जानिए कहानी माउंट एवरेस्ट शिखर पर चढ़ने वाले 8 भाई – बहनों की

21 वर्षीय निमा लामू शेरपा के खून में पर्वतारोहण दौड़ता है फिर भी उसके लिए माऊंट एवरेस्ट शिखर पर चढ़ना आसान बात नहीं थी।

सौभाग्यवश वह ऐसे लोगों से घिरी हुई थी जिन्होंने यह कार्य पहले से ही किया था। उसके 7 भाई-बहन यह कार्य कर चुके थे जिनमें से ज्यादातर पर्वतारोहण गाइड का काम करते हैं।

प्रत्येक समय उसके भाई पहाड़ियों पर चढ़ाई कर घर लौटते थे और निमा उनसे हिमालय में साहसिक कार्यों की उनकी कहानियां सुनती थी। उसके भाई माऊंट एवरेस्ट सहित अनेक चोटियां चढ़ चुके थे।

अपने भाइयों की कहानियों को उसने दिल में उतार लिया और पहाड़ियों पर चढ़ने की इच्छा जाहिर की मगर वह आश्वास्त नहीं थी कि वह कभी ऐसा मौका पाएगी ।

12 मई, 2021 को निमा ने अपने बचपन के सपने को वास्तविकता में बदला हुआ महसूस किया और माऊंट एवरेस्ट पर अपना कदम रखा।

अपने परिवार में 7 भाई बहनों के साथ वह माऊंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली 8वीं सदस्य बनी। उसकी सफलता ने किसी भी भाई-बहनों द्वारा अधिक बार चढ़ाई चढ़ने का रिकॉर्ड भी तोड़ डाला।

निमा से पहले उसके 6 भाई तथा 1 बहन दावा डिकी शेरपा पहले से ही एवरेस्ट चढ़ चुके थे। वह कहती है, “मेरे भाइयों के खुशनुमा चेहरों ने मुझे प्रेरित किया और पर्वतारोहण को एक शौक के तौर पर लिया।”

शिखर पर पहुंचने पर निमा ने महसूस किया कि यह एक खतरनाक कार्य है जिसमें सख्त मेहनत, हिम्मत तथा दृढ़संकल्प की जरूरत है।

यूनिवर्सिटी में पढ़ रही निमा ने इससे पहले माऊंट लोबूचे के अलावा कोई पर्वत नहीं चढ़ा था। हालांकि, अपने भाइयों की सहायता से वह इस चुनौती को पार कर गई।

निमा अपने आपको इसलिए भी भाग्यशाली मानती है क्योंकि उसके भाइयों ने हमेशा से ही उसका हर कदम पर मार्गदर्शन किया। उनकी सहायता तथा समर्थन के बिना निमा इस कार्य को कर पाने में असमर्थ थी।

दो दशक पूर्व उसके एक भाई ने एवरेस्ट शिखर पर चढ़ाई के दौरान दम तोड़ा दिया था। उसके 5 भाई गाइड हैं जो दर्जनों पर्वतारोहियों की मदद कर चुके हैं।

काठमांडू के उत्तर-पूर्व में करीब 4000 मीटर की ऊंचाई पर रोलवालिंग नामक गांव है जहां निमा का परिवार बसता है। यहां के ज्यादातर लोग पर्यटन सैक्टर से जुड़े हुए है।

शेरपा परिवार के पास पर्वतारोहण के अनेकों रिकार्ड है। गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज कराने के लिए उसके भाई लंदन जाने की सोच रहे हैं।

सितारों की दुनिया के बारे में रोचक तथ्य और जानकारी

सूर्य के केंद्र (कोर) में दबाव इतना अधिक है कि हाइड्रोजन के लाखों की संख्या में अणु हीलियम में बदल जाते हैं, जो अत्यधिक ताप और ऊर्जा छोड़ते हैं। सूर्य की सतह पर तापमान ‘ पानी के उबाल बिंदू से लगभग 55 गुणा अधिक है।

सितारे या तारे हमें केवल रात को दिखाई देते हैं और जब वे सामने आते हैं तो हजारों की संख्या में नजर आते हैं। किसी साफ रात को हम संभवतः कुछ हजार सितारे गिन पाएं लेकिन वास्तव में सितारे खरबों की संख्या में ब्रह्मांड में बिखरे पड़े हैं इसलिए रात में आप जो सितारे आकाश में देखते हैं, वे उन खरबों सितारों का मात्र एक छोटा-सा हिस्सा होते हैं।

सबको जीवन देने वाला सूर्य भी एक सितारा है। दरअसल यह सम्पूर्ण सौर प्रणाली में एकमात्र सितारा है। सितारे वास्तव में गर्म गैसों के विशाल गोले हैं।

कैसे पता चलता है अंतर सितारों में

खगोल विज्ञानियों को भी सितारों में अंतर करने और उन्हें याद रखने में कठिनाई हुई थी, इसलिए उन्होंने उन्हें कई तारामंडलों के समूहों में बांट दिया।

तारामंडल चुने हुए सितारों द्वारा बनाया गया एक निर्धारित पैटर्न होता है। दरअसल रात्रिकालीन आकाश को तारामंडलों में बांटने का विचार काफी प्राचीन है।

150 ईस्वी में, यूनानी (ग्रीक) खगोल विज्ञानी टोलेमी ने सितारों के 48 पैटर्न्स का उल्लेख किया था, जिनमें उर्स मेजर’ अथवा ‘ग्रेट बीयर’ जैसे अच्छी तरह से जाने पहचाने तारामंडल शामिल हैं। आकाश को 88 तारामंडलों में विभाजित किया गया है।”

बिजली के आविष्कार से पहले सूर्य रोशनी का एकमात्र स्रोत था। इसके अस्त होने के बाद लोगों को अंधेरे में रास्ता तलाश करना पड़ता था और यह वह समय था जब उन्हें पृथ्वी के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी।

रात के समय वे सितारों के विभिन्न पैटर्न्स को देखते और धीरे-धीरे ये पैटर्न अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने लगे। तारामंडल यात्रियों को उनके रहने के स्थान का पता लगाने तथा गंतव्य का सटीक अनुमान लगाने और घर वापस लौटने में मदद करते थे। जब खोजकर्ताओं ने समुद्री मार्ग अपनाया तो उन्होंने समुद्री मार्गों का पता लगाने के लिए तारामंडलों की मदद ली।”

तारामंडलों को नाम कैसे दिया गया

तारामंडलों को उनके द्वारा बनाए जाने वाले पैटर्न्स के अनुसार नाम दिए गए। प्राचीन सभ्यताओं के लोगों ने रात को आकाश का अवलोकन किया होगा तथा पहचानी जाने वाली आकृतियों में कुछ नजदीकी सितारों के समूह बनाए होंगे।

उन्हें दी गई आकृतियां उनकी दंत कथाओं व लोक कहानियों में वर्णित पौराणिक देवताओं तथा जानवरों की थी इसलिए ‘उर्सा माइनर’ तथा ‘उर्सा मेजर’ तारामंडल बनाने वाली आकृतियां आकाश में दो भालुओं की तरह दिखाई देती हैं।

इन्हें ‘ग्रेट बियर’ भी कहा जाता है। इनमें से सात तारों के हिस्से को हिन्दी में ‘सप्तऋषि तारामंडल कहते हैं। इसे अमरीका और कनाडा में ‘बिग डिप्पर’ यानी बड़ा चमचा भी कहा जाता है।

‘द स्कॉर्पियन’ तारामंडल में सितारे एक बिच्छू (स्कॉर्पियन) की आकृति में नजर आते हैं। ‘ओरियन’ तारामंडल एक शिकारी की आकृति में जबकि ‘एरिस’ एक भेड़ की आकृति में है।

किसी एक तारामंडल में दिखाई देने वाले सितारों का आपस में कोई संबंध नहीं होता। दरअसल एक तारामंडल से संबंधित अधिकतर सितारे पृथ्वी तथा एक दूसरे से कई प्रकाश वर्ष दूर स्थित हैं।

जानिए सोने का इस्तेमाल सबसे पहले कहां हुआ!

सोना पहला धातु था जिसके बारे में मानव जानता था और इसका प्राकृतिक रूप से सबसे पहले खनन किया गया। हालांकि यह कहना कठिन है कि मानव ने सबसे पहले इसका खनन कहां और कब किया।

सबसे पहले स्वर्ण कलाकृतियां बुल्गारिया के ‘वरना नैक्रोपोलिस’ में पाई गई। यह करीब 4700 से 4200 बी.सी. का समय था जब सोने को इस स्थान पर खोजा गया। इससे पता चलता है कि सोने का खनन 7000 वर्ष पूर्व किया गया।

ऑस्ट्रेलिया में सोने की ऐतिहासिक भूमिका रही है और यह धातु “न्यू साऊथ वेल्स” में बाथर्स्ट के निकट 1851 में पाया गया। इसके बाद सोने की खोज विक्टोरिया में की गई।

सोना पाने का खुमार इतना बढ़ गया कि हजारों की तादाद में विश्व के कई हिस्सों से आप्रवासी लोग ऑस्ट्रेलियाई कलोनियों की ओर आकर्षित हुए। विक्टोरिया के दो क्षेत्रों बालार्ट और बेंडिगो में ज्यादा मात्रा में सोना पाया गया।

इसके बाद 1890 के शुरूआती दौर में पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के कूलगार्डी और कालगुर्ली में सोने को खोजा गया। सोने की चाह में ऑस्ट्रेलिया में आबादी एक मिलियन से ज्यादा की हो गई। इसके चलते कस्बों, संचार, परिवहन तथा विदेशी व्यापार में बढ़ौतरी हुई।

बेशक सोने ने ऑस्ट्रेलिया के विकास में बहुत ज्यादा वृद्धि की पर इसकी महत्ता 20वीं सदी के दौरान कम हो गई क्योंकि अन्य धातुओं की आर्थिक महत्ता बढ़ गई।

पंजाब केसरी से साभार

यह भी पढ़ें:-

 

अजीबोगरीब वास्तुकला को दर्शाती यह इमारतें!

21वीं सदी की बनी इन खूबसूरत इमारतों को देखकर हमें एक अदभुत अहसास होता है. आप भी इन इमारतों को देखकर हैरान रह जायेंगे क्योंकि यह इमारतें 21वीं सदी की वास्तुकला का अदभुत नमूना है.

साइबरटेकचर ऐग(Cybertecture Egg) – मुंबई, भारत

wonders-of-modern-architecture-cyber tecture egg-mumbai, india

bcdn

ग्रैंड लिस्बोआ – मकाओ, चीन

wonders-of-modern-architecture-Grand Lisboa - Macao, China

bcdn

बुल्ल्रिंग – बिर्मिंघम, इंग्लैंड

wonders-of-modern-architecture-Bullring - Birmingham, England

bcdn

बी.एम्.डबलयू, वेल्ट जर्मनी

wonders-of-modern-architecture-bmw-germany

bcdn

एक्सपीरियंस म्यूजिक प्रोजेक्ट – सीएटल, अमेरिका

wonders-of-modern-architecture-Experience Music Project

bcdn

मुंबई यूनिवर्सिटी आस्क फाउंडेशन कन्वेंशन सेंटर

wonders-of-modern-architecture0mumbai ask

bcdn

द सेज – गेटशेड, इंग्लैंड

wonders-of-modern-architecture-The-Sage

bcdn

एयर फ़ोर्स अकादमी – चैपल, कोलोराडो

wonders-of-modern-architecture-air-force-academy

bcdn

द यूनीव्रस्म साइंस म्यूजिक, ब्रेमेन- जर्मनी

wonders-of-modern-architecture-science-museum

bcdn

लोटस टेम्पल – दिल्ली, भारत

wonders-of-modern-architecture-lotus-temple

bcdn

4 पत्ते वाले इस दुर्लभ पौधे की कीमत जानकर आप रह जायेंगे हैरान

पहले लोग पार्क या खाली जगह में ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने के बारे में सोचते थे। लेकिन अब पता चला है कि इंडोर प्लांट का जबरदस्त क्रेज आज के समय में देखने को मिल रहा है।

इसके लिए लोग अपने घर में शुद्ध हवा की सजावट के लिए अच्छे इंडोर प्लांट्स लगाना पसंद करते हैं। हाल ही में ऐसा हुआ है कि एक कोई व्यक्ति अपने घर में इंडोर प्लांट का पौधा लेकर आया तो उसकी कीमत ने सभी के होश उड़ा दिए।

जानकारी के लिए बता दें कि न्यूजीलैंड के एक शख्स ने अपने घर में चार पत्ती वाला इंडोर प्लांट लगाया। जिसकी कीमत न्यूजीलैंड डॉलर में करीब 6 लाख रुपये है।

हालांकि अलग से लाखों में बिकने वाले इस पौधे का नाम रिफीडोफोरा टेट्रास्पर्मा है। इसे फिलोडेंड्रोन मिनिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह एक दुर्लभ प्रवृत्ति वाला पौधा है और खास बात यह है कि इस पौधे की पत्तियां अपने आप ही रंग बदलती रहती हैं।

जब इस पौधे की बोली लगी तो उस व्यक्ति ने 6 लाख रुपये की कीमत देकर प्लांट खरीदा। वैसे बताया जा रहा है कि शुरू में इस प्लांट की सबसे ज्यादा कीमत 4.77 लाख रुपये तय की गई थी लेकिन फिर इस शख्स ने 5.98 लाख रुपये देकर यह प्लांट अपने नाम कर लिया।

हालांकि इस खास प्लांट की डिमांड अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में सबसे ज्यादा है। यह यहां के लोगों के लिए एक बहुत ही भाग्यशाली पौधा माना जाता है इसलिए इसकी देखभाल एक बच्चे की तरह ही की जाती है।

15 सेंटीमीटर के गमले में लगाया गया यह पौधा आर्थिक समस्याओं को दूर करता है जिसके कारण लोग इसे अपने घर में रखना पसंद करते हैं।

यह भी पढ़ें :-

बरसात के मौसम में रखें इन खास बातों का ध्यान!!

बरसात के मौसम के दस्तक दे दी है। जिसके चलते अब जगह जगह पर लगातार बारिश हो रही है ऐसे में इस मौसम का मजा कौन नहीं लेता है। मगर इस मौसम का मजा लेने के साथ साथ हमें अपनी सेहत का ख्याल भी रखना होता है।

ऐसा कहा जाता है कि किसी भी अन्य मौसम के मुकाबले मानसून के दौरान वायरस, बैक्टीरिया, और अन्य संक्रमणों के संपर्क में आने का जोखिम दो गुना ज्यादा होता है, क्योंकि गर्म और आद्र जलवायु हानिकारक सूक्ष्मजीवों को पनपने की इजाजत देते हैं। सबसे आम मानसूनी बीमारियां मच्छर, पानी, हवा और दूषित भोजन की वजह से फैलती हैं।

मानसून के दौरान तापमान में अचानक हुआ उतार-चढ़ाव से सर्दी और फ्लू का खतरा बढ़ सकता है इसलिए आपको बरसात के मौसम में साफ-सफाई का खास ख्याल रखना चाहिए। तो आइए जानते हैं कि इस मानसूनी बीमारियों से आप खुद को कैसे बचा सकते हैं।

इस मौसम में भीड़ में जाने से बचें

इस मौसम में हवा से फैलने वाले वारयरस के संपर्क में आने से कई बीमारियां हो सकती हैं इसलिए भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें।

यहां ऐसे कई लोग हो सकते हैं, जो पहले से ही सर्दी या फ्लू से ग्रसित हों। खुद को संक्रमण से बचाने के लिए ऐसे लोगों से दूरी बनाना जरूरी है।

बार-बार मुंह को ना छूएं

मानसून में संक्रमित हाथों से अपने मुंह या नाक को छूने से बचने के लिए अपने हाथों को बार-बार धोएं। या तो साबुन से या फिर सादा पानी से हाथों को धोना चाहिए। आप चाहें, तो हैंड सैनेटाइजर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

घर को हवादार और बैक्टीरिया फ्री बनाएं

बरसात के दिनों में घर जितनी हवा आए, उतना अच्छा है। इसलिए घर की खिड़की और दरवाजे खुले रखें। जिस भी चीज़ को आप टच कर रहे हैं, उसकी सतहों को नियमित रूप से साफ कर बैक्टीरिया फ्री बनाएं।

दरवाजे की कुंडी, कीबोर्ड यहां तक की मोबाईल फोन को साफ करने के लिए भी अल्कोहलयुक्त कीटाणुनाशक का समय-समय पर इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि फ्लू के वायरस ऐसी सतहों पर पनपने की संभावना ज्यादा रहती है।

गर्म पानी पीएं

मानसून में पानी की स्वच्छता को लेकर खास सावधानी बरतनी चाहिए इसलिए कोशिश करें कि इस मौसम में गर्म पानी बार-बार पीएं। संभव हो, तो ऑफिस या स्कूल में अपना पीने का पानी साथ रखें।

ध्यान रखें किसी भी प्रकार के संक्रमण को रोकने के लिए बोतल बंद या फिल्टर किया हुआ पानी ही पीएं। अगर ये मुमकिन न हो, तो पानी को उबाल कर रख लें और इसे ठंडा करके पीएं।

छींकते समय मुंह को ढंकें

इस मौसम में वायरस और बैक्टीरिया से बचने के लिए जरूरी है कि दूसरों में वायरस को फैलने से रोका जाए। खासतौर से अगर आपको सर्दी या खांसी हैं, तो छींकते या खांसते समय अपनी नाक और मुंह को हाथ या फिर साफ रूमाल से ढंकना चाहिए।

बच्चों की देखभाल करें

के दिनों में सर्दी या जुकाम होना बहुत आम है इसलिए अपने बच्चों को बीमार लोगों के नजदीक न जाने देना संक्रमण से बचाव का बेहतर विकल्प है।

इम्यूनिटी मजबूत रखें

इम्यूनिटी को मजबूत बनाए रखने से आप वायरस की चपेट में आने से बच जाएंगे। इसके लिए बहेतर है कि आप विटामिन सी से भरपूर खट्टे फल खाएं और नींबू पानी पीते रहें।

अच्छी मात्रा में पानी पीने से भी इम्यूनिटी को स्ट्रांग बनाने में मदद मिलेगी। अपने शरीर को संक्रमण से लडने के लिए तैयार करने के लिए जितना हो सके आराम करें।

मच्छरों से बचें

इन दिनों होने वाली बीमारियों का मुख्य कारण मच्छर होते हैं। इसलिए बरसात शुरू होते ही आपकी पहली कोशिश मच्छरों से बचना होनी चाहिए।

इसके लिए आप सोते वक्त मच्छरदानी और मॉस्किटो कॉइल का इस्तेमाल करें। इसके अलावा अपने घर में और घर के आसपास मच्छरों को जमा न होने दें।

बरसात के मौसम में बीमार पड़ने का खतरा बहुत ज़्यादा होता है। इसलिए खुद के साथ बच्चों और बुजुर्गों की भी खास देखभाल करें।

यदि बीमारी के लक्षण गंभीर दिखाई दें, तो इसके ठीक होने का इंतजार न करें, तुरंत डॉक्टर के पास जाएं। खांसी -जुकाम से दूर रहकर परहेज करें और सुरक्षित रहें।

यह भी पढ़ें :-

जानिए किस्से महान खिलाड़ियों के!!

रोमन सम्राट थियोडोसियस द्वारा 15 साल पहले प्रतिबंध किए जाने के बाद प्राचीन ओलंपिक खेलों की परंपरा को पहले आधुनिक ओलंपिक खेलों के रूप में यूनान की राजधानी एथेंस में 1896 मैं दोबारा शुरू किया गया था इनके लगभग 125 वर्ष के इतिहास में कुछ सबसे सफल खिलाड़ियों के बारे में आपको बता रहे हैं।

खेलों की दुनिया में ओलंपिक सबसे बड़ी प्रतियोगिता है हर खिलाड़ी इस में भाग लेने और मेडल जीतने का सपना देखता है जो उन्हें सर्वश्रेष्ठ साबित करने के बाद ही दुनियाभर में सम्मान भी दिलाता है।

आज इस पोस्ट में हम आपको सबसे अधिक ओलंपिक मेडल जीतने वाले महान खिलाड़ियों के बारे में बताने जा रहे हैं।

माइकल फेल्प्स, तैराक (अमेरिका)

जब माइकल फेल्प्स छोटे थे तो पानी के अंदर अपना चेहरा डालने से डरते थे परंतु इस डर पर जीत हासिल करते हुए कम उम्र में ही अपनी मेहनत से तैराकी के चैंपियन बन गए।

‘बाल्टिमोर बुलेट’ या ‘फ्लाइंग फिश’ के नाम से मशहूर माइकल का ओलंपिक में दबदबा रहा। उन्होंने सिडनी 2000, एंथैंस 2004, बीजिंग 2008, लंदन 2012 और रियो 2016 ओलंपिक में भाग लिया और कुल मिलाकर 28 मैडल जीते जिनमें 23 स्वर्ण पदक, 3 रजत पदक और 2 कांस्य पदक हैं।

विजेता बनने के बाद भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ। ओलंपिक के बाद वह गंभीर डिप्रेशन में गए थे। इसकी वजह से वह आगे खेलना नहीं चाहते थे और उनकी जीने की इच्छा भी खत्म हो गई थी परंतु उन्होंने इच्छाशक्ति मजबूत करके खुद को संभाला और आज उनकी उपलब्धियां इतनी बड़ी है कि इनकी बराबरी करना किसी के लिए भी बहुत कठिन है।

लारिसा लैतिनीन,जिमनास्ट(रुस)

सोवियत यूनियन की यह जिम्नास्ट दुनिया की सबसे सफल महिला खिलाड़ी थीं। उनके नाम सबसे ज्यादा ओलंपिक मैडल जीतने वाली महिला खिलाड़ी का भी कीर्तिमान है।

उन्होंने मेलबोर्न 1956,रोम 1960 और टोक्यो 1964 ओलंपिक में हिस्सा लिया और नौ स्वर्ण पदक जीते। साथ ही 5 रजत और 4 कांस्य पदक भी उन्होंने अपने नाम किए।

पावो नुरमी,एथलीट (फिनलैंड)

‘फ्लाइंग फिन’ या ‘फैंटम फिन’ के नाम से विख्यात पावो नुरमी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ट्रैक एंड फील्ड खिलाड़ियों में से एक रहे हैं।

गरीबी की वजह से उन्हें 12 साल की उम्र में स्कूल छोड़ कर काम करना पड़ा। अपने देश के खिलाड़ी हंस से प्रेरित होकर उन्होंने खूब मेहनत की और कामयाबी पाई।

1500 मीटर से 20 किलोमीटर दौड़ में उन्होंने 22 रिकॉर्ड बनाए थे। उन्होंने अपने देश का 3 ओलंपिक एंटपर्व 1920, पैरिस 1924 और एम्सटर्डम 1928 में प्रतिनिधित्व किया और 9 स्वर्ण पदक जीते।

मार्क स्पिट्ज,तैराक(अमरीका)

अपने प्रशंसकों और दोस्तों के बीच ‘मार्क द शार्क’ नाम से प्रसिद्ध यह अमरीकी तैराक अपने जमाने का माइकल फेलप्स था। तैराकी में 1968 से लेकर 1972 ओलंपिक तक उनका दबदबा रहा।

उन्होंने मैक्सिको सिटी 1968 और म्युनिख 1972 ओलंपिक्स में 9 स्वर्ण पदक जीते। इनके अलावा इन खेलों में उन्होंने दो रजत पदक भी अपने नाम किए।

कार्ल लुइस, एथलीट (अमरीका)

कार्ल लुइस अमरीकी ‘ट्रैक एंड फील्ड’ के बादशाह थे जिन्होंने कोई 10 ओलंपिक मैडल जीते । इनमें नौ स्वर्ण पदक शामिल थे। इनके अलावा उन्होंने आठ विश्व चैंपियनशिप स्वर्ण पदक भी जीते।

लॉस एंजेल्स 1992, सिओल 1988, बार्सिलोना 1992 और एटलांटा 1996 ओलंपिक में भाग लिया और दौड़ से लेकर लंबी कूद जैसे खेलों में शानदार प्रदर्शन किया।

उसेन बोल्ट,धावक (जमैका)

जमैका के फर्राटा धावक उसने बोर्ड 21 वीं सदी के महान एथलीट हैं। 100 मीटर और 200 मीटर के इस विश्व रिकॉर्ड धारी ने 8 बार ओलंपिक में गोल्ड मैडल जीते हैं।

2017 में उन्होंने लंदन वर्ल्ड चैंपियनशिप के बाद संन्यास ले लिया था लेकिन जब तक वह खेले, ओलंपिक के 200 मीटर और 100 मीटर की दौड़ में उन्हें कोई पीछे नहीं छोड़ सका। वह ओलंपिक स्पर्धाओं में हमेशा पहले नंबर पर रहे।

पंजाब केसरी से साभार…..।

यह भी पढ़ें :-

वायरल वीडियो :- कपिल शर्मा और भारती का ‘Baspan Ka Pyar’ गाना सुन बेहाल हुई फैन

इन दिनों सोशल मीडिया पर ‘बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे’ गाने की धूम मची है। इस गाने पर अब तक कई सिलेब्रिटीज मजेदार वीडियो बनाकर शेयर कर चुके हैं।

इसी गाने पर हाल ही में कपिल शर्मा और भारती सिंह ने एक मजेदार वीडियो बनाया है जो सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। उनके ‘बसपन का प्यार’ गाने को सुनकर एक फैन का तो ऐसा हाल हो गया कि उसने मुंह ही छिपा लिया।

 

भारती सिंह और कपिल शर्मा का यह वीडियो खूब वायरल हो रहा है। दरअसल भारती सिंह और कपिल शर्मा रविवार को राइड पर निकले थे और इस दौरान उन्होंने कई वीडियो बनाए।

उन्हीं में से एक वीडियो उन्होंने ‘बसपन का प्यार’ पर बनाया जो खूब वायरल हुआ है।

कपिल और भारती का गाना सुनकर जैसे ही वहां मौजूद फीमेल फैन मुंह छिपाकर भागने लगी। इस पर भारती और कपिल उससे कहते हैं, ‘यह है जानेमन, कहां भाग रही हो ? रुको.. रुको फोटो तो खिचाओ।’

इस वीडियो को कपिल शर्मा ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर भी शेयर किया है और साथ में लिखा है, ‘फैन्स के साथ मस्ती’।

यह भी देखें :-

जानिए ‘पैराशूट’ का इतिहास और कुछ रोचक तथ्य

पैराशूट यानी हवाई छतरी का संबंध हम हवाई जहाजों के साथ जोड़ते हैं लेकिन पैराशूट का आविष्कार हवाई जहाजों से काफी पहले हो गया था, ताकि लोगों को ऊंची जलती इमारतों से बच निकलने के सक्षम बनाया जा सके।

दुनिया में पहला व्यावहारिक रूप से सफल पैराशूट बनाने का श्रेय फ्रांसीसी नागरिक लुइ सेबास्तियन लेनोर्मां को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1783 में इसका पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन किया था।

हालांकि पंद्रहवीं सदी के दौरान लिओनार्दो दा विंची ने सबसे पहले पैराशूट की कल्पना करते हुए इसका रेखाचित्र भी तैयार किया था।

दा विंची की इस डिजाइन से प्रेरणा लेकर फॉस्ट ब्रांसिस ने वर्ष 1617 में एक सख्त फ्रेम वाला पैराशूट पहनकर वेनिस टॉवर से छलांग लगाई थी। उन्होंने अपने इस पैराशूट को होमो वोलंस नाम दिया था।

विंची की इस डिजाइन से प्रेरणा लेकर 1617 में एक इतालवी खोजकर्ता, फॉस्ट ब्रांसिस ने अपने द्वारा डिजाइन (यह चौकोर आकृति में तथा कपड़े से ढंका था) एक पैराशूट को बांध कर एक वेरांजिओ गिरजाघर की मीनार से छलांग लगा दी। देखने वालों ने सोचा कि वह अपनी गर्दन तुड़वा बैठेगा लेकिन फौस्टे सुरक्षित ज़मीन पर उतरने में सफल रहे।

अपने जीवन को जोखिम में डालने के बावजूद, फौस्टे को कभी भी वह पहचान नहीं मिली, जिसके वह पैराशूट के साथ कूदने वाले पहले व्यक्ति के तौर पर हकदार थे।

यह उपलब्धि फ्रांसीसी सेबेस्टियन लेनोमांड के खाते में गई, जिन्होंने 1783 में एक दिन एक ऊंची इमारत से छलांग लगाई और बिना घायल हुए धरती पर सकुशल उतर आए।

पैराशूट के नियम का प्रदर्शन करने वाला पहला व्यक्ति होने का श्रेय लेनोमांड को जाता है। इन सभी व्यक्तियों ने ऊंची इमारतों से छलांग लगाई परंतु बैलून यानी गुब्बारे से कूदने वाला व्यक्ति था जैक्स गार्नेरिन।

22 अक्तूबर, 1797 को गार्नेरिन ने एक बैलून में पैरिस के ऊपर उड़ान भरी। बैलून के गोंडोला के साथ जुड़ा पैराशूट उसके एक तरफ आधा-अधूरा लटका हुआ था। 700 मीटर की ऊंचाई पर गानेंरिन ने काट कर बैलून को गोंडोला से अलग कर दिया।

गोंडोला धरती की ओर गिरने लगा। नीचे ज़मीन पर खड़े दर्शक भयभीत होकर देख रहे थे, उन्हें विश्वास हो गया था कि गार्नेरिन अब जीवित नहीं बचेंगे।

तब अचानक पैराशूट खुल गया। पैराशूट एक से दूसरी तरफ मंडरा रहा था और गानेंरिन तूफानी सागर के ऊपर यहां वहां पटखनियां खा रहा था मगर आखिरकार वह सकुशल धरती पर उतरने में सफल रहा।

गार्नेरिन के बाद, कैथचेन पॉलस नामक एक महिला सहित कई अन्य ने पैराशूट के विकास में योगदान दिया, जिसका इस्तेमाल न केवल वे पायलट करते हैं, जिन्हें जल्दबाजी में अपने विमान को छोड़ना पड़ता है, बल्कि इनका इस्तेमाल विभिन्न प्रकार गिराने, जैसे बाढ़ पीड़ितों या सैन्य आपूर्ति के लिए, लैंड कर रहे अंतरिक्ष यानोंकी रफ्तार को कम करने के लिए तथा युद्ध के समय सैनिकों को उतारने के लिए किया जाता है।

जानिए मछलियों के अनोखे संसार के बारे में!!

मछलियों का संसार बड़ा विचित्र और रोमांचक होता है। इन्हें जल की रानी या जलपरी भी कहा गया है। पानी में ही जन्म लेने, पलने और विचरण करने वाली इन मछलियों की अनन्त किस्में हैं।

आज इस पोस्ट में हम बात करने जा रहे हैं मछलियों के अनोखे संसार के बारे में, तो चलिए जानते हैं :-

अनेक प्रकार की मछलियां

प्रत्येक वर्ष मछलियों की 200 या 300 नई प्रजातियों की खोज होती है और उनके नाम रखे भी जाते हैं। यह मछलियां विभिन्न प्रकार की होती हैं। इनमें से कुछ मछलियां बहुत छोटी हैं तो वहीं कुछ बहुत बड़ी ।

मछलियों का सुरक्षा कवच

इनके शरीर पर स्केल्स होते हैं, जो एक परत बनाते हैं और इनके लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। यह मछलियों के लाइफस्टाइल के अनुसार बनते हैं।

उदाहरण के लिए जो मछलियां तटीय स्थानों पर रहती हैं, उनके शरीर पर यह सख्त होता है। जो गहरे पानी में रहती हैं, उनका इतना सख्त कवच नहीं होता। इन स्केल्स पर म्यूकस का कवर भी होता है, जो इनकी त्वचा को चिकनी और सुरक्षित करता है ।

कितना लंबा जीवन

कुछ मछलियों का जीवन बस कुछ हफ्तों का होता है, जबकि कुछ मछलियां 50 साल तक जीती हैं।

कैसे सांस लेती हैं मछलियां

सभी को जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत होती है। मछलियों के पास विशेष अंग (गिल्स) होते हैं जो उनके सिर के दोनों ओर पाए जाते हैं।

वे पानी के अंदर सांस लेने के लिए मुंह को खोलती हैं और गिल्स की तरफ पंप कर देती हैं। इसके बाद यह ग्रुप में उपस्थित मैब्रेन की मदद से पानी में मौजूद ऑक्सीजन को सोख लेती हैं।

इसके बाद गिल्स खुलने से ये पानी बाहर आ जाता है। कुछ मछलियां सांस लेने के लिए बार-बार पानी की सतह पर आती हैं ।

कैसे करती हैं मछलियां आपस में बातचीत

पहले समझा जाता था कि मछलियां बोलना नहीं जानतीं, फिर जब पानी के अंदर आवाज सुनने वाली मशीन का आविष्कार हुआ तब पता चला कि ये कितनी गिटर- पिटर करती हैं।

क्रोकर नामक मछली बिल्कुल कछुए की भांति आवाज निकालती है। कुछ तो विस्फोट जैसी आवाज निकालती हैं। ऐसी आवाज तब निकलती है, जब वे मछुआरे के जाल में फंस जाती हैं।

होता यह है कि उनके पास एक छोटा-सा ‘स्विम ब्लैडर’ होता है। जिसमें गैस भरी होती है ताकि वे आसानी से तैर सकें। और आराम करने के समय वे इस ब्लैडर के आकार को अपने अनुरूप ढाल लेती हैं लेकिन जब वे अचानक मछुआरे के जाल में फंसती हैं, तब उनके पास इतना समय नहीं होता कि वे उस गैस को बाहर कर दें।

जैसे ही वह पानी के बाहर आती हैं, उनका ब्लैडर फट जाता है और विस्फोट-सी आवाज होती है।

रोचक बातें

जैलीफिश, स्टारफिश और ऑक्टोपस मछलियां नहीं हैं। ये इनवर्टिब्रेट्स हैं, यानी इनके पास रीड की हड्डी नहीं होती और न ही ये मछली की प्रजाति में आती हैं।

पंजाब केसरी से साभार……।

यह भी पढ़ें :-

क्या सचमुच मछलियों की बारिश होती है??