21वीं सदी की बनी इन खूबसूरत इमारतों को देखकर हमें एक अदभुत अहसास होता है. आप भी इन इमारतों को देखकर हैरान रह जायेंगे क्योंकि यह इमारतें 21वीं सदी की वास्तुकला का अदभुत नमूना है.
4 पत्ते वाले इस दुर्लभ पौधे की कीमत जानकर आप रह जायेंगे हैरान
पहले लोग पार्क या खाली जगह में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने के बारे में सोचते थे। लेकिन अब पता चला है कि इंडोर प्लांट का जबरदस्त क्रेज आज के समय में देखने को मिल रहा है।
इसके लिए लोग अपने घर में शुद्ध हवा की सजावट के लिए अच्छे इंडोर प्लांट्स लगाना पसंद करते हैं। हाल ही में ऐसा हुआ है कि एक कोई व्यक्ति अपने घर में इंडोर प्लांट का पौधा लेकर आया तो उसकी कीमत ने सभी के होश उड़ा दिए।

जानकारी के लिए बता दें कि न्यूजीलैंड के एक शख्स ने अपने घर में चार पत्ती वाला इंडोर प्लांट लगाया। जिसकी कीमत न्यूजीलैंड डॉलर में करीब 6 लाख रुपये है।
हालांकि अलग से लाखों में बिकने वाले इस पौधे का नाम रिफीडोफोरा टेट्रास्पर्मा है। इसे फिलोडेंड्रोन मिनिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह एक दुर्लभ प्रवृत्ति वाला पौधा है और खास बात यह है कि इस पौधे की पत्तियां अपने आप ही रंग बदलती रहती हैं।
जब इस पौधे की बोली लगी तो उस व्यक्ति ने 6 लाख रुपये की कीमत देकर प्लांट खरीदा। वैसे बताया जा रहा है कि शुरू में इस प्लांट की सबसे ज्यादा कीमत 4.77 लाख रुपये तय की गई थी लेकिन फिर इस शख्स ने 5.98 लाख रुपये देकर यह प्लांट अपने नाम कर लिया।
हालांकि इस खास प्लांट की डिमांड अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में सबसे ज्यादा है। यह यहां के लोगों के लिए एक बहुत ही भाग्यशाली पौधा माना जाता है इसलिए इसकी देखभाल एक बच्चे की तरह ही की जाती है।
15 सेंटीमीटर के गमले में लगाया गया यह पौधा आर्थिक समस्याओं को दूर करता है जिसके कारण लोग इसे अपने घर में रखना पसंद करते हैं।
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बरसात के मौसम में रखें इन खास बातों का ध्यान!!
बरसात के मौसम के दस्तक दे दी है। जिसके चलते अब जगह जगह पर लगातार बारिश हो रही है ऐसे में इस मौसम का मजा कौन नहीं लेता है। मगर इस मौसम का मजा लेने के साथ साथ हमें अपनी सेहत का ख्याल भी रखना होता है।
ऐसा कहा जाता है कि किसी भी अन्य मौसम के मुकाबले मानसून के दौरान वायरस, बैक्टीरिया, और अन्य संक्रमणों के संपर्क में आने का जोखिम दो गुना ज्यादा होता है, क्योंकि गर्म और आद्र जलवायु हानिकारक सूक्ष्मजीवों को पनपने की इजाजत देते हैं। सबसे आम मानसूनी बीमारियां मच्छर, पानी, हवा और दूषित भोजन की वजह से फैलती हैं।
मानसून के दौरान तापमान में अचानक हुआ उतार-चढ़ाव से सर्दी और फ्लू का खतरा बढ़ सकता है इसलिए आपको बरसात के मौसम में साफ-सफाई का खास ख्याल रखना चाहिए। तो आइए जानते हैं कि इस मानसूनी बीमारियों से आप खुद को कैसे बचा सकते हैं।
इस मौसम में भीड़ में जाने से बचें
इस मौसम में हवा से फैलने वाले वारयरस के संपर्क में आने से कई बीमारियां हो सकती हैं इसलिए भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें।
यहां ऐसे कई लोग हो सकते हैं, जो पहले से ही सर्दी या फ्लू से ग्रसित हों। खुद को संक्रमण से बचाने के लिए ऐसे लोगों से दूरी बनाना जरूरी है।
बार-बार मुंह को ना छूएं

मानसून में संक्रमित हाथों से अपने मुंह या नाक को छूने से बचने के लिए अपने हाथों को बार-बार धोएं। या तो साबुन से या फिर सादा पानी से हाथों को धोना चाहिए। आप चाहें, तो हैंड सैनेटाइजर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
घर को हवादार और बैक्टीरिया फ्री बनाएं

बरसात के दिनों में घर जितनी हवा आए, उतना अच्छा है। इसलिए घर की खिड़की और दरवाजे खुले रखें। जिस भी चीज़ को आप टच कर रहे हैं, उसकी सतहों को नियमित रूप से साफ कर बैक्टीरिया फ्री बनाएं।
दरवाजे की कुंडी, कीबोर्ड यहां तक की मोबाईल फोन को साफ करने के लिए भी अल्कोहलयुक्त कीटाणुनाशक का समय-समय पर इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि फ्लू के वायरस ऐसी सतहों पर पनपने की संभावना ज्यादा रहती है।
गर्म पानी पीएं

मानसून में पानी की स्वच्छता को लेकर खास सावधानी बरतनी चाहिए इसलिए कोशिश करें कि इस मौसम में गर्म पानी बार-बार पीएं। संभव हो, तो ऑफिस या स्कूल में अपना पीने का पानी साथ रखें।
ध्यान रखें किसी भी प्रकार के संक्रमण को रोकने के लिए बोतल बंद या फिल्टर किया हुआ पानी ही पीएं। अगर ये मुमकिन न हो, तो पानी को उबाल कर रख लें और इसे ठंडा करके पीएं।
छींकते समय मुंह को ढंकें

इस मौसम में वायरस और बैक्टीरिया से बचने के लिए जरूरी है कि दूसरों में वायरस को फैलने से रोका जाए। खासतौर से अगर आपको सर्दी या खांसी हैं, तो छींकते या खांसते समय अपनी नाक और मुंह को हाथ या फिर साफ रूमाल से ढंकना चाहिए।
बच्चों की देखभाल करें

के दिनों में सर्दी या जुकाम होना बहुत आम है इसलिए अपने बच्चों को बीमार लोगों के नजदीक न जाने देना संक्रमण से बचाव का बेहतर विकल्प है।
इम्यूनिटी मजबूत रखें
इम्यूनिटी को मजबूत बनाए रखने से आप वायरस की चपेट में आने से बच जाएंगे। इसके लिए बहेतर है कि आप विटामिन सी से भरपूर खट्टे फल खाएं और नींबू पानी पीते रहें।
अच्छी मात्रा में पानी पीने से भी इम्यूनिटी को स्ट्रांग बनाने में मदद मिलेगी। अपने शरीर को संक्रमण से लडने के लिए तैयार करने के लिए जितना हो सके आराम करें।
मच्छरों से बचें

इन दिनों होने वाली बीमारियों का मुख्य कारण मच्छर होते हैं। इसलिए बरसात शुरू होते ही आपकी पहली कोशिश मच्छरों से बचना होनी चाहिए।
इसके लिए आप सोते वक्त मच्छरदानी और मॉस्किटो कॉइल का इस्तेमाल करें। इसके अलावा अपने घर में और घर के आसपास मच्छरों को जमा न होने दें।
बरसात के मौसम में बीमार पड़ने का खतरा बहुत ज़्यादा होता है। इसलिए खुद के साथ बच्चों और बुजुर्गों की भी खास देखभाल करें।
यदि बीमारी के लक्षण गंभीर दिखाई दें, तो इसके ठीक होने का इंतजार न करें, तुरंत डॉक्टर के पास जाएं। खांसी -जुकाम से दूर रहकर परहेज करें और सुरक्षित रहें।
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जानिए किस्से महान खिलाड़ियों के!!
रोमन सम्राट थियोडोसियस द्वारा 15 साल पहले प्रतिबंध किए जाने के बाद प्राचीन ओलंपिक खेलों की परंपरा को पहले आधुनिक ओलंपिक खेलों के रूप में यूनान की राजधानी एथेंस में 1896 मैं दोबारा शुरू किया गया था इनके लगभग 125 वर्ष के इतिहास में कुछ सबसे सफल खिलाड़ियों के बारे में आपको बता रहे हैं।
खेलों की दुनिया में ओलंपिक सबसे बड़ी प्रतियोगिता है हर खिलाड़ी इस में भाग लेने और मेडल जीतने का सपना देखता है जो उन्हें सर्वश्रेष्ठ साबित करने के बाद ही दुनियाभर में सम्मान भी दिलाता है।
आज इस पोस्ट में हम आपको सबसे अधिक ओलंपिक मेडल जीतने वाले महान खिलाड़ियों के बारे में बताने जा रहे हैं।
माइकल फेल्प्स, तैराक (अमेरिका)

जब माइकल फेल्प्स छोटे थे तो पानी के अंदर अपना चेहरा डालने से डरते थे परंतु इस डर पर जीत हासिल करते हुए कम उम्र में ही अपनी मेहनत से तैराकी के चैंपियन बन गए।
‘बाल्टिमोर बुलेट’ या ‘फ्लाइंग फिश’ के नाम से मशहूर माइकल का ओलंपिक में दबदबा रहा। उन्होंने सिडनी 2000, एंथैंस 2004, बीजिंग 2008, लंदन 2012 और रियो 2016 ओलंपिक में भाग लिया और कुल मिलाकर 28 मैडल जीते जिनमें 23 स्वर्ण पदक, 3 रजत पदक और 2 कांस्य पदक हैं।
विजेता बनने के बाद भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ। ओलंपिक के बाद वह गंभीर डिप्रेशन में गए थे। इसकी वजह से वह आगे खेलना नहीं चाहते थे और उनकी जीने की इच्छा भी खत्म हो गई थी परंतु उन्होंने इच्छाशक्ति मजबूत करके खुद को संभाला और आज उनकी उपलब्धियां इतनी बड़ी है कि इनकी बराबरी करना किसी के लिए भी बहुत कठिन है।
लारिसा लैतिनीन,जिमनास्ट(रुस)

सोवियत यूनियन की यह जिम्नास्ट दुनिया की सबसे सफल महिला खिलाड़ी थीं। उनके नाम सबसे ज्यादा ओलंपिक मैडल जीतने वाली महिला खिलाड़ी का भी कीर्तिमान है।
उन्होंने मेलबोर्न 1956,रोम 1960 और टोक्यो 1964 ओलंपिक में हिस्सा लिया और नौ स्वर्ण पदक जीते। साथ ही 5 रजत और 4 कांस्य पदक भी उन्होंने अपने नाम किए।
पावो नुरमी,एथलीट (फिनलैंड)

‘फ्लाइंग फिन’ या ‘फैंटम फिन’ के नाम से विख्यात पावो नुरमी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ट्रैक एंड फील्ड खिलाड़ियों में से एक रहे हैं।
गरीबी की वजह से उन्हें 12 साल की उम्र में स्कूल छोड़ कर काम करना पड़ा। अपने देश के खिलाड़ी हंस से प्रेरित होकर उन्होंने खूब मेहनत की और कामयाबी पाई।
1500 मीटर से 20 किलोमीटर दौड़ में उन्होंने 22 रिकॉर्ड बनाए थे। उन्होंने अपने देश का 3 ओलंपिक एंटपर्व 1920, पैरिस 1924 और एम्सटर्डम 1928 में प्रतिनिधित्व किया और 9 स्वर्ण पदक जीते।
मार्क स्पिट्ज,तैराक(अमरीका)

अपने प्रशंसकों और दोस्तों के बीच ‘मार्क द शार्क’ नाम से प्रसिद्ध यह अमरीकी तैराक अपने जमाने का माइकल फेलप्स था। तैराकी में 1968 से लेकर 1972 ओलंपिक तक उनका दबदबा रहा।
उन्होंने मैक्सिको सिटी 1968 और म्युनिख 1972 ओलंपिक्स में 9 स्वर्ण पदक जीते। इनके अलावा इन खेलों में उन्होंने दो रजत पदक भी अपने नाम किए।
कार्ल लुइस, एथलीट (अमरीका)

कार्ल लुइस अमरीकी ‘ट्रैक एंड फील्ड’ के बादशाह थे जिन्होंने कोई 10 ओलंपिक मैडल जीते । इनमें नौ स्वर्ण पदक शामिल थे। इनके अलावा उन्होंने आठ विश्व चैंपियनशिप स्वर्ण पदक भी जीते।
लॉस एंजेल्स 1992, सिओल 1988, बार्सिलोना 1992 और एटलांटा 1996 ओलंपिक में भाग लिया और दौड़ से लेकर लंबी कूद जैसे खेलों में शानदार प्रदर्शन किया।
उसेन बोल्ट,धावक (जमैका)

जमैका के फर्राटा धावक उसने बोर्ड 21 वीं सदी के महान एथलीट हैं। 100 मीटर और 200 मीटर के इस विश्व रिकॉर्ड धारी ने 8 बार ओलंपिक में गोल्ड मैडल जीते हैं।
2017 में उन्होंने लंदन वर्ल्ड चैंपियनशिप के बाद संन्यास ले लिया था लेकिन जब तक वह खेले, ओलंपिक के 200 मीटर और 100 मीटर की दौड़ में उन्हें कोई पीछे नहीं छोड़ सका। वह ओलंपिक स्पर्धाओं में हमेशा पहले नंबर पर रहे।
पंजाब केसरी से साभार…..।
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वायरल वीडियो :- कपिल शर्मा और भारती का ‘Baspan Ka Pyar’ गाना सुन बेहाल हुई फैन
इन दिनों सोशल मीडिया पर ‘बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे’ गाने की धूम मची है। इस गाने पर अब तक कई सिलेब्रिटीज मजेदार वीडियो बनाकर शेयर कर चुके हैं।
इसी गाने पर हाल ही में कपिल शर्मा और भारती सिंह ने एक मजेदार वीडियो बनाया है जो सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। उनके ‘बसपन का प्यार’ गाने को सुनकर एक फैन का तो ऐसा हाल हो गया कि उसने मुंह ही छिपा लिया।
भारती सिंह और कपिल शर्मा का यह वीडियो खूब वायरल हो रहा है। दरअसल भारती सिंह और कपिल शर्मा रविवार को राइड पर निकले थे और इस दौरान उन्होंने कई वीडियो बनाए।
उन्हीं में से एक वीडियो उन्होंने ‘बसपन का प्यार’ पर बनाया जो खूब वायरल हुआ है।
कपिल और भारती का गाना सुनकर जैसे ही वहां मौजूद फीमेल फैन मुंह छिपाकर भागने लगी। इस पर भारती और कपिल उससे कहते हैं, ‘यह है जानेमन, कहां भाग रही हो ? रुको.. रुको फोटो तो खिचाओ।’
इस वीडियो को कपिल शर्मा ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर भी शेयर किया है और साथ में लिखा है, ‘फैन्स के साथ मस्ती’।
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जानिए ‘पैराशूट’ का इतिहास और कुछ रोचक तथ्य
पैराशूट यानी हवाई छतरी का संबंध हम हवाई जहाजों के साथ जोड़ते हैं लेकिन पैराशूट का आविष्कार हवाई जहाजों से काफी पहले हो गया था, ताकि लोगों को ऊंची जलती इमारतों से बच निकलने के सक्षम बनाया जा सके।
दुनिया में पहला व्यावहारिक रूप से सफल पैराशूट बनाने का श्रेय फ्रांसीसी नागरिक लुइ सेबास्तियन लेनोर्मां को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1783 में इसका पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन किया था।
हालांकि पंद्रहवीं सदी के दौरान लिओनार्दो दा विंची ने सबसे पहले पैराशूट की कल्पना करते हुए इसका रेखाचित्र भी तैयार किया था।
दा विंची की इस डिजाइन से प्रेरणा लेकर फॉस्ट ब्रांसिस ने वर्ष 1617 में एक सख्त फ्रेम वाला पैराशूट पहनकर वेनिस टॉवर से छलांग लगाई थी। उन्होंने अपने इस पैराशूट को होमो वोलंस नाम दिया था।

विंची की इस डिजाइन से प्रेरणा लेकर 1617 में एक इतालवी खोजकर्ता, फॉस्ट ब्रांसिस ने अपने द्वारा डिजाइन (यह चौकोर आकृति में तथा कपड़े से ढंका था) एक पैराशूट को बांध कर एक वेरांजिओ गिरजाघर की मीनार से छलांग लगा दी। देखने वालों ने सोचा कि वह अपनी गर्दन तुड़वा बैठेगा लेकिन फौस्टे सुरक्षित ज़मीन पर उतरने में सफल रहे।
अपने जीवन को जोखिम में डालने के बावजूद, फौस्टे को कभी भी वह पहचान नहीं मिली, जिसके वह पैराशूट के साथ कूदने वाले पहले व्यक्ति के तौर पर हकदार थे।
यह उपलब्धि फ्रांसीसी सेबेस्टियन लेनोमांड के खाते में गई, जिन्होंने 1783 में एक दिन एक ऊंची इमारत से छलांग लगाई और बिना घायल हुए धरती पर सकुशल उतर आए।
पैराशूट के नियम का प्रदर्शन करने वाला पहला व्यक्ति होने का श्रेय लेनोमांड को जाता है। इन सभी व्यक्तियों ने ऊंची इमारतों से छलांग लगाई परंतु बैलून यानी गुब्बारे से कूदने वाला व्यक्ति था जैक्स गार्नेरिन।
22 अक्तूबर, 1797 को गार्नेरिन ने एक बैलून में पैरिस के ऊपर उड़ान भरी। बैलून के गोंडोला के साथ जुड़ा पैराशूट उसके एक तरफ आधा-अधूरा लटका हुआ था। 700 मीटर की ऊंचाई पर गानेंरिन ने काट कर बैलून को गोंडोला से अलग कर दिया।

गोंडोला धरती की ओर गिरने लगा। नीचे ज़मीन पर खड़े दर्शक भयभीत होकर देख रहे थे, उन्हें विश्वास हो गया था कि गार्नेरिन अब जीवित नहीं बचेंगे।
तब अचानक पैराशूट खुल गया। पैराशूट एक से दूसरी तरफ मंडरा रहा था और गानेंरिन तूफानी सागर के ऊपर यहां वहां पटखनियां खा रहा था मगर आखिरकार वह सकुशल धरती पर उतरने में सफल रहा।
गार्नेरिन के बाद, कैथचेन पॉलस नामक एक महिला सहित कई अन्य ने पैराशूट के विकास में योगदान दिया, जिसका इस्तेमाल न केवल वे पायलट करते हैं, जिन्हें जल्दबाजी में अपने विमान को छोड़ना पड़ता है, बल्कि इनका इस्तेमाल विभिन्न प्रकार गिराने, जैसे बाढ़ पीड़ितों या सैन्य आपूर्ति के लिए, लैंड कर रहे अंतरिक्ष यानोंकी रफ्तार को कम करने के लिए तथा युद्ध के समय सैनिकों को उतारने के लिए किया जाता है।
जानिए मछलियों के अनोखे संसार के बारे में!!
मछलियों का संसार बड़ा विचित्र और रोमांचक होता है। इन्हें जल की रानी या जलपरी भी कहा गया है। पानी में ही जन्म लेने, पलने और विचरण करने वाली इन मछलियों की अनन्त किस्में हैं।
आज इस पोस्ट में हम बात करने जा रहे हैं मछलियों के अनोखे संसार के बारे में, तो चलिए जानते हैं :-
अनेक प्रकार की मछलियां
प्रत्येक वर्ष मछलियों की 200 या 300 नई प्रजातियों की खोज होती है और उनके नाम रखे भी जाते हैं। यह मछलियां विभिन्न प्रकार की होती हैं। इनमें से कुछ मछलियां बहुत छोटी हैं तो वहीं कुछ बहुत बड़ी ।
मछलियों का सुरक्षा कवच
इनके शरीर पर स्केल्स होते हैं, जो एक परत बनाते हैं और इनके लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। यह मछलियों के लाइफस्टाइल के अनुसार बनते हैं।
उदाहरण के लिए जो मछलियां तटीय स्थानों पर रहती हैं, उनके शरीर पर यह सख्त होता है। जो गहरे पानी में रहती हैं, उनका इतना सख्त कवच नहीं होता। इन स्केल्स पर म्यूकस का कवर भी होता है, जो इनकी त्वचा को चिकनी और सुरक्षित करता है ।
कितना लंबा जीवन
कुछ मछलियों का जीवन बस कुछ हफ्तों का होता है, जबकि कुछ मछलियां 50 साल तक जीती हैं।
कैसे सांस लेती हैं मछलियां
सभी को जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत होती है। मछलियों के पास विशेष अंग (गिल्स) होते हैं जो उनके सिर के दोनों ओर पाए जाते हैं।
वे पानी के अंदर सांस लेने के लिए मुंह को खोलती हैं और गिल्स की तरफ पंप कर देती हैं। इसके बाद यह ग्रुप में उपस्थित मैब्रेन की मदद से पानी में मौजूद ऑक्सीजन को सोख लेती हैं।
इसके बाद गिल्स खुलने से ये पानी बाहर आ जाता है। कुछ मछलियां सांस लेने के लिए बार-बार पानी की सतह पर आती हैं ।
कैसे करती हैं मछलियां आपस में बातचीत
पहले समझा जाता था कि मछलियां बोलना नहीं जानतीं, फिर जब पानी के अंदर आवाज सुनने वाली मशीन का आविष्कार हुआ तब पता चला कि ये कितनी गिटर- पिटर करती हैं।
क्रोकर नामक मछली बिल्कुल कछुए की भांति आवाज निकालती है। कुछ तो विस्फोट जैसी आवाज निकालती हैं। ऐसी आवाज तब निकलती है, जब वे मछुआरे के जाल में फंस जाती हैं।
होता यह है कि उनके पास एक छोटा-सा ‘स्विम ब्लैडर’ होता है। जिसमें गैस भरी होती है ताकि वे आसानी से तैर सकें। और आराम करने के समय वे इस ब्लैडर के आकार को अपने अनुरूप ढाल लेती हैं लेकिन जब वे अचानक मछुआरे के जाल में फंसती हैं, तब उनके पास इतना समय नहीं होता कि वे उस गैस को बाहर कर दें।
जैसे ही वह पानी के बाहर आती हैं, उनका ब्लैडर फट जाता है और विस्फोट-सी आवाज होती है।
रोचक बातें
जैलीफिश, स्टारफिश और ऑक्टोपस मछलियां नहीं हैं। ये इनवर्टिब्रेट्स हैं, यानी इनके पास रीड की हड्डी नहीं होती और न ही ये मछली की प्रजाति में आती हैं।
पंजाब केसरी से साभार……।
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क्यों जलाई जाती है ओलम्पिक खेलों में मशाल, जाने इसका इतिहास और महत्व
भगवान के नाम पर दीया जलाकर या किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने की प्रथा न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर के कई देशों में देखी जा सकती है। इसी तरह की प्रथा ओलम्पिक खेलों से पहले मशाल जलाने की है।
आज इस पोस्ट में हम जानेंगे कि क्यों ओलम्पिक खेलों में मशाल जलाई जाती हैं और क्या है इसका महत्व। तो चलिए जाने हैं :-
ओलम्पिक मशाल का इतिहास

ओलम्पिक खेलों की शुरुआत 1896 में ग्रीस यानी यूनान की राजधानी एथेंस में हुई थी। हालाँकि, उस समय मशाल जलाने की प्रथा प्रचलित नहीं थी। मशाल जलाने की प्रथा 1936 में ग्रीक शहर ओलंपिया में शुरू हुई थी।
मान्य़ताओं के अनुसार यूनान के लोग आग को बहुत पवित्र मानते थे और अपने मंदिरों में निरंतर आग जलाकर रखते थे। यही कारण है कि ग्रीस में पूजे जाने वाली देवी हेस्टिया, देवता जूयस और हेरा के टेम्पलस में भी निरंतर आग जलती रहती है। ओलम्पिक में भी ये प्रथा इसी धारणा को लेकर शुरु हुई थी कि आग से खेल की पवित्रता बनी रहेगी।
ओलम्पिक मशाल जलाने की शुरुआत भगवान हेरा के मंदिर से की गई थी। उस समय ओलंपिक की मशाल में आग सूर्य की किरणों के जरिए लगाई जाती थी।
ऐसा इसलिए क्योंकि सूर्य कि किरणों को काफी पवित्र माना जाता था। जिस साल (1936) ओलंपिया शहर से ओलम्पिक मशाल जलाने की शुरुआत हुई थी उस साल ओलम्पिक खेलों की मेजबानी बर्लिन ने की थी।
इसके बाद साल 1952 में ओस्लो ओलम्पिक के दौरान पहली बार ओलम्पिक मशाल को हवाई यात्रा के जरिए ले जाया गया था।
हालांकि उस समय तक दुनियाभर में संचार के साधन उतने विकसित नहीं थे जिस वजह से कभी ओलम्पिक का टेलीविजन पर प्रसारण नहीं हुआ करता था।
लेकिन साल 1960 तक दुनियाभर में संचार क्रांति आ चुकी थी। जिस वजह से रोम ओलम्पिक की मशाल यात्रा का टीवी पर प्रसारण किया गया।
ओलम्पिक मशाल को समुद्र के रास्ते से पहली बार 1968 के मैक्सिको ओलम्पिक में ले जाया गया था। इसके अलावा ओलम्पिक की मशाल को सिडनी ओलम्पिक के दौरान साल 2000 में रेगिस्तान के रास्तों से ले जाते समय ऊटों और घोड़ो पर भी ले जाया जा चुका है। सभी देशों की यात्रा करते हुए मशाल को मेजबान देश तक पहुंचाने की प्रथा आज भी ओलंपिक में होती है।
ओलंपिक मशाल का महत्व

- मशाल को विश्व ओलम्पिक में ‘ओलम्पिक आंदोलन’ का प्रतीक माना जाता है। यह प्राचीन और आधुनिक खेलों के बीच निरंतरता का भी प्रतीक है।
- ओलम्पिक में भाग लेने वाले देशों में शांति का संदेश फैलाने के लिए मशाल जलाई जाती है।
- प्रारंभ में पैराबोलिक कांच की मदद से सूर्य की रोशनी से ओलंपिक मशाल जलाई जाती थी।
- प्रत्येक ओलम्पिक के लिए एक नई मशाल बनाई जाती है। हालांकि, इसके मूल डिजाइन में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
- मशाल रिले ओलंपिक लौ को ओलंपिया से मेजबान शहर तक ले जाती है।
- ओलम्पिक से कई महीने पहले रिले शुरू हो जाती है। यह विभिन्न शहरों और देशों के माध्यम से मशाल ले जाने का समय देता है।
- यदि मशाल को हवाई जहाज से ले जाना हो तो उसे विशेष सुरक्षा लैम्प में रखा जाता है।
- मशाल को पूरे सुरक्षा तंत्र में आगे बढ़ाया जाता है। इसके लिए रिले रूट पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था होती है।
- जिस स्टेडियम में ओलम्पिक का उद्घाटन समारोह होता है वह मशाल रिले का अंतिम चरण होता है। किसी सेलिब्रिटी, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी द्वारा बड़े कड़ाही के आकार के बर्तन में आग जलाई जाती है। तभी खेल शुरू होता है।
- ओलंपिक के बाद मशाल बुझा दी जाती है। यानी प्रतियोगिता के अंत की आधिकारिक घोषणा कर दी जाती है।
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फूलों और पेड़ों से ढ़की हैं, ये खूबसूरत रंग-बिरंगी सुरंगे!!
सुरंगे शहरों को आपस में जोड़ती है। सड़कों की तंगी के कारण ही सुरंगो का निर्माण किया जाता है, लेकिन कुछ जगह ऐसी होती है जिनको खुबसूरत दिखाने के लिए भी सुरंगो का निर्माण किया जाता है।
आज हम आपको कुछ ऐसी सुरंगो के बारे में बताने जा रहे हैं जिनको देखकर आप हैरत में पड़ जाएंगे क्योंकि ये सुरंगे फूलों पेड़ो से बनायीं गई। जो बेहद खुबसूरत है। तो चलिए जानते हैं :-
Tunnel of love, Ukraine (टनल ऑफ लव, यूक्रेन)

दुनिया की सबसे बड़ी हरी-भरी सुरंग यूक्रेन के क्लेवेन में स्थित है। यूक्रेन में स्थित ‘टनल ऑफ लव’ के नाम से मशहूर यह सुरंग करीब 1.8 मील लंबी है।
इस सुरंग के अंदर कई खूबसूरत बेल, पेड़, पौधे और झाड़ियां मौजूद हैं जिस कारण प्रकृति की सुंदरता इस सुरंग में आसानी से देखी जा सकती है।
हम आपको बता दें कि यह एक रेलवे सुरंग है जिसके अंदर से ट्रेन भी गुजरती थी, हालांकि वर्तमान में रेलवे इस ट्रैक का उपयोग नहीं करता है।
वैसे तो ये एक रेलवे ट्रैक है लेकिन प्रेमी जोड़े अक्सर यहाँ घूमने आते रहते हैं, जिसकी वजह से इस सुरंग का नाम ” टनल ऑफ़ लव ” पड़ा है।
Jacarandas walk (जोहान्सबर्ग, दक्षिण अफ्रीका)

पेड़-पौधों से बनी हुई इस सुरंग का नाम जकरंदस वाक है। इसके किनारे लगे हुए जकरंदस के पेड़ों की वजह से इसका नाम जकरंदस वाक पड़ा।
इसे दुनिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित जंगल भी माना जाता है। इस सड़क के किनारे जकरंदस के पेड़ों की लगभग 40 से ज्यादा प्रजाति मौजूद हैं।
Cypress Tunnel, California (साइप्रस सुरंग, कैलिफ़ोर्निया)

साइप्रस सुरंग कैलिफ़ोर्निया में प्वाइंट रेयस में स्थित है और अमेरिका में सबसे सुंदर प्रकृति की रचनाओं में से एक है। पेड़ों से बनी इस प्राकृतिक सुंगर में से सड़क गुजरती है, जिसमें से गुजरना किसी रोमांच से कम नहीं है।
cherry blossom Tunnel, Japan (चेरी ब्लॉसम टनल, जापान)

यह खूबसूरत सुरंग ‘cherry blossom’ पिंक और व्हाइट रंगों के फूलों से बनी हुई हैं। यह सुरंग बहुत ही सुन्दर और मनमोहक है।
आपको बता दें कि साल के कुछ महीनों में जब इन पेड़ों पर गुलाबी फूल खिलते है तो ये और भी मनमोहक हो जाती है।
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- इस खूबसूरत वर्साय महल को बनने में लगे थे पुरे 100 साल, जाने कुछ रोचक तथ्य !!
- दुनिया की सबसे लंबी गॉटहार्ड बेस सुरंग के बारे में कुछ रोचक तथ्य
- दुनिया की सबसे लम्बी और गहरी और अद्भुत सुरंग – गॉटहार्ड बेस
- विश्व की सबसे लम्बीं रेल सुरंग






















