ये हैं दुनिया के सबसे खतरनाक रास्ते, जिन्हें देखकर किसी की भी रूह कांप जाए

हमारी दुनिया बड़ी अनोखी है। यहां हर कदम पर रोमांच है। कहीं रेतीले मैदान हैं तो कहीं गहरे महसागर हैं कहीं पठार हैं तो कहीं पहाड़ हैं।

आज इस पोस्ट में हम बात करने जा रहे हैं कुछ ऐसे रास्तों के बारे में जो बेहद ही खतरनाक हैं जिनपर चलना हर किसी के बस की बात नहीं।

खासकर कमजोर दिल वाले तो इन रास्तों पर जा ही नहीं सकते। इन खतरनाक और डरावने रास्तों पर चलना तो दूर देखने मात्र से ही लोगों की रूह कांप जाती है। तो चलिए जानते हैं :-

हुशान क्लिफसाइड पाथ चीन

चीन का हुशान क्लिफसाइड पाथ हुशान यलो नदी के बेसिन के पास ऑरडॉस लूप सेक्शन के साउथवेस्ट में शानक्सी प्रांत के क्विनलिंग माउंटेंन्स के पूर्वी छोर पर स्थित है।

हुशान की उत्तरी चोटी पर 1614 मीटर की ऊंचाई पर दो पैदल रास्ते बनाये गए हैं इन्हें ‘हुआ शान यु’ के नाम से जाना जाता है।

हर साल यहां हज़ारों टूरिस्ट आते हैं। सरकार ने इस जगह पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतज़ाम किए हुए हैं, लेकिन लोगों की लापरवाहियों के चलते दुर्घटना हो ही जाती है।

युएयांग का नया रास्ता

ये रास्ता बनाया था चीन की स्पाइडर मैन की अमेजिंग आर्मी ने, वो भी अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर। यह रास्ता चीन के हुनान राज्य के युएयांग में मौजूद है। यह 300 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद है। इस रास्ते को देखकर भी सांसे अटक जाती हैं।

एल केमिनिट डेल रे

स्पेन का ‘एल केमिनटी डेल रे’ दुनिया के सबसे खतरनाक रास्तों में से एक माना जाता है। इसे ‘किंग्स पाथ-वे’ भी कहा जाता है । यह 110 साल पुराना है जिसका निर्माण सन 1905 में स्पेन के दक्षिणी क्षेत्र में किया गया था।

यह बहुत ही खतरनाक रास्ता है स्पेन के हाइड्रोलिक पावर प्लांट में काम करने वाले मजदूरों के लिए ये रास्ता बनाया गया था। लेकिन सन 2000 में दो लोगों की गिरने से मौत होने के बाद इस रास्ते को बंद कर दिया गया था।

द क्लिक ऑफ़ मदर, आयरलैंड

यह रास्ता अटलांटिक सागर से 700 मीटर की ऊँचाई पर बना हुआ है। यह डुलिन कस्बे के समीप स्थित है। यहाँ पर भी बहुत से लोग साहसी अभियान के लिए आते है। इस रास्ते पर चलना बेहद मुश्किल भरा है लेकिन फिर भी यहाँ लोग साईकिल चलाते है।

रोच वेयरांड, फ्रांस

फ्रांस के अल्पस के सेंट पियरे डि इंट्रीमॉन्ट में स्थित रोच वेयरांड पर जाना हर किसी के बस की बात नहीं है। यह अल्पस रीजन के सेंट पियरे डि इंट्रीमॉन्ट में स्थित है। यहां अच्छे से अच्छे मजबूत कलेजे वाले लोगों की भी रूह कांप जाती है।

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यह है दुनिया का सबसे जहरीला पौधा, जिसे छूने मात्र से हो जाती है इंसान की मृत्यु

यह बात तो हम सभी जानते हैं कि हमारे वातावरण के लिए पेड़ पौधे कितने जरूरी हैं। इतना ही नहीं हम अपने घरों के आसपास हरियाली लाने के लिए पेड़ पौधे लगाते हैं।

यूं तो पौधे कुदरत के साथ साथ हमें कई सारे फायदे देते हैं। लेकिन कुछ पेड़ पौधे ऐसे भी होते हैं जो बेहद खतरनाक होते हैं इन्हीं में से एक है जाइंट होगवीड, जो किलर ट्री के नाम से मशहूर है।

इस पौधे का वैज्ञानिक नाम हेरकिलम मेंटागेजिएनम है। यह पौधा इतना जहरीला होता है कि इसे छूने भर से हाथों में छाले पड़ जाते हैं।

देखने में यह पौधा इतना खूबसूरत है कि इसे देखकर हरकिसी का मन इसे छूने की लिए ललचा जाता है लेकिन महज 48 घंटे में इसका साइड इफेक्ट शरीर पर दिखने लगता है।

वैज्ञानिको का मानना है कि यह पौधा सांप से भी ज्यादा जहरीला होता है। अगर आपने कभी इस पेड़ को स्पर्श कर दिया तो कुछ ही घंटों में आपको महसूस होगा की आपकी पूरी त्वचा जलने लगी है।

आपको बता दें कि इस पौधे की लंबाई 14 फीट की होती है। इस पौधे को लेकर डॉक्टर का कहना है कि यदि कोई इस पौधे को स्पर्श कर ले तो उनकी आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है।

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मीराबाई चानू – घोर ग़रीबी और असफलता से ओलंपिक पदक का सफ़र

भारतीय महिला भारोत्तोलक “साईखोम मीरा बाई चानू” ने टोक्यो ओलंपिक की 49 किग्रा स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। मीरा बाई चानू ओलंपिक गेम्स के पहले दिन मेडल जीतने वाली पहली महिला बन गई हैं।

मीरा बाई चानू ने सिल्वर जीतकर भारत का भारोत्तोलन स्पर्धा में मेडल जीतने का 21 साल लंबा इंतजार खत्म किया है।

भारतीय वेटलिफ़्टर मीराबाई चानू टोक्यो ओलंपिक में भारत को पहला मेडल

26 साल की चानू ने क्लीन एवं जर्क में 115 किग्रा और स्नैच में 87 किग्रा से कुल 202 किग्रा वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया।

इससे पहले कर्णम मल्लेश्वरी ने सिडनी ओलंपिक 2000 में देश को भारोत्तोलन में कांस्य पदक दिलाया था।

चीन की होऊ झिऊई ने कुल 210 किग्रा (स्नैच में 94 किग्रा, क्लीन एवं जर्क में 116 किग्रा) से स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इंडोनेशिया की ऐसाह विंडी कांटिका ने कुल 194 किग्रा (84 किग्रा +110 किग्रा) का वजन उठाकर कांस्य पदक हासिल किया।

मीराबाई चानू का बचपन

साईखोम मीराबाई चानू का जन्म 8 अगस्त 1994 को मणिपुर के नोंगपेक काकचिंग गांव में हुआ था. शुरुआत में मीराबाई का सपना तीरंदाज बनने का था, लेकिन किन्हीं कारणों से उन्होंने वेटलिफ्टिंग को अपना करियर चुनना पड़ा.

बताते हैं कि मीराबाई बचपन में तीरंदाज यानी आर्चर बनना चाहती थीं. लेकिन कक्षा आठ तक आते-आते उनका लक्ष्य बदल गया. दरअसल कक्षा आठ की किताब में मशहूर वेटलिफ्टर कुंजरानी देवी का जिक्र था.

भारोत्तोलन की शुरुआत

मणिपुर से आने वालीं मीराबाई चानू का जीवन संघर्ष से भरा रहा है. मीराबाई का बचपन पहाड़ से जलावन की लकड़ियां बीनते बीता. वह बचपन से ही भारी वजन उठाने की आदि हैं.

जब वह सिर्फ 12 साल की थीं, वह आसानी से जलाऊ लकड़ी का एक बड़ा गट्ठर उठा कर घर ले जाती थी जब कि उनके बड़े भाई के लिए इसे उठाना भी मुश्किल हो जाता था।

घोर असफलता से ओलंपिक पदक का सफ़र

2016 रियो ओलंपिक में मीराबाई अपने वर्ग में सामान्य वजन भी नहीं उठा पायीं थी और अपने राउंड को ख़त्म भी नहीं कर पायीं थी, और प्वाइंटस टेबल में उनके नाम के आगे लिखा था – Did not finish। यह काफ़ी शर्मनाक और दिल तोड़ने वाला प्रदर्शन था।

जब भारत के खेल प्रेमियों ने यह ख़बर पढ़ीं तो मीराबाई रातों रात भारतीय प्रशंसकों की नज़र में विलेन बन गईं थीं. नौबत यहाँ तक आई कि 2016 के बाद वो डिप्रेशन में चली गईं और उन्हें हर हफ्ते मनोवैज्ञानिक के सेशन लेने पड़े.

इस असफलता के बाद एक बार तो मीरा ने खेल को अलविदा कहने का मन बना लिया था. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में ज़बरदस्त वापसी की.

मीराबाई चानू ने 2018 में ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रमंडल खेलों में 48 किलोवर्ग के भारोत्तोलन में गोल्ड मेडल जीता था और अब ओलंपिक मेडल.

बांस से की प्रैक्टिस

बिना ख़ास सुविधाओं वाला उनका गांव इंफ़ाल से कोई 200 किलोमीटर दूर था. उन दिनों मणिपुर की ही महिला वेटलिफ़्टर कुंजुरानी देवी स्टार थीं और एथेंस ओलंपिक में खेलने गई थीं.

2007 में जब प्रैक्टिस शुरु की तो पहले-पहल उनके पास लोहे का बार नहीं था तो वो बाँस से ही प्रैक्टिस किया करती थीं.

गाँव में ट्रेनिंग सेंटर नहीं था तो 50-60 किलोमीटर दूर ट्रेनिंग के लिए जाया करती थीं. डाइट में रोज़ाना दूध और चिकन चाहिए था, लेकिन एक आम परिवार की मीरा के लिए वो मुमकिन न था।

11 साल में वो अंडर-15 चैंपियन बन गई थीं और 17 साल में जूनियर चैंपियन. जिस कुंजुरानी को देखकर मीरा के मन में चैंपियन बनने का सपना जागा था, अपनी उसी आइडल के 12 साल पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को मीरा ने 2016 में तोड़ा- 192 किलोग्राम वज़न उठाकर.

मीराबाई चानू की 9 प्रमुख उपलब्धियां

  • 2020 टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक
  • ग्लासगो, 2014 राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक।
  • महिला वरिष्ठ राष्ट्रीय भारोत्तोलन चैम्पियनशिप, 2016 में स्वर्ण पदक।
  • विश्व भारोत्तोलन चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक, अनाहेम, यूएसए, 2017
  • 2018 के लिए राजीव गांधी खेल रत्न
  • 2018 में पद्म श्री से सम्मानित
  • महिला सीनियर नेशनल डब्ल्यूएल चैंपियनशिप, मैंगलोर, जनवरी 2018 में स्वर्ण पदक
  • राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक, गोल्ड कोस्ट ऑस्ट्रेलिया, 2018
  • अप्रैल 2021 में ताशकंद में आयोजित एशियाई चैंपियनशिप में 119 किलोग्राम भार उठाकर क्लीन एंड जर्क में विश्व रिकॉर्ड बनाया।

7 साल का सिक्स पैक एब्स वाला बच्चा जो मैस्सी की तरह फ़ुटबाल खेलता है!

ईरान में जन्मे और वर्तमान में ब्रिटेन के लिवरपूल में रहने वाले अरात होसैनी (आरत ) एक ऐसा अदभुत बालक यानि वंडरकिड है जैसा हमने शायद कभी तक नहीं देखा है। कुछ साल बाद अरत का नाम यदि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल खिलाड़ियों में शामिल होता है तो हमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

सिर्फ सात साल की उम्र में अरत होसैनी एक शानदार ड्रिबलर (फ़ुटबाल प्लेअर) है और इंटरनेट पर उसके असंख्य वीडियो हैं जिनमें वह डिफेंडरों के झुंड को शानदार ढंग से छका कर गोल करता दिखता है।

आरत इंस्टाग्राम स्टार है और इंस्टाग्राम पर उसके 57 लाख फ़ॉलोअर हैं।

ईरान के बाबोल शहर में जन्में आरत होसैनी अपने सिक्स पैक एब और सॉकर प्लेयर होने के कारण पहले ही सोशल मीडिया स्टार बन चुके थे और अब वह फुटबाल स्टार मेसी जैसा बनना चाहते है जिसकी झलक उनके फ़ुट्बॉल खेलते विडीओज़ में साफ़ नज़र आती है।

एक अन्य वीडीयो में वह कमाल के बैलेन्स के साथ ज़मीन पर पड़ी गेंद को माथे से छूता है और फिर उसी लय में वापिस अपनी पोजिशन पर वापिस आ जाता है। ऐसा लगता है कि यह वह स्लो-मोशन में कर रहा है लेकिन ऐसा नहीं है, जोकि उसके ट्रेनर पिता को देख कर समझ में आ जाता है ।

आइए जानते हैं कहानी छोटी सी उम्र में इतना नाम कमाने वाले लिटिल चैम्पियन की

आरत होसैनी की ट्रेनिंग

आरत के पिता मोहम्मद होसैनी ने आरत की ट्रेनिंग काफी कम उम्र में ही शुरू कर दी थी। आरत ने 9 महीने की उम्र से जिम्नास्टिक करना शुरू किया था l वे आरत  को प्रतिदिन  लगभग 20 मिनट तक प्रशिक्षण देते थे। आरत  के पिता अपने बेटे की तस्वीरें अपने इंस्टाग्राम पेज पर पोस्ट करते रहते थे।

आरत दो साल की उम्र पूरी होने तक अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बन चुका था। आरत को फ़ुटबाल खेलना काफी पसंद है।

सोशल मीडिया स्टार

आरत का जन्म इंग्लैंड के लिवरपूल में हुआ था और अब वह लिवरपूल एकेडमी में स्पोर्ट्स ट्रेनिंग ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर आरत की फैन फॉलोइंग काफी ज़्यादा है। इंस्टाग्राम पर इनके 4 मिलियन फॉलोअर हैं। इनकी लगभग हर एक पोस्ट पर मिलियन लाइक हैं।

इंस्टाग्राम पर डेब्यू

आरत के पिता मोहम्मद का कहना है कि ‘मेरे बेटे की प्रतिभा और अनोखे टैलेंट को देखने के बाद आसपास के लोगों ने सलाह दी कि इंस्टाग्राम पर उसका एक पेज बनाना चाहिए। आरत के इंस्टाग्राम पेज को न केवल ईरान में बल्कि विदेशों में भी पसंद किया गया।

लियोनेल मेसी का फैन

आरत दीवार पर चढ़ने की कला में भी माहिर है। आरत चाहते हैं कि बड़े होकर बार्सिलोना सॉकर क्लब के लिए खेलें। उनके पसंदीदा खिलाड़ी लियोनेल मेसी हैं। आरत मेसी की तरह ही खेलना चाहते हैं।

पिता को कई आरोपों का सामना करना पड़ा

आरत के पिता पर कई बार यह आरोप भी लगे कि वह अपने बेटे को बचपन से वंचित रख रहे हैं वह अपने बेटे से पैसे कमाने के लिए ऐसा करा रहे हैं। जिस पर उन्होंने कहा कि बेटा हमेशा से एथलेटिक्स एक्टिविटीज में एक्टिव रहा है। मैंने सिर्फ एक पिता के तौर पर उसकी उन चीजों में मदद की है जो वह करना चाहता है।

कॉमिक्स : हमारे बचपन के साथी, जाने कब और कैसे हुई इनकी शुरुआत

एक ऐसा वक्त भी था, जब दुनिया आज की तरह तकनीक के इशारों पर नहीं नाचती थी। तब बच्चों की सबसे प्यारी दोस्त कॉमिक्स हुआ करती थी। गर्मी की छुट्टी का मतलब ढेर सारी कॉमिक्स और मस्ती हुआ करती थी।

लेकिन वक्त बदलने के साथ बच्चों के दोस्त और पसंद भी बदलने लगी है। वह भले ही अब गुजरे जमाने की बात हो, लेकिन कॉमिक्स से लोगों का जुड़ाव कम नहीं हुआ है।

जब हम कॉमिक्स की बात करते हैं तो सबसे पहले याद आती है सुपरहीरोज पर बनी कॉमिक्स की, जो बच्चों को बेहद पसंद है आज इस पोस्ट में हम इन्हीं कॉमिक्स के बारे में बात करने जा रह हैं तो चलिए जानते हैं :-

मार्वल कॉमिक्स

पल्प मैगजीन के पब्लिशर मार्टिन गुडमैन ने सन् 1939 में एक कॉमिक्स कंपनी टाइमली पब्लिकेशन बनाई, जिसे बाद में मार्वल कॉमिक्स के नाम से जाना गया।

इसके बाद आधुनिक मार्वल कॉमिक बनाने का श्रेय फेमस राइटर स्टैन ली को जाता है, उन्होंने सन् 1961 में द फैंटास्टिक फोर के साथ मार्वल कॉमिक्स की शुरुआत की थी।

इसमें अवेंजर्स, एक्स-मैन, फैंटास्टिक फोर और गार्जियन्स ऑफ गैलेक्सी जैसे सुपरहीरोज की टीम भी शामिल है। साथ ही डॉक्टर डूम, ग्रीन गोब्लिन, मैगनेटो, गेलेक्ट्स, थानोस, अल्ट्रॉन, डॉक्टर ऑक्टोपस, लोकी, वेनॉम, एपॉकेलिप्स, किंगपिन और रेड स्कल जैसे खलनायक शामिल है। इसके सारे पात्र काल्पनिक हैं।

मार्वल में स्पाइडर-मैन, द एक्स मैन, आयरन मैन, द हल्क, थॉर, कैप्टन अमेरिका, वूल्वरिन (कॉमिक्स), ब्लैक पैंथर, ह्यूमन टॉर्च ,ऐंट-मैन, डॉक्टर स्ट्रेंज, वास्प, डेडपूल, हॉकआई, ब्लैक विडो, स्टार-लॉर्ड, डेयरडेविल, कैप्टन मार्वेल और पनिशर जैसे सुपर हीरो की कॉमिक्स शामिल हैं। ज्यादातर कैरेक्टर पर हॉलिवुड में मूवी भी बन चुकी हैं, लेकिन कॉमिक की अपनी एक जगह और फैन हैं।

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डीसी कॉमिक्स

यह डीसी एंटरटेनमेंट की प्रकाशन इकाई है, जो वार्नर ब्रदर्स की एक सहायक कंपनी है। यह अमेरिका की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी कॉमिक पुस्तक कंपनियों में से एक है, जिनमें बैटमैन, सुपरमैन, वंडर वूमन और साथ में कुछ खलनायक जैसे- लेक्स लुथर, जोकर, केटवोमेन आदि शामिल हैं।

सुपरमैन डीसी कॉमिक्स द्वारा प्रकाशित एक काल्पनिक सुपरहीरो या महानायक है। लेखक जेरी सीगल एवं आर्टिस्ट जॉय शस्टर ने इसकी रचना की थी।

वर्ष 1938 में 30 जून को सुपरमैन पहली बार कॉमिक्स के पन्नों पर नजर आया था। उसके बाद सुपरमैन दुनियाभर के बच्चों का पसंदीदा किरदार बन गया और इसे आज भी पसंद किया जाता है।

भारत में बनी कॉमिक्स

भारत में कॉमिक्स प्रकाशन की शुरुआत देखें तो शरू में विदेशों के कॉमिक्स पात्रों को हिन्दी में ट्रांसलेट करके पब्लिश किया था, जिसमें सर्वप्रथम नाम आता है ‘इंद्रजाल कॉमिक्स’ का, जिसने 1964 में ‘द फैंटम्स बेल्ट’ के नाम से महान कॉमिक्स लेखक और चित्रकार ली फॉक के फेमस कैरेक्टर फैन्टम की कॉमिक्स प्रकाशित की थी।

इसके बाद बात आती है हिंदी कॉमिक की, जिसमें बहादुर को पहला भारतीय कॉमिक हीरो माना जाता है। केसरिया कुर्ता और नीली डेनिम पहनने वाला बहादुर डाकुओं से लड़ता था।

इस किरदार के रचयिता हैं आबित सुरती जो मुंबई में रहते हैं। इसे इंद्रजाल कॉमिक्स द्वारा सबसे पहले 1976 में पब्लिश किया गया था।

साठ के दशक में अमर चित्र कथा प्रकाशन का जन्म हुआ, जिसमें पौराणिक कथाओं का जिक्र होता था। मशहूर कार्टूनिस्ट प्राण ने 1971 में चाचा चौधरी कार्टून की रचना की।

इसके अलावा उन्होंने श्रीमती जी, पिंक, बिल्लू और रमन जैसे किरदारों को जन्म दिया, जिसे बच्चों में आज भी पसंद किया जाता है। इसके बाद डायमंड कॉमिक्स, मधु मुस्कान, आदर्श चित्र कथा, गोवरसंस कॉमिक्स आदि हैं।

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कहानियों की ये किताबें आपके बच्चे की लाइफ़ बना देंगी!

कहानियाँ सुनना किसे अच्छी नहीं लगता? पिछले दशक तक हम अक्सर घरों में दादी-नानी द्वारा कहानियाँ सुने जाने के क़िस्से सुना करते थे। हालाँकि यह प्रचलन अब लगभग विलुप्त हो गया है।

आज के दौर में बच्चों का अधिकतर समय मोबाइल पर बीत रहा है जो उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए बिलकुल भी ठीक नहीं है। बच्चों में इस आदत को दूर करने का सबसे आसान तरीक़ा उनमें पढ़ने की आदत को विकसित करना है।

इसकी शुरुआत कहानियों की किताबों से की जाती है। बच्चों में सचित्र कहानियों के प्रति एक ख़ास लगाव होता है। इसलिए रंग-बिरंगी चित्रों से सजी कहानियों को पढ़ कर बच्चे पढ़ने के प्रति आकर्षित होते हैं।

इस लेख में हमने कुछ चुनिंदा संग्रह चुने हैं जिन्हें पढ़ कर बच्चों में सही-ग़लत की समझ, नैतिकता, परिश्रम और शिक्षा का महत्व, सच्चाई, ईमानदारी, अनुशासन, आज्ञाकारिता, चतुरता, साहस और अच्छा व्यक्तित्व आदि गुण विकसित हो सकते हैं।

तो आइए देखते हैं बेहद रोचक कहानियों के कुछ चुनिंदा संग्रह

पंचतंत्र की 101 कहानियाँ
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पंचतन्त्र की कहानियाँ बहुत जीवन्त हैं। इनमे लोकव्यवहार को बहुत सरल तरीके से समझाया गया है। बहुत से लोग इस पुस्तक को नेतृत्व क्षमता विकसित करने का एक सशक्त माध्यम मानते हैं। इस पुस्तक की महत्ता इसी से प्रतिपादित होती है कि इसका अनुवाद विश्व की लगभग हर भाषा में हो चुका है।
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अकबर बीरबल
अकबर और बीरबल की कहानियाँ हम बचपन से पढ़ते और सुनते आये हैं जिनसे बीरबल की बुद्धिमता और चतुराई का अंदाजा लगाया जा सकता है, ये कहानियाँ अत्यंत रोचक तो हैं साथ ही इनमें ज्ञान, प्रेरणा और सीखने योग्य भी बहुत कुछ है।  अभी ख़रीदें
 

 

 

 

 

 

 

 

 

Alif Laila (Hindi Edition) [Omprakash Sharma] तक अलिफ लैला की कहानियां

अलिफ लैला की कहानी अरब देश की एक प्रचलित लोक कथा है जो पूरी दुनिया में सदियों से सुनी व पढ़ी जाती रही है। यह एक ऐसी नवयुवती की कहानी है, जिसने एक ज़ालिम बादशाह से विवाह करने के बाद न केवल उसका हृदय परिवर्तित कर दिया, अपितु अनेक नवयुवतियों का जीवन भी बचा लिया। उस युवती की प्रत्येक रात अमावस्या की रात बनकर आती थी और प्रत्येक सवेरा उसे कुछ साँसों का अवकाश देकर चला जाता था, किन्तु उस ज़ालिम बादशाह के साथ विवाह करने के बाद उस युवती ने नवजीवन प्राप्त किया। अभी खरीदें 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

तेनाली रामा

तेनाली रामा जिन्हें तेनाली राम या तेनाली रमन के नाम से भी जाना जाता है एक भारतीय कवि, विद्वान, विचारक और श्री कृष्णदेवराय के दरबार में एक विशेष सलाहकार थे। उनके व्यक्तित्व व चतुराई से जुड़े किस्से हर किसी को प्रभावित व रोमांचित करते हैं।  अभी खरीदें 

 

 

 

 

 

 

 

 

मुल्ला नसरुद्दीन (Marathi Edition) [चारुलता पाटील, गिरीश सहस्रबुद्धे] तक मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन सूफी परंपरा में सबसे लोकप्रिय प्राचीन फारसी पात्रों में से एक है। उनकी चतुराई और बुद्धिमत्ता के किस्से बच्चों और बड़ों दोनों को समान रूप से पसंद आते हैं। यह पुस्तक विचारोत्तेजक और विनोदी कहानियों का एक सुंदर सचित्र संकलन है जो बच्चे की कल्पना को पकड़ती है और अंत तक उनकी रुचि को बनाए रखती है।

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विक्रम बेताल

बैताल पच्चीस कथाओं से युक्त एक कथा ग्रन्थ है। इसके रचयिता बेताल भट्टराव थे। जो न्याय के लिये प्रसिद्ध राजा विक्रम के नौ रत्नों में से एक थे। ये कथाएं राजा विक्रम की न्याय-शक्ति का बोध कराती हैं। बेताल प्रतिदिन एक कहानी सुनाता है और अन्त में राजा से ऐसा प्रश्न कर देता है कि राजा को उसका उत्तर देना ही पड़ता है। उसने शर्त लगा रखी थी कि अगर राजा बोलेगा तो वह उससे रूठकर फिर से पेड़ पर जा लटकेगा। लेकिन यह जानते हुए भी सवाल सामने आने पर राजा से चुप नहीं रहा जाता। अभी खरीदें 

 

 

 

 

 

 

 

 

शेखचिल्ली

शेखचिल्ली वो नाम है, जो अपनी कल्पनाओं और खयाली पुलाव के लिए प्रसिद्ध रहा है। अगर कुरुक्षेत्र महाभारत के लिए प्रसिद्ध है तो उससे कुछ ही दूरी पर स्थित थानेसर शेखचिल्ली के कारनामों के लिए प्रसिद्ध है। भारत में शेख चिल्ली को एक मजेदार कैरेक्टर के रूप में देख जाता है जो अक्सर ख्यालों में खो जाता है और हवाई-किलें बनाया करता है। पर जब उसे होश आता है तो वो खुद को लोगों के बीच पाता है और सबके लिए हंसी का पात्र बन जाता है। अभी खरीदें 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सिंहासन बत्तीसी 

सिंहासन बत्तीसी ३२ कथाओं का संग्रह है जिसमें ३२ पुतलियाँ विक्रमादित्य के विभिन्न गुणों का कथा के रूप में वर्णन करती हैं। इन कथाओं की भूमिका भी कथा ही है जो राजा भोज की कथा कहती है। ३२ कथाएँ ३२ कथाएँ ३२ पुतलियों के मुख से कही गई हैं जो एक सिंहासन में लगी हुई हैं। यह सिंहासन राजा भोज को विचित्र परिस्थिति में प्राप्त होता है। अभी खरीदें 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

परी कथाएं

परियों की कहानियां काल्पनिक होती है जिसमे विभिन्न लोककथनीय पात्रों का जैसे कि अप्सराएँ, पिशाच, राक्षस, जादूगर, दानव और, बात करने वाले पशु और पक्षिओं का समावेश होता है, साथ ही विभिन्न विस्मयकारी घटनाओं और आमतौर पर एक लम्बे काल का वर्णन होता है। परी एक मजेदार पात्र है जिसे बड़े हो या छोटे सब पसंद करते है जिस की कहानी सबको अच्छी लगती है । अभी खरीदें

 

 

 

 

 

 

 

 

 

महाभारत की कहानियां

वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत हिन्दू धर्म और वैदिक परम्परा का सार है। वर्तमान समय में महाभारत की कई ऐसी कहानियां भी हैं, जिससे शायद ही आप परिचित हों। सामान्य पाठकों को यह रुचिकर प्रतीत हो इसके लिए महाभारत की अलग-अलग कहानियों का संकलन इस पुस्तक में किया गया है। अभी खरीदें

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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OMG :11 साल की उम्र में ग्रजुएशन

छोटी उम्र के बच्चों को नई-नई चीजों में दिलचस्पी होती है और वे कुछ अलग करने की चाहत रखने लगते हैं। एक बच्चा ऐसा है जो 11 साल की उम्र में ‘अमरता’ जैसी गम्भीर चीज के बारे में सोचता है।

बैल्जियम के रहने वाले लॉरेंट सिमंस ने छोटी-सी उम्र में बहुत बड़ा सपना देखा है। उसने 11 साल की उम्र में ही फिजिक्स जैसे कठिन विषय में ग्रैजुएशन कर लिया है और दुनिया का सबसे कम उम्र का दूसरा ग्रैजुएट बन गया है।

इस बच्चे ने 3 साल का कोर्स भी 1 साल में ही पूरा कर लिया। वह बताता है कि उसने कभी इस बात की चिंता नहीं की है कि उसकी उम्र छोटी है बल्कि वह तो ज्यादा से ज्यादा ज्ञान लेना चाहता है। अब उसका ख्वाब है इंसान को अमरता देना।

इसके लिए वह दुनिया के बैस्ट प्रोफैसर्स के साथ मिल कर काम करना चाहता है और इंसानी दिमाग की स्टडी करना चाहता है। उसे यह जानना है कि इंसान का दिमाग काम कैसे करता है?

जहां तक बात इंसानों को अमर कर देने की है तो इस संबंध में उसका अपना ही एक तर्क है। वह आगे चलकर इंसान के शरीर के हिस्सों को मशीन में बदल देना चाहता है ताकि वे कभी खही न हों।

लॉरेंट के अनुसार उसके वांटम फिजिक्स में छोटे-छोटे पार्टिकल्स के बारे में पढ़ाई की है और अमरता को लेकर उसकी अपनी एक योजना है।

8 साल की उम्र में पास किया था हाई स्कूल

गौरतलब है कि उसने अपनी हाई स्कूल की शिक्षा केवल डेढ़ साल में पूरी कर ली थी और 8 साल की उम्र में हाई स्कूल डिप्लोमा हासिल कर लिया था।

पंजाब केसरी से साभार

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करंसी नोटों का इतिहास और रोचक तथ्य

रिजर्व बैंक को 10,000 रुपए तक का नोट छापने का अधिकार है। यदि यह इससे भी बड़ा नोट छापना चाहती है तो उसको सरकार से पूछना पड़ेगा और सरकार को इसके लिए कानून में संशोधन करने की आवश्यकता होगी।

भारत में नोटों की छपाई 1928 में इंडिया सिक्योरिटी प्रैस, नासिक (महाराष्ट्र) में शुरू हुई। उससे पहले भारत के
लिए नोट लंदन में ‘बैंक ऑफ इंगलैंड’ छापता था।

इसके लिए वर्ष 1861 में ‘कागजी मुद्रा अधिनियम’ बनाया गया था जिससे पहले भारत में कागज के नोटों का प्रचलन नहीं था। शुरूआत में नोट आज के नोटों जैसे नहीं थे। समय के साथ उनमें तरह-तरह के बदलाव होते रहे।

जब नोट नहीं थे

सबसे पहले एक चीज के बदले चीज का लेन-देन किया जाता था। उसके बाद सिक्कों का चलन शुरू हुआ। जब कारोबार फैलने लगे और नोटों का प्रचलन नहीं था तब साहूकार अपनी साख के अनुसार हुंडियां जारी करते थे।

ये वर्तमान के वचन पत्र, बैंक ड्राफ्ट आदि का पुराना रूप कही जा सकती हैं। उन दिनों जब कोई व्यक्ति कहीं बाहर जाता तो वह अपना धन साहूकार के पास रख जाता था।

साहूकार बदले में उसे ‘रुक्का’ लिख कर दे देता जिसके आधार पर वह व्यक्ति दुसरी जगह धन तथा अन्य जरूरी चीजें प्राप्त कर लेता था। आज यह काम बैंक करते हैं

ब्रिटिश काल के पहले नोट

सबसे पहले ब्रिटिश इंडिया नोट विक्टोरिया पोर्टेट सीरीज’ के थे। इन्हें 10, 20, 50, 100, 1000 के मूल्यवर्ग में जारी किए गए थे। इनमें एक ओर ही छपाई होती थी जबकि दूसरी ओर से ये कोरे होते थे।

ये ‘लेवरस्टॉक पेपर मिल्स’ में निर्मित हाथ से बने कागज पर मुद्रित किए जाते थे। सुरक्षा के लिए इनमें वॉटरमार्क के रूप में ‘भारत सरकार’ ‘रुपी’ ‘दोहस्ताक्षर’ और ‘लहराती रेखाएं होती थीं।

बड़े पैमान पर इन्हें जाली रूप से तैयार होने पर इनकी जगह पर 1867 में ‘अंडरप्रिंट सीरीज’ शुरू की गई जो 1923 में ‘किंग्स पोर्टेट सीरीज’ शुरू करने तक चलते रहे।

आधुनिक करंसी नोट

ये वास्तव में बैंक नोट होते हैं जो एक तरह का वचन पत्र हैं। इन्हें बैंक नोट इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये बैंक द्वारा छपवाए और जारी किए जाते हैं।

प्रायः सभी देशों में वहां के प्रमुख बैंक, केंद्रीय बैंक के रूप में काम करते हैं और अपने देश में बैंक नोट जारी करते हैं।

नोटों की सुरक्षा के लिए

वाटर मार्क : कागज पर वाटर मार्क का चलन वर्ष 1282 में इटली के एक कागज निर्माता ने शुरू किया था। शुरू में नोट इतने सादा होते थे कि उनकी नकल आसानी से की जा सकती थी लेकिन अब नकल करना बहुत कठिन है क्योंकि पहचान के लिए नोटों पर कई तरह के वाटर मार्क बने होते हैं।

सिक्योरिटी थ्रैड : नोट की नकल न हो इसके लिए नोट पर लम्बा निशान भी डाला जाता है जिसे ‘सिक्योरिटी थ्रैड ‘ कहते हैं।

नोट के लिए कागज : नोट छापने के लिए विशेष तरह का कागज इस्तेमाल किया जाता है। यह कागज 1967-68 तक इंगलैंड की एक कम्पनी से खरीदा जाता था।

1962 में होशंगाबाद में कागज मिल लगाने का निश्चय किया गया जिसने जून 1968-69 में नोट छापने का कागज बनाना शुरू कर दिया। अब भारत में 4 जगहों पर नोटों की छपाई होती है।

नोटों के लिए कागज बनाते समय उसमें रोल का उपयोग विशेष ढंग से किया जाता है जिसकी वजह से कागज ज्यादा टिकाऊ होता है और वह भीगने या मोड़ने पर जल्दी नहीं फटता।

भारत में कौन छापता है नोट

रिजर्व बैंक द्वारा विभिन्न मूल्यों के नोट छापे जाते हैं। हालांकि रिजर्व बैंक को 10,000 रुपए तक का नोट मुद्रित करने का अधिकार है।

यदि यह इससे भी बड़ा नोट छापना चाहता है तो उसे सरकार से पूछना पड़ेगा और सरकार को इसकी अनुमति देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम में संशोधन करने की आवश्यकता होगी।

रिजर्व बैंक हर साल इस बात का अनुमान लगाता है कि अर्थव्यवस्था में कितने नोटों की जरुरत होगी, इसी के आधार पर वह बैंक नोटों को छापने के लिए सरकार से अनुमति लेता है लेकिन सरकार भी अंतिम निर्णय लेने से पहले रिजर्व बैंक के वरिष्ठ स्टाफ से सलाह लेती है।

यानी भारत में नोट छापने का अंतिम निर्णय भारत सरकार के पास है। हालांकि, सरकार भी रिजर्व बैंक से सलाह लेती है।

पंजाब केसरी से साभार

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जानें ‘कठपुतलियों’ का खेल

कठपुतली कला उन बच्चों के लिए एक रोमांचक शौक हो सकता है जो नए कैरेक्टर बनाना और नाटक करना पसंद करते हैं। यह रंगमंच का एक प्राचीन रूप है जो आज भी चलन में है।

मनोरंजन प्रदान करने के अलावा, इस कला रूप का उपयोग संदेश देने के लिए भी किया जाता है। यह शौक कल्पना को चुनौती के साथ सही संदेश देने के लिए रंगों तथा विभिन्न चीजों का उपयोग करके नए डिजाइन और आकृतियां बनाने का अवसर देता है।

अपनी खुद की कठपुतली बनाएं

कुछ कठपुतलियों को ऊपर से डोरी द्वारा नचाया जाता है। ये डोरी आमतौर पर कठपुतली के सिर, हाथ या पैरों से जुड़ी होती हैं। इन्हें बनाने के लिए एक इस्तेमाल किया हुआ कैन या कॉफी कप लें। इसे उल्टा कर दें।

उस चरित्र के बारे में सोचें जिसे आप तैयार करना चाहते हैं। चेहरे को उसी के अनुसार रंग दें और बाल, आंखें, नाक और अन्य चीजों को जोड़ें। निचले आधे हिस्से के लिए एक कंटेनर लेकर उसके ढक्कन को हटा दें।

 

आपने जो चेहरा बनाया है, इस कंटेनर पर उसे फिट करें। अपनी मर्जी अनुसार कंटेनर को पेंट करें। आप अपनी कठपुतली को टी-शर्ट, जींस, साड़ी वगैरह पहना सकते हैं। अब दो छेद करके कठपुतली के सिर पर एक डोरी लगाएं।

फिंगर पपेट

यह कठपुतली का सबसे सरल रूप है जहां उंगली को ढंकने के लिए विभिन्न सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। इन्हें मुख्य रूप से बच्चों के लिए कहानी कहने में उपयोग किया जाता है।

इसके लिए एक पुरानी जुराब लें और उस चरित्र के बारे में सोचें जिसे आप बनाना चाहते हैं। अब जुराब को अपनी उंगली पर लपेटं।

आप बस इसे रंग कर सकते हैं और आंखें, नाक तथा अन्य विशेषताएं बना सकते हैं। आप सभी उंगलियों के लिए भी कठपुतली बना सकते हैं, प्रत्येक हाथ के लिए एक।

आप इन दोनों को अलग-अलग चेहरे के भाव भी दे सकते हैं। सुनाने के लिए उनके बीच एक कहानी विकसित करें और इसकी मदद से अपने दोस्तों के लिए एक छोटा-सा नाटक रचें।

पंजाब केसरी से साभार

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मानसून में इन्फेक्शन से बचना है, तो जरूर पीएं ये 4 देसी काढ़े!!

अब तक भारत के कई हिस्सों में मानसून पहुंच चुका है वहीं बारिश के मौसम के साथ कई गंभीर इंफेक्शन भी जरूर आते हैं। जिनके कारण सर्दी-खांसी, जुकाम, बुखार समेत कई बीमारियां हो सकती हैं।

आयुर्वे के अनुसार, आप 4 देसी काढ़ों की मदद से बरसात के मौसम में इंफेक्शन को दूर कर सकते हैं। बारिश का मौसम कई हानिकारक और बीमार करने वाले सूक्ष्मजीवों के लिए काफी उपयुक्त होता है।

इस दौरान इन हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि के विकास की गति काफी होती है और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोग काफी जल्दी बीमार पड़ जाते हैं इसलिए हमें मानसून के मौसम में एहतियातन बरतनी चाहिए और मानसून में ये 4 देसी काढ़े जरूर पीने चाहिए।

गुड़, जीरा और काली मिर्च का काढ़ा

इस काढ़े को बनाने के लिए आप 1/4 चौथाई चम्मच काली मिर्च और एक चम्मच जीरा को एक गिलास पानी में डालकर तब तक उबालें, जब तक कि पानी आधा ना रह जाएं। उसके बाद आप इस काढ़े में गुड़ को शामिल सकते हैं।

सफेद प्याज का काढ़ा

सफेद प्याज का काढ़ा पीकर भी मानसून में इंफेक्शन से बचाव कर सकते हैं। आप सफेद प्याज को अच्छी तरह साफ कर लें और 1 गिलास पानी में उबालें उसके बाद जब पानी आधा हो जाए उसके बाद सेवन करें। यह देसी काढ़ा खांसी, सर्दी-जुकाम आदि से राहत प्रदान करता है।

काली मिर्च, अजवाइन, तुलसी और अदरक का काढ़ा

इस काढ़े के लिए आपको सबसे पहले अदरक को साफ करके उसके छोटे-छोटे टुकड़े काट लें। इसके बाद एक गिलास पानी में अदरक के टुकड़े, एक चम्मच अजवाइन, 4-5 तुलसी के पत्ते और एक चुटकी काली मिर्च का पाउडर डालकर उबालें।

जब पानी उबलकर आधा हो जाए, तो इसका सेवन करें। यह बारिश के मौसम में होने वाली खांसी व सर्दी-जुकाम की समस्या से राहत प्रदान करता है।

सर्दी-खांसी के लिए काली मिर्च का काढ़ा

आप बारिश के मौसम में काली मिर्च का काढ़ा भी बना सकते हैं। यह बनाने में काफी आसान होता है और शरीर को फायदे देता है।

इसे बनाने के लिए एक गिलास पानी में 5 से 6 काली मिर्च और स्वादानुसार काला नमक डालकर उबालें। जब पानी आधा हो जाए, तो इसका सेवन करें।

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