जानिए ग्लास फ़्रॉग के बारे में कुछ रोचक तथ्य!

ग्लास फ्रॉग या “सी-थ्रू फ्रॉग” एक अद्वितीय प्रकार का मेंढक है जिसका नाम उसकी पारभासी त्वचा के कारण रखा गया है। ग्लास फ्रॉग 60 विभिन्न प्रकार के होते हैं। वे दक्षिणी मेक्सिको में, मध्य और दक्षिण अमेरिका में रहते हैं।

ग्लास फ्रॉग उष्णकटिबंधीय वर्षावनों में जीवन पसंद करते हैं। इन मेंढकों को पालतू जानवरों के रूप में भी रखा जा सकता है, लेकिन टेरारियम में जीवित रहने के लिए उन्हें विशेष देखभाल और जलवायु परिस्थितियों की आवश्यकता होती है।

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ग्लास फ़्रॉग के बारे में कुछ रोचक तथ्य

  • इन मेंढकों का आकार प्रजातियों पर निर्भर करता है। छोटी प्रजातियां आमतौर पर 0.78 इंच लंबी होती हैं। बड़ी प्रजातियां लंबाई में 3 इंच तक पहुंच सकती हैं।
  • ग्लास फ्रॉग का शरीर आमतौर पर चमकीले हरे या जैतून के हरे रंग का होता है। इसे काले, सफेद, नीले या हरे धब्बों से ढका जा सकता है। इसका पेट पारभासी त्वचा से ढका होता है।
  • ग्लास फ्रॉग को नीचे से देखने पर जिगर, हृदय और आंतों को देखा जा सकता था। कुछ प्रजातियों की हड्डियाँ हरे या सफेद रंग की होती हैं।

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  • वैज्ञानिकों का मानना ​​​​है कि विशिष्ट प्रकार की त्वचा छलावरण के एक तरीके का प्रतिनिधित्व करती है, जोकि शिकारियों को ग्लास फ्रॉग को आसानी से पहचानने से रोकती है (विशेषकर जब वे पत्तियों पर गतिहीन बैठते हैं)।
  • ग्लास फ्रॉग एक मांसाहारी है। यह कोमल शरीर और विभिन्न प्रकार की मकड़ियों वाले कीड़ों को खाता है।
  • अपने छोटे आकार के कारण, ये बड़े शिकारियों का आसान लक्ष्य होते हैं। ग्लास फ्रॉग के मुख्य दुश्मन सांप, स्तनधारी और पक्षी हैं।
  • ये निशाचर जानवर हैं। वे शाम से लेकर सुबह के शुरुआती घंटों तक सबसे अधिक सक्रिय होते हैं।
  • ग्लास फ्रॉग वृक्षीय जानवर हैं (पेड़ों में अपना जीवन व्यतीत करते हैं)। ये संभोग के मौसम के दौरान ही मैदान में आते हैं।
  • संभोग आमतौर पर बारिश के मौसम के बाद या हल्की बारिश के दौरान होता है। मादा पानी के ऊपर लटकी पत्तियों के नीचे 20 से 30 अंडे देती है। नर इन अंडों रक्षा करता है। जब इन अंडों में से टैडपोल निकलते हैं वे अंडे को शिकारी कीड़ों और परजीवियों से सुरक्षित रखते हैं।

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  • टैडपोल 2 सप्ताह के बाद फूटते हैं और पानी में गिर जाते हैं। गिलास फ्रॉग की कुछ प्रजातियां तब तक जमीन में दब जाती हैं जब तक कि वे वयस्क मेंढक नहीं बन जाते। अन्य प्रजातियां पानी में कायापलट से गुजरती हैं।
  • सारे गिलास फ्रॉग इतने पारदर्शी नहीं होते कि उनका दिल सीने में से बाहर ही नजर आता रहे।
  • इनका औसत जीवनकाल आमतौर पर जंगली में 10 से 14 वर्ष के बीच होता है।

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जानिए कुछ रोचक तथ्य दुनिया के सबसे अनोखे हरियल पक्षी के बारे में, जो कभी भी अपने पैर जमीन पर नहीं रखता!

धरती पर कई तरह के जानवर और पक्षी रहते हैं। आपने पक्षियों को पेड़ों पर बैठे या आसमान में उड़ते देखा होगा। इसके साथ ही आपने पक्षियों को जमीन पर बैठकर या अनाज खाते हुए भी देखा होगा,

लेकिन इस दुनिया में एक ऐसा पक्षी भी है जो कभी भी अपने पैर जमीन पर नहीं रखना चाहता। जी हां आज इस पोस्ट में हम आपको इसी अनोखे पक्षी के बारे बताने जा रहे हैं, तो चलिए जानते हैं:-

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  • हरियल नाम का यह पक्षी कभी जमीन पर पैर नहीं रखता। इस पक्षी का वैज्ञानिक नाम ट्रेरोन फोनीकोप्टेरा है और यह बरगद और पीपल के पेड़ों पर अपना घोंसला बनाता है।
  • इसका आकार कबूतर जैसा होता है। साथ ही इस पक्षी का रंग ग्रे और हरा होता है। इसमें पीली धारियां होती हैं। इस पक्षी की चोंच मोटी और मजबूत होती है। आंखें नीली और उनके चारों ओर एक गुलाबी घेरा है। इसे अंग्रेजी में ग्रीन पिजन भी कहते हैं।
  • यह पक्षी पर्णपाती या सदाबहार जंगलों में पेड़ों पर रहना पसंद करता है। यह जमीन पर आना पसंद नहीं करता, इसलिए यह अपना पूरा जीवन पेड़ों पर ही बिता देता है।
  • इस पक्षी का आकार 29 सेंटीमीटर से लेकर 33 सेंटीमीटर तक होता है तथा इसका वजन मात्र 225 ग्राम से 260 ग्राम के बीच होता है, यह एक सामाजिक प्राणी है और झुंडो में ही पाए जाते हैं, इनके पंखों का फैलाव 17 से 19 सेंटीमीटर लंबा होता है, इनके शरीर का रंग हल्का पीला हरा होता है जोकि ओलिव के फल से मिलता-जुलता होता है।

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  • आप इस पक्षी को पेड़ के शीर्ष भाग पर बैठे हुए देख सकते हैं। हरियल पक्षी एक शाकाहारी पक्षी है और फल, पौधे के अंकुर और अनाज खाना पसंद करता है।
  • हरियल पक्षी घास के तिनके और पत्तियों से अपना घोंसला बनाता है। इस पक्षी के बारे में यह भी कहा जाता है कि ये घने और ऊंचे पेड़ों पर अपना घोंसला बनाना पसंद करते हैं।
  • इस पक्षी का प्रजनन काल मार्च से जून तक होता है। यह एक प्रजनन काल में एक से दो अंडे ही देते हैं इन अंडो का रंग चमकीला सफेद होता है, अंडे से बच्चे बाहर आने पर दोनों हरियल पक्षी बच्चों की देखभाल करते हैं।
  • ये पक्षी भारत के अलावा पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बर्मा, चीन आदि देशों में भी पाए जाते हैं। कहा जाता है कि यह पक्षी बहुत शर्मीला होता है। जब कोई व्यक्ति आता है, तो वह चुप रहता है।

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फिटनेस स्मार्ट गैजेट्स जिन्हें आप घर पर इस्तेमाल कर सकते हैं!

स्वस्थ जीवन पाने के लिए कसरत जरूरी है लेकिन हम सभी जानते हैं कि व्यस्त जीवन के कारण लोग अपने काम और व्यायाम के बीच संतुलन नहीं बना पाते हैं।

आजकल लोग एक नॉर्मल घड़ी की बजाय स्मार्ट वॉच पहनना ज्यादा पसंद करते हैं। स्मार्ट वॉच हमारी जीवनशैली को बनाए रखने का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है।

अगर आपके पास बाहर जाने का समय नहीं है तो कुछ स्मार्ट गैजेट्स के साथ आप घर पर ही एक्सरसाइज कर सकते हैं। ये फिटनेस गैजेट्स जिम जाने के बराबर ही फायदेमंद होते हैं।

इस पोस्ट में हमने कुछ फिटनेस गैजेट्स सूचीबद्ध किए हैं जो आपको खुद को फिट रखने मदद करेंगे। तो चलिए जानते हैं:-

स्मार्ट वॉच

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आजकल लोगों एक नॉर्मल घड़ी की बजाय स्मार्ट वॉच पहनना ज्यादा पसंद करते हैं। स्मार्ट वॉच हमारी जीवनशैली को बनाए रखने का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है।

स्मार्ट वॉच को ब्लूटूथ की सहायता से आसानी से मोबाइल से कनेक्ट किया जा सकता है। इस घड़ी में आप ने सिर्फ वक्त देख सकते हैं बल्कि ये स्टेप, एक्सरसाइज के गोल, हार्ट बीट, हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर को भी ट्रैक कर सकते हैं।

स्किपिंग रोप

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फिट रहने के लिए स्किपिंग सबसे अच्छे तरीकों में से एक है। जिन लोगों को कार्डियो एक्सरसाइज पसंद है वो इसके लिए घर पर स्किपिंग रोप ट्राई कर सकते हैं।

यह आपके स्मार्ट फ़ोन से अटैच्ड होती है जहाँ पर ये जंप काउंट, कैलोरी बर्न रेट, आपने कितनी कैलोरी बर्न की जैसे डाटा शो करती है।

स्मार्ट एक्सरसाइज़ साइिकल

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साइकिल चलाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है और हाँ आप इसे अपने घर पर कर सकते हैं यदि आपके पास बाहर जाने के लिए समय नहीं है।

पोर्टेबल ट्रेडमिल

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कुछ लोगों को वर्कआउट करना बिल्कुल पसंद नहीं होता है, लेकिन वो रनिंग और जॉगिंग करने के शौकीन होते हैं। ऐसे लोग पोर्टेबल ट्रेडमिल का इस्तेमाल कर सकते है।

पोर्टेबल ट्रेडमिल पर आप जॉगिंग और वॉकिंग, रनिंग जैसी एक्सरसाइज कर सकते हैं। इससे आप वेट लूज आसानी से कर सकते हैं। पोर्टेबल ट्रेडमिल को घर में रखने के लिए बहुत ही कम स्पेस की जरूरत होती है।

टमी ट्विस्टर

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इस गैजेट के नाम से ही जाहिर है कि ये आपके टमी यानी कि पेट की चर्बी को कम करने में मददगार साबित हो सकता है।

ऑफिस में घंटों बैठने के बाद जिन लोगों का पेट बाहर की ओर आ गया है ऐसे लोग टमी ट्विस्टर का सहारा लेकर इस चर्बी को कम कर सकते हैं। यह गैजेट परफेक्ट फिगर पाने में काफी मददगार हो सकता है।

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रहस्यमयी है भीमकुंड, केवल तीन बूंद पानी पीने से बुझ जाती है प्यास!

हमारे देश में ऐसी कई जगहें हैं जो बेहद अद्भुत और रहस्य्मयी है। इन्हीं रहस्य्मयी जगहों में से एक है भीमकुंड, जिससे जुड़ी कई कहानियां आज भी प्रचलित हैं।

कहा जाता है कि इसके पानी के स्रोत के बारे में आज तक किसी को पता नहीं चल पाया है। वहीं यह कुंड इतना चमत्कारी है कि इसके पानी की केवल तीन बूंद पीने से प्यास बुझ जाती है।

आज हम आपको इसी रहस्य्मयी के बारे में बताने जा रहे हैं,तो चलिए जानते हैं :-

कहाँ पर है ये कुंड

रहस्य्मयी कुंड को भीमकुंड कहा जाता है, और इसे नीलकुंड के नाम से भी जाना जाता है। यह मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से लगभग 77 किमी दूर बाजना गांव में स्थित है। जैसा कि नाम से पता चलता है, इस कुंड की कहानी महाभारत काल की है।

ऐसी मान्यता है कि महाभारत के समय जब पांडवों को अज्ञातवास मिला था तब वे यहां के घने जंगलों से गुजर रहे थे। उसी समय द्रौपदी को प्यास लगी। लेकिन, यहां पानी का कोई स्रोत नहीं था।

द्रौपदी व्याकुलता देख गदाधारी भीम ने क्रोध में आकर अपने गदा से पहाड़ पर प्रहार किया। इससे यहां एक पानी का कुंड निर्मित हो गया। लेकिन पानी का स्रोत जमीन की सतह से लगभग तीस फीट नीचे था।

तब युधिष्ठिर ने अर्जुन से अपने तीरंदाजी कौशल दिखाने और पानी तक पहुंचने का रास्ता बनाने को कहा। अर्जुन ने अपने बाणों से जलस्रोत तक सीढ़ियाँ बनायीं। इससे द्रौपदी पानी तक पहुंच गई और पानी पीकर वापस आ गई।

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यह कुंड भीम की गदा से बना था, इसलिए इसे भीमकुंड के नाम से जाना जाने लगा। यह भी माना जाता है कि यह भीमकुंड एक शांत ज्वालामुखी है।

कई भूवैज्ञानिकों ने इसकी गहराई को मापने की कोशिश की, लेकिन कुंड का तल नहीं मिल सका। कहा जाता है कि कुंड के अस्सी फीट की गहराई में तेज जलधाराएं बहती हैं। ये धाराएँ शायद इसे समुद्र से जोड़ती हैं।

भूवैज्ञानिकों के लिए भी भीमकुंड की गहराई आज भी एक रहस्य बनी हुई है। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से कई तरह के रोग दूर हो जाते हैं। कोई कितना भी प्यासा क्यों न हो, इस कुंड की केवल तीन बूंद उसकी प्यास बुझाती है।

वहीं अगर कोई संकट आने वाला है तो इस जल स्रोत का पानी बढ़ने लगता है। कुंड का एक और रहस्यमय पहलू यह भी है कि आम तौर पर जब कोई व्यक्ति पानी के भीतर मर जाता है, तो शरीर पानी की सतह से ऊपर तैरता है, लेकिन भीमकुंड की एक अलग घटना होती है।

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इस कुंड में एक बार डूबने के बाद शरीर फिर कभी ऊपर नहीं तैरता और शरीर फिर कभी नहीं मिल सकता। स्थानीय लोगों के अनुसार भीमकुंड आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का भी सूचक है।

जब भी प्राकृतिक आपदा आने वाली होती है तो भीमकुंड का जल स्तर काफी बदल जाता है। 2004 में सुनामी के समय जल स्तर लगभग 15 फीट बढ़ गया था और नेपाल भूकंप के समय भी ऐसा ही हुआ था।

इस कुंड के पानी को पवित्र जल माना जाता है। ऐसा कहा जाता ​​है कि मकर संक्रांति के दिन भीमकुंड में डुबकी लगाने से आप दोनों ठीक हो जाएंगे और आपके सभी पाप धुल जाएंगे।

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“गोरी बैठी छत्त पर” ओम प्रकाश ‘आदित्य’ द्वारा प्रस्तुत किया गया एक हास्यप्रद प्रसंग!

इस रचना का प्रसंग है कि एक नवयुवती छज्जे पर उदास बैठी है। उसकी मुख-मुद्रा देखकर लग रहा है कि जैसे वह छत से कूदकर आत्महत्या करने वाली है।

हिंदी के प्रसिद्ध हास्य कवि ओम प्रकाश आदित्य जी ने इस प्रसंग पर विभिन्न कवियों की शैलियों में लिखा है कि यदि अमुक कवि इस विषय पर लिखते तो कैसी कविता बनती।

मैथिलीशरण गुप्त

अट्टालिका पर एक रमिणी अनमनी सी है अहो
किस वेदना के भार से संतप्त हो देवी कहो?
धीरज धरो संसार में, किसके नही है दुर्दिन फिरे
हे राम! रक्षा कीजिए, अबला न भूतल पर गिरे।

सुमित्रानंदन पंत

स्वर्ण–सौध के रजत शिखर पर
चिर नूतन चिर सुंदर प्रतिपल
उन्मन–उन्मन‚ अपलक–नीरव
शशि–मुख पर कोमल कुंतल–पट
कसमस–कसमस चिर यौवन–घट

पल–पल प्रतिपल

छल–छल करती निर्मल दृग–जल
ज्यों निर्झर के दो नीलकमल
यह रूप चपल ज्यों धूप धवल
अतिमौन‚ कौन?
रूपसि‚ बोलो‚
प्रिय‚ बोलो न?

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

दग्ध हृदय में धधक रही
उत्तप्त प्रेम की ज्वाला।
हिमगिरि के उत्स निचोड़‚ फोड़
पाताल बनो विकराला।
ले ध्वंसों के निर्माण त्राण से
गोद भरो पृथ्वी की।
छत पर से मत गिरो
गिरो अंबर से वज्र–सरीखी।

काका हाथरसी

गोरी बैठी छत्त पर‚ कूदन को तैयार
नीचे पक्का फर्श है‚ भली करे करतार
भली करे करतार‚ न दे दे कोई धक्का
ऊपर मोटी नार कि नीचे पतरे कक्का
कह काका कविराय‚ अरी! मत आगे बढ़ना
उधर कूदना‚ मेरे ऊपर मत गिर पड़ना

गोपाल प्रसाद व्यास

छत पर उदास क्यों बैठी है‚
तू मेरे पास चली आ री।
जीवन का सुख–दुख कट जाए‚
कुछ मैं गाऊं‚ कुछ तू गा री।

तू जहां कहीं भी जाएगी‚
जीवन–भर कष्ट उठाएगी।
यारों के साथ रहेगी तो‚
मथुरा के पेड़े खाएगी।

श्यामनारायण पाण्डेय

ओ घमंड मंडिनी‚
अखंड खंड–खंडिनी।
वीरता विमंडिनी‚
प्रचंड चंड चंडिनी।

सिंहनी की ठान से‚
आन–बान–शान से।
मान से‚ गुमान से‚
तुम गिरो मकान से।

तुम डगर–डगर गिरो
तुम नगर–नगर गिरो।
तुम गिरो‚ अगर गिरो‚
शत्रु पर मगर गिरो।

भवानीप्रसाद मिश्र

गिरो!
तुम्हें गिरना है तो ज़रूर गिरो
पर कुछ अलग ढंग से गिरो
गिरने के भी कई ढंग होते हैं!
गिरो!
जैसे बूंद गिरकर किसी बादल से
बन जाती है मोती
बख़ूबी गिरो, हँसते-हँसते मेरे दोस्त
जैसे सीमा पर गोली खाकर
सिपाही गिरता है
सुबह की पत्तियों पर
ओस की बूंद जैसी गिरो
गिरो!
पर ऐसे मत गिरो
जैसे किसी की आँख से कोई गिरता है
किसी गरीब की झोपड़ी पर मत गिरो
बिजली की तरह
गिरो! पर किसी के होकर गिरो
किसी के ग़म में रोकर गिरो
कुछ करके गिरो

गोपालदास “नीरज”

यों न उदास रूपसी‚ तू मुस्कुराती जा‚
मौत में भी ज़िन्दगी के फूल कुछ खिलाती जा।
जाना तो हर एक को एक दिन जहान से‚
जाते–जाते मेरा एक गीत गुनगुनाती जा।

सुरेन्द्र शर्मा

ऐ जी, के कर रही है
छज्जे से नीचे कूदै है?
तो पहली मंज़िल से क्यूँ कूदे
चौथी पे जा!
जैसे के बेरो तो लाग्ये के कूदी थी!

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हरिवंश राय बच्चन की “मधुशाला”

अजीबो गरीब परम्परा : इंसान को जलाकर उसकी बची राख का सुप बनाकर पीते हैं यानोमामी समुदाय के लोग

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इस दुनिया में कई प्रकार की जातियों और समुदायों के लोग रहते हैं और सदियों से वे अपनी विशेष परंपरा और संस्कृति का पालन करते आ रहे हैं। लेकिन कुछ ऐसे समुदाय हैं जो अभी भी दुनिया के बाकी हिस्सों से अनजान हैं और उनके रहन-सहन और तौर-तरीके इतने अजीब कि सुनकर विश्वास करना भी मुश्किल होता है।

आज हम आपको दक्षिण अमेरिका के एक आदिवासी यानोमामी समुदाय में भी पाई जाती है। यहां लोग लाशों को जलाकर उनकी बची राख का सूप बनाकर पीते हैं।

जी हाँ आज इस पोस्ट में हम जानेगें इसी अजीबोगरीब यानोमामी समुदाय के बारे में, तो चलिए जानते हैं :-

यानोमामी जनजाति वेनेजुएला और ब्राजील के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। इन्हें यानम या सेनेमा के नाम से भी जाना जाता है। इस आदिवासी यानोमामी समुदाय के रहन-सहन का तरीका काफी अलग है।

ये पूरे गांव के लोग एक छत के नीचे रहते हैं। जिसके चारों ओर कमरे बने हुए हैं और बीच में एक बड़ा सा आंगन है। रहने की इस विशेष व्यवस्था को शबोनो कहा जाता है।

जहां प्रत्येक आदिवासी समुदाय और जनजाति में मृतकों के संबंध में अलग-अलग रीति-रिवाज और अनुष्ठान किए जाते हैं, वहीं इस यानोमामी समुदाय में अपने समुदाय के मरे हुए लोगों को खाने का रिवाज है। मांस खाने की ये अजीब परंपरा (एंडोकैनिबिलिज्म) Endocannibalism कहलाती है।

इन लोगों के अनुसार मृत्यु स्वाभाविक नहीं है। उनके अनुसार मृत्यु तब आती है जब कोई शत्रु किसी को शैतान का साया भेजकर मार डालता है तो वह व्यक्ति मर जाता है।

शव के संबंध में, इस यानोमामी समुदाय का मानना ​​है कि शरीर को मिट्टी में मिलने में जितना समय लगेगा, उस मृत व्यक्ति की आत्मा उतने ही दिनों तक पीड़ित रहेगी।

जब किसी की मृत्यु हो जाती हैं तो ये लोग शव को केले के पत्तों से ढक कर रखते हैं। जब कुछ समय बाद शरीर में केवल हड्डियाँ ही रह जाती हैं, तब ये लोग उसे जलाते हैं और फिर उसकी राख को केले से बनाए गए एक सूप जैसे पदार्थ में डाल लेते हैं और मृतक के परिवारजन उसे पीते हैं।

ये वहां की अंतिम संस्कार की एक परंपरा है। इस दौरान ये लोग काफ़ी रोते हैं और मृतक की याद में शोक गीत गाते हैं।

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ज़िंदगी में बस एक बार नहाती हैं यहाँ की महिलाएं, वजह जानकर रह जाएंगे दंग

अगर हम एक दो दिन न नहाएं तो कितना अजीब सा लगता है। 1-2 दिनों के बाद हर व्यक्ति स्नान करता है। दरअसल, हम तन और मन को शुद्ध रखने के लिए स्नान करते हैं। नहाने से हमारी थकान दूर होती है और शरीर स्वस्थ रहता है।

अगर हम कुछ दिनों तक नहीं नहाते हैं तो शरीर से बदबू आने लगती है और हमारी मानसिकता भी थोड़ी अजीब लगने लगती है। लेकिन इस दुनिया में एक ऐसी जगह भी है जहाँ महिलाओं को जीवन में केवल एक बार नहाने की इजाज़त है।

जी हाँ लेकिन बावजूद इसके उन्हें अफ्रीका की सबसे खूबसूरत महिलाएं माना जाता है। यही नहीं वे अपने शरीर को साफ कैसे रखती हैं ये सुनकर आप दंग रह जाएंगे।

दरअसल, दुनिया में कई ऐसी जनजातियां हैं, जिनके बहुत ही अनोखे रिवाज हैं। कुछ ऐसा ही अफ्रीका के उत्तरी नामीबिया के कुनैन प्रांत में रहने वाली हिम्बा जनजाति की महिलाओं के साथ भी है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां महिलाओं को स्नान करने की मनाही है, फिर भी उन्हें अफ्रीका की सबसे खूबसूरत महिला माना जाता है। इस प्रजाति के लोग समझते हैं कि अगर महिलाओं को नहाने की इजाजत दे दी गई तो उनकी सुंदरता खत्म हो जाएगी और फिर कोई उनसे शादी नहीं करेगा।

इतना ही नहीं ये महिलाएं हाथ धोने के लिए भी पानी का इस्तेमाल नहीं कर सकती हैं। हालांकि इन महिलाओं का खुद को साफ रखने का अपना एक खास तरीका होता है।

ये महिलाएं अपनी त्वचा को धूप से बचाने के लिए खास लोशन का इस्तेमाल करती हैं। यह लोशन जानवरों की चर्बी और हेमाटाइट (लोहे की तरह एक खनिज तत्व) के घोल से तैयार किया जाता है।

हेमाटाइट की धूल के कारण उनकी त्वचा का रंग लाल हो जाता है। यह खास लोशन उन्हें कीड़ों के काटने से भी बचाता है। इन महिलाओं को “रेड मेन” के नाम से भी जाना जाता है।

ये महिलाएं नहाती नहीं हैं, लेकिन अपनी खूबसूरती को बरकरार रखने के लिए ये कई काम करती हैं। ये महिलाएं जड़ी-बूटियों और वहां की मिट्टी से खुद को खूबसूरत रखती हैं।

यहां की महिलाओं के बारे में सबसे खास बात ये है कि हिम्बा जनजाति में परिवार का मुखिया पुरुष ही क्यों न हो, लेकिन आर्थिक फैसले लेने का हक सिर्फ महिलाओं को ही है।

दूसरी सबसे बड़ी बात ये है कि यहां की महिलाएं साल में सिर्फ एक बार ही नहाती हैं, वो भी अपनी शादी के समय।

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वास्तु के अनुसार न करें सूर्यास्त के बाद ये काम, रूठ जाती है माँ लक्ष्मी 

वास्तु में कहा गया है कि सूर्यास्त के बाद कई ऐसी गतिविधियां होती हैं जिनसे बचना चाहिए। सूर्योदय और सूर्यास्त को दिन और रात के मिलन का समय माना जाता है। इसलिए शास्त्रों में इस समय का बहुत महत्व माना गया है।

आपने अपने पूर्वजों से हमेशा सुना होगा कि शाम को न तो सोना चाहिए और न ही झाड़ू लगाना चाहिए। इसका कारण यह है कि देवी लक्ष्मी क्रोधित हो जाती हैं।

अगर आप ऐसा करते हैं तो आपको कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। ज्योतिष का मानना ​​है कि शाम को माता सरस्वती, देवी लक्ष्मी और देवी दुर्गा के आगमन का प्रतीक है। ऐसे में कई बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है।

शाम को न सोएं

हर चीज का एक सही समय होता है। इंसान के लिए सही आदत का होना बहुत जरूरी है। जो लोग शाम को सोते हैं उन्हें अब ऐसा नहीं करना चाहिए।

ऐसा करने से उस व्यक्ति का जीवन कम हो जाता है और वह कई बीमारियों का शिकार हो जाता है। देवी लक्ष्मी सूर्यास्त और शाम के समय घर में आती हैं। इसके साथ ही शाम के समय घर के दरवाजे खुले रखें।

घर या आंगन में झाडू न लगाएं

शास्त्रों के अनुसार सूर्यास्त और शाम के समय घर में झाडू नहीं लगाना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि इस दौरान देवी लक्ष्मी घरों में प्रवेश करती हैं। यदि आप इस समय झाडू लगाते हैं तो वह घर छोड़ देती है और उस घर में धन की कमी हो जाती है।

दहलीज पर मत बैठो

शास्त्रों के अनुसार शाम के समय घर की दहलीज पर नहीं बैठना चाहिए। इसे अशुभ माना जाता है। ऐसा करने से आपके घर में देवी लक्ष्मी का प्रवेश नहीं होगा।

घर का मुख्य दरवाजा बंद न रखें

वास्तु के अनुसार शाम के समय घर का मुख्य दरवाजा बंद न रखें। ऐसा माना जाता है कि इस समय ही मां लक्ष्मी घर में प्रवेश करती हैं। इसलिए इस समय दरवाजे बंद रखने से मां का आगमन नहीं होता और घर में गरीबी आती है।

तुलसी के पौधे को छूने से बचें

हिंदू धर्म में तुलसी पौधे का विशेष महत्व है। मान्यता है कि तुलसी जी को जल चढ़ाने व पूजा करने से घर में सुख-समद्धि, शांति व खुशहाली का वास होता है। मगर सूर्यास्त के बाद तुलसी पौधे को पानी देने व इसे छुने से बचना चाहिए।

बाल और नाखून न काटें

सूर्यास्त के बाद बाल और नाखून काटना अशुभ माना जाता है। ऐसा करने से जीवन में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके कारण धन संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसके साथ जीवन से जुड़ी कई परेशानियां भी झेलनी पड़ सकती है।

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कैल्शियम से भरपूर होते हैं ये खाद्य पदार्थ!!

कैल्शियम एक पोषक तत्व है जो हर जीवित जीव के लिए महत्वपूर्ण है। यह सबसे महत्वपूर्ण खनिज है जो हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है और शरीर के विकास और रखरखाव में मदद करता है।

हमारे शरीर में 1 प्रतिशत कैल्शियम खून और मांसपेशियों में होता है, जबकि हड्डियों और दांतों में 99 फीसदी कैल्शियम होता है। यह मांसपेशियों की गति और हृदय क्रिया में मुख्य भूमिका निभाता है।

रोजाना कम से कम 1000 मिलीग्राम कैल्शियम का सेवन करना चाहिए क्योंकि यह आपको लंबे समय तक स्वस्थ रखता है। समय के साथ बहुत से लोग अपनी हड्डियों की ताकत खोने लगते हैं क्योंकि उनके शरीर में इसकी कमी हो जाती है और परिणामस्वरूप उनकी हड्डियों का घनत्व भी कम हो जाता है।

डॉक्टरों द्वारा उचित कैल्शियम युक्त आहार लेने की सलाह दी जाती है। बहुत से लोग अपने कैल्शियम को खाद्य पदार्थों से प्राकृतिक तरीके से प्राप्त करते हैं, जबकि कुछ अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इसकी खुराक लेने का विकल्प चुनते हैं।

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आज इस पोस्ट में हम आपको कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों के बारे में बताने जा रहे हैं जो कैल्शियम से भरपूर होते हैं ये खाद्य पदार्थ, तो चलिए जानते हैं :-

डेयरी उत्पाद– कैल्शियम का सबसे अच्छा सोर्स है डेयरी उत्पाद। आपको कैल्शियम की कमी पूरा करने के लिए डाइट में दूध, दही और पनीर शामिल करना चाहिए। इसके डेली नीड्स को पूरा करने के लिए दूध और उससे बनी चीजें खा सकते हैं।

तिल और चिया जैसे बीज – शरीर को तुरंत ऊर्जा देने के लिए बीज सबसे अच्छे माने जाते हैं। इतना ही नहीं ये बीज स्वस्थ वसा और प्रोटीन के साथ-साथ कैल्शियम से भरपूर होते हैं।

बादाम – बादाम से भरा एक कप 385 मिलीग्राम कैल्शियम का सबसे अच्छा प्रदाता के रूप में भी जाना जाता है।

हरी सब्जियां – हरी सब्जियों में विटामिन्स और मिनिरल्स भरपूर पाए जाते हैं। आप खाने में पालक, मैथी, बीन्स शामिल कर सकते हैं। ब्रोकली और बीन्स कैल्शियम से भरपूर होती हैं।

फल– स्वस्थ रहने के लिए डाइट में फल भी शामिल करने चाहिए. आप कैल्शियम के लिए रोज 2 संतरे खाएं। संतरे में विटामिन सी के साथ भरपूर कैल्शियम पाया जाता है। 2 संतरे खाने से आप कैल्शियम की दैनिक जरूरतों को पूरा कर सकते हैं।

अंजीर – एक प्रकार का मेवा जिसमें सभी सूखे मेवों में सबसे अधिक कैल्शियम होता है।

आंवला– कैल्शियम की कमी को पूरा करने के लिए आप आंवला का सेवन जरूर करें। आंवला को चिरआयु फल कहा जाता है। आंवला में भरपूर एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं जिससे शरीर इंफेक्शन से बचता है। आंवला में कैल्शियम भी काफी मात्रा में पाया जाता है। इसके अलावा विटामिन सी का सबसे अच्छा सोर्स है आंवला। इससे इम्यूनिटी मजबूत होती है।

सोया मिल्क– यदि आप लैक्टोज असहिष्णु हैं, तो सोया मिल्क के लिए जाने का सुझाव दिया जाता है जो प्रोटीन और विटामिन डी के साथ कैल्शियम प्रदान करता है।

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OMG: इस बकरी के बच्चे के हैं 46 सेमी लंबे कान हैं: देखें तस्वीरें और वीडियो !

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पाकिस्तान के कराची में एक बकरी के बच्चे ने इतने लंबे कानों के साथ जन्म लिया है जिन्हें देखकर हर कोई चकित है। उसके कानों की लंबाई लगभग 19 इंच (46 सेमी) है, जिससे यह अब वर्ल्ड रिकॉर्ड बन सकता है।

मीडिया रिपोटर्स के मुताबिक, सिम्बा नाम की बकरी का जन्म 5 जून को सिंध में हुआ था। बकरी का मालिक मुहम्मद हसन नरेजो तब चकित रह गया जब उसने इस बकरी के इतने लंबे कान देखे।

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इस बकरी के बच्चे के कान इतने लंबे हैं कि चलते-चलते वे फर्श पर छू जाते हैं। वे उसके चेहरे के दोनों ओर लटकते हैं और हवा में झूलते हैं।

इस अनूठी विशेषता ने उसे और अधिक आकर्षक बना दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उसके इतने बड़े कान क्यों हैं? अगर नहीं जानते तो चलिए जानते हैं इस पोस्ट के माध्यम से :-

सिम्बा एक न्युबियन है जो बकरी की नस्ल है और वे अपने बड़े कानों के लिए लोकप्रिय हैं और ये कान गर्म मौसम में बकरी के शरीर को ठंडा रखने का एक बहुत ही महत्वपूर्ण काम करते हैं। हालांकि, सिम्बा के कान इस नस्ल की तुलना में बहुत ज़्यादा बड़े हैं।

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पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सबसे ज्यादा कामोरी बकरी पाई जाती हैं, जो कि यहां सबसे आम है। ऐसा कहा जाता है कि लगभग 54 मिलियन बकरियों के साथ, यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बकरी उत्पादक देश है।

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