‘आई-दा’- दुनिया की पहली रोबोट पेंटर

‘आई-दा’ नामक खूबसूरत महिला जैसी लगने वाली यह पेंटर दरअसल एक रोबोट है। यह दुनिया की पहली रोबोट पेंटर बन गई है इसने एक कमाल किया है। आइने में खुद को देखकर अपनी पेंटिंग बना डाली। इसके बाद से यह लगातार चर्चा में है।

रोबोट आई-दा की पेंटिंग प्रदर्शनी हाल ही में लंदन के डिजाइन म्यूजियम में लगी। इसे बनाने वाले लोगों ने इसका नाम 19वीं सदी की गणितज्ञ ‘अदा लवलेस’ के नाम पर रखा है। यह दुनिया की पहली ‘अल्ट्रारियलिस्टिक रोबोट’ है जो अपनी आंखों और हाथों के उपयोग से पेंटिंग बनाती है।

आई-दा ने अपनी पेंटिंग बनाने के लिए कुछ देर तक खुद को आइने में देखा। सारे ‘कॉर्डिनेट्स’ रिकॉर्ड किए। उनका आकलन आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस से किया, उसके बाद उसने अपनी तस्वीर को कैनवास पर उतार दिया।

इंगलैंड के लीड्स स्थित इंजीनियरों ने इसे बनाया है लेकिन इस रोबोट को बनाने का आइडिया ऑक्सफोर्ड आर्ट गैलरी के मालिक एइदान मेलर और क्यूरेटर लूसी सील को आया था। लूसी ने कहा कि इतना तो तय है कि भविष्य में लोग टैक्नोलॉजी आधारित पेंटिंग्स को भी काफी पसंद करने लगेंगे।

आई-दा की पेंटिंग एग्जीबिशन को लेकर एइदान पहले काफी संदेह की स्थिति में थे लेकिन उनका कहना है कि आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस आधारित आर्ट मूवमैंट की शुरूआत अगर आई-दा से हो तो लाजवाब होगा।

वह आई-दा का काम दुनिया के सामने रखना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि आई-दा दुनिया की पहली प्रोफैशनल ह्यूमेनॉयड आर्टिस्ट है जो अपनी कलाकृतियां खुद बनाती है।

क्योंकि यह एक रोबोट है इसलिए उसके काम के लिए सोचने का नजरिया भी आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस के जरिए ही सम्भव होता है। जो वह रोबोट सोचता है उसे कैनवास पर उतार देता है या फिर जो देखता है उसे।

प्रदर्शनी के दौरान आई-दा ने कुछ सवालों के जवाब भी दिए। प्रदर्शनी में उसके द्वारा बनाई गई ड्रॉइंग्स, पेंटिंग्स, स्कल्पचर्स, वीडियो आर्ट को भी दिखाया जा रहा है ताकि लोगों को पता चल सके कि आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस, टैक्नोलॉजी और ऑर्गेनिक लाइफ को मिलाकर क्या कुछ किया जा सकता है।

पंजाब केसरी से साभार

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हिमालय पर रहती है ‘उड़ने वाली गिलहरी’

गिलहरी को आपने जमीन पर तेजी से भागते और उछल-कूद करते हुए तो कई बार देखा ही होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया की सबसे ऊंची जगहों पर ऐसी भी गिलहरियां पाई जाती हैं जो उड़ सकती हैं।

ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने ऐसी ही एक विशालकाय गिलहरी को ढूंढ निकाला है। यह गिलहरी जीवों की कुछ बेहद दुर्लभ और विलुप्तप्राय प्रजातियों में से एक है। इस गिलहरी का वजन करीब अढ़ाई किलो है और लम्बाई एक मीटर है।

आमतौर पर गिलहरियां न तो इतनी वजनदार और न ही इतनी लम्बी होती हैं। खासतौर पर एशिया में हिमालय की पहाड़ियों पर इनका डेरा है। बता दें कि इनके इंतजार में वैज्ञानिकों ने 130 साल बिता दिए, उन्हें उम्मीद थी कि ये पाकिस्तान में सुदूर घाटियों पर कहीं रहती हैं।

फिलहाल दो गिलहरियों को हिमालय के पहाड़ों पर देखा गया है। यहाँ ‘तिब्बतन वूली’ और ‘यूनानी वूली’ नामक उड़ने वाली दो गिलहरियां देखी गई हैं। ये आकार में काफी ज्यादा बड़ी हैं।

ऐसे में प्रोफैसर हैलगन कहते हैं कि इसको साल के अंत तक ही कोई वैज्ञानिक नाम दिया जा सकेगा। ये दुनिया की कुछ सबसे विशालकाय गिलहरियों में से एक हैं।

पंजाब केसरी से साभार

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इस ग्रह के हैं ’82’ उपग्रह

किसी ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करने वाली चीज को ही उपग्रह कहते हैं। बोलचाल की भाषा में इसे चांद कहा जाता है। हमारी पृथ्वी का एक चांद है। हमारे सौरमंडल में मौजूद सभी 8 ग्रहों के पास चांद मौजूद हैं।

ये चांद एक निश्चित समय में अपने ग्रह की परिक्रमा करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हमारा चांद हमारी पृथ्वी की परिक्रमा करता है।

वैसे आप शनि ग्रह के कुछ चांद यह जानकार हैरान हो जाएंगे कि एक ग्रह ऐसा भी है जिसके एक या दो नहीं बल्कि पूरे 82 चांद हैं।

ये सभी 82 उपग्रह अपने ग्रह की परिक्रमा करते रहते हैं। बड़ी बात यह है कि इसमें से 20 उपग्रहों को तो 2 साल पहले ही खोजा गया है।

सौरमंडल में 82 चांद वाले इस ग्रह का नाम ‘सैटर्न’ यानी शनि है। आज से दो साल पहले तक सबसे अधिक चांद के होने का तमगा ज्यूपिटर’ यानी बृहस्पति ग्रह के नाम था लेकिन 2019 में खगोलविदों ने शनि की परिक्रमा करते हुए 20 नए चांद की खोज कर इतिहास को बदल दिया।

बृहस्पति के पास वर्तमान में 79 चांद हैं। इन 20 नए उपग्रहों को कार्नेगी इंस्टीच्यूशन फॉर साइंस के स्कॉट एस. शैपर्ड के नेतृत्व में एक टीम ने खोजा था।

वैज्ञानिकों ने शनि के जिन नए चांद की खोज की, उनमें से एक की परिभ्रमण कक्षा ही शनि से सबसे ज्यादा दूर है। इन उपग्रहों का आकार लगभग एक समान ही है। इनका व्यास करीब 5 किलोमीटर के आस-पास है।

20 में से दो चांद को शनि की परिक्रमा करने में 2 साल का समय लगता है जबकि बाकी के 18 चांद को ऐसा करने में तीन साल से अधिक का समय लगता है। अन्य ग्रहों के चांद की तुलना में शनि के ये नए चांद एक समान कक्षा में परिक्रमा करते हैं।

इनकी कक्षाएं पहले से ज्ञात शनि के बाकी के चांदों से मिलती-जुलती हैं। ऐसे में इन चांदों के झुकाव को देखकर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ये सभी कसी बड़े उपग्रह के टुकड़े हो सकते हैं, जो पहले से शनि की परिक्रमा कर रहा था।

खगोलविदों का मानना है कि इन छोटे और हमारे सौरमंडल के बड़े चांदों के बीच के संबंध का अध्ययन करने से उन्हें बड़ी जानकारी मिल सकती।

इससे धरती के बनने के रहस्य से भी पर्दा उठ सकता है। हवाई द्वीप पर लगे हुए सुबारू टैलीस्कोप से वैज्ञानिकों ने पहली बार इन चांदों को देखा था।

पंजाब केसरी से साभार

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नासा ने की धरती जैसे ग्रहों की खोज जहां पर हो सकता है जीवन संभव

‘स्टारगेजिंग’ – शौक तारों को निहारने का

कितनी ही बार आपने रात के समय आकाश को देखा होगा और इसकी सुंदरता से चकित भी हुए होंगे लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह एक दिलचस्प शौक भी हो सकता है। रात के आकाश को देखने के शौक को ‘स्टारगेजिंग’ कहा जाता है।

इस शौक की शुरूआत के लिए आपको क्या करना चाहिए :

  • खगोल विज्ञान के बारे में पढ़ें और अंतरिक्ष से खुद को परिचित करें। इसके लिए आप किताबें पढ़ सकते हैं या इंटरनैट पर भी सर्च कर सकते हैं।
  • किसी प्लैनेटेरियम’ में जाएं। तारों तथा ग्रहों से परिचित होने के लिए यह एक बेहतरीन जगह है।
  • एक स्टार मैप’ यानी तारों का मानचित्र प्राप्त करें और सौरमंडल व तारों समूहों (कांस्टीलेशन्स) के बारे में अधिक जानें।

‘स्टारगेजिंग’ के दौरान ध्यान में रखने वाली बातें।

  • सभी तरह की तेज रोशनी को दृष्टि से दूर रखें।
  • आकाश जितना हो सके साफ होना चाहिए।
  • आपको एक अच्छे क्षितिज की आवश्यकता है इसलिए किसी ऊंची इमारत की छत इसके लिए आदर्श होनी चाहिए।

उपकरण जो आपके मददगार हो सकते हैं

शुरूआत के लिए दूरबीन सबसे अच्छी हैं क्योंकि वे आपको चांद का क्रेटर देखने में मदद करती हैं। वे निहारिकाओं और धूमकेतुओं को देखने के लिए भी अच्छी हैं।

वैसे टैलीस्कोप आपको सबसे अच्छा नजारा दिखा सकते हैं। आप उनके माध्यम से ग्रहों, चंद्रमा, आकाशगंगाओं और निहारिकाओं को साफ-साफ देख सकते हैं।

तारों को देखने के लिए अच्छी जगहें

जहां शाम से सुबह के बीच आकाश साफ हो, दक्षिण दिशा की ओर स्थितिज के बीच कोई व्यवधान न हो, भवन, ऊंचे पेड़ आदि, शहरी रोशनी न हो वही स्थान श्रेष्ठ है। ऐसे में ये घर की छत भी हो सकता है।

पंजाब केसरी से साभार

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लक्षद्वीप का कायाकल्प और प्राकृतिक सौंदर्य को खतरा

हमारे देश में जितने भी पर्यटन स्थल हैं, वे अधिकतर ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक हैं। इनमें विशाल किले, राजा महाराजा, नवाब, बादशाह, और शहंशाहों द्वारा बनवाए गए अनेक स्थल सदियों से आकर्षण का केंद्र रहे हैं।

इसी तरह धार्मिक स्थल हैं जो पूरे देश में आस्था के प्रतीक और प्राचीन वास्तु कला के अद्वितीय भंडार हैं। इनका सौंदर्य अनूठा, आलौकिक और अद्भुत है।

इसके अतिरिक्त प्राकृतिक सौंदर्य के प्रतीक अनेक स्थल हैं जो अपनी विविधता के लिए प्रसिद्ध हैं। ऐसे ही स्थलों में अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप है जो अपने प्राकृतिक संपदा के लिए विख्यात है। अभी तक यह क्षेत्र सैलानियों के लिए एक तरह से प्रतिबंधित रहा है।

सरकार अब इसे भी देशी और विदेशी पर्यटकों के लिए खोलना चाहती है। इसका विरोध भी हो रहा है और इसे पर्यावरण संरक्षण में बाधक कहकर अनेक राजनीतिक और सामाजिक कार्यों से जुड़े लोगों द्वारा अनावश्यक बताया जा रहा है।

लक्षद्वीप अनूठा द्वीप समूह

फरवरी 2019 में विज्ञान प्रसार के लिए एक फिल्म बनाने के लिए लक्षद्वीप जाना हुआ। इस फिल्म का विषय था कि समुद्र के पानी से ऊर्जा अर्थात बिजली का उत्पादन करने से हमारी विज्ञान प्रयोगशालाओं ने जो प्रयास किए हैं और उनके फलस्वरूप जो उपलब्धियां हासिल की हैं उन्हें इंडिया साइंस चैनल के माध्यम से दर्शकों को अवगत कराना।

फिल्म निर्माण के समय इस क्षेत्र के सौंदर्य को निहारने और इसकी विशेषताओं से परिचित होने का अवसर था। सबसे पहले इस अनूठे क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य की बात करते हैं।

32 वर्ग किलोमीटर में फैले लक्षद्वीप में 36 स्थल हैं। इनमें 27 द्वीप हैं जिनमें से 10 में आबादी है और17 में कोई नहीं रहता। तीन रीफ हैं जो पर्यावरण की दृष्टि से अनमोल धरोहर हैं छः सैंड बैंक हैं जिनका भी इकोसिस्टम की दृष्टि से बहुत महत्व है।

लगभग 70 हजार की जनसंख्या वाले इस केंद्र शासित प्रदेश में कुछ इलाके ऐसे हैं जहां केवल 10 लोग रहते हैं। यह पूरा अनुसूचित जनजाति क्षेत्र है और यहां की आबादी 9% मुस्लिम है।

शेष 3% में अधिकतर प्रशासनिक, सैन्य तथा अन्य सरकारी सेवाओं के लोग हैं ।स्थानीय आबादी हालांकि एक ही धर्म से संबंधित है लेकिन उनका व्यवहार इतना धर्मनिरपेक्ष है कि वहां बाहर से आने वाले व्यक्ति को लगता है कि उसमें और उनमें कोई अंतर नहीं है।

स्वागत सत्कार, बातचीत से उनके मिलनसार होने का आभास धरती पर एक कदम रखते ही हो जाता है। इस तरह से मदद करने और किसी भी प्रकार की अपेक्षा न रखने की प्रवृत्ति यहां स्थानीय आबादी में इतनी है कि अगर किसी को कहीं रहने की सुविधा न मिले तो उसे यह अपने घर ठहरने तक में कोई असुविधा महसूस नहीं करते और उनकी कुछ सुविधा का ध्यान रखने में कोई कमी नहीं रखते।

राजधानी कवारती में अधिकतर सरकारी कार्यालय हैं और पूरे क्षेत्र का प्रशासन यहीं से चलता है। रहने के लिए जो भी होटल या गेस्ट हाउस है वह सरकारी हैं और यहां आने से पहले यह निश्चित कर लेना होता है कि इनमें रहने के लिए जगह उपलब्ध है और बुकिंग करा ली गई है। कई बार तो इसके लिए कई सप्ताह इंतजार करना पड़ सकता है क्योंकि बहुत सीमित मात्रा में निवास की सुविधाएं हैं।

जहां तक पानी का संबंध है तो अभी भी यहां सब जगह खारा पानी ही उपलब्ध है। पीने का पानी बहुत सीमित मात्रा में उपलब्ध है। यह या तो बोतल बंद बाहर से आता है या फिर डीसैलिनेशन प्लांट से नलों के जरिए प्राप्त होता है। यह नल जगह-जगह लगे हुए हैं जहां से पानी भरकर घरों तक लाया जाता है।

अगर इस क्षेत्र का विकास करना है और उसे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करना है तो सबसे पहले बिजली और पानी की समुचित व्यवस्था करनी होगी।

वैसे भी यह दोनों स्थानीय आबादी की मूलभूत आवश्यकताएं हैं जिनकी पूर्ति किए बिना लक्षद्वीप के शहर कवारती को स्मार्ट सिटी का आकार देना संभव नहीं है।

लक्षद्वीप के पर्यटन की दृष्टि से जो दीप विकसित किए जा सकते हैं उनमें बंगाराम पहले से ही सैलानियों का पसंदीदा स्थल है। जिन अन्य द्वीपों पर आबादी है उनका विकास जीवन के लिए आवश्यक सुविधाओं का प्रबंध करने से ही होगा। इनमें स्कूल, शौचालय,अधिकार प्रमुख हैं।

नई प्रशासनिक घोषणा से बीफ को प्रतिबंधित करने और उसके स्थान पर मछली और अंडों का सेवन करने पर जोर देना कहीं से भी उचित नहीं है। बीफ का प्रचलन रोकने से स्थानीय आबादी के रोष का कारण बनना ठीक नहीं।

यदि गौरक्षा ही उद्देश्य है तो उसके लिए अलग से व्यवस्था की जानी चाहिए ना कि ऐसा काम किया जाए जिससे विरोध की लहर पैदा हो जाए। अल्कोहल की अनुमति देना भी तर्कसंगत नहीं क्योंकि अभी तक यह क्षेत्र की इस व्यसन से अपरिचित है।

पर्यटकों का स्वागत अल्कोहल के स्थान पर किसी अन्य भारतीय पेय पदार्थ किया जा सकता है। इससे न केवल विदेशियों को एक भारतीय पेय का स्वाद मिलेगा बल्कि वे उसे अपने साथ भी ले जाना पसंद करेंगे।

जहां तक कानून व्यवस्था की बात है, यह प्रदेश अभी तक अपराध से लगभग अछूता है। यहां चोरी, डकैती ,लूटपाट जैसी घटनाएं लगभग न के बराबर होती हैं। जनसंख्या एक दूसरे के साथ सहयोग करने और आपसी विश्वास की जीवन चर्या का अंग मानती है।

पंचायत चुनावों में भाग लेने के लिए दो बच्चों की सीमा बना देना न केवल हास्य पद है बल्कि गैर कानूनी भी है क्योंकि अभी तक संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।

विकास करना ही अगर उद्देश्य है तो सबसे पहले क्षेत्र की मूलभूत आवश्यकताओं को ही पूरा कर ले तो काफी होगा।
पंजाब केसरी से साभार……।

पृथ्वी, मनुष्य और प्रदूषण

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जमीन, भूमि, धरा, धरणी, अचला, पृथ्वी, वसुधा, वसुंधरा, सहित कितने ही सुंदर नामों वाली प्यारी धरती मनुष्य और जीव-जंतुओं की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।

इसके बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते, लेकिन विकास की जाने कौन- सी दौड़ और हवस है, जिसके कारण मनुष्य धरती के वातावरण को लगातार नुक्सान पहुंचा रहा है।

आज धरती के वातावरण और जन-जीवन को बचाने के लिए हमारे सामने अनेक चुनौतियां पैदा हो गई हैं। सूरज की पराबैंगनी किरणों से धरती की रक्षा करने वाली ओजोन परत को खतरा पैदा हो गया है।

ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है। बर्फ के ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। पानी के स्त्रोत दूषित होते जा रहे हैं धरती पर अपशिष्ट कूड़े के अंबार लगे हुए हैं।

हर रोज पैदा होने वाले कचरे की तुलना में कचरे के प्रबंधन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। कचरा प्रबंधन में भ्रष्टाचार जले पर नमक के समान है।

सुनामी, सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए भी मनुष्य की उदासीनता को जिम्मेदार बताया जा रहा है, तो हर एक का दायित्व है कि धरती, उसकी वन संपदा, जल संपदा, पहाड़ व प्रकृति को बचाने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयास किए जाएं।

मानव सहित पृथ्वी लाखों प्रजातियों का घर है। पृथ्वी सौरमंडल का एकमात्र ग्रह है जहां पर जीवन संभव है। सात महाद्वीपों में बांटी गई पृथ्वी पर सबसे उत्तम बिंदु माउंट एवरैस्ट है, जिसकी ऊंचाई 8848 मीटर है।

दूसरी ओर सबसे निम्नतम बिंदु प्रशांत महासागर में स्थित मारियाना खाई है, जिसकी समुद्र के स्तर से गहराई 10911 मीटर है। पृथ्वी आकार में पांचवां सबसे बड़ा ग्रह है और सूर्य की दूरी के क्रम में तीसरा ग्रह है। आकार एवं बनावट की दृष्टि से पृथ्वी शुक्र के समान है।

यह अपने अक्ष पर पश्चिम से पूरब 1610 किलोमीटर प्रति घंटा की चाल से 23 घंटे 56 मिनट और 4 सेकेंड में एक चक्कर पूरा करती है। पृथ्वी की इस गति को घूर्णन या दैनिक गति कहते हैं। इस गति से ही दिन व रात होते हैं।

पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट 40 सेकंड का समय लगता है। सूर्य के चतुर्दिक पृथ्वी की इस परिक्रमा को पृथ्वी की वार्षिक गति अथवा परिक्रमण कहते हैं। पृथ्वी को सूर्य के परिक्रमा पूरी करने में लगे समय को सौर वर्ष कहा जाता है।

प्रत्येक सौर वर्ष, कैलेंडर वर्ष, से लगभग 6 घंटा बढ़ जाता है। जिसे हर चौथे वर्ष में लीप वर्ष बनाकर समायोजित किया जाता है। लीप वर्ष 366 दिन का होता है।

जिसके कारण फरवरी माह में 28 दिन के स्थान पर 29 दिन होते हैं। जल की उपस्थिति तथा अंतरिक्ष से नीला दिखाई देने के कारण पृथ्वी को नीला ग्रह भी कहा जाता है।

पृथ्वी की उत्पत्ति 4.6 अरब वर्ष पूर्व हुई थी। जिसका 70.8% भाग जलीय और 29.2 % भाग स्थलीय है। उत्पत्ति के एक अरब वर्ष बाद यहां जीवन का विकास शुरू हो गया था। तब से पृथ्वी के जैवमंडल ने यहां के वायुमंडल में काफी परिवर्तन किया है।

समय बीतने के साथ ओजोन परत बनी जिसने पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के साथ मिलकर पृथ्वी पर आने वाले हानिकारक विकिरण को रोककर इसको रहने योग्य बनाया। लेकिन बढ़ती जनसंख्या तथा औद्योगीकरण व शहरीकरण में तेजी से वृद्धि ने 20वीं सदी में पर्यावरण को क्षति की प्रक्रिया को तेज कर दिया था।

प्रदूषण के कारण पृथ्वी अपना प्राकृतिक रुप खोती जा रही है। पृथ्वी के सौंदर्य को जगह – जगह पर फैले कचरे के अम्बारों और ठोस अपशिष्ट पदार्थों ने छीन लिया है।

आधुनिक युग में सुविधाओं के विस्तार ने भी स्थिति को विकराल बना दिया है। मनुष्यों की सुविधा के लिए बनाई गई पॉलीथिन सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई है। पॉलिथीन जमीन और जल दोनों के लिए घातक सिद्ध हुआ है।

इनको जलाने से निकलने वाला धुआं ओजोन परत को भी नुक्सान पहुंचाता है जो ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा कारण है। देश में प्रतिवर्ष लाखों पशु -पक्षी पॉलीथिन के कचरे से मर रहे हैं। इससे लोगों में कई प्रकार की बीमारियां फैल रही हैं।

इससे जल स्त्रोत दूषित हो रहे हैं। पॉलीथिन कचरा जलाने से कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड एवं कार्बन डाइऑक्सीन्स जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं।

इनसे सांस, त्वचा आदि की बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती है। भारत की ही बात करें तो यहां प्रतिवर्ष लगभग 500 मीट्रिक टन पॉलीथिन का निर्माण होता है, लेकिन इसके 1% से भी कम का पुनर्चक्रण हो पाता है।

अनुमान है कि भोजन के धोखे में इन्हें खा लेने के कारण प्रतिवर्ष एक लाख समुद्री जीवों की मौत होती है। विश्व में प्रतिवर्ष प्लास्टिक और 10 करोड़ टन के लगभग है और इसमें प्रतिवर्ष 4% की वृद्धि हो रही है।

भारत में औसतन प्रत्येक भारतीय के पास प्रतिवर्ष आधा किलो प्लास्टिक अपशिष्ट पदार्थ इकट्ठा हो जाता है। इसका अधिकांश भाग कूड़े के ढेर और इधर-उधर बिखर कर पर्यावरण प्रदूषण फैलाता है।

पंजाब केसरी से साभार….।

जाने कहानी आम की और इससे जुड़े कुछ खास तथ्य!!

आम को फलों का राजा कहा जाता है। दुनिया भर में अनेक प्रकार के आम उगाए तथा बड़े ही चाव के साथ खाए जाते हैं। यह दुनिया भर में सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले फलों में से एक है।

बरसात में तो हर घर में आप आम देख सकते हैं। इसमें पोषक तत्व भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, यह जहाँ पाचन तंत्र को ठीक रखता है, वही त्वचा की कोमलता के लिए भी यह कारगर है।

यह त्वचा का रंग भी साफ करने में सहायता करता है। हम आपको इससे जुड़े कुछ ऐसे और खास तथ्यों के बारे में बता रहे हैं जिनके बारे में आपको शायद ही पता होगा।

तो चलिए जानते हैं :-

  • दुनिया में सबसे अधिक आम भारत में पैदा किए जाते हैं। वैसे इसे केवल भारत में ही नहीं, पाकिस्तान और फिलीपींस में भी राष्ट्रीय फल माना जाता है और बांग्लादेश में इसके पेड़ को राष्ट्रीय पेड़ का दर्जा प्राप्त है।
  • दुनिया भर में इसकी करीब 1400 किस्में में पाई जाती हैं, इनमें से 1 हजार भारत में पैदा होती हैं।
  • आम के पेड़ का वैज्ञानिक नाम ‘मैंगिफेरी इंडिका’ है। इसका अर्थ है ‘आम के फल वाला एक भारतीय पौधा’।
  • भारत में उगाए जाने वाले फलों में यह सबसे पुराना है। इसे भारत में लगभग 5000 सालों से उगाया जा रहा है। इसे सबसे पहले उत्तर- पूर्वी राज्यों में उगाया गया। वह क्षेत्र वर्तमान समय में म्यांमार से जुड़ा हुआ है जहां आम के बाग सबसे पहले लगाए गए थे।
  • भारत में मुगलों का शासन आया तो इसकी खेती को और बढ़ावा मिला मगर तब आम को सोने के भाव तोला जाता था इसलिए इसकी खेती केवल शाही उद्यानों में ही होती थी। हालांकि, शाहजहां के शासनकाल में यह बंदिश खत्म कर दी गई। ‘ए हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड’ नामक पुस्तक में इतिहासविद केटी आचार्या ने भी इस बात का जिक्र किया है कि मुगलों के शासन काल में भारत में तोतापरी, रातोल और केसर जैसे आम उगाए जाते थे।
  • बताया जाता है कि आम मुगल बादशाह जहांगीर का पसंदीदा फल था और उसने एक बार यह भी कहा था कि पूरी दुनिया में इससे स्वादिष्ट फल और कोई नहीं हो सकता।
  • इतिहास में इस बात का भी ज़िक्र मिलता है कि जब ‘अलेक्जेंडर द ग्रेट यानी सिकंदर’ भारत से वापस यूनान लौट रहा था तो वह अपने साथ सबसे अच्छी किस्म के आम ले गया था।
  • पुराने समय में दक्षिण भारत में इस फल को ‘आमकाय’ कहा जाता था। यहां के कुछ लोग इसे ‘मामकाय’ भी कहते हैं।इसके अलावा इसे ‘मांगा’ भी कहा जाता था। जब पुर्तगाली भारत आए तो उन्होंने इसका नाम ‘आम’ रखा।
  • ‘ए हिस्टारिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड’ के अनुसार आम की खेती सबसे पहले खुद पुर्तगालियों ने ही भारत आकर शुरू की थी। जो सबसे पहले किस्म उगाई गई उसका नाम ‘फ्रेनानदीन’ रखा गया। इसके बाद पुर्तगाली दूसरे देशों में भी भारत से इसके बीज लेकर गए और वहां इसकी अलग किस्में उगाई।
  • सबसे लोकप्रिय आमों में लंगड़ा, दशहरी, तोतापुरी, सिंदूरी, अलफांसो, से लेकर सफेदा शामिल हैं।

हर आम के पीछे है एक खास कहानी

लंगड़ा आम

लंगड़ा आम खाने में हल्की खटास लिए मीठा होता है। इसके साथ एक कहानी जुड़ी है। कहते हैं कि बनारस के एक किसान के बगीचे में एक आम का पेड़ लगा था।

उसे इसका स्वाद इतना अच्छा लगा कि इसी तरह के आम के और भी पेड़ उसने लगा लिए और इसका नाम, लंगड़ा रखा गया क्योंकि जिस किसान ने इस किस्म को खोजा था वह पैरों से अपाहिज था।

दशहरी

दशहरी आम का सबसे ज्यादा उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है यहां हर साल करीब 20 लाख टन दशहरी आम पैदा होता है।

कहते हैं कि इसका पहला पेड़ लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन से सटे दशहरे गांव में लगाया गया था, इसी गांव के नाम पर इसका नाम दशहरी आम पड़ा कहते हैं कि वह पेड़ आज भी मौजूद है, जिस पर पहला दशहरी आम आया था।

इसकी उम्र करीब 200 साल बताई जाती है। इसे ‘मदर ऑफ मैंगो ट्री’ भी कहा जाता है। इसके अलावा चौसा और एक दर्जन से अधिक किस्मों के नाम गांव के नाम पर ही पड़े हैं।

तोतापुरी

इसकी ‘तोते की चोंच जैसी नोक और रंग के कारण इसे तोतापुरी या तोतापरी कहा जाता है।

सिंदूरी

सिंदूरी आम की फसल में छिलकों पर हरे रंग के अलावा सिंदूरी रंग भी दिखाई देता है, इसलिए इसे सिंदूरी भी कहा जाता है।

अलफांसो

दुनिया भर में भारत में पैदा होने वाले अलफांसो की अलग पहचान है, इसे सभी आमों का राजा भी कहा जाता है अल्फांसो ही एक ऐसा नाम है जो तौल के साथ साथ दजर्न में भी बिकता है।

यह सबसे अधिक यूएसए को एक्सपोर्ट होता है कई देशों में इसके दाम और ज्यादा हो जाते हैं वैसे अलफासों को ब्रिटेन में भी उगाया जाता है। अलफासों को भारत में हापुस आम भी कहा जाता है। यह लगड़ा आम के बाद सबसे मीठा होता है।

सफेदा

इसके छिलके में हल्की सफेदी होती है इसलिए इसको सफेदा कहा जाता जाता है।

जीवनदायिनी नदियों पर गहराता संकट

प्राचीन काल में नदियों के किनारे ही मानव सभ्यताओं का जन्म व विकास हुआ थाl नदियां केवल धरती के प्राण ही नहीं हैं बल्कि मानव संस्कृतियों की जननी भी हैं।

हमारे पूर्वज नदियों को देवी मानकर उनकी पूजा किया करते थे नदियों की महानता से प्रसन्न होकर ऐतिहासिक काल में कई महा ऋषियों ने नदी व पुराण ग्रंथों की रचना भी की है।

उस समय नदियों के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं थी क्योंकि प्राचीन काल में नदियों का केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व ही नहीं था बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक महत्व को भी समेटे हुए थीं, जिन्हें उजागर करने के लिए कई मेलों और त्यौहारों का आयोजन भी नदियों को केंद्र में रखकर किया जाता था।

प्राचीन समय में भारत अपनी कई महान नदियों के कारण विश्व विख्यात था। भारत की धरती पर कई नदियां इठलाती थीं और उनके जल से हजारों खेतों में फसलें लहलहाती थीं।

प्राचीन भारत को सोने की चिड़िया का गौरव भी इन्हीं नदियों की बदौलत हासिल था लेकिन बदलते दौर में नदियों के मूल्यों और अस्मिता के साथ छेड़छाड़ हुई।

उनके निर्मल पवित्र जल में जहर घोल गया और उन्हें मृतप्राय सा बना कर छोड़ दिया गया। यही कारण है कि पूरी दुनिया में ऐसी नदियों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है।

इसका असर इन नदियों में रहने वाले जीवों की प्रजातियों पर भी पड़ा है। एक नए अध्ययन में कहा गया है कि दुनिया में केवल 17 फीसदी नदियां ऐसी बची हैं, जिनमें बह रहा पानी साफ व ताजा है।

ये नदियां भी इसलिए बची हैं, क्योंकि उन क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया जा चुका है। चिंताजनक बात है कि मछली, कछुए जैसी सैंकड़ों प्रजातियां जो साफ और ताजे पानी वाली नदियों में रहती हैं, उनकी संख्या में भी बेहद कमी दर्ज की गई है।

एक अध्ययन बताता है कि उसे 1970 के बाद से इन जीवों की आबादी में औसतन 84 फ़ीसदी की कमी आई है क्योंकि इन सालों के दौरान नदियों पर बांध बनाने, प्रदूषण, नदियों की धाराओं को मोड़ देने जैसी घटनाएं बढ़ी हैं।

आज देश में तकरीबन 223 नदियों का पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि उनके पानी में नहाने या पीने पर बीमारी का खतरा हो सकता है। देश की 62 फीसदी नदियां भयंकर रूप से प्रदूषित हो चुकी हैं।

इनमें गंगा और यमुना समेत इनकी सहायक नदियां भी शामिल हैं। निश्चित ही शहरीकरण और औद्योगीकरण ने नदियों के प्राण हरने का कार्य किया है। कृषि अपशिष्ट, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों ने नदियों के जल को सर्वाधिक क्षति पहुंचाई है।

औद्योगिक अपशिष्ट, भारी धातु, प्लास्टिक की थैलियां व ठोस अपशिष्ट जैसी वस्तुओं के कारण नदियों की अविरल धारा में रुकावट आई है। वहीं पशुओं के नहाने, मानव द्वारा मल-मूत्र त्यागने के कारण नदियों का जल प्रदूषित हुआ है।

आज देश में नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए तो कई योजनाएं और परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं पर नदियों को प्रदूषित करने वाले कारकों पर किसी तरह की रोक लगाने को लेकर प्रयास होते नहीं दिख रहे।

इसी वजह से जहां एक और नदियां साफ हो रही हैं तो दूसरी और डाला जा रहा कचरा उन्हें फिर से गंदी कर रहा है।
असल में देश में नदी संरक्षण का कार्य नदी प्रबंधन सिद्धांत के बिना ही चल रहा है।

क्या केवल कार्य योजनाओं के बूते देश की नदियों का जल स्वच्छ हो जाएगा? हमारे लिए नदी प्रबंधन का सिद्धांत यह होना चाहिए कि नदी को कोई खराब ही नहीं करे। यदि ऐसा होगा तो नदी को स्वच्छ करने के नाम पर करोड़ों का धन व्यय करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

नदियों में जैव विविधता लौटाने के लिए नदियों के पानी में जैव ऑक्सीजन की मांग घटानी होगी ताकि नदियों को साफ करने वाले जलीय जीव जिंदा रह सकें।

नदियों के पानी में औषधीय गुण फिर आएं इसके लिए किनारों पर औषधीय पेड़ रोपित किए जाएं। इसके अतिरिक्त खेतों और घरों में डिटर्जेंट आदि में इस्तेमाल हो रहे खतरनाक रसायन और कीटनाशक से नदियों को बचाना होगा।

मुक्त रूप से बहने वाली नदियां और अन्य प्राकृतिक रूप से काम करने वाले तेज ताजे पानी के पारिस्थितिक तंत्र, जैव विविधता और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला, पेयजल, अर्थव्यवस्था और दुनिया भर के अरबों लोगों की संस्कृतियों को बनाए रखते हैं इसलिए मूल्यों को बनाए रखने के लिए उनकी सुरक्षा महत्वपूर्ण है।

अस्तित्व के लिए जूझ रही नदियों को जीवित नदी का दर्जा देने से अधिक जरूरी है उन्हें जीवित रखना। यह काम केवल खानापूर्ति से नहीं होगा बल्कि इसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति व ईमानदारी से प्रयास करने की जरूरत है।

पंजाब केसरी से साभार…।

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ये हैं देश के देश के टॉप 10 मेडिकल कॉलेज, जिनमें पढ़ना है हर बच्चे का सपना

देश में हर साल करीब 13 से 15 लाख स्टूडेंट्स नीट (NEET) की परीक्षा देते हैं। नीट 2021 (NEET 2021) के लिए भी लाखों स्टूडेंट्स को एप्लीकेशन फॉर्म का इंतजार है।

परीक्षा 01 अगस्त 2021 को संभावित है लेकिन एनटीए (NTA) ने नीट एग्जाम 2021 के एप्लीकेशन को लेकर अभी कोई जानकारी नहीं दी है।

इस बीच हम आपको देश के उन टॉप 10 मेडिकल कॉलेजों के नाम बता रहे हैं, जहां एडमिशन पाना लगभग हर एमबीबीएस (MBBS) और एमडी/ – एमएस कैंडिडेट का सपना होता है।

आज इस पोस्ट में हम आपको देश के टॉप 10 मेडिकल कॉलेज के बारे में बताने जा रहे हैं यह लिस्ट एनआईआरएफ रैंकिंग 2020 पर आधारित है, जो भारत सरकार द्वारा जारी की जाती है, तो आइये जानते हैं :-

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, दिल्ली (AIIMS)

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस, नई दिल्ली (AIIMS Delhi) इस लिस्ट में पहले नंबर पर है। नीट में टॉप करने वाले स्टूडेंट्स की पहली पसंद भी एम्स नई दिल्ली ही रहता है। एनआईआरएफ रैंकिंग 2020 में भी इसे सबसे ज्यादा 90.69 स्कोर मिले थे।

पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ (PGIMER)

पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ (PGIMER Chandigarh) इस लिस्ट में दूसरे स्थान पर है। इसे 100 में से 80.06 स्कोर मिला था। यहां सिर्फ पीजी की सीट्स हैं।

क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर (CMC Vellore)

तमिलनाडु के वेल्लौर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज (CMC Vellore) देश के टॉप मेडिकल कॉलेजों की लिस्ट में तीसरे स्थान पर है। एनआईआरएफ रैंकिंग 2020 में इसे 73.56 स्कोर मिला था।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस, कर्नाटक

बंगलुरू का नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेस (NIMHANS) 71.35 स्कोर के साथ चौथे नंबर पर है। यहां सिर्फ पीजी कोर्स में एडमिशन होते हैं।

संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, (लखनऊ)

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थित संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस (SGPGIMS) 5 वें स्थान पर है। इसका NIRF स्कोर 70.21 है। यहाँ भी सिर्फ पीजी कोर्स में एडमिशन लिये जाते हैं।

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)

वाराणसी स्थित बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (BHU) का भी मेडिकल की पढ़ाई के मामले में अच्छा नाम है। NIRF Ranking में बीएचयू 64.72 स्कोर के साथ नंबर 6 पर रहा।

अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च (केरल)

अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस एंड रिसर्च (AIMSR) 7वें स्थान पर है। यह संस्थान केरल के कोच्चि शहर में है।

जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च

जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (JIPMER) ओवरऑल मेडिकल एजुकेशन के मामले में भले ही 8वें स्थान पर हो लेकिन एमबीबीएस स्टूडेंट्स के बीच जिपमर की अच्छी डिमांड है। पॉन्डिचेरी में स्थित इस संस्थान में एडमिशन के लिए स्टूडेंट्स कड़ी मेहनत करते हैं।

कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज (मणिपाल)

कर्नाटक के मणिपाल में है कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज यानी केएमसी (KMC) जो टॉप मेडिकल कॉलेजेज़ की लिस्ट में एनआईआरएफ रैंकिंग 2020 के अनुसार यह 9वें स्थान पर है इसका स्कोर 62.84 रहा था।

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (लखनऊ, उत्तर प्रदेश)

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) मेडिकल कॉलेज के क्षेत्र में एक बड़ा नाम है। लिस्ट में 62.20 स्कोर के साथ यह 10वें नंबर पर है। लेकिन कई एमबीबीएस स्टूडेंट्स के लिए यहां एडमिशन होना सपना साकार होने जैसा है।

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जानें क्यों है रहस्यमयी दिल के आकार का ये आइलैंड

इस दुनिया में कई ऐसे आइलैंड (द्वीप) हैं, जो रहस्यों से भरे हुए हैं। एक ऐसा ही आइलैंड स्कॉटलैंड में भी है, जिसे आइनहैलो द्वीप के नाम से जाना जाता है।

दिल के आकार का यह द्वीप है तो बेहद ही खूबसूरत है लेकिन सबसे हैरानी की बात ये है कि यहां साल में सिर्फ एक दिन ही लोगों को जाने की इजाजत मिलती है। बाकी के 364 दिन इस आइलैंड पर आना संभव ही नहीं है।

क्यों है ये आइलैंड रहस्यमयी

यह द्वीप इतना छोटा है कि इसे नक्शे में ढूंढ पाना भी बेहद ही मुश्किल है। इस द्वीप को लेकर कई रहस्यमयी कहानियां भी प्रचलित हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, आइनहैलो भूत-प्रेतों का द्वीप है।

किस्से-कहानियों के मुताबिक, इस आइलैंड पर बुरी आत्माओं का साया है। कोई भी व्यक्ति इस द्वीप की आने की अगर कोशिश करता है तो ये बुरी आत्माएं द्वीप को हवा में गायब कर देती हैं।

कहा तो यह भी जाता है कि इस द्वीप पर जलपरियां रहती हैं, जो गर्मी के मौसम में ही पानी से बाहर निकलती हैं।

इस मामले में प्रोफेसर डेन ली ने कहा कि, इस आइलैंड पर हजारों साल पहले भी लोग रहा करते थे, लेकिन वर्ष 1851 में यहां प्लेग की बीमारी फैल गई, जिसकी वजह से यहां रहने वाले लोग यह द्वीप छोड़कर चले गए।

अब यह द्वीप बिल्कुल वीरान पड़ा हुआ है। यहां कई पुरानी इमारतों के मलबे मिले हैं। पुरातत्वविदों के मुताबिक, खुदाई में यहां पाषाण काल की भी कई दीवारें मिली हैं। यह द्वीप कब बना, इसकी जानकारी किसी के पास भी नहीं है।

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