MIT और हारवर्ड ने बनाया अनोखा फेस मास्क, बताएगा COVID-19 इन्फेक्शन है या नहीं

बोस्टन एमआईटी और हारवर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्ताओं ने एक नये फेस मास्क का डिजाइन तैयार किया गया है जिसे पहनने के डेढ़ घंटे के अंदर पता चल सकता है कि उसे पहनने वाले को SARS-SoV-2 या कोरोना वायरस का संक्रमण तो नहीं है। पत्रिका ‘नेचर बायोटेक्नोलॉजी’ में इस मास्क डिजाइन के बारे में बताया गया है।

इसके ऊपर छोटे-छोटे डिस्पोजेबल सेंसर लगे होते हैं जिन्हें दूसरे मास्क में भी लगाया जा सकता है और इनसे अन्य वायरसों के संक्रमण का भी पता चल सकता है।

अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार, इन सेंसरों को न केवल फेस मास्क पर बल्कि प्रयोगशालाओं में स्वास्थ्य कर्मियों के इस्तेमाल में आने वाले कोट जैसे परिधान आदि पर भी लगाया जा सकता है। इस तरइ इनसे स्वास्थ्य कर्मियों को वायरस के संभावित खतरे पर नज़र रखी जा सकती है।

अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में प्रोफेसर जेम्स कॉलिन्स ने कहा, ‘हमने देखा कि वायरस या बैक्टीरियल न्यूक्लिक एसिड का पता लगाने के लिए कई तरह के सिंथेटिक जैविक सेंसर का उपयोग किया जा सकता है। इनसे कई ज़हरीले रसायनों का भी पता चल सकता है।’

मास्क बेहद जरूरी कोरोना की महामारी के खिलाफ सबसे पहला हथियार मास्क आज भी बेहद अहम हैं। एलएनजेपी के डायरेक्टर डॉ सुरेश कुमार का कहना है कि मास्क बहुत जरूरी है।

इससे छुटकारा तभी मिल सकता है, जब 80 परसेंट आबादी का वैक्सीनेशन हो जाए और हार्ड इम्युनिटी बन जाए। ऐसे हालात में इंफेक्शन फैलने का खतरा कम हो जाता है और वायरस में बदलाव की संभावना भी कम होती है।

जहां तक अपने देश की बात है तो केवल 5 परसेंट की आबादी को दोनों डोज लगी है, इसमें हम मास्क हटाने की बात तो सोच नहीं सकते। अभी जिस प्रकार वेरिएंट दिख रहा है, जो वैक्सीन के बाद भी हो रहा है, उसमें मास्क ही बचा सकता है।

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इतना बड़ा मकड़ी का जाल, ऑस्ट्रेलिया में कई किलोमीटर तक फैली बुनी हुई ‘सफेद चादर’

हम सभी ने पुराने घरों और बगीचों में मकड़ी के जाले देखे हैं। यह कोई आश्चर्य या नई बात नहीं है लेकिन मकड़ी के जाले इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में चर्चा का विषय बने हुए हैं।

दरअसल, ऑस्ट्रेलिया में विक्टोरिया राज्य के गिप्सलैंड कस्बे में आई बाढ़ के बाद एक चौंकाने वाला नज़ारा दिखा है। बाढ़ग्रस्त इलाके में मकड़ी के जाल की चादर फैली हुई है। यह जाल काफी बड़ा और ट्रांसपेरेंट है।

मकड़ियों का यह अद्भुत जाल पेड़ों, खेतों, सड़कों और झाड़ियों तक फैला हुआ है। जब हवा चलती है तो मकड़ियों का यह जाल सफेद चादर की तरह हिलता है। हालांकि विशेषज्ञ लोगों को इससे होने वाले किसी खतरे के बारे में नहीं बता रहे हैं।

बाढ़ से बचने के लिए ऊँचे स्थानों पर आती हैं मकड़ी

दरअसल गिप्सलैंड इलाके में हुई भारी बारिश से बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए हैं। बाढ़ के पानी से बचने और खुद को बचाने के लिए मकड़ियाँ ऊँची ज़मीन की ओर मुड़ गईं।

बाढ़ के बाद गिप्सलैंड कस्बे में बिजली व्यवस्था ध्वस्त है और कई इमारतें डैमेज हो चुकी हैं। जमीन पर पानी का स्तर बढ़ने के कारण यहां की मकड़ियां जाल बुनकर ऊंचाई तक पहुंचने की कोशिश में हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, मकड़ियां खुद को बचाने के लिए बड़े स्तर पर जाल बुन रही हैं। खुद को बचाने की इस तकनीक को वैज्ञानिक भाषा में ‘बैलूनिंग’ कहते हैं।

इसकी मदद से मकड़ियां ऊंचाई तक पहुंच जाती है। उनके द्वारा फेंका गया यह धागा आसपास की वनस्पतियों से चिपक जाता है।

इससे बचने के लिए मकड़ियां पास के पेड़ों और ऊंचे स्थानों पर जाने लगीं। खास बात यह है कि लाखों मकड़ियों के ऊंचे स्थानों पर जाने की यह घटना एक साथ घटी।

निचले स्थानों से ऊंचे स्थानों पर जाने की प्रक्रिया में, इन मकड़ियों ने अपने इस जाल को इतना फैला दिया कि यह जाल गिप्सलैंड के पूरे क्षेत्र में फैल गया। विक्टोरिया प्रांत में मकड़ी के जाले बनने की यह घटना आमतौर पर सर्दियों के दौरान होती है।

 

इंसानों को इन मकड़ियों से खतरा नहीं

एक्सपर्ट्स का कहना है, इन जाल को बनाने वाली मकड़ियों के काटने से इंसान को कोई बड़ा खतरा नहीं है। हां, मकड़ियों के काटने पर हल्की-फुल्की खुजली हो सकती है।

लोगों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। ये मकड़ियां आकार में इतनी छोटी हैं कि इंसान की स्किन को भेद पाना इनके लिए मुश्किल है।

ऐसे बनाएं “मिश्री वाली कैंडी”

“मिश्री वाली कैंडी” बनाने के लिए एक बर्तन में उबलता पानी भरें। उसमें शक्कर का संतृप्त (सैचुरेटेड) घोल बनाएं यानी तब तक शक्कर मिलाते जाओ जब कि वह घुलनी बंद होकर तले में बैठने न लग जाए। उसके बाद बर्तन के मुंह को गत्ते के टुकड़े से ढंक दें।

इस गत्ते के टुकड़े में चार-पांच धागे इस तरह बांधें कि वे शक्कर के घोल के अंदर लटकते रहें। अब बर्तन को दो-तीन दिन के लिए किसी छायादार स्थान पर रख दें।

उसके बाद आप देखोगे कि धागों पर शक्कर के अनेक ‘क्रिस्टल’ जम गए हैं। यही वह मिश्री है जिसे आप परचून की दुकान से खरीद कर लाते हो। अब अगर आप चाहो तो उन्हें खा सकते हो।

इससे ‘रॉक कैंडी’ भी बना सकते हैं

मिश्री से स्वादिष्ट कैंडी या टॉफी भी बनाई जा सकती है।

सामग्री

लकड़ी की चॉपस्टिक, 1 कप पानी, 2-3 कप चीनी, एक लंबा संकरा गिलास या जार।

संकरे गिलास या जार में ऊपर बताई विधि से तैयार चीनी के घोल को ठंडा होने दें। उसके बाद इस घोल में लकड़ी की चॉपस्टिक को पैंसिल या दूसरी सीख से बांध कर कांच के अंदर इस तरह लटकाएं कि वह तल से 1 इंच ऊपर रहे।

इसे ऐसी जगह रख दें जहां इसे कोई छेड़े न। अगले कुछ दिनों में सीख के साथ चीनी के क्रिस्टल चिपक जाएंगे और आपकी कैंडी तैयार हो जाएगी। यदि आप रंगीन ‘रॉक कैंडी’ बनाना चाहते हैं तो चीनी के पानी में फूड कलर मिलाएं।

कैसे होता है ऐसा?

जब पानी और चीनी मिलाते हैं तो एक बहुत गाढ़ा घोल बन जाता है। इसका मतलब है कि अगर दोनों बहुत गर्म हों तो पानी केवल चीनी को थामे रह सकता है।

पानी ठंडा होते ही घोल से चीनी बाहर आकर धागे या चॉपस्टिक पर चिपकने लगती है जो चीनी के क्रिस्टल्स को आकर्षित करने का काम करते हैं। थोड़े से धैर्य के साथ आपके पास चखने के लिए एक स्वादिष्ट ‘साइंटिफिक ट्रीट’ होगी।

पंजाब केसरी से साभार

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जाने कहानी ‘बादलों’ की!!

बादलों में कभी घोड़ा तो कभी हाथी दिखते हैं लेकिन यह जानना वाकई दिलचस्प है कि अलग-अलग तरह के बादलों को कैसे पहचाना जाए, उनका नाम क्या है और प्रत्येक से किस तरह के मौसम की उम्मीद की जा सकती है।

आसमान में आपने तरह – तरह के बादल देखें होंगे लेकिन क्या आप जानते हैं। हरेक बादल का अपना नाम है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के ‘इंटरनैशनल क्लाऊड एटलस‘ के अनुसार आसमान में 100 से अधिक प्रकार के बादल मौजूद हैं। हालांकि, उनक सामान्य आकार और आकाश में ऊंचाई के आधार पर 10 खास प्रकार में बादलों को बांटा जा सकता है:-

  • निम्न-स्तर के बादल (क्यूमुलस, स्ट्राटस, स्ट्राटोक्यूमुलस) जो 6,500 फुट से नीचे होते हैं।
  • मध्य बादल (आल्टोक्यूमुलस, निम्बोस्ट्राटस, आल्टोस्ट्राटस) 6,500 और 20,000 फुट के बीच होते हैं।
  • उच्च बादल (सिरस, सिरोक्यूमु लस, सिरोस्ट्राटस) 20,000 फुट से अधिक ऊंचाई पर।
  • क्यूमुलोनिम्बसजोनिम्न, मध्य और ऊपरी तीनों ऊंचाई में जमा होते हैं।

क्यूमुलस

ये बादल आकाश में रूई की सफेद गेंदों की तरह नजर आते हैं। सूर्योदय के समय ये बहुत सुंदर दिखते हैं।

मौसम का अनुमान : अच्छे मौसम का संकेत।

स्ट्राटस

स्ट्राटस यानि फैले हुए बादल आकाश में एक फ्लैट, एकसमान भूरे रंग के बादल की परत के रूप में दिखते हैं।

मौसम का अनुमान : इन्हें शुष्क दिनों में देखा जाता है, हल्की धुंध या रिमझिम बारिश हो सकती है।

स्ट्राटोक्यूमुलस

जैसे किसी ने हाथ में एक चाकू लेकर आकाश में इन्हें छितराते हुए फैला दिया हो। ये नीले आकाश में दिखाई देने वाले भूरे या सफेद रंग के बादल होते हैं।

मौसम का अनुमान : आने वाले तूफान का संकेत हो सकते हैं।

आल्टोक्यूमुलस

वे भेड़ की ऊन की तरह दिखते हैं इसलिए उनका एक उपनाम ‘भेड़ की पीठ’ भी है। अपना हाथ आकाश की ओर बादल की दिशा में रखें। यदि बादल आपके अंगूठे के आकार का है तो यह आल्टोक्यूम्यलस है।

मौसम का अनुमान: वे गरज के साथ बारिश का संकेत दे सकते हैं।

निम्बोस्ट्राटस

ये गहरे भूरे रंग की परत में आकाश को ढंकते हैं और सूरज को छिपाने के लिए प्रयाप्त घने होते हैं।

मौसम का अनुमान : ये बारिश वाले बादल हैं। जब भी लगातार बारिश हो रही है या बर्फ गिर रही है।

आल्टोस्ट्राटस

ये एक चादर के रूप में दिखाई देते हैं जो आंशिक रूप से या पूरी तरह आकाश को ढंक लेते हैं।

मौसम का अनुमान: ये गर्म या ठंडे मौसम से पहले निकलते हैं।

सिरस

ये पतले, सफेद, बादल हैं जो आकाश में लकीर खींचते हैं। इनमें कम जल वाष्प मौजूद होते हैं, ऐसे में वे पानी की बूंदों के बजाय छोटे बर्फ के क्रिस्टल से बने होते हैं।

मौसम का अनुमान : ये आमतौर पर उचित मौसम में बनते हैं। वे तफानों तथा उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के आगे भी बन सकते हैं।

सिरोक्यूमुलस

इन्हें कपासी बादल भी कह सकते है जो छोटे होते हैं। बादलों के सफेद पैच अक्सर कतार में होते हैं। ये बर्फ के क्रिस्टल से बने होते हैं।

मौसम का अनुमान: आमतौर पर ये सर्दियों का संकेत देते हैं।

सिरोस्ट्राटस

ये पारदर्शी, सफेदीवाले बादल होते हैं जो पूरे आकाश को ढंकते हैं।

मौसम का अनुमान : ये ऊपरी वायुमंडल में नमी का संकेत देते हैं।

क्यूमुलोनिम्बस

ये हर ऊंचाई पर मिलते हैं जो बड़ी फूलगोभी की तरह दिखते हैं।

मौसम का अनुमान: ये गरजने वाले बादल हैं जो भारी वर्षा, ओलावृष्टि और तूफान आने की भी सम्भावना पेश करते हैं।

पंजाब केसरी से साभार

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‘स्टारगेजिंग’ – शौक तारों को निहारने का

ये है सबसे कम उम्र का ‘योग्य टीचर’

अगर किसी से पूछा जाए कि 11 साल की उम्र में कितने पैसे कमाते हो तो ज्यादातर लोगों का जवाब होगा कि इस समय तो हम लोग पॉकेटमनी पर ही अपने खर्चे चलाते हैं लेकिन चीन में एक ऐसा बच्चा है जो महीने के 10 लाख रुपए से ज्यादा कमा रहा है।

एक रिपोर्ट के अनुसार यह बच्चा लोगों को प्राचीन भारतीय योग की ट्रेनिंग देता है। सुन चीन के पूर्वी प्रांत झेजियांग का रहने वाला है। वह केवल चीन का नहीं बल्कि दुनिया का सबसे कम उम्र का सर्टिफाइड योग टीचर है।

सबसे कम उम्र का सर्टिफाइड योगा ट्रेनर

चीनी मीडिया के मुताबिक, सून दुनिया का सबसे कम उम्र वाला सर्टिफाइड योगा ट्रेनर है। चीन के पूर्वी प्रांत झेजियांग का रहने वाला सुन लोगों को प्राचीन भारतीय योग की ट्रेनिंग देता है। चीन के कई बड़े योग सेंटर उसे अपने संस्थान में ट्रेनिंग देने का ऑफर दे चुके हैं।

100 से अधिक लोगों को किया ट्रेंड

सून ने योग की शुरुआत 2 साल की उम्र से की थी। 6 साल की उम्र तक योग के कारण वह चीन में फेमस होने लगा । 7 साल की उम्र में सून चीन में एक योग सेलिब्रिटी के तौर पर पहचान बना चुका था। सून अब तक 100 से अधिक लोगों को योग में ट्रेंड कर चुका है।

योग से ऑटिज्म को दी मात

सुन की मां के अनुसार उनके बेटे ने महज 2 साल की उम्र में तब योग सीखना शुरू किया जब पता लगा कि वह हल्के तौर पर ऑटिज्म बीमारी का शिकार है। इसलिए 2 साल की उम्र में उसे योग सेंटर ले जाया गया।

वहां उसने योग सीखना शुरू किया। योग के कारण उसका टैलेंट लोगों के सामने आया और ऑटिज्म नाम की बीमारी पूरी तरह खत्म हो गई।

कई रिसर्च में यह दावा किया गया है कि योग से ऑटिज्म को खत्म किया जा सकता है। इससे जूझने वाले बच्चों को योग कराया जाए तो उनके शारीरिक और मानसिक विकास में सुधार दिखने लगता है।

इस बीमारी से बचाव के लिए उसकी मां उसे योग सैंटर ले गईं। केवल 1 साल के अंदर सुन ने बहुत अच्छा योग करना शुरू कर दिया। वह योग के नैचुरल टैलेंट के रूप में उभरा। 2 साल के बाद उसने ऑटिज्म की बीमारी से निजात भी पा ली।

सून की मां ने भी योग की ट्रेनिंग ली

चीनी मीडिया के मुताबिक, बेटे की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए सून की मां ने भी योग की ट्रेनिंग ली। उनका मानना है कि बेटे को ईश्वर की ओर से योग एक तोहफे के रूप में मिला है।

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जानिए गहरी सांस लेने के चमत्कारी फायदों के बारे में

रोज़ाना बस कुछ ही मिनटों के लिए गहरी सांस लेने से मन को शांत और शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। इसके अलावा भी कई फायदे हैं गहरी सांस लेने के सही तरीके से सांस लेना समग्र स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

इससे शरीर स्वस्थ रहता है। इसके लिए सुबह खुली हवा में बैठ जाएं और 10 से 15 मिनट गहरी सांसें लें।

रोज़ ऐसा करने से मस्तिष्क शांत रहेगा, तनाव दूर होगा और अच्छा महसूस करेंगे। इसके अलावा भी कई फायदे हैं आइये जानते हैं इस पोस्ट के माध्यम से…

प्राकृतिक दर्द निवारक

जब आप गहरी सांस लेते हैं तो शरीर में एंडॉर्फिन हार्मोन का स्राव होता है। एंडॉर्फिन अच्छा महसूस कराने वाला हार्मोन है और शरीर द्वारा बनाया गया एक प्राकृतिक पेन किलर है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार

गहरी सांस लेने से ताज़ी ऑक्सीज़न मिलती है और जब सांस छोड़ते हैं तो विषाक्त पदार्थ और कार्बन डाई ऑक्साइड शरीर से बाहर निकलते हैं।

जब खून का ऑक्सीकरण हो जाता है, तो यह शरीर के महत्वपूर्ण अंगों, प्रतिरक्षा प्रणाली को सुचारु रूप से कार्य करने में मदद करता है।

साफ़, टॉक्सिन -फ्री और स्वस्थ खून की आपूर्ति से संक्रमण से दूर रहने में मदद मिलती है यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत होती है।

शरीर की बनावट में सुधार

शरीर की ख़राब बनावट (पॉश्चर) से सांस सही ढंग से लेने में दिक़्क़त होती है। गहरी सांसें लेने की कोशिश करें और यह गौर करें कि आपका शरीर इस प्रक्रिया के दौरान कैसे सीधा होता है।

जब आप अपने फेफड़ों में हवा भर लेते हैं तो यह अपने आप रीढ़ को सीधा करने के लिए उकसाता है। इसके अलावा वज़न को नियंत्रित करने में असरदार है।

शरीर को रीटॉक्स करता है

गहरी सांस लेने से शरीर विष से मुक्त होता है लेकिन अगर छोटी सांस लेते हैं, तो शरीर के अंगों को यही काम करने में अधिक समय लगता है। गहरी सांस लेने से शरीर में ऑक्सीज़न का स्तर बढ़ता है। श्वसन प्रणाली बेहतर होती है।

तन और मन को आराम मिलता है

क्रोध, परेशानी, मांसपेशियां कड़क हो जाती हैं, वहीं लंबी सांस लेने से दिमाग और शरीर को आराम मिलता है।

ऐसे पा सकते है कोविड के बाद होने वाली परेशानियों से आराम

कोरोना एक ऐसी संक्रामक बीमारी है जिसके शिकार लोग हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद भी कई तरह की दिक्कतों से जूझते हैं। लगभग हरेक मरीज में कम या ज्यादा लेवल पर ये पोस्ट कोविड कॉम्प्लिकेशंस देखने को मिलते हैं।

आइए जानें कि क्या है कोविड-19 से रिकवरी के दौरान होने वाली मुश्किलें और इन्हें कैसे मैनेज किया जा सकता है

1. सांस लेने में परेशानी (ब्रेदलेसनेस)

कोविड के कारण हॉस्पिटल में भर्ती होने के बाद सांस लेने में दिक्कत होना मरीजों में आम समस्या है। इसके लिए ऐसे कई पोजिशंस हैं जो मरीजों की इस दिक्कत को कम करने में मदद कर सकते हैं।

हाई-साइड होकर लेटना

इसमें मरीज को सलाह दी जाती को थोड़ा ऊंचा उठाते हुए करवट लेकर लेटे, जिससे सिर और गर्दन को सपोर्ट मिलता रहे। मरीज के घुटने थोड़े-से मुड़े हुए हों।

सामने की तरफ झुककर बैठना

इसमें कुर्सी पर बैठकर मरीज को कमर के हिस्से से आगे की तरफ टेबल या मेज पर झुककर बैठना होता है, जबकि सिर और गर्दन मेज पर रखे तकिए से टिका देना होता है और दोनों हाथ भी मेज पर आराम से रख देने हैं। इस पोजिशन को अगर मरीज आरामदायक महसूस करे, तो बिना तकिए के सहारे भी ट्राई कर सकता है।

सामने की तरफ बिना टेबल के सहारे झुककर बैठना

इस पोजिशन में भी मरीज को कुर्सी पर बैठकर सामने की तरफ झुकना है, लेकिन सामने कोई टेबल नहीं होता, बल्कि दोनों हाथो को अपनी गोद या फिर कुर्सी के बाजुओं के सहारे आराम से टिका देना है।

खड़े रहकर ही सामने की तरफ झुकना

इस पोजिशन में व्यक्ति को खड़े रहते हुए ही सामने किसी खिड़की के प्लैटफॉर्म (विंडोसिल) या किसी दूसरी टिकाऊ सतह के सहारे सामने की तरफ झुककर रहना होता है।

पीठ के सहारे खड़े रहना

इस पोजिशन में व्यक्ति को किसी दीवार से सटकर या पीठ टिकाकर अपने हाथों को दोनों तरफ रखते हुए खड़े रहना होता है। इस स्थिति में उसके पैर दीवार से करीब एक फुट दूर हों और दोनों पैरों में हल्का सा गैप हो।

2.कमजोरी लगना (वीकनेस)

कोविड के बाद थकान या कमजोरी लगना भी बेहद कॉमन प्रॉब्लम है। कई तरह के एक्सरसाइज से धीरे-धीरे इससे निजात पाई जा सकती है। लेकिन, इसे सही लेवल पर करना बेहद जरूरी है। इसके लिए कोई भी मरीज वाक्य बोलने के टेस्ट के जरिए इसे जांच सकता है।

  • अगर आप एक पूरा वाक्य बिना रुके हुए बोल पाते हैं और इसके बावजूद आपको सांस लेने में परेशानी नहीं होती, तो इसका मतलब है कि आप ज्यादा कड़े एक्सरसाइज भी कर सकते हैं।
  • अगर आप खुद को बोलने में बिल्कुल असमर्थ पाते हैं या एक बार में केवल एकाध शब्द ही बोल पा रहे हैं और उसी से आपकी सांस बहुत ज्यादा फूलने लगती है तो इसका मतलब है कि आप जरूरत से ज्यादा कड़े एक्सरसाइज कर रहे हैं।
  • अगर आप एक पूरा वाक्य बोल पा रहे हैं और इस दौरान सांस लेने के लिए एक या दो बार हल्का-सा विराम लेते हैं और हल्के से लेकर गंभीर रूप से हांफने लगते हैं तो इसका मतलब है कि आप सही लेवल पर एक्सरसाइज कर रहे हैं।

3. आवाज के साथ जुड़ी दिक्कत

कोरोना में कई दफा वेंटिलेटर पर जाने वाले मरीजों को उनकी वॉयस के साथ जुड़ी दिक्कत भी पेश आती है। ऐसे में अहम है कि जब आप आरामदायक महसूस करें तभी बातचीत करें और अपनी आवाज पर जोर डालने की कोशिश ना करें। ज्यादा रेस्ट लें, पूरे दिन थोड़ा-थोड़ा कर पानी पीते रहें।

4.अटेंशन, एकाग्रता और स्पष्ट रूप से सोचने-समझने से जुड़ी दिक्कतें

अगर आप कोविड के बाद इस तरह की समस्याओं से जूझते हैं तो ये उपाय कारगर हो सकते हैं

  • फिजिकल एक्सरसाइज
  • ब्रेन एक्सरसाइज जैसे कि नई हॉबीज, पजल, वर्ड और नंबर गेम्स, मेमरी से जुड़ी एक्सरसाइज और रीडिंग वगैरह मददगार होंगे।
  • लिस्ट्स, नोट्स, फोन अलार्म आदि के जरिए खुद को रिमाइंड कराने की आदत डाल सकते हैं
  • एक्टिविटीज को तोड़कर या बांटकर करने की कोशिश करें ताकि ज्यादा बोझ ना पड़े।

5. तनाव, चिंता और डिप्रेशन को मैनेज करना

इन समस्याओं से छुटकारे के लिए अच्छी नींद लेने की पूरी कोशिश करें। फिजिकली एक्टिव रहें, सामाजिक रूप से मेलजोल बनाए रखें और रोजमर्रा के कामों में क्रमबद्ध रूप से अपनी भागीदारी बढ़ाते रहें।

कब करें डॉक्टर से संपर्क

  • अगर हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बावजूद सांस लेने में परेशानी लगातार बनी रहे।
  • अगर बेहद थोड़ी-सी एक्टिविटी करते ही दम फूलने लगे।
  • अगर आपके अटेंशन, याददाश्त, सोचने-समझने की ताकत और थकान व कमजोरी में कोई सुधार ना आए तो।

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भारत के 5 ऐसे मंदिर जहां पुरुषों को जाने की अनुमति नहीं है

भारत को मंदिरों की भूमि के रूप में जाना जाता है। आस्था के ये भव्य, सरल, पवित्र मंदिर देश के लगभग हर कोने में देखे जा सकते हैं।

लेकिन, क्या आप जानते हैं कि भारत में ऐसे मंदिर भी हैं, जहां की परंपराएं पुरुषों के प्रवेश पर रोक लगाती हैं, या कुछ दिन ऐसे होते हैं जब मंदिर परिसर में महिलाओं का वर्चस्व होता है, और जब केवल महिलाओं को ही पूजा करने के लिए परिसर में प्रवेश करने की अनुमति होती है?

आज इस पोस्ट में हम कुछ ऐसे ही खास मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं

अटुकल भगवती मंदिर, केरल

केरल के अट्टूकल भगवती मंदिर में सिर्फ महिलाओं को ही पूजा करने का अधिकार है। इस मंदिर में महिलाओं का वर्चस्व है। यहां हर साल पोंगल के खास मौके पर लाखों संख्या में महिला श्रद्धालु आती है।

पोंगल त्योहार के दौरान मनाए जाने वाला यह खास कार्यक्रम 10 दिनों तक चलता है। इसे नारी पूजा भी कहते हैं। इस दौरान पुरुषों के यहां प्रवेश करने पर पाबंदी होती है।

इस मंदिर का नाम गिनीज वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया है, यहां के पुरुष पंडित दिसंबर में महिलाओं के लिए 10 दिन का उपवास रखते हैं और पहले शुक्रवार को महिला श्रद्धालुओं के पैर धोते हैं। इस दिन को धनु कहा जाता है।

भगवान ब्रह्मा मंदिर, राजस्थान

यह बहुत ही दुर्लभ मंदिरों में से एक है जहां भगवान ब्रह्मा राज करते हैं। यह प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर विवाहित पुरुषों को देवता की पूजा करने के लिए गर्भगृह में प्रवेश करने से रोकता है।

यह पुरे देश में बना हुआ ब्रह्मा का अकेला मंदिर है। पुराणों के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने पुष्कर झील में पत्नी देवी सरस्वती के साथ एक यज्ञ किया था लेकिन सरस्वती किसी बात के लिए नाराज हो गईं।

तब उन्होंने मंदिर को शाप दिया कि “किसी विवाहित व्यक्ति को आंतरिक परकोटे में जाने की इजाजत नहीं है अन्यथा उसके वैवाहिक जीवन में एक समस्या उत्पन्न होगी.” यही कारण है कि कुंवारे पुरुष तो मंदिर में जा सकते हैं लेकिन विवाहित पुरुषों का प्रवेश वर्जित है।

बिहार में राजराजेश्वरी माता मंदिर

बिहार के मुजफ्फरपुर का माता का मंदिर आमतौर पर तो सभी श्रद्धालुओं के लिए खुला होता है, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि मंदिर में विराजमान देवी कुमारी कन्या हैं। वह जब महीने में 4 दिन राजस्वला (पीरियड) में होती है।

इस दौरान कोई भी पुरुष मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता और मंदिर के इस नियम का खास तौर पर बेहद सख्ती से पालन किया जाता है। बता दें इस दौरान मंदिर के पुजारी को भी गर्भग्रह में जाने की अनुमति नहीं होती।

कामाख्या मंदिर, असम

यह भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है, जहां पुरुषों को वर्ष के कुछ निश्चित समय के दौरान मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है।

असम के पश्चिम गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ियों में बसा यह मंदिर अपने अंबुबाची मेले के लिए प्रसिद्ध है। यह मेला हर साल आयोजित किया जाता है और दुनिया भर से बहुत सारे भक्त इस भव्य समारोह का हिस्सा बनने आते हैं। इस दौरान मंदिर का मुख्य द्वार चार दिनों तक बंद रहता है।

ऐसा माना जाता है कि उन दिनों देवी को मासिक धर्म होता है। इस अवसर पर, पुरुषों को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है और उन दिनों केवल महिला पुजारी या संन्यासियों को मंदिर की सेवा करने की अनुमति है।

कन्याकुमारी मंदिर, तमिलनाडु

तमिलनाडु की देवी कन्याकुमारी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर ब्रह्मचारी या सन्यासी को केवल मंदिर के द्वार तक प्रवेश करने की अनुमति देता है।

इस मंदिर के गर्भगृह में विवाहित पुरुषों का प्रवेश सख्त वर्जित है। यह मंदिर उस स्थान के लिए माना जाता है जहां माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या की थी।

कन्याकुमारी कन्या (कुंवारी) के इस मंदिर में केवल महिलाएं ही जाती हैं। माना जाता है कि विवाहित पुरुष देवी के इस स्वरूप के दर्शन कर लें तो उनके विवाहित जीवन में नकारात्मकता आ जाती है। इसी वजह से मंदिर के गर्भगृह में विवाहित पुरुषों का प्रवेश वर्जित है।

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जाने क्या है अंतर ‘कोवैक्सीन और कोविशील्ड’ में

दुनिया का सबसे बड़ा कोरोना टीकाकरण अभियान भारत में 16 जनवरी से शुरू हुआ था। भारत की दो प्रमुख वैक्सीन कोवैक्सीन और कोविशील्ड मार्केट में आ चुकी है और वैक्सीनेशन शुरू हो चुका है, दोनों ही वैक्सीन का दो डोज़ है।

कोवैक्सीन बनाने वाली भारत बायोटेक कंपनी हैदराबाद में स्थित है जबकि कोविशील्ड नाम की वैक्सीन बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट पुणे में स्थित है।

इन दोनों वैक्सीन पर इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए मंजूरी की मुहर लगाने वाले डीसीजीआई से लेकर देश के जाने माने डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने भी ने वैक्सीन को कारगर बताया है.

आज इस में हम जानेंगे कोवैक्सीन और कोविशील्ड के बारे में :-

क्या होती है वैक्सीन ?

वैक्सीन एक प्रकार का जैविक दवा है जो इम्यून सिस्टम को मजबूत करके हमारे शरीर को किसी भी खतरनाक रोगाणु संक्रमण से बचाने का काम करती है। वैक्सीन एकमात्र उपाय है जो बीमार होने के पहले, उसके कारण से हमें बचाता या तैयार करता है।

सरल भाषा में कहें तो वैक्सीन इस बात का भरोसा देता है की हमे संक्रमण नहीं होगा और अगर हुआ भी तो गंभीर नहीं होगा। जैसे की बच्चो को पोलियो की टीका लगता है, जो निश्चित करता है की उनमे पोलियो की बीमारी भविष्य में कभी न हो।

वैक्सीन हमारे प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम पर काम करता है क्योंकि इम्यून सिस्टम ही हमें किसी भी बीमारी या बाहरी रोगाणु से लड़ने में मदद करता है, यही वजह है कि हम छोटे- छोटे कितने संक्रमण से हर रोज़ बचे रहते हैं जिसका हमें पता भी नहीं चलता।

क्या है अंतर ‘कोवैक्सीन और कोविशील्ड’ में

कोवैक्सीन को भारत बायोटेक ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) के साथ मिलकर डेवलप किया है।

कोवैक्सीन इनएक्टिवेटेड वैक्सीन है, जो बीमारी पैदा करने वाले वायरस को निष्क्रिय करके बनाई गई है। कोवैक्सीन B.1.617 वेरिएंट यानी भारत के डबल म्यूटेंट वेरिएंट को बेअसर करने में कारगर है।

वहीं, कोविशील्ड चिम्पैंजी एडेनोवायरस वेक्टर पर आधारित वैक्सीन है। इसमें चिम्पैंजी को संक्रमित करने वाले वायरस को आनुवांशिक तौर पर संशोधित किया गया है ताकि ये इंसानों में ना फैल सके।

कोवैक्सीन और कोविशील्ड एक दूसरे से एकदम अलग हैं। ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका द्वारा डेवलप कोविशील्ड के इस वैक्सीन को कई और भी देशों में इस्तेमाल किया जा रहा है।

वैज्ञानिकों का दावा है कि ये वैक्सीन कोरोना के खिलाफ एंटीबॉडी जेनरेट करने का काम करती है। हालांकि इन दोनों ही वैक्सीन की खूबियां इन्हें एक दूसरे से अलग करती हैं।

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जाने ‘पेन’ का इतिहास और इसकी खोज के बारे में !!

आधुनिक युग में जहां हरेक व्यक्ति की जेब में टंगा पेन देख कर खुशी होती है वहीं इसका प्रयोग करते समय कभी-कभी हैरानी भी होती है कि कैसे एक छोटी-सी छड़ी वक्त के पृष्ठ पर निरंतर चलती आ रही है।

शुरूआत हुई मोर, बत्तख और हंस के पंखों की कलम से

पुराने समय में पेन नहीं होते थे तब मनुष्य मोर, बत्तख और हंस के पंखों की कलम बनाकर लिखता था। ये पंख इन पक्षियों की पूंछ से लिए जाते थे। फिर लकड़ी की कलम का प्रयोग शुरू हुआ।

कई इलाकों में जानवरों की बारीक हड्डियों को घिसाकर कलम का रूप प्रदान किया जाता था। अब इन पुरातन कलमों के बारे में सोच कर हैरानी होती है परंतु उस समय ये भी काफी सफल थे। पुरानी पांडुलिपियां इन्हीं कलमों से लिखी गई हैं जो आज भी देखने को मिलती हैं।

कहाँ आया ‘पेन’ शब्द

पेन शब्द लैटिन भाषा के ‘पेन सीलस’ शब्द से बना है जिसका अर्थ ‘पूंछ वाला’ होता है। पुरातन डंकों, कलमों तथा पंखों आदि में समय-समय पर सुधार होते गए। उनके रूप आकर्षक बनाए गए।

इन कलमों के अगले सिरे पर निबनुमा धातु की पत्तियां लगाई गई। सन् 1845 तक ऐसे ही पैन इस्तेमाल किए जाते रहे थे।
इनके प्रयोग करने में एक ही मुश्किल आती थी कि कागज पर हरेक शब्द लिखते समय स्याही की दवात में इन्हें डुबोना पड़ता था और ऐसा बार-बार करना पड़ता।

दूसरे इन्हें सफर में ले जाना आसान नहीं था। अगर स्याही खत्म हो जाती, सूख जाती या बिखर जाती तो लिखना असंभव हो जाता था। स्याही वाले पेन की खोज विज्ञान हर काल में विद्वान रहा है।

सन् 1846 ईस्वी में एक फ्रांसीसी ने ‘स्याही वाले पेन’ की खोज की। उसने जिस पेन का निर्माण किया जिसके अगले भाग पर निब फिट थी और पिछले हिस्से में स्याही भरी जा सकती थी।

यह स्याही पेन की निब में से होकर कागज पर लिखती थी। इसका नाम ‘फाऊंटेन पेन’ रखा गया। लगभग 40 साल खोजी इस पेन में तबदीली करते रहे। इसके सुख ने लोगों को राहत दी पर इसमें एक ही कमी रही कि इसमें भी बार-बार स्याही भरनी पड़ती थी।

फिर कई बार स्याही पेन में से रिस जाती, खुश्क हो जाती या उछल जाती थी इसलिए इसके प्रयोग के समय मुश्किलों का सामना करना पड़ता। कई बार तो कपड़े भी खराब हो जाते। इन मुश्किलों का हल करना समय की मांग थी और विज्ञान की प्राप्ति।

फाऊंटेन पेन में सुधार

सन् 1884 में लुईस वाटरमैन ने फाऊंटेन पेन में हैरानीजनक सुधार कर दिखाया। उसने फाऊंटेन पेन में एक ड्रॉपर फिट कर दिया जिसे दबा कर छोड़ने से पेन में आसानी से स्याही भर जाती थी।

इस सुधरे पेन में ड्रॉपर लगाने से इसकी मांग इतनी बढ़ गई कि सन् 1942 तक ये बाजारों में छाए रहे। ‘वाटरमैन’ ने इस दौरान निबों में परिवर्तन किए। पहले ये निब लोहे की होती थीं, वाटरमैन के बाद में रेडियम, स्टील आदि धातु की अन्य निबें तैयार की।

यूं तैयार हुआ बॉल पेन

फाऊंटन पेन हर लिहाज से सफल रहा पर उस समय हैरानी हुई जब हवाई जहाज के पायलटों ने शिकायतें की कि इन पेनों में से हवा के कम दबाव के कारण स्याही बाहर निकल आती है। इस समस्या का हल ‘लाजलो बीरो’ ने ढूंढ निकाला।

उसने 1938 में ऐसा पेन बनाया जो गाढ़ी स्याही से भरा रहता था और हवा के कम-ज्यादा दबाव के कारण स्याही बाहर नहीं आती थी। इस पेन में आम निब के स्थान पर ‘बॉल बेयरिंग का इस्तेमाल किया जाता था। इसे ही आज बॉल पेन के रूप में जानते हैं।

बॉल पेन के लिए बनी बढ़िया स्याही

हंगरी के ‘लोडी सलाऊ बैरू’ ने बॉल पेन के लिए ऐसी स्याही तैयार की जो सूखती नहीं थी। एक बार वह यूगोस्लाविया के होटल में बैठा कुछ लिख रहा था कि अर्जेंटीना के उच्च अधिकारी ‘हैनरी मार्टिन’ की नजर उसके पेन पर पड़ी।

उसे वह बहुत पसंद आया। उसने उसे अपने देश आने और रहने की पेशकश रखी। अर्जेंटीना में उसने बॉल पेन में और सुधार किए।

सन् 1942 में सुंदर लिखावट तथा इस्तेमाल में आसानी के कारण इसकी मांग इतनी बढ़ गई कि संसार की प्रसिद्ध कम्पनी ‘पारकर’ वालों ने ‘बैरू’ के साथ संपर्क किया तथा उसने अपने सारे अधिकार पारकर’ को बेच दिए।

फिर ये बॉल पेन घर-घर की शान होने लगे। इस प्रकार आज हम जिन पेनों का इस्तेमाल करते हैं उनकी खोज में अनेक लोगों का योगदान रहा है।

पंजाब केसरी से साभार