कई वर्षों से नहीं मनाई गई इन जगहों पर होली, जानें क्या कारण?

होली का पर्व सारे देश में धूमधाम तथा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। होली को लेकर कई दिन पहले से ही जोरशोर से तैयारियां शुरू हो जाती हैं लेकिन हमारे ही देश में कई ऐसी जगहें हैं जहां रंगों का यह त्यौहार हमेशा फीका रहता है।

इन जगहों पर कभी भी होली के रंग नहीं बिखरते। आइए जानते हैं ये कौन सी जगहें है और आखिर क्यों यहां होली नहीं मनाते?

60 वर्षों से नहीं मनी यहाँ होली

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित खरहरी गांव में लगभग 160 वर्षों से होली नहीं खेली गई है। होली न खेलने को लेकर ग्रामीणों की अपनी ही कुछ मान्यताएं हैं। एक मान्यता के अनुसार वर्षों पहले इस गांव के लोग होलिका दहन कर रहे थे।

उसी दौरान गांव के सभी घर अचानक जलने लगे। इस घटना से लोगों में ऐसा खौफ बैठ गया और गांव के लोगों ने होली न मनाने का फैसला किया। इसके बाद से लेकर आज तक इस गांव में होली नहीं मनाई गई।

कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें डर है कि अगर उन्होंने होली खेली तो उनके साथ कुछ बुरा हो सकता है। कहा जाता है कि एक बार गांव का एक शख्स होली खेलने के लिए दूसरे गांव गया था।

जैसे ही वह अपने गांव खरहरी लौटा तो उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसकी मौत हो गई। इसके बाद से लोगों का डर और बढ़ गया और भविष्य में कभी भी होली न खेलने का प्रण लिया। इस फैसले को सभी लोग मानते हैं और हर पीढ़ी के लोग इसका पालन कर रहे हैं।

झारखंड के इन गावों में डरते है होली से

झारखंड के बोकारो जिले के दुर्गापुर गांव के लोग होली के नाम से डरते हैं। यहां होली के दिन लोग भूलकर भी एक-दूसरे को रंग नहीं लगाते। कहा जाता है कि अगर यहाँ होली के दिन रंग खेलेंगे तो गांव में तबाही आ जाएगी।

एक कथा के अनुसार इस गांव को राजा दुर्गादेव ने बसाया था और उन्हीं का राज था। उस समय सब तीज-त्यौहार मनाए जाते थे लेकिन कुछ समय बाद राजा के बेटे की होली के दिन ही मौत हो गई।

उसके बाद जब भी गांव में होली का आयोजन होता था यहां कभी भयंकर सूखा पड़ जाता था या फिर महामारी का सामना करना पड़ता था, जिससे गांव में कई लोगों की मौत हो जाती थी।

फिर एक बार होली के ही दिन पास के इलाके रामगढ़ के राजा दलेल सिंह के साथ हुए युद्ध में राजा दुर्गादेव की भी मौत हो गयी जिसकी खबर सुनते ही रानी ने भी आत्महत्या कर ली।

कहते हैं अपनी मौत से पहले राजा ने आदेश दिया था कि उसकी प्रजा कभी होली न मनाए। तब से उसी शोक और आदेश के कारण यहां के लोगों ने होली मनानी छोड़ दी।

रायबरेली के इन गावों में नहीं मनाते होली

रायबरेली के डलमऊ क्षेत्र के खजूरी गांव में होली के दिन रंग नहीं बिखरते बल्कि यहां उस दिन शोक मनाते हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि पुराने समय में खजूरी गांव के किले को मुगल शासकों ने होली के दिन ही ध्वस्त कर दिया था। सैकड़ों लोगों की मौत हुई थी।

तब से आज तक होली पर्व नहीं मनाया जाता है। वहीं जलालपुर धई में होली के दिन शोक मनाने के पीछे कहा जाता है कि जलालपुर धई रियासत थी। कभी वहां पर धईसेन नाम के राजा का शासन था। उनके ही नाम पर जलालपुर धई रियासत के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

उसकी रियासत पर मुगल शासक सैयद जमालुद्दीन की नजर थी। वह उस रियासत का स्वामित्व चाहता था। इसके बाद एक बार उसे पता चला कि होली के दिन राजा अपनी प्रजा के साथ होली खेलते हैं।

वहीं इस दिन राजा धईसेन अपने साथ कोई भी अस्त्रशस्त्र नहीं रखते। बस इसी बात का फायदा उठाकर जमालुद्दीन ने होली के दिन धईसेन और उसकी प्रजा पर आक्रमण कर दिया।

इन गावों में नहीं मनी बरसो से होली

उत्तराखंड के क्वीली, कुरझण और जौंदली गांव में तकरीबन 150 सालों से होली नहीं मनाई गई। यह गांव रूद्रप्रयाग के अगस्त्यमुनि ब्लॉक में हैं।

इन गांवों में होली के दिन शोक मनाए जाने के पीछे कई सारी मान्यताएं हैं। इसमें पहली मान्यता है कि इस गांव की इष्टदेवी मां त्रिपुर सुंदरी देवी हैं।

कहा जाता है कि मां को हुड़दंग पसंद नहीं है। ऐसे में होली पर तो मस्ती होती ही है तो लोगों ने होली खेलनी बंद कर दी। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि इस गांव में जब डेढ़ सौ साल पहले लोगों ने होली खेलने की कोशिश की तो तीनों ही गांव हैजा की चपेट में आ गए। इसके बाद किसी ने भी होली मनाने का साहस नहीं जुटाया।

राजस्थान में भी सुना रहता है होली का दिन

राजस्थान में ब्राह्मण जाति के चोवाटिया जोशी जाति के लोग होली नहीं मनाते। इसके पीछे कहा जाता है कि एक अरसे पहले इसी जाति की एक महिला होली के दिन होलिका की पवित्र अग्नि के फेरे लगा रही थी तभी उसका बेटा होलिका में गिर गया।

इसके बाद बच्चे को बचाने के चक्कर में महिला की मौत हो गई। कहा जाता है कि जिस वक्त उस महिला की मौत हुई वह अपने बेटे के गम में इतनी आहत थी कि उसने मरते-मरते कहा कि अब कभी कोई इस गांव में होली नहीं मनाएगा।

इस घटना के बाद से इस जनजाति के लोग होली मनाने का साहस नहीं जुटा पाए। अरसा बीत गया लेकिन आज भी इस जाति के लोग यहां शोक ही मनाते हैं।

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आपको हर संकट से बचाएंगें, होली पर किए गए यह 7 अनोखे काम

वैसे तो हर त्यौहार का अपना एक रंग और महत्व होता है, लेकिन हरे, पीले, लाल, गुलाबी आदि असल रंगों का त्यौहार होली बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है।

होली के दिन हर किसी का तन-मन, प्रेम-उल्लास और उमंग के रंगों की फुहार से भर जाता है। आइए जानते हैं होली पर किए गए वह 7 अनोखे काम, जो आपको हर संकट से बचाएंगें:-

कब है होली

होली 2022 तिथि की बात करें तो, इस बार होली 17 मार्च 2022 को है और 18 मार्च 2022 को होलिका दहन है।होलिका दहन और होली के शुभ मुहूर्त का समय रात में 09 बजकर 6 मिनट से  लेकर 10 बजकर 16 मिनट तक है।

होली पर पढ़ें यह शुभ मंत्र

आज हम आपको एक मंत्र के बारे में बताने जा रहें हैं, इस होली इस शुभ मंत्र को पढ़ लिया, तो सुख, समृद्धि और सफलता के दरवाज़े खुल जाएंगे। सुख और समृद्धि के लिए पढ़ें होली का यह शुभ मंत्र-

अहकूटा भयत्रस्तै:कृता त्वं होलि बालिशै: अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम:

इस मंत्र का उच्चारण एक माला, तीन माला या फिर पांच माला विषम संख्या के रूप में करना चाहिए।

करें यह 7 काम

होली और दिवाली तंत्र, मंत्र और यंत्र के लिए जानी जाती है, लेकिन होली पर अगर आप कोई कठिन तंत्र-मंत्र नहीं करना चाहते हैं, तो आप यह बहुत सरल से उपाय भी कर सकतें हैं।

  • होलिका का पूजन कर पान, फल, मिष्ठान्न चढ़ाएं और दूसरे दिन कुछ चुटकी भस्म लेकर धारण करें और पूजन करें, तांत्रिक प्रयोगों से रक्षा होगी।
  • होली के दिन जो लोग भगवान विष्णु के दर्शन करते हैं, वे बैकुंठगामी होते हैं। अगर उनकी प्रतिमा हिंडोले (झूला) में झूलते हुए है, तो वर्ष भर यह दर्शन शुभता लाते हैं।
  • नमक, मिर्च, राई लेकर अपने ऊपर से उतारकर होली में डाल दें। किसी व्यक्ति से बचाव के लिए उस व्यक्ति का नाम लेकर डालें।
  • इस दिन आम मंजरी और चंदन को मिलाकर खाने की बड़ी महत्ता है।
  • अशुभ ग्रहों के निवारण के लिए होली की भस्म शरीर पर लगाकर स्नान करें।
  • होलिका दहन के बाद जो राख निकलती है, उस राख को शरीर पर लगाना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि जली हुई होली की गर्म राख घर में समृद्धि लाती है। साथ ही परिवार में शांति और आपसी प्रेम बढ़ता है।
  • होलिका दहन के दौरान गेहूं की बाली सेंककर घर में रखने से धनधान्य में वृद्धि होती है।

होली की आग, भस्म और धूल, बुरी आत्माओं को रखती हैं दूर

ऐसा माना जाता है कि होली की बची हुई अग्नि और भस्म को अगले दिन प्रात: घर में लाने से घर को अशुभ शक्तियों से बचाने में सहयोग मिलता है। इस भस्म का शरीर पर लेपन भी किया जाता है। भस्म का लेपन करते समय निम्न मंत्र का जाप करना कल्याणकारी रहता है-

वंदितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च। अतस्त्वं पाहि मां देवी! भूति भूतिप्रदा भव।।

होली की पूजा कैसे करें

लकड़ी और कंडों की होली के साथ घास लगाकर होलिका खड़ी करके उसका पूजन करने से पहले हाथ में असद, फूल, सुपारी, पैसा लेकर पूजन कर जल के साथ होलिका के पास छोड़ दें और अक्षत, चंदन, रोली, हल्दी, गुलाल, फूल तथा गूलरी की माला पहनाएं।

इसके बाद होलिका की तीन परिक्रमा करते हुए नारियल का गोला, गेहूं की बाली तथा चना को भूंज कर इसका प्रसाद सभी को वितरित करें। होली की पूजा करने से घर में सुख-शांति, समृद्धि, संतान प्राप्ति होती है।

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जानें दुनिया के अलग-अलग देशों में मनाए जाने वाले होली जैसे त्यौहारों के बारे में

रंगों का त्यौहार होली पुरे विश्व में मनाया जाता है। ब्रजभूमि मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल और बरसाना की होली केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में मशहूर हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि दुनियाभर में कई ऐसे देश हैं जहां होली जैसे ही त्यौहार मनाए जाते हैं।

हां यह बात अलग है कि अलग-अलग देशों में इसके रंग अलग-अलग हैं। कहीं ये रंगों से खेली जाती है तो कहीं कीचड़ से, कहीं पानी से तो कहीं टमाटर से।

जिन्हें देखकर लगता है कि रंग 12 नहीं हजार हैं। इस लेख में हम जानेंगे कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मनाए जाने वाले होली जैसे त्यौहारों के बारे में। तो चलिए जानते हैं:-

म्यामांर (पानी वाली होली)

भारत के पड़ोसी देश म्यामांर में मेकांग के नाम से पानी का त्यौहार मनाया जाता है। इसे थिंगयान भी कहते हैं। म्यामांर के नववर्ष पर मेकांग मनाया जाता है। इस त्यौहार में देश के सभी लोग भाग लेते हैं। लोग एक-दूसरे पर रंग और पानी की बौछार करते हैं। वहां के लोगों का मानना है कि आपस में एक-दूसरे पर पानी डालकर पाप धोएं जाते हैं।

दक्षिण कोरिया (कीचड़ और ठंडे पानी की होली)

भारत की होली की ही तरह दक्षिण कोरिया में बोरीयोंग मड फेस्टिवल मनाया जाता है। यह पर्व हर वर्ष जुलाई महीने में मनाया जाता है। इस दिन लोग एक-दूसरे के ऊपर मिट्टी लगाते हैं और कीचड़ फेंकते हैं।

इसके अलावा थाईलैंड में होली की ही तरह अप्रैल माह में सोंगक्रन नाम का एक पर्व मनाया जाता है। इस पर्व में सभी एक-दूसरे पर ठंडा पानी डालते हैं और नए साल का स्वागत करते हैं।

इटली (संतरे और टमाटर की होली)

होली की तरह ही इटली में फरवरी माह में बैटल ऑफ द ऑरेंज फेस्टिवल मनाया जाता है। इस पर्व में सभी एक-दूसरे पर ऑरेंज फेंकते हैं।

इसके अलावा स्पेन में होली की ही तरह ला टोमाटीना पर्व मनाया जाता है। इसमें लोग एक दूसरे के ऊपर टमाटर फेंककर अपनी खुशी का इजहार करते हैं।

जापान में होली का बहुत खास रंग

जापान में मनाए जाने वाला यह त्यौहार एक अनोखा त्यौहार माना जाता है। यह अपने अनूठेपन के लिए जाना जाता है। यह उत्सव मार्च अप्रैल के महीने में मनाया जाता है।

इस महीने में मनाए जाने के पीछे एक खास वजह भी है। यह समय चेरी के पेड़ में फूल आने का समय होता है और लोग अपने परिवार के साथ चेरी के बागों में बैठकर एक-दूसरे को बधाई देते हैं।

लोग पेड़ से गिरने वाली फूलों की पंखुड़ियों से सबका स्वागत करते हैं। पूरे दिन चलने वाले इस त्यौहार पर विशेष प्रकार का भोजन और गीत-नृत्य करने का भी रिवाज होता है।

पोलैंड में है भारत जैसा ही होली का रंग

पोलैंड में होली की तरह असना नाम का त्यौहार मनाते हैं। इस अवसर पर लोग एक-दूसरे पर रंग डालते हैं और एक-दूसरे के गले मिलते हैं। पुरानी शत्रुता भूलकर नए सिरे से रिश्ते बनाने के लिए यह श्रेष्ठ उत्सव माना जाता है।

चेकोस्लोवाकिया में भी बलिया कनौसे नाम से एक त्यौहार बिल्कुल होली के ढंग से ही मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग आपस में एक-दूसरे पर रंग डालते हैं और नाचते-गाते हैं।

जर्मनी (में रैनलैंड)

जर्मनी में रैनलैंड नाम के स्थान पर होली जैसा त्यौहार एक नहीं बल्कि 7 दिनों तक मनाया जाता है। इस समय लोग अटपटी पोशाक पहनते हैं और अटपटा व्यवहार करते हैं।

बच्चे-बूढ़े सभी एक दूसरे से मजाक करते हैं। इन दिनों किसी तरह के भेदभाव की कोई गुंजाइश नही रहती। इस दौरान किए गए हंसी-मजाक का कोई बुरा नहीं मानता है।

पेरू (होली जैसा इनकान उत्सव)

पेरू में इनकान उत्सव 5 दिनों तक चलता है। इस त्यौहार में पूरा शहर रंगीला हो जाता है। सारे लोग रंगीन परिवेश में पूरे शहर में टोलियों में घूमते रहते हैं। हर टोली की अपनी एक थीम होती है।

टोली में चलने वाले लोग ड्रम की थाप पर नाचते हुए चलते हैं। सभी टोलियों में एक-दूसरे से अच्छे साबित करने की चुनौती होती है। रात में कुजको नाम के एक महल में इकट्ठा होकर एक-दूसरे को शुभकामनाएं दी जाती हैं

ऑस्ट्रेलिया में चारों ओर नजर आते हैं तरबूज

आस्ट्रेलिया में होली की तरह ही एक रोमांचकारी त्यौहार मनाया जाता है। भारत में जैसे होली पर हर तरफ रंग ही रंग दिखाई देते हैं। वैसे ही यहां हर तरफ तरबूज ही तरबूज दिखाई देते हैं।

इस त्यौहार पर ऐसा लगता है जैसे तरबूजों की नदी बहने लगती है। इस त्यौहार में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं, जिसमें यहां के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

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आयुर्वेद के अनुसार बेहतर जीवन जीने के लिए क्या करें और क्या न करें

आयुर्वेद स्वस्थ और लंबे जीवन की कुंजी है। आयुर्वेद की जीवनशैली अपनाने से कई मौजूदा और पुरानी बीमारियों से छुटकारा पाने में मदद मिल सकती है।

आयुर्वेद समग्र चिकित्सा का एक रूप है जो शरीर और दिमाग के बीच संतुलन को बनाये रखता है। इस लेख के माध्यम से हम आपको बताने जा रहे हैं कि आयुर्वेद के अनुसार बेहतर जीवन जीने के लिए क्या करें और क्या न करें, तो चलिए जानते हैं:-

आयुर्वेदिक आहार

आयुर्वेद के अनुसार कोई भी बीमारी शरीर में पाए जाने वाले तत्त्वों के असंतुलन के कारण होती है। जब आयुर्वेद के तीनों तत्त्वों वायु, पित्त और कफ में से किसी में असंतुलन होता है तो इसे दोष कहा जाता है।

जैसे यदि किसी व्यक्ति में वात की अधिकता है तो उसे चक्कर आएगा, पित्त की अधिकता है तो सूजन होगी और कफ का असंतुलन होने पर उसे बलगम ज्यादा बनता है।

आहार की आयुर्वेद में तीन श्रेणियां हैं। सभी आहारों में सबसे शुद्ध होता है “सात्विक आहार“। यह शरीर को पोषण, मस्तिष्क को शांत, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। इसमें साबुत अनाज, ताजे फल, सब्जियां, गाय का दूध, घी, फलियां, मेवे, अंकुरित अनाज, शहद और हर्बल चाय शामिल होती है।

दूसरे नंबर पर आता है “राजसिक आहार” यह भोजन प्रोटीन आधारित और मसालेदार होता है। अत्यधिक शारीरिक श्रम करने वाले इस भोजन का इस्तेमाल कर सकते हैं।

तीसरे नंबर पर आता है “तामसिक आहार” इसमें रिफाइंड भोजन शामिल होते हैं। यह डीप फ्राई और मसालेदार होते हैं। इनमें नमक की मात्रा भी अधिक होती है। यह आलस्य बढ़ाते हैं।

सुबह जल्दी उठें

आयुर्वेद “ब्रह्म मुहूर्त” में जागने की सलाह देता है। उस समय का वातावरण प्रदूषण मुक्त रहता है। इस समय ऑक्सीजन की मात्रा सबसे अधिक होती है। प्रातः काल की सूर्य की किरणों और प्रदूषण मुक्त वातावरण के प्रभाव से शरीर से उपयोगी रसायन स्रावित होते हैं, जिससे शरीर ऊर्जावान बना रहता है।

भरपूर नींद लें

गर्मी को छोड़कर सभी मौसमों में रात को 6-8 घंटे की नींद जरूरी है। गर्मियों में रात के साथ-साथ दिन में भी 1-2 घंटे आराम करना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक गर्मी से शरीर में पानी और ऊर्जा की कमी होती है। उचित नींद लेने से शारीरिक और मानसिक थकान दूर होती है और पाचन क्रिया बेहतर होती है, जिससे शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है।

व्यायाम करें

सूर्य नमस्कार, योग या अन्य दैनिक व्यायाम से शारीरिक शक्ति और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। रक्त संचार बढ़ता है और शरीर से अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकल जाते हैं। अतिरिक्त चर्बी कम होती है।

तेल की मालिश

झुर्रियों, उम्र बढ़ने और अन्य नुकसान से खुद को बचाने के लिए हर सुबह तेल मालिश करने की कोशिश करें। सुबह तेल की मालिश करने से ऊतकों का सूखना बंद हो जाएगा और आपके मन और शरीर का पोषण मिलेगा। इसके अलावा, यह आपकी त्वचा को स्वस्थ और खूबसूरत बनाता है।

सुबह की सैर करें

सुबह सैर अवश्य करनी चाहिए। चलना व्यायाम के सर्वोत्तम रूपों में से एक है। यह आपके शरीर को बिना तनाव के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक शांति प्रदान करता है।

आयुर्वेद के अनुसार न करें खाने से जुड़ी ये गलतियां :-

खाना कभी भी खड़े होकर न खाएं

आयुर्वेद के मुताबिक खाने को आराम से मजे लेकर खाना चाहिए। कई बार जल्दबाजी और टीवी वगैरह देखने के चक्कर में हम खड़े होकर खाना खाने लगते हैं। यह बहुत ही नुक़सानदायक होता है। जब आप खड़े होकर खाते हैं तो पाचन की प्रक्रिया रुक जाती है। इसलिए खाते वक्त सही मुद्रा का होना बेहद जरूरी है, इसके अलावा पानी भी कभी खड़े होकर न पिएं।

भोजन के तुरंत बाद सोने से बचें

आयुर्वेद के अनुसार खाना खाने के तुरंत बाद सोने से बचना चाहिए। इससे शरीर में कफ और चर्बी बढ़ती है। नींद के दौरान शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, जिससे पाचन क्रिया भी धीमी हो जाती है। ऐसे में अगर आप खाना खाने के तुरंत बाद सो जाते हैं तो पूरा खाना ठीक से नहीं पच पाता है।

गर्मियों में बहुत ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए

गर्मियों में हम सभी को ठंडा पानी पीने का मन करता है और हम ठंडा पानी पीते हैं जबकि यह गलत है। ऐसा करने से  शरीर के तापमान को अचानक झटका लगता है। इससे गैस्ट्रिक जूस का फ्लो बंद हो जाता है। आयुर्वेद के हिसाब से पानी कमरे के तापमान पर होना चाहिए और धीरे-धीरे पीना चाहिए ताकि शरीर के हर अंग तक पहुंच सके।

सही हेल्दी डायट चुनें

लोग सोचते हैं कि हेल्दी डायट लेनी है तो सबसे पहले इससे फैट हटा देना चाहिए जबकि यह सच नहीं है। आयुर्वेद के मुताबिक शरीर को कुछ फैट्स की भी जरूरत होती है। अगर आप वजन कम करना चाहते हैं तो फैट बिलकुल छोड़ने के बजाय अपने लिए सही फैट चुनें।

भोजन के बाद व्यायाम करने से बचें

भोजन के तुरंत बाद व्यायाम करना स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। आयुर्वेद के अनुसार, ये सभी गतिविधियां वात को बढ़ाती हैं और पाचन में रुकावट पैदा करती हैं। इससे शरीर में सूजन, पोषण का अधूरा अवशोषण और भोजन के बाद बेचैनी हो सकती है।

भोजन के बाद स्नान न करें

आयुर्वेद के अनुसार हर काम को करने का एक निश्चित समय होता है। अगर इसे गलत समय पर किया जाए तो शरीर को नुकसान पहुंचता है। आयुर्वेद में भोजन करने के बाद स्नान नहीं करने की सलाह दी गई है। ऐसा कहा जाता है कि भोजन करने के बाद अगले दो घंटे तक स्नान नहीं करना चाहिए।

शरीर में अग्नि तत्व भोजन के पाचन के लिए जिम्मेदार होता है, इसलिए जब आप भोजन करते हैं तो अग्नि तत्व सक्रिय हो जाता है और प्रभावी पाचन के लिए रक्त संचार तेज हो जाता है। लेकिन जब आप तुरंत नहाते हैं तो इस समय शरीर का तापमान कम होने लगता है और पाचन क्रिया भी धीमी हो जाती है।

रात में कभी भी दही का सेवन न करें

रात में किसी भी कीमत पर दही का सेवन नहीं करना चाहिए। दही की जगह छाछ ले सकते हैं। दही शरीर में कफ होने की समस्या को बढ़ा सकता है, जिसके चलते नाक में बलगम के गठन की अधिकता पैदा हो सकती है।

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बेटे ने CM चन्नी को हराया, मां नहीं छोड़ेंगी सफाईकर्मी की नौकरी, आप देखकर रह जाएंगे दंग!

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पंजाब में आम आदमी पार्टी ने एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। (आप) के विधान सभा सदस्य (एमएलए) लाभ सिंह उगोके ने भारी मतों से जीत हासिल की है आम आदमी पार्टी ने 117 सीटों में से 92 सीटें हासिल की हैं।

भदौर की आरक्षित सीट से लाभ सिंह उगोके के सामने चरणजीत सिंह चन्नी थे। पहले उगोके खुद एक मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान में काम करते थे। बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि या अनुभव के लाभ सिंह ने चन्नी को 37,558 वोटों के अंतर से हरा दिया।

जहाँ एक ओर लाभ सिंह उगोके ने निवर्तमान मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को हरा कर सभी को चौंका दिया है वहीँ दूसरी ओर उनकी मां के सफाईकर्मी की नौकरी न छोड़ेंने के बयान ने भी सभी को हैरान कर दिया है।

इस पोस्ट में हम जानेंगे कि क्यों लाभ सिंह उगोके की मां सफाईकर्मी की नौकरी नहीं छोड़ना चाहती :-

जीवन का एहम हिस्सा है “झाड़ू”

दरअसल लाभ सिंह की मां बलदेव कौर एक संविदा (contract) सफाई कर्मचारी हैं। वह बेटे के जीतने के एक दिन बाद ही काम पर चली गईं जिसे देखकर सहकर्मी हैरान रह गए। जब उनसे पूछा कि आप आज काम पर क्यों आई हैं, तो उन्होंने कहा, “सबने सोचा कि मैं अपने बेटे की जीत की ख़ुशी में कम से कम एक दिन तक तो काम पर नहीं आऊंगी, लेकिन मैंने साफ कह दिया कि मेरा बेटा विधायक बना है, मैं नहीं। मैं अभी भी एक संविदा सफाई कर्मचारी हूँ और मुझे अपनी नौकरी क्यों छोड़नी चाहिए?”

उन्होंने कहा, “हमारे परिवार ने हमेशा पैसा कमाने के लिए कड़ी मेहनत की है। मेरे बेटे के चुनाव जीतने के बावजूद, मैं स्कूल में स्वीपर के रूप में काम करना जारी रखूंगी।” आप उम्मीदवार के रूप में अपने बेटे की जीत से खुश बलदेव कौर ने कहा कि ‘झाड़ू’ मेरे जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है।

“मैं जो कर रही हूँ, उसपर मुझे गर्व है। जब हमारा परिवार गुज़ारे के लिए संघर्ष कर रहा था, तब मेरी नौकरी ही आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत रही है” बलदेव पिछले 22 सालों से बरनाला ज़िले के अपने पैतृक गांव उगोके में स्कूल में सफाईकर्मी का काम कर रही हैं।

नवनिर्वाचित विधायक के पिता दर्शन सिंह, जो मजदूरी का काम करते थे, उन्होंने कहा कि परिवार अपनी जीवन शैली नहीं बदलेगा और पहले की तरह ही रहेगा। वह चाहते हैं कि उनका बेटा अपने परिवार के बजाय लोगों के कल्याण पर ध्यान केंद्रित करे।

ऐतिहासिक है ये जीत

इस जीत को इसलिए भी ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि पंजाब के तीन पूर्व मुख्यमंत्री अपने ‘गढ़’ से हार गए जिसमें पटियाला अर्बन में कैप्टन अमरिंदर, लाम्बी में प्रकाश सिंह बादल और भदौर एवं चमकौर साहिब में चरणजीत सिंह चन्नी को हार का मुंह देखना पड़ा।

अपने एक चुनावी भाषण में लाभ सिंह उगोके ने कहा था,

“1952 के चुनाव में भदौर सीट पर राजा निर्पाल सिंह और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के अर्जुन सिंह के बीच मुकाबला हुआ था। निर्पाल सिंह, एक राजा थे। महलों, कारों और भारी धन के मालिक थे। उनका अभियान भव्य था। दूसरी ओर भूमिहीन किसानों के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अर्जुन सिंह थे।

एक विनम्र परिवार से आए। बैलगाड़ियों पर प्रचार किया। भारी शक्ति प्रदर्शन के बावजूद, निर्पाल सिंह चुनाव हार गए और कॉमरेड अर्जुन सिंह प्रचंड बहुमत से जीत गए. इस बार भी ऐसा ही होगा।”

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कंदोवन- दुनिया का एक ऐसा अजीबोगरीब गांव, जहां लोग घोंसलों में रहते हैं

दुनिया भर में आपको बहुत से अजीबोगरीब लोग और जगहें देखने को मिलेंगी। अगर किसी से पूछा जाए कि घोंसले में कौन रहता है, तो लगभग सभी का जवाब होगा -“पक्षी”। लेकिन अगर कोई कहे कि इंसान भी घोंसले में रहते हैं तो इस पर कोई भी यकीन नहीं करेगा क्योंकि हर इंसान का एक आलीशान घर का सपना होता है।

हर कोई चाहता है कि उसका अपना घर हो और उसमें सारी सुख-सुविधाएं उपलब्ध हों। लेकिन इस लेख में हम आपको इंसानों के एक ऐसे घर के बारे में बताने रहे हैं, जिसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे। इसे गाँव का नाम है कंदोवन। तो चलिए जानते हैं।

कंदोवन – पुरानी परम्परा

दरअसल, ईरान के कंदोवन गांव के लोगों के बीच घोंसलानुमा घरों में रहने की परंपरा काफी पुरानी है। यह गांव अपनी परंपरा और अद्भुत रहन-सहन के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। इस गांव के लोग पक्षियों की तरह मिट्टी के घोंसलेनुमा घर बनाकर रहते हैं।

कंदोवन नाम कंदो के बहुवचन जिसका मतलब मधुमक्खियों का घोंसला होता है, पर रखा गया है। दिलचस्प बात यह है कि यहाँ लोग एक दो साल से नहीं बल्कि पिछले 700 सालों से इन्हीं घोंसलानुमा घरों में रहते आ रहे हैं। ये लोग कई पीढ़ियों से इन घरों में रह रहे हैं।

 

क्यों बनाये गए हैं ऐसे घर

कंदोवन के प्रारंभिक निवासी यहां हमलावर मंगोलों से बचने के लिए आए थे।  दरअसल यहां मंगोलों का दहशत काफी समय पहले से ही थी। यहां के पूर्वजों ने मंगोलों के हमले से अपनी जान बचाने के लिए दूरदराज़ के इस क्षेत्र में ऐसे घर बनाए थे।

हमलावर मंगोलों से बचने के लिए इन लोगों के पूर्वजों ने ज्वालामुखी की चट्टानों को खोद डाला और इसे ही अपना स्थायी घर बना लिया।

वातावरण के अनुकूल

इन घरों की एक खास बात यह भी है कि यह घर वातावरण के अनुकूल रहते हैं। यहां ठंड के मौसम में गर्मी और गर्मी में ठंडक का अहसास होता है। यह घर देखने में तो काफी अजीब लगते हैं लेकिन काफी आरामदायक होते हैं। 700 साल पुराने इस गांव के लोगों को ठंड में हीटर और गर्मी में एसी की जरूरत नहीं पड़ती।

कंदोवन – पर्यटन के लिए हो रहा मशहूर

कंदोवन अब यह ईरान के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। चट्टानों को खोदकर बने घर, यहां आने वालों पर्यटकों के लिए अद्भुत नजारा प्रस्तुत करते हैं। कंदोवन के निवासियों का मुख्य पेशा कृषि और पशुपालन है। दुनिया भर में यह गांव अपने अनोखे घरों के लिए पहचाना जाने लगा है।

अब ईरान के इस गांव ने एक बड़े कस्बे की शक्ल ले ली है। खास बात यह है कि इनमें ज्यादातर मकान चार मंजिला हैं। यहां के लोगों की कमाई का जरिया कृषि, भेड़ पालन है। लेकिन अच्छी कमाई टूरिज्म से ही होती है। यहां के लोग हैंडीक्रॉफ्ट बनाकर बेचते हैं। लोगों ने अपने घरों को हेरिटेज होटल में बदल दिया है।

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जानिए शेन वॉर्न के बारे में कुछ ऐसे तथ्य जो आपने पहले कहीं नहीं सुने होंगे!!

शेन वॉर्न क्रिकेट इतिहास के सबसे महान गेंदबाजों में से एक थे। वह अपनी लोकप्रिय लेग-स्पिन गेंदबाजी के लिए जाने जाते थे, उनकी इसी अद्भुत गेंदबाजी ने ऑस्ट्रेलिया को कई शानदार जीत दिलाई थी।

आज इस लेख में हम आपको शेन वॉर्न से जुड़े कुछ अनसुने तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं, चलिए जानते हैं:-

  • शेन वॉर्न का जन्म 13 सितंबर 1969 को फ़र्नट्री गली, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया में हुआ था। उनके पिता का नाम कीथ वॉर्न और माता का नाम ब्रिजेट था।
  • उनका पूरा नाम शेन कीथ वॉर्न था। वॉर्न की शुरुआत से लेकर ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में हुई थी। उनकी पढ़ाई की शुरुआत हैम्पटन हाई स्कूल मेलबर्न में हुई थी।
  • वार्न ने वास्तव में अपने एथलेटिक करियर की शुरुआत एक फुटबॉलर के रूप में की थी लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

  • 1992 में शेन वॉर्न ने अपना पहला टेस्ट मैच खेला था। शुरुआत में वो लेग स्पिन और ऑफ स्पिन के मिश्रण के साथ गेंदबाजी करते थे।
  • शेन वार्न के बारे में सबसे प्रसिद्ध तथ्यों में से एक यह है कि उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में किसी भी गेंदबाज द्वारा लिए गए सबसे अधिक विकेट (708) का विश्व रिकॉर्ड बनाया था। वॉर्न ने 2004 से 2007 के वर्षों में श्रीलंकाई गेंदबाज मुरलीधरन के साथ प्रतिस्पर्धा की, दोनों के बीच कई बार रिकॉर्ड बदलते रहे, जब तक कि 2007 में वॉर्न अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से सेवानिवृत्त नहीं हुए, और रिकॉर्ड मुरलीधरन ने जीत लिया।
  • शेन वॉर्न और मुरलीधरन को सम्मान देने के लिए 2007-2008 में Australia-Sri Lanka Test cricket series का नाम ‘वॉर्न-मुरलीधरन ट्रॉफ़ी’ रखा गया था। ये ख़ास ट्रॉफ़ी इस सीरीज़ के विजेता को दी गई थी।
  • आपको जानकर हैरानी होगी कि शेन वॉर्न एक मात्र ऐसे खिलाड़ी हैं, जिनके नाम बिना शतक के टेस्ट मैचों में सबसे ज़्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड दर्ज है। उन्होंने 1992 से लेकर 2007 के बीच अपने टेस्ट मैच करियर में बिना शतक के कुल 3,154 रन बनाए थे।
  • शेन वॉर्न गरीब व जरूरतमंद बच्चों के लिए एक चैरिटी फाउंडेशन भी चलाते थे जिसके लिए आए दिन वो किसी ना किसी इवेंट के जरिए पैसे जुटाया करते थे। उनकी संस्था का नाम शेन वॉर्न फाउंडेशन था।
  • इस क्रिकेटर का उनकी जिंदगी में कई लड़कियों के साथ नाम जुड़ा। जहां तक बात है शादी की तो उन्होंने सिमोन कैलेहान के साथ 1995 में शादी की और 2005 में दोनों अलग भी हो गए। इसके बाद वह हॉलीवुड अभिनेत्री लिज हर्ले के साथ चर्चा रहे, दोनों की सगाई भी हो गई थी लेकिन कुछ समय के बाद यह रिश्ता भी खत्म हो गया।
  • वॉर्न का विवादों के साथ भी गहरा नाता रहा था उनको 2003 आईसीसी विश्व कप के दौरान डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाया गया था। जिस वजह से उन्हें वर्ल्ड कप से बाहर होना पड़ा था। इस बात को उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि उन्होंने फ्लूइड टेबलेट का सेवन किया था। उनका कहना था कि उन्होंने यह दवा अपनी मां के कहने पर ली थी। इसके बाद उन पर एक साल का प्रतिबंध लगा दिया गया था।
  • सितंबर 2017 में एक पॉर्न स्टार वलेरी फॉक्स ने उन पर लंदन के नाइट क्लब में हाथापाई का आरोप लगाया था। वलेरी फॉक्स ने तब चोटिल आंखों के साथ अपनी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी जिसके कैप्शन में लिखा था, “आप मशहूर हस्ती हैं, इसका मतलब ये बिल्कूल नहीं कि किसी भी औरत पर हाथ उठाया जा सकता है”।
  • शेन वॉर्न न केवल एक क्रिकेट खिलाड़ी थे, बल्कि उन्हें खेल में सट्टेबाजी का भी शौक था। शेन वार्न का सट्टेबाजी उद्योग के साथ पहला ज्ञात संबंध 1994-95 में जुड़ा था जब उन्हें और टीम के एक सदस्य “मार्क वॉ” पर ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड द्वारा एक सट्टेबाज को आगामी मैच के बारे में जानकारी देने के लिए जुर्माना लगाया गया था। क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भी वार्न कई अन्य सट्टेबाजी कंपनियों के साथ जुड़े हुए थे, जिनमें Dafabet और 888poker शामिल थी।
  • शेन वार्न ने एक बार ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय टेलीविजन पर यह कहा था कि वह एलियंस में विश्वास करते हैं। उन्होंने यह एक टॉक-शो के दौरान कहा था, जिसे “आई एम ए सेलेब्रिटी” “गेट मी आउट ऑफ हियर” (“I’m a Celebrity…Get Me Out of Here”) के रूप में जाना जाता है। शेन वार्न न केवल एलियंस में विश्वास करते थे, बल्कि उनका मानना था कि पूरी मानव प्रजाति किसी न किसी तरह एलियंस से निकली है।

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आखिर क्या है कारण रूस – यूक्रेन युद्ध का ?

रूस-यूक्रेन संकट अब तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 24 फरवरी को यूक्रेन के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। रुसी सेना ने कई दिशाओं से यूक्रेन पर आक्रमण किया और अब इसे नाटो के पूर्वी विस्तार को समाप्त करने और रूस की मांगों पर यूरोप में युद्ध की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। इस पोस्ट में हम जानेगें कि आखिर क्या कारण है रूस-यूक्रेन के युद्ध का :-

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

रूस और यूक्रेन के बीच तनाव बरसों पुराना है। हालांकि, 2021 में तनाव बढ़ गया जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन से यूक्रेन को नाटो में शामिल होने का आग्रह किया। यूक्रेन 44 मिलियन लोगों का एक लोकतांत्रिक देश है, जिसका इतिहास 1,000 से अधिक वर्षों का है। यह रूस के बाद क्षेत्रफल के हिसाब से यूरोप का सबसे बड़ा देश भी है। सोवियत संघ के पतन के बाद, उसने मास्को से स्वतंत्रता के लिए मतदान किया। पुतिन यूक्रेन को दुश्मनों द्वारा रूस से उकेरी गई एक कृत्रिम रचना मानते हैं। उन्होंने यूक्रेन को पश्चिम की कठपुतली भी बताया है। ज़ेलेंस्की के नाटो का हिस्सा बनने के अनुरोध से रूस नाराज़ हो गया और उसने यूक्रेन की सीमा के पास सैनिकों को रखना शुरू कर दिया। 10 नवंबर 2021 को, अमेरिका ने यूक्रेनी सीमा के पास रूसी सेना की गतिविधियों की सूचना दी। 28 नवंबर को, यूक्रेन ने कहा कि रूस जनवरी के अंत या फरवरी की शुरुआत में लगभग 92,000 सैनिकों को एक आक्रामक हमले के लिए तैयार कर रहा है। हालांकि, मास्को ने इसका खंडन किया और कीव पर अपने स्वयं के सैन्य निर्माण का आरोप लगाया।

क्या है कारण फ़रवरी 2022 युद्ध का

युद्ध का कारण यह है कि यूक्रेन उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन यानी नाटो का सदस्य देश बनना चाहता है और रूस इसका विरोध कर रहा है। नाटो अमेरिका और पश्चिमी देशों के बीच एक सैन्य गठबंधन है, इसलिए रूस नहीं चाहता कि उसका पड़ोसी देश नाटो का मित्र बने। नाटो देशों पर ठने इस पूरे विवाद ने एक नई युद्ध की संभावना को जन्म दिया है जिसमें एक से ज्यादा देश भाग ले सकते हैं। रूस ने यूक्रेन से लगी 450 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अपने 1,25,000 सैनिकों को तैनात किये हैं। इन जवानों को यूक्रेन की पूर्वी और उत्तर-पूर्वी सीमा पर तैनात किया गया है। रूस ने काला सागर में अपने युद्धपोत भी तैनात किए हैं जो खतरनाक मिसाइलों से लैस हैं। 2014 में रूस ने यूक्रेन में एक महत्वपूर्ण बंदरगाह क्षेत्र क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था और तब से संघर्ष कभी खत्म ही नहीं हुआ। रूस ने यूक्रेन की सीमा पर ड्रोन भी तैनात किए हैं, जो पलक झपकते ही किसी भी सैन्य अड्डे को तबाह कर सकते हैं। रूस ने यूक्रेन को चारों तरफ से घेर लिया है। रूस-यूक्रेन संघर्ष ने दुनिया को दो गुटों में बांट दिया है। एक तरफ रूस है, जिसे चीन जैसे देशों का समर्थन प्राप्त है और दूसरी तरफ यूक्रेन है, जिसे अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य नाटो देशों से समर्थन मिल रहा है।

गैस पाइपलाइन भी है विवाद एक वजह

दरअसल रूस पाइपलाइन के जरिए गैस को यूरोप तक भेजता था। जिन देशों से होकर ये पाइपलाइन जाती थी, रूस को उन्हें ट्रांजिट शुल्क देना पड़ता था जिसमें यूक्रेन भी शामिल था। एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 तक रूस हर साल करीब 33 बिलियन डॉलर का भुगतान यूक्रेन को कर रहा था। ये राशि यूक्रेन के कुल बजट की 4 फीसदी थी। रूस को समझ आ गया था कि युद्ध के हालात में यूक्रेन उसके पैसे का ही इस्तेमाल करेगा और जिसके चलते रूस ने एक नया प्लान बनाया और नॉर्ड स्ट्रीम -2 गैस पाइपलाइन की शुरूआत की गई। इसमें वेस्टर्न रूस से नॉर्थ ईस्टर्न जर्मनी तक बाल्टिक महासागर के रास्ते 1200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई। वैसे तो इसमें करीब 10 बिलियन डॉलर का खर्च आया, लेकिन अब उसे यूक्रेन को कोई ट्रांजिट शुल्क नहीं देना पड़ता था। अब रूस जर्मनी तक सीधे गैस भेज सकता है वो भी बिना कोई ट्रांजिट शुल्क दिए। यह भी एक वजह बन गई जिससे यूक्रेन और पोलैंड जैसे देश रूस से नाराज हो गए।

रूस क्यों नहीं चाहता कि यूक्रेन नाटो देशों में शामिल हो?

नाटो एक सैन्य समूह है जिसमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे 30 देश शामिल हैं। अब रूस के सामने चुनौती यह है कि उसके कुछ पड़ोसी देश पहले ही नाटो में शामिल हो चुके हैं। इनमें एस्टोनिया और लातविया जैसे देश हैं, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा थे। अब अगर यूक्रेन भी नाटो का हिस्सा बन गया तो रूस हर तरफ से अपने दुश्मन देशों से घिर जाएगा और अमेरिका जैसे देश उस पर हावी हो जाएंगे। अगर यूक्रेन नाटो का सदस्य बन जाता है और रूस भविष्य में उस पर हमला करता है तो समझौते के तहत इस समूह के सभी 30 देश इसे अपने खिलाफ हमला मानेंगे और यूक्रेन की सैन्य सहायता भी करेंगे। रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन ने एक बार कहा था कि ‘यूक्रेन को खोना रूस के लिए एक शरीर से अपना सिर काट देने जैसा होगा’। यही वजह है कि रूस नाटो में यूक्रेन के प्रवेश का विरोध कर रहा है। यूक्रेन रूस की पश्चिमी सीमा पर स्थित है। जब 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस पर हमला किया गया तो यूक्रेन एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जहां से रूस ने अपनी सीमा की रक्षा की थी। अब अगर यूक्रेन नाटो देशों के साथ चला गया तो रूस की राजधानी मास्को, पश्चिम से सिर्फ 640 किलोमीटर दूर होगी। फिलहाल यह दूरी करीब 1600 किलोमीटर है। यह भी पढ़ें :-  द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के “साल बाद” तक लड़ता रहा यह जापानी सिपाही

लड़के का वेश बनाकर महाराजा के साथ विदेश घूमने गई थी ये ‘महारानी’

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अगर आजादी से पहले भारत के राजा, महाराजाओं के किस्सों की बात की जाए तो वे बेहद गजब-गजब थे। वे कभी कभी ऐसे काम कर डालते थे जिससे हरकोई चकित रह जाता था। ऐसा ही एक काम महाराजा कपूरथला ने किया था। वो अपनी सबसे सुंदर रानी को विदेश एक पुरुष बनाकर ले गए थे।

दरअसल यह उस समय की बात है जब ब्रिटिश राज का जमाना था। देश में वायसराय सबसे बड़ा अधिकारी होता था जिसकी बात राजा, महाराजाओं को भी माननी पड़ती थी। उस समय लार्ड कर्जन वायसराय थे।

महाराजा कपूरथला जगजीत सिंह ने जब विदेश जाने के लिए लार्ड कर्जन से की इजाजत मांगी तो उन्हें एक शर्त पर इजाजत मिली कि वो अपने साथ केवल कुछ सहायक लेकर यूरोप जा सकते हैं, लेकिन किसी महारानी को नहीं,

परन्तु वे अपनी रानी को साथ ले जाना चाहते थे जिसके लिए उन्होंने एक योजना बनाई। जिस रानी को राजा अपने साथ ले जाना चाहते थे उसका पूरा नाम रानी कनारी साहिबा था।

महारानी कनारी को महाराजा बहत प्यार करता था। चूंकि कनारी महाराजा के साथ महारानी के तौर पर यूरोप नहीं जा सकती थी, इसलिए वह अचकन, पाजामा और पगड़ी पहन कर एक सिख लड़के की वेशभूषा में साथ गई थी।

क्यूंकि उन दिनों पासपोर्ट नहीं लेना पड़ता था इसलिए वह लड़के के वेश में भारत तथा यूरोप के सरकारी कर्मचारियों की नजरों से बच कर यूरोप जा पहुंची।

युरोप प्रवास में महाराजा और महारानी ने खूब मौज की। जिस समय उसके सामने कोई और व्यक्ति न होता तब महारानी औरतों के कपड़े पहन लेती थी।

फ्रांस के शाही खानदानों के मेहमानों के तौर पर महाराजा और महारानी को खास होटलों में ठहराया जाता था। वे लोग महाराज के इस रहस्य से परिचित थे। महारानी कनारी परम सुंदरी थी, वह कांगड़ा के राजपूत परिवार से सम्बन्ध रखती थी।

उसके गर्भ से एक पुत्र तथा एक पुत्री का जन्म हुआ। पुत्र का नाम था महाराज कुमार करमजीत सिंह, जो एक सुंदर और सुसंस्कृत राजकुमार था तथा पुत्री का नाम था महाराज कुमारी अमृतकौर जिसकी शादी हिमाचल प्रदेश की एक महत्वपूर्ण रियासत मंडी के राजा जोगिंद्र सेन से हुई।

भारत की स्वतंत्रता के बाद जब रियासतों को भारत गणराज्य में शामिल कर लिया गया तब मंडी के इसी राजा को भारत के राजदूत के रूप में नियुक्त करके ब्राजील भेजा गया।

मंडी के राजा जोगिंद्र सेन के साथ फरवरी, 1923 को महाराज कुमारी अमृतकौर की शादी हुई। शादी की रस्में पूरे ठाट-बाट के साथ पूरी की गईं।

पंजाब के गवर्नर तथा उसकी पत्नी लेडी मैक्लेगन कई राजे-महाराजे, महारानियां राजकुमारियां, रियासतों के मंत्री आदि इस शादी में शामिल हुए।

दूल्हे राजा को एक सजे हुए हाथी पर बैठा कर कपूरथला स्टेशन से एक महल तक लाया गया था। आतिशबाजी छोड़ी गई और रोशनी की गई। कपूरथला के राजमहल में शानदार दावतों के दौर भी चले। हजारों गरीबों को खाना भी खिलाया गया और ईनाम भी बांटा गया।

आगे महाराज कुमारी अमृतकौर के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका प्यार का नाम टीबू था। इसे ही बड़े होकर कपूरथला रियासत का महाराजा बनना था। यही सुंदर राजकुमार पढ़-लिख कर जवान हो गया मगर उस समय तक उसकी मां पुरे तौर पर शराबी बन चुकी थी।

शराब पीने की लत उसे अपनी मां महारानी कनारी से लगी थी। फिर महाराज कुमारी अमृतकौर अमरीका चली गई और बरसों तक वहां अकेली रही। उसने अपने पति से कानूनी तौर पर संबंध विच्छेद कर लिया था। उसके पति मंडी के राजा ने बाद में राजपिपला के महाराज के एक निकट संबंधी सरदार पिंकी की लड़की से शादी की।

अमृतकौर की मृत्यु अमरीका में बड़ी दर्दनाक स्थितियों में हुई। यह था उस नाजोंपली राजकुमारी का दुखद अंत जिसकी बुद्धि को पाश्चात्य शिक्षा ने भ्रष्ट कर डाला था।

यूरोप की राजधानियों में कई महीने बिताने के बाद जब महाराजा और महारानी कनारी भारत लौटे और उनका हवाई जहाज बम्बई में उतरा तो बम्बई के गवर्नर के सैनिक सचिव ने वाइसराय की ओर से उनका स्वागत किया था।

इस स्वागत समारोह में भी महारानी को कोई नहीं पहचान पाया क्योंकि इस समय भी वह सिख लड़के की वेशभूषा में ही थी। इससे पता चलता है कि उस समय के महाराजा लोग कितने चालाक थे और अपनी सनकें पूरी करने की खातिर वे वाइसराय तथा अन्य सरकारी अफसरों की आंखों में किस तरह धूल झोंका करते थे।

पंजाब केसरी से साभार

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भारत की 10 सबसे लम्बी नदियाँ

भारत 10 की सबसे लम्बी नदियाँ कौन सी हैं? यह प्रश्न जितना आसान है इसका उत्तर उतना ही कठिन है। दरअसल यहाँ तीन प्रश्न दिमाग में आते हैं। एक, कि भारत में से होकर बहने वाली सबसे लंबी नदियाँ कौन सी हैं?

दूसरा, कि भारत के अंदर से शुरू होकर भारत ही के अंदर बहने वाली सबसे लंबी नदियाँ कौन सी हैं। और तीसरा कि किसी भी नदी का भारत के अंदर बहने वाले हिस्से ही लंबाई के हिसाब से कौन सी नदी शीर्ष पर है?

यह पोस्ट पहले प्रश्न के उत्तर के बारे में हैं। भारत के अंदर ही अंदर बहने वाली सबसे लंबी नदियाँ कौन सी हैं इसके लिए इस लेख को पढ़ें।

भारत में नदियाँ

भारत में छोटी-बड़ी लगभग 200 मुख्य नदियां हैं। इनमें पानी प्रवाह के हिसाब से गंगा नदी देश की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है। जबकि तय दूरी के हिसाब यानि लंबाई के हिसाब सिन्धु नदी सबसे बड़ी नदी है। वहीं राजस्थान में मात्र 90 कि.मी. बहने वाली अरवरी नदी को भारत की सबसे छोटी नदी माना जाता है।

लम्बी नदियाँ
नदियां देश की जीवन रेखाएँ होती है। (चित्र: ऋषिकेश में गंगा नदी पर बना लक्ष्मण झूला पल)

खैर ये थी ‘भारत की 10 सबसे लंबी नदियाँ’ शीर्षक की इस पोस्ट में नदियों के बारे में कुछ चर्चा। अब सीधा मुद्दे पर आते हैं। तो आइये देखते हैं भारत की 10 सबसे लम्बी नदियाँ कौन सी हैं। (नदियों के बारे में अधिक जानकारी और तथ्यों के लिए इस पोस्ट को पढ़ें।)

सिंधु नदी (2900 KM)

सिंधु नदी भारत की सबसे लंबी नदी हैं. सिंधु नदी का उद्गम तिब्बत में स्थित सिन-का-बाब नामक जलधारा से हुआ है. सिंधु नदी की लम्बाई 2900 किलोमीटर हैं. भारत में सिंधु नदी तिब्बत और कश्मीर के बीच बहती हैं. सिंधु नदी नंगा पर्वत के उतरी भाग से होकर दक्षिण पश्चिम में पाकिस्तान के बीचो-बीच से गुजरती है. सिंधु नदी की पांच उपनदियाँ हैं ईरावती, विपासा, वितस्ता, चन्द्रभागा एंव शतद्रु.  इनमें से सबसे बड़ी नदी का नाम शतद्रु उपनदी हैं.

सिंधु नदी – हजारों साल पुरानी सभ्यता की गवाह नदी

ब्रह्मपुत्र नदी (2700 KM)

ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत, भारत, और बांग्लादेश से होकर बहती है. ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम तिब्बत में स्थित चेमायुंग दुंग नामक हिमवाह से हुआ है. ब्रह्मपुत्र नदी की लम्बाई 2700 किलोमीटर हैं. ब्रह्मपुत्र नदी को कई नामों से जाना जाता है जैसे कि तिब्बत में इसका नाम सांपो, अरुणाचल में डिहं और असम में ब्रह्मपुत्र है. ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश की सीमा में बहती गंगा की उप नदी पद्मा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है. ब्रह्मपुत्र नदी की पांच उपनदियाँ हैं सुवनश्री, तिस्ता, तोर्सा, लोहित, बराक आदि.

भारत के प्राचीन इतिहास से जुड़ी है ब्रह्मपुत्र नदी

गंगा नदी (2525 KM)

गंगा नदी भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी मानी जाती हैं. गंगा नदी भारत, नेपाल और बांग्लादेश में बहती है. गंगा नदी की लम्बाई 2,525 किलोमीटर हैं. गंगा नदी की आठ उपनदियाँ है महाकाली, करनाली, कोसी, गंडक, घाघरा, यमुना, सोन, महानंदा आदि.

आखिर क्या है गंगा नदी के पवित्र होने का रहस्य

गोदावरी नदी (1450 KM)

गोदावरी नदी भारत की प्रमुख नदियों में से एक हैं. गोदावरी नदी का उद्गम पश्चिमघाट की पर्वत श्रेणी के अन्तर्गत त्रिम्बक पर्वत से हुआ है. इसकी लम्बाई 1,450 किलीमीटर हैं. गोदावरी की उपनदियाँ हैं प्राणहिता, इन्द्रावती, मंजिरा. गोदावरी नदी महाराष्ट, तेलंगना और आंध्र प्रदेश से बहते हुए राजहमुन्द्री शहर के समीप बंगाल की खाड़ी मे जाकर गिरती है.

जानिए गोदावरी नदी के अनेक नामों की विशेषता के बारे में

नर्मदा नदी (1310 KM)

नर्मदा नदीलम्बी नदियाँनर्मदा नदी  की उत्पप्ति महाकाल पर्वत के अमरकंटक शिखर से हई है. नर्मदा नदी भारत में मध्य प्रदेश और गुजरात में बहने वाली प्रमुख नदी है. नर्मदा नदी की लम्बाई 1310 किलोमीटर हैं. नर्मदा नदी पश्चिम की तरफ जाकर खंभात की खाड़ी में गिरती है और इसे उत्तरी और दक्षिणी भारत की सीमा रेखा माना जाता है.

पढ़ें: रोचक तथ्य- म.प्र. और गुजरात की जीवन रेखा नर्मदा नदी

कृष्णा नदी (1290 KM)

कृष्णा नदी की उत्पप्ति महाराष्ट्र राज्य के महाबलेश्वर पर्वत से हई है. यह नदी दक्षिण भारत की प्रमुख नदी है. कृष्णा नदी की लम्बाई 1290 हैं. यह दक्षिण-पूर्व में बहती हई बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती है. कृष्णा नदी की चार उपनदियाँ तुंगभद्रा, घाटप्रभा, मूसी और भीमा आदि है.

जानिए कृष्णा नदी का सबसे लम्बा सफर

यमुना नदी (1211 KM)

यमुना नदी, गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है. यमुना नदी यमुनोत्री जगह से निकलती है और इलाहाबाद के प्रयाग जगह में गंगा से मिल जाती है. यमुना नदी की पांच उपनदियाँ चम्बल, सेंगर, छोटी सिन्ध, बतवा और केन आदि हैं. यमुना नदी की लम्बाई 1211 किलोमीटर हैं.

ताजमहल के किनारे बहती यमुना नदी

महानदी (855 KM)

महानदी भारत में छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सबसे बड़ी नदी है. महानदी को कई नामों से जाना जाता है जैसे कि चित्रोत्पला, महानन्दा तथा नीलोत्पला. महानदी की उत्पप्ति रायपुर में सिहावा नामक पर्वत श्रेणी से हुआ है. सिहावा से बंगाल की खाड़ी में गिरने तक महानदी लगभग 855 किलोमीटर की दूरी तय करती हैं. महानदी की पांच उपनदियाँ हैं पैरी, सोंढुर, शिवनाथ, हसदेव, अरपा, जोंक, तेल आदि.

उड़ीसा का शोक – छत्तीसगढ़ की महानदी

कावेरी नदी (765 KM)

कावेरी नदी, पश्चिमी घाट के ब्रह्मगिरी पर्वत से निकली है. यह कनार्टक और तमिलनाडु की प्रमुख नदी है. कावेरी नदी को दक्षिण भारत की गंगा भी कहा जाता है. कावेरी नदी की लम्बाई 765 किलोमीटर हैं. सिमसा, हिमावती, भवानी इसकी उपनदियाँ है.

कर्नाटक के ब्रह्मगिरि पर्वत से बहती कावेरी नदी

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तापी नदी (724 KM)

तापी नदी मध्य प्रदेश राज्य के बैतूल जिले से निकलती है. यह पश्चिमी भारत की प्रसिद्ध नदी है. तापी नदी महाराष्ट्र के खानदेश पठार एवं सूरत के मैदान को पार करती हई अरब सागर में मिलती है. तापी नदी की लम्बाई 724 किलोमीटर हैं.

मध्य प्रदेश के बैतूल से बहती तापी नदी