नहीं रहे अपनी फिरकी से दुनिया को दीवाना बनाने वाले शेन वॉर्न

क्रिकेट जगत में बहुत से महान खिलाड़ी हैं और इन्हीं महान खिलाडियों में से एक थे शेन वॉर्न। शुक्रवार 4 मार्च को थाईलैंड में अपने विला में शेन वॉर्न का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। शेन वॉर्न ने 52 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया है।

आज इस पोस्ट में हम जानेगें महान स्पिनर शेन वॉर्न के बारे में में, तो चलिए जानते हैं:-

शेन वॉर्न का जन्म ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया में 13 सितंबर 1969 को हुआ था। 1992 में शेन वॉर्न ने अपना पहला टेस्ट मैच खेला था और श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन के बाद वह दूसरे गेंदबाज बने थे जिन्होंने 1000 अंतरराष्ट्रीय विकेट (टेस्ट और वनडे मैचों में) लिए।

वॉर्न के 708 विकेट टेस्ट क्रिकेट में किसी भी गेंदबाज द्वारा लिए गए सर्वाधिक विकेट थे, जब तक कि मुरलीधरन ने इससे ज्यादा विकेट नहीं ले लिए थे।

वार्न को ‘स्पिनर का जादूगर’ कहा जाता था और उन्होंने 1993 के एशेज के दौरान मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड टेस्ट में इंग्लैंड के माइक गेटिंग को जिस गेंद पर बोल्ड किया था, उसे अब तक के क्रिकेट इतिहास की सबसे बेहतर गेंद कहा जाता है। वार्न ने अपनी कप्तानी में आईपीएल के पहले सीजन में राजस्थान रॉयल्स को चैंपियन बनाया था।

बिना शतक के सबसे ज्यादा रन वाले क्रिकेटर

वॉर्न ने टेस्ट क्रिकेट में 3154 रन भी बनाए, जो बिना शतक के किसी भी बल्लेबाज के सबसे ज्यादा रन का वर्ल्ड रिकॉर्ड है। लेकिन उनका उच्चतम स्कोर 99 रन पर ही रह गया, जो उन्होंने 2001 में न्यूजीलैंड के खिलाफ पर्थ में बनाया था।

वनडे में भी उन्होंने 1018 रन बनाए। वे दुनिया के उन चुनिंदा क्रिकेटर्स में शामिल हैं, जिनके नाम पर टेस्ट और वनडे, दोनों में बल्ले से 1000+ रन और गेंद से 200+ विकेट दर्ज हैं।

सबसे खास थी वार्न की बॉल ऑफ द सेंचुरी

वार्न ने 15 साल पहले अपना आखिरी टैस्ट मैच खेला था, लेकिन आज भी लैग-स्पिन किंग द्वारा फैंकी गई प्रतिष्ठित ‘बॉल ऑफ द सेंचुरी‘ क्रिकेट प्रशंसकों के लिए यादगार है।

30 साल पहले मैनचेस्टर में इंगलैंड के खिलाफ एशेज सीरीज के टैस्ट मैच में इंगलैंड के बल्लेबाज माइक गैटिंग को क्लीन बोल्ड कर वार्न ने दुनिया को चौंका दिया था। वार्न द्वारा फैंकी गई जादुई गेंद गैटिंग के ऑफ स्टंप को हिट करने के लिए 90 डिग्री मुड़ी थी।

शेन वार्न से जुड़े विवादों के अनेक पन्ने

हालांकि, जब भी शेन वार्न का जिक्र आएगा तो उनसे जुड़े विवादों के पन्ने भी अपने आप पलटने लगेंगे। चाहे पिच की जानकारी देने का फिक्सिंग का मामला हो या ड्रग्स विवाद के चलते विश्व कप से बाहर हो जाना। शेन वार्न ने विवादों के चलते बहुत कुछ गंवाया भी था।

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Amazon पर सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ें !!

जैसा कि हम जानते हैं कि ई-कॉमर्स उद्योग दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है और Amazon दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन रिटेल स्टोर है जहाँ लगभग सभी तरह के प्रोडक्ट्स उपलब्ध हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इतने सारे प्रोडक्ट्स में से अमेज़न पर सबसे अधिक बिकने वाले प्रोडक्ट्स कौन-कौन से हैं?

आज इस पोस्ट में हम आपको Amazon पर सबसे अधिक बिकने वाले उत्पादों की सूची बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं :-

फैशन एक्सेसरीज़

यदि कोई प्रथम स्थान है जिसमें सबसे अधिक बिकने वाले उत्पाद हैं, तो वह निश्चित रूप से फैशन का क्षेत्र है। परिधान और फैशन एक्सेसरीज़ उद्योग निश्चित रूप से भारत में सबसे अधिक बिकने वाले उत्पादों की सूची में सबसे ऊपर है।

  • वस्त्र (Clothes)
  • बैग (Bag)
  • घड़ियों (watches)
  • धूप का चश्मा (sunglasses)
  • बेल्ट (belt)
  • टाई और कफ़लिंक (tie and cufflinks)
  • जुराबें और रूमाल (socks and handkerchiefs)

इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम्स

इलेक्ट्रॉनिक्स की खरीदारी के लिए सबसे अच्छा बाज़ार ऑनलाइन है l लैपटॉप, टैबलेट और डिजिटल कैमरे जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान आप यहाँ आसानी से खरीद सकते हैं।

यहाँ आपको अपनी खरीदारी पर बचत करने का मौका भी मिलता है जैसे कैशबैक ऑफर, बैंक ऑफर्स, सेल ऑफर्स आदि।

  • मोबाइल फोन, स्मार्टफोन और टैबलेट (Mobile phones, smartphones and tablets)
  • लैपटॉप और कंप्यूटर (laptops and computers)
  • घरेलु उपकरण  (home appliance)
  • स्पीकर और म्यूजिक सिस्टम  (Speakers and Music Systems)

बेबी केयर प्रोडक्ट्स

सूची में अगला नंबर बेबी केयर प्रोडक्ट्स का है। पैरेंट्स अपने नवजात शिशु की सुरक्षा और सेहत को लेकर काफी चिंतित रहते हैं इसलिए आधुनिक समय में पैरेंट्स ऑनलाइन खरीदारी को सबसे अच्छा समझते हैं। अपने नवजात शिशुओं के लिए कपड़े खरीदने से लेकर आवश्यक बेबी केयर प्रोडक्ट्स खरीदने तक, लगभग सब कुछ ऑनलाइन खरीदा जा सकता है।

  • स्किन केयर प्रोडक्ट्स (Skin care products)
  • मसाज ऑयल (Massage Oil)
  • बाथिंग प्रोडक्ट (Bathing Product)
  • बेबी शैम्पू (Baby Shampoo)
  • डायपर (Diaper)
  • क्लॉथ्स (Clothes)

होम डेकॉर आइटम्स

किसी भी घर में उसका रख-रखाव के साथ साज-सज्जा बहुत मायने रखती है। घर एक ऐसा स्थान है जहां परिवार के सदस्य आपस में एक-दूसरे के साथ मिलजुल कर रहते हैं इसलिए प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि घर साफ सुथरा और  खूबसूरत दिखे। आधुनिक समय में लोग ऑनलाइन शॉपिंग को ज़्यादा महत्व देते हैं ऑनलाइन आप फर्नीचर से लेकर घर की सजावट के उत्पाद आसानी से खरीद है।

  • पर्दे, कुशन कवर, फूलों के फूलदान, टेबल मैट, टी कोस्टर, गलीचे, वॉल-हैंगिंग आदि।

फ़ूड एंड हेल्थ सप्लीमेंट्स

ऑनलाइन होम एसेंशियल मार्केट आज सबसे लोकप्रिय ऑनलाइन व्यवसायों में से एक है। इन दिनों लाखों लोग ऑनलाइन खाना मंगवाते हैं। कोई भी किराने का सामान ऑनलाइन खरीद सकता है और इसे अपने स्थान पर पहुंचा सकता है। आप दवाएं और स्वास्थ्य संबंधी उत्पाद ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं। ऐसे उत्पादों को खरीदने के लिए ईकामर्स साइट सबसे अच्छा विकल्प है।

ज्वेलरी

आभूषण को श्रृंगार और सजावट के रूप में पहना जाता है और आमतौर पर विशेष दिनों में इसे पहना जाता है। आभूषण चाहे वह सोना, चांदी, प्लेटिनम, हीरा, ऑक्सीकृत या कृत्रिम हो, महिलाओं को गहने बहुत पसंद होते हैं और वे उन्हीं की खरीदारी करती हैं जो उनके कपड़ों से मेल खाते हों जिसके लिए अमेज़न सबसे अच्छा विकल्प है।

  • कान की बाली (Earrings)
  • हार (Necklace)
  • ब्रेसलेट (Bracelet)
  • पायल (Anklet)
  • रिंग्स (Rings)

ब्यूटी प्रोडक्ट्स

एक महिला अपने मेकअप सेट को वैसे ही पसंद करती है जैसे वह अपने गहनों को पसंद करती है। ऑनलाइन मेकअप स्टोर के आगमन के साथ ही सौंदर्य और त्वचा देखभाल उत्पादों की खरीदारी और भी बेहतर हो गई है। अमेज़न पर लगभग हर ब्यूटी प्रोडक्ट्स उपलब्ध है, चाहे वह किसी भी ब्रांड से क्यों न हो।

  • फेस क्रीम और फाउंडेशन (Face Cream and Foundation)
  • आँखों का मेकअप (eye makeup)
  • स्किन केयर प्रोडक्ट्स (skin care products)
  • परफ्यूम (Perfume)
  • बॉडी क्रीम और लोशन (body cream and lotion)
  • हेयर प्रोडक्ट्स (hair products)

टॉयज और वीडियो गेम

लूडो और मोनोपॉली जैसे बोर्ड गेम से लेकर एक्शन फिगर्स और बैटरी से चलने वाले खिलौनों तक, नए और पुराने दोनों तरह के उत्पाद अमेज़न पर आपको आसानी से मिल जाते हैं।

  • स्क्रैबल (Scrabble)
  • लूडो (Ludo)
  • सांप-सीढ़ी (Snakes-n-ladders)
  • मोनोपोली (Monopoly)
  • रिमोट कंट्रोल्ड कार और हेलीकॉप्टर (Remote controlled cars and helicopters)

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‘ज़िद्दी’ पत्नियों को ‘अभद्र’ व्यवहार करने पर ‘शालीनतापूर्वक’ पीटें – मंत्री

आपने यह कहावत तो सुनी होगी कि, “कुत्ते का कुत्ता बैरी”। लेकिन सदियों से चली आ रही “औरत की औरत बैरी” वाली कहावत या यूँ कहें कि कहानी भी उतनी ही सटीक है। मलेशिया की एक महिला मंत्री ने यह बात एक बार फिर से साबित भी कर दी है।

सिती जैला मोहम्मद युसॉफ
सिती जैला मोहम्मद युसॉफ

दरअसल मलेशिया की महिला, परिवार और सामुदायिक विकास उपमंत्री ने ‘पतियों’ को सलाह दी है वह पत्नियों की पिटाई कर सकते हैं। एक वीडियो संदेश में उन्होंने पुरुषों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वे अपनी ‘ज़िद्दी’ पत्नियों को ‘अभद्र’ व्यवहार करने पर ‘शालीनतापूर्वक’ पीटें।

मलेशिया की इस मंत्री का नाम सिती जैला मोहम्मद युसॉफ (Siti Zailah Mohd Yusoff) है। वह पान-मलेशिया इस्लामिक पार्टी (Pan-Malaysian Islamic Party) की एक सांसद हैं। ‘मदर टिप्स’ नाम का उनका यह वीडियो पिछले दिनों इंस्टाग्राम पर अपलोड हुआ था।

अपने इस वीडियो संदेश में उन्होंने कहा कि वह अपनी पत्नियों से बातचीत न करें और उन्हें अनुशासित करें। अगर उनकी पत्नी उनकी बात मानने से इंकार करती है तो वह तीन दिन तक उनके साथ न सोएँ। फिर भी उनका व्यवहार ना बदले तो सख़्ती दिखाएँ और उनकी पिटाई करें।

महिलायों को पति का ‘दिल जीतने’ की सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि पति की मर्ज़ी होने पर ही वह उनसे कुछ कहें। उन्होंने कहा कि पत्नियां अपने पति से उस वक्त बात करें जब वह एकदम कूल हों. जैसे कि वह खाना खाकर रिलेक्स हो रहे हों और किसी बात में न उलझे हों।

इस विवादित बयान की वजह से दुनिया भर में उनकी आलोचना हो रही है। देश विदेश के कई महिला अधिकार समूह इस मंत्री के इस्तीफ़े की माँग कर रहे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, मलेशिया के महिला अधिकार समूह ज्वाइंट एक्शन ग्रुप फॉर जेंडर इक्वेलिटी (Joint Action Group for Gender Equality ) ने मंत्री पर घरेलू हिंसा को ‘सामान्य’ दर्शाने का आरोप लगाया है जो कि अन्यथा मलेशिया में एक अपराध है। उन्होंने कहा है कि महिलाओं के लिए घरेलू हिंसा की रिपोर्ट करना पहले से ही मुश्किल है और इस तरह के बयानों से मामला और बिगड़ जाता है। उन्होंने उनके तत्काल इस्तीफे की मांग की है।

बयान में, JAG ने कहा, “एक मंत्री के तौर पर उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह लैंगिक समानता और महिलाओं के संरक्षण और सुरक्षा के अधिकारों को बनाए रखने के लिए करेंगी।”

“लेकिन यह अंत्यंत चिंताजनक और घृणित है कि वह महिलाओं को समानता के अधिकार, उनके सम्मान के अधिकार और अपमानजनक व्यवहार से मुक्ति पाने के उनके अधिकार के ख़िलाफ़ काम कर रही है।”

“यह पूरी तरह से निंदनीय है और एक असफल नेतृत्व का उदाहरण है।”

हालाँकि यह पहली बार नहीं है कि किसी ज़िम्मेदारी वाले पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा ऐसी संकुचित मानसिकता का प्रदर्शन किया गया है। दरअसल यह तो मात्र एक कड़ी है भर है। ऐसे अनगिनत क़िस्से तो अपने भारत देश में होते ही रहते है जहां महिलाओं को अधिकांश एक ‘वस्तु’ ही समझा जाता है।

क्रांतिकारियों के आदर्श थे ‘चंद्रशेखर आजाद’!!

देश को आजाद करवाने के लिए हजारों नौजवानों ने क्रांति का रास्ता अपना कर अंग्रेजों को इस देश से भगाने के महायज्ञ में अपने जीवन की आहुति डली, जिनके बलिदानों के कारण आज हम स्वतन्त्र देश की हवा में जी रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के विरले नायकों के नामों की श्रृंखला में अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद एक ऐसा नाम है जिसके स्मरण मात्र से शरीर की रगें फड़कने लगती हैं।

इस वीर का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश की अलीराजपुरा रियासत के मामरा ग्राम में मां जगरानी की कोख से गरीब तिवारी परिवार में पांचवी संतान के रूप में हुआ।

पिता सीता राम तिवारी बहुत ही मेहनती और धार्मिक विचारों के थे। चंद्रशेखर की आरम्भिक शिक्षा गांव में ही हुई। यहीं पर उन्होंने धनुष-बाण चलाना सीखा और महाभारत के अर्जुन जैसे निशानेबाज बने, जिसका फायदा उन्हें क्रांति और स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में गोलियों के निशाने लगाने में मिला।

14 वर्ष की आयु में इन्हें संस्कृत पढ़ने के लिए काशी भेजा गया। काशी में ही चंद्रशेखर देश को आजाद करवाने के लिए प्रयासरत क्रांतिकारी वीरों के सम्पर्क में आए और उनके प्रभाव से छोटी आयु में ही देश को आजाद करवाने के कांटो भरे रास्ते पर चल पड़े।

काशी संस्कृत महाविद्यालय में पढ़ते हुए असहयोग आंदोलन में उन्होंने पहला धरना दिया जिसके कारण पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर न्यायाधीश के सामने पेश किया। न्यायाधीश के साथ सवांद से आजाद सुर्खियों में आ गए।

न्यायाधीश ने जब बालक चंद्रशेखर से उनका तथा उनके पिता का नाम और पता पूछा तो चंद्रशेखर ने अपना नाम ‘आजाद‘, पिता का नाम ‘स्वतंत्र‘ और निवास ‘बंदीगृह‘ बताया जिससे इनका नाम हमेशा के लिए “चंद्रशेखर आजाद” मशहूर हो गया।

बालक चंद्रशेखर के उत्तर से मैजिस्ट्रेट गुस्से से लाल हो गया और उन्हें 15 बेंतों की कड़ी सजा सुनाई। जिसे देश के मतवाले इस निडर बालक ने प्रत्येक बेंत के शरीर पर पड़ने पर ‘भारत माता की जय‘ और ‘वंदे मातरम्‘ का जयघोष कर स्वीकार किया।

इस घटना के बाद अन्य क्रांतिकारियों भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, राजगुरु, सुखदेव से इनका सम्पर्क हुआ और तब आजाद पूरी तरह से क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए।

इसी दौरान साइमन कमिशन के विरोध में बरसी लाठियों के कारण लाला लाजपतराय जी के शहीद होने से क्रांतिकारी योद्धाओं ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी और ‘खून का बदला खून‘ से लेने का प्रण कर दोषी पुलिस अफसरों को सजा देने का निर्णय लिया। अपने प्रिय नेता लाला लाजपतराय जी की हत्या का बदला लेने के लिए वह क्रांतिकारी दल के नेता बनाए गए।

17 दिसम्बर, 1928 को आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने पुलिस अधीक्षक लाहौर कार्यालय के पास दफ्तर से निकलते ही सांडर्स का वध कर दिया।

लाहौर नगर के चप्पे-चप्पे पर पर्चे चिपका दिए गए कि लाला जी की शहादत का बदला ले लिया गया है। पूरे देश क्रांतिकारियों के इस कदम को खूब सराहा गया।

9 अगस्त, 1925 को कलकत्ता मेल को राम प्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर के नेतृत्व में लूटने की योजना बनी जिसे इन्होंने अपने 8 साथियों की सहायता से ‘काकोरी स्टेशन‘ के पास बहुत ही अच्छे ढंग से सम्पन्न किया।

इस घटना से ब्रिटिश सरकार पूरी तरह से बोखला गई और उन्होंने जगह-जगह छापामारी कर कुछ क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया जिन्होंने पुलिस की मार से अपने साथियों के ठिकाने बता दिए।

क्रांतिकारियों का पता मिलने से ब्रिटिश पुलिस ने कई क्रांतिकारियों को पकड़ लिया और राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां सहित 4 वीरों को फांसी देकर शहीद कर दिया परन्तु आजाद पुलिस की पकड़ में नहीं आए तो ब्रिटिश पुलिस ने इन पर 30000 रुपए के ईनाम की घोषणा कर दी।

27 फरवरी, 1931 के दिन आजाद अपने एक साथी के साथ इलाहाबाद के अल्‍फ्रेड पार्क  में बैठे अगली रणनीति पर विचार कर रहे थे कि पैसों के लालच में किसी मुखबिर ने पुलिस को खबर कर दी।

पुलिस ने तुरन्त सुपरिटेंडेंट नाट बाबर के नेतृत्व में इन्हें घेर लिया। 20 मिनट तक भारत माता के इस शेर ने पुलिस का मुकाबला किया और अपने बेहतरीन निशाने से कइयों को मौत के घाट उतार दिया।

इस मुकाबले में चंद्रशेखर भी घायल हो गई। उनके पास जब अंतिम गोली रह गई तो उन्होंने उसे कनपटी पर लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर आजादी के महायज्ञ में अपने जीवन की आहूति डाल दी। चंद्रशेखर आजाद थे और अंतिम समय तक आजाद ही रहे।

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जानिए एक अजीबो गरीब पत्थर के बारे में, जिससे निकलता है खून !

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दुनिया भर में अद्भुत और अनोखी चीजों का भंडार है। इन्हीं अनोखी चीजों में से एक पत्थर ऐसा भी है जिसके टूटने पर उसमें से खून निकलने लगता है। इस के टूटने पर वैसे ही निशान बन जाते हैं जैसे किसी के शरीर पर चोट के बन जाते हैं और उसमें से खून रिसने लगता है।

आज इस पोस्ट में हम आपको इस पोस्ट में इसी अजीबो गरीब पत्थर के बारे में बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं :

यह पत्थर नहीं बल्कि समुद्री जीव है

दरअसल, यह पत्थर चिली और पेरू के समुद्र में बड़ी संख्या में ये पाए जाते हैं। इनको यदि कोई पहली नज़र देखे तो उसे ये सामान्य पत्थर की तरह नज़र आते हैं परंतु वास्तव में ये एक तरह के जीव हैं।

इन्हें ‘पायुरा चिलियांसिस‘ के नाम से जाना जाता है। दरअसल ये बड़ी चट्टानों से चिपके रहते हैं और धीरे-धीरे उनका ही हिस्सा बन जाते हैं।

इनको ‘पीरियड रॉक‘ (माहवारी वाले पत्थर) के नाम से भी जाना जाता है। इन्हें लेकर चौंकाने वाली बात है कि इनसे केवल खून ही नहीं निकलता बल्कि इनमें मांस भी होता है। ऊपर से पत्थर जैसे सख्त दिखने वाले ये अंदर से बेहद नरम और मुलायम होते हैं।

लोग इनकी तलाश के लिए समुद्र की गहराइयों को छानते हैं क्योंकि इन्हें वे बड़े चाव से खाते हैं जिस कारण दिनों दिन इनकी मांग भी बढ़ती जा रही है।

इन्हें निकालने के लिए लोगों को तेज चाकू की जरूरत पड़ती है। इनसे कई व्यंजन और सलाद भी बनाए जाते हैं लेकिन स्थानीय लोग इन्हें कच्चा खाना पसंद करते हैं।

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महर्षि दयानंद सरस्वती – दया की मूर्ती जिन्होंने अपने हत्यारे की भागने में मदद की – रोचक तथ्य

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक, तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उनके बचपन का नाम ‘मूलशंकर’ था। उन्होंने वेदों के प्रचार और आर्यावर्त अर्थात भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए आर्यसमाज की स्थापना की। स्वराज शब्द का प्रयोग पहली बार स्वामी दयानंद सरस्वती ने ही किया था।

प्रारम्भिक जीवन

स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म 26 फ़रवरी 1824 में टंकारा,  जिला राजकोट, गुजरात में हुआ था। (कुछ स्रोत 12 फरवरी को मानते हैं।)

उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के एक अमीर, समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे।

दयानन्द सरस्वती का प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता। परन्तु उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गंभीर प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया।

एक बार महाशिवरात्रि की घटना है जब वे चौदह वर्ष के थे। शिवरात्रि की रात उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मन्दिर में रुका हुआ था। सारे परिवार के सो जाने के पश्चात् भी वे जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। इस घटना का उनके मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।

यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा कैसे करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।

अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे जिससे उनके माता पिता चिन्तित रहने लगे। तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह किशोरावस्था के प्रारम्भ में ही करने का निर्णय किया (19वीं सदी के भारत में यह आम प्रथा थी)।

लेकिन बालक मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं बना है और वे 1846 में सत्य की खोज में निकल पड़े।

वेद, ईश्वर और धर्म पर दयानंद सरस्वती के विचार

स्वामी दयानन्द ने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। ‘वेदों की ओर लौटो’ यह उनका प्रमुख नारा था। उन्होंने वेदों का भाष्य किया इसलिए उन्हें ‘महर्षि’ भी कहा जाता है क्योंकि ‘ऋषयो मन्त्र दृष्टारः’ (वेदमन्त्रों के अर्थ का दृष्टा ऋषि होता है)।

स्वामी जी एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे. उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया. उनका कहना था कि किसी भी अहिन्दू को हिन्दू धर्म में लिया जा सकता है. इससे हिंदुओं का धर्म परिवर्तन रूक गया।

उनका अगला कदम ईश्वर के प्रति पूर्ण-समर्पण के साथ हिंदू धर्म में सुधार करना था। उन्होंने अपने तर्कों, संस्कृत और वेदों के ज्ञान के बल पर देश भर के धार्मिक विद्वानों और पुजारियों को वेद, धर्म और ईश्वर पर चर्चा के लिए चुनौती देते हुए देश की यात्रा की और हर बार, बार बार जीत कर निकले।

22 अक्टूबर 1869 को वाराणसी में, उन्होंने 27 विद्वानों और 12 विशेषज्ञ पंडितों के खिलाफ एक बहस (debate) जीती। कहा जाता है कि इस बहस में 50,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया था। इस बहस का मुख्य विषय था “क्या वेद मूर्ति-पूजा को प्रोत्साहित करते हैं?

उस समय पुजारियों ने सामान्य लोगों को वैदिक शास्त्रों को पढ़ने से हतोत्साहित किया। उन्होंने तथाकथित धार्मिक अनुष्ठानों, जैसे कि गंगा नदी में स्नान करना और वर्षगाँठ पर पुजारियों को खाना खिलाना आदि को बढ़ावा दिया। पुजारियों ने लोगों को स्वयं को धन, गौ-धन, वस्त्र, सोना आदि दान देने को प्रोत्साहित किया, जिसे दयानंद सरस्वती ने अंधविश्वास या आत्म-सेवा प्रथाओं के रूप मान कर नकार दिया।

इस तरह की अंधविश्वासी धारणाओं को अस्वीकार करने के लिए राष्ट्र को प्रोत्साहित करके, उनका उद्देश्य राष्ट्र को वेदों की शिक्षाओं पर लौटने और वैदिक जीवन शैली का पालन करने के लिए शिक्षित करना था। उन्होंने हिंदुओं को राष्ट्रीय समृद्धि के लिए गायों के महत्व के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता के लिए राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी को अपनाने सहित सामाजिक सुधारों को स्वीकार करने का भी आह्वान किया।

धर्म और राष्ट्र के प्रति योगदान

अपने दैनिक जीवन और योग और आसनों, शिक्षाओं, उपदेशों, उपदेशों और लेखन के अभ्यास के माध्यम से, उन्होंने हिंदुओं को स्वराज्य (स्वशासन), राष्ट्रवाद और अध्यात्मवाद की आकांक्षा के लिए प्रेरित किया। उन्होंने महिलाओं के समान अधिकारों और सम्मान की वकालत की और लिंग की परवाह किए बिना सभी बच्चों की शिक्षा की वकालत की।

स्वामी दयानंद सरस्वती का मानना ​​​​था कि वेदों के मूलभूत सिद्धांतों के प्रति अज्ञानता और भटकाव के कारण हिंदू धर्म भ्रष्ट हो गया था और पुजारियों के द्वारा अपने निजी हित के कारण आम-जन को द्वारा गुमराह किया जा रहा था। इस शोषण और पथ-भ्रष्टता को रोकने के लिए, उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की, जिसमें दस सार्वभौमिक सिद्धांतों को सार्वभौमिकता के लिए एक कोड के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसे “कृण्वन्तो विश्वं आर्यं” कहा गया।

मूर्तिपूजा और कर्मकांडों की पूजा का खंडन करते हुए उन्होंने वैदिक विचारधाराओं को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम किया। इसके बाद, भारत के दार्शनिक और राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने उन्हें “आधुनिक भारत के निर्माताओं” में से एक कहा, ठीक ऐसा ही श्री अरबिंदो ने भी कहा था।

उन्होंने कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा सन्यास को अपने दर्शन के चार स्तम्भ बनाया। उन्होंने ही सबसे पहले 1876 में ‘स्वराज्य’ का नारा दिया जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। प्रथम जनगणना के समय स्वामी जी ने आगरा से देश के सभी आर्य-सामाजियों को यह निर्देश भिजवाया कि सब सदस्य अपना धर्म “सनातन धर्म” लिखवाएं। उनका मत था कि ‘हिंदू’ शब्द विदेशियों की देन है और ‘फारसी भाषा’ में इसके अर्थ ‘चोर, डाकू’ इत्यादि लिखे गए हैं।

दयानंद सरस्वती – महान प्रेरणास्रोत

स्वामी दयानंद सरस्वती के तार्किक, ज्वलंत और क्रांतिकारी विचारों ने भारत के असंख्य मनुष्यों को प्रभावित और प्रेरित किया।  इनमें कई महापुरुषों के नाम भी शामिल है, जिनमें प्रमुख नाम हैं- मादाम भिकाजी कामा, शहीद भगत सिंह, पण्डित लेखराम आर्य, स्वामी श्रद्धानन्द, चौधरी छोटूराम पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी, श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर, लाला हरदयाल, मदनलाल ढींगरा, राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, महादेव गोविंद रानाडे, महात्मा हंसराज, लाला लाजपत राय इत्यादि।

स्वामी दयानन्द के प्रमुख अनुयायियों में लाला हंसराज ने सन 1886 में लाहौर में ‘दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज’ की स्थापना की तथा स्वामी श्रद्धानन्द जी ने 1901 में हरिद्वार के निकट कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की।

स्वामी दयानंद आधुनिक भारत के निर्माताओं में सर्वोच्च स्थान पर हैं। उन्होंने देश की राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक मुक्ति के लिए अथक प्रयास किया। हिंदू धर्म को वैदिक नींव पर वापस ले जाने के मिशन को उन्होंने तर्क द्वारा निर्देशित किया। उन्होंने समाज को सुधारने का प्रयास किया, जिसकी सख्त जरूरत थी और फिर से पड़ेगी। भारतीय संविधान में किए गए कुछ सुधार उनकी शिक्षाओं से प्रेरित थे
– डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

महर्षि दयानन्द के हृदय में आदर्शवाद की उच्च भावना, तार्किक और यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि की नियति को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि से युगानुकूल चिन्तन करने की तीव्र इच्छा तथा आर्यावर्तीय (भारतीय) जनता में गौरवमय अतीत के प्रति निष्ठा जगाने की भावना थी। उन्होंने किसी के विरोध तथा निन्दा करने की परवाह किये बिना आर्यावर्त (भारत) के हिन्दू समाज का कायाकल्प करना अपना ध्येय बना लिया था।

दयानंद सरस्वती का साहित्य में योगदान

दयानंद सरस्वती ने 60 से अधिक रचनाएँ लिखीं, जिनमें छह वेदांगों की 16 खंडों की व्याख्या, अष्टाध्यायी (पाणिनी का व्याकरण) पर एक अधूरी टिप्पणी, नैतिकता और नैतिकता पर कई छोटे पथ, वैदिक अनुष्ठान और संस्कार, और विश्लेषण पर एक अंश शामिल हैं। उनके कुछ प्रमुख कार्यों में सत्यार्थ प्रकाश, सत्यार्थ भूमिका, संस्कारविधि, ऋग्वेददी भाष्य भूमिका, ऋग्वेद भाष्य (7/61/2 तक) और यजुर्वेद भाष्यम शामिल हैं। भारतीय शहर अजमेर में स्थित परोपकारिणी सभा की स्थापना सरस्वती ने अपने कार्यों और वैदिक ग्रंथों को प्रकाशित करने और प्रचार करने के लिए की थी।

नारी सशक्तिकरण में योगदान

दयानंद के कई सारे बहुमूल्य योगदानों में एक महिलाओं के लिए समान अधिकारों को बढ़ावा देना, जैसे कि शिक्षा का अधिकार और भारतीय शास्त्रों को पढ़ने का अधिकार शामिल था। उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को भी प्रोत्साहित किया।

स्वामी दयानंद सरस्वती की मृत्यु

सन 1883 में, जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय ने स्वामी जी को अपने महल में आमंत्रित किया। महाराजा दयानंद के शिष्य बनने और उनकी शिक्षाओं को सीखने के लिए उत्सुक थे। दयानंद अपने प्रवास के दौरान महाराजा के विश्राम कक्ष में गए और उन्हें नन्ही-जान नाम की एक नृत्यांगना लड़की के साथ देखा। दयानंद ने महाराजा से कहा कि वह लड़की और सभी अनैतिक कार्यों को त्याग दें और एक सच्चे आर्य (महान) की तरह धर्म का पालन करें। दयानंद के सुझाव ने नन्ही को नाराज कर दिया, और उसने बदला लेने का फैसला किया।

29 सितंबर 1883 को, उसने दयानंद के रसोइए जगन्नाथ को रात के दूध में कांच के छोटे टुकड़े मिलाने के लिए रिश्वत दी।  दयानंद को सोने से पहले गिलास से भरा दूध परोसा गया, जिसे उन्होंने तुरंत पी लिया। वह कई दिनों तक बिस्तर पर पड़े रहे और असहनीय दर्द सहते रहे। महाराजा ने तुरंत उसके लिए डॉक्टर की सेवाओं की व्यवस्था की। हालांकि, जब तक डॉक्टर पहुंचे, तब तक उनकी हालत खराब हो चुकी थी, और उन्हें बड़े रक्तस्रावी घाव हो गए थे।

दयानंद की पीड़ा को देखकर, जगन्नाथ अपराध बोध से भर गया और उन्होंने दयानंद के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। अपनी मृत्युशय्या पर पड़े दयानन्द ने उसे क्षमा कर दिया और उसे 500 रुपये दिए और कहा कि महाराजा के आदमियों द्वारा उसे खोजे जाने और मार डालने से पहले वह नेपाल भाग जाए। ऐसे दया की मूर्ति थें हमारे स्वामी दयानद!

वेदों पर संस्कृत के साथ-साथ हिंदी में उनका साहित्य, सनातन धर्म की रक्षा का उनका संकल्प, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों पर उनके प्रहार, महिला कल्याण, स्वराज की प्रेरणा और भारत के जनमानस की भलाई के लिए उनका योगदान अमूल्य है। देश उनके दिखाए दया, धर्म, शांति और समृद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित होता रहेगा, ऐसी आशा और कामना है।

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सत्यार्थप्रकाश – अंधविश्वास, पाखण्ड और सामाजिक कुरीतिओं पर चोट करते तथ्य जो आपने कहीं नहीं पढ़े होंगे

सत्यार्थप्रकाश – अंधविश्वास, पाखण्ड और सामाजिक कुरीतिओं पर चोट करते तथ्य जो आपने कहीं नहीं पढ़े होंगे

सत्यार्थप्रकाश (Satyarth Prakash, सत्यार्थ प्रकाश) ग्रन्थ की रचना महान चिन्तक, समाज सुधारक एवं विद्वान महर्षि दयानन्द सरस्वती ने 1875 ई में की थी। अब तक इसके 20 से अधिक संस्करण अलग-अलग भाषाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

उस दौर में हिन्दू शास्त्रों की गलत व्याख्या करके हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने चलन बढ़ रहा था। साथ ही शास्त्रों का गलत अर्थ निकाल कर हिन्दू धर्म को बदनाम करने का षड्यन्त्र चल रहा था।

इसी बात को ध्यान में रखकर महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इसका नाम सत्यार्थप्रकाश (सत्य + अर्थ + प्रकाश) अर्थात् सही अर्थ पर प्रकाश डालने वाला (ग्रन्थ) रखा। स्वयं स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनुसार इस रचना का मुख्य प्रयोजन सत्य को सत्य और मिथ्या को मिथ्या ही प्रतिपादन करना है।

सत्यार्थ प्रकाश में चौदह समुल्लास (अध्याय) हैं। इन अध्यायों में ईश्वर, सृष्टि-उत्पत्ति, बाल-शिक्षा, अध्ययन-अध्यापन, विवाह एवं गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास-राजधर्म, बंध-मोक्ष, आचार-अनाचार, आर्यावर्तदेशीय मतमतान्तर, ईसाई मत तथा इस्लाम पर विस्तृत विवेचन और व्याख्या की गयी है।

अध्याय विषय
प्रथम ईश्वर के ओंकारादि नामों की व्याख्या
द्वितीय सन्तानों की शिक्षा
तृतीय ब्रह्मचर्य, पठनपाठन व्यवस्था, सत्यासत्य ग्रन्थों के नाम और पढ़ने-पढ़ाने की रीति
चतुर्थ विवाह और गृहस्थाश्रम का व्यवहार
पञ्चम वानप्रस्थ और संन्यासाश्रम की विधि
षष्ट राजधर्म
सप्तम वेद एवं ईश्वर
अष्टम जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय
नवम विद्या, अविद्या, बन्ध और मोक्ष की व्याख्या
दशम आचार, अनाचार और भक्ष्याभक्ष्य विषय
एकादशम आर्य्यावर्त्तीय मतमतान्तर का खण्डन मण्डन
द्वादशम चार्वाक, बौद्ध और जैन मत
त्रयोदशम ईसायत (बाइबल)
चतुर्दशम मुसलमानों का मत (कुरान)

 

इसकी भाषा के सम्बन्ध में दयानन्द जी ने सन् 1882 में इस ग्रन्थ के दूसरे संस्करण में स्वयं यह लिखा –“जिस समय मैंने यह ग्रन्थ बनाया था, उस समय.संस्कृत भाषण करने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती होने के कारण मुझको इस भाषा (हिन्दी) का विशेष परिज्ञान न था। इससे भाषा अशुद्ध बन गई थी। अब इसको भाषा-व्याकरण-अनुसार शुद्ध करके दूसरी बार छपवाया है।”

सत्यार्थप्रकाश के मुख्य सन्देश

इसके मुख्य संदेश पारम्परि्क हिन्दू रीति से अलग और कहीं-कही  विरूद्ध भी हैं। ये इस प्रकार हैं –

  • ओ३म् परमात्मा का निज नाम है। सत्य होने की वजह से ब्रह्म, सर्वत्र व्यापक होने की वजह से विष्णु, कल्याणकारी होने से शिव, सारी प्रजा के उत्पादक होने की वजह से गणपति और प्रजापति, दुष्टदमन होने से रूद्र तथा सोम, अग्नि इत्यादि उसी एक परमात्मा के नाम हैं।
  • परमात्मा को कोई रंग या स्वरूप नहीं है। ईश्वर कोई अवतार, पैगम्बर या मसीहा नहीं भेजता। अपने कर्मों के कारण ही कोई मनुष्य आदरणीय बनता है। राम और श्रीकृष्ण आदरणीय महापुरुष थे, लेकिन ईश्वरावतार नहीं। परमात्मा सर्वआनन्दमय – सच्चिदानन्द हैं। दरअसल ईश्वर अनंत व् अपरिमित(unlimited) है अत वह अंत अथवा परिमित (limited) शरीर में नहीं समा सकता।
  • देव का अर्थ होता है देने वाला (दान या कृपा) – अतः ऋषि, मुनि या कोई नदी जो कईयों का कल्याण करे, सूर्य, नक्षत्र आदि देव हैं। लेकिन उपासना ईश्वर की ही करनी चाहिए जो इन सभी का कर्ता है। इसी से एकमात्र ईश्वर का ही नाम महादेव है। वेद मंत्रों को भी देव कहा गया है क्योंकि उनके आत्मसात करने से कल्याण होता है।
  • वर्ण व्यवस्था गुण और कर्म को लेकर होती है – जन्म से नहीं। राजा का बेटा आवश्यक नहीं कि क्षत्रिय ही हो। ये उसके बल, पराक्रम, इन्दि्रजित और कल्याणकारी गुण पर निर्भर है। इत्यादि..
  • मूर्तिपूजा वेदों (और उपनिषदों) में कहीं नहीं है। मूर्ति पूजन से लोग मूर्तिआश्रित हो जाते हैं और पुरुषार्थ के लिए प्रेरित नहीं रहते। सिर्फ पुरुषार्थ से ही जीवों का कल्याण हो सकता है।
  • जीव (आत्मा, पुरुष), प्रकृति और परमात्मा तीनों एक दूसरे से पृथक हैं। परमात्मा जीवों पर नियंत्रण नहीं करता – लोग अपने कार्य के लिए स्वतंत्र हैं। परिणाम अपने कार्य के अनुसार ही होगा – परमात्मा की इच्छा के अनुसार नहीं।
  • मोक्ष प्राप्ति के लिए अष्टांग योग, उत्तम कर्म, पवित्रता, यज्ञ (पदार्ध यज्ञ, दान, त्याग और निष्काम कर्म) सत्य का साथ और मिथ्या को दूर छोड़ना, विद्वान पुरुषों का संग, विवेक (सत्य और असत्य का विवेचन) इत्यादि करना चाहिए।
  • ईश्वर उपासना करने से अपराध क्षमा नहीं करता – कई हिन्दू (और इस्लामी तथा अन्य) मतों में ईश्वर पूजन के लिए ऐसा  प्रस्तुत किया जाता है कि ईश्वर हमारे पाप क्षमा कर देता है परन्तु पुस्तक के अनुसार ईश्वर सिर्फ सत्यज्ञान दे सकता है। अपराध क्षमा करना (जैसे हरि या बिसमिल्लाह बोलकर) ईश्वर जैसे न्यायकारी शक्ति के अनुकूल नहीं है।
  • वैष्णव, शैव, शाक्त, कापालिक, चक्रांकित और चार्वाक मत वेदों को नहीं समझ सकने के कारण बने हैं। ईश्वर का कोई रूप या अवतार नहीं होता क्योंकि वेदों में इनका कहीं विवरण नहीं मिलता।
  • श्राद्ध, तर्पण आदि कर्म जीवित श्रद्धापात्रों (माता पिता, पितर, गुरु आदि) के लिए होता है, मृतकों के लिए नहीं।
  • तीर्थ दुख ताड़ने का नाम है – किसी सागर या नदी-सरोवर में नहाने का नहीं। इसी प्रकार आत्मा के (मोक्ष पश्चात) सुगम विचरण को स्वर्ग और पुनर्जन्म के बंधन में पड़ने को नरक कहते है – ऐसी कोई दूसरी या तीसरी दुनिया नहीं है।
  • इस्लाम और ईसाई धर्मों का खण्डन – कोई पैग़म्बर या मसीहा नहीं भेजा जाता है। ईश्वर को अपना सामर्थ्य जताने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि वो सच्चिदानंद है। स्वर्ग, नरक, जिन्न आदि का भी खण्डन।

सत्यार्थप्रकाश का प्रभाव

स्वामी दयानन्द का मत कई (अन्ध) विश्वासों और मतों का खण्डन करना और वेदों के मत को पुनःप्रकाश में लाने का था। इसलिए कई बार उन्हें प्रचलित हिन्दू , जैन, बौद्ध, इस्लामी और ईसाई मतों की मान्यताओं का खण्डन करना पड़ा। अवतारवाद, शंकराचार्य को शिव का अवतार, राम और कृष्ण को विष्णु नामक सार्वभौम का अवतार मानने वाले कई थे। इसी प्रकार तीर्थ, बालविवाह और जन्म संबंधी जाति (वर्ण व्यवस्था का नया रूप) जैसी व्यवस्थाओं का उन्होंने सप्रमाण खण्डन किया। इससे कई सुधार हिन्दू समाज में आए। कई विश्वास इस्लामी समाज का भी बदला। कुछ इस प्रकार हैं –

  • सत्यार्थप्रकाश और ऋषि दयानन्द की जीवनी स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिकारियों की प्रिय पुस्तक बनी। एक अंग्रेज विद्वान शेरोल ने यहाँ तक कहा कि सत्यार्थप्रकाश ब्रिटिश सरकार कि जड़ें उखाड़ने वाला ग्रंथ है। वस्तुतः सत्यार्थप्रकाश उस समय कि कालजयी कृति थी और इस  कालजयी कृति में अंग्रेजों का विरोध भी था जिससे अंग्रेज सरकार को काफी नुकसान हुआ।
  • हिन्दुओ के धर्मान्तरण पर रोक लगी और मुसलमानों, ईसाई आदि विधर्मियों की शुद्धि (घर वापसी ) हुई।
  • सत्यार्थप्रकाश ने स्त्री-जाति को  पैरों से उठाकर जगदम्बा के सिंहासन पर बैठा दिया।
  • मूर्तिपूजा का स्वरूप बदल गया , पहले मूर्ति को ही  ईश्वर मान चुके थे , अब मूर्तिपूजक भाई बंधू  मूर्तिपूजा  की विभिन्न मनोहारी  व्याख्याएं करने का असफल प्रयास करते हैं।
  • विनायक दामोदर सावरकर के शब्दों में,  “सत्यार्थप्रकाश ने हिन्दू जाति कि ठंडी रगों में उष्ण रक्त का संचार किया। “
  • अकेले सत्यार्थप्रकाश ने अनेकों क्रन्तिकारी और समाज सुधारक पैदा कर दिए।
  • सत्यार्थप्रकाश ने वेदों का महत्त्व बढ़ा दिया, वेद की प्रतिष्ठा को हिमालय सदृश चोटी पर स्थापित कर दिया।
  • सत्यार्थप्रकाश का प्रभाव विश्वव्यापी हुआ , बाइबिल , कुरान , पुराण , जैन आदि सभी ग्रंथो की बातें बदल गयी , व्याख्याएं बदल गयी। सत्यार्थप्रकाश ने धर्म के क्षेत्र में मानो सम्पूर्ण पृथ्वी पर हलचल मचा दी हो।
  • फरवरी 1931 में कलकत्ता से छपने वाले एपिफेनी वीकली में स्वर्ग और नरक की अवधारणी बदली। साप्ताहिक पत्र लिखता है – “What are hell and heaven? ..Hell and heaven are spiritual states; heaven is enjoyment of the presence of God, and Hell Banishment from it”. इस पर आर्य विचारधारा (सत्यार्थ प्रकाश जिसकी सबसे प्रमुख पुस्तक है) का प्रभाव दिखता है।
  • कुरान के भाष्य ‘फ़तह उल हमीद’ (प्रशंसा से जीत) ने मुसलमानों के कब्र, पीर या दरगाह निआज़ी को ग़लत बताया। इसी पर मौलाना हाली ने मुसलमानों की ग़ैरमुसलमानों की मूर्ति पूजा पर ऐतराज जताते हुए कहा कि मुसलमानों को नबी को खुदा मानना और मज़ारों पर जाना भी उचित नहीं है।
  • पुराणों, साखियों, भागवत और हदीसों की मान्यता घट गई है। उदाहरणार्थ, जबलपुर में सन् १९१५ में आर्य समाजियों के साथ शास्त्रार्थ में मौलाना सनाउल्ला ने हदीसों से पल्ला झाड़ लिया।

हिन्दी साहित्य में सत्यार्थ प्रकाश

हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने अपने ग्रंथों में सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी के उन प्रारंभिक ग्रंथों में माना है, जिनके गद्य की शैली को बाद में सभी ने परम्परा के रूप में ग्रहण किया। सत्यार्थ प्रकाश के प्रकाशन से पहले हिंदी गद्य की भाषा ब्रजभाषा और अवधी से बहुत अधिक प्रभावित थी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास में माना है कि 1868 से 1893 का कालखंड हिंदी गद्य के विकास का समय था।

डॉ. चंद्रभानु सीताराम सोनवणे ने हिंदी गद्य साहित्य में लिखा है कि सत्यार्थ प्रकाश आधुनिक हिंदी का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ है। उनके अनुसार हिन्दी को नई चाल में ढालने में स्वामी दयानन्द सरस्वती का स्थान भारतेंदु हरिश्चंद्र से कम नहीं है।

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जानिए ब्रिटिश संसद में चुन कर पहुंचने वाले पहले भारतीय के बारे में !

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कहा जाता है कि बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी ने प्रखर राष्ट्रवादी दादा भाई नौरोजी से ही राजनीति का पहला पाठ सीखा था। वह न केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देने और विदेशों में भारत के हितों की लगातार रक्षा करते रहने वाले एक प्रमुख व्यक्ति भी थे।

उन्होंने भारत के लिए सबसे पहले स्वराज की मांग की थी। 1906 में कांग्रेस के कलकता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने स्वराज यानी ‘इंडिया का राज‘ को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित कर दिया था। यह उस समय अपनी तरह की पहली घोषणा थी।

अंग्रेज भारत का शोषण कर रहे थे। अंग्रेजी शासन के खिलाफ भारतीयों को जागरूक करने के लिए उन्होंने बहुत सारे आलेख लिखे, भाषण दिए और धीरे-धीरे राजनीति में बहुत ज्यादा सक्रिय हो गए।

उनका राजनीति में शामिल होना भारत के लिए फायदेमंद साबित हुआ क्योंकि यहां से एक नए युग का सूत्रपात हुआ। इतना ही नहीं, दादा भाई नौरोजी को दुनिया भर में जातिवाद और साम्राज्यवाद के विरोध की तरह भी जाना जाता था।

4 सितम्बर, 1825 को एक गरीब पारसी परिवार में जन्मे नौरोजी का प्रगतिशील विचारों की तरफ झुकाव कम उम्र में ही हो गया था।

यही कारण है कि उन्होंने लड़कियों की पढ़ाई पर जोर दिया और 1840 के दशक में लड़कियों के लिए स्कूल खोला। इस कारण उन्हें रूढ़िवादी पुरुषों के विरोध का सामना करना पड़ा लेकिन वह ज़रा भी डिगे नहीं।

5 साल के अंदर ही मुम्बई में लड़कियों का स्कूल भरा नजर आने लगा जिससे उनके इरादे और मजबूत हो गए। वह लैंगिक समानता की मांग करने लगे और उन्होंने महिलाओं और पुरुषों के लिए एकसमान कानूनों का समर्थन किया।

नौरोजी का कहना था कि भारतीय एक दिन यह समझेंगे कि “महिलाओं को दुनिया में अपने अधिकारों का इस्तेमाल, सुविधाओं और कर्तव्यों का पालन करने का उतना ही अधिकार है, जितना एक पुरुष को।”

आजादी के 6 दशक से ज्यादा समय बाद ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ‘ जैसी पहल नौरोजी की तब की कही बात को ही सच साबित करती है।

कार्यस्थल पर सुरक्षा-बराबरी का मामला हो या फिर उनके खिलाफ अपराध करने वालों के लिए सख्त कानून बनाने का, बेटियों को पहली बार वे अधिकार मिले हैं जिनकी बान नौरोजी उस समय करते थे।

दादा भाई नौरोजी की स्वतंत्रता संग्राम में अहमियत का पता 1894 को महात्मा गांधी द्वारा लिखी गई उस चिट्ठी से चलता है जिसमें उन्होंने लिखा था, “हिंदुस्तानी आपकी तरफ ऐसे देखते हैं जैसे बच्चे अपने पिता की ओर। यहां आपको लेकर कुछ इस तरह का अहसास है।” यही कारण है कि कृतज्ञ भारतीय राष्ट्र आज भी उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करता है।

पंजाब केसरी से साभार

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ये हैं भारत के कुछ अनोखे बाज़ार, जो अपनी अलग- अलग खासियत के लिए जाने जाते हैं !!

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बाज़ार ऐसी जगह को कहते हैं जहाँ पर किसी भी चीज़ का व्यापार होता है। बाज़ार में कई बेचने वाले एक जगह पर होतें हैं ताकि जो उन चीज़ों को खरीदना चाहें वे उन्हें आसानी से ढूँढ सकें। हमारे देश भारत के हर कोने और गलियों में बाज़ार देखने को मिल जाते हैं लेकिन कुछ बाज़ार ऐसे भी हैं जो बहुत ही अनोखे हैं।

आज इस पोस्ट में हम आपको देश के कुछ ऐसे ही अनोखे बाज़ारों के बारे में बताने जा रहे हैं, तो चलिए जानते हैं :-

इमा कैथेल, मणिपुर – Ima Keithel Manipur

मणिपुर की राजधानी इंफाल को पारंपरिक, सांस्कृतिक और खेल के लिए जाना जाता है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी पहचान, यहां स्थित एशिया की सबसे बड़ा ऑल इंडिया वीमेन मार्केट। महिलाओं की इस मार्केट को इमा कैथेल, मदर्स मार्केट, नुपी कैथेल के नाम से भी जाना जाता है।

इस बाजार में 5,000 से अधिक महिला दुकानदार हैं। 500 साल पुराना यह बाज़ार राज्य का सबसे बड़ा बाजार है। यह बाज़ार मणिपुर की राजधानी इम्फाल के केंद्र में स्थित है।

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जोनबील मार्केट, असम – Jonbeel Market Assam

Jonbeel Market Assam

15वीं शताब्दी में शुरू हुआ यह बाजार अलग-अलग जनजातियों में एकता लाने के लिए खूब चलता है। जोनबील असमिया के दो शब्दों ‘जोन‘ और ‘बील‘ से मिलकर बना हैं, जिनका अर्थ क्रमशः “चंद्रमा” और “आर्द्र भूमि” होता है।

बाज़ार लगने से पहले, मानव जाति की भलाई के लिए एक अग्नि पूजा (अग्नि पूजा) की जाती है। मेले की शुरुआत जूनबील आर्द्रभूमि में सामुदायिक मछली पकड़ने से होती है।

इसका विषय पूर्वोत्तर भारत में फैले स्वदेशी असमिया समुदायों और जनजातियों के बीच सद्भाव और भाईचारा है। ये बाज़ार हफ्ते में बस तीन दिन ही खुलता है। इसकी शुरुआत माह के तीसरे सप्ताह के वृहस्पतिवार से शनिवार तक होती है।

फ्लोटिंग मार्केट, कश्मीर – Floating Market Kashmir

यह भारत में एक तरह का फ्लोटिंग मार्केट है और दुनिया का दूसरा। प्रसिद्ध डल झील पर तैरता बाजार कम से कम दो शताब्दी पुराना है। डल झील के अंदर एक तैरती हुई सब्जी मंडी है जो कि काफी प्रसिद्ध है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि डल झील की इस सब्जी मंडी में सब्जियां खरीदने के लिए लोग नाव से आते हैं। बाजार हर दिन सुबह 5-7 बजे के बीच खोला जाता है।

अत्तर मार्केट, उत्तर प्रदेश – Attar Market Uttar pradesh

उत्तर प्रदेश के कन्नौज में अत्तर मार्केट 650 से अधिक परफ्यूमरीज हैं। कन्नौज और उसका बाज़ार हर्षवर्धन के समय से ही अपने इत्र और अत्तर के लिए जाना जाता है, जिससे ये भारत और शायद एशिया में सबसे पुराना अत्तर बाज़ार बन चुका है।

इस शहर में प्रवेश करते ही आपको इसकी हवा में ही इत्र की खुशबू महसूस होने लगती है। इस शहर में इत्र का सबसे बड़ा कारोबार होता है।

सोनपुर मवेशी बाजार, बिहार – Sonepur Cattle Market

यह एशिया का सबसे बड़ा पशु बाज़ार है और गंगा तट पर कार्तिक पूर्णिमा के दौरान इस बाजार को लगाया जाता है। यह एक महीने तक चलने वाला बाज़ार साथ ही एक मेला भी है।

इस बाज़ार की उत्पत्ति प्राचीन काल की है और ऐसा कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य भी यहां से हाथी और घोड़े खरीदते थे। पशु जैसे: कुत्ते, भैंस, गधे, टू, फारसी घोड़े, खरगोश, हाथी, बकरी, पक्षी और कभी-कभी ऊंट की सभी नस्लों को सोनपुर बाजार में खरीदा जा सकता है।

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वीडियो : सलाद बनाने के इन तरीकों को देखकर आप दंग रह जायेंगे!!

सोशल मीडिया पर आये दिन कई वीडियो वायरल होती रहती हैं। जिनमें से कई बहुत फनी होती है तो कई हैरान कर देने वाली होती हैं। लेकिन आज इस पोस्ट में हम आपको एक ऐसा वीडियो दिखाने जा रहें जिसमें सलाद को इतनी खूबसूरती से बनाया गया है जिसे देखकर आप दंग रह जायेंगे, तो चलिए देखते हैं!

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