भारतीय संविधान बनाने में इन महिलाओं का था विशेष योगदान

विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान ‘भारतीय संविधान’ 26 नंवबर 1949 को पारित हुआ और 26 जनवरी 1950 को पूरे देश में लागू हुआ था। इस संविधान को मूल रुप देने वाली समिति में 15 महिलाएं भी शामिल थीं, जिन्होंने संविधान के साथ-साथ भारतीय समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

आज हम इस पोस्ट में इन्हीं महिलाओं के बारे में बात करने जा रहे है तो चलिए जानते हैं :-

दक्षिणानी वेलायुधन

32 वर्षीय दक्षिणानी संविधान सभा की सबसे युवा सदस्य थीं। दक्शायनी वेलायुधन का जन्म 4 जुलाई, 1912 को कोचीन के बोलगाटी द्वीप पर हुआ था। वह 1946 में संविधान सभा के लिए चुनी जाने वाली पहली और एकमात्र दलित महिला थीं।

संविधान सभा की पहली बैठक में उन्होंने कहा था, ‘संविधान का कार्य इस बात पर निर्भर करेगा कि लोग भविष्य में किस तरह का जीवन जिएंगे। मैं आशा करती हूं कि समय के साथ ऐसा कोई समुदाय इस देश में न बचे जिसे अछूत कहकर पुकारा जाए।’

अम्मू स्वामीनाथन

अम्मू स्वामीनाथन का जन्म केरल के पालघाट जिले के अंकारा में एक उच्च जाति के हिंदू परिवार हुआ था उन्होंने 1917 में मद्रास में एनी बेसेंट, मार्गरेट चचेरे भाई, मलाथी पटवर्धन, दादाभॉय और अंबुजम्मल के साथ मिलकर वूमन्स इंडिया एसोसिएशन का गठन किया।

13 वर्ष की उम्र में जब अम्मू से कहा गया कि उन्हें अब शादी करनी ही पड़ेगी, तो उन्होंने यह शर्त रखी कि वे शादी तभी करेंगी जब उन्हें मद्रास जाकर शिक्षा लेने की अनुमति दी जाएगी। वह 1946 में मद्रास संविधान सभा का हिस्सा बनीं।

बेगम ऐज़ाज़ रसूल

इनका जन्म एक राजसी परिवार में हुआ था और उन्होंने एक युवा जमींदार नवाब ऐज़ाज़ रसूल से शादी की थी। वह संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं।

भारत सरकार अधिनियम 1935 के अधिनियमन के साथ बेगम और उनके पति मुस्लिम लीग में शामिल हो गए और चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। 1937 के चुनावों में वह यूपी विधान सभा के लिए चुनी गईं।

वह 1952 में राज्य सभा के लिए चुनी गईं और 1969 से 1990 तक उत्तर प्रदेश विधान सभा की सदस्य रहीं।

दुर्गाबाई देशमुख

दुर्गाबाई देशमुख का जन्म 15 जुलाई 1909 को राजमुंदरी में हुआ था। जब वह 12 साल की थीं तब उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया और आंध्र केसरी टी प्रकाशम के साथ उन्होंने मई 1930 में मद्रास शहर में नमक सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया। ।

1936 में उन्होंने आंध्र महिला सभा की स्थापना की जो एक दशक के भीतर मद्रास शहर में शिक्षा और सामाजिक कल्याण की एक महान संस्था बन गई।

हंसा जीवराज मेहता

3 जुलाई 1897 को बड़ौदा के दीवान मनुभाई नंदशंकर मेहता के घर जन्मे हंसा मेहता ने इंग्लैंड में पत्रकारिता और समाजशास्त्र का अध्ययन किया। एक सुधारक और सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ वह एक शिक्षिका और लेखिका भी थीं।

उन्होंने गुजराती में बच्चों के लिए कई किताबें लिखीं और गुलिवर्स ट्रेवल्स सहित कई अंग्रेजी कहानियों का अनुवाद भी किया।

वह 1926 में बॉम्बे स्कूल कमेटी के लिए चुनी गईं और 1945-46 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष बनीं। हंसा महिला अधिकारों की प्रबल पक्षधर थीं। 15 अगस्त 1947 को हंसा ने महिलाओं की ओर से स्वतंत्र भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज प्रस्तुत किया था।

कमला चौधरी

कमला चौधरी का जन्म लखनऊ के एक संपन्न परिवार में हुआ था, हालाँकि यह अभी भी उनके लिए अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए संघर्ष था।

अपने शाही परिवार से दूर वह राष्ट्रवादियों में शामिल हो गईं और 1930 में गांधी द्वारा शुरू किए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन में एक सक्रिय भागीदार थीं।

वह अपने 54 वें सत्र में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष थीं और सत्तर के दशक के अंत में लोकसभा की सदस्य चुनी गईं।

चौधरी भी एक प्रसिद्ध फिक्शन लेखक थे और उनकी कहानियाँ आमतौर पर महिलाओं की आंतरिक दुनिया या भारत के एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में उभरने से जुड़ी हैं।

लीला रॉय

लीला रॉय का जन्म अक्टूबर 1900 में असम के गोलपारा में हुआ था। उनके पिता एक डिप्टी मजिस्ट्रेट थे और राष्ट्रवादी आंदोलन से सहानुभूति रखते थे।

उन्होंने 1921 में बेथ्यून कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और अखिल बंगाल महिला पीड़ित समिति की सहायक सचिव बनीं उन्होंने महिलाओं के अधिकारों की मांग के लिए बैठकों की व्यवस्था की।

1923 में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ दीपाली संघ की स्थापना की और उन स्कूलों की स्थापना की, जो राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गए, जिनमें प्रसिद्ध नेताओं ने भाग लिया।

1946 में लीला भारतीय संविधान सभा में शामिल हुईं और बहस में सक्रिय रुप से भाग लिया। उन्होंने हिंदू कोड बिल के तहत महिलाओं को सम्पत्ति का अधिकार, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा घोषित करने जैसे मामलों की ज़बरदस्त पैरवी की थी।

मालती चौधरी

मालती चौधरी का जन्म 1904 में तत्कालीन पूर्वी बंगाल, जो अब बांग्लादेश है में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। वर्ष 1921 में 16 वर्ष की आयु में मालती चौधरी को शांतिनिकेतन भेजा गया, जहाँ वे विश्वभारती में भर्ती हुईं।

नमक सत्याग्रह के दौरान मालती चौधरी,अपने पति के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुईं और आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने सत्याग्रह के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए लोगों के साथ शिक्षित और संवाद किया।

पूर्णिमा बनर्जी

पूर्णिमा बनर्जी उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समिति की सचिव थीं। वह उत्तर प्रदेश की महिलाओं के कट्टरपंथी नेटवर्क में से एक थीं, जो 1930 के दशक के अंत और 40 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे आगे थीं।

उन्हें सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लिए गिरफ्तार किया गया था। संविधान सभा में पूर्णिमा बनर्जी के भाषणों के एक और खास पहलू समाजवादी विचारधारा के प्रति उनकी दृढ़ प्रतिबद्धता थी।

शहर समिति के सचिव के रूप में वह ट्रेड यूनियनों, किसान सभाओं को सुलझाने, संगठित करने और अधिक से अधिक ग्रामीण जुड़ाव की दिशा में काम करने के लिए जिम्मेदार थीं।

सुचेता कृपलानी

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अग्रिम पंक्ति के नेताओं में सुचेता भी शामिल थीं। पंडित जवाहरलाल नेहरु के प्रसिद्ध भाषण ‘नियति से साक्षात्कार’ के पूर्व वंदे मातरम्, सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा और जन गण मन गाने के लिए सुचेता कृपलानी को आमंत्रित किया गया था।

विजयालक्ष्मी पंडित

विजया लक्ष्मी पंडित का जन्म 18 अगस्त 1900 को इलाहाबाद में हुआ था और वह भारत के पहले प्रधानमंत्री, जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं। उन्हें 1932-1933, 1940 और 1942-1943 में तीन अलग-अलग मौकों पर अंग्रेजों ने कैद किया।

पंडित का राजनीतिक जीवन इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड के चुनाव के साथ शुरू हुआ। 1936 में वह संयुक्त प्रांत की विधानसभा के लिए चुनी गईं, और 1937 में स्थानीय स्व-सरकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री के रूप में कैबिनेट मंत्री बनने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।

सरोजिनी नायडू

सरोजिनी नायडू जिन्हें भारत का कोकिला भी कहा जाता है का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद भारत में हुआ था। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला थीं और भारतीय राज्य राज्यपाल के रूप में नियुक्त होने वाली पहली महिला थीं।

राजकुमारी अमृत कौर

अमृत ​​कौर का जन्म 2 फरवरी 1889 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वह भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री थीं और उन्होंने दस साल तक इस पद को संभाला। उन्होंने अपनी शिक्षा इंग्लैंड के डोरसेट में लड़कियों के लिए शेरबोर्न स्कूल में की ।

वह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की संस्थापक थीं। वह महिलाओं की शिक्षा, खेल में उनकी भागीदारी और उनकी स्वास्थ्य सेवा में दृढ़ विश्वास रखती थीं।

रेणुका रे

रेणुका रे ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बीए पूरा किया। उन्होंने भारत में महिलाओं की कानूनी अक्षमता नामक एक दस्तावेज प्रस्तुत किया। 1943 से 1946 तक वह केंद्रीय विधान सभा, तत्कालीन संविधान सभा और अनंतिम संसद की सदस्य थीं।

एनी मस्कारीन

एनी मस्कारीन का जन्म केरल के तिरुवनंतपुरम के एक लैटिन कैथोलिक परिवार में हुआ था। वह त्रावणकोर राज्य कांग्रेस कार्य समिति का हिस्सा बनने वाली पहली महिला थीं। वह स्वतंत्रता और त्रावणकोर राज्य में भारतीय राष्ट्र के साथ एकीकरण के आंदोलनों के नेताओं में से एक थीं।

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हॉरर स्टोरी- कोलोराडो का भुतहा होटल

अमेरिका के कोलोराडो स्थित एस्तेस पार्क की ओर अधिकतर पर्यटकों को इसकी नैसर्गिक सुन्दरता ही खींच लाती है। यहाँ खूबसूरत पर्वत, भरा-पूरा वन्य जीवन तथा रॉकी माउंटेन नैशनल पार्क में तरह-तरह की आउटडोर एडवेंचर एक्टिविटीज हर वर्ष बड़ी संख्या में लोगो को आकर्षित करती हैं परन्तु सूरज डूबने के साथ ही इस कस्बे की नैसर्गिक सुन्दरता और आकर्षण का स्थान रहस्यमयी शक्तियां ले लेती हैं।

the-stanley-hotel-colorado-hauntedकस्बे से कुछ ऊँचे स्थान पर स्थित एक पुराना रिजॉर्ट ‘द स्टैनले होटल‘ लगभग एक सौ साल पुराना है। अब यह होटल एक भुतहा होटल के रूप में दुनिया भर में विख्यात हो चुका है ।

138 कमरों वाले इस होटल को साल 1909 में फ्रीलन. ऑस्कर. (Freelan Oscar Stanley) और फ्लोरा स्टैनले ने खोला था। कई लोग मानते हैं कि मरने के बाद वे दोनों या यूँ कहें कि उनकी आत्माएँ कभी भी इस होटल से नहीं गयीं।

होटल के कर्मचारियों ने कई बार रात को उन्हें भुतहा अन्दांज में पियानो बजाते हुए सुना है। साथ ही होटल के हॉल में ऊँचे कॉलर वाली विक्टोरियन ड्रैस पहने व्यक्ति के भूत को घूमते कई बार देखा गया है।

माना जाता है कि इस होटल के मालिकों की आत्माओं के अलावा अब यहाँ काम करने वाले समर्पित (dedicated) कर्मचारियों की आत्माएँ भी घूमने लगी हैं ।

जैसे कि 1980 के दशक के एक इलैक्ट्रीशियन की आत्मा कंसर्ट हॉल की लाइट्स ओन-ऑफ करने के लिए कुख्यात है। वहीँ एक रात्रिकालीन गार्ड यानि पहरेदार की आवाज भी सुनाई देने का दावा किया गया है जोकि होटल में चोरी-छुपे घुसपैठ करने वाले को चेतावनी देता है।

किताब और फिल्म की प्रेरणा

यह होटल स्टीफन किंग(Stephen King) की मशहूर किताब द शाइनिंग(The Shining) के प्रेरणास्रोत  के रूप में जाना जाता है।

किंग ने यह किताब इस होटल के कमरा न. 217 में ठहरने के बाद लिखी थी। सन 1980 में इस किताब पर इसी नाम की फिल्म भी बनी जो सुपरहिट रही थी।

रात्रिकालीन टूर

हानिरहित भूतों को लेकर इसकी लोकप्रियता के कारण अब इस होटल में रात्रिकालीन टूर भी आयोजित किये जाने लगे हैं जिनमें कंसर्ट हॉल तथा स्मोकिंग रूम्स में लोग आत्माओं से संपर्क स्थापित करने या उन्हें देखें की दिलेरी दिखा सकते हैं।

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मिस्र में मिली 2 हज़ार साल पुरानी सोने की जीभ वाली ममी, जानें क्या है रहस्य

दुनियाभर में मिस्र अपनी पुरानी सभ्यता, पिरामिड और ममी के लिए प्रसिद्ध है, जिस वजह से बड़ी संख्या में लोग यहाँ पर आते हैं।

अब मिस्र के पुरातत्वविदों को एक नई ममी का पता चला है, जिसको देखकर सभी हैरान हैं। इस नई ममी की जीभ सोने की है जिसके बाद से मिस्र में अजीबो-गरीब कहानियों के बारे में चर्चा हो रही है।

मिस्त्र के प्राचीन इलाके तापोसिरिस मैग्ना में एक ममी मिली है, जो 2000 साल पुरानी है। मिस्त्र में इतनी पुरानी ममी मिलना कोई अनोखी बात नहीं है लेकिन इस ममी की खासियत है कि इसकी जीभ सोने की है।

ये ममी मिस्र के टोलमी साम्राज्य की चर्चित रानी क्लियोपैट्रा (Queen Cleopatra) की है। इस ममी को मिस्र के तापोसिरिस मैग्ना से निकाला गया।

तापोसिरिस मैग्ना (Taposiris Magna) में खनन के दौरान 16 कब्रें मिली हैं। इस खनन का काम डॉमिनिकन डॉमिनिकन रिपब्लिक की पुरातत्वविद कैथलीन मार्टीनेज कर रही हैं। इन ममी के चेहरों पर पत्थर के मास्क मिले हैं जो उन्हें दफनाने के वक्त उनके चेहरे पर पहनाए गए होंगे।

पुरानी परंपराओं के मुताबिक मिस्र में सोने की जीभ को मरने के बाद देवी-देवताओं से संवाद करने की एक अहम योग्यता के तौर पर देखा जाता था।

इन साइट्स से पहले रानी क्लियोपेट्रा -7 के चेहरे के सिक्के मिले थे और उनकी मूर्तियां भी बरामद हुई हैं। अन्य 15 कब्रों से जो भी चीजें निकल रही हैं, वो सभी कई पुराने खजाने सामने ला रही हैं।

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 द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के ’30 साल बाद’ तक लड़ता रहा यह जापानी सिपाही

द्वितीय विश्व युद्ध केवल युद्ध नहीं था, यह इंसानी सभ्यता तथा मानवीयता के लिए एक अभिशाप था। इसने पूरी दुनिया में तबाही मचा दी और लाखों जानें इस युद्ध की भेंट चढ़ गईं।

पूरी दुनिया गवाह है कि द्वितीय विश्व युद्ध में जापानी सिपाहियों से ज्यादा क्रूर और आज्ञाकारी सिपाही शायद ही कोई अन्य हों। उस समय जापान में राजशाही वस्तुतः एक फासिस्ट किस्म के सिस्टम पर शासन करती थी।

जनता को देश के लिए मरने और मारने की घुट्टी मिली होती थी। ‘कामिकाजे’ एक प्रथा है जिसमें बचने का कोई मार्ग न मिलने पर समुराई या कहिए फौजी अपनी मौत को उद्देश्य बना कर लड़ता है।

यूं तो 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हो गया था परंतु इम्पीरियल जापानी आर्मी का एक सिपाही हीरू ओनोदा युद्ध विराम के बाद भी 1974 तक अपने दम पर लड़ता रहा।

1945 में फिलीपींस में एक मिशन के लिए उसे भेजते समय आदेश दिया गया था कि किसी भी हाल में वह समर्पण न करे। इसी आदेश के कारण वह 1974 तक लड़ता रहा पर जब उसे पता चला कि युद्ध तो 1945 में ही खत्म हो चुका है तब उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।

बाद में उसे उसी साल यानी 1974 में अपने भूतपूर्व कमांडिंग अफसर से ऑर्डर मिला कि वह अपनी ड्यूटी से विराम ले लें, तब जा कर वह अपने काम से सेवानिवृत्त हुआ।

हीरू ओनोदा ने अपने भाई के साथ 1940 में जापानी सेना ज्वाइन की थी। उसे एक इंटैलीजैंस अफसर और कमांडो की ट्रेनिंग दी गई थी।

उसे फिलीपींस के एक टापू लुबाग पर अमरीकी हवाई अड्डे की पट्टी को नष्ट करने के लिए भेजा गया परंतु वहां के स्थानीय जापानी अधिकारियों ने उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं दी और अंतत: अमरीकी फौज वहां उतरी और उनके दल में शामिल अधिकतर सैनिक मारे गए। हीरू और उनके 3 साथी ही बचे।

हीरू अन्यों से सीनियर था तो उसने सभी को पहाड़ों में जा छुपने का आदेश दिया और वहां से चुप कर गोरिल्ला लडाई जारी रखी।

युद्ध खत्म होने की जानकारी को समझा झूठा प्रचार

कुछ दिनों बाद उन्हें जंगल में हवाई जहाज से गिराए गए पर्चे मिले जिन पर लिखा था कि युद्ध समाप्त हो चुका है जापान ने हार मान ली है।

उन्होंने सोचा कि जापान तो हार मान ही नहीं सकता और उन्होंने इसे झूठा प्रचार समझ कर मानने से इंकार कर दिया। हीरू और उनके साथियों का संघर्ष जारी रहा। 6 साल बाद उनका एक साथी भाग गया।

फिर पर्चे गिरे जिसमें साथी के आत्मसमर्पण की जानकारी थी। यह पर्चा पढ़ कर तो हीरू और उसके दो साथियों के गुस्से का पारावार न रहा l उन्होंने मरते दम तक देश के लिए संघर्ष की कसम खाई। कोई भागे तो दूसरे को उसे गोली मारने का हक था।

तब तक पर्वतों की तलहटी पर खेती शुरू हो गई थी और किसानों के भेस में अमरीकी जासूस उनकी टोह लेने आते थे इसलिए वे किसानों को मारते, फसलें जला देते, खाने भर के लिए लूट लेते। ऐसी ही एक लड़ाई में हीरू का साथी मारा गया। अब 2 बचे परंतु 10-12 साल बाद उनका अंतिम साथी भी मर गया।

इस तरह खत्म हुई उसकी लड़ाई

हीरू को जंगल में एक दिन एक जापानी युवक मिला। हीरू ने उसे बंधक बना लिया। उसने बताया कि युद्ध तो सच में 30 साल पहले ही खत्म हो चुका है।

जापान पर एटम बम गिराए जाने और उसके बाद जापान के आत्मसमर्पण से लेकर तत्कालीन समाज की जानकारी उसने हीरू को दी परंतु हीरू अब भी यकीन न कर पाया। उसे कमांडिंग अफसर का आदेश था कि आत्मसमर्पण नहीं करना है।

युवक को उसने छोड़ दिया। उसी युवक ने जापान जाकर हीरू के कमांडिंग अफसर को खोज निकाला और उसे फिलीपींस लाया। हीरू के पहाड़ पर कमांडिंग अफसर अकेले गया। उसे शाबाशी दी और कहा, “युद्ध खत्म हो गया है, आत्मसमर्पण कर दो!”

हीरू ने सिर झुकाया, सैल्यूट किया और जमीन पर बैठ कर जार-जार रोने लगा। 30 साल आंखों के सामने घूम गए। उसका संघर्ष, उसके साथियों की शहादत, उसके हाथ से कत्ल हुए लोग सब बेकार!!! इतने साल वह फौजी नहीं था।

यह वर्ष 1974 था। फटी हुई वर्दी पहने हीरू ने अपनी एसाल्ट गन, कुछ कारतूस और समुराई तलवार के साथ फिलीपींस के राष्ट्रपति के समक्ष आत्म समर्पण किया। उस पर 30 से ज्यादा हत्या के मामले थे मगर माफी दे दी गई। उसके बाद हीरू अपने देश लौटा।

साभार पंजाब केसरी 

दुनिया का सबसे सुंदर मंदिर, जहां भगवान ने अपने नाखूनों से बना डाली झील

भारत का शायद ही कोई ऐसा कोना होगा जहां कोई मंदिर या कोई अन्य धार्मिक स्थल न हो। भारत में रहने वाले लोग किसी एक धर्म के नहीं बल्कि अनेक संप्रदाय हैं।

यही कारण हैं कि देश में मंदिर, मस्जिद आदि बहुत अधिक है। राजस्थान में स्थित विष्णु भगवान को समर्पित यह मंदिर अपनी भव्यता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

दिलवाड़ा जैन मंदिर

वैसे तो राजस्थान में अनेको सुंदर और प्राचीन मंदिर स्थित है परंतु माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर की बात ही अलग है।

इस मंदिर की शिल्प कला अपने आप में ही अनोखी है। यही कारण है कि इस मंदिर में विदेशी पर्यटकों की विशेष रुचि रहती है। यहां के पांच मंदिरों के समूह में विमल वसाही सबसे प्राचीन मंदिर है जिसे 1031 ईसवी में तैयार किया गया।

1231 में वस्तुपाल और तेजपाल दो भाईयों ने इसका निर्माण करवाया था। यह कुल पांच मंदिरों का समूह है लेकिन मुख्य रूप से तीन मंदिर खास हैं। दिलवाड़ा का ये मंदिर 48 खंभों पर टिका हुआ है।

इसकी खूबसूरती और नक्काशी के कारण इसे राजस्थान का ताजमहल भी कहा जाता है। इस मंदिर की एक-एक दीवार पर बेहद सुंदर कालाकारी और नक्काशी की गई है, जो अपना इतिहास बताती हैं।

इस मंदिर से जुड़ी कई कहानियां और कई मान्यताएं हैं, जो अपने आप में अनोखी है। इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार यहाँ भगवान विष्णु ने बालमरसिया के रूप में अवतार लिया था।

कहा जाता है कि भगवान विष्णु का ये अवतार गुजरात के पाटन में एक साधारण परिवार के घर में हुआ था। विष्णु भगवान के जन्म के बाद ही पाटन के महाराजा उनके मंत्री वस्तुपाल और तेजपाल ने माउंट आबू में इस मंदिर के निमार्ण की इच्छा जागी।

जब भगवान विष्णु के अवतार बालमरसिया ने महाराज की यह बात सुनी तो वो वस्तुपाल और तेजपाल के पास इस मंदिर की रुपरेखा लेकर पहुंच गए।

तब वस्तुपाल ने कहा कि अगर ऐसा ही मंदिर तैयार हो गया तब वो अपनी पुत्री की शादी बालमरसिया से कर देंगे। भगवान विष्णु के अवतार बालमरसिया ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और बेहद सुंदर मंदिर का निर्माण किया।

1 घंटे में ही बदल दिया मैदान को झील में

परन्तु बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने छल पूर्वक एक और शर्त रख दी कि अगर वे एक ही रात में सूरज निकलने से पहले अपने नाखूनों से खुदाई कर मैदान को झील में बदल दे तभी वे अपनी पोती की शादी बालमरसिया से करेंगी ।

उन्होंने केवल 1 घंटे में ही मैदान को झील में बदल दिया। फिर भी बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने अपनी पोती का विवाह उनसे करने से मना कर दिया। इस बात को लेकर भगवान विष्णु कोध्रित हो उठे और उन्होंने अपनी होने वाली दादीसास का वध कर दिया।

आपको जानकर हैरानी होगी कि उस वक्त इस मंदिर को तैयार करने में 1500 कारीगरों ने काम किया था। वो भी कोई एक या दो साल तक नहीं पूरे 14 सालों तक। इस मंदिर के निर्माण में उस वक्त करीब 12 करोड़ 53 लाख रूपए खर्च हुए थे।

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जानिए दुनिया के सबसे अनोखे फूलों के बारे में

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दुनिया में बहुत सारे खूबसूरत फूल पाए जाते हैं। विभिन्न रंग, आकार और सुगन्धित फूल सबको अपनी ओर आकर्षित करते हैं। आज हम आपको इस पोस्ट में कुछ अनोखे फूलों के बारे में बताने जा रहे हैं।

आइये जानते हैं:-

जंगली ऑर्किड (साइप्रिपेडियम कैलकेलस)

साइप्रिपेडियम कैलकेलस नाम का ये जंगली ऑर्किड कभी पूरे यूरोप में मिलता था लेकिन अब यह सिर्फ ब्रिटेन में पाया जाता है। पीले और जामुनी से रंग वाला ये फूल अब इतना दुर्लभ है कि इसकी एक डाली 5 हजार अमेरिकी डॉलर और 3 लाख 35 हजार 7 सौ 49 रुपये में मिलती है।

रात में ही खिलता है ये फूल (एपिफाइलम ऑक्सापेटाइम)

बौद्ध धर्म में खास जगह रखने वाला यह फूल श्रीलंका में होता है। इस फूल का नाम एपिफाइलम ऑक्सापेटाइम है, जो केवल रात में ही खिलता है। इस फूल की खास बात है कि जब सुबह सूरज की किरणें आती हैं तब यह फूल मुरझा जाता  है।

नील कुरिंजी

दक्षिण भारत के पश्चिम घाट में 1800 मीटर से ऊंचे शोला घास के मैदानों में 12 साल में एक बार खिलता है कुरिंजी फूल। नीलगिरी के नाम से पहचाने जाने वाले इस फूल को ब्लू माउंटेन भी कहते हैं और इसका वैज्ञानिक नाम स्ट्रोबिलैंथस कुंथियाना है।

इससे पहले यह फूल 2006 में खिले थे और उसके बाद यह 2018 में खिले थे। भारत में इसकी कुल 46 प्रजातियां पाई जाती हैं ।

शू फ्लॉवर (हिबिस्कस कोकियो)

हिबिस्कस कोकियो फूल शू फ्लॉवर की प्रजाति का है और यह सिर्फ हवाई आइलैंड में मिलते हैं। 1950 में यह विलुप्त हो चुका था। फिर 20 साल बाद कोकियो में इसका एक पेड़ मिला था।

स्टूअर्ट्स डेजर्ट पी

स्वाएनसोना फॉर्मोसा ऑस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला एक फूल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये मटर की नसल का फूल है।

स्ट्रोंगिलोडोन मैक्रोबोट्रिस

हल्के हरे रंग का स्ट्रोंगिलोडोन मैक्रोबोट्रिस एक तरह की बेल होती है। इसमें पंजे के शेप वाले फिरोजी रंग के फूल होते हैं। हालांकि इसका रंग नीले हरे से लेकर चटक हरे तक हो सकता है। ये फूल फिलीपींस के जंगलों में पाए जाते हैं।

चॉकलेट कॉस्मॉस (कॉस्मॉस एट्रोसैन्गिनियस)

कॉस्मॉस एट्रोसैन्गिनियस मेक्सिको में पाया जाने वाला एक जंगली फूल हैं। ये फूल गर्मियों में वनिला जैसी खुशबू देते हैं, इन्हें चॉकलेट कॉस्मॉस भी कहा जाता है।

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भारत के इस हिस्से में होती है खूनी बारिश, जानिए क्या है कारण

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कई बार प्रकृति के ऐसे अनोखे रूप देखने को मिलते हैं। जिन्हें समझने में आम इंसान तो क्या बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी असमर्थ रह जाते हैं। ऐसी ही एक घटना बारिश से जुड़ी है।

बारिश हर किसी को पसंद होती है, लेकिन अगर यह एक खूनी बारिश हो तो कितना डरावना लगता है। देश के दक्षिण तटीय इलाकों में कुछ ऐसा ही हो रहा है जो आश्चर्य का विषय है।

तो आइए जानते हैं इसके पीछे छिपे रहस्य के बारे में:-

साल 2001 में केरल के दो जिलों – कोट्टयम और इदुक्की में लाल रंग की बारिश हुई थी। यह बात 5 जुलाई 2001 की है। खून के रंग की बारिश को देखकर केरल के लोग दंग रह गए थे।

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इस तरह की लाल रंग की बारिश केरल में 1896 में भी हुई थी। उसके बाद 2001 में 5 जुलाई को इसी तरह की बारिश देखने को मिली। इसके बाद जून 2012 में भी केरल में कुछ ऐसा ही देखने को मिला था।

क्या है कारण इस लाल रंग की बारिश का

2001 में बारिश के पानी के सैंपल सेंटर फॉर अर्थ साइंस स्टडीज़ (CESS) के पास भेजे गए। इस मामले में CESS का मानना था कि किसी उल्कापिंड के फटने की वजह से ये लाल रंग की बारिश हो रही है।

हालाँकि बाद में यह थ्योरी गलत साबित हुई और इसके बाद बारिश के पानी के सैंपल ट्रॉपिकल बॉटैनिकल गार्डन एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट (TBGRI) को भेजे गए।

वहां माइक्रोस्कोपिक जांच में सामने आया कि बारिश का रंग लाल होने का कारण एक प्रकार का शैवाल (alga) है।शैवाल नामक यह कवक पेड़ों की गीली शाखाओं और चट्टानों पर बढ़ता है।

इसके छोटे छोटे छिद्र जो आँखों से नहीं देखे जा सकते, हवा में उड़ते रहते हैं। बारिश के दौरान वे एक लाल रंग छोड़ देते हैं जिससे पूरा वातावरण लाल हो जाता है।

इस संबंध में वर्ष 2013 में फिजियो जेनेटिक्स एंड इवोल्यूशनरी बायोलॉजी में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी। जिसमें यह कहा गया था कि यह कवक मध्य यूरोप और ऑस्ट्रिया में बड़ी संख्या में पाया जाता है। यह केरल और श्रीलंका के वर्षा वनों में भी बड़े पैमाने पर देखा गया है।

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गिरगिट की तरह रंग बदलती है ये दुर्लभ मछली

आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि गिरगिट ही रंग बदलने में माहिर होते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। दुनिया में और भी कई जीव रंग बदलने में माहिर हैं उन्हीं में से एक हैं यह दुर्लभ मछली, जो गिरगिट की तरह ही रंग बदल सकती है।

यह दुर्लभ मछली हाल ही में भारतीय जलस्त्रोत में पायी गई है। इस मछली की खोज पहली बार भारत में की गई है। सेंट्रल मरीन फिशरीज इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों को यह दुर्लभ मछली मन्नार की खाड़ी में दिखी थी।

इस दुर्लभ मछली का नाम है स्कॉर्पियन फिश, जिसका वैज्ञानिक नाम स्कॉर्पिनोस्पिसिस नेगलेक्टा है। सेंट्रल मरीन फिशरीज इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ. जेयाबास्करन ने बताया, कि जब हमने पहली बार इसे देखा तो वह घास में छिपी हुई थी।

पता ही नहीं चल रहा था कि वो कोई मछली है या पत्थर का छोटा टुकड़ा, लेकिन चार सेकंड के बाद ही उसने जब अपने शरीर का रंग बदल कर काला कर लिया, तब समझ में आया कि यह स्कॉर्पियन फिश है।

यह मछली बहुत ज़हरीली और तेज होती है। स्कॉर्पियन फिश शिकार करते समय या शिकारियों से बचाव के समय ही अपना रंग बदलती है। रंग बदलने में माहिर यह मछली बेहद ज़हरीली भी है।

 

इसके रीढ़ की हड्डी में जहर भरा हुआ रहता है। इसे पकड़ने के लिए बेहद सावधानी बरतनी पड़ती है, नहीं तो यह पल भर में जहर उड़ेल देती है। इसका जहर न्यूरोटॉक्सिक होता है, जो अगर इंसान के शरीर में चला जाए तो भयानक दर्द होता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्र की गहराईयों में रहने वाली स्कॉर्पियन फिश रात में शिकार करती है। वह एक जगह दुबक कर पहले शिकार के पास आने का इंतजार करती है और पास आते ही उसपर तेज़ी से हमला कर देती है।

डॉ. जेयाबास्करन ने कहा कि इस दुर्लभ मछली को नेशनल मरीन बायोडायवर्सिटी म्यूजियम में भेजा गया है ताकि इसके बारे में गहन अध्ययन किया जा सके।

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अनोखा मंदिर : जहां मांगी जाती हैं बेटी पैदा होने की मन्नत !!

आज के समय में संतान के रूप में बेटी हो या बेटा दोनों एक-समान हैं लेकिन फिर भी यदि किसी के मन में कोई भी इच्छा होती है तो वह भगवान का दरवाजा खटखटाता है और भगवान से अपनी इच्छा प्राप्ति की कामना करता है।

वैसे तो भारत में बहुत से मंदिर हैं और हर मंदिर से लोगों की अलग अलग आस्था जुड़ी है लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में एक ऐसा मंदिर भी है जहां कन्या के जन्म के लिए मन्नत मांगी जाती है।

जी हाँ हम बात कर रहे हैं झारखंड के बोकारो जिले के चाकुलिया गांव में स्थित 170 साल पुराने दुर्गा मंदिर की जहां सैकड़ों लोग आते हैं और कन्या प्राप्ति मन्नत मांगते हैं।

यहां हर साल दुर्गा पूजा की शुरुआत में घटस्थापना की जाती है और इस मंदिर में एक 150 साल पुराने तांबे के बर्तन की पूजा की जाती है। यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि भले ही लोग पूरे साल मंदिर में आते हैं, लेकिन नवरात्रि के दौरान भीड़ बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि सैकड़ों लोग बेटी की उम्मीद में सिद्धिदात्री दुर्गा की भव्य मूर्ति से कन्या प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

दूसरी ओर अगर लोककथाओं पर विश्वास किया जाए तो लगभग 150 साल पहले कालीचरण दुबे नाम के एक ग्रामीण ने पहली बार यहाँ बेटी के लिए प्रार्थना की और उसकी इच्छा पूरी हुई। जैसे ही लोगों को इस बारे में पता चला, धीरे-धीरे लोग यहां आने लगे।

लोगों का कहना है कि उसके बाद यहां आने वाले सभी लोगों की मुरादें पूरी होने लगी। यह बात देखते ही देखते सभी जगह फ़ैल गई।

कहा जाता है कि हर साल कई जोड़े बेटी की कामना में यहां आते हैं। इनमें से बहुत से लोगों की मुराद पूरी भी हो चुकी है। सभी यहां भक्ति और समर्पण के साथ दुर्गा पूजा करते हैं।

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मुर्दों के शहर के नाम से जाना जाता है ये रहस्यमयी गांव

यह दुनिया कई रहस्यों से भरी हुई हैं जहां कई रहस्यमयी जगहें हैं जो अपने अनोखेपन के चलते प्रसिद्ध हैं। ऐसी ही एक जहग रूस के उत्तरी ओसेटिया में है जिसका नाम है “दर्गाव्स”l

ऐसा कहा जाता है कि यहां जाने वाला कभी वापस लौटकर नहीं आता। यह इलाका बेहद ही सुनसान है। डर की वजह से इस जगह पर कोई भी आता-जाता नहीं है। तो चलिए आज इस रहस्यमयी गांव के बारे में जानते हैं :-

अनगिनत तहखाना नुमा इमारतें

बाहर से खूबसूरत दिखने वाली इस जगह को ‘सिटी ऑफ द डेड’ यानी ‘मुर्दों का शहर’ के नाम से भी जाना जाता है। यह जगह ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों के बीच छिपी हुई है। यहां पर सफेद पत्थरों से बनी अनगिनत तहखाना नुमा इमारतें है। इनमें से कुछ तो 4 मंजिला ऊंची भी है।

विशाल कब्रिस्तान

इमारत की प्रत्येक मंजिल में लोगों के शव दफनाए हुए है। जो इमारत जितनी ऊंची है उसमें उतने ही ज्यादा शव है। बताया जाता है कि इन कब्रों को 16वीं शताब्दी में बनवाया गया था।

यह एक विशाल कब्रिस्तान है। कहते हैं कि हर इमारत एक परिवार से संबंधित है, जिसमें सिर्फ उसी परिवार के सदस्यों को दफनाया गया है। इतना ही नहीं इस जगह को लेकर स्थानीय लोगों के बीच तरह-तरह की मान्यताएं हैं।

उनका मानना है कि इन झोपड़ीनुमा इमारतों में जाने वाला कभी लौटकर नहीं आता, हालांकि कभी-कभार पर्यटक इस जगह के रहस्य को जानने के लिए आते रहते हैं।

इस जगह तक पहुंचने का रास्ता भी बेहद ही मुश्किल है। पहाड़ियों के बीच तंग रास्तों से होकर यहां पहुंचने में करीब तीन घंटे का समय लगता है। यहां का मौसम भी हमेशा खराब रहता है जो सफर के लिए एक बहत बड़ी रुकावट है।

यहां कब्रों के पास नावें मिली हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां शवों को लकड़ी के ढांचे में दफनाया गया था, जिसका आकार नाव के जैसा था।

हालांकि ये अभी रहस्य ही बना हुआ है कि आस-पास नदी मौजूद ना होने के बावजूद यहां तक नाव कैसे पहुंचीं। नाव के पीछे मान्यता ये है कि आत्मा को स्वर्ग तक पहुंचने के लिए नदी पार करनी होती है इसलिए शव को नाव पर रखकर दफनाया जाता है।

पुरातत्वविदों को यहां हर तहखाने के सामने एक कुआं भी मिला है जिसके बारे में कहा जाता है कि लोग अपने परिजनों को यहां दफनाने के बाद कुएं में सिक्का फेंकते थे। अगर सिक्का तल में मौजूद पत्थरों से टकराता है तो इसका मतलब होता था कि आत्मा स्वर्ग तक पहुंच गई।