दुनिया का सबसे सुंदर मंदिर, जहां भगवान ने अपने नाखूनों से बना डाली झील

भारत का शायद ही कोई ऐसा कोना होगा जहां कोई मंदिर या कोई अन्य धार्मिक स्थल न हो। भारत में रहने वाले लोग किसी एक धर्म के नहीं बल्कि अनेक संप्रदाय हैं।

यही कारण हैं कि देश में मंदिर, मस्जिद आदि बहुत अधिक है। राजस्थान में स्थित विष्णु भगवान को समर्पित यह मंदिर अपनी भव्यता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

दिलवाड़ा जैन मंदिर

वैसे तो राजस्थान में अनेको सुंदर और प्राचीन मंदिर स्थित है परंतु माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर की बात ही अलग है।

इस मंदिर की शिल्प कला अपने आप में ही अनोखी है। यही कारण है कि इस मंदिर में विदेशी पर्यटकों की विशेष रुचि रहती है। यहां के पांच मंदिरों के समूह में विमल वसाही सबसे प्राचीन मंदिर है जिसे 1031 ईसवी में तैयार किया गया।

1231 में वस्तुपाल और तेजपाल दो भाईयों ने इसका निर्माण करवाया था। यह कुल पांच मंदिरों का समूह है लेकिन मुख्य रूप से तीन मंदिर खास हैं। दिलवाड़ा का ये मंदिर 48 खंभों पर टिका हुआ है।

इसकी खूबसूरती और नक्काशी के कारण इसे राजस्थान का ताजमहल भी कहा जाता है। इस मंदिर की एक-एक दीवार पर बेहद सुंदर कालाकारी और नक्काशी की गई है, जो अपना इतिहास बताती हैं।

इस मंदिर से जुड़ी कई कहानियां और कई मान्यताएं हैं, जो अपने आप में अनोखी है। इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार यहाँ भगवान विष्णु ने बालमरसिया के रूप में अवतार लिया था।

कहा जाता है कि भगवान विष्णु का ये अवतार गुजरात के पाटन में एक साधारण परिवार के घर में हुआ था। विष्णु भगवान के जन्म के बाद ही पाटन के महाराजा उनके मंत्री वस्तुपाल और तेजपाल ने माउंट आबू में इस मंदिर के निमार्ण की इच्छा जागी।

जब भगवान विष्णु के अवतार बालमरसिया ने महाराज की यह बात सुनी तो वो वस्तुपाल और तेजपाल के पास इस मंदिर की रुपरेखा लेकर पहुंच गए।

तब वस्तुपाल ने कहा कि अगर ऐसा ही मंदिर तैयार हो गया तब वो अपनी पुत्री की शादी बालमरसिया से कर देंगे। भगवान विष्णु के अवतार बालमरसिया ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और बेहद सुंदर मंदिर का निर्माण किया।

1 घंटे में ही बदल दिया मैदान को झील में

परन्तु बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने छल पूर्वक एक और शर्त रख दी कि अगर वे एक ही रात में सूरज निकलने से पहले अपने नाखूनों से खुदाई कर मैदान को झील में बदल दे तभी वे अपनी पोती की शादी बालमरसिया से करेंगी ।

उन्होंने केवल 1 घंटे में ही मैदान को झील में बदल दिया। फिर भी बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने अपनी पोती का विवाह उनसे करने से मना कर दिया। इस बात को लेकर भगवान विष्णु कोध्रित हो उठे और उन्होंने अपनी होने वाली दादीसास का वध कर दिया।

आपको जानकर हैरानी होगी कि उस वक्त इस मंदिर को तैयार करने में 1500 कारीगरों ने काम किया था। वो भी कोई एक या दो साल तक नहीं पूरे 14 सालों तक। इस मंदिर के निर्माण में उस वक्त करीब 12 करोड़ 53 लाख रूपए खर्च हुए थे।

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जानिए दुनिया के सबसे अनोखे फूलों के बारे में

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दुनिया में बहुत सारे खूबसूरत फूल पाए जाते हैं। विभिन्न रंग, आकार और सुगन्धित फूल सबको अपनी ओर आकर्षित करते हैं। आज हम आपको इस पोस्ट में कुछ अनोखे फूलों के बारे में बताने जा रहे हैं।

आइये जानते हैं:-

जंगली ऑर्किड (साइप्रिपेडियम कैलकेलस)

साइप्रिपेडियम कैलकेलस नाम का ये जंगली ऑर्किड कभी पूरे यूरोप में मिलता था लेकिन अब यह सिर्फ ब्रिटेन में पाया जाता है। पीले और जामुनी से रंग वाला ये फूल अब इतना दुर्लभ है कि इसकी एक डाली 5 हजार अमेरिकी डॉलर और 3 लाख 35 हजार 7 सौ 49 रुपये में मिलती है।

रात में ही खिलता है ये फूल (एपिफाइलम ऑक्सापेटाइम)

बौद्ध धर्म में खास जगह रखने वाला यह फूल श्रीलंका में होता है। इस फूल का नाम एपिफाइलम ऑक्सापेटाइम है, जो केवल रात में ही खिलता है। इस फूल की खास बात है कि जब सुबह सूरज की किरणें आती हैं तब यह फूल मुरझा जाता  है।

नील कुरिंजी

दक्षिण भारत के पश्चिम घाट में 1800 मीटर से ऊंचे शोला घास के मैदानों में 12 साल में एक बार खिलता है कुरिंजी फूल। नीलगिरी के नाम से पहचाने जाने वाले इस फूल को ब्लू माउंटेन भी कहते हैं और इसका वैज्ञानिक नाम स्ट्रोबिलैंथस कुंथियाना है।

इससे पहले यह फूल 2006 में खिले थे और उसके बाद यह 2018 में खिले थे। भारत में इसकी कुल 46 प्रजातियां पाई जाती हैं ।

शू फ्लॉवर (हिबिस्कस कोकियो)

हिबिस्कस कोकियो फूल शू फ्लॉवर की प्रजाति का है और यह सिर्फ हवाई आइलैंड में मिलते हैं। 1950 में यह विलुप्त हो चुका था। फिर 20 साल बाद कोकियो में इसका एक पेड़ मिला था।

स्टूअर्ट्स डेजर्ट पी

स्वाएनसोना फॉर्मोसा ऑस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला एक फूल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये मटर की नसल का फूल है।

स्ट्रोंगिलोडोन मैक्रोबोट्रिस

हल्के हरे रंग का स्ट्रोंगिलोडोन मैक्रोबोट्रिस एक तरह की बेल होती है। इसमें पंजे के शेप वाले फिरोजी रंग के फूल होते हैं। हालांकि इसका रंग नीले हरे से लेकर चटक हरे तक हो सकता है। ये फूल फिलीपींस के जंगलों में पाए जाते हैं।

चॉकलेट कॉस्मॉस (कॉस्मॉस एट्रोसैन्गिनियस)

कॉस्मॉस एट्रोसैन्गिनियस मेक्सिको में पाया जाने वाला एक जंगली फूल हैं। ये फूल गर्मियों में वनिला जैसी खुशबू देते हैं, इन्हें चॉकलेट कॉस्मॉस भी कहा जाता है।

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भारत के इस हिस्से में होती है खूनी बारिश, जानिए क्या है कारण

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कई बार प्रकृति के ऐसे अनोखे रूप देखने को मिलते हैं। जिन्हें समझने में आम इंसान तो क्या बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी असमर्थ रह जाते हैं। ऐसी ही एक घटना बारिश से जुड़ी है।

बारिश हर किसी को पसंद होती है, लेकिन अगर यह एक खूनी बारिश हो तो कितना डरावना लगता है। देश के दक्षिण तटीय इलाकों में कुछ ऐसा ही हो रहा है जो आश्चर्य का विषय है।

तो आइए जानते हैं इसके पीछे छिपे रहस्य के बारे में:-

साल 2001 में केरल के दो जिलों – कोट्टयम और इदुक्की में लाल रंग की बारिश हुई थी। यह बात 5 जुलाई 2001 की है। खून के रंग की बारिश को देखकर केरल के लोग दंग रह गए थे।

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इस तरह की लाल रंग की बारिश केरल में 1896 में भी हुई थी। उसके बाद 2001 में 5 जुलाई को इसी तरह की बारिश देखने को मिली। इसके बाद जून 2012 में भी केरल में कुछ ऐसा ही देखने को मिला था।

क्या है कारण इस लाल रंग की बारिश का

2001 में बारिश के पानी के सैंपल सेंटर फॉर अर्थ साइंस स्टडीज़ (CESS) के पास भेजे गए। इस मामले में CESS का मानना था कि किसी उल्कापिंड के फटने की वजह से ये लाल रंग की बारिश हो रही है।

हालाँकि बाद में यह थ्योरी गलत साबित हुई और इसके बाद बारिश के पानी के सैंपल ट्रॉपिकल बॉटैनिकल गार्डन एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट (TBGRI) को भेजे गए।

वहां माइक्रोस्कोपिक जांच में सामने आया कि बारिश का रंग लाल होने का कारण एक प्रकार का शैवाल (alga) है।शैवाल नामक यह कवक पेड़ों की गीली शाखाओं और चट्टानों पर बढ़ता है।

इसके छोटे छोटे छिद्र जो आँखों से नहीं देखे जा सकते, हवा में उड़ते रहते हैं। बारिश के दौरान वे एक लाल रंग छोड़ देते हैं जिससे पूरा वातावरण लाल हो जाता है।

इस संबंध में वर्ष 2013 में फिजियो जेनेटिक्स एंड इवोल्यूशनरी बायोलॉजी में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी। जिसमें यह कहा गया था कि यह कवक मध्य यूरोप और ऑस्ट्रिया में बड़ी संख्या में पाया जाता है। यह केरल और श्रीलंका के वर्षा वनों में भी बड़े पैमाने पर देखा गया है।

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गिरगिट की तरह रंग बदलती है ये दुर्लभ मछली

आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि गिरगिट ही रंग बदलने में माहिर होते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। दुनिया में और भी कई जीव रंग बदलने में माहिर हैं उन्हीं में से एक हैं यह दुर्लभ मछली, जो गिरगिट की तरह ही रंग बदल सकती है।

यह दुर्लभ मछली हाल ही में भारतीय जलस्त्रोत में पायी गई है। इस मछली की खोज पहली बार भारत में की गई है। सेंट्रल मरीन फिशरीज इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों को यह दुर्लभ मछली मन्नार की खाड़ी में दिखी थी।

इस दुर्लभ मछली का नाम है स्कॉर्पियन फिश, जिसका वैज्ञानिक नाम स्कॉर्पिनोस्पिसिस नेगलेक्टा है। सेंट्रल मरीन फिशरीज इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ. जेयाबास्करन ने बताया, कि जब हमने पहली बार इसे देखा तो वह घास में छिपी हुई थी।

पता ही नहीं चल रहा था कि वो कोई मछली है या पत्थर का छोटा टुकड़ा, लेकिन चार सेकंड के बाद ही उसने जब अपने शरीर का रंग बदल कर काला कर लिया, तब समझ में आया कि यह स्कॉर्पियन फिश है।

यह मछली बहुत ज़हरीली और तेज होती है। स्कॉर्पियन फिश शिकार करते समय या शिकारियों से बचाव के समय ही अपना रंग बदलती है। रंग बदलने में माहिर यह मछली बेहद ज़हरीली भी है।

 

इसके रीढ़ की हड्डी में जहर भरा हुआ रहता है। इसे पकड़ने के लिए बेहद सावधानी बरतनी पड़ती है, नहीं तो यह पल भर में जहर उड़ेल देती है। इसका जहर न्यूरोटॉक्सिक होता है, जो अगर इंसान के शरीर में चला जाए तो भयानक दर्द होता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्र की गहराईयों में रहने वाली स्कॉर्पियन फिश रात में शिकार करती है। वह एक जगह दुबक कर पहले शिकार के पास आने का इंतजार करती है और पास आते ही उसपर तेज़ी से हमला कर देती है।

डॉ. जेयाबास्करन ने कहा कि इस दुर्लभ मछली को नेशनल मरीन बायोडायवर्सिटी म्यूजियम में भेजा गया है ताकि इसके बारे में गहन अध्ययन किया जा सके।

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अनोखा मंदिर : जहां मांगी जाती हैं बेटी पैदा होने की मन्नत !!

आज के समय में संतान के रूप में बेटी हो या बेटा दोनों एक-समान हैं लेकिन फिर भी यदि किसी के मन में कोई भी इच्छा होती है तो वह भगवान का दरवाजा खटखटाता है और भगवान से अपनी इच्छा प्राप्ति की कामना करता है।

वैसे तो भारत में बहुत से मंदिर हैं और हर मंदिर से लोगों की अलग अलग आस्था जुड़ी है लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में एक ऐसा मंदिर भी है जहां कन्या के जन्म के लिए मन्नत मांगी जाती है।

जी हाँ हम बात कर रहे हैं झारखंड के बोकारो जिले के चाकुलिया गांव में स्थित 170 साल पुराने दुर्गा मंदिर की जहां सैकड़ों लोग आते हैं और कन्या प्राप्ति मन्नत मांगते हैं।

यहां हर साल दुर्गा पूजा की शुरुआत में घटस्थापना की जाती है और इस मंदिर में एक 150 साल पुराने तांबे के बर्तन की पूजा की जाती है। यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि भले ही लोग पूरे साल मंदिर में आते हैं, लेकिन नवरात्रि के दौरान भीड़ बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि सैकड़ों लोग बेटी की उम्मीद में सिद्धिदात्री दुर्गा की भव्य मूर्ति से कन्या प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

दूसरी ओर अगर लोककथाओं पर विश्वास किया जाए तो लगभग 150 साल पहले कालीचरण दुबे नाम के एक ग्रामीण ने पहली बार यहाँ बेटी के लिए प्रार्थना की और उसकी इच्छा पूरी हुई। जैसे ही लोगों को इस बारे में पता चला, धीरे-धीरे लोग यहां आने लगे।

लोगों का कहना है कि उसके बाद यहां आने वाले सभी लोगों की मुरादें पूरी होने लगी। यह बात देखते ही देखते सभी जगह फ़ैल गई।

कहा जाता है कि हर साल कई जोड़े बेटी की कामना में यहां आते हैं। इनमें से बहुत से लोगों की मुराद पूरी भी हो चुकी है। सभी यहां भक्ति और समर्पण के साथ दुर्गा पूजा करते हैं।

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मुर्दों के शहर के नाम से जाना जाता है ये रहस्यमयी गांव

यह दुनिया कई रहस्यों से भरी हुई हैं जहां कई रहस्यमयी जगहें हैं जो अपने अनोखेपन के चलते प्रसिद्ध हैं। ऐसी ही एक जहग रूस के उत्तरी ओसेटिया में है जिसका नाम है “दर्गाव्स”l

ऐसा कहा जाता है कि यहां जाने वाला कभी वापस लौटकर नहीं आता। यह इलाका बेहद ही सुनसान है। डर की वजह से इस जगह पर कोई भी आता-जाता नहीं है। तो चलिए आज इस रहस्यमयी गांव के बारे में जानते हैं :-

अनगिनत तहखाना नुमा इमारतें

बाहर से खूबसूरत दिखने वाली इस जगह को ‘सिटी ऑफ द डेड’ यानी ‘मुर्दों का शहर’ के नाम से भी जाना जाता है। यह जगह ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों के बीच छिपी हुई है। यहां पर सफेद पत्थरों से बनी अनगिनत तहखाना नुमा इमारतें है। इनमें से कुछ तो 4 मंजिला ऊंची भी है।

विशाल कब्रिस्तान

इमारत की प्रत्येक मंजिल में लोगों के शव दफनाए हुए है। जो इमारत जितनी ऊंची है उसमें उतने ही ज्यादा शव है। बताया जाता है कि इन कब्रों को 16वीं शताब्दी में बनवाया गया था।

यह एक विशाल कब्रिस्तान है। कहते हैं कि हर इमारत एक परिवार से संबंधित है, जिसमें सिर्फ उसी परिवार के सदस्यों को दफनाया गया है। इतना ही नहीं इस जगह को लेकर स्थानीय लोगों के बीच तरह-तरह की मान्यताएं हैं।

उनका मानना है कि इन झोपड़ीनुमा इमारतों में जाने वाला कभी लौटकर नहीं आता, हालांकि कभी-कभार पर्यटक इस जगह के रहस्य को जानने के लिए आते रहते हैं।

इस जगह तक पहुंचने का रास्ता भी बेहद ही मुश्किल है। पहाड़ियों के बीच तंग रास्तों से होकर यहां पहुंचने में करीब तीन घंटे का समय लगता है। यहां का मौसम भी हमेशा खराब रहता है जो सफर के लिए एक बहत बड़ी रुकावट है।

यहां कब्रों के पास नावें मिली हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां शवों को लकड़ी के ढांचे में दफनाया गया था, जिसका आकार नाव के जैसा था।

हालांकि ये अभी रहस्य ही बना हुआ है कि आस-पास नदी मौजूद ना होने के बावजूद यहां तक नाव कैसे पहुंचीं। नाव के पीछे मान्यता ये है कि आत्मा को स्वर्ग तक पहुंचने के लिए नदी पार करनी होती है इसलिए शव को नाव पर रखकर दफनाया जाता है।

पुरातत्वविदों को यहां हर तहखाने के सामने एक कुआं भी मिला है जिसके बारे में कहा जाता है कि लोग अपने परिजनों को यहां दफनाने के बाद कुएं में सिक्का फेंकते थे। अगर सिक्का तल में मौजूद पत्थरों से टकराता है तो इसका मतलब होता था कि आत्मा स्वर्ग तक पहुंच गई।

दुनिया का सबसे बड़ा और खूबसूरत उद्यान

फूलों की खुशबू ऐसी होती है जो किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती हैं। सुंदर फूलों को देखते ही हमारी सारी उदासी और नकारात्मक विचार छूमंतर हो जाते हैं और मन खुशी से भर जाता है।

आज हम ऐसे ही उद्यान की बात करेंगे जहां चारों तरफ सिर्फ फूल ही फूल दिखाई देते है। जी हाँ हम बात कर रहे है मिरेकल गार्डन की, जो की दुबई में डुबाइलैंड जिले में स्थित है।

मिरेकल गार्डन दुनिया का सबसे खूबसूरत और बड़ा उद्यान है। इस गार्डन में 45 लाख अलग-अलग फूल देखने को मिलते है। दुबई का मिरेकल गार्डन 72 हजार वर्ग में फैला हुआ है।

इस उद्यान को 14 फरवरी 2013 से आम व्यक्तियों के लिए खोल दिया है। इस गार्डन में बॉलीवुड फिल्म ‘हमारी अधूरी कहानी‘ की शूटिंग भी हो चुकी है।

 

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बहुत ही खूबसूरत है नायगरा वॉटरफॉल

रेगिस्तान के बीचो बीच होने के कारण पर्यटकों के लिए यहां तक पहुंचना थोड़ा मुश्किल होता है। यह गार्डन पूरे 18 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है और इस गार्डन में 4 करोड़ 50 लाख फूल लगे हैं।

इस गार्डन का आकार ताजमहल के समान लगता है। यहां पर लगे लाल रंग के फूलों को देखकर ऐसा लगता है मानो यहां पर लाल रंग की नदी बह रही हो।

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dubai-miracle-gardमिरेकल गार्डन की सुंदरता की और अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते है तो मिरेकल गार्डन पर बनी वेबसाइट भी देख सकते हैं। वेबसाइट देखें

ये खूबसूरत लड़कियां जो रियल लाइफ में बिलकुल बार्बी डॉल जैसी दिखती हैं

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हर लड़की की ये इच्छा होती है कि वह खूबसूरत दिखें, इसके लिए लड़कियां कई ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करती हैं तो कुछ प्लास्टिक सर्जरी तक करवा लेती हैं।

आज हम आपको बताने वाले दुनिया की कुछ ऐसी खूबसूरत लड़कियों के बारे में जो रियल लाइफ बार्बी गर्ल है और अपनी लाइफ को उसी तरह जीती हैं।

एंजेलिका केनोवा

इसे दुनिया की सबसे सुन्दर बार्बी डॉल माना जाता है। एंजेलिका रूस की राजधानी मॉस्को की रहने वाली है। एंजेलिका की उम्र 26 साल है लेकिन देखने से वो सिर्फ 16 साल की ही लगती है।

एंजेलिका का दवा है कि उसने कभी भी कोई कॉस्मेटिक सर्जरी नहीं करवाई। बार्बी डॉल की तरह दिखने के लिए वह दो से तीन घंटे की एक्सरसाइज करती है। उनके पेरेंट्स ने उसके लिए घर पर ही पर्सनल ट्रेनर रखा है और ये काफी फिट भी है।

वेलेरिया लुक्यानोवा

बार्बी डॉल के लुक की वजह से वेलेरिया पूरी दुनिया मे पहचान रखती है। 2007 में वेलेरिया ने विश्व स्तरीय ब्यूटी कांटेस्ट भी जीता था जिसमे उन्हें मिस डायमंड क्राउन का ख़िताब मिला था।

वीनस पलेर्मो

15 साल की वीनस पलेर्मो देखने में एकदम बार्बी डॉल जैसी दिखती है। लंदन में रहने वाली वीनस पलेर्मो को उनके फैन वीनस एंजलिक के नाम से जानते हैं।

अलीना कोवालेवस्काया

यूक्रेन मे जन्मी अलीना भी बार्बी की तरह दिखती है। लंम्बी टांगे, बड़ी-बड़ी आँखे और सुन्दर बाल उन्हें एक परफेक्ट बार्बी डॉल का लुक देता है लेकिन इस तरह का लुक पाने के लिए अलीना अपनी आँखों के लिए कॉटेक्ट लेंस का प्रयोग करती है जिसके कारण उसकी आँखे सुन्दर व बड़ी दिखती हैं।

लोलिता रिचीv

बार्बी डॉल की तरह दिखने वाली इस खूबसूरत लड़की का कहना है कि वह ‘रियल लाइफ टीनएज बार्बी’ है। इसके लिए उन्हें किसी भी तरह की प्लास्टिक सर्जरी नही करानी पड़ी।

वह कहती है कि इस गेटअप के लिए उसे मां (33 वर्षीय अन्या रिची) का भरपूर सपोर्ट मिला है। लोलिता की मां ही उसकी फोटोग्राफर है, जिन्होंने इंटरनेट पर उसकी शानदार तस्वीरें अपलोड की हैं।

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अनोखा समाज:-जहां लोगों के पूरे शरीर पर लिखा जाता है राम का नाम

हिन्दू धर्म में राम का नाम लेना ही बहुत पुण्यकारी माना जाता है लेकिन भारत में एक ऐसी संस्कृति भी है जिसमें राम नाम को कण-कण में बसाने की परम्परा है।

वैसे तो भारत को विविधताओं वाला देश कहा जाता है क्योंकि यहाँ पर हर धर्म के लोग और हर धर्म का अलग अलग स्वरूप देखने को मिलता है।

लेकिन आज इस लेख में हम आपको ऐसी ही एक अनोखी परम्परा के बारे ने बताने जा रहे हैं जिनके सिर्फ मुंह पर ही नहीं बल्कि पूरे शरीर पर राम नाम रहता हैं।

भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में एक ऐसी परम्परा है जिसे “रामनामी” के नाम से जाना जाता है। इसी परम्परा के चलते इस संप्रदाय से जुड़े लोग अपने पूरे शरीर पर “राम-राम” का नाम अर्थात राम नाम का स्थाई टैटू बनवाते हैं।

राम-राम लिखे कपड़े धारण करते हैं, घरों की दीवारों पर राम-राम लिखवाते हैं, आपस में एक दूसरे का अभिवादन राम-राम कह कर करते हैं, यहां तक कि एक-दूसरे को राम-राम के नाम से ही पुकारते हैं।

इनके अनुसार राम हर मनुष्य में, पेड़-पौधों में, जीव-जन्तु में और समस्त प्रकृति में समाया हुआ है लेकिन न ये लोग मंदिर जाते हैं और न ही मूर्ति पूजा करते हैं।

टैटू बनवाने के पीछे भगवान की भक्ति के साथ ही सामाजिक बगावत भी एक कारण है। कहा जाता है कि 100 साल पहले गांव में हिन्दुओं की ऊंची जाति के लोगों ने इस समाज को मंदिर में जाने से मना कर दिया था।

इसके बाद से ही इन्होंने विरोध करने के लिए चेहरे सहित पूरे शरीर में राम नाम का टैटू बनवाना शुरू कर दिया। रामनामी समाज को “रमरमिहा” के नाम से भी जाना जाता है।

कई लोग इस परंपरा को पिछले 50 सालों से निभा रहे हैं। वहां के लोग बताते हैं जिस दिन उन्होंने ये टैटू बनवाया, उस दिन उनका नया जन्म हो गया। 50 साल बाद उनके शरीर पर बने टैटू कुछ धुंधले से हो चुके हैं लेकिन उनके विश्वास में कोई कमी नहीं आई है।

रामनामी जाति के लोगों की आबादी तकरीबन एक लाख है और छत्तीसगढ़ के चार जिलों में इनकी संख्या ज़्यादा है। सभी में टैटू बनवाना एक आम बात है।

इस समाज में पैदा हुए लोगों को शरीर के कुछ हिस्सों में टैटू बनवाना जरूरी है। खासतौर पर छाती पर और दो साल का होने से पहले। टैटू बनवाने वाले लोगों को शराब पीने की मनाही के साथ ही रोजाना राम नाम बोलना भी जरूरी है।

रामराम लिखवाने वालों ने बताया कि रामनामियों की पहचान राम-राम का नाम लिखवाने के मुताबिक की जाती है। शरीर के किसी भी हिस्से में राम-राम लिखवाने वाले रामनामी, माथे पर राम नाम लिखवाने वाले को शिरोमणि, और पूरे माथे पर राम नाम लिखवाने वाले को सर्वांग रामनामी और पूरे शरीर पर राम नाम लिखवाने वाले को नखशिख रामनामी कहा जाता है।

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जानिए खूबसूरत हमिंग बर्ड से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

दुनिया भर में बहुत सारे पक्षी पाए जाते हैं जो बहुत ही खूबसूरत होते हैं। उन्ही खूबसूरत पक्षियों में से एक है “हमिंग बर्ड” इसे गुंजन पक्षी के नाम से भी जाना जाता है।

यह दुनिया का सबसे छोटा पक्षी है। इस पक्षी का नाम हमिंग बर्ड इसके गुनगुनाने की वजह से पड़ा है। आज इस लेख में हम बात करेंगे हमिंग बर्ड के बारे में तो चलिए जानते हैं :-

  • यह (गुंजन पक्षी) विश्व की सबसे छोटी चिड़िया है।
  • हमिंग बर्ड एक ऐसा इकलौता पक्षी है जो उल्टा भी उड़ सकता है।
  • हमिंग बर्ड की कई प्रजातियाँ है पर किसी भी प्रजाति का वज़न भारी अथवा आकार बड़ा नहीं होता है। एक औसत हमिंग बर्ड का वज़न 2.0 ग्राम से कम होता है।

  • हमिंग बर्ड मधुमक्खी और छोटी चिड़िया का वंश है। यह मधुमक्खी जितनी ही होती है। यह अधिकतर क्यूबा के जंगलों में पाई जाती है।
  • दुनिया भर में इसकी की 300 से अधिक प्रजातियाँ पायी जाती हैं।
  • हमिंग बर्ड की चोंच आगे से थोड़ी मुड़ी हुई और लचीली होती है। यह फूलों का रस पीने के लिए फूल के अंदर आसानी से पहुंच जाती है।
  • हमिंग बर्ड की कुछ प्रजातियाँ ऐसी है, जिनकी तलवार जैसी चोंच उनके शरीर से बड़ी होती है।
  • इनकी जीभ काफी लंबी और डब्ल्यू के आकार में दो भागों में बंटी होती है। इसकी जीभ पर छोटे-छोटे बाल होते हैं, जो फूलों का रस चूसने में सहायता करते हैं। फूलों का रस पीते समय यह 22-72 बार अपने पंख फड़फड़ाती हुई हवा में एक ही जगह उड़ती रहती है।
  • इनके घोंसले बेहद छोटे होते हैं इनका आकार एक अखरोट से भी छोटा होता है।
  • हमिंग बर्ड्स के पंखों की संख्या 1000 से 1500 होती है, जो कि चिड़ियों की किसी भी प्रजाति से कम है। उड़ान के दौरान यह पक्षी एक सेकंड में करीब 80 से 100 बार अपने पंख फड़फड़ाती है और यह इतनी तेज होती है कि नंगी आंखों से आप पँखो को फड़फड़ाते हुए नहीं देख सकते। वैसे कुछ प्रजातियां एक मिनट में 200 बार अपने पँखो को फड़फड़ाते है।

  • इनके पैर बहुत कमजोर होते हैं, इसलिए ये मुश्किल से चल पाती हैं लेकिन अपने पैरों की मदद से ये पेड़ की टहनियों को कसकर पकड़ लेती हैं और खड़े-खड़े सो सकती हैं।
  • इनका भोजन मुख्यतः फूलों का रसपान है। यह पक्षी फूलों पर अक्सर मंडराती रहती है। ये फूलों का रस चूसकर पेट भरती है। इसके अलावा यह कीड़े मकोड़ो को भी खाती है। यह पक्षी हर 10 से 15 मिनट में भोजन करती है। इसके पीछे का कारण एनर्जी प्राप्त करना है। उड़ने के लिए इनको एनर्जी की आवश्यकता होती है।
  • हमिंग बर्ड मुख्य रूप से फूलों का रस पीती हैं। दिन भर में यह करीब 1,000 फूलों का रस पीती हैं। इन्हें लाल और नारंगी रंग के ट्यूबलर प्रकार के फूल खास प्रिय हैं क्योंकि इनमें इनकी चोंच आसानी से चली जाती है।
  • यह 60-80 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से उड़ सकती है।
  • एक औसत हमिंग बर्ड का दिल 1 मिनट में 1,200 बार धड़कता है।
  • हमिंग बर्ड 4-5 साल तक जिंदा रहती हैं। ये अकसर सांप, उल्लू या बड़ी बर्डस का शिकार बन जाती हैं।
  • इस पक्षी की याददास्त बहुत तेज होती है। यह जिस फूल पर एक बार चली जाती है, उसे नहीं भूलती।

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