बसंत ऋतु के आते ही पिघलकर नदी बन जाता है यह खूबसूरत होटल, जानें क्यों?

इस दुनिया में कई ऐसी कलाकृतियां मौजूद हैं, जिन्हें देख कोई भी हैरान रह जाएगा। अब जैसे कि एक होटल को ले लीजिए। क्या आप जानते हैं कि दुनिया में एक ऐसा होटल भी है जो वसंत ऋतु में पिघलकर नदी बन जाता है?

यह है स्वीडन का आइस होटल। यह हर साल सर्दियों के मौसम में बर्फ से बनाया जाता है और वसंत ऋतु के आते ही पिघलकर नदी बन जाता है। इसकी उत्पत्ति टॉर्न नदी से होती है।

इस बार सर्दियों में स्वीडन के इस आइस होटल में 13 देशों के 14 आर्टिस्टों और डिजाइनर्स ने 15 नए कमरों का सेट बनाए। हालांकि साल 2016 से इसके कुछ हिस्सों को स्थायी रूप दे दिया गया और ऐसा सोलर पावर्ड कूलिंग टेक्नॉलजी के ज़रिए संभव हुआ।

यह जगह दुनियाभर के पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है। इस होटल को पहली बार 1992 में खोला गया था और इसमें स्नो और आइस का बना एक कॉम्प्लैक्स, रेस्ट्रॉन्ट, सेरेमनी हॉल जैसी कई चीजें हैं। यह होटल खूबसूरत और आकर्षक है। इस होटल को देखने हर साल लाखों टूरिस्ट आते हैं।

 

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ये हैं भारत के मशहूर प्राकृतिक अजूबे, जो हैं बेहद खूबसूरत!!

वैसे तो हम सब ने दुनिया के सात अजूबों के बारे में खूब पढ़ा और सुना है। लेकिन क्या आपने कभी प्राकृतिक अजूबों के बारे में सुना है। ये प्राकृतिक अजूबे भारत के अलग-अलग राज्यों में मौजूद हैं। जो अपनी नेचुरल सुंदरता से सभी का मन मोह लेते हैं।

आज इस पोस्ट में हम आपको भारत के प्राकृतिक अजूबों के बारे में बताने जा रहे हैं चलिए जानते हैं

लिविंग रुट ब्रिज

चेरापूंजी में स्थित इस रूट ब्रिज को डबल डेकर लिविंग रूट ब्रिज भी कहा जाता है। दरअसल, ये ब्रिज यानी पुल (Ficus Elastica) फिकस इलास्टिक पेड़ से बना होता है। ये ब्रिज देखने में काफी खूबसूरत है और साथ ही मजबूत भी है।

मजूली आईलैंड

यह दुनिया का सबसे बड़ा रिवर आइलैंड है। यह जगह वनस्पति और जीव-जंतुओं के लिए काफी मशहूर है और यहां कई विलुप्तप्रायः प्रजाति भी पाई जाती है।

यह विश्व का सबसे बड़ा रिवर आईलैंड है जोकि असम में ब्रह्मापुत्र नदीं किनारे स्थित है। मजूली को असम की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जा सकता है। मजूली असम की राजधानी गुवाहाटी से दो सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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मार्बल रॉक्स भेडाघाट

भेड़ाघाट जबलपुर शहर से लगभग 20 किमी दूर नर्मदा नदी के किनारे पर स्थित है। भेड़ाघाट को संगमरमरीय सौंदर्य और शानदार झरनों के लिए ही जाना जाता है। साथ ही धुआंधार जलप्रपात चमकती हुई मार्बल की 100 फीट ऊंची चट्टनों के लिए भी पर्यटकों के बीच काफी प्रसिद्ध है।

यह जगह तब और खूबसूरत लगती है जब इन संगमरमर की सफेद चट्टानों पर सूर्य की किरणें और पानी पर इनकी छाया पड़ती है तब काले और गहरे रंग की इन सफेद चट्टानों को देखना सुखद अनुभव होता है, इतना ही नहीं चांदनी रात में यह और भी ज्यादा जादुई प्रभाव पैदा करती हैं।

दूधसागर जलप्रपात गोवा

दूधसागर वॉटर फॉल्स जहां देश की 10 सबसे ऊंची वॉटर फॉल्स में से एक हैं, वहीं यह दुनिया की सबसे खूबसूरत फॉल्स में भी शामिल है। यह भारत के गोवा और कर्नाटक राज्य की सीमा पर पणजी से लगभग 60 कि.मी. की दूरी पर स्थित एक खूबसूरत झरना हैं।

दूधसागर जलप्रपात मोल्लेम नेशनल पार्क के अंदर स्थित हैं और इसके आसपास की भूमि हरे भरे जंगल से घिरी हुई है। दूधसागर जलप्रपात 310 मीटर (1017 फिट) की उंची पहाड़ी से नीचे गिरता हैं और जब इसका पानी ऊंचाई से चट्टानों से बहते हुए नीचे आता हैं तो बिल्कुल दूध की तरह सफेद दिखता हैं।

इतनी ऊंचाई से गिरता हुआ पानी ऐसा प्रतीत होता हैं जैसे पहाड़ से दूध की नदी प्रवाहित हो रही हो और इसलिए इस झरने का नाम दूधसागर पड़ा हैं, जो भारत के प्राकृतिक चमत्कार और अजूबो में से एक है।

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फ्लोटिंग द्वीप लोकटक झील

फ्लोटिंग लेक यानी लोकटक झील मणिपुर में स्थित है, जोकि अपनी सतह पर तैरते हुए वनस्पति और मिट्टी से बने द्वीपों के लिये प्रसिद्ध है। इन द्वीपों को ‘कुंदी’ कहा जाता है।

यह दुनिया की एकमात्र फ्लोटिंग लेक है और भारत के पूर्वोतर में एकमात्र सबसे बड़ा फ्रेशवॉटर लेक है। मोइरांग के पास स्थित लोकटक झील को मणिपुर का प्राकृतिक अजूबा भी कहते हैं।

केइबुल लामजाओ नेशनल पार्क इसी झील के अंदर स्थित है और ये दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ नेशनल पार्क है।

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मिजोरम – द ब्‍लू माउंटेन

इसे फाउनग्‍पुई के नाम से भी जाना जाता है। ब्‍लू माउंटेन समुद्रतट से 2157 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। ये लुशाई हिल्‍स की सबसे ऊंची चोटी है और यहां पर वनस्‍पति और जीवों की कई प्रजातियां देखने को मिलती हैं।

हालांकि, शाम के समय इस जगह का नीले रंग में तब्‍दील हो जाना ही इसे मिजोरम की सबसे खूबसूरत जगह बनाता है।

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वैली ऑफ फ्लावर्स

उत्तराखंड राज्य में चमोली जिले में स्थित वैली ऑफ फ्लावर्स भारत की सबसे आकर्षक जगहों में से एक है। पश्चिमी हिमालय में स्थित फूलों की घाटी एक प्राकृतिक और सुंदर राष्ट्रीय उद्यान के रूप में जानी जाती है।

फूलों की घाटी में अलग-अलग मौसम में भिन्न-भिन्न प्रकार के फूल इसकी सुंदरता को और अधिक खूबसूरत कर देते हैं, जिससे फूलों की घाटी की सुंदरता परिवर्तनशील प्रतीत होती हैं।

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रिवर्स वॉटरफॉल लोनवाला

रिवर्स वॉटरफॉल प्रकृति द्वारा निर्मित आश्चर्यजनक रचनायों में से एक है। रिवर्स वॉटरफॉल की अचंभित कर देने वाली बात यह है कि इस झरने का पानी नीचे की और गिरने की बजाए उपर की ओर आता है।

मॉनसून के दौरान जब झरना उफान पर होता है तब झरने का पानी फब्बारे के रूप उपर की और आता दिखाई देता है। जिसे भारत के प्राकृतिक चमत्कार और अजूबो का एक अहम हिस्सा है।

दरअसल माना जाता है की झरने का यह पानी उच्च दबाव वाली हवाओं के कारण ऊपर आता है।

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जाने उँगलियों को चटकाने से आवाज़ क्यों आती है?

आपने कई लोगों को अपनी उंगलियां चटकाते हुए देखा होगा और उँगलियों को चटकाने से आने वाली आवाज को भी सुना होगा। आखिर यह आवाज़ कैसे और कहां से आती है?

वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी उंगलियों के जोड़ों के आसपास एक लिक्विड या Fluid होता है, जिसे साइनोविल फ्लूड कहते हैं। इस Fluid में Air यानी हवा घुली होती है।

जब हम उंगलियों को जरूरत से ज्यादा बेंड कर देते हैं या मोड़ देते हैं तो ये हवा बुलबुलों के रूप में उस Fluid से बाहर निकलने लगती है और इन्हीं बुलबुलों के निकलने की वजह से चट-चट की आवाज होती है।

आपने यह भी ध्यान दिया होगा कि एक बार उंगलियों को चटकाने के बाद कुछ समय तक उसे मोड़ने पर आवाज नहीं आती है, ऐसा तब तक होता है जब तक कि फिर से हवा उस Fluid में घुल नहीं जाती।

ऐसा होने में कम से कम 10 से 15 मिनट का वक्त लगता है। एक तो कारण यह है। इसके अलावा एक दूसरा कारण है कि ऐसा Tissue की वजह से भी हो सकता है।

अंगड़ाई लेने पर हड्डियों (Bones) और मांसपेशियों (Muscles) के बीच पाए जाने वाले ऊतकों (Tissues) पर तनाव (Stress) पड़ने लगता है, जिससे ये अपनी जगह से हट जाते हैं और हमें चटकने की आवाज सुनाई देती है।

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जानिए सबसे पहले ‘साबुन’ कब बना

बिना साबुन के आप नहाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। आज साबुन स्वच्छ रहने के लिए एक अनिवार्य वस्तु बन चुका है। सवाल यह है कि इसकी खोज कब की गई?

ऐतिहासिक तौर पर साबुन को लकड़ी की राख को चर्बी के साथ मिलाकर इसे उबाल कर बनाया गया। शुरू में इसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाता था।

2800 और 600 बी.सी. तक बेबिलोनियन और फिनिशयंस ने साबुन बनाना शुरू किया। चर्बी को दो हिस्सों ग्लिसरीन और वसायुक्त एसिड में बांट कर ‘अलकली’ की प्रक्रिया की जाती है ताकि ‘अलकली’ में सोडियम और पोटाशियम को चर्बी या तेल के मिश्रण में मिलाया जा सके और फिर साबुन बनाया जा सके।

सदियों से साबुन को पोटाश और पर्ल लैश लाई के मिश्रण से बनाया गया था। दोनों ही पौधों में पाए जाने वाले पोटाशियम पर आधारित थे।

इसे बनाने का पहला प्रमाण पुरातन रोम में पाया गया वहां पर साबुन बनाने की फैक्टरी की खोज की गई। वहां के लोग नहाने और कपड़े धोने के लिए साबुन का इस्तेमाल करते थे।

आमतौर पर साबुन के निर्माण की जिम्मेदारी महिलाओं की थी। शुरू-शुरू में तरल साबुन का इस्तेमाल किया गया ताकि सख्त साबुन बनाया जा सके।

इसे बनाने की प्रक्रिया के अंत में नमक मिलाया जाता था। नमक की घरों और खेतों में सप्लाई की जाती थी।
इसी करण यह महंगा था। हालांकि कठोर साबुन को संरक्षित करके रखना और इधर से उधर ले जाना आसान था।

इसे अमरीका में बिक्री के लिए भेजा गया। आज वर्तमान में साबुन को कास्टिक सोडे से बनाया जाता है। 1971 में निकोलस लैबलेन ने नमक में से सोडा राख बनाने की खोज की।

पंजाब केसरी से साभार

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नींद की कमी से हो सकती है बड़ी समस्या, जानिए क्यों ?

नींद शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक तत्वों में से एक है। शोधकर्ताओं के अनुसार, जब नींद जरूरत से कम होती है, तो शारीरिक और मानसिक रूप से कई तरह की जटिलताएं पैदा हो जाती हैं। यह कोशिका के सामान्य कामकाज को भी बाधित करता है।

एक विशेष शारीरिक समस्या सर्दी-जुकाम होने की समस्या है। अमेरिकी शोधकर्ताओं की एक टीम का दावा है कि छह घंटे से कम सोने से सर्दी-जुकाम से जुड़ी कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं।

उनका दावा है कि रात में छह घंटे से कम सोने वाले ज्यादातर पुरुष और महिलाएं सर्दी से पीड़ित हैं और जो लोग पर्याप्त नींद लेते हैं, उन्हें सर्दी-जुकाम होने का खतरा बहुत कम होता है।

मानव नींद पर शोध के बाद इस विषय पर एक रिपोर्ट ‘स्लिप’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। शोध दल के प्रमुख एरिक प्रेथर ने कहा कि जो लोग रात में छह से सात घंटे की नींद लेते हैं,

उनमें से केवल 16 प्रतिशत को ही कोल्ड वायरस होने का खतरा होता है और जो लोग दिन में पांच घंटे या उससे कम सोते हैं – उनमें से 39 प्रतिशत सर्दी से पीड़ित हैं।

अध्ययनों से यह भी पता चला है कि पुरुषों और महिलाओं दोनों को रात में कम से कम छह घंटे की नींद की जरूरत होती है नहीं तो ठंड लगने की संभावना रहती है।

परिणाम संयुक्त राज्य अमेरिका में 184 पुरुषों और महिलाओं के लिए एक सप्ताह में नींद की कुल मात्रा को देखने के बाद आए।

अध्ययनों से पता चला है कि जो लोग रात में छह घंटे से कम सोते हैं, उन्हें सर्दी से पीड़ित होने की संभावना कम सोने वालों की तुलना में अधिक होती है।

एरिक प्रथर का कहना है कि जब नींद आवश्यकता से कम होती है, तो यह शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से विभिन्न जटिलताओं का कारण बनती है। यह कोशिका के सामान्य कामकाज को भी बाधित करता है।

सेंट लुइस यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर पीडियाट्रिक स्लीप एंड रिसर्च के निदेशक शालीन परुथी ने कहा कि नींद मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए आवश्यक है।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप के अनुसार, उन्होंने कहा कि अमेरिकी अपने जीवन के 25 साल सोते हैं लेकिन अब अमेरिकियों के लिए पर्याप्त नींद लेना बहुत मुश्किल हो गया है।

1975 के एक अध्ययन में पाया गया कि अमेरिकी रात में औसतन 7.50 घंटे सोते थे। फिलहाल यह घटकर 7.16 घंटे रह गई है। नतीजतन, देश के नागरिक सर्दी के साथ-साथ हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और मोटापे से पीड़ित हैं।

एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि जो लोग रोजाना नौ घंटे या उससे अधिक सोते थे, उनमें मृत्यु का जोखिम कम था। हालांकि, शोधकर्ताओं के बीच मतभेद हैं।

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इम्युनिटी स्ट्रांग करने के लिए करें इस फल का सेवन, नहीं होगा संक्रमण

कोरोना वायरस के संक्रमण काल में इम्युनिटी सिस्टम को मजबूत रखना काफी अहम है। इसके लिए आंवला लाभदायक साबित हो सकता है।

इसका सेवन दिन में एक बार किसी न किसी रूप में करना आवश्यक है। आंवला शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाने में काफी कारगर है।

आंवला कब्ज, क्षय, छाती के रोग, दाह, रक्तपित्त, अरुचि, त्रिदोष, ह्रदय रोग, मूत्र विकार, खांसी, स्वांस रोग अदि अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति रखता है।

यह संक्रमण से बचाव करता है। इसके अलावा आंवला शरीर में फंगस अदि बीमारियों से बचाव करने के साथ ही शरीर को पुष्ट और स्फूर्ति से भरपूर रखता है।

आंवला विटामिन-सी का सर्वोत्तम प्राकृतिक श्रोत है। इसमें मौजूद विटामिन-सी नष्ट नहीं होता। इसके अलावा आंवला में कैल्शियम, आयरन, फास्फोरस, फाइबर और कार्बोहाइड्रेट भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।

इसके सेवन से एनीमिया होने का खतरा भी कम हो जाता है और याददाश्त बढ़ती है। आंवला ब्लड प्यूरीफायर की तरह भी काम करता है, जो शरीर के टॉक्सिक को फ्लश करता है।

नियमित रूप से आंवले के जूस का सेवन करने से हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है और ब्लड सेल्स काउंट भी बढ़ता है। इन्ही खूबियों के चलते यह कोरोना संक्रमण से बचाव में अहम साबित हो सकता है।

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ये हैं भारत के अजीबो गरीब और फनी रेलवे स्टेशन, जिनके नाम सुनकर हंसी नहीं रोक पाएंगे

भारत की लाइफलाइन कही जाने वाली सैकड़ों ट्रेन रोजाना एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाती हैं। इस दौरान ट्रेन कई स्टेशनों से होकर गुजरती हैं। सभी जगहें अपनी संस्कृति और सभ्यता के लिए देशभर में प्रसिद्ध है।

इनमें कई रेलवे स्टेशन अपने फनी नाम के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। इन स्टेशनों का नाम सुनकर आप अपनी हंसी नहीं रोक पाएंगे। अगर आप ट्रेन के दौरान सफर करते हैं, तो इन स्टेशनों का दीदार जरूर करें।

आज इस पोस्ट में हम जानेंगे कुछ फनी रेलवे स्टेशनों के नाम तो चलिए जानते हैं :-

सिंगापुर रोड, ओडिशा

जी हाँ आपने सही सुना है। इस सिंगापुर की यात्रा के लिए आपको वीजा की आवश्यकता नहीं होगी। आप ट्रेन से सफर कर सिंगापुर पहुंच सकते हैं। इसके लिए आपको वीसा की जरूरत नहीं पड़ेगी।

चौंक गए न, दरअसल हम बात कर रहे हैं ओडिशा के सिंगापुर रोड रेलवे स्टेशन की। विभिन्न एक्सप्रेस ट्रेन इस स्टेशन से होकर गुजरती हैं और भारत के विभिन्न मार्गों पर चलती हैं।

भैंसा, तेलंगाना

इस स्टेशन से ज्यादा ट्रेनें नहीं गुजरती हैं। इस स्टेशन का नाम 50,000 की आबादी वाले तेलंगाना के निर्मल जिले में स्थित भैंसा शहर के नाम पर रखा गया है। इस रेलवे स्टेशन के नजदीक कई जंक्शन हैं।

दारू स्टेशन, झारखंड

जैसा कि हम सब जानते हैं कि दारू एक पेय पदार्थ है लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि किसी जगह या रेलवे स्टेशन का नाम दारू हो सकता है। दारू का नाम सुनते ही लोगों के मन में मदिरा का ख्याल आ जाता है।

हालांकि, दारू स्टेशन का शराब से कोई लेना देना नहीं है। केवल इस जगह का नाम दारू है। यह गांव झारखंड के हज़ारीबाग जिले में स्थित है।

पनौती रेलवे स्टेशन, उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के एक गांव के लोग चाहकर भी पनौती शब्द से छुटकारा नहीं पा सकते हैं l ऐसा इसलिए क्योंकि इस गांव का नाम ही ‘पनौती’ है ल

अक्सर देश में बैड लक को लोग पनौती कहते हैं लेकिन क्या आपने सुना है कि किसी रेलवे स्टेशन का नाम पनौती भी हो सकता है।

जी हाँ पनौती रेलवे स्टेशन उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में स्थित है। इस गांव की कुल आबादी 2197 है।

बीबीनगर, हैदराबाद

यह कोई बीवियों का नगर नहीं है। दरसअल यह हैदराबाद का छोटा सा शहर है। बीबीनगर रेलवे स्टेशन हैदराबाद के बेहद करीब है।

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MIT और हारवर्ड ने बनाया अनोखा फेस मास्क, बताएगा COVID-19 इन्फेक्शन है या नहीं

बोस्टन एमआईटी और हारवर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने एक नये फेस मास्क का डिजाइन तैयार किया गया है जिसे पहनने के डेढ़ घंटे के अंदर पता चल सकता है कि उसे पहनने वाले को SARS-SoV-2 या कोरोना वायरस का संक्रमण तो नहीं है। पत्रिका ‘नेचर बायोटेक्नोलॉजी’ में इस मास्क डिजाइन के बारे में बताया गया है।

इसके ऊपर छोटे-छोटे डिस्पोजेबल सेंसर लगे होते हैं जिन्हें दूसरे मास्क में भी लगाया जा सकता है और इनसे अन्य वायरसों के संक्रमण का भी पता चल सकता है।

अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, इन सेंसरों को न केवल फेस मास्क पर बल्कि प्रयोगशालाओं में स्वास्थ्य कर्मियों के इस्तेमाल में आने वाले कोट जैसे परिधान आदि पर भी लगाया जा सकता है। इस तरइ इनसे स्वास्थ्य कर्मियों को वायरस के संभावित खतरे पर नज़र रखी जा सकती है।

अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में प्रोफेसर जेम्स कॉलिन्स ने कहा, ‘हमने देखा कि वायरस या बैक्टीरियल न्यूक्लिक एसिड का पता लगाने के लिए कई तरह के सिंथेटिक जैविक सेंसर का उपयोग किया जा सकता है। इनसे कई ज़हरीले रसायनों का भी पता चल सकता है।’

मास्क बेहद जरूरी कोरोना की महामारी के खिलाफ सबसे पहला हथियार मास्क आज भी बेहद अहम हैं। एलएनजेपी के डायरेक्टर डॉ सुरेश कुमार का कहना है कि मास्क बहुत जरूरी है।

इससे छुटकारा तभी मिल सकता है, जब 80 परसेंट आबादी का वैक्सीनेशन हो जाए और हार्ड इम्युनिटी बन जाए। ऐसे हालात में इंफेक्शन फैलने का खतरा कम हो जाता है और वायरस में बदलाव की संभावना भी कम होती है।

जहां तक अपने देश की बात है तो केवल 5 परसेंट की आबादी को दोनों डोज लगी है, इसमें हम मास्क हटाने की बात तो सोच नहीं सकते। अभी जिस प्रकार वेरिएंट दिख रहा है, जो वैक्सीन के बाद भी हो रहा है, उसमें मास्क ही बचा सकता है।

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इतना बड़ा मकड़ी का जाल, ऑस्ट्रेलिया में कई किलोमीटर तक फैली बुनी हुई ‘सफेद चादर’

हम सभी ने पुराने घरों और बगीचों में मकड़ी के जाले देखे हैं। यह कोई आश्चर्य या नई बात नहीं है लेकिन मकड़ी के जाले इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में चर्चा का विषय बने हुए हैं।

दरअसल, ऑस्ट्रेलिया में विक्टोरिया राज्य के गिप्सलैंड कस्बे में आई बाढ़ के बाद एक चौंकाने वाला नज़ारा दिखा है। बाढ़ग्रस्त इलाके में मकड़ी के जाल की चादर फैली हुई है। यह जाल काफी बड़ा और ट्रांसपेरेंट है।

मकड़ियों का यह अद्भुत जाल पेड़ों, खेतों, सड़कों और झाड़ियों तक फैला हुआ है। जब हवा चलती है तो मकड़ियों का यह जाल सफेद चादर की तरह हिलता है। हालांकि विशेषज्ञ लोगों को इससे होने वाले किसी खतरे के बारे में नहीं बता रहे हैं।

बाढ़ से बचने के लिए ऊँचे स्थानों पर आती हैं मकड़ी

दरअसल गिप्सलैंड इलाके में हुई भारी बारिश से बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए हैं। बाढ़ के पानी से बचने और खुद को बचाने के लिए मकड़ियाँ ऊँची ज़मीन की ओर मुड़ गईं।

बाढ़ के बाद गिप्सलैंड कस्बे में बिजली व्यवस्था ध्वस्त है और कई इमारतें डैमेज हो चुकी हैं। जमीन पर पानी का स्तर बढ़ने के कारण यहां की मकड़ियां जाल बुनकर ऊंचाई तक पहुंचने की कोशिश में हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, मकड़ियां खुद को बचाने के लिए बड़े स्तर पर जाल बुन रही हैं। खुद को बचाने की इस तकनीक को वैज्ञानिक भाषा में ‘बैलूनिंग’ कहते हैं।

इसकी मदद से मकड़ियां ऊंचाई तक पहुंच जाती है। उनके द्वारा फेंका गया यह धागा आसपास की वनस्पतियों से चिपक जाता है।

इससे बचने के लिए मकड़ियां पास के पेड़ों और ऊंचे स्थानों पर जाने लगीं। खास बात यह है कि लाखों मकड़ियों के ऊंचे स्थानों पर जाने की यह घटना एक साथ घटी।

निचले स्थानों से ऊंचे स्थानों पर जाने की प्रक्रिया में, इन मकड़ियों ने अपने इस जाल को इतना फैला दिया कि यह जाल गिप्सलैंड के पूरे क्षेत्र में फैल गया। विक्टोरिया प्रांत में मकड़ी के जाले बनने की यह घटना आमतौर पर सर्दियों के दौरान होती है।

 

इंसानों को इन मकड़ियों से खतरा नहीं

एक्सपर्ट्स का कहना है, इन जाल को बनाने वाली मकड़ियों के काटने से इंसान को कोई बड़ा खतरा नहीं है। हां, मकड़ियों के काटने पर हल्की-फुल्की खुजली हो सकती है।

लोगों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। ये मकड़ियां आकार में इतनी छोटी हैं कि इंसान की स्किन को भेद पाना इनके लिए मुश्किल है।

ऐसे बनाएं “मिश्री वाली कैंडी”

“मिश्री वाली कैंडी” बनाने के लिए एक बर्तन में उबलता पानी भरें। उसमें शक्कर का संतृप्त (सैचुरेटेड) घोल बनाएं यानी तब तक शक्कर मिलाते जाओ जब कि वह घुलनी बंद होकर तले में बैठने न लग जाए। उसके बाद बर्तन के मुंह को गत्ते के टुकड़े से ढंक दें।

इस गत्ते के टुकड़े में चार-पांच धागे इस तरह बांधें कि वे शक्कर के घोल के अंदर लटकते रहें। अब बर्तन को दो-तीन दिन के लिए किसी छायादार स्थान पर रख दें।

उसके बाद आप देखोगे कि धागों पर शक्कर के अनेक ‘क्रिस्टल’ जम गए हैं। यही वह मिश्री है जिसे आप परचून की दुकान से खरीद कर लाते हो। अब अगर आप चाहो तो उन्हें खा सकते हो।

इससे ‘रॉक कैंडी’ भी बना सकते हैं

मिश्री से स्वादिष्ट कैंडी या टॉफी भी बनाई जा सकती है।

सामग्री

लकड़ी की चॉपस्टिक, 1 कप पानी, 2-3 कप चीनी, एक लंबा संकरा गिलास या जार।

संकरे गिलास या जार में ऊपर बताई विधि से तैयार चीनी के घोल को ठंडा होने दें। उसके बाद इस घोल में लकड़ी की चॉपस्टिक को पैंसिल या दूसरी सीख से बांध कर कांच के अंदर इस तरह लटकाएं कि वह तल से 1 इंच ऊपर रहे।

इसे ऐसी जगह रख दें जहां इसे कोई छेड़े न। अगले कुछ दिनों में सीख के साथ चीनी के क्रिस्टल चिपक जाएंगे और आपकी कैंडी तैयार हो जाएगी। यदि आप रंगीन ‘रॉक कैंडी’ बनाना चाहते हैं तो चीनी के पानी में फूड कलर मिलाएं।

कैसे होता है ऐसा?

जब पानी और चीनी मिलाते हैं तो एक बहुत गाढ़ा घोल बन जाता है। इसका मतलब है कि अगर दोनों बहुत गर्म हों तो पानी केवल चीनी को थामे रह सकता है।

पानी ठंडा होते ही घोल से चीनी बाहर आकर धागे या चॉपस्टिक पर चिपकने लगती है जो चीनी के क्रिस्टल्स को आकर्षित करने का काम करते हैं। थोड़े से धैर्य के साथ आपके पास चखने के लिए एक स्वादिष्ट ‘साइंटिफिक ट्रीट’ होगी।

पंजाब केसरी से साभार

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