जानें सितारों की दुनिया के बारे में

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सूर्य के केंद्र (कोर) में दबाव इतना अधिक है कि हाइड्रोजन के लाखों की संख्या में अणु हीलियम में बदल जाते हैं, जो अत्यधिक ताप और ऊर्जा छोड़ते हैं। सूर्य की सतह पर तापमान ‘ पानी के उबाल बिंदू से लगभग 55 गुणा अधिक है।

सितारे या तारे हमें केवल रात को दिखाई देते हैं और जब वे सामने आते हैं तो हजारों की संख्या में नजर आते हैं। किसी साफ रात को हम संभवतः कुछ हजार सितारे गिन पाएं लेकिन वास्तव में सितारे खरबों की संख्या में ब्रह्मांड में बिखरे पड़े हैं इसलिए रात में आप जो सितारे आकाश में देखते हैं, वे उन खरबों सितारों का मात्र एक छोटा-सा हिस्सा होते हैं।

सबको जीवन देने वाला सूर्य भी एक सितारा है। दरअसल यह सम्पूर्ण सौर प्रणाली में एकमात्र सितारा है। सितारे वास्तव में गर्म गैसों के विशाल गोले हैं।

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कैसे पता चलता है अंतर सितारों में

खगोल विज्ञानियों को भी सितारों में अंतर करने और उन्हें याद रखने में कठिनाई हुई थी, इसलिए उन्होंने उन्हें कई तारामंडलों के समूहों में बांट दिया।

तारामंडल चुने हुए सितारों द्वारा बनाया गया एक निर्धारित पैटर्न होता है। दरअसल रात्रिकालीन आकाश को तारामंडलों में बांटने का विचार काफी प्राचीन है।

150 ईस्वी में, यूनानी (ग्रीक) खगोल विज्ञानी टोलेमी ने सितारों के 48 पैटर्न्स का उल्लेख किया था, जिनमें उर्स मेजर’ अथवा ‘ग्रेट बीयर’ जैसे अच्छी तरह से जाने पहचाने तारामंडल शामिल हैं। आकाश को 88 तारामंडलों में विभाजित किया गया है।”

बिजली के आविष्कार से पहले सूर्य रोशनी का एकमात्र स्रोत था। इसके अस्त होने के बाद लोगों को अंधेरे में रास्ता तलाश करना पड़ता था और यह वह समय था जब उन्हें पृथ्वी के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी।

रात के समय वे सितारों के विभिन्न पैटर्न्स को देखते और धीरे-धीरे ये पैटर्न अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने लगे। तारामंडल यात्रियों को उनके रहने के स्थान का पता लगाने तथा गंतव्य का सटीक अनुमान लगाने और घर वापस लौटने में मदद करते थे। जब खोजकर्ताओं ने समुद्री मार्ग अपनाया तो उन्होंने समुद्री मार्गों का पता लगाने के लिए तारामंडलों की मदद ली।”

तारामंडलों को नाम कैसे दिया गया

तारामंडलों को उनके द्वारा बनाए जाने वाले पैटर्न्स के अनुसार नाम दिए गए। प्राचीन सभ्यताओं के लोगों ने रात को आकाश का अवलोकन किया होगा तथा पहचानी जाने वाली आकृतियों में कुछ नजदीकी सितारों के समूह बनाए होंगे।

उन्हें दी गई आकृतियां उनकी दंत कथाओं व लोक कहानियों में वर्णित पौराणिक देवताओं तथा जानवरों की थी इसलिए ‘उर्सा माइनर’ तथा ‘उर्सा मेजर’ तारामंडल बनाने वाली आकृतियां आकाश में दो भालुओं की तरह दिखाई देती हैं।

इन्हें ‘ग्रेट बियर’ भी कहा जाता है। इनमें से सात तारों के हिस्से को हिन्दी में ‘सप्तऋषि तारामंडल कहते हैं। इसे अमरीका और कनाडा में ‘बिग डिप्पर’ यानी बड़ा चमचा भी कहा जाता है।

‘द स्कॉर्पियन’ तारामंडल में सितारे एक बिच्छू (स्कॉर्पियन) की आकृति में नजर आते हैं। ‘ओरियन’ तारामंडल एक शिकारी की आकृति में जबकि ‘एरिस’ एक भेड़ की आकृति में है।

किसी एक तारामंडल में दिखाई देने वाले सितारों का आपस में कोई संबंध नहीं होता। दरअसल एक तारामंडल से संबंधित अधिकतर सितारे पृथ्वी तथा एक दूसरे से कई प्रकाश वर्ष दूर स्थित हैं।

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