जानिए शेन वॉर्न के बारे में कुछ ऐसे तथ्य जो आपने पहले कहीं नहीं सुने होंगे!!

शेन वॉर्न क्रिकेट इतिहास के सबसे महान गेंदबाजों में से एक थे। वह अपनी लोकप्रिय लेग-स्पिन गेंदबाजी के लिए जाने जाते थे, उनकी इसी अद्भुत गेंदबाजी ने ऑस्ट्रेलिया को कई शानदार जीत दिलाई थी।

आज इस लेख में हम आपको शेन वॉर्न से जुड़े कुछ अनसुने तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं, चलिए जानते हैं:-

  • शेन वॉर्न का जन्म 13 सितंबर 1969 को फ़र्नट्री गली, विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया में हुआ था। उनके पिता का नाम कीथ वॉर्न और माता का नाम ब्रिजेट था।
  • उनका पूरा नाम शेन कीथ वॉर्न था। वॉर्न की शुरुआत से लेकर ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में हुई थी। उनकी पढ़ाई की शुरुआत हैम्पटन हाई स्कूल मेलबर्न में हुई थी।
  • वार्न ने वास्तव में अपने एथलेटिक करियर की शुरुआत एक फुटबॉलर के रूप में की थी लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

  • 1992 में शेन वॉर्न ने अपना पहला टेस्ट मैच खेला था। शुरुआत में वो लेग स्पिन और ऑफ स्पिन के मिश्रण के साथ गेंदबाजी करते थे।
  • शेन वार्न के बारे में सबसे प्रसिद्ध तथ्यों में से एक यह है कि उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में किसी भी गेंदबाज द्वारा लिए गए सबसे अधिक विकेट (708) का विश्व रिकॉर्ड बनाया था। वॉर्न ने 2004 से 2007 के वर्षों में श्रीलंकाई गेंदबाज मुरलीधरन के साथ प्रतिस्पर्धा की, दोनों के बीच कई बार रिकॉर्ड बदलते रहे, जब तक कि 2007 में वॉर्न अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से सेवानिवृत्त नहीं हुए, और रिकॉर्ड मुरलीधरन ने जीत लिया।
  • शेन वॉर्न और मुरलीधरन को सम्मान देने के लिए 2007-2008 में Australia-Sri Lanka Test cricket series का नाम ‘वॉर्न-मुरलीधरन ट्रॉफ़ी’ रखा गया था। ये ख़ास ट्रॉफ़ी इस सीरीज़ के विजेता को दी गई थी।
  • आपको जानकर हैरानी होगी कि शेन वॉर्न एक मात्र ऐसे खिलाड़ी हैं, जिनके नाम बिना शतक के टेस्ट मैचों में सबसे ज़्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड दर्ज है। उन्होंने 1992 से लेकर 2007 के बीच अपने टेस्ट मैच करियर में बिना शतक के कुल 3,154 रन बनाए थे।
  • शेन वॉर्न गरीब व जरूरतमंद बच्चों के लिए एक चैरिटी फाउंडेशन भी चलाते थे जिसके लिए आए दिन वो किसी ना किसी इवेंट के जरिए पैसे जुटाया करते थे। उनकी संस्था का नाम शेन वॉर्न फाउंडेशन था।
  • इस क्रिकेटर का उनकी जिंदगी में कई लड़कियों के साथ नाम जुड़ा। जहां तक बात है शादी की तो उन्होंने सिमोन कैलेहान के साथ 1995 में शादी की और 2005 में दोनों अलग भी हो गए। इसके बाद वह हॉलीवुड अभिनेत्री लिज हर्ले के साथ चर्चा रहे, दोनों की सगाई भी हो गई थी लेकिन कुछ समय के बाद यह रिश्ता भी खत्म हो गया।
  • वॉर्न का विवादों के साथ भी गहरा नाता रहा था उनको 2003 आईसीसी विश्व कप के दौरान डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाया गया था। जिस वजह से उन्हें वर्ल्ड कप से बाहर होना पड़ा था। इस बात को उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि उन्होंने फ्लूइड टेबलेट का सेवन किया था। उनका कहना था कि उन्होंने यह दवा अपनी मां के कहने पर ली थी। इसके बाद उन पर एक साल का प्रतिबंध लगा दिया गया था।
  • सितंबर 2017 में एक पॉर्न स्टार वलेरी फॉक्स ने उन पर लंदन के नाइट क्लब में हाथापाई का आरोप लगाया था। वलेरी फॉक्स ने तब चोटिल आंखों के साथ अपनी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी जिसके कैप्शन में लिखा था, “आप मशहूर हस्ती हैं, इसका मतलब ये बिल्कूल नहीं कि किसी भी औरत पर हाथ उठाया जा सकता है”।
  • शेन वॉर्न न केवल एक क्रिकेट खिलाड़ी थे, बल्कि उन्हें खेल में सट्टेबाजी का भी शौक था। शेन वार्न का सट्टेबाजी उद्योग के साथ पहला ज्ञात संबंध 1994-95 में जुड़ा था जब उन्हें और टीम के एक सदस्य “मार्क वॉ” पर ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड द्वारा एक सट्टेबाज को आगामी मैच के बारे में जानकारी देने के लिए जुर्माना लगाया गया था। क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भी वार्न कई अन्य सट्टेबाजी कंपनियों के साथ जुड़े हुए थे, जिनमें Dafabet और 888poker शामिल थी।
  • शेन वार्न ने एक बार ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय टेलीविजन पर यह कहा था कि वह एलियंस में विश्वास करते हैं। उन्होंने यह एक टॉक-शो के दौरान कहा था, जिसे “आई एम ए सेलेब्रिटी” “गेट मी आउट ऑफ हियर” (“I’m a Celebrity…Get Me Out of Here”) के रूप में जाना जाता है। शेन वार्न न केवल एलियंस में विश्वास करते थे, बल्कि उनका मानना था कि पूरी मानव प्रजाति किसी न किसी तरह एलियंस से निकली है।

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आखिर क्या है कारण रूस – यूक्रेन युद्ध का ?

रूस-यूक्रेन संकट अब तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 24 फरवरी को यूक्रेन के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। रुसी सेना ने कई दिशाओं से यूक्रेन पर आक्रमण किया और अब इसे नाटो के पूर्वी विस्तार को समाप्त करने और रूस की मांगों पर यूरोप में युद्ध की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। इस पोस्ट में हम जानेगें कि आखिर क्या कारण है रूस-यूक्रेन के युद्ध का :-

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

रूस और यूक्रेन के बीच तनाव बरसों पुराना है। हालांकि, 2021 में तनाव बढ़ गया जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन से यूक्रेन को नाटो में शामिल होने का आग्रह किया। यूक्रेन 44 मिलियन लोगों का एक लोकतांत्रिक देश है, जिसका इतिहास 1,000 से अधिक वर्षों का है। यह रूस के बाद क्षेत्रफल के हिसाब से यूरोप का सबसे बड़ा देश भी है। सोवियत संघ के पतन के बाद, उसने मास्को से स्वतंत्रता के लिए मतदान किया। पुतिन यूक्रेन को दुश्मनों द्वारा रूस से उकेरी गई एक कृत्रिम रचना मानते हैं। उन्होंने यूक्रेन को पश्चिम की कठपुतली भी बताया है। ज़ेलेंस्की के नाटो का हिस्सा बनने के अनुरोध से रूस नाराज़ हो गया और उसने यूक्रेन की सीमा के पास सैनिकों को रखना शुरू कर दिया। 10 नवंबर 2021 को, अमेरिका ने यूक्रेनी सीमा के पास रूसी सेना की गतिविधियों की सूचना दी। 28 नवंबर को, यूक्रेन ने कहा कि रूस जनवरी के अंत या फरवरी की शुरुआत में लगभग 92,000 सैनिकों को एक आक्रामक हमले के लिए तैयार कर रहा है। हालांकि, मास्को ने इसका खंडन किया और कीव पर अपने स्वयं के सैन्य निर्माण का आरोप लगाया।

क्या है कारण फ़रवरी 2022 युद्ध का

युद्ध का कारण यह है कि यूक्रेन उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन यानी नाटो का सदस्य देश बनना चाहता है और रूस इसका विरोध कर रहा है। नाटो अमेरिका और पश्चिमी देशों के बीच एक सैन्य गठबंधन है, इसलिए रूस नहीं चाहता कि उसका पड़ोसी देश नाटो का मित्र बने। नाटो देशों पर ठने इस पूरे विवाद ने एक नई युद्ध की संभावना को जन्म दिया है जिसमें एक से ज्यादा देश भाग ले सकते हैं। रूस ने यूक्रेन से लगी 450 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अपने 1,25,000 सैनिकों को तैनात किये हैं। इन जवानों को यूक्रेन की पूर्वी और उत्तर-पूर्वी सीमा पर तैनात किया गया है। रूस ने काला सागर में अपने युद्धपोत भी तैनात किए हैं जो खतरनाक मिसाइलों से लैस हैं। 2014 में रूस ने यूक्रेन में एक महत्वपूर्ण बंदरगाह क्षेत्र क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था और तब से संघर्ष कभी खत्म ही नहीं हुआ। रूस ने यूक्रेन की सीमा पर ड्रोन भी तैनात किए हैं, जो पलक झपकते ही किसी भी सैन्य अड्डे को तबाह कर सकते हैं। रूस ने यूक्रेन को चारों तरफ से घेर लिया है। रूस-यूक्रेन संघर्ष ने दुनिया को दो गुटों में बांट दिया है। एक तरफ रूस है, जिसे चीन जैसे देशों का समर्थन प्राप्त है और दूसरी तरफ यूक्रेन है, जिसे अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य नाटो देशों से समर्थन मिल रहा है।

गैस पाइपलाइन भी है विवाद एक वजह

दरअसल रूस पाइपलाइन के जरिए गैस को यूरोप तक भेजता था। जिन देशों से होकर ये पाइपलाइन जाती थी, रूस को उन्हें ट्रांजिट शुल्क देना पड़ता था जिसमें यूक्रेन भी शामिल था। एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 तक रूस हर साल करीब 33 बिलियन डॉलर का भुगतान यूक्रेन को कर रहा था। ये राशि यूक्रेन के कुल बजट की 4 फीसदी थी। रूस को समझ आ गया था कि युद्ध के हालात में यूक्रेन उसके पैसे का ही इस्तेमाल करेगा और जिसके चलते रूस ने एक नया प्लान बनाया और नॉर्ड स्ट्रीम -2 गैस पाइपलाइन की शुरूआत की गई। इसमें वेस्टर्न रूस से नॉर्थ ईस्टर्न जर्मनी तक बाल्टिक महासागर के रास्ते 1200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई। वैसे तो इसमें करीब 10 बिलियन डॉलर का खर्च आया, लेकिन अब उसे यूक्रेन को कोई ट्रांजिट शुल्क नहीं देना पड़ता था। अब रूस जर्मनी तक सीधे गैस भेज सकता है वो भी बिना कोई ट्रांजिट शुल्क दिए। यह भी एक वजह बन गई जिससे यूक्रेन और पोलैंड जैसे देश रूस से नाराज हो गए।

रूस क्यों नहीं चाहता कि यूक्रेन नाटो देशों में शामिल हो?

नाटो एक सैन्य समूह है जिसमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे 30 देश शामिल हैं। अब रूस के सामने चुनौती यह है कि उसके कुछ पड़ोसी देश पहले ही नाटो में शामिल हो चुके हैं। इनमें एस्टोनिया और लातविया जैसे देश हैं, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा थे। अब अगर यूक्रेन भी नाटो का हिस्सा बन गया तो रूस हर तरफ से अपने दुश्मन देशों से घिर जाएगा और अमेरिका जैसे देश उस पर हावी हो जाएंगे। अगर यूक्रेन नाटो का सदस्य बन जाता है और रूस भविष्य में उस पर हमला करता है तो समझौते के तहत इस समूह के सभी 30 देश इसे अपने खिलाफ हमला मानेंगे और यूक्रेन की सैन्य सहायता भी करेंगे। रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन ने एक बार कहा था कि ‘यूक्रेन को खोना रूस के लिए एक शरीर से अपना सिर काट देने जैसा होगा’। यही वजह है कि रूस नाटो में यूक्रेन के प्रवेश का विरोध कर रहा है। यूक्रेन रूस की पश्चिमी सीमा पर स्थित है। जब 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस पर हमला किया गया तो यूक्रेन एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जहां से रूस ने अपनी सीमा की रक्षा की थी। अब अगर यूक्रेन नाटो देशों के साथ चला गया तो रूस की राजधानी मास्को, पश्चिम से सिर्फ 640 किलोमीटर दूर होगी। फिलहाल यह दूरी करीब 1600 किलोमीटर है। यह भी पढ़ें :-  द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के “साल बाद” तक लड़ता रहा यह जापानी सिपाही

लड़के का वेश बनाकर महाराजा के साथ विदेश घूमने गई थी ये ‘महारानी’

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अगर आजादी से पहले भारत के राजा, महाराजाओं के किस्सों की बात की जाए तो वे बेहद गजब-गजब थे। वे कभी कभी ऐसे काम कर डालते थे जिससे हरकोई चकित रह जाता था। ऐसा ही एक काम महाराजा कपूरथला ने किया था। वो अपनी सबसे सुंदर रानी को विदेश एक पुरुष बनाकर ले गए थे।

दरअसल यह उस समय की बात है जब ब्रिटिश राज का जमाना था। देश में वायसराय सबसे बड़ा अधिकारी होता था जिसकी बात राजा, महाराजाओं को भी माननी पड़ती थी। उस समय लार्ड कर्जन वायसराय थे।

महाराजा कपूरथला जगजीत सिंह ने जब विदेश जाने के लिए लार्ड कर्जन से की इजाजत मांगी तो उन्हें एक शर्त पर इजाजत मिली कि वो अपने साथ केवल कुछ सहायक लेकर यूरोप जा सकते हैं, लेकिन किसी महारानी को नहीं,

परन्तु वे अपनी रानी को साथ ले जाना चाहते थे जिसके लिए उन्होंने एक योजना बनाई। जिस रानी को राजा अपने साथ ले जाना चाहते थे उसका पूरा नाम रानी कनारी साहिबा था।

महारानी कनारी को महाराजा बहत प्यार करता था। चूंकि कनारी महाराजा के साथ महारानी के तौर पर यूरोप नहीं जा सकती थी, इसलिए वह अचकन, पाजामा और पगड़ी पहन कर एक सिख लड़के की वेशभूषा में साथ गई थी।

क्यूंकि उन दिनों पासपोर्ट नहीं लेना पड़ता था इसलिए वह लड़के के वेश में भारत तथा यूरोप के सरकारी कर्मचारियों की नजरों से बच कर यूरोप जा पहुंची।

युरोप प्रवास में महाराजा और महारानी ने खूब मौज की। जिस समय उसके सामने कोई और व्यक्ति न होता तब महारानी औरतों के कपड़े पहन लेती थी।

फ्रांस के शाही खानदानों के मेहमानों के तौर पर महाराजा और महारानी को खास होटलों में ठहराया जाता था। वे लोग महाराज के इस रहस्य से परिचित थे। महारानी कनारी परम सुंदरी थी, वह कांगड़ा के राजपूत परिवार से सम्बन्ध रखती थी।

उसके गर्भ से एक पुत्र तथा एक पुत्री का जन्म हुआ। पुत्र का नाम था महाराज कुमार करमजीत सिंह, जो एक सुंदर और सुसंस्कृत राजकुमार था तथा पुत्री का नाम था महाराज कुमारी अमृतकौर जिसकी शादी हिमाचल प्रदेश की एक महत्वपूर्ण रियासत मंडी के राजा जोगिंद्र सेन से हुई।

भारत की स्वतंत्रता के बाद जब रियासतों को भारत गणराज्य में शामिल कर लिया गया तब मंडी के इसी राजा को भारत के राजदूत के रूप में नियुक्त करके ब्राजील भेजा गया।

मंडी के राजा जोगिंद्र सेन के साथ फरवरी, 1923 को महाराज कुमारी अमृतकौर की शादी हुई। शादी की रस्में पूरे ठाट-बाट के साथ पूरी की गईं।

पंजाब के गवर्नर तथा उसकी पत्नी लेडी मैक्लेगन कई राजे-महाराजे, महारानियां राजकुमारियां, रियासतों के मंत्री आदि इस शादी में शामिल हुए।

दूल्हे राजा को एक सजे हुए हाथी पर बैठा कर कपूरथला स्टेशन से एक महल तक लाया गया था। आतिशबाजी छोड़ी गई और रोशनी की गई। कपूरथला के राजमहल में शानदार दावतों के दौर भी चले। हजारों गरीबों को खाना भी खिलाया गया और ईनाम भी बांटा गया।

आगे महाराज कुमारी अमृतकौर के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका प्यार का नाम टीबू था। इसे ही बड़े होकर कपूरथला रियासत का महाराजा बनना था। यही सुंदर राजकुमार पढ़-लिख कर जवान हो गया मगर उस समय तक उसकी मां पुरे तौर पर शराबी बन चुकी थी।

शराब पीने की लत उसे अपनी मां महारानी कनारी से लगी थी। फिर महाराज कुमारी अमृतकौर अमरीका चली गई और बरसों तक वहां अकेली रही। उसने अपने पति से कानूनी तौर पर संबंध विच्छेद कर लिया था। उसके पति मंडी के राजा ने बाद में राजपिपला के महाराज के एक निकट संबंधी सरदार पिंकी की लड़की से शादी की।

अमृतकौर की मृत्यु अमरीका में बड़ी दर्दनाक स्थितियों में हुई। यह था उस नाजोंपली राजकुमारी का दुखद अंत जिसकी बुद्धि को पाश्चात्य शिक्षा ने भ्रष्ट कर डाला था।

यूरोप की राजधानियों में कई महीने बिताने के बाद जब महाराजा और महारानी कनारी भारत लौटे और उनका हवाई जहाज बम्बई में उतरा तो बम्बई के गवर्नर के सैनिक सचिव ने वाइसराय की ओर से उनका स्वागत किया था।

इस स्वागत समारोह में भी महारानी को कोई नहीं पहचान पाया क्योंकि इस समय भी वह सिख लड़के की वेशभूषा में ही थी। इससे पता चलता है कि उस समय के महाराजा लोग कितने चालाक थे और अपनी सनकें पूरी करने की खातिर वे वाइसराय तथा अन्य सरकारी अफसरों की आंखों में किस तरह धूल झोंका करते थे।

पंजाब केसरी से साभार

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भारत की 10 सबसे लम्बी नदियाँ

भारत 10 की सबसे लम्बी नदियाँ कौन सी हैं? यह प्रश्न जितना आसान है इसका उत्तर उतना ही कठिन है। दरअसल यहाँ तीन प्रश्न दिमाग में आते हैं। एक, कि भारत में से होकर बहने वाली सबसे लंबी नदियाँ कौन सी हैं?

दूसरा, कि भारत के अंदर से शुरू होकर भारत ही के अंदर बहने वाली सबसे लंबी नदियाँ कौन सी हैं। और तीसरा कि किसी भी नदी का भारत के अंदर बहने वाले हिस्से ही लंबाई के हिसाब से कौन सी नदी शीर्ष पर है?

यह पोस्ट पहले प्रश्न के उत्तर के बारे में हैं। भारत के अंदर ही अंदर बहने वाली सबसे लंबी नदियाँ कौन सी हैं इसके लिए इस लेख को पढ़ें

भारत में नदियाँ

भारत में छोटी-बड़ी लगभग 200 मुख्य नदियां हैं। इनमें पानी प्रवाह के हिसाब से गंगा नदी देश की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है। जबकि तय दूरी के हिसाब यानि लंबाई के हिसाब सिन्धु नदी सबसे बड़ी नदी है। वहीं राजस्थान में मात्र 90 कि.मी. बहने वाली अरवरी नदी को भारत की सबसे छोटी नदी माना जाता है।

लम्बी नदियाँ
नदियां देश की जीवन रेखाएँ होती है। (चित्र: ऋषिकेश में गंगा नदी पर बना लक्ष्मण झूला पल)

खैर ये थी ‘भारत की 10 सबसे लंबी नदियाँ’ शीर्षक की इस पोस्ट में नदियों के बारे में कुछ चर्चा। अब सीधा मुद्दे पर आते हैं। तो आइये देखते हैं भारत की 10 सबसे लम्बी नदियाँ कौन सी हैं। (नदियों के बारे में अधिक जानकारी और तथ्यों के लिए इस पोस्ट को पढ़ें।)

सिंधु नदी (2900 KM)

सिंधु नदी भारत की सबसे लंबी नदी हैं. सिंधु नदी का उद्गम तिब्बत में स्थित सिन-का-बाब नामक जलधारा से हुआ है. सिंधु नदी की लम्बाई 2900 किलोमीटर हैं. भारत में सिंधु नदी तिब्बत और कश्मीर के बीच बहती हैं. सिंधु नदी नंगा पर्वत के उतरी भाग से होकर दक्षिण पश्चिम में पाकिस्तान के बीचो-बीच से गुजरती है. सिंधु नदी की पांच उपनदियाँ हैं ईरावती, विपासा, वितस्ता, चन्द्रभागा एंव शतद्रु.  इनमें से सबसे बड़ी नदी का नाम शतद्रु उपनदी हैं.

सिंधु नदी – हजारों साल पुरानी सभ्यता की गवाह नदी

ब्रह्मपुत्र नदी (2700 KM)

ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत, भारत, और बांग्लादेश से होकर बहती है. ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम तिब्बत में स्थित चेमायुंग दुंग नामक हिमवाह से हुआ है. ब्रह्मपुत्र नदी की लम्बाई 2700 किलोमीटर हैं. ब्रह्मपुत्र नदी को कई नामों से जाना जाता है जैसे कि तिब्बत में इसका नाम सांपो, अरुणाचल में डिहं और असम में ब्रह्मपुत्र है. ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश की सीमा में बहती गंगा की उप नदी पद्मा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है. ब्रह्मपुत्र नदी की पांच उपनदियाँ हैं सुवनश्री, तिस्ता, तोर्सा, लोहित, बराक आदि.

भारत के प्राचीन इतिहास से जुड़ी है ब्रह्मपुत्र नदी

गंगा नदी (2525 KM)

गंगा नदी भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी मानी जाती हैं. गंगा नदी भारत, नेपाल और बांग्लादेश में बहती है. गंगा नदी की लम्बाई 2,525 किलोमीटर हैं. गंगा नदी की आठ उपनदियाँ है महाकाली, करनाली, कोसी, गंडक, घाघरा, यमुना, सोन, महानंदा आदि.

आखिर क्या है गंगा नदी के पवित्र होने का रहस्य

गोदावरी नदी (1450 KM)

गोदावरी नदी भारत की प्रमुख नदियों में से एक हैं. गोदावरी नदी का उद्गम पश्चिमघाट की पर्वत श्रेणी के अन्तर्गत त्रिम्बक पर्वत से हुआ है. इसकी लम्बाई 1,450 किलीमीटर हैं. गोदावरी की उपनदियाँ हैं प्राणहिता, इन्द्रावती, मंजिरा. गोदावरी नदी महाराष्ट, तेलंगना और आंध्र प्रदेश से बहते हुए राजहमुन्द्री शहर के समीप बंगाल की खाड़ी मे जाकर गिरती है.

जानिए गोदावरी नदी के अनेक नामों की विशेषता के बारे में

नर्मदा नदी (1310 KM)

नर्मदा नदीलम्बी नदियाँनर्मदा नदी  की उत्पप्ति महाकाल पर्वत के अमरकंटक शिखर से हई है. नर्मदा नदी भारत में मध्य प्रदेश और गुजरात में बहने वाली प्रमुख नदी है. नर्मदा नदी की लम्बाई 1310 किलोमीटर हैं. नर्मदा नदी पश्चिम की तरफ जाकर खंभात की खाड़ी में गिरती है और इसे उत्तरी और दक्षिणी भारत की सीमा रेखा माना जाता है.

पढ़ें: रोचक तथ्य- म.प्र. और गुजरात की जीवन रेखा नर्मदा नदी

कृष्णा नदी (1290 KM)

कृष्णा नदी की उत्पप्ति महाराष्ट्र राज्य के महाबलेश्वर पर्वत से हई है. यह नदी दक्षिण भारत की प्रमुख नदी है. कृष्णा नदी की लम्बाई 1290 हैं. यह दक्षिण-पूर्व में बहती हई बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती है. कृष्णा नदी की चार उपनदियाँ तुंगभद्रा, घाटप्रभा, मूसी और भीमा आदि है.

जानिए कृष्णा नदी का सबसे लम्बा सफर

यमुना नदी (1211 KM)

यमुना नदी, गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है. यमुना नदी यमुनोत्री जगह से निकलती है और इलाहाबाद के प्रयाग जगह में गंगा से मिल जाती है. यमुना नदी की पांच उपनदियाँ चम्बल, सेंगर, छोटी सिन्ध, बतवा और केन आदि हैं. यमुना नदी की लम्बाई 1211 किलोमीटर हैं.

ताजमहल के किनारे बहती यमुना नदी

महानदी (855 KM)

महानदी भारत में छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सबसे बड़ी नदी है. महानदी को कई नामों से जाना जाता है जैसे कि चित्रोत्पला, महानन्दा तथा नीलोत्पला. महानदी की उत्पप्ति रायपुर में सिहावा नामक पर्वत श्रेणी से हुआ है. सिहावा से बंगाल की खाड़ी में गिरने तक महानदी लगभग 855 किलोमीटर की दूरी तय करती हैं. महानदी की पांच उपनदियाँ हैं पैरी, सोंढुर, शिवनाथ, हसदेव, अरपा, जोंक, तेल आदि.

उड़ीसा का शोक – छत्तीसगढ़ की महानदी

कावेरी नदी (765 KM)

कावेरी नदी, पश्चिमी घाट के ब्रह्मगिरी पर्वत से निकली है. यह कनार्टक और तमिलनाडु की प्रमुख नदी है. कावेरी नदी को दक्षिण भारत की गंगा भी कहा जाता है. कावेरी नदी की लम्बाई 765 किलोमीटर हैं. सिमसा, हिमावती, भवानी इसकी उपनदियाँ है.

कर्नाटक के ब्रह्मगिरि पर्वत से बहती कावेरी नदी

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तापी नदी (724 KM)

तापी नदी मध्य प्रदेश राज्य के बैतूल जिले से निकलती है. यह पश्चिमी भारत की प्रसिद्ध नदी है. तापी नदी महाराष्ट्र के खानदेश पठार एवं सूरत के मैदान को पार करती हई अरब सागर में मिलती है. तापी नदी की लम्बाई 724 किलोमीटर हैं.

मध्य प्रदेश के बैतूल से बहती तापी नदी

नहीं रहे अपनी फिरकी से दुनिया को दीवाना बनाने वाले शेन वॉर्न

क्रिकेट जगत में बहुत से महान खिलाड़ी हैं और इन्हीं महान खिलाडियों में से एक थे शेन वॉर्न। शुक्रवार 4 मार्च को थाईलैंड में अपने विला में शेन वॉर्न का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। शेन वॉर्न ने 52 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया है।

आज इस पोस्ट में हम जानेगें महान स्पिनर शेन वॉर्न के बारे में में, तो चलिए जानते हैं:-

शेन वॉर्न का जन्म ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया में 13 सितंबर 1969 को हुआ था। 1992 में शेन वॉर्न ने अपना पहला टेस्ट मैच खेला था और श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन के बाद वह दूसरे गेंदबाज बने थे जिन्होंने 1000 अंतरराष्ट्रीय विकेट (टेस्ट और वनडे मैचों में) लिए।

वॉर्न के 708 विकेट टेस्ट क्रिकेट में किसी भी गेंदबाज द्वारा लिए गए सर्वाधिक विकेट थे, जब तक कि मुरलीधरन ने इससे ज्यादा विकेट नहीं ले लिए थे।

वार्न को ‘स्पिनर का जादूगर’ कहा जाता था और उन्होंने 1993 के एशेज के दौरान मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड टेस्ट में इंग्लैंड के माइक गेटिंग को जिस गेंद पर बोल्ड किया था, उसे अब तक के क्रिकेट इतिहास की सबसे बेहतर गेंद कहा जाता है। वार्न ने अपनी कप्तानी में आईपीएल के पहले सीजन में राजस्थान रॉयल्स को चैंपियन बनाया था।

बिना शतक के सबसे ज्यादा रन वाले क्रिकेटर

वॉर्न ने टेस्ट क्रिकेट में 3154 रन भी बनाए, जो बिना शतक के किसी भी बल्लेबाज के सबसे ज्यादा रन का वर्ल्ड रिकॉर्ड है। लेकिन उनका उच्चतम स्कोर 99 रन पर ही रह गया, जो उन्होंने 2001 में न्यूजीलैंड के खिलाफ पर्थ में बनाया था।

वनडे में भी उन्होंने 1018 रन बनाए। वे दुनिया के उन चुनिंदा क्रिकेटर्स में शामिल हैं, जिनके नाम पर टेस्ट और वनडे, दोनों में बल्ले से 1000+ रन और गेंद से 200+ विकेट दर्ज हैं।

सबसे खास थी वार्न की बॉल ऑफ द सेंचुरी

वार्न ने 15 साल पहले अपना आखिरी टैस्ट मैच खेला था, लेकिन आज भी लैग-स्पिन किंग द्वारा फैंकी गई प्रतिष्ठित ‘बॉल ऑफ द सेंचुरी‘ क्रिकेट प्रशंसकों के लिए यादगार है।

30 साल पहले मैनचेस्टर में इंगलैंड के खिलाफ एशेज सीरीज के टैस्ट मैच में इंगलैंड के बल्लेबाज माइक गैटिंग को क्लीन बोल्ड कर वार्न ने दुनिया को चौंका दिया था। वार्न द्वारा फैंकी गई जादुई गेंद गैटिंग के ऑफ स्टंप को हिट करने के लिए 90 डिग्री मुड़ी थी।

शेन वार्न से जुड़े विवादों के अनेक पन्ने

हालांकि, जब भी शेन वार्न का जिक्र आएगा तो उनसे जुड़े विवादों के पन्ने भी अपने आप पलटने लगेंगे। चाहे पिच की जानकारी देने का फिक्सिंग का मामला हो या ड्रग्स विवाद के चलते विश्व कप से बाहर हो जाना। शेन वार्न ने विवादों के चलते बहुत कुछ गंवाया भी था।

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Amazon पर सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ें !!

जैसा कि हम जानते हैं कि ई-कॉमर्स उद्योग दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है और Amazon दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन रिटेल स्टोर है जहाँ लगभग सभी तरह के प्रोडक्ट्स उपलब्ध हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इतने सारे प्रोडक्ट्स में से अमेज़न पर सबसे अधिक बिकने वाले प्रोडक्ट्स कौन-कौन से हैं?

आज इस पोस्ट में हम आपको Amazon पर सबसे अधिक बिकने वाले उत्पादों की सूची बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं :-

फैशन एक्सेसरीज़

यदि कोई प्रथम स्थान है जिसमें सबसे अधिक बिकने वाले उत्पाद हैं, तो वह निश्चित रूप से फैशन का क्षेत्र है। परिधान और फैशन एक्सेसरीज़ उद्योग निश्चित रूप से भारत में सबसे अधिक बिकने वाले उत्पादों की सूची में सबसे ऊपर है।

  • वस्त्र (Clothes)
  • बैग (Bag)
  • घड़ियों (watches)
  • धूप का चश्मा (sunglasses)
  • बेल्ट (belt)
  • टाई और कफ़लिंक (tie and cufflinks)
  • जुराबें और रूमाल (socks and handkerchiefs)

इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम्स

इलेक्ट्रॉनिक्स की खरीदारी के लिए सबसे अच्छा बाज़ार ऑनलाइन है l लैपटॉप, टैबलेट और डिजिटल कैमरे जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान आप यहाँ आसानी से खरीद सकते हैं।

यहाँ आपको अपनी खरीदारी पर बचत करने का मौका भी मिलता है जैसे कैशबैक ऑफर, बैंक ऑफर्स, सेल ऑफर्स आदि।

  • मोबाइल फोन, स्मार्टफोन और टैबलेट (Mobile phones, smartphones and tablets)
  • लैपटॉप और कंप्यूटर (laptops and computers)
  • घरेलु उपकरण  (home appliance)
  • स्पीकर और म्यूजिक सिस्टम  (Speakers and Music Systems)

बेबी केयर प्रोडक्ट्स

सूची में अगला नंबर बेबी केयर प्रोडक्ट्स का है। पैरेंट्स अपने नवजात शिशु की सुरक्षा और सेहत को लेकर काफी चिंतित रहते हैं इसलिए आधुनिक समय में पैरेंट्स ऑनलाइन खरीदारी को सबसे अच्छा समझते हैं। अपने नवजात शिशुओं के लिए कपड़े खरीदने से लेकर आवश्यक बेबी केयर प्रोडक्ट्स खरीदने तक, लगभग सब कुछ ऑनलाइन खरीदा जा सकता है।

  • स्किन केयर प्रोडक्ट्स (Skin care products)
  • मसाज ऑयल (Massage Oil)
  • बाथिंग प्रोडक्ट (Bathing Product)
  • बेबी शैम्पू (Baby Shampoo)
  • डायपर (Diaper)
  • क्लॉथ्स (Clothes)

होम डेकॉर आइटम्स

किसी भी घर में उसका रख-रखाव के साथ साज-सज्जा बहुत मायने रखती है। घर एक ऐसा स्थान है जहां परिवार के सदस्य आपस में एक-दूसरे के साथ मिलजुल कर रहते हैं इसलिए प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि घर साफ सुथरा और  खूबसूरत दिखे। आधुनिक समय में लोग ऑनलाइन शॉपिंग को ज़्यादा महत्व देते हैं ऑनलाइन आप फर्नीचर से लेकर घर की सजावट के उत्पाद आसानी से खरीद है।

  • पर्दे, कुशन कवर, फूलों के फूलदान, टेबल मैट, टी कोस्टर, गलीचे, वॉल-हैंगिंग आदि।

फ़ूड एंड हेल्थ सप्लीमेंट्स

ऑनलाइन होम एसेंशियल मार्केट आज सबसे लोकप्रिय ऑनलाइन व्यवसायों में से एक है। इन दिनों लाखों लोग ऑनलाइन खाना मंगवाते हैं। कोई भी किराने का सामान ऑनलाइन खरीद सकता है और इसे अपने स्थान पर पहुंचा सकता है। आप दवाएं और स्वास्थ्य संबंधी उत्पाद ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं। ऐसे उत्पादों को खरीदने के लिए ईकामर्स साइट सबसे अच्छा विकल्प है।

ज्वेलरी

आभूषण को श्रृंगार और सजावट के रूप में पहना जाता है और आमतौर पर विशेष दिनों में इसे पहना जाता है। आभूषण चाहे वह सोना, चांदी, प्लेटिनम, हीरा, ऑक्सीकृत या कृत्रिम हो, महिलाओं को गहने बहुत पसंद होते हैं और वे उन्हीं की खरीदारी करती हैं जो उनके कपड़ों से मेल खाते हों जिसके लिए अमेज़न सबसे अच्छा विकल्प है।

  • कान की बाली (Earrings)
  • हार (Necklace)
  • ब्रेसलेट (Bracelet)
  • पायल (Anklet)
  • रिंग्स (Rings)

ब्यूटी प्रोडक्ट्स

एक महिला अपने मेकअप सेट को वैसे ही पसंद करती है जैसे वह अपने गहनों को पसंद करती है। ऑनलाइन मेकअप स्टोर के आगमन के साथ ही सौंदर्य और त्वचा देखभाल उत्पादों की खरीदारी और भी बेहतर हो गई है। अमेज़न पर लगभग हर ब्यूटी प्रोडक्ट्स उपलब्ध है, चाहे वह किसी भी ब्रांड से क्यों न हो।

  • फेस क्रीम और फाउंडेशन (Face Cream and Foundation)
  • आँखों का मेकअप (eye makeup)
  • स्किन केयर प्रोडक्ट्स (skin care products)
  • परफ्यूम (Perfume)
  • बॉडी क्रीम और लोशन (body cream and lotion)
  • हेयर प्रोडक्ट्स (hair products)

टॉयज और वीडियो गेम

लूडो और मोनोपॉली जैसे बोर्ड गेम से लेकर एक्शन फिगर्स और बैटरी से चलने वाले खिलौनों तक, नए और पुराने दोनों तरह के उत्पाद अमेज़न पर आपको आसानी से मिल जाते हैं।

  • स्क्रैबल (Scrabble)
  • लूडो (Ludo)
  • सांप-सीढ़ी (Snakes-n-ladders)
  • मोनोपोली (Monopoly)
  • रिमोट कंट्रोल्ड कार और हेलीकॉप्टर (Remote controlled cars and helicopters)

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‘ज़िद्दी’ पत्नियों को ‘अभद्र’ व्यवहार करने पर ‘शालीनतापूर्वक’ पीटें – मंत्री

आपने यह कहावत तो सुनी होगी कि, “कुत्ते का कुत्ता बैरी”। लेकिन सदियों से चली आ रही “औरत की औरत बैरी” वाली कहावत या यूँ कहें कि कहानी भी उतनी ही सटीक है। मलेशिया की एक महिला मंत्री ने यह बात एक बार फिर से साबित भी कर दी है।

सिती जैला मोहम्मद युसॉफ
सिती जैला मोहम्मद युसॉफ

दरअसल मलेशिया की महिला, परिवार और सामुदायिक विकास उपमंत्री ने ‘पतियों’ को सलाह दी है वह पत्नियों की पिटाई कर सकते हैं। एक वीडियो संदेश में उन्होंने पुरुषों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वे अपनी ‘ज़िद्दी’ पत्नियों को ‘अभद्र’ व्यवहार करने पर ‘शालीनतापूर्वक’ पीटें।

मलेशिया की इस मंत्री का नाम सिती जैला मोहम्मद युसॉफ (Siti Zailah Mohd Yusoff) है। वह पान-मलेशिया इस्लामिक पार्टी (Pan-Malaysian Islamic Party) की एक सांसद हैं। ‘मदर टिप्स’ नाम का उनका यह वीडियो पिछले दिनों इंस्टाग्राम पर अपलोड हुआ था।

अपने इस वीडियो संदेश में उन्होंने कहा कि वह अपनी पत्नियों से बातचीत न करें और उन्हें अनुशासित करें। अगर उनकी पत्नी उनकी बात मानने से इंकार करती है तो वह तीन दिन तक उनके साथ न सोएँ। फिर भी उनका व्यवहार ना बदले तो सख़्ती दिखाएँ और उनकी पिटाई करें।

महिलायों को पति का ‘दिल जीतने’ की सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि पति की मर्ज़ी होने पर ही वह उनसे कुछ कहें। उन्होंने कहा कि पत्नियां अपने पति से उस वक्त बात करें जब वह एकदम कूल हों. जैसे कि वह खाना खाकर रिलेक्स हो रहे हों और किसी बात में न उलझे हों।

इस विवादित बयान की वजह से दुनिया भर में उनकी आलोचना हो रही है। देश विदेश के कई महिला अधिकार समूह इस मंत्री के इस्तीफ़े की माँग कर रहे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, मलेशिया के महिला अधिकार समूह ज्वाइंट एक्शन ग्रुप फॉर जेंडर इक्वेलिटी (Joint Action Group for Gender Equality ) ने मंत्री पर घरेलू हिंसा को ‘सामान्य’ दर्शाने का आरोप लगाया है जो कि अन्यथा मलेशिया में एक अपराध है। उन्होंने कहा है कि महिलाओं के लिए घरेलू हिंसा की रिपोर्ट करना पहले से ही मुश्किल है और इस तरह के बयानों से मामला और बिगड़ जाता है। उन्होंने उनके तत्काल इस्तीफे की मांग की है।

बयान में, JAG ने कहा, “एक मंत्री के तौर पर उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह लैंगिक समानता और महिलाओं के संरक्षण और सुरक्षा के अधिकारों को बनाए रखने के लिए करेंगी।”

“लेकिन यह अंत्यंत चिंताजनक और घृणित है कि वह महिलाओं को समानता के अधिकार, उनके सम्मान के अधिकार और अपमानजनक व्यवहार से मुक्ति पाने के उनके अधिकार के ख़िलाफ़ काम कर रही है।”

“यह पूरी तरह से निंदनीय है और एक असफल नेतृत्व का उदाहरण है।”

हालाँकि यह पहली बार नहीं है कि किसी ज़िम्मेदारी वाले पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा ऐसी संकुचित मानसिकता का प्रदर्शन किया गया है। दरअसल यह तो मात्र एक कड़ी है भर है। ऐसे अनगिनत क़िस्से तो अपने भारत देश में होते ही रहते है जहां महिलाओं को अधिकांश एक ‘वस्तु’ ही समझा जाता है।

क्रांतिकारियों के आदर्श थे ‘चंद्रशेखर आजाद’!!

देश को आजाद करवाने के लिए हजारों नौजवानों ने क्रांति का रास्ता अपना कर अंग्रेजों को इस देश से भगाने के महायज्ञ में अपने जीवन की आहुति डली, जिनके बलिदानों के कारण आज हम स्वतन्त्र देश की हवा में जी रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के विरले नायकों के नामों की श्रृंखला में अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद एक ऐसा नाम है जिसके स्मरण मात्र से शरीर की रगें फड़कने लगती हैं।

इस वीर का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश की अलीराजपुरा रियासत के मामरा ग्राम में मां जगरानी की कोख से गरीब तिवारी परिवार में पांचवी संतान के रूप में हुआ।

पिता सीता राम तिवारी बहुत ही मेहनती और धार्मिक विचारों के थे। चंद्रशेखर की आरम्भिक शिक्षा गांव में ही हुई। यहीं पर उन्होंने धनुष-बाण चलाना सीखा और महाभारत के अर्जुन जैसे निशानेबाज बने, जिसका फायदा उन्हें क्रांति और स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में गोलियों के निशाने लगाने में मिला।

14 वर्ष की आयु में इन्हें संस्कृत पढ़ने के लिए काशी भेजा गया। काशी में ही चंद्रशेखर देश को आजाद करवाने के लिए प्रयासरत क्रांतिकारी वीरों के सम्पर्क में आए और उनके प्रभाव से छोटी आयु में ही देश को आजाद करवाने के कांटो भरे रास्ते पर चल पड़े।

काशी संस्कृत महाविद्यालय में पढ़ते हुए असहयोग आंदोलन में उन्होंने पहला धरना दिया जिसके कारण पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर न्यायाधीश के सामने पेश किया। न्यायाधीश के साथ सवांद से आजाद सुर्खियों में आ गए।

न्यायाधीश ने जब बालक चंद्रशेखर से उनका तथा उनके पिता का नाम और पता पूछा तो चंद्रशेखर ने अपना नाम ‘आजाद‘, पिता का नाम ‘स्वतंत्र‘ और निवास ‘बंदीगृह‘ बताया जिससे इनका नाम हमेशा के लिए “चंद्रशेखर आजाद” मशहूर हो गया।

बालक चंद्रशेखर के उत्तर से मैजिस्ट्रेट गुस्से से लाल हो गया और उन्हें 15 बेंतों की कड़ी सजा सुनाई। जिसे देश के मतवाले इस निडर बालक ने प्रत्येक बेंत के शरीर पर पड़ने पर ‘भारत माता की जय‘ और ‘वंदे मातरम्‘ का जयघोष कर स्वीकार किया।

इस घटना के बाद अन्य क्रांतिकारियों भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, राजगुरु, सुखदेव से इनका सम्पर्क हुआ और तब आजाद पूरी तरह से क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए।

इसी दौरान साइमन कमिशन के विरोध में बरसी लाठियों के कारण लाला लाजपतराय जी के शहीद होने से क्रांतिकारी योद्धाओं ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी और ‘खून का बदला खून‘ से लेने का प्रण कर दोषी पुलिस अफसरों को सजा देने का निर्णय लिया। अपने प्रिय नेता लाला लाजपतराय जी की हत्या का बदला लेने के लिए वह क्रांतिकारी दल के नेता बनाए गए।

17 दिसम्बर, 1928 को आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने पुलिस अधीक्षक लाहौर कार्यालय के पास दफ्तर से निकलते ही सांडर्स का वध कर दिया।

लाहौर नगर के चप्पे-चप्पे पर पर्चे चिपका दिए गए कि लाला जी की शहादत का बदला ले लिया गया है। पूरे देश क्रांतिकारियों के इस कदम को खूब सराहा गया।

9 अगस्त, 1925 को कलकत्ता मेल को राम प्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर के नेतृत्व में लूटने की योजना बनी जिसे इन्होंने अपने 8 साथियों की सहायता से ‘काकोरी स्टेशन‘ के पास बहुत ही अच्छे ढंग से सम्पन्न किया।

इस घटना से ब्रिटिश सरकार पूरी तरह से बोखला गई और उन्होंने जगह-जगह छापामारी कर कुछ क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया जिन्होंने पुलिस की मार से अपने साथियों के ठिकाने बता दिए।

क्रांतिकारियों का पता मिलने से ब्रिटिश पुलिस ने कई क्रांतिकारियों को पकड़ लिया और राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां सहित 4 वीरों को फांसी देकर शहीद कर दिया परन्तु आजाद पुलिस की पकड़ में नहीं आए तो ब्रिटिश पुलिस ने इन पर 30000 रुपए के ईनाम की घोषणा कर दी।

27 फरवरी, 1931 के दिन आजाद अपने एक साथी के साथ इलाहाबाद के अल्‍फ्रेड पार्क  में बैठे अगली रणनीति पर विचार कर रहे थे कि पैसों के लालच में किसी मुखबिर ने पुलिस को खबर कर दी।

पुलिस ने तुरन्त सुपरिटेंडेंट नाट बाबर के नेतृत्व में इन्हें घेर लिया। 20 मिनट तक भारत माता के इस शेर ने पुलिस का मुकाबला किया और अपने बेहतरीन निशाने से कइयों को मौत के घाट उतार दिया।

इस मुकाबले में चंद्रशेखर भी घायल हो गई। उनके पास जब अंतिम गोली रह गई तो उन्होंने उसे कनपटी पर लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर आजादी के महायज्ञ में अपने जीवन की आहूति डाल दी। चंद्रशेखर आजाद थे और अंतिम समय तक आजाद ही रहे।

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जानिए एक अजीबो गरीब पत्थर के बारे में, जिससे निकलता है खून !

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दुनिया भर में अद्भुत और अनोखी चीजों का भंडार है। इन्हीं अनोखी चीजों में से एक पत्थर ऐसा भी है जिसके टूटने पर उसमें से खून निकलने लगता है। इस के टूटने पर वैसे ही निशान बन जाते हैं जैसे किसी के शरीर पर चोट के बन जाते हैं और उसमें से खून रिसने लगता है।

आज इस पोस्ट में हम आपको इस पोस्ट में इसी अजीबो गरीब पत्थर के बारे में बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं :

यह पत्थर नहीं बल्कि समुद्री जीव है

दरअसल, यह पत्थर चिली और पेरू के समुद्र में बड़ी संख्या में ये पाए जाते हैं। इनको यदि कोई पहली नज़र देखे तो उसे ये सामान्य पत्थर की तरह नज़र आते हैं परंतु वास्तव में ये एक तरह के जीव हैं।

इन्हें ‘पायुरा चिलियांसिस‘ के नाम से जाना जाता है। दरअसल ये बड़ी चट्टानों से चिपके रहते हैं और धीरे-धीरे उनका ही हिस्सा बन जाते हैं।

इनको ‘पीरियड रॉक‘ (माहवारी वाले पत्थर) के नाम से भी जाना जाता है। इन्हें लेकर चौंकाने वाली बात है कि इनसे केवल खून ही नहीं निकलता बल्कि इनमें मांस भी होता है। ऊपर से पत्थर जैसे सख्त दिखने वाले ये अंदर से बेहद नरम और मुलायम होते हैं।

लोग इनकी तलाश के लिए समुद्र की गहराइयों को छानते हैं क्योंकि इन्हें वे बड़े चाव से खाते हैं जिस कारण दिनों दिन इनकी मांग भी बढ़ती जा रही है।

इन्हें निकालने के लिए लोगों को तेज चाकू की जरूरत पड़ती है। इनसे कई व्यंजन और सलाद भी बनाए जाते हैं लेकिन स्थानीय लोग इन्हें कच्चा खाना पसंद करते हैं।

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महर्षि दयानंद सरस्वती – दया की मूर्ती जिन्होंने अपने हत्यारे की भागने में मदद की – रोचक तथ्य

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक, तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उनके बचपन का नाम ‘मूलशंकर’ था। उन्होंने वेदों के प्रचार और आर्यावर्त अर्थात भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए आर्यसमाज की स्थापना की। स्वराज शब्द का प्रयोग पहली बार स्वामी दयानंद सरस्वती ने ही किया था।

प्रारम्भिक जीवन

स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म 26 फ़रवरी 1824 में टंकारा,  जिला राजकोट, गुजरात में हुआ था। (कुछ स्रोत 12 फरवरी को मानते हैं।)

उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के एक अमीर, समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे।

दयानन्द सरस्वती का प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता। परन्तु उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गंभीर प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया।

एक बार महाशिवरात्रि की घटना है जब वे चौदह वर्ष के थे। शिवरात्रि की रात उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मन्दिर में रुका हुआ था। सारे परिवार के सो जाने के पश्चात् भी वे जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। इस घटना का उनके मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा

यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा कैसे करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।

अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे जिससे उनके माता पिता चिन्तित रहने लगे। तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह किशोरावस्था के प्रारम्भ में ही करने का निर्णय किया (19वीं सदी के भारत में यह आम प्रथा थी)।

लेकिन बालक मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं बना है और वे 1846 में सत्य की खोज में निकल पड़े।

वेद, ईश्वर और धर्म पर दयानंद सरस्वती के विचार

स्वामी दयानन्द ने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। ‘वेदों की ओर लौटो’ यह उनका प्रमुख नारा था। उन्होंने वेदों का भाष्य किया इसलिए उन्हें ‘महर्षि’ भी कहा जाता है क्योंकि ‘ऋषयो मन्त्र दृष्टारः’ (वेदमन्त्रों के अर्थ का दृष्टा ऋषि होता है)।

स्वामी जी एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे. उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया. उनका कहना था कि किसी भी अहिन्दू को हिन्दू धर्म में लिया जा सकता है. इससे हिंदुओं का धर्म परिवर्तन रूक गया।

उनका अगला कदम ईश्वर के प्रति पूर्ण-समर्पण के साथ हिंदू धर्म में सुधार करना था। उन्होंने अपने तर्कों, संस्कृत और वेदों के ज्ञान के बल पर देश भर के धार्मिक विद्वानों और पुजारियों को वेद, धर्म और ईश्वर पर चर्चा के लिए चुनौती देते हुए देश की यात्रा की और हर बार, बार बार जीत कर निकले।

22 अक्टूबर 1869 को वाराणसी में, उन्होंने 27 विद्वानों और 12 विशेषज्ञ पंडितों के खिलाफ एक बहस (debate) जीती। कहा जाता है कि इस बहस में 50,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया था। इस बहस का मुख्य विषय था “क्या वेद मूर्ति-पूजा को प्रोत्साहित करते हैं?

उस समय पुजारियों ने सामान्य लोगों को वैदिक शास्त्रों को पढ़ने से हतोत्साहित किया। उन्होंने तथाकथित धार्मिक अनुष्ठानों, जैसे कि गंगा नदी में स्नान करना और वर्षगाँठ पर पुजारियों को खाना खिलाना आदि को बढ़ावा दिया। पुजारियों ने लोगों को स्वयं को धन, गौ-धन, वस्त्र, सोना आदि दान देने को प्रोत्साहित किया, जिसे दयानंद सरस्वती ने अंधविश्वास या आत्म-सेवा प्रथाओं के रूप मान कर नकार दिया

इस तरह की अंधविश्वासी धारणाओं को अस्वीकार करने के लिए राष्ट्र को प्रोत्साहित करके, उनका उद्देश्य राष्ट्र को वेदों की शिक्षाओं पर लौटने और वैदिक जीवन शैली का पालन करने के लिए शिक्षित करना था। उन्होंने हिंदुओं को राष्ट्रीय समृद्धि के लिए गायों के महत्व के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता के लिए राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी को अपनाने सहित सामाजिक सुधारों को स्वीकार करने का भी आह्वान किया।

धर्म और राष्ट्र के प्रति योगदान

अपने दैनिक जीवन और योग और आसनों, शिक्षाओं, उपदेशों, उपदेशों और लेखन के अभ्यास के माध्यम से, उन्होंने हिंदुओं को स्वराज्य (स्वशासन), राष्ट्रवाद और अध्यात्मवाद की आकांक्षा के लिए प्रेरित किया। उन्होंने महिलाओं के समान अधिकारों और सम्मान की वकालत की और लिंग की परवाह किए बिना सभी बच्चों की शिक्षा की वकालत की।

स्वामी दयानंद सरस्वती का मानना ​​​​था कि वेदों के मूलभूत सिद्धांतों के प्रति अज्ञानता और भटकाव के कारण हिंदू धर्म भ्रष्ट हो गया था और पुजारियों के द्वारा अपने निजी हित के कारण आम-जन को द्वारा गुमराह किया जा रहा था। इस शोषण और पथ-भ्रष्टता को रोकने के लिए, उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की, जिसमें दस सार्वभौमिक सिद्धांतों को सार्वभौमिकता के लिए एक कोड के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसे “कृण्वन्तो विश्वं आर्यं” कहा गया।

मूर्तिपूजा और कर्मकांडों की पूजा का खंडन करते हुए उन्होंने वैदिक विचारधाराओं को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम किया। इसके बाद, भारत के दार्शनिक और राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने उन्हें “आधुनिक भारत के निर्माताओं” में से एक कहा, ठीक ऐसा ही श्री अरबिंदो ने भी कहा था।

उन्होंने कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा सन्यास को अपने दर्शन के चार स्तम्भ बनाया। उन्होंने ही सबसे पहले 1876 में ‘स्वराज्य’ का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। प्रथम जनगणना के समय स्वामी जी ने आगरा से देश के सभी आर्य-सामाजियों को यह निर्देश भिजवाया कि सब सदस्य अपना धर्म “सनातन धर्म” लिखवाएं। उनका मत था कि ‘हिंदू’ शब्द विदेशियों की देन है और ‘फारसी भाषा’ में इसके अर्थ ‘चोर, डाकू’ इत्यादि लिखे गए हैं।

दयानंद सरस्वती – महान प्रेरणास्रोत

स्वामी दयानंद सरस्वती के तार्किक, ज्वलंत और क्रांतिकारी विचारों ने भारत के असंख्य मनुष्यों को प्रभावित और प्रेरित किया।  इनमें कई महापुरुषों के नाम भी शामिल है, जिनमें प्रमुख नाम हैं- मादाम भिकाजी कामा, शहीद भगत सिंह, पण्डित लेखराम आर्य, स्वामी श्रद्धानन्द, चौधरी छोटूराम पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी, श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, मदनलाल ढींगरा, राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, महादेव गोविंद रानाडे, महात्मा हंसराज, लाला लाजपत राय इत्यादि।

स्वामी दयानन्द के प्रमुख अनुयायियों में लाला हंसराज ने सन 1886 में लाहौर में ‘दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज’ की स्थापना की तथा स्वामी श्रद्धानन्द जी ने 1901 में हरिद्वार के निकट कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की।

स्वामी दयानंद आधुनिक भारत के निर्माताओं में सर्वोच्च स्थान पर हैं। उन्होंने देश की राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मुक्ति के लिए अथक प्रयास किया। हिंदू धर्म को वैदिक नींव पर वापस ले जाने के मिशन को उन्होंने तर्क द्वारा निर्देशित किया। उन्होंने समाज को सुधारने का प्रयास किया, जिसकी सख्त जरूरत थी और फिर से पड़ेगी। भारतीय संविधान में किए गए कुछ सुधार उनकी शिक्षाओं से प्रेरित थे
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

महर्षि दयानन्द के हृदय में आदर्शवाद की उच्च भावना, तार्किक और यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि की नियति को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से युगानुकूल चिन्तन करने की तीव्र इच्छा तथा आर्यावर्तीय (भारतीय) जनता में गौरवमय अतीत के प्रति निष्ठा जगाने की भावना थी। उन्होंने किसी के विरोध तथा निन्दा करने की परवाह किये बिना आर्यावर्त (भारत) के हिन्दू समाज का कायाकल्प करना अपना ध्येय बना लिया था।

दयानंद सरस्वती का साहित्य में योगदान

दयानंद सरस्वती ने 60 से अधिक रचनाएँ लिखीं, जिनमें छह वेदांगों की 16 खंडों की व्याख्या, अष्टाध्यायी (पाणिनी का व्याकरण) पर एक अधूरी टिप्पणी, नैतिकता और नैतिकता पर कई छोटे पथ, वैदिक अनुष्ठान और संस्कार, और विश्लेषण पर एक अंश शामिल हैं। उनके कुछ प्रमुख कार्यों में सत्यार्थ प्रकाश, सत्यार्थ भूमिका, संस्कारविधि, ऋग्वेददी भाष्य भूमिका, ऋग्वेद भाष्य (7/61/2 तक) और यजुर्वेद भाष्यम शामिल हैं। भारतीय शहर अजमेर में स्थित परोपकारिणी सभा की स्थापना सरस्वती ने अपने कार्यों और वैदिक ग्रंथों को प्रकाशित करने और प्रचार करने के लिए की थी।

नारी सशक्तिकरण में योगदान

दयानंद के कई सारे बहुमूल्य योगदानों में एक महिलाओं के लिए समान अधिकारों को बढ़ावा देना, जैसे कि शिक्षा का अधिकार और भारतीय शास्त्रों को पढ़ने का अधिकार शामिल था। उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को भी प्रोत्साहित किया।

स्वामी दयानंद सरस्वती की मृत्यु

सन 1883 में, जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय ने स्वामी जी को अपने महल में आमंत्रित किया। महाराजा दयानंद के शिष्य बनने और उनकी शिक्षाओं को सीखने के लिए उत्सुक थे। दयानंद अपने प्रवास के दौरान महाराजा के विश्राम कक्ष में गए और उन्हें नन्ही-जान नाम की एक नृत्यांगना लड़की के साथ देखा। दयानंद ने महाराजा से कहा कि वह लड़की और सभी अनैतिक कार्यों को त्याग दें और एक सच्चे आर्य (महान) की तरह धर्म का पालन करें। दयानंद के सुझाव ने नन्ही को नाराज कर दिया, और उसने बदला लेने का फैसला किया।

29 सितंबर 1883 को, उसने दयानंद के रसोइए जगन्नाथ को रात के दूध में कांच के छोटे टुकड़े मिलाने के लिए रिश्वत दी।  दयानंद को सोने से पहले गिलास से भरा दूध परोसा गया, जिसे उन्होंने तुरंत पी लिया। वह कई दिनों तक बिस्तर पर पड़े रहे और असहनीय दर्द सहते रहे। महाराजा ने तुरंत उसके लिए डॉक्टर की सेवाओं की व्यवस्था की। हालांकि, जब तक डॉक्टर पहुंचे, तब तक उनकी हालत खराब हो चुकी थी, और उन्हें बड़े रक्तस्रावी घाव हो गए थे।

दयानंद की पीड़ा को देखकर, जगन्नाथ अपराध बोध से भर गया और उन्होंने दयानंद के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। अपनी मृत्युशय्या पर पड़े दयानन्द ने उसे क्षमा कर दिया और उसे 500 रुपये दिए और कहा कि महाराजा के आदमियों द्वारा उसे खोजे जाने और मार डालने से पहले वह नेपाल भाग जाए। ऐसे दया की मूर्ति थें हमारे स्वामी दयानद!

वेदों पर संस्कृत के साथ-साथ हिंदी में उनका साहित्य, सनातन धर्म की रक्षा का उनका संकल्प, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों पर उनके प्रहार, महिला कल्याण, स्वराज की प्रेरणा और भारत के जनमानस की भलाई के लिए उनका योगदान अमूल्य है। देश उनके दिखाए दया, धर्म, शांति और समृद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित होता रहेगा, ऐसी आशा और कामना है।

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सत्यार्थप्रकाश – अंधविश्वास, पाखण्ड और सामाजिक कुरीतिओं पर चोट करते तथ्य जो आपने कहीं नहीं पढ़े होंगे