चरम पर था तब गीतों को उनके ऑडियो सहित वीडियो फॉर्म में सिनेमा के अलावा टीवी पर देखना नया अनुभव था। चित्रहार आज भी चल रहा है।

रामायण

रामानंद सागर की प्रस्तुति रामायण देश का पहला टीवी धारावाहिक था। रामायण के कुछ-कुछ एपिसोड इतने मार्मिक हैं कि लोग देखने के घंटे-घंटे भर बाद तक आंसू बहाते रहे।

भारत के लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों के बारे में जब कभी लिखा-पढ़ा जाएगा तुलसीदास लिखित रामचरित मानस का टीवी रूपांतर प्रस्तुतिकरण ‘रामायण‘ नाम पहली पंक्ति में आएगा। इसका प्रभाव इतना गहरा था कि इस टीवी सीरियल के पोस्टर को लोग अपने घरों में लगाकर पूजा करने लगे थे।

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महाभारत

रामायण की तरह ही दूरदर्शन पर महाभारत सीरियल ने भी जमकर धूम मचाई। इस सीरियल का सबसे खास हिस्सा ‘मैं समय हूं’ था। महाभारत में पांडव और कौरवों के बीच युद्ध को दिखाया गया था। लोगों ने केवल चंद पन्‍नों में दर्ज अपनी आस्‍था की किताब और उसके महाविशाल कथानक को पहली बार टीवी नाम के डिब्‍बे में देखा।

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जानिए किसने बनाई ‘इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन’ और क्या है इसकी कहानी!!

एक समय था जब लोकसभा और विधानसभा चुनाव करवाने के लिए कागज के मत पत्र, मतपेटियां और मुहरें लेकर सरकारी कर्मचारी दूर-दराज तक जाते थे। मतगणना करने और परिणाम घोषित करने में 3 दिन लग जाते थे। पूरा देश और करोड़ों वोटर रिजल्ट जानने के लिए बेचैन रहते थे। अब इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ई.वी.एम.) ने भारतीय चुनाव व्यवस्था को न केवल आसान बल्कि बहुत तेज़ बना दिया है। मतगणना वाले दिन दोपहर 12 बजे तक 90 प्रतिशत परिणाम आ जाते हैं।

क्या होती है ई.वी.एम.

ई.वी.एम. वोट रिकॉर्ड करने के लिए एक इलैक्ट्रॉनिक उपकरण है। वोटिंग मशीन के दो मुख्य हिस्से होते हैं – एक कंट्रोल यूनिट और एक बैलेटिंग यूनिट होती है जो एक तार से जुड़ी होती हैं।

इनमें से एक में उम्मीदवारों के नाम लिखे होते हैं जिसे बैलेट यूनिट कहते हैं। उसे मतदान कक्ष के अंदर रखा जाता है जबकि कंट्रोल यूनिट को मतदान अधिकारी के पास रखा जाता है और मतपत्र जारी करने की बजाय कंट्रोल यूनिट के प्रभारी मतदान अधिकारी अपनी यूनिट पर बैलेट बटन दबाकर मतपत्र जारी करते हैं।

इससे मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवार और चुनाव चिह्न के सामने बैलेट यूनिट पर नीले बटन को दबाकर अपना वोट डाल देता है।

पहली बार प्रयोग

ई.वी.एम. का इस्तेमाल पहली बार केरल के पारूर विधानसभा क्षेत्र में वर्ष 1982 में किया गया था।

कितने की आती है ई.वी.एम.

चुनाव आयोग की आधिकारिक वैबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार एक एम2 ई.वी.एम. (2006-10) होती है जिसमें अधिकतम 64 उम्मीदवारों के चुनाव कराए जा सकते हैं यानी इसमें 4 वोटिंग मशीन तक जोड़ी जा सकती है।

इसके अलावा एक ‘एम3 ई.वी.एम.’ होती है जिसमें ई.वी.एम. से 24 बैलेटिंग इकाइयों को जोड़कर अधिकतम 384 उम्मीदवारों के लिए निर्वाचन कराया जा सकता है।

‘एम2 ई.वी.एम.'(2006-10 के बीच निर्मित) की लागत 8670 रुपए प्रति ई.वी.एम. (बैलेटिंग यूनिट और कंट्रोल यूनिट) थी।

इन दिनों काम में आने वाली एम3 ई.वी.एम.’ की लागत लगभग 17,000 रुपए प्रति यूनिट है। वैसे शुरूआती निवेश कुछ अधिक प्रतीत होता है, लेकिन मतपत्र से होने वाली वोटिंग से इसका खर्चा कम ही आता है।

अब चुनाव ई.वी.एम. से होते हैं

पत्रों की प्रिंटिंग, उनके परिवहन, भंडारण आदि से संबंधित बचत और मतगणना स्टाफ में होने वाले फायदे से इस कीमत की भरपाई हो जाती है।

ई.वी.एम. कैसे चलती है

ई.वी.एम. बैटरी पर काम करती है, इससे बिजली जाने की स्थिति में भी वोटिंग प्रक्रिया को जारी रखा जा सकता है। साथ ही मशीन को लेकर यह भरोसा दिया जा सकता है कि ‘नीले बटन‘ को दबाने या ई.वी.एम. को सम्भालते समय किसी भी मतदाता या कर्मचारी को बिजली का झटका लगने की कोई संभावना नहीं है।

कितने दिन स्टोर रहता है डेटा

कंट्रोल यूनिट अपनी मैमोरी में परिणाम को तब तक स्टोर कर सकती है जब तक कि डेटा को ‘क्लीयर’ न कर दिया जाए।

किसने बनाई

ई.वी.एम. को दो सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों ‘भारत इलैक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड बेंगलूर‘ और ‘इलैक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड हैदराबाद‘ के सहयोग से चुनाव आयोग की तकनीकी विशेषज्ञ समिति ने तैयार और डिजाइन किया है। ई.वी.एम.का निर्माण इन दो कम्पनियों द्वारा ही किया जाता है।

पंजाब केसरी से साभार

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करंट का झटका देती है ये मछली, जानिए कुछ रोचक तथ्य

आपको इस बात की हैरानी होगी कि मछलियां करंट का झटका कैसी दे सकती हैं, पर यह सच है कि इलेक्ट्रिक केट फिश और इलेक्ट्रिक ईल नामक मछली अपने शिकार को मारने के लिए बिजली के हाई वॉल्टेज झटके का इस्तेमाल करती हैं।

आज इस लेख में हम आपको बताने जा रहे हैं करंट मारने वाली मछली के बारे में कुछ रोचक तथ्य तो चलिए जानते हैं :-

  • इलेक्ट्रिक ईल नाइफ-फिश परिवार के सदस्यों में गिनी जाती है। यह ज्यादातर दक्षिण अमेरिका में अमेजन और ओरिनोको नदियों के आसपास कीचड़ या उथले पानी में पाई जाती है।
  • जब ईल द्वारा Electrolight Cell को एक्टिव किया जाता है तो यह सेल करंट पैदा करते हैं, जो करीब 200 वाट से लेकर 600 वाट तक हो सकता है।
  • इस ईल मछली के नाम के आगे इलेक्ट्रिक इसीलिए लगा है क्योंकि यह मछली करंट मारती है।
  • आपको जानकर हैरानी होगी एक इलेक्ट्रिक ईल अपने करंट के द्वारा मगरमच्छ तक को मार सकती है।
  • इलेक्ट्रिक ईल की बॉडी में उत्पन्न होने वाला करंट इसके शरीर में मौजूद Electrolight Cell में होता है।
  • इसकी बॉडी का शेप बेलनाकार होता है और लंबाई करीब 2 मीटर तक होती है।
  • इसका वजन लगभग 20 किलोग्राम हो सकता है और मेल ईल फिमेल से छोटे होते हैं।
  • सर्पमीन (Eel) ऑर्डर एपोडीज (order Apodes) के म्युरीनिडी कुल (family Muraenidae) की सर्पाकार मछलियां हैं इन्हें सर्पमीन इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह देखने में सांप जैसी होती हैं।
  • दिन के समय ज्यादातर यह कीचड़ में छिपकर रहती है और रात में खाने की तलाश में बाहर निकलती है। इनके मुंह में तेज दांत होते हैं।
  • इनकी कई प्रजातियां हैं जो हिंद महासागर, भूमध्य सागर, अटलांटिक महासागर, प्रशांत महासागर तथा यूरोप के पश्चिमी भाग के समुद्रों में फैली हुई हैं।
  • फायर ईल को ज्यादातर एक्वेरियम में देखा जा सकता है। इनकी बॉडी काले रंग की होती है और उसके ऊपर लाल रंग की धारियां होती हैं। यह ज्यादातर दक्षिण पूर्वी एशिया में पाई जाती है।
  • इनमें सबसे प्रसिद्ध ऐंग्विला (Anguilla) है, जो अधिकतर नॉर्थ अमेरिका में पाई जाती हैं। इनके अंडों में से छोटे-छोटे चपटे पारदर्शी (Transparent) बच्चे निकलते हैं।

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ये हैं दुनिया के 10 सबसे जहरीले जीव, जिन्हें छूने भर से ही मनुष्‍य की जान जा सकती है

प्रकृति जितनी खूबसूरत है उतनी ही खतरनाक भी। दुनिया में एक से बढ़कर एक खूबसूरत जीव हैं, जो अपनी खूबसूरती से हर किसी को लुभाते हैं। लेकिन आज हम आपको कुछ ऐसे जीवों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो बेहद ही खतरनाक और जहरीले हैं जिन्हें छूने भर से ही मनुष्‍य अपनी जान गवां सकता है तो चलिए जानते हैं :-

फनल वेब स्पाइडर

फनल वेब स्पाइडर (मकड़ी) मूल रूप से ऑस्ट्रेलिया में पाई जाता है, इसलिए इसे ऑस्ट्रेलियन फनल वेब स्पाइडर भी कहा जाता है। इसका जहर सायनाइड से भी ज्यादा खतरनाक होता है। कहा जाता हैं कि यह मकड़ी अगर किसी को काट ले तो 15 मिनट से लेकर 3 दिन के अंदर उसकी मौत हो जाती है।

इंडियन रेड स्कॉर्पियन

बिच्छूओं को तो आपने देखा ही होगा, लेकिन यह दुनिया की सबसे जहरीली बिच्छू है। इसे ‘इंडियन रेड स्कॉर्पियन‘ के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यह मूलत: भारत में ही पाया जाता है। यह भारत समेत दक्षिण एशिया के देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में पाया जाने वाला यह बिच्छू अगर किसी इंसान को काट ले तो 72 घंटे में उसकी मौत निश्चित है।

बॉक्स जेलीफिश

वैसे तो हम सभी जानते हैं कि जेलीफिश कितनी सुंदर होती है लेकिन यह जितनी खूबसूरत होती है उतनी ही खतरनाक भी होती है। इसी की प्रजाती बॉक्स जेलीफिश इससे से भी बहुत ज्यादा जहरीली होती है। कहते हैं कि इसका जहर एक बार में करीब 60 लोगों को मार सकता है। अगर बॉक्स जेलीफिश का जहर एक बार इंसान के शरीर में पहुंच जाए तो एक मिनट के अंदर उसकी मौत निश्चित है।

ब्लू लाइन ऑक्टोपस

ब्लू लाइन नाम के इस ऑक्टोपस का आकार टेबल टेनिस की बॉल के जितना छोटा होता है। दिखने मे यह बड़ा ही सुंदर होता है। इसे आसानी से आप मुट्ठी में पकड़ सकते हैं। ब्लू लाइन ऑक्टोपस ज्यादातर ऑस्ट्रेलिया, जापान, इंडोनेशिया, फिलीपींस और पापुआ न्यू गिनी में पाए जाते हैं। इसका जहर पहले आंखों और फिर श्वसन तंत्र को नाकाम कर देता है।

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मार्बल्ड कोन घोंघा

घोंघे आम तौर पर जहरीले नहीं होते लेकिन यह बात मार्बल्ड कोन स्नेल पर लागू नहीं होती। इसका जहर दूसरे प्राणियों को पहले अंधा बनाता है, फिर सांस गड़बड़ाने लगती है, लकवा हो जाता है और अंत में मौत हो जाती है। इसके जहर की फिलहाल कोई इलाज नहीं है।

किंग कोबरा

10 most poisonous creatures in the world

किंग कोबरा विषैले साँपों की ही एक प्रजाति है। यह सांप एशिया का ही स्थानिक है और मुख्यरूप से भारत के जंगलों से लेकर दक्षिणपूर्वीय एशिया तक मिलते हैं। यह विश्व के सबसे जहरीले सांप होते हैं। इसका जहर एक अफ्रीकन हाथी को कुछ ही घंटों में मार सकता है। इतना ही नहीं ये एक डंक में 5 गुना ज्यादा जहर छोड़ सकता है।

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डार्ट फ्राग

मध्य और दक्षिण अमेरिका में पाया जाने वाला यह मेंढक अपने रंग से शिकार को आकर्षित करता है। देखने में यह जितना सुंदर है उतना ही घातक भी है। शिकारियों से बचने के लिए इसकी त्वचा में घातक जहर होता है। इसके संपर्क में आने वाले जीवों के जिंदा बचने की संभावना बहुत कम होती है।

इनलैंड ताइपैन

ऑस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला इनलैंड ताइपैन बहुत सांपो की प्रजाति का बेहद जहरीला सांप है। इसके विष में न्यूरोटॉक्सिन होता है जो 45 मिनट के भीतर इंसान को मार डालता है।

स्टोन फिश

10 most poisonous creatures in the world

मकर रेखा के आसपास समुद्र में मिलने वाली और पत्थर सी दिखने वाली यह मछली बेहद जहरीली होती है। इसकी पीठ पर जहर होता है। जिसके संपर्क में आते ही दूसरे जीवों को लकवा मार जाता है। इसके जहर का इलाज है पर उपचार तुरंत मिलना चाहिए।

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पफर फिश

दिखने में बेहद सुंदर यह मछली बहुत ही जहरीली है। जापान, चीन, फिलीपींस और मेक्सिको में मिलने वाली इस मछली के अंदर साइनाइड से भी खतरनाक जहर होता है। कई लोग इसे खाते भी हैं लेकिन पकाने से पहले बेहद सावधानी से इसकी सफाई की जाती है।

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जुगाड़ ऐसा जिसके बारे में आपने कभी सोचा भी नहीं होगा, देखें वीडियो

सोशल मीडिया पर जुगाड़ के वीडियो आते ही रहते हैं। आमतौर पर भारतीय लोगों को जुगाड़ के लिए जाना जाता है। उनके देशी जुगाड़ के वीडियो को लोग देखना पसंद करते हैं। लेकिन कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक विदेशी महिला के जुगाड़ का वीडियो लोगों को खूब हंसा रहा है।

वीडियो में महिला प्याज काटते समय होने वाली परेशानी से बचने के लिए अनोखा तरीका अपनाती है। तरीका इतना खास है कि हम और आप आसानी से सोच नहीं पाएंगे। लेकिन ये जरूर है कि वीडियो देखने के बाद आपकी हंसी नहीं रुकेगी।

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महिला ने बनाई ये अनोखी फेस शील्ड

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लोगों को महिला का जुगाड़ पसंद आ रहा है। महिला ने किचन में होने वाली आम परेशानी को लेकर शानदार जुगाड़ लगाया है।

महिला कढ़ाई के शीशे वाले ढक्कन को बतौर शील्ड इस्तेमाल करती है। वीडियो में महिला शीशे को अपने चेहरे पर लगाती है फिर उसे हुड के कैप से अच्छी तरह ढक लेती है।

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इसके बाद आराम से किचन में रखी प्याज को काटती नजर आती है। वीडियो को देखकर सोशल मीडिया यूजर्स अपनी हंसी नहीं रोक पा रहे हैं। ये वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया गया है। लोग वीडियो को खूब पसंद कर रहे हैं।

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भारत के 6 सबसे घातक और जहरीले सांप

भारत के विशाल और घने जंगल सरीसृपों को अनुकूल निवास स्थान प्रदान करते हैं. भारत में सांपों की लगभग 270 प्रजातियां पायी जाती हैं, जिनमें से लगभग 50 प्रजातियों में ही जहरीले सांप होते हैं. इनमें से भी लगभग 15 प्रजातियाँ ही ऐसी हैं, जो बहुत अधिक ज़हरीली हैं और इनके काटने पर मृत्यु भी हो सकती है.

गैर-आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत में हर वर्ष लगभग 46 हज़ार लोग इन जहरीले सांपों के काटने से मर जाते हैं l ये हैं भारत के छह सबसे जहरीले सांप

इंडियन क्रेट (Indian Krait)

इंडियन क्रेट भारत का सबसे ज़हरीला सांप है। इसके एक बार काटने से इतना ज़हर निकलता है, जिससे 60 लोगों की जान जा सकती है। इस सांप की 12 प्रजातियाँ और 5 उप प्रजातियाँ हैं. भारत में यह सालाना लगभग 10,000 मौतों के लिए जिम्मेदार है। यह सांप रात में ही निकलता है।

इंडियन कोबरा (Indian Cobra)

इंडियन कोबरा को भारत में “नाग” के नाम से भी जाना जाता है. यह भारत के सबसे खतरनाक साँपों में से एक है। यह ज्यादातर जंगल में नदियों के किनारे, खेतों में और गाँवों के आसपास रहते हैं. यह रेंगने वाले जीवों को, छिपकलियों को और मेंढकों को अपना शिकार बनाते हैं. इंडियन कोबरा सांप को हिंदुओं में पूजा भी जाता है. भारत में हर साल लगभग 15,000 लोग इनके काटने से मारे जाते हैं।

रसेल वाईपर (Russell Viper)

indian-russel-wiper-snakeरसेल वाईपर को भारत में “कोरिवाला” के नाम से भी जाना जाता है. हालाँकि यह इंडियन क्रेट से कम जहरीला है, फिर भी यह सांप भारत का सबसे घातक सांप है. यह बेहद गुस्सैल सांप बिजली की तेज़ी से हमला करने में सक्षम है. इसके काटने की वजह से भारत में हर साल लगभग 25,000 लोगों की मौत हो जाती है।

सॉ-स्केल्ड वाईपर (Saw-Scaled Viper)

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सॉ-स्केल्ड वाईपर नाम का यह सांप लंबाई में छोटा होता है. लेकिन अपनी गुस्सैल, चिड़चिड़ी और अत्यंत आक्रामक प्रवृति और इसकी घातक जहर शक्ति इसे बहुत खतरनाक बना देती है. भारत में या सालाना लगभग 5,000 मौतों के लिए जिम्मेदार है।

द किंग कोबरा (The King Cobra)

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यह सांप भारत का ही नहीं, बल्कि विश्व का सबसे लंबा जहरीला सांप है. इसकी लंबाई 13-15 फुट होती है. यह ज्यादातर वर्षावनों, नम जंगलों, शांत दलदलों और बांस के वनों में रहते हैं. हालांकि ये बहुत ही अधिक जहरीले सांप होते हैं और इनके काटने पर मृत्यु होने की सम्भावना ज्यादा होती है, लेकिन गनीमत है कि यह बहुत ही कम लोगों को काटता है. किंग कोबरा भारत में इन 5 जगह अधिक पाया जाता है।

इंडियन पिट वाईपर (Indian Pit Viper)

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इंडियन ग्रीन पिट वाईपर को भारत में “बम्बू वाईपर” या “ट्री वाईपर” के नाम से भी जाना जाता है. यह सांप मुख्य रूप से झाड़ियों में और बांस के पेड़ों पर रहते हैं. यह सांप मेंढक, छिपकली और कीड़ों को अपना शिकार बनाते हैं. इन साँपों की लंबाई 2.5 फीट होती है. इंडियन ग्रीन पिट की प्रजाति ज्यादातर भारत के पश्चिमी घाट पर पायी जाती है।

किसने बनवाया था गंगोत्री मंदिर, जानिए कुछ रोचक बातें !!

गंगोत्री गंगा नदी का उद्गम स्थल है। गंगा जी का मंदिर समुद्र तल से 3042 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। भागीरथी के दाहिने ओर का परिवेश आकर्षक एवं मनोहारी है।

यह स्थान उत्तरकाशी से 100 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। गंगा मैया के मंदिर का निर्माण गोरखा कमांडर अमर सिंह थापा द्वारा 18वीं शताब्दी के शुरूआत में किया गया था।

वर्तमान मंदिर का पुननिर्माण जयपुर राजघराने द्वारा किया गया। प्रत्येक वर्ष मई से अक्तूबर के महीनों के बीच पतित पावनी गंगा मैया के दर्शन करने के लिए लाखों तीर्थयात्री यहां आते हैं।

यमुनोत्री की ही तरह गंगोत्री का पतित पावन मंदिर भी अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर खुलता है और दीपावली के दिन मंदिर के कपाट बंद होते हैं।

पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री राम के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर ने प्रचंड तपस्या की थी।

भगवान शिव इस स्थान पर अपनी जटाओं को फैलाकर बैठ गए और उन्होंने गंगा माता को अपनी जटाओं में लपेट लिया। शीतकाल के आारंभ में जब गंगा का जलस्तर इस स्थान पर काफी नीचे चला जाता है तब श्रद्धालुओं को पवित्र शिवलिंग के दर्शन होते हैं।

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  • गंगोत्री मंदिर से नीचे की ओर भागीरथी शिला है जिस पर यहां पिण्डदान आदि कर्म किये जाते हैं। यह वह स्थान है जहां गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए पाण्डवों ने यज्ञ किया था।
  • शिला से नीचे भागीरथी की जलधरा में एक कुण्ड सा बन गया है जिसको ब्रह्मकुण्ड कहते है। ब्रह्मकुण्ड के पीछे की ओर भागीरथी की धरा रूकने से बने कुण्ड को विष्णु कुण्ड के नाम से सम्बोधित किया जाता है।
  • लोक मान्यता के अनुसार इस कुण्ड में भगवान विष्णु निवास करते हैं। मंदिर से कुछ दूरी पर जहां झरने के रूप मे गंगा नीचे गिरती है वह स्थान गौरी कुण्ड कहलाता है।
  • लोक आस्थाओं के अनुसार पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए इस स्थान पर तपस्या की थी।
  • गंगा मंदिर के पीछे बनी समाधि के विषय में भी यह प्रसिद्ध है कि आदिगुरू शंकराचार्य का निर्वाण यहीं हुआ था।
  • गंगोत्री के निकट ही यहां के रक्षक का मंदिर है। भैरव देवता गंगोत्री के रक्षक हैं। ऐसी मान्यता है कि भैरव की पूजा किये बिना गंगोत्री की तीर्थ यात्रा का फल नहीं मिलता।
  • गंगोत्री के निकट ही “गंगनानी” नाम का स्थान है जहां गर्म जल के कुण्ड में स्नान किया जाता है। मान्यता है कि गंगोत्री धाम की यात्रा करने वाले सभी यात्रियों को इस कुण्ड में जरुर स्नान करना चाहिए।

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सर्दियों में टैनिंग को कैसे दूर करें, जानिए कुछ घरेलु उपाए !!

ज़्यादातर लोगों को लगता है कि टैनिंग केवल गर्मियों में होती है जबकि सच तो यह है कि गर्मियों की अपेक्षा लोग सर्दियों में ज्यादा धूप में बैठते हैं। हालांकि सर्दियों की धूप इतनी तेज़ नहीं होती है पर ज्यादा देर धूप में बिताने की वजह से चेहरा, हाथ और पैर का रंग काला हो जाता है। महिलाओं की त्वचा अधिक संवेदनशील होती है। आज इस पोस्ट में हम आपको बताने जा रहें है कि सर्दियों में टैनिंग को दूर करने के कुछ घरेलु उपाए ।

तो चलिए जानते हैं :-

Know how to remove tanning in winter

दही, हल्दी और नींबू

दो बड़े चम्मच दही में दो बूंद नींबू के साथ दो चुटकी हल्दी मिलाकर टैन हुई त्वचा पर 10 से 15 मिनट के लिए लगाएं। फिर सामान्य पानी से धो दें। सप्ताह में दो से तीन बार इस्तेमाल करने पर पूरी तरह टैनिंग दूर हो जाएगी।

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टमाटर, पपीता और ग्लिसरीन

धूप में बैठने से पहले पपीते में टमाटर का गूदा और ग्लिसरीन मिलाकर टैन हुए हाथ-पैरों और मुंह पर लगा लें। इस पेस्ट के इस्तेमाल से त्वचा का रंग काला नहीं पड़ेगा साथ ही यह पैक धूप की हानिकारक किरणों से त्वचा को खराब होने से भी बचाएगा।

दूध मलाई और ग्लिसरीन

इस मौसम में टैनिंग के साथ रूखापन भी बहुत बढ़ जाता है इसलिए त्वचा में नमी को बरकरार रखने के लिए मलाई में ग्लिसरीन मिलाकर रात में चेहरे पर लगाएं इससे स्किन का ग्लो भी बढ़ेगा साथ ही त्वचा में नमी भी बनी रहेगी।

छाछ औरदलिया

दो चम्मच छाछ में दलिया को भिगा लें। फिर इस पेस्ट से 10 मिनट चेहरे की मसाज करें। टैनिंग दूर हो जाएगी। छाछ त्वचा को ठंडक देगा तो वहीं दलिया क्लींजिग का काम करेगा।

एलोवरायुक्त मॉइश्चराइजर

स्किन के पीएच लेवल को बैलेंस करने के लिए ऐलोवेरा युक्त मॉइश्चराइजर लगाएं।

सही उत्पाद चुनें

मौसम में परिवर्तन के दौरान यह आवश्यक है कि त्वचा को एक अच्छे क्लींसर तथा मॉइश्चराइजर से सुरक्षित किया जाए। शरीर के अन्य हिस्सों के मुकाबले चेहरे की त्वचा के ऊतक ज्यादा नाजुक होते हैं, इसीलिए इन्हें अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है।

सही उत्पाद चुनने और उत्पाद के अवयवों को ध्यान में रखने से स्वच्छ एवं लचीली त्वचा प्राप्त कर सकते हैं। धूप में जब भी निकलें तो सन्सक्रीन लोशन का इस्तेमाल करें।

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ये हैं दुनिया की 10 सबसे खूबसूरत फूलों से भरी वादियां!!

प्रकृति के पास श्रृंगार की अद्भुत कलाएं हैं और पुष्प उस शृंगार का सबसे सुंदर आभूषण है। फूल सभी का मन मोह लेते हैं।
आज इस पोस्ट में हम आपको कुछ ऐसी खूबसूरत फूलों से भरी वादियों के बारे में बताने जा रहें है जो बेहद ही मनमोहक है, तो चलिए जानते हैं

फूलों की घाटी, उत्तराखंड

देवभूमि उत्तराखंड के चमोली स्थित पुष्पों की यह सुरम्य घाटी एक राष्ट्रीय उद्यान है। समुद्र तल से क़रीब 3,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह उद्यान 87.50 वर्ग किमी में फैला हुआ है और यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल में शामिल किया गया है। यहां 600 से अधिक प्रजाति के फूल पाए जाते हैं।

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कास पठार, महाराष्ट्र

पश्चिमी घाट के महाराष्ट्र भाग में स्थित यह कास पठार एक रिज़र्व फॉरेस्ट है तथा वर्ष 2012 में यूनेस्को द्वारा इसे प्राकृतिक विश्व विरासत स्थल के रूप में चिह्नित किया गया।

अगस्त से सितम्बर माह के मध्य यहां असंख्य फूलों और तितलियों की प्रजातियां देखने को मिलती हैं, जो कि विशेषत: यहीं पाई जाती हैं। समुद्र तल से 1,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह पठार 10 वर्ग किमी में फैला है।

यमथांग वैली, सिक्किम

यमथांग वैली (सिक्किम वैली ऑफ़ फ्लॉवर्स सैंक्चुरी) हिमालय की गगनचुम्बी चोटियों से उत्पन्न होते नयनाभिराम दृश्य, गर्म जलस्रोतों, याक एवं फूलों के लिए प्रसिद्ध है।

3,564 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह घाटी विदा लेते फरवरी से जून मध्य तक फूलों की रंगबिरंगी चादर बिछी नज़र आती है। यहां पर इस क़दर बर्फबारी होती है कि दिसम्बर से मार्च के बीच यह घाटी पर्यटकों के लिए बंद रहती है।

जूकू वैली, नगालैंड

समुद्र तल से 2,452 मीटर की ऊंचाई पर स्थित जूकू वैली नगालैंड और मणिपुर की सीमा पर स्थित है और प्राकृतिक वातावरण, मौसमी पुष्प, वनस्पतियों तथा जीवों के लिए प्रसिद्ध है।

यूं तो यहां हर मौसम में फूल देखने को मिलते हैं लेकिन यहां का जूकू लिली फूल अधिक प्रसिद्ध है जो कि सिर्फ यहीं प्राप्त होता है। नगालैंड के राज्य पक्षी ब्लिथ ट्रैगोपन के अलावा एशियन गोल्डन कैट भी यहीं पाई जाती है।

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मुन्नार घाटी, केरल

दक्षिण भारत का प्रसिद्ध हिल स्टेशन है मुन्नार जिसका मलयाली अर्थ होता है तीन नदियां। यूं तो मुन्नार कई कारणों से प्रसिद्ध है किंतु नील कुरेंजी फूल ने इसे प्रसिद्धि के शीर्ष पर विराजमान किया है जो कि 12 वर्ष में केवल एक बार खिलता है।

जब नीलवर्णी नीलकुरेंजी पुष्पों से पूरी घाटी नीलाम्बर ओढ़ लेती है तो इस दृश्य को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक यहां जुटते हैं। 2018 के पश्चात अब ये फूल वर्ष 2030 में पुन: खिलेंगे।

ट्यूलिप गार्डन, श्रीनगर

ट्यूलिप फूलों का एशिया का सबसे बड़ा उद्यान है। ज़बरवान रेंज की तलहटी में बसा यह गार्डन घाटी में फूलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 2007 में खोला गया था।

यहां पर ट्यूलिप की क़रीब 65 प्रकार की प्रजातियां मौजूद हैं। प्रतिवर्ष वसंत आगमन पर यहां ट्यूलिप महोत्सव का आयोजन किया जाता है।

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एंटलोप वैली, कैलिफोर्निया

कैलिफोर्निया स्थित यह घाटी हर वसंत में पीले रंग के पॉपी नामक फूलों से ढक जाती है, जो कि इसे एक सुंदर दृश्य प्रदान करता है। यहां फरवरी मध्य से मई तक घाटी में फूल देखने को मिलते हैं। 790 से 910 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह वन-क्षेत्र कैलिफोर्निया राज्य सरकार द्वारा संरक्षित है।

लैवेंडर फील्ड, फ्रांस

फ्रांस का प्रोवेंस क्षेत्र पहाड़ों पर बसे गांव, लैंवेंडर के खेतों और मेडिटेरियन सागर के लिए प्रसिद्ध है। पहाड़ों से घिरे लैवेंडर के बैंगनी खेतों को देखने का सबसे सही समय जून मध्य से जुलाई मध्य के बीच होता है, जब सारा क्षेत्र बैंगनी रंग की चादर ओढ़ लेता है।

यहां पर लैवेंडर इतनी बहुतायत में होता है कि इस फूल को यहां की ‘आत्मा‘ माना जाता है। प्रोवेंस तथा लैवेंडर एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं।

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यलोस्टोन पार्क, अमेरिका

अमेरिका के इस पहले राष्ट्रीय उद्यान का उदघाटन 1872 में हआ था। यह पार्क विशेषत: वन्यजीवों तथा विविध वनस्पतियों के लिए जाना जाता है।

यहां पर वृक्षों की क़रीब 1,700 प्रजातियां पाई जाती हैं और कई फूलों की प्रजातियां यहां खिलती हैं। अधिकतर पुष्प प्रजातियां मई से सितम्बर माह के मध्य खिलती हैं। यलोस्टोन सैंड वर्बीना एक दुर्लभ पुष्प प्रजाति है, जो सिर्फ इसी उद्यान में पाई जाती है।

कैस्टलुसियो, इटली

इटली के उम्ब्रिया क्षेत्र में कैस्टलुसियो नामक पहाड़ी गांव है, जो चारों ओर से सिबिलिनी पहाड़ों से घिरा है। पहाड़ी के नीचे की ओर खेती होती है और यहां की दालें बहुत प्रसिद्ध हैं।

1,452 मीटर ऊंचे इस स्थान की सुंदरता में रंग-बिरंगे फूल चार चांद लगा देते हैं। मई के अंत से जुलाई तक यहां फूलों की चादर बिछ जाती है जिसे ‘ला फिओरिता‘ कहते हैं।

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