करंसी नोटों का इतिहास और रोचक तथ्य

रिजर्व बैंक को 10,000 रुपए तक का नोट छापने का अधिकार है। यदि यह इससे भी बड़ा नोट छापना चाहती है तो उसको सरकार से पूछना पड़ेगा और सरकार को इसके लिए कानून में संशोधन करने की आवश्यकता होगी।

भारत में नोटों की छपाई 1928 में इंडिया सिक्योरिटी प्रैस, नासिक (महाराष्ट्र) में शुरू हुई। उससे पहले भारत के
लिए नोट लंदन में ‘बैंक ऑफ इंगलैंड’ छापता था।

इसके लिए वर्ष 1861 में ‘कागजी मुद्रा अधिनियम’ बनाया गया था जिससे पहले भारत में कागज के नोटों का प्रचलन नहीं था। शुरूआत में नोट आज के नोटों जैसे नहीं थे। समय के साथ उनमें तरह-तरह के बदलाव होते रहे।

जब नोट नहीं थे

सबसे पहले एक चीज के बदले चीज का लेन-देन किया जाता था। उसके बाद सिक्कों का चलन शुरू हुआ। जब कारोबार फैलने लगे और नोटों का प्रचलन नहीं था तब साहूकार अपनी साख के अनुसार हुंडियां जारी करते थे।

ये वर्तमान के वचन पत्र, बैंक ड्राफ्ट आदि का पुराना रूप कही जा सकती हैं। उन दिनों जब कोई व्यक्ति कहीं बाहर जाता तो वह अपना धन साहूकार के पास रख जाता था।

साहूकार बदले में उसे ‘रुक्का’ लिख कर दे देता जिसके आधार पर वह व्यक्ति दुसरी जगह धन तथा अन्य जरूरी चीजें प्राप्त कर लेता था। आज यह काम बैंक करते हैं

ब्रिटिश काल के पहले नोट

सबसे पहले ब्रिटिश इंडिया नोट विक्टोरिया पोर्टेट सीरीज’ के थे। इन्हें 10, 20, 50, 100, 1000 के मूल्यवर्ग में जारी किए गए थे। इनमें एक ओर ही छपाई होती थी जबकि दूसरी ओर से ये कोरे होते थे।

ये ‘लेवरस्टॉक पेपर मिल्स’ में निर्मित हाथ से बने कागज पर मुद्रित किए जाते थे। सुरक्षा के लिए इनमें वॉटरमार्क के रूप में ‘भारत सरकार’ ‘रुपी’ ‘दोहस्ताक्षर’ और ‘लहराती रेखाएं होती थीं।

बड़े पैमान पर इन्हें जाली रूप से तैयार होने पर इनकी जगह पर 1867 में ‘अंडरप्रिंट सीरीज’ शुरू की गई जो 1923 में ‘किंग्स पोर्टेट सीरीज’ शुरू करने तक चलते रहे।

आधुनिक करंसी नोट

ये वास्तव में बैंक नोट होते हैं जो एक तरह का वचन पत्र हैं। इन्हें बैंक नोट इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये बैंक द्वारा छपवाए और जारी किए जाते हैं।

प्रायः सभी देशों में वहां के प्रमुख बैंक, केंद्रीय बैंक के रूप में काम करते हैं और अपने देश में बैंक नोट जारी करते हैं।

नोटों की सुरक्षा के लिए

वाटर मार्क : कागज पर वाटर मार्क का चलन वर्ष 1282 में इटली के एक कागज निर्माता ने शुरू किया था। शुरू में नोट इतने सादा होते थे कि उनकी नकल आसानी से की जा सकती थी लेकिन अब नकल करना बहुत कठिन है क्योंकि पहचान के लिए नोटों पर कई तरह के वाटर मार्क बने होते हैं।

सिक्योरिटी थ्रैड : नोट की नकल न हो इसके लिए नोट पर लम्बा निशान भी डाला जाता है जिसे ‘सिक्योरिटी थ्रैड ‘ कहते हैं।

नोट के लिए कागज : नोट छापने के लिए विशेष तरह का कागज इस्तेमाल किया जाता है। यह कागज 1967-68 तक इंगलैंड की एक कम्पनी से खरीदा जाता था।

1962 में होशंगाबाद में कागज मिल लगाने का निश्चय किया गया जिसने जून 1968-69 में नोट छापने का कागज बनाना शुरू कर दिया। अब भारत में 4 जगहों पर नोटों की छपाई होती है।

नोटों के लिए कागज बनाते समय उसमें रोल का उपयोग विशेष ढंग से किया जाता है जिसकी वजह से कागज ज्यादा टिकाऊ होता है और वह भीगने या मोड़ने पर जल्दी नहीं फटता।

भारत में कौन छापता है नोट

रिजर्व बैंक द्वारा विभिन्न मूल्यों के नोट छापे जाते हैं। हालांकि रिजर्व बैंक को 10,000 रुपए तक का नोट मुद्रित करने का अधिकार है।

यदि यह इससे भी बड़ा नोट छापना चाहता है तो उसे सरकार से पूछना पड़ेगा और सरकार को इसकी अनुमति देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम में संशोधन करने की आवश्यकता होगी।

रिजर्व बैंक हर साल इस बात का अनुमान लगाता है कि अर्थव्यवस्था में कितने नोटों की जरुरत होगी, इसी के आधार पर वह बैंक नोटों को छापने के लिए सरकार से अनुमति लेता है लेकिन सरकार भी अंतिम निर्णय लेने से पहले रिजर्व बैंक के वरिष्ठ स्टाफ से सलाह लेती है।

यानी भारत में नोट छापने का अंतिम निर्णय भारत सरकार के पास है। हालांकि, सरकार भी रिजर्व बैंक से सलाह लेती है।

पंजाब केसरी से साभार

यह भी पढ़ें :-

भारतीय मुद्रा के बारे में 15 दिलचस्प तथ्य

जानें ‘कठपुतलियों’ का खेल

कठपुतली कला उन बच्चों के लिए एक रोमांचक शौक हो सकता है जो नए कैरेक्टर बनाना और नाटक करना पसंद करते हैं। यह रंगमंच का एक प्राचीन रूप है जो आज भी चलन में है।

मनोरंजन प्रदान करने के अलावा, इस कला रूप का उपयोग संदेश देने के लिए भी किया जाता है। यह शौक कल्पना को चुनौती के साथ सही संदेश देने के लिए रंगों तथा विभिन्न चीजों का उपयोग करके नए डिजाइन और आकृतियां बनाने का अवसर देता है।

अपनी खुद की कठपुतली बनाएं

कुछ कठपुतलियों को ऊपर से डोरी द्वारा नचाया जाता है। ये डोरी आमतौर पर कठपुतली के सिर, हाथ या पैरों से जुड़ी होती हैं। इन्हें बनाने के लिए एक इस्तेमाल किया हुआ कैन या कॉफी कप लें। इसे उल्टा कर दें।

उस चरित्र के बारे में सोचें जिसे आप तैयार करना चाहते हैं। चेहरे को उसी के अनुसार रंग दें और बाल, आंखें, नाक और अन्य चीजों को जोड़ें। निचले आधे हिस्से के लिए एक कंटेनर लेकर उसके ढक्कन को हटा दें।

 

आपने जो चेहरा बनाया है, इस कंटेनर पर उसे फिट करें। अपनी मर्जी अनुसार कंटेनर को पेंट करें। आप अपनी कठपुतली को टी-शर्ट, जींस, साड़ी वगैरह पहना सकते हैं। अब दो छेद करके कठपुतली के सिर पर एक डोरी लगाएं।

फिंगर पपेट

यह कठपुतली का सबसे सरल रूप है जहां उंगली को ढंकने के लिए विभिन्न सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। इन्हें मुख्य रूप से बच्चों के लिए कहानी कहने में उपयोग किया जाता है।

इसके लिए एक पुरानी जुराब लें और उस चरित्र के बारे में सोचें जिसे आप बनाना चाहते हैं। अब जुराब को अपनी उंगली पर लपेटं।

आप बस इसे रंग कर सकते हैं और आंखें, नाक तथा अन्य विशेषताएं बना सकते हैं। आप सभी उंगलियों के लिए भी कठपुतली बना सकते हैं, प्रत्येक हाथ के लिए एक।

आप इन दोनों को अलग-अलग चेहरे के भाव भी दे सकते हैं। सुनाने के लिए उनके बीच एक कहानी विकसित करें और इसकी मदद से अपने दोस्तों के लिए एक छोटा-सा नाटक रचें।

पंजाब केसरी से साभार

यह भी पढ़ें :-

मानसून में इन्फेक्शन से बचना है, तो जरूर पीएं ये 4 देसी काढ़े!!

अब तक भारत के कई हिस्सों में मानसून पहुंच चुका है वहीं बारिश के मौसम के साथ कई गंभीर इंफेक्शन भी जरूर आते हैं। जिनके कारण सर्दी-खांसी, जुकाम, बुखार समेत कई बीमारियां हो सकती हैं।

आयुर्वे के अनुसार, आप 4 देसी काढ़ों की मदद से बरसात के मौसम में इंफेक्शन को दूर कर सकते हैं। बारिश का मौसम कई हानिकारक और बीमार करने वाले सूक्ष्मजीवों के लिए काफी उपयुक्त होता है।

इस दौरान इन हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि के विकास की गति काफी होती है और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोग काफी जल्दी बीमार पड़ जाते हैं इसलिए हमें मानसून के मौसम में एहतियातन बरतनी चाहिए और मानसून में ये 4 देसी काढ़े जरूर पीने चाहिए।

गुड़, जीरा और काली मिर्च का काढ़ा

इस काढ़े को बनाने के लिए आप 1/4 चौथाई चम्मच काली मिर्च और एक चम्मच जीरा को एक गिलास पानी में डालकर तब तक उबालें, जब तक कि पानी आधा ना रह जाएं। उसके बाद आप इस काढ़े में गुड़ को शामिल सकते हैं।

सफेद प्याज का काढ़ा

सफेद प्याज का काढ़ा पीकर भी मानसून में इंफेक्शन से बचाव कर सकते हैं। आप सफेद प्याज को अच्छी तरह साफ कर लें और 1 गिलास पानी में उबालें उसके बाद जब पानी आधा हो जाए उसके बाद सेवन करें। यह देसी काढ़ा खांसी, सर्दी-जुकाम आदि से राहत प्रदान करता है।

काली मिर्च, अजवाइन, तुलसी और अदरक का काढ़ा

इस काढ़े के लिए आपको सबसे पहले अदरक को साफ करके उसके छोटे-छोटे टुकड़े काट लें। इसके बाद एक गिलास पानी में अदरक के टुकड़े, एक चम्मच अजवाइन, 4-5 तुलसी के पत्ते और एक चुटकी काली मिर्च का पाउडर डालकर उबालें।

जब पानी उबलकर आधा हो जाए, तो इसका सेवन करें। यह बारिश के मौसम में होने वाली खांसी व सर्दी-जुकाम की समस्या से राहत प्रदान करता है।

सर्दी-खांसी के लिए काली मिर्च का काढ़ा

आप बारिश के मौसम में काली मिर्च का काढ़ा भी बना सकते हैं। यह बनाने में काफी आसान होता है और शरीर को फायदे देता है।

इसे बनाने के लिए एक गिलास पानी में 5 से 6 काली मिर्च और स्वादानुसार काला नमक डालकर उबालें। जब पानी आधा हो जाए, तो इसका सेवन करें।

यह भी पढ़ें :-

बसंत ऋतु के आते ही पिघलकर नदी बन जाता है यह खूबसूरत होटल, जानें क्यों?

इस दुनिया में कई ऐसी कलाकृतियां मौजूद हैं, जिन्हें देख कोई भी हैरान रह जाएगा। अब जैसे कि एक होटल को ले लीजिए। क्या आप जानते हैं कि दुनिया में एक ऐसा होटल भी है जो वसंत ऋतु में पिघलकर नदी बन जाता है?

यह है स्वीडन का आइस होटल। यह हर साल सर्दियों के मौसम में बर्फ से बनाया जाता है और वसंत ऋतु के आते ही पिघलकर नदी बन जाता है। इसकी उत्पत्ति टॉर्न नदी से होती है।

इस बार सर्दियों में स्वीडन के इस आइस होटल में 13 देशों के 14 आर्टिस्टों और डिजाइनर्स ने 15 नए कमरों का सेट बनाए। हालांकि साल 2016 से इसके कुछ हिस्सों को स्थायी रूप दे दिया गया और ऐसा सोलर पावर्ड कूलिंग टेक्नॉलजी के ज़रिए संभव हुआ।

यह जगह दुनियाभर के पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है। इस होटल को पहली बार 1992 में खोला गया था और इसमें स्नो और आइस का बना एक कॉम्प्लैक्स, रेस्ट्रॉन्ट, सेरेमनी हॉल जैसी कई चीजें हैं। यह होटल खूबसूरत और आकर्षक है। इस होटल को देखने हर साल लाखों टूरिस्ट आते हैं।

 

यह भी पढ़ें :-

ये हैं भारत के मशहूर प्राकृतिक अजूबे, जो हैं बेहद खूबसूरत!!

वैसे तो हम सब ने दुनिया के सात अजूबों के बारे में खूब पढ़ा और सुना है। लेकिन क्या आपने कभी प्राकृतिक अजूबों के बारे में सुना है। ये प्राकृतिक अजूबे भारत के अलग-अलग राज्यों में मौजूद हैं। जो अपनी नेचुरल सुंदरता से सभी का मन मोह लेते हैं।

आज इस पोस्ट में हम आपको भारत के प्राकृतिक अजूबों के बारे में बताने जा रहे हैं चलिए जानते हैं

लिविंग रुट ब्रिज

चेरापूंजी में स्थित इस रूट ब्रिज को डबल डेकर लिविंग रूट ब्रिज भी कहा जाता है। दरअसल, ये ब्रिज यानी पुल (Ficus Elastica) फिकस इलास्टिक पेड़ से बना होता है। ये ब्रिज देखने में काफी खूबसूरत है और साथ ही मजबूत भी है।

मजूली आईलैंड

यह दुनिया का सबसे बड़ा रिवर आइलैंड है। यह जगह वनस्पति और जीव-जंतुओं के लिए काफी मशहूर है और यहां कई विलुप्तप्रायः प्रजाति भी पाई जाती है।

यह विश्व का सबसे बड़ा रिवर आईलैंड है जोकि असम में ब्रह्मापुत्र नदीं किनारे स्थित है। मजूली को असम की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जा सकता है। मजूली असम की राजधानी गुवाहाटी से दो सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

सम्बंधित :- इस आइलैंड पर चलता है केकड़ों का राज

मार्बल रॉक्स भेडाघाट

भेड़ाघाट जबलपुर शहर से लगभग 20 किमी दूर नर्मदा नदी के किनारे पर स्थित है। भेड़ाघाट को संगमरमरीय सौंदर्य और शानदार झरनों के लिए ही जाना जाता है। साथ ही धुआंधार जलप्रपात चमकती हुई मार्बल की 100 फीट ऊंची चट्टनों के लिए भी पर्यटकों के बीच काफी प्रसिद्ध है।

यह जगह तब और खूबसूरत लगती है जब इन संगमरमर की सफेद चट्टानों पर सूर्य की किरणें और पानी पर इनकी छाया पड़ती है तब काले और गहरे रंग की इन सफेद चट्टानों को देखना सुखद अनुभव होता है, इतना ही नहीं चांदनी रात में यह और भी ज्यादा जादुई प्रभाव पैदा करती हैं।

दूधसागर जलप्रपात गोवा

दूधसागर वॉटर फॉल्स जहां देश की 10 सबसे ऊंची वॉटर फॉल्स में से एक हैं, वहीं यह दुनिया की सबसे खूबसूरत फॉल्स में भी शामिल है। यह भारत के गोवा और कर्नाटक राज्य की सीमा पर पणजी से लगभग 60 कि.मी. की दूरी पर स्थित एक खूबसूरत झरना हैं।

दूधसागर जलप्रपात मोल्लेम नेशनल पार्क के अंदर स्थित हैं और इसके आसपास की भूमि हरे भरे जंगल से घिरी हुई है। दूधसागर जलप्रपात 310 मीटर (1017 फिट) की उंची पहाड़ी से नीचे गिरता हैं और जब इसका पानी ऊंचाई से चट्टानों से बहते हुए नीचे आता हैं तो बिल्कुल दूध की तरह सफेद दिखता हैं।

इतनी ऊंचाई से गिरता हुआ पानी ऐसा प्रतीत होता हैं जैसे पहाड़ से दूध की नदी प्रवाहित हो रही हो और इसलिए इस झरने का नाम दूधसागर पड़ा हैं, जो भारत के प्राकृतिक चमत्कार और अजूबो में से एक है।

सम्बंधित :-दुनिया के सबसे मनमोहक झरने !!!

फ्लोटिंग द्वीप लोकटक झील

फ्लोटिंग लेक यानी लोकटक झील मणिपुर में स्थित है, जोकि अपनी सतह पर तैरते हुए वनस्पति और मिट्टी से बने द्वीपों के लिये प्रसिद्ध है। इन द्वीपों को ‘कुंदी’ कहा जाता है।

यह दुनिया की एकमात्र फ्लोटिंग लेक है और भारत के पूर्वोतर में एकमात्र सबसे बड़ा फ्रेशवॉटर लेक है। मोइरांग के पास स्थित लोकटक झील को मणिपुर का प्राकृतिक अजूबा भी कहते हैं।

केइबुल लामजाओ नेशनल पार्क इसी झील के अंदर स्थित है और ये दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ नेशनल पार्क है।

सम्बंधित :- एक ऐसा द्वीप जहाँ चलता है बिल्लियों का राज

मिजोरम – द ब्‍लू माउंटेन

इसे फाउनग्‍पुई के नाम से भी जाना जाता है। ब्‍लू माउंटेन समुद्रतट से 2157 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। ये लुशाई हिल्‍स की सबसे ऊंची चोटी है और यहां पर वनस्‍पति और जीवों की कई प्रजातियां देखने को मिलती हैं।

हालांकि, शाम के समय इस जगह का नीले रंग में तब्‍दील हो जाना ही इसे मिजोरम की सबसे खूबसूरत जगह बनाता है।

सम्बंधित :- माउन्ट एवरेस्ट से भी कहीं ऊँचा है ये समुद्री पर्वत!!

वैली ऑफ फ्लावर्स

उत्तराखंड राज्य में चमोली जिले में स्थित वैली ऑफ फ्लावर्स भारत की सबसे आकर्षक जगहों में से एक है। पश्चिमी हिमालय में स्थित फूलों की घाटी एक प्राकृतिक और सुंदर राष्ट्रीय उद्यान के रूप में जानी जाती है।

फूलों की घाटी में अलग-अलग मौसम में भिन्न-भिन्न प्रकार के फूल इसकी सुंदरता को और अधिक खूबसूरत कर देते हैं, जिससे फूलों की घाटी की सुंदरता परिवर्तनशील प्रतीत होती हैं।

सम्बंधित  :- ये हैं दुनिया की 10 सबसे खूबसूरत फूलों से भरी वादियां!!

रिवर्स वॉटरफॉल लोनवाला

रिवर्स वॉटरफॉल प्रकृति द्वारा निर्मित आश्चर्यजनक रचनायों में से एक है। रिवर्स वॉटरफॉल की अचंभित कर देने वाली बात यह है कि इस झरने का पानी नीचे की और गिरने की बजाए उपर की ओर आता है।

मॉनसून के दौरान जब झरना उफान पर होता है तब झरने का पानी फब्बारे के रूप उपर की और आता दिखाई देता है। जिसे भारत के प्राकृतिक चमत्कार और अजूबो का एक अहम हिस्सा है।

दरअसल माना जाता है की झरने का यह पानी उच्च दबाव वाली हवाओं के कारण ऊपर आता है।

यह भी पढ़ें :-

जाने उँगलियों को चटकाने से आवाज़ क्यों आती है?

आपने कई लोगों को अपनी उंगलियां चटकाते हुए देखा होगा और उँगलियों को चटकाने से आने वाली आवाज को भी सुना होगा। आखिर यह आवाज़ कैसे और कहां से आती है?

वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी उंगलियों के जोड़ों के आसपास एक लिक्विड या Fluid होता है, जिसे साइनोविल फ्लूड कहते हैं। इस Fluid में Air यानी हवा घुली होती है।

जब हम उंगलियों को जरूरत से ज्यादा बेंड कर देते हैं या मोड़ देते हैं तो ये हवा बुलबुलों के रूप में उस Fluid से बाहर निकलने लगती है और इन्हीं बुलबुलों के निकलने की वजह से चट-चट की आवाज होती है।

आपने यह भी ध्यान दिया होगा कि एक बार उंगलियों को चटकाने के बाद कुछ समय तक उसे मोड़ने पर आवाज नहीं आती है, ऐसा तब तक होता है जब तक कि फिर से हवा उस Fluid में घुल नहीं जाती।

ऐसा होने में कम से कम 10 से 15 मिनट का वक्त लगता है। एक तो कारण यह है। इसके अलावा एक दूसरा कारण है कि ऐसा Tissue की वजह से भी हो सकता है।

अंगड़ाई लेने पर हड्डियों (Bones) और मांसपेशियों (Muscles) के बीच पाए जाने वाले ऊतकों (Tissues) पर तनाव (Stress) पड़ने लगता है, जिससे ये अपनी जगह से हट जाते हैं और हमें चटकने की आवाज सुनाई देती है।

यह भी पढ़ें :-

जानिए सबसे पहले ‘साबुन’ कब बना

बिना साबुन के आप नहाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। आज साबुन स्वच्छ रहने के लिए एक अनिवार्य वस्तु बन चुका है। सवाल यह है कि इसकी खोज कब की गई?

ऐतिहासिक तौर पर साबुन को लकड़ी की राख को चर्बी के साथ मिलाकर इसे उबाल कर बनाया गया। शुरू में इसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाता था।

2800 और 600 बी.सी. तक बेबिलोनियन और फिनिशयंस ने साबुन बनाना शुरू किया। चर्बी को दो हिस्सों ग्लिसरीन और वसायुक्त एसिड में बांट कर ‘अलकली’ की प्रक्रिया की जाती है ताकि ‘अलकली’ में सोडियम और पोटाशियम को चर्बी या तेल के मिश्रण में मिलाया जा सके और फिर साबुन बनाया जा सके।

सदियों से साबुन को पोटाश और पर्ल लैश लाई के मिश्रण से बनाया गया था। दोनों ही पौधों में पाए जाने वाले पोटाशियम पर आधारित थे।

इसे बनाने का पहला प्रमाण पुरातन रोम में पाया गया वहां पर साबुन बनाने की फैक्टरी की खोज की गई। वहां के लोग नहाने और कपड़े धोने के लिए साबुन का इस्तेमाल करते थे।

आमतौर पर साबुन के निर्माण की जिम्मेदारी महिलाओं की थी। शुरू-शुरू में तरल साबुन का इस्तेमाल किया गया ताकि सख्त साबुन बनाया जा सके।

इसे बनाने की प्रक्रिया के अंत में नमक मिलाया जाता था। नमक की घरों और खेतों में सप्लाई की जाती थी।
इसी करण यह महंगा था। हालांकि कठोर साबुन को संरक्षित करके रखना और इधर से उधर ले जाना आसान था।

इसे अमरीका में बिक्री के लिए भेजा गया। आज वर्तमान में साबुन को कास्टिक सोडे से बनाया जाता है। 1971 में निकोलस लैबलेन ने नमक में से सोडा राख बनाने की खोज की।

पंजाब केसरी से साभार

यह भी पढ़ें :-

नींद की कमी से हो सकती है बड़ी समस्या, जानिए क्यों ?

नींद शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक तत्वों में से एक है। शोधकर्ताओं के अनुसार, जब नींद जरूरत से कम होती है, तो शारीरिक और मानसिक रूप से कई तरह की जटिलताएं पैदा हो जाती हैं। यह कोशिका के सामान्य कामकाज को भी बाधित करता है।

एक विशेष शारीरिक समस्या सर्दी-जुकाम होने की समस्या है। अमेरिकी शोधकर्ताओं की एक टीम का दावा है कि छह घंटे से कम सोने से सर्दी-जुकाम से जुड़ी कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं।

उनका दावा है कि रात में छह घंटे से कम सोने वाले ज्यादातर पुरुष और महिलाएं सर्दी से पीड़ित हैं और जो लोग पर्याप्त नींद लेते हैं, उन्हें सर्दी-जुकाम होने का खतरा बहुत कम होता है।

मानव नींद पर शोध के बाद इस विषय पर एक रिपोर्ट ‘स्लिप’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। शोध दल के प्रमुख एरिक प्रेथर ने कहा कि जो लोग रात में छह से सात घंटे की नींद लेते हैं,

उनमें से केवल 16 प्रतिशत को ही कोल्ड वायरस होने का खतरा होता है और जो लोग दिन में पांच घंटे या उससे कम सोते हैं – उनमें से 39 प्रतिशत सर्दी से पीड़ित हैं।

अध्ययनों से यह भी पता चला है कि पुरुषों और महिलाओं दोनों को रात में कम से कम छह घंटे की नींद की जरूरत होती है नहीं तो ठंड लगने की संभावना रहती है।

परिणाम संयुक्त राज्य अमेरिका में 184 पुरुषों और महिलाओं के लिए एक सप्ताह में नींद की कुल मात्रा को देखने के बाद आए।

अध्ययनों से पता चला है कि जो लोग रात में छह घंटे से कम सोते हैं, उन्हें सर्दी से पीड़ित होने की संभावना कम सोने वालों की तुलना में अधिक होती है।

एरिक प्रथर का कहना है कि जब नींद आवश्यकता से कम होती है, तो यह शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से विभिन्न जटिलताओं का कारण बनती है। यह कोशिका के सामान्य कामकाज को भी बाधित करता है।

सेंट लुइस यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर पीडियाट्रिक स्लीप एंड रिसर्च के निदेशक शालीन परुथी ने कहा कि नींद मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए आवश्यक है।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप के अनुसार, उन्होंने कहा कि अमेरिकी अपने जीवन के 25 साल सोते हैं लेकिन अब अमेरिकियों के लिए पर्याप्त नींद लेना बहुत मुश्किल हो गया है।

1975 के एक अध्ययन में पाया गया कि अमेरिकी रात में औसतन 7.50 घंटे सोते थे। फिलहाल यह घटकर 7.16 घंटे रह गई है। नतीजतन, देश के नागरिक सर्दी के साथ-साथ हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और मोटापे से पीड़ित हैं।

एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि जो लोग रोजाना नौ घंटे या उससे अधिक सोते थे, उनमें मृत्यु का जोखिम कम था। हालांकि, शोधकर्ताओं के बीच मतभेद हैं।

यह भी पढ़ें :-

इम्युनिटी स्ट्रांग करने के लिए करें इस फल का सेवन, नहीं होगा संक्रमण

कोरोना वायरस के संक्रमण काल में इम्युनिटी सिस्टम को मजबूत रखना काफी अहम है। इसके लिए आंवला लाभदायक साबित हो सकता है।

इसका सेवन दिन में एक बार किसी न किसी रूप में करना आवश्यक है। आंवला शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाने में काफी कारगर है।

आंवला कब्ज, क्षय, छाती के रोग, दाह, रक्तपित्त, अरुचि, त्रिदोष, ह्रदय रोग, मूत्र विकार, खांसी, स्वांस रोग अदि अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति रखता है।

यह संक्रमण से बचाव करता है। इसके अलावा आंवला शरीर में फंगस अदि बीमारियों से बचाव करने के साथ ही शरीर को पुष्ट और स्फूर्ति से भरपूर रखता है।

आंवला विटामिन-सी का सर्वोत्तम प्राकृतिक श्रोत है। इसमें मौजूद विटामिन-सी नष्ट नहीं होता। इसके अलावा आंवला में कैल्शियम, आयरन, फास्फोरस, फाइबर और कार्बोहाइड्रेट भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।

इसके सेवन से एनीमिया होने का खतरा भी कम हो जाता है और याददाश्त बढ़ती है। आंवला ब्लड प्यूरीफायर की तरह भी काम करता है, जो शरीर के टॉक्सिक को फ्लश करता है।

नियमित रूप से आंवले के जूस का सेवन करने से हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है और ब्लड सेल्स काउंट भी बढ़ता है। इन्ही खूबियों के चलते यह कोरोना संक्रमण से बचाव में अहम साबित हो सकता है।

यह भी पढ़ें :-

ये हैं भारत के अजीबो गरीब और फनी रेलवे स्टेशन, जिनके नाम सुनकर हंसी नहीं रोक पाएंगे

भारत की लाइफलाइन कही जाने वाली सैकड़ों ट्रेन रोजाना एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाती हैं। इस दौरान ट्रेन कई स्टेशनों से होकर गुजरती हैं। सभी जगहें अपनी संस्कृति और सभ्यता के लिए देशभर में प्रसिद्ध है।

इनमें कई रेलवे स्टेशन अपने फनी नाम के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। इन स्टेशनों का नाम सुनकर आप अपनी हंसी नहीं रोक पाएंगे। अगर आप ट्रेन के दौरान सफर करते हैं, तो इन स्टेशनों का दीदार जरूर करें।

आज इस पोस्ट में हम जानेंगे कुछ फनी रेलवे स्टेशनों के नाम तो चलिए जानते हैं :-

सिंगापुर रोड, ओडिशा

जी हाँ आपने सही सुना है। इस सिंगापुर की यात्रा के लिए आपको वीजा की आवश्यकता नहीं होगी। आप ट्रेन से सफर कर सिंगापुर पहुंच सकते हैं। इसके लिए आपको वीसा की जरूरत नहीं पड़ेगी।

चौंक गए न, दरअसल हम बात कर रहे हैं ओडिशा के सिंगापुर रोड रेलवे स्टेशन की। विभिन्न एक्सप्रेस ट्रेन इस स्टेशन से होकर गुजरती हैं और भारत के विभिन्न मार्गों पर चलती हैं।

भैंसा, तेलंगाना

इस स्टेशन से ज्यादा ट्रेनें नहीं गुजरती हैं। इस स्टेशन का नाम 50,000 की आबादी वाले तेलंगाना के निर्मल जिले में स्थित भैंसा शहर के नाम पर रखा गया है। इस रेलवे स्टेशन के नजदीक कई जंक्शन हैं।

दारू स्टेशन, झारखंड

जैसा कि हम सब जानते हैं कि दारू एक पेय पदार्थ है लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि किसी जगह या रेलवे स्टेशन का नाम दारू हो सकता है। दारू का नाम सुनते ही लोगों के मन में मदिरा का ख्याल आ जाता है।

हालांकि, दारू स्टेशन का शराब से कोई लेना देना नहीं है। केवल इस जगह का नाम दारू है। यह गांव झारखंड के हज़ारीबाग जिले में स्थित है।

पनौती रेलवे स्टेशन, उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के एक गांव के लोग चाहकर भी पनौती शब्द से छुटकारा नहीं पा सकते हैं l ऐसा इसलिए क्योंकि इस गांव का नाम ही ‘पनौती’ है ल

अक्सर देश में बैड लक को लोग पनौती कहते हैं लेकिन क्या आपने सुना है कि किसी रेलवे स्टेशन का नाम पनौती भी हो सकता है।

जी हाँ पनौती रेलवे स्टेशन उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में स्थित है। इस गांव की कुल आबादी 2197 है।

बीबीनगर, हैदराबाद

यह कोई बीवियों का नगर नहीं है। दरसअल यह हैदराबाद का छोटा सा शहर है। बीबीनगर रेलवे स्टेशन हैदराबाद के बेहद करीब है।

यह भी पढ़ें :-