महिलाओं के बारे में कुछ रोचक तथ्य

महिलाएं भगवान् द्वारा बनाई सबसे अदभुत रचना है। किसी भी देश की महानता और संस्कृति में महिलाओं का विशेष स्थान होता है और वेदों में भी महिलाओं को विशेष दर्जा प्राप्त है।

आज हम आपको महिलाओं से जुड़ी कुछ रोचक बातें बताने जा रहे हैं जिनको जानकर आप हैरान हो जायेंगे। तो आइये जानते हैं महिलाओं के बारे में कुछ रोचक तथ्य :-

  • महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज्यादा रंग दिखाई देते हैं। न्यूकासल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का मानना है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों को कम रंग दिखाई देते हैं।
  • जब एक महिला एक पुरुष के प्रति आकर्षित होती है, तो वह सामान्य से अधिक ऊँचे पिच में बात करती है।
  • “मैं क्या पहनूँ” यही सोचने में महिलाएं अपने जीवन का एक साल बिता देती हैं।
  • क्या आप जानते हैं दुनिया की पहली कम्प्यूटर प्रोग्रामर एक महिला थी।
  • फिजिकल डिफरेंस की वजह से महिलाओं का सिर्फ दिमाग का आकार छोटा होता है पर उसमें निहित कोशिकाएं बराबर ही होती हैं। पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मस्तिष्क नौ प्रतिशत छोटा होता है। इसका यह मतलब नहीं है कि उनकी बुद्धि छोटी होती है। यह मामला बराबर का होता है।
  • अमेरिका में 30% बिज़नेस की मालिक महिलाएं हैं।
  • महिलाएं झूठ बोलना कतई पसंद नहीं करती, खास तौर से रिलेशनशिप के मामलों में।
  • महिलाओं को डेट्स बहुत याद रहती है। उनकी दोस्ती किससे, किस दिन, कब, कहां और क्यों हुई, सारा लेखा जोखा उनके पास रहता है। अगर आप कभी उनसे कोई बात करें तो वह गड़े मुर्दे उखाड़ देगी, ऐसी बातें याद दिलाएगी जो आपको याद ही न हों।
  • 80% महिलाएं अपने दर्द को व्यक्त करने के लिए चुप्पी का उपयोग करती हैं।
  • महिला और पुरुष समान मात्रा में भावनाओं का अनुभव करते हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि महिलाएं अपनी भावनाओं को पुरुषों की तुलना में ज़्यादा दिखाती है।
  • एक रिसर्च के मुताबिक जीभ से चाटने से लेकर खाना खाते वक्त महिलाएं अपने जीवनकाल में करीब दो किलोग्राम लिपस्टिक खा जाती हैं। एक लिपस्टिक 2.5 ग्राम की होती है तो करीब 800 लिपस्टिक का मटीरियल महिलाओं के पेट में पाया जा सकता है।
  • महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण पुरुषों से अलग होते हैं। डिप्रेशन, मोटापा आदि की बात की जाए तो वह भी महिलाओं में ज़्यादा होने की संभावना होती है। इसका कारण प्रेग्नेंसी, खुद पर ध्यान ना देना या हॉर्मोन में बदलाव कुछ भी हो सकता है। मोटापा, डिप्रेशन आदि के कारण महिलाओं में दिल की बीमारी का खतरा ज़्यादा बढ़ जाता है।
  • महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक बुरे और अधिक भावनात्मक सपने आते हैं।
  • सीबीएस डेट्रायट के एक शोध से पता चला है कि महिलाओं को मासिक धर्म में ऐंठन और हार्ट अटैक का दर्द बराबर हो सकता है। इस स्थिति को डिसमेनोरिया (Dysmenorrhea) के नाम से जाना जाता है।
  • महिलाएं जिन्हें पसंद करती हैं उनके खिलाफ एक शब्द भी सुनना पसंद नहीं करती।
  • महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक बोलने वाला माना जाता है। यह कोई नई बात नहीं लग रही पर क्या आप जानते हैं कि महिलाएं पुरुष की तुलना में एक ही दिन में करीब 13 हजार शब्द ज़्यादा बोलने की सक्षम होती हैं।
  • लड़कियां जिससे प्यार करती हैं उसके बारे में हर मिनट सोचती रहती हैं।
  • अगर कोई भी लड़की स्पेशियली आपके लिए कुछ पका कर लाये , तो समझ लीजिए कि आप उसके लिए बेहद खास हैं।
  • महिलाएं इतनी ज़्यादा संवेदनशील होती हैं कि अगर कोई लड़का बेहद सेंटीमेंटल बात कह दे, तो वह उसे जिंदगी भर नहीं भूलती।

अजब – गजब:- एक ही पेड़ पर 8 तरह के फल, जानें कुछ रोचक बातें

आपने अलग-अलग तरह के फल खाएं होंगे, लेकिन शायद आपने कभी एक ही पेड़ में लगे 8 तरह के फल नहीं खाएं होंगे। आज हम आपको जिस फल के बारे में बताने जा रहे हैं उसका नाम है “फ्रूट सैलड ट्री”l

‘फ्रूट सैलड ट्री” जैसा नाम से ही स्पष्ट है। जिस तरह सैलड में कई सब्जियां होती हैं, ठीक इसी तरह फ्रूट सैलड ट्री पर कई तरह के फल उगते हैं। इस पर 6 से 8 तरह के एक ही प्रजाति के फल उग सकते हैं।

जैसे खट्टा फल नींबू, संतरा, चकोतरा आदि। अभी इस तरह के पेड़ पर अलग-अलग प्रजाति के फल जैसे सेब और केला एक साथ नहीं उगाया जा सकता है। आइए इस फ्रूट के बारे में जानते हैं…

जेम्स और केरी वेस्ट का था आइडिआ

1990 के शुरुआती दशक में ऑस्ट्रेलिया के जेम्स और केरी वेस्ट ने यह आइडिया पेश किया था। पहले फ्रूट सैलड ट्री को ऑस्ट्रेलिया में ही सफलतापूर्वक उगाया गया था।

बाद में ऑस्ट्रेलिया से ये पेड़ दुनिया के अन्य हिस्सों में पहुंचे। फ्रूट सैलड ट्री को खुले मैदान में या फिर गमले में उगाया जा सकता है।

चार प्रकार के फ्रूट सैलेड ट्री

मुख्य रूप से फ्रूट सैलड ट्री चार प्रकार के होते हैं। जिनके नाम स्टोन फ्रूट (stone fruit), सिट्रस फ्रूट (citrus fruit). मल्टि ऐपल (multi apple) और मल्टि नाशी (multi nashi) है।

स्टोन फ्रूट ट्री में बेर, खूबानी, आडू और शफतालू को उगाया जा सकता है। गर्म जलवायु में इसकी पैदावार अच्छी होती है। सिट्रस फ्रूट सैलड ट्री पर ।

नींबू, संतरा, चकोतरा, टैंगलो, पोमेलो, मैंडरिन आदि के फल उगाए जा सकते हैं। मल्टि ऐपल ट्री में तरह के सेब जैसे हरे, पीले और लाल सेब की पैदावार हो सकती है। मल्टि नाशी ट्री में कई तरह की नाशपाती की पैदावार हो सकती है।

इस ट्री के फायदे

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि छोटी सी जगह में आप कई फ्रूट उगा सकते हैं लेकिन इसमें एक खामी भी है। खामी यह है कि इसमें अलग प्रजाति के फल जैसे सेब और केला की एक साथ पैदावार नहीं हो सकती।

कैसे उगाया जाता है ये पेड़

इसे रात भर में एक बाल्टी पानी में भिगोकर रखा जाता है। उसके बाद आप इसे किसी खुली जगह या फिर गमले में भी लगा सकते हैं।

ठंड और गर्मी के मौसम में साल में दो बार उसमें खाद डाली जाती है। पेड़ रोपने के 6 से 18 महीने के अंदर पेड़ पर फल लगने शुरू हो जाते हैं।

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पेड़ अपनी पत्तियां क्यों गिराते हैं, जानिए क्या है कारण

पतझड़ी पेड़ अपनी पत्तियां गर्मी के सूखे दिनों में पानी बचाने के मकसद से गिराते हैं। हमारे यहां पतझड़ का मौसम करीब तीन महीने का रहता है। अलग-अलग पेड़ों के लिए पतझड़ का समय भी अलग-अलग होता है।

कुछ पेड़ों के लिए पतझड़ बीत चुका है तो कुछ के लिए अभी चल रहा है। इतना ही नहीं, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी पतझड़ का मौसम अलग-अलग समय आता है। कहीं सितंबर से नवंबर तक चलता है तो कहीं फरवरी से शुरू होकर अप्रैल-मई तक।

सवाल यह उठता है कि आखिर पेड़ अपनी पत्तियों को गिराते ही क्यों है? क्या इसमें भी उनका कोई फायदा होता है? गर्मियों से पहले पतझड़ी पेड़ अपनी पत्तियों को आने वाले गर्मी के सूखे दिनों में पानी बचाने के मकसद से गिराते हैं, वहीं ठंडे देशों के पतझड़ी पेड़ ऐसा सर्दी के दिनों में बर्फबारी से होने वाले नुकसान से बचने के लिए करते हैं।

पत्तियों के गिरने की शुरुआत उनके पीले पड़ने से होती है। सभी जानते हैं कि पेड़ अपना भोजन पत्तियों से बनाते हैं। जब पत्तियां गिरने लगती हैं तो उस समय भोजन निर्माण की प्रक्रिया भी रुक जाती है।

इस प्रक्रिया में कई पत्तियां अपना नाइटोजन और कार्बन निकालकर प्रोटीन के रूप में जड़ों और छाल में जमा कर देती हैं। यही संग्रहित प्रोटीन बाद में नाइट्रोजन के स्रोत के रूप में नई पत्तियों और फूलों के विकास के काम में आता है।

यह भी देखा गया है कि कई पतझड़ी पेड़ तभी फूलते हैं, जब वे पत्ती विहीन अवस्था में होते हैं, जैसे अमलतास, सेमल और टेसू।

पत्तियां नहीं होने से फूल दूर से ही स्पष्ट नजर आने लगते हैं और इसलिए कीट-पतंगे और पक्षी उनकी ओर ज़्यादा आकर्षित होते हैं।

सवाल यह भी है कि क्या वास्तव में पतझड़ी पेड़ों में हर साल प्रति पेड़ लाखों-करोड़ों नए पत्ते उगाना, कुछ महीने उनका उपयोग करना और फिर उन्हें त्याग देना उचित है?

विकासवादियों के अनुसार दुनिया में पतझड़ी पेड़ 10 करोड़ वर्ष पूर्व ही आए हैं, जबकि चीड़ और देवदार जैसे सदाबहार पेड़ 17 करोड़ वर्षों से यहां राज कर रहे हैं।

अतः पतझड़ी पेड़ प्रकृति के नए आविष्कार हैं जो विपरीत परिस्थितियों के लिए ज्यादा अनुकूलित हैं। चीड़ और देवदार जैसे सदाबहार पेड़ अपनी पत्तियां नहीं गिराते और उन्हें इसका भारी नुकसान भी उठाना पड़ता है,

जैसे बर्फबारी के दौरान उनकी ऊपरी शाखाएं टूट जाती हैं और उन पर पत्तियां खाने वाले शाकाहारियों का भी दबाव बढ़ जाता है, क्योंकि पतझड़ी पेड़-पौधे तो अपनी पत्तियां पहले ही गिरा चुके होते हैं।

आर्थिक दृष्टि से भी अहम है पतझड़ का मौसम

उपग्रह इस मौसम में जो चित्र भेजते हैं। उनमें पुथ्वी कछ ज्यादा ही रंगीन नजर आती है। इन चित्रों में गहरे, हरे, पीले, लाल व भूरे रंग के बदलाव की स्पष्ट तरंगें देखने को मिलती हैं।

रंग परिवर्तन की यह लहर दक्षिण यूरोप में 60 से 70 किलोमीटर प्रति दिन की रफ्तार से चलती है और सारा क्लोरोफिल देखते-देखते दो-तीन सप्ताह में नष्ट हो जाता है।

पत्तियों से जब क्लोरोफिल टूटता है तो वे पत्तियां पीली, नारंगी या लाल दिखाई देने लगती हैं। उनका पीलापन कैरोटीन और लाल रंग एंथोसाइन जैसे पदार्थों के कारण होता है।

यूरोपीय देशों में प्रकृति के इस बदले हुए रूप को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। पूर्वी उत्तरी अमेरिका में तो पतझड़ पर पर्यटन से अरबों डॉलर की कमाई होती है।

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धरती को नुकसान पंहुचा रहे “मांसाहारी “

6 करोड़ लोग प्रति वर्ष भूख से मर जाते हैं। क्या इसका कारण हमारे द्वारा खाया जाने वाले मांस है? जरा निम्नलिखित तथ्यों पर गौर करें..

80 प्रतिशत मक्का, मांस के लिए पाले जाने वाले पशुओं द्वारा खा लिया जाता है जबकि केवल 20 प्रतिशत मनुष्यों के खाने के लिए छोड़ा जाता है।

20 शाकाहारियों का पेट उतनी जमीन से भरा जा सकता है जितनी कि 1 मांसाहारी की भूख मिटाने के लिए जरूरत होती है। लगभग 5.45 किलो गेहूं से बनाई जा सकती हैं 12 ब्रैड तथा केवल 1 मांसाहारी हैमबर्गर।

1 किलो पशु प्रोटीन प्राप्त करने के लिए मुर्गियों को 5 किलो पौध प्रोटीन खिलाया जाता है। मांस केंद्रित भोजन के समर्थन में फसल उगाने के लिए 26 करोड़ एकड़ अछूते जंगल साफ कर दिए गए।

विश्व के पैट्रोलियम भंडार केवल 13 वर्षों तक बचे रहेंगे अगर सभी मनुष्य मांसाहारी होंगे लेकिन यदि सभी मनुष्य शाकाहारी हों तो 260 वर्षों तक।

5000 गैलन (लगभग 18927 लीटर) पानी का इस्तेमाल मात्र 1 पाऊंड (लगभग 454 ग्राम) बीफ तैयार करने के लिए किया जाता है।

1पाऊंड सेबों के लिए केवल 49 गैलन (लगभग 18550 लीटर) पानी की जरूरत है। पशुधन में मात्र 1 जानवर इतना पानी पी जाता है, जो 1 युद्धपोत के पानी की आपूर्ति के लिए पर्याप्त होता है।

इंसानी शरीर शाकाहार के लिए ही बना है, ये हैं इसके प्रमाण

पैतृक वंशानुक्रम

हमारे सबसे करीबी पूर्वज यानी कि प्राइमेट्स (नर-वानर या मनुष्य सदृश्यजानवर) शाकाहारी हैं। हमारी जैविक व्यवस्था इस संबंधमें परिवर्तित नहीं हुई है। अभी भी मनुष्य उन प्राइमेट्स जैसा दिखाई देता है, जिनसे इसका विकास हुआ है।

पालन-पोषण

हमारे पूर्वजों ने अपने बच्चों को फल चुनना और तोड़ना सिखाया न कि शिकार करना। यह अभी तक भी हमारे पालन-पोषण का काफी हद तक तरीका बना हुआ है।

सहज प्रवृत्ति

हम कच्चे मांस की बजाय फलों की खुशबू की ओर अधिक आकर्षित होते हैं।

जबड़े

मनुष्य शाकाहारी जीवों की तरह अपने जबड़े दाएं-बाएं तथा ऊपर-नीचे चला सकता है।
मांसाहारी जीव अपने जबड़े केवल ऊपर-नीचे चला सकते हैं।

आहार नली

मनुष्य की पाचन नलीशाकाहारी जीवों की तरह लंबी होती है, हमारी रीढ़ से कई गुना लंबी। शाकाहारी जीवों की आहार नली इससे कहीं कम लंबाई की होती है।

गाय : रीढ़ से 16 गुना, सिंह : रीढ़ से 3 गुना, मनष्य : रीढ़ से 12 गना

दांत

मनुष्य में शाकाहारियों की तरह कैनाइन्स (कुत्ते जैसे तीखे दांत) तथा इनसिजर्स (कृतक) की बजाय मोलार्स (चबाने वाले दांत) अधिक होते हैं, ताकि वे रेशेदार शाकाहारी चीज़ों को पीस सकें। मांसाहारी जीवों में मांस को चीरने-फाड़ने के लिए कैनाइन्स तथा इनसिजर्स अधिक होते हैं।

लार

मनुष्य की लार क्षारीय होती है, जैसे कि शाकाहारी जीवों की । मांसाहारी जीवों की लार अम्लीय होती है।

रात्रि दृष्टि (नाइट विजन)

मांसाहारी जीवों की रात्रि दृष्टि बहुत तेज होती है, ताकि अंधेरे में शिकार करने में उन्हें मदद कर सके। मनुष्य को शिकार करने की जरूरत नहीं होती और न ही वह करता है।

शाकाहारी जीवों की तरह मनुष्य खुद को पसीना बहा कर ठंडा करते हैं, जबकि मांसाहारी जीव हांफ कर खुद को ठंडा करते हैं।

पानी पीने का तरीका

सभी शाकाहारी जीवों की तरह मनुष्य पानी को अपने होंठों से खींच कर या चूस कर पीते हैं। मांसाहारी जीव अपनी जीभ में लपेट कर पानी को अपने मुंह में डालते हैं। यह एक और प्रमाण है इंसानी शरीर शाकाहार के लिए ही बना है।

गंगाजल के ये चमत्कारी टोटके खोल देंगे किस्मत के ताले

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ या किसी भी धार्मिक काम में गंगाजल को विशेष महत्व होता है। लोग किसी शुभ दिन व खास मौके पर गंगा नदी में स्नान करने जाते हैं।

मान्यता है कि इससे जीवन की परेशानियां दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुराणों के अनुसार, गंगाजल को अमृत माना जाता है।

ऐसे में ज्योतिष व वास्तुशास्त्र के अनुसार, कुछ उपाय या टोटके करने से जीवन की समस्याएं दूर होकर मनोकामनाओं को पूरा किया जा सकता है। तो आइए जानते हैं उन टोटकों के बारे में…

  • जो लोग अच्छी नौकरी की तलाश में हैं वे गंगाजल से जुड़ा यह उपाय कर सकते हैं। इसके लिए पीतल के लोटे में गंगाजल भरकर शिव जी को चढ़ाएं। बाद में उसमें बिल्वपत्र और कमल पुष्प डालकर महादेव को अर्पित करें। इससे कारोबार व नौकरी से जुड़ी परेशानी दूर होकर घर में सुख-समृद्धि व शांति का वास होगा।
  • भगवान शिव जी को गंगाजल अतिप्रिय  है। ऐसे में ज्योतिष व वास्तु शास्त्र के अनुसार, नियमित रूप से भोलेनाथ को गंगाजल चढ़ाना चाहिए। इससे जीवन की परेशानियां दूर होकर सुख मिलता है साथ ही मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • वास्तु शास्त्र के अनुसार घर पर गंगाजल रखने से कर्ज से मुक्ति मिलने के साथ आय के नए स्त्रोत बनते हैं। इसके लिए गंगाजल को पीतल की बोतल में डाल उसे अपने कमरे के उत्तर-पूर्व कोण में रखें। माना जाता है कि इससे कर्ज से परेशानी दूर होकर जीवन में खुशहाली आती है।
  • पुराणों के अनुसार गंगा जल को घर पर हमेशा रखना चाहिए। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने के साथ सुख-समृद्धि व शांति बनी रहती है। घर में खुशियों का आगमन होने के साथ अन्न व धन की बरकत बनी रहती है।
  • जिन घरों में लोग अक्सर बीमार रहते हैं उन्हें रोजाना गंगाजल का सेवन करना चाहिए। मान्यता है कि इससे इससे सेहत में सुधार होने के साथ बीमारियां दूर रहती है।

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ऐतिहासिक धरोहर है ‘अग्रसेन की बावड़ी’

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भारत की राजधानी दिल्ली का बहुत ही अद्भुत और गौरवशाली इतिहास रहा है। दिल्ली के संदर्भ में कहा जाता है कि यह नगर 7 बार उजड़ा है और 7 बार बसा है फिर भी आज दिल्ली अपने समृद्ध इतिहास से सम्पन्न है।

शहर की बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच में आप गर्व से इठलाती प्राचीन व मध्यकालीन इमारतों को आराम से देख सकते हैं जिन्हें भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने आने वाली पीढ़ियों के लिए संजो कर रखा है।

कई इमारतें ऐसी भी हैं जिनके आज केवल अवशेष देखने को मिलते हैं परंतु इन्हें भी संरक्षित रखा गया है। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने दिल्ली शहर में 1200 धरोहर स्थल घोषित किए हैं जोकि विश्व के किसी भी अन्य शहर की तुलना में कहीं ज्यादा हैं।

इन्हीं धरोहरों में से एक है ‘अग्रसेन की बावड़ी’। दिल्ली के दिल में स्थित यह बावली मशहूर पर्यटन स्थल तो है ही परंतु यह प्राचीन भारतीय वर्षा जल संरक्षण परम्परा का भी अप्रतिम उदाहरण है।

माना जाता है कि इस बावड़ी का निर्माण महाभारत काल में करवाया गया था परंतु इसके पुनः जीर्णोद्धार का कार्य महाराजा अग्रसेन द्वारा 14वीं शताब्दी में करवाया गया।

यह बावड़ी इस बात को सिद्ध करती है कि प्राचीन भारत तकनीकी रूप से सशक्त था और उस समय के लोग यह भी समझते थे कि हम बारिश के पानी को ऐसे ही बहने नहीं दे सकते, इसे संरक्षित करने के लिए इन बावड़ियों का निर्माण किया गया।

ये बावड़ियां एक जमाने में पेयजल का मुख्य स्रोत हुआ करती थीं। घर के नल में आसानी से जल उपलब्ध होने से यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि हम अपनी इन अनमोल धरोहरों को नगण्य रूप में देखें।

ये बावड़ियां जल संकट के इस युग में भी हमें इतिहास से परिचित कराते हुए जल संरक्षण के प्रति जागरूक होने की प्रेरणा देती हैं।

प्रत्येक नागरिक को अपने इस इतिहास पर गौरवान्वित होना चाहिए और इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाते हुए वर्षा जल संरक्षण की पद्धति को अपनाना चाहिए।

युवाओं के आकर्षण का केंद्र

यह बावड़ी अपने ऊपरी तल पर 60 मीटर लम्बी व भूतल पर 15 मीटर चौड़ी है। इस बावली में कुल 105 सीढ़ियां हैं जिनकी सहायता से नीचे के जल तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।

इस बावड़ी के निर्माण में लाल बलुए पत्थर का प्रयोग किया गया है तथा इसकी स्थापत्य शैली उत्तरकालीन तुगलक व लोदी काल से मेल खाती है। कनॉट प्लेस के हैली रोड पर स्थित यह बावली खास तौर पर युवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र है।

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जानिए हल्दी के सेवन से होने वाले जबरदस्त फायदों के बारे में

हल्दी एक ओर जहां खाने का स्वाद और रंग बढ़ा देती है, वहीं दूसरी ओर इसका उपयोग सौंदर्य वृद्धि और त्वचा की समस्याओं को दूर करने में भी किया जाता है, इसके अलावा हल्दी शरीर को स्वस्थ रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज इस पोस्ट में हम जानेंगे हल्दी से होने वाले जबरदस्त फायदों के बारे में :-

  • हल्दी में एंटीसेप्टिक और एंटीबायोटिक गुण होते हैं, इसलिए सर्दी-ज़ुकाम और कफ की समस्या होने पर हल्दी वाले दूध का सेवन करना लाभकारी होता है। यह शरीर को वायरस से लड़ने में भी मदद करता है। सर्दी के मौसम में इसका सेवन करना अधिक लाभकारी होता है।
  • खून के रिसाव को रोकने या चोट को ठीक करने के लिए हल्दी का आमतौर पर उपयोग किया जाता है, इसे चोट पर लगाने से यह दर्द में राहत मिलती है और घाव जल्दी भरता है।
  • हल्दी में मौजूद करक्यूमिन कैंसर को बढ़ने से रोकता है।
  • हल्दी का लेप चेहरे की रंगत निखारता है। दो टेबलस्पून बेसन में आधा चम्मच हल्दी और तीन चम्मच ताज़ा दही मिलाकर अपने चेहरे पर लगाएं और सूखने पर धो लें।
  • पेट की सेहत के लिए हल्दी को अच्छा माना जाता है। यह पित्ताशय में पित्त के निर्माण में मदद करती है। पित्त पाचन में सुधार करता है और पाचन सुचारू रहता है। अगर आप जंक फूड बहुत खाते हैं, तो आपको हर दिन हल्दी वाले पानी का सेवन करना चाहिए।

  • हल्दी को नैचुरल लिवर डिटॉक्सीफायर माना जाता है। इसके इस्तेमाल से रक्त में मौजूद विषैले तत्व बाहर निकलते हैं और ब्लड सर्कुलेशन अच्छा होता है। रक्त का धमनियों में प्रवाह बढ़ जाता है और हार्ट संबंधी परेशानियां नहीं होती।
  • हल्दी का सेवन शरीर को मजबूत बनाता है। प्रतिदिन सुबह के समय एक गिलास दूध में आधा चम्मच हल्दी मिलाकर पीने से शरीर सुडौल हो जाता है। गुनगुने दूध के साथ हल्दी के सेवन से शरीर में जमा अतिरिक्त फैट धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसमें उपस्थित कैल्शियम और अन्य तत्व वजन कम करने में भी मददगार होते हैं।
  • गठिया रोग में हल्दी के लड्डू विशेष लाभ देते हैं इसके लिए आग में भुनी हुई हल्दी की गांठों को घिसकर उसमें गुड़ मिलाकर लड्डू बनाएं। आप चाहें तो इसमें काजू भी मिला सकते हैं। इन लड्डुओं का सेवन प्रतिदिन सुबह नींबू या तुलसी की चाय के साथ करना चाहिए।
  • हाथ-पैरों में होने वाले दर्द से राहत पाने के लिए भी हल्दी वाला दूध फायदेमंद होता है।
  • इसके सेवन से हड्डियां मजबूत होती हैं। दूध में हल्दी मिलाकर पीने से हड्डियों से जुड़ी समस्याओं से छुटकारा मिलता है।
  • ब्लड शुगर बढ़ने पर हल्दी वाले दूध का सेवन करना लाभकारी होता है इससे शुगर लेवल कम होता है।
  • बॉडी को डिटॉक्स करने के लिए गर्म पानी में नींबू, हल्दी पाउडर और शहद मिलाकर पिएं। यह शरीर के टोक्सिन्स को बाहर निकालने में मददगार होता है।
  • कई महिलाओं को मासिक धर्म के समय अधिक दर्द व पेट में ऐंठन का सामना करना पड़ता है। इससे बचने के लिए हल्दी का इस्तेमाल किया जा सकता है। ईरान में हुए एक शोध के अनुसार, करक्यूमिन में एंटीइंफ्लेमेटरी गुण होता है, जो मासिक धर्म से पहले पीएमएस के लक्षणों को कम कर सकता है। मासिक धर्म के दौरान हल्दी दूध का सेवन फायदेमंद हो सकता है।
  • आंखों की रोशनी को बढ़ाने के लिए हल्दी के कोमल पत्तों का रस निकालकर छान लें और इसकी दो-दो बूंद हर रोज़ डालें। इससे नेत्र ज्योति बढ़ती है।
  • सोने से आधे घंटे पहले हल्दी वाला दूध पीने से नींद अच्छी आती है।
  • इससे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाती है। इसमें मौजूद लाइपोपॉलीसकराइड नाम का पदार्थ प्रतिरक्षा प्रणाली को बढाता है।
  • इसमें रक्त को साफ़ करने वाले तत्व होते हैं। हल्दी त्वचा से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करती है। यह त्वचा को साफ, स्वच्छ और सूंदर बनती है।

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भारतीय संविधान बनाने में इन महिलाओं का था विशेष योगदान

विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान ‘भारतीय संविधान’ 26 नंवबर 1949 को पारित हुआ और 26 जनवरी 1950 को पूरे देश में लागू हुआ था। इस संविधान को मूल रुप देने वाली समिति में 15 महिलाएं भी शामिल थीं, जिन्होंने संविधान के साथ-साथ भारतीय समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

आज हम इस पोस्ट में इन्हीं महिलाओं के बारे में बात करने जा रहे है तो चलिए जानते हैं :-

दक्षिणानी वेलायुधन

32 वर्षीय दक्षिणानी संविधान सभा की सबसे युवा सदस्य थीं। दक्शायनी वेलायुधन का जन्म 4 जुलाई, 1912 को कोचीन के बोलगाटी द्वीप पर हुआ था। वह 1946 में संविधान सभा के लिए चुनी जाने वाली पहली और एकमात्र दलित महिला थीं।

संविधान सभा की पहली बैठक में उन्होंने कहा था, ‘संविधान का कार्य इस बात पर निर्भर करेगा कि लोग भविष्य में किस तरह का जीवन जिएंगे। मैं आशा करती हूं कि समय के साथ ऐसा कोई समुदाय इस देश में न बचे जिसे अछूत कहकर पुकारा जाए।’

अम्मू स्वामीनाथन

अम्मू स्वामीनाथन का जन्म केरल के पालघाट जिले के अंकारा में एक उच्च जाति के हिंदू परिवार हुआ था उन्होंने 1917 में मद्रास में एनी बेसेंट, मार्गरेट चचेरे भाई, मलाथी पटवर्धन, दादाभॉय और अंबुजम्मल के साथ मिलकर वूमन्स इंडिया एसोसिएशन का गठन किया।

13 वर्ष की उम्र में जब अम्मू से कहा गया कि उन्हें अब शादी करनी ही पड़ेगी, तो उन्होंने यह शर्त रखी कि वे शादी तभी करेंगी जब उन्हें मद्रास जाकर शिक्षा लेने की अनुमति दी जाएगी। वह 1946 में मद्रास संविधान सभा का हिस्सा बनीं।

बेगम ऐज़ाज़ रसूल

इनका जन्म एक राजसी परिवार में हुआ था और उन्होंने एक युवा जमींदार नवाब ऐज़ाज़ रसूल से शादी की थी। वह संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं।

भारत सरकार अधिनियम 1935 के अधिनियमन के साथ बेगम और उनके पति मुस्लिम लीग में शामिल हो गए और चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। 1937 के चुनावों में वह यूपी विधान सभा के लिए चुनी गईं।

वह 1952 में राज्य सभा के लिए चुनी गईं और 1969 से 1990 तक उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्य रहीं।

दुर्गाबाई देशमुख

दुर्गाबाई देशमुख का जन्म 15 जुलाई 1909 को राजमुंदरी में हुआ था। जब वह 12 साल की थीं तब उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया और आंध्र केसरी टी प्रकाशम के साथ उन्होंने मई 1930 में मद्रास शहर में नमक सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया। ।

1936 में उन्होंने आंध्र महिला सभा की स्थापना की जो एक दशक के भीतर मद्रास शहर में शिक्षा और सामाजिक कल्याण की एक महान संस्था बन गई।

हंसा जीवराज मेहता

3 जुलाई 1897 को बड़ौदा के दीवान मनुभाई नंदशंकर मेहता के घर जन्मे हंसा मेहता ने इंग्लैंड में पत्रकारिता और समाजशास्त्र का अध्ययन किया। एक सुधारक और सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ वह एक शिक्षिका और लेखिका भी थीं।

उन्होंने गुजराती में बच्चों के लिए कई किताबें लिखीं और गुलिवर्स ट्रेवल्स सहित कई अंग्रेजी कहानियों का अनुवाद भी किया।

वह 1926 में बॉम्बे स्कूल कमेटी के लिए चुनी गईं और 1945-46 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष बनीं। हंसा महिला अधिकारों की प्रबल पक्षधर थीं। 15 अगस्त 1947 को हंसा ने महिलाओं की ओर से स्वतंत्र भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज प्रस्तुत किया था।

कमला चौधरी

कमला चौधरी का जन्म लखनऊ के एक संपन्न परिवार में हुआ था, हालाँकि यह अभी भी उनके लिए अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए संघर्ष था।

अपने शाही परिवार से दूर वह राष्ट्रवादियों में शामिल हो गईं और 1930 में गांधी द्वारा शुरू किए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन में एक सक्रिय भागीदार थीं।

वह अपने 54 वें सत्र में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष थीं और सत्तर के दशक के अंत में लोकसभा की सदस्य चुनी गईं।

चौधरी भी एक प्रसिद्ध फिक्शन लेखक थे और उनकी कहानियाँ आमतौर पर महिलाओं की आंतरिक दुनिया या भारत के एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में उभरने से जुड़ी हैं।

लीला रॉय

लीला रॉय का जन्म अक्टूबर 1900 में असम के गोलपारा में हुआ था। उनके पिता एक डिप्टी मजिस्ट्रेट थे और राष्ट्रवादी आंदोलन से सहानुभूति रखते थे।

उन्होंने 1921 में बेथ्यून कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और अखिल बंगाल महिला पीड़ित समिति की सहायक सचिव बनीं उन्होंने महिलाओं के अधिकारों की मांग के लिए बैठकों की व्यवस्था की।

1923 में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ दीपाली संघ की स्थापना की और उन स्कूलों की स्थापना की, जो राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गए, जिनमें प्रसिद्ध नेताओं ने भाग लिया।

1946 में लीला भारतीय संविधान सभा में शामिल हुईं और बहस में सक्रिय रुप से भाग लिया। उन्होंने हिंदू कोड बिल के तहत महिलाओं को सम्पत्ति का अधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा घोषित करने जैसे मामलों की ज़बरदस्त पैरवी की थी।

मालती चौधरी

मालती चौधरी का जन्म 1904 में तत्कालीन पूर्वी बंगाल, जो अब बांग्लादेश है में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। वर्ष 1921 में 16 वर्ष की आयु में मालती चौधरी को शांतिनिकेतन भेजा गया, जहाँ वे विश्वभारती में भर्ती हुईं।

नमक सत्याग्रह के दौरान मालती चौधरी,अपने पति के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुईं और आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने सत्याग्रह के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए लोगों के साथ शिक्षित और संवाद किया।

पूर्णिमा बनर्जी

पूर्णिमा बनर्जी उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समिति की सचिव थीं। वह उत्तर प्रदेश की महिलाओं के कट्टरपंथी नेटवर्क में से एक थीं, जो 1930 के दशक के अंत और 40 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे आगे थीं।

उन्हें सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लिए गिरफ्तार किया गया था। संविधान सभा में पूर्णिमा बनर्जी के भाषणों के एक और खास पहलू समाजवादी विचारधारा के प्रति उनकी दृढ़ प्रतिबद्धता थी।

शहर समिति के सचिव के रूप में वह ट्रेड यूनियनों, किसान सभाओं को सुलझाने, संगठित करने और अधिक से अधिक ग्रामीण जुड़ाव की दिशा में काम करने के लिए जिम्मेदार थीं।

सुचेता कृपलानी

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अग्रिम पंक्ति के नेताओं में सुचेता भी शामिल थीं। पंडित जवाहरलाल नेहरु के प्रसिद्ध भाषण ‘नियति से साक्षात्कार’ के पूर्व वंदे मातरम्, सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा और जन गण मन गाने के लिए सुचेता कृपलानी को आमंत्रित किया गया था।

विजयालक्ष्मी पंडित

विजया लक्ष्मी पंडित का जन्म 18 अगस्त 1900 को इलाहाबाद में हुआ था और वह भारत के पहले प्रधानमंत्री, जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं। उन्हें 1932-1933, 1940 और 1942-1943 में तीन अलग-अलग मौकों पर अंग्रेजों ने कैद किया।

पंडित का राजनीतिक जीवन इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड के चुनाव के साथ शुरू हुआ। 1936 में वह संयुक्त प्रांत की विधानसभा के लिए चुनी गईं, और 1937 में स्थानीय स्व-सरकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री के रूप में कैबिनेट मंत्री बनने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।

सरोजिनी नायडू

सरोजिनी नायडू जिन्हें भारत का कोकिला भी कहा जाता है का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद भारत में हुआ था। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला थीं और भारतीय राज्य राज्यपाल के रूप में नियुक्त होने वाली पहली महिला थीं।

राजकुमारी अमृत कौर

अमृत ​​कौर का जन्म 2 फरवरी 1889 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वह भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री थीं और उन्होंने दस साल तक इस पद को संभाला। उन्होंने अपनी शिक्षा इंग्लैंड के डोरसेट में लड़कियों के लिए शेरबोर्न स्कूल में की ।

वह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की संस्थापक थीं। वह महिलाओं की शिक्षा, खेल में उनकी भागीदारी और उनकी स्वास्थ्य सेवा में दृढ़ विश्वास रखती थीं।

रेणुका रे

रेणुका रे ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बीए पूरा किया। उन्होंने भारत में महिलाओं की कानूनी अक्षमता नामक एक दस्तावेज प्रस्तुत किया। 1943 से 1946 तक वह केंद्रीय विधान सभा, तत्कालीन संविधान सभा और अनंतिम संसद की सदस्य थीं।

एनी मस्कारीन

एनी मस्कारीन का जन्म केरल के तिरुवनंतपुरम के एक लैटिन कैथोलिक परिवार में हुआ था। वह त्रावणकोर राज्य कांग्रेस कार्य समिति का हिस्सा बनने वाली पहली महिला थीं। वह स्वतंत्रता और त्रावणकोर राज्य में भारतीय राष्ट्र के साथ एकीकरण के आंदोलनों के नेताओं में से एक थीं।

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हॉरर स्टोरी- कोलोराडो का भुतहा होटल

अमेरिका के कोलोराडो स्थित एस्तेस पार्क की ओर अधिकतर पर्यटकों को इसकी नैसर्गिक सुन्दरता ही खींच लाती है। यहाँ खूबसूरत पर्वत, भरा-पूरा वन्य जीवन तथा रॉकी माउंटेन नैशनल पार्क में तरह-तरह की आउटडोर एडवेंचर एक्टिविटीज हर वर्ष बड़ी संख्या में लोगो को आकर्षित करती हैं परन्तु सूरज डूबने के साथ ही इस कस्बे की नैसर्गिक सुन्दरता और आकर्षण का स्थान रहस्यमयी शक्तियां ले लेती हैं।

the-stanley-hotel-colorado-hauntedकस्बे से कुछ ऊँचे स्थान पर स्थित एक पुराना रिजॉर्ट ‘द स्टैनले होटल‘ लगभग एक सौ साल पुराना है। अब यह होटल एक भुतहा होटल के रूप में दुनिया भर में विख्यात हो चुका है ।

138 कमरों वाले इस होटल को साल 1909 में फ्रीलन. ऑस्कर. (Freelan Oscar Stanley) और फ्लोरा स्टैनले ने खोला था। कई लोग मानते हैं कि मरने के बाद वे दोनों या यूँ कहें कि उनकी आत्माएँ कभी भी इस होटल से नहीं गयीं।

होटल के कर्मचारियों ने कई बार रात को उन्हें भुतहा अन्दांज में पियानो बजाते हुए सुना है। साथ ही होटल के हॉल में ऊँचे कॉलर वाली विक्टोरियन ड्रैस पहने व्यक्ति के भूत को घूमते कई बार देखा गया है।

माना जाता है कि इस होटल के मालिकों की आत्माओं के अलावा अब यहाँ काम करने वाले समर्पित (dedicated) कर्मचारियों की आत्माएँ भी घूमने लगी हैं ।

जैसे कि 1980 के दशक के एक इलैक्ट्रीशियन की आत्मा कंसर्ट हॉल की लाइट्स ओन-ऑफ करने के लिए कुख्यात है। वहीँ एक रात्रिकालीन गार्ड यानि पहरेदार की आवाज भी सुनाई देने का दावा किया गया है जोकि होटल में चोरी-छुपे घुसपैठ करने वाले को चेतावनी देता है।

किताब और फिल्म की प्रेरणा

यह होटल स्टीफन किंग(Stephen King) की मशहूर किताब द शाइनिंग(The Shining) के प्रेरणास्रोत  के रूप में जाना जाता है।

किंग ने यह किताब इस होटल के कमरा न. 217 में ठहरने के बाद लिखी थी। सन 1980 में इस किताब पर इसी नाम की फिल्म भी बनी जो सुपरहिट रही थी।

रात्रिकालीन टूर

हानिरहित भूतों को लेकर इसकी लोकप्रियता के कारण अब इस होटल में रात्रिकालीन टूर भी आयोजित किये जाने लगे हैं जिनमें कंसर्ट हॉल तथा स्मोकिंग रूम्स में लोग आत्माओं से संपर्क स्थापित करने या उन्हें देखें की दिलेरी दिखा सकते हैं।

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मिस्र में मिली 2 हज़ार साल पुरानी सोने की जीभ वाली ममी, जानें क्या है रहस्य

दुनियाभर में मिस्र अपनी पुरानी सभ्यता, पिरामिड और ममी के लिए प्रसिद्ध है, जिस वजह से बड़ी संख्या में लोग यहाँ पर आते हैं।

अब मिस्र के पुरातत्वविदों को एक नई ममी का पता चला है, जिसको देखकर सभी हैरान हैं। इस नई ममी की जीभ सोने की है जिसके बाद से मिस्र में अजीबो-गरीब कहानियों के बारे में चर्चा हो रही है।

मिस्त्र के प्राचीन इलाके तापोसिरिस मैग्ना में एक ममी मिली है, जो 2000 साल पुरानी है। मिस्त्र में इतनी पुरानी ममी मिलना कोई अनोखी बात नहीं है लेकिन इस ममी की खासियत है कि इसकी जीभ सोने की है।

ये ममी मिस्र के टोलमी साम्राज्य की चर्चित रानी क्लियोपैट्रा (Queen Cleopatra) की है। इस ममी को मिस्र के तापोसिरिस मैग्ना से निकाला गया।

तापोसिरिस मैग्ना (Taposiris Magna) में खनन के दौरान 16 कब्रें मिली हैं। इस खनन का काम डॉमिनिकन डॉमिनिकन रिपब्लिक की पुरातत्वविद कैथलीन मार्टीनेज कर रही हैं। इन ममी के चेहरों पर पत्थर के मास्क मिले हैं जो उन्हें दफनाने के वक्त उनके चेहरे पर पहनाए गए होंगे।

पुरानी परंपराओं के मुताबिक मिस्र में सोने की जीभ को मरने के बाद देवी-देवताओं से संवाद करने की एक अहम योग्यता के तौर पर देखा जाता था।

इन साइट्स से पहले रानी क्लियोपेट्रा -7 के चेहरे के सिक्के मिले थे और उनकी मूर्तियां भी बरामद हुई हैं। अन्य 15 कब्रों से जो भी चीजें निकल रही हैं, वो सभी कई पुराने खजाने सामने ला रही हैं।

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