क्यों जलाई जाती है ओलम्पिक खेलों में मशाल, जाने इसका इतिहास और महत्व

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भगवान के नाम पर दीया जलाकर या किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने की प्रथा न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर के कई देशों में देखी जा सकती है। इसी तरह की प्रथा ओलम्पिक खेलों से पहले मशाल जलाने की है।

आज इस पोस्ट में हम जानेंगे कि क्यों ओलम्पिक खेलों में मशाल जलाई जाती हैं और क्या है इसका महत्व। तो चलिए जाने हैं :-

ओलम्पिक मशाल का इतिहास

ओलम्पिक खेलों की शुरुआत 1896 में ग्रीस यानी यूनान की राजधानी एथेंस में हुई थी। हालाँकि, उस समय मशाल जलाने की प्रथा प्रचलित नहीं थी। मशाल जलाने की प्रथा 1936 में ग्रीक शहर ओलंपिया में शुरू हुई थी।

मान्य़ताओं के अनुसार यूनान के लोग आग को बहुत पवित्र मानते थे और अपने मंदिरों में निरंतर आग जलाकर रखते थे। यही कारण है कि ग्रीस में पूजे जाने वाली देवी हेस्टिया, देवता जूयस और हेरा के टेम्पलस में भी निरंतर आग जलती रहती है। ओलम्पिक में भी ये प्रथा इसी धारणा को लेकर शुरु हुई थी कि आग से खेल की पवित्रता बनी रहेगी।

ओलम्पिक मशाल जलाने की शुरुआत भगवान हेरा के मंदिर से की गई थी। उस समय ओलंपिक की मशाल में आग सूर्य की किरणों के जरिए लगाई जाती थी।

ऐसा इसलिए क्योंकि सूर्य कि किरणों को काफी पवित्र माना जाता था। जिस साल (1936) ओलंपिया शहर से ओलम्पिक मशाल जलाने की शुरुआत हुई थी उस साल ओलम्पिक खेलों की मेजबानी बर्लिन ने की थी।

इसके बाद साल 1952 में ओस्लो ओलम्पिक के दौरान पहली बार ओलम्पिक मशाल को हवाई यात्रा के जरिए ले जाया गया था।

हालांकि उस समय तक दुनियाभर में संचार के साधन उतने विकसित नहीं थे जिस वजह से कभी ओलम्पिक का टेलीविजन पर प्रसारण नहीं हुआ करता था।

लेकिन साल 1960 तक दुनियाभर में संचार क्रांति आ चुकी थी। जिस वजह से रोम ओलम्पिक की मशाल यात्रा का टीवी पर प्रसारण किया गया।

ओलम्पिक मशाल को समुद्र के रास्ते से पहली बार 1968 के मैक्सिको ओलम्पिक में ले जाया गया था। इसके अलावा ओलम्पिक की मशाल को सिडनी ओलम्पिक के दौरान साल 2000 में रेगिस्तान के रास्तों से ले जाते समय ऊटों और घोड़ो पर भी ले जाया जा चुका है। सभी देशों की यात्रा करते हुए मशाल को मेजबान देश तक पहुंचाने की प्रथा आज भी ओलंपिक में होती है।

ओलंपिक मशाल का महत्व

  • मशाल को विश्व ओलम्पिक में ‘ओलम्पिक आंदोलन’ का प्रतीक माना जाता है। यह प्राचीन और आधुनिक खेलों के बीच निरंतरता का भी प्रतीक है।
  • ओलम्पिक में भाग लेने वाले देशों में शांति का संदेश फैलाने के लिए मशाल जलाई जाती है।
  • प्रारंभ में पैराबोलिक कांच की मदद से सूर्य की रोशनी से ओलंपिक मशाल जलाई जाती थी।
  • प्रत्येक ओलम्पिक के लिए एक नई मशाल बनाई जाती है। हालांकि, इसके मूल डिजाइन में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
  • मशाल रिले ओलंपिक लौ को ओलंपिया से मेजबान शहर तक ले जाती है।
  • ओलम्पिक से कई महीने पहले रिले शुरू हो जाती है। यह विभिन्न शहरों और देशों के माध्यम से मशाल ले जाने का समय देता है।
  • यदि मशाल को हवाई जहाज से ले जाना हो तो उसे विशेष सुरक्षा लैम्प में रखा जाता है।
  • मशाल को पूरे सुरक्षा तंत्र में आगे बढ़ाया जाता है। इसके लिए रिले रूट पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था होती है।
  • जिस स्टेडियम में ओलम्पिक का उद्घाटन समारोह होता है वह मशाल रिले का अंतिम चरण होता है। किसी सेलिब्रिटी, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी द्वारा बड़े कड़ाही के आकार के बर्तन में आग जलाई जाती है। तभी खेल शुरू होता है।
  • ओलंपिक के बाद मशाल बुझा दी जाती है। यानी प्रतियोगिता के अंत की आधिकारिक घोषणा कर दी जाती है।

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