अनोखी प्रेम कहानी :- 83 साल के व्यक्ति ने 27 साल की लड़की से रचाई शादी

कहते है कि प्यार अँधा होता है। प्यार की कोई उम्र नहीं होती है। आज के इस लेख में हम एक ऐसी ही अनोखी प्रेम कहानी के बारे में जानेगें। जिसे पढ़ने के बाद आप जरूर कहेंगे कि प्यार सच में अँधा होता है।

तो चलिए जानते हैं :-

यह मामला इंडोनेशिया से सामने आया है। जहां पर एक 83 साल के शख्स ने 27 साल की लड़की से शादी की है। इन दोनों को पहली नज़र में ही प्यार हो गया था।

आपको बता दें कि सुदीर्गों नाम के व्यक्ति ने 27 साल की महिला नूरैनी से शादी की है हालांकि उसकी खुद की उम्र 83 साल है। तो वहीं उनके बड़े बेटे की उम्र 51 साल की है।

आपको बता दें कि लड़की के पिता की उम्र सदीर्गो के बड़े बेटे से भी कम है। इसका मतलब है कि अपने पिता से भी ज्यादा उम्र के शख्स से इस महिला ने शादी की है और वह उसके बच्चों की सौतेली मां बनी है।

कैसे हुई दोनों की पहली मुलाकात

सुदीर्गो उस महिला के माता-पिता के पास एक मामले में सुझाव देने के लिए गए थे। उसी दौरान उनकी नज़र उस महिला पर पड़ी।

मीडिया से बात करते हए महिला ने कहा कि पहली नज़र में ही हम दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया था। हम लोग उसके बाद से किसी बहाने मिलते रहे।

शादी का प्रस्ताव

मीडिया से बात करते हुए इस बुजुर्ग ने बताया कि मैं अब उम्र के उस पड़ाव पर हं जहां मेरे लिए रोमांटिक रिलेशन ऐसा कुछ भी नहीं है। लेकिन इस महिला से मिलने के बाद मुझे एक अलग सा एहसास हआ। इसीलिए मैंने उनसे अपने प्यार का इजहार किया और शादी का प्रस्ताव भी रखा।

आसानी से मान गए लड़की के परिवार वाले

दोनों के रिश्ते में सबसे खास बात यह है कि महिला के परिवार वाले भी शादी के लिए आसानी से मान गए। दोनों को शादी करने के लिए किसी तरह की कोई भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। हालांकि बुजुर्ग के बड़े बेटे ने कई बार इस रिश्ते को लेकर चिंता जताई थी। लेकिन बाद में उन्हें भी कोई दिक्कत नहीं हुई।

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आखिर क्यों ‘पारिजात वृक्ष’ को इतना पवित्र माना जाता है जानिए क्या है खासियत

भारत में प्राचीन काल से ही वृक्षों की पूजा अर्चना होती चली आ रही हैं, फिर चाहे वो पीपल का पेड़ हो या बरगद का। हमारे देश में बहुत से ऐसे वृक्ष है जिनका बड़ा धार्मिक महत्व है। ऐसा ही एक अद्भुत वृक्ष है ‘पारिजात’।

पारिजात वृक्ष भगवान श्री राम का बहुत प्रिय है। इस पौधे के साथ-साथ इस पर आने वाले नाजुक सफेद फूल और उसकी मनमोहक खुशबू का भी हिंदू पौराणिक कथाओं में बहुत महत्व है।

पारिजात का वृक्ष 10-15 फीट ऊंचा होता है। कहीं कहीं इसकी ऊँचाई 25 से 30 फीट तक भी चली जाती है। खासतौर पर ये बागबगीचों की शोभा होता है। इसके फूल बेहद खूबसूरत होते हैं।

पारिजात पर काफी संख्या में फूल लगते हैं या आप कह सकते हैं कि यह वृक्ष फूलों से लदा होता है। यह मध्य भारत और हिमालय की नीची तराइयों में अधिक पैदा होता है।

इस अद्भुत वृक्ष की खास बात यह है कि इसमें फूल तो जरूर खिलते हैं लेकिन वे भी रात के समय और सुबह होते-होते वे सब मुरझा जाते हैं।

इन फूलों को खासतौर पर लक्ष्मी पूजन के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन केवल उन्हीं फूलों को इस्तेमाल किया जाता है जो अपने आप पेड़ से टूटकर नीचे गिर जाते हैं, क्योंकि इस पेड़ से फूलों को तोड़ने की मनाही है।

ज्योतिष ज्योतिष विज्ञान में भी पारिजात का विशेष महत्व बताया गया है। आज इस पोस्ट में हम जानेगें कि क्यों यह पौधा इतना महत्वपूर्ण है, तो चलिए जानते हैं :-

कैसे हुई इस पेड़ की उत्पत्ति

इस पेड़ की उत्पत्ति के बारे में मान्यता है कि एक बार देवराज इंद्र महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण श्री हीन हो गए। जिससे उनका स्वर्ग लोक से वैभव, समृद्धि और संपन्नता खत्म हो गई। इससे सभी देवता बेहद परेशान और दुखी थे। इसके निवारण के लिए वे ​एक दिन भगवान विष्णु के पास गए।

उन्होंने फिर देवताओं को असुरों की मदद से सागर मंथन करने की सलाह दी। देवताओं और असुरों की मदद से सागर मंथन हुआ, जिसमें से पहले विष निकला। उसे ग्रहण कर भगवान शिव नीलकंठ कहलाए।

फिर इसके बाद सागर से एक-एक करके 14 रत्न निकले। उसमें कल्पवृक्ष के साथ ‘पारिजात’ या ‘हरसिंगार’ का पेड़ भी था। उन 14 रत्नों में कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पद्रुम, रंभा, माता लक्ष्मी, वारुणी (मदिरा), चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष, शंख, धन्वंतरि वैद्य और अमृत शामिल थे।

देवराज इंद्र ने सागर मंथन से निकले रत्नों में से पारिजात वृक्ष को स्वर्ग में स्थापित कर दिया। ‘हरिवंश पुराण’ में भी इस वृक्ष का उल्लेख मिलता है जिसमें कहा गया है कि इस वृक्ष को छूने भर से देव नर्तकी उर्वशी की थकान मिट जाती थी।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा धरती पर किया गया स्थापित

एक बार नारद मुनि इस वृक्ष से कुछ फूल इन्द्र लोक से लेकर आये और कृष्ण भगवान को दिए। कृष्ण ने वे फूल लेकर पास बैठी अपनी पत्नी रुक्मणी को दे दिए।

यह बात दासियों द्वारा सत्यभामा तक पहुंची जो भी श्रीकृष्ण की धर्मपत्नी थीं। जब भगवान द्वारका स्थित सत्यभामा के महल में पहुंचे तो सत्यभामा ने उनसे पारिजात वृक्ष लाने का हठ पकड़ लिया। बहुत मनाने पर भी वह नहीं मानी।

फिर श्रीकृष्ण ने अपना एक दूत स्वर्गलोक पारिजात का वृक्ष लाने के लिए भेजा लेकिन देवराज इंद्र ने दूत को वृक्ष देने से इंकार कर दिया। फ़िर भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही स्वर्गलोक गए जहां उन्हें वृक्ष लाने के लिए देवराज इंद्र से युद्ध करना पड़ा।

जब भगवान श्रीकृष्ण इंद्रदेव को पराजित करने के बाद जाने लगे तो इंद्र ने क्रोध में आकर वृक्ष पर कभी फल ना आने का श्राप दिया। इसी वजह से इस पर फूल तो आते हैं पर फल एक भी नहीं।

वादे के अनुसार कृष्ण ने उस वृक्ष को लाकर सत्यभामा की वाटिका में लगवा दिया लेकिन उन्हें सबक सिखाते हुए कुछ ऐसा किया जिस कारण रात को वृक्ष पर पुष्प तो उगते थे लेकिन वे उनकी पहली पत्नी रुक्मणी की वाटिका में ही गिरते थे।इस प्रकार इस वृक्ष कि स्थापना धरती पर हुई।

पारिजात नाम की ‘राजकुमारी’

एक मान्यता यह भी है कि ‘पारिजात’ नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी, जिसे भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था। तमाम कोशिश के बाद भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्रेम को स्वीकार नहीं किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने आत्महत्या कर ली।

जिस स्थान पर पारिजात की क़ब्र बनी, वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया। इसी कारण पारिजात वृक्ष को रात में देखने से ऐसा लगता है, जैसे वह रो रहा हो। लेकिन सूर्य उदय के साथ ही पारिजात की टहनियां और पत्ते सूर्य को आगोश में लेने को आतुर दिखाई पड़ते हैं।

औषधीय गुणों का भंडार

पारिजात में औषधीय गुणों का भी भण्डार है :-

  • पारिजात बवासीर रोग के निदान के लिए रामबाण औषधि है।
  • इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम औषधि माने जाते हैं।
  • पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खाँसी ठीक हो जाती है।
  • इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधी रोग ठीक हो जाते हैं।
  • पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है।
  • पारिजात की कोंपल को यदि पाँच काली मिर्च के साथ महिलाएं सेवन करें तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है।
  • इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है।

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जानिए खूबसूरत फिंच बर्ड के बारे में कुछ रोचक तथ्य

फिंच बर्ड एक बहुत खूबसूरत पालतू पक्षी है। फिंच पक्षी (Finch Bird) की पूरी दुनिया में कई प्रजातियां पाई जाती हैं। ये जंगलों, रेगिस्तान और पहाड़ी इलाकों में भी मिल जाते हैं। यह एक आकर्षक और छोटे आकार का पक्षी है।

इसकी आवाज बहुत मधुर होती है। यह एक कलरफुल पक्षी है, जिसकी वजह से इसे पालतू बनाया जाता है। अलग-अलग प्रजाति के फिंच का कलर अलग होता है। मेल फिंच फीमेल से ज्यादा कलरफुल होते हैं।

आज इस पोस्ट में हम इस खूबसूरत पक्षी के बारे में कुछ रोचक तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं, तो चलिए जानते हैं :-

  • फीमेल फिंच हल्का नीला और पीला अंडा देती है। इन अंडों की संख्या 2 से 6 के लगभग होती है। करीब 14 दिन के बाद इन अंडों से बच्चे बाहर आते हैं।
  • फिंच बर्ड की लंबाई लगभग 3 से 6 इंच होती है। इसका वजन करीब 10 ग्राम से 30 ग्राम तक होता है।
  • जंगल में फिंच पक्षी का औसत जीवनकाल केवल 6 वर्ष होता है, जबकि पालतू फिंच करीब 20 वर्षों तक जीवित रह सकता है।
  • फिंच के बच्चों पर बाल नहीं होते। करीब 3 हफ्ते तक घोंसले में रहने के बाद बच्चे बाहर निकलते हैं।
  • यह मुख्यतः पौधों की पत्तियां, फूल, बीज, टहनी को खाता है। कुछ फिंच प्रजाति के पक्षी फल भी खाते हैं, जैसे जेब्रा फिंच ज़मीन पर पड़े बीजों को खाता है।

कुछ फेमस फिंच प्रजातियां

जेब्रा फिंच

जेब्रा फिंच ज्यादातर ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है। इसके गर्दन और पूंछ पर जेब्रा की तरह सफेद और काली धारियां होती हैं। इसकी चोंच ट्राइएंगल शेप की होती है।

आउल फिंच

एक नज़र में देखने में यह एक छोटे उल्लू जैसा दिखाई देता है, इसीलिए इसका नाम आउल फिंच रखा गया है। गले पर पाए जाने वाली दो काली धारियां इन्हें और भी खास बनाती हैं।

स्ट्रॉबेरी फिंच

यह फिंच बर्ड ज्यादातर एशिया में पाया जाता है। इसका शरीर लाल और उसके ऊपर व्हाइट डॉट्स होते हैं और मॉनसून के दिनों में ये ज्यादातर नज़र आते हैं।

ब्लू फिंच

इसका पूरा शरीर नीला होता है और चोंच पीली होती है। यह ब्राजील और बोलिविया में पाए जाते हैं।

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जानिए क्यों हाड़ी रानी ने अपना सिर काट कर निशानी के रूप में रणभूमि को भेज दिया था?

राजस्थान केवल एक राज्य का नाम ही नहीं बल्कि अपने आप में वीरता और शौर्य की एक लंबी कहानी का संग्रह भी है।इतिहास की नजर से देखें तो जहां एक तरह इस धरती ने महाराणा प्रताप जैसे वीर पुत्रों को जन्म दिया है, तो वहीं कई ऐसी वीरांगनाएं भी थी, जिनकी मिसाल आज भी दी जाती है और इन्हीं वीरांगनाओं में से एक थी ‘हाड़ी रानी’।

आज भी राजस्थान में इनकी वीरता और अमर बलिदान की गाथा सुनाई देती है। राजस्थान खासकर मेवाड़ के स्वर्णिम इतिहास में हाड़ी रानी को विशेष स्थान दिया गया है।

इतना ही नहीं इनके वीरता और बलिदान से प्रभावित होकर इस वीरांगना के नाम पर राजस्थान पुलिस में एक महिला बटालियन का गठन किया गया। जिसका नाम हाड़ी रानी महिला बटालियन रखा गया है।

आज इस लेख में हम आपको इस साहसी और बलिदानी हाड़ी रानी के बारे में बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं :-

यह उस समय की बात है जब मेवाड़ पर महाराणा राजसिंह (1652 – 1680 ई०) का शासन था। इनके सामन्त सलुम्बर के राव चुण्डावत रतन सिंह थे। हाड़ी रानी बूंदी के हाड़ा शासक की बेटी थी। जिनकी शादी उदयपुर (मेवाड़) के सलुंबर के सरदार राव रतन सिंह चूड़ावत से हुई।

हाड़ी रानी के विवाह को अभी केवल 7 ही दिन हुए थे, हाथों की मेंहदी भी नहीं छूटी थी कि उनके पति को युद्ध पर जाने का फरमान आ गया।

जिसमें महाराणा राजसिंह ने राव चुण्डावत रतन सिंह को दिल्ली से औरंगजेब के सहायता के लिए आ रही अतिरिक्त सेना को रोकने का निर्देश दिया था। चुण्डावत रतन सिंह के लिए यह सन्देश उनका मित्र शार्दूल सिंह ले कर आया था।

राव चुण्डावत रतन सिंह ने अपनी सेना को युद्ध की तैयरी के आदेश तो दे दिए, लेकिन राव हाड़ी रानी से इतना प्रेम करते थे की एक पल भी दूर रहना गंवारा नहीं था।

ऐसे में जब हाड़ी रानी को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने अपने पति राव रतन सिंह को युद्ध पर जाने के लिए तैयार किया और विजय की कामना करते हुए उन्हें विदा कर दी और रतन सिंह अपनी सेना लेकर चल पड़ा।

चुण्डावत अपनी सेना की साथ आगे तो बढ़ गया लेकिन उसके मन में रह रह कर एक ही बात घूम रही था कि कहीं मेरी पत्नी मुझे भूल ना जाएँ? वह मन को समझाता लेकिन उसका फिर उसका मन यही सोचने लगता। आखिर हाड़ी सरदार से रहा न गया और उन्होंने आधे मार्ग से पत्नी के पास एक संदेश वाहक भेज दिया।

पत्र में लिखा था कि प्रिय, मुझे मत भूलना। मैं जरूर लौटकर आउंगा। मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही है। अगर संभव हो तो अपनी कोई प्रिय निशानी भेज देना।

पत्र पढ़कर हाड़ी रानी सोच में पड़ गयी। अगर मेरे पति इसी तरह मोह से घिरा रहे तो शत्रुओं से कैसे लड़ेंगे। अचानक उनके मन में एक विचार आया।

उन्होंने संदेशवाहक को अपना एक पत्र देते हुए कहा, “मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी दे रही हूँ। इसे थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढककर मेरे वीर पति के पास पहुंचा देना, किन्तु याद रखना कि उनके सिवा इसे कोई और न देखे।”

हाड़ी रानी के पत्र में लिखा था, “प्रिय, मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी भेज रही हूँ। तुम्हें मेरे मोह के बंधनों से आजाद कर रही हूँ। अब बेफ्रिक होकर अपने कर्तव्य का पालन करना। पत्र संदेशवाहक को देकर हाड़ी रानी ने अपनी कमर से तलवार निकाली और एक ही झटके में अपना सिर धड़ से अलग कर दिया।

संदेश वाहक की आंखों से आंसू निकल पड़े। स्वर्ण थाल में हाड़ी रानी के कटे सिर को सुहाग के चूनर से ढककर संदेशवाहक भारी मन से युद्ध भूमि की ओर दौड़ पड़ा। उसको देखकर हाड़ा सरदार ने पूछा, “क्या तुम रानी की निशानी ले आए?” संदेशवाहक ने कांपते हाथों से थाल उसकी ओर बढ़ा दिया।

रानी का कटा सिर देखकर हाड़ा सरदार की आँखें फटी की फटी रह गई। उसके मोह ने उसकी सबसे प्यारी चीज़ छीन ली थी। उसके मुख से केवल इतना निकला रानी तुमने यह क्या कर डाला।

अब हाड़ा सरदार के मोह के सारे बंधन टूट चुके थे। वह शत्रु पर टूट पड़ा। इतना अप्रतिम शौर्य दिखाया था कि उसकी मिसाल मिलना बहुत कठिन है।

अपने प्यार में दिग्भ्रमित हुए पति को कर्तव्य की ओर मोड़ने और एक सैनिक का फर्ज निभाने के लिए रानी द्वारा लिया गया निर्णय सदा के लिए अमर हो गया और हाड़ी रानी जैसी वीरागंना इस वीर धरती के लिए बलिदान की एक अनूठी मिसाल बन गई। जिनका नाम आज भी बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है।

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दुनिया की 5 सबसे महंगी किताबें!!

किताबें तो सब पढ़ते हैं लेकिन किताबों का महत्व सिर्फ वही व्यक्ति जान या समझ सकता है जिसने किताबें लिखीं और पढ़ी हो. हममें से बहुत कम लोग ऐसे होंगे जो बुक रिलीज़ होने से पहले ही बुक खरीदने के लिए बेताब रहते हैं. दुनिया में कुछ किताबें ऐसी हैं जिनकी कीमत जानकर आप यकीन नहीं कर पाएंगें कि क्या सच में इनकी कीमत इतनी हो सकती है?

आज हम आपको दुनिया की 10 ऐसी ही किताबों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी कीमत जान कर आप भी हैरान रह जाएंगे..

द कोडेक्स लिसेस्टर (The Codex Leicester)

  • लेखक : लियोनार्डो द विंसी
  • कीमत : 30.8 मिलियन डॉलर (करीब 200.2 करोड़ रुपए)

द कोडेक्स लिसेस्टर बुक, लियोनार्डो दा विंसी द्वारा लिखी गई हस्तलिखित पांडुलिपि है और इसमें कुल 72 पेज हैं. थॉमस कुक ने इस किताब की पहली पांडुलिपि 1717 में खरीदी थी. बाद में 1980 में  लीसेस्टर स्टेट ने इसे अर्मांड हैमर से खरीदा और उनके पास यह किताब करीब 14 साल तक रही. वर्तमान ने यह किताब, दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेट्स के पास है. बिल गेट्स ने इस किताब को 200.2 करोड़ रुपए में खरीदा जो कि एक वर्ल्ड रिकॉर्ड है.

द गॉस्पेल ऑफ हेनरी द लायन, आर्डर ऑफ सेंट बेनेडिक्ट

  • कीमत: 11.7 मिलियन डॉलर (76.05 करोड़ रुपए)

द गॉस्पेल ऑफ हेनरी द लायन बुक ईसाई धर्म से संबंधित है. गोस्पेल ऑफ़ हेनरी द लायन बुक में कुल 266 पेज हैं. यह किताब 12वीं सदी की रोमन संस्कृति से सम्बंधित है. जर्मनी सरकार ने इस धार्मिक किताब को 1983 में 8,140,000 पाउंड (11.7 मिलियन डॉलर) में खरीदा था.

बर्ड्स ऑफ अमेरिका

  • लेखक: जेम्स ऑडबॉन
  • कीमत: 11.5 मिलियन (करीब 74.75 करोड़ रुपए)

बर्ड्स ऑफ अमेरिका बुक को अमेरिका के पक्षी प्रकृतिवादी और चित्रकार, जॉन जेम्स Audubon द्वारा लिखित पुस्तक है जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका के पक्षियों की एक विस्तृत विविधता को दर्शाती है. इस किताब की एक कॉपी की नीलाम सन 2000 में 8,802,500 डॉलर में हुई थी तथा दूसरे संस्करण की नीलामी करीब 10 साल के बाद लंदन में हुई, जिसमें यह किताब 11.5 मिलियन डॉलर में बिकी.

कैंटरबरी टेल्स

  • लेखक: ज्योफ्रे चासर
  • कीमत: 7.5 मिलियन डॉलर (48.75 करोड़ रुपए)

कैंटरबरी टेल्स, इंग्लैंड के मशहूर और प्रसिद्ध कवि ज्योफ्रे चासर द्वारा लिखित सबसे अंतिम और सर्वोत्तम रचना है. कैंटरबरी टेल्स बुक की पहले संस्करण की नीलामी सन 1998 में लंदन में की गई थी और यह किताब 7.5 मिलियन डॉलर में बिकी थी.

फर्स्ट पोलियो

  • लेखक: विलियम शेक्सपीयर
  • कीमत: 6 मिलियन डॉलर (39 करोड़ रुपए)

विलियम शेक्सपीयर, अंग्रेजी साहित्य के महान नाटककार, कवि और अभिनेता थे. उनके नाटकों का लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ है. उनके नाटकों की नीलामी न्यूयॉर्क के क्रिस्टी स्थान में हुई थी तथा इसे माइक्रोसाफ्ट के सह संस्थापक पॉल एलेन ने 6 मिलियन डॉलर में खरीदा गया था.

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जन्माष्टमी पर राशि के अनुसार लगाएं कान्हा जी को भोग, और पहनाएं वस्त्र

भगवान श्रीकृष्ण जन्म-उत्सव भादौ कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन रात्रि 12 बजे मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण का पूजन विधि-विधानपूर्वक करना चाहिए। इस साल कृष्ण जन्माष्टमी 30 अगस्त को मनाई जाएगी।

धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म इसी तिथि को रोहिणी नक्षत्र और वृष लग्न में हुआ था। यह पर्व देशभर में मनाया जाता है। इस दिन बाल गोपाल के लिए पालकी सजाई जाती है। उनका शृंगार किया जाता है।

वहीं इस दिन नि:संतान दंपत्ति विशेष तौर पर जन्माष्टी का व्रत रखते हैं। वे बाल गोपाल कृष्ण जैसी संतान की कामना से यह व्रत रखते हैं और मुरलीवाले को उनकी प्रिय चीजों का भोग लगाते हैं।

ज्योतिषीय मान्यता है कि इस दिन राशि के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को शृंगार और भोग लगाने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

आज हम आपको हम बताने जा रहे हैं जन्माष्टमी पर राशि के अनुसार लगाएं भोग और पहनाएं वस्त्र:-

मेष :इस राशि के जातकों को भगवान श्रीकृष्ण का श्रृंगार लाल रंग के कपड़े से करने के बाद उन्हें माखन मिश्री का भोग लगाना चाहिए।

वृषभ : जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण को मिश्री का भोग लगाएं और चांदी के वर्क से श्रृंगार करें व सफेद चंदन का तिलक करें।

मिथुन : जन्माष्टमी के दिन लहरिया वाले वस्त्र पहनाएं व चंदन का तिलक करें और उसके बाद उन्हें भोग में दही अर्पण करना चाहिए। फिर भगवान के सामने हाथ जोड़कर अपनी अर्जी लगाएं।

कर्क : इस राशि के जातकों को भगवान श्रीकृष्ण का सफेद वस्त्र से श्रृंगार करना चाहिए और फिर उन्हें दूध और केसर का भोग लगाना चाहिए।

सिंह : गुलाबी वस्त्र पहनाएं व अष्टगंध का तिलक लगाएं, और प्रसाद में उन्हें माखन-मिश्री चढ़ाएं।

कन्या : कन्या राशि के जातकों को जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को हरे रंग के वस्त्रों से सजाएं। इसके बाद उन्हें मावे का भोग जरूर लगाएं।

तुला : तुला राशि के जातकों के जातकों को जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को गुलाबी रंग के वस्त्र पहनाएं और इसके बाद उन्हें घी का भोग लगाएं।

वृश्चिक : भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर लाल वस्त्र पहनाएं और साथ ही उन्हें माखन या दही जरूर चढ़ाएं।

धनु : इस राशि के जातक भगवान कृष्ण को पीला वस्त्र पहनाएं व पीली मिठाई का भोग लगाएं।

मकर : इस राशि के जातक भगवान कृष्ण को लाल-पीला मिश्रित रंग का वस्त्र पहनाएं व मिश्री का भोग लगाएं।

कुंभ : कुभ राशि के जातक जन्माष्टमी पूजा पर भगवान श्रीकृष्ण को नीले रंग का वस्त्र पहनाएं। फिर कान्हा को बालूशाही का भोग लगाएं।

मीन : जन्माष्टमी पर मीन राशि के जातकों को भगवान श्रीकृष्ण को पीतांबरी वस्त्र और पीले ही रंग के कुंडल पहनाएं। फिर भोग में केसर और बर्फी चढ़ाएं।

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राजस्थान की रंगों से भरी इन जगहों पर लगता है पर्यटकों का मेला

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राजस्थान भारत के उन राज्यों में से है जो पर्यटकों को सबसे अधिक लुभाता है। राजस्थान के शहर पूरी दुनिया में उनके रंगों की खासियत के कारण जाने जाते हैं। आज इस पोस्ट में हम राजस्थान के रंग बिरंगे खूबसूरत शहरों के बारे में जानेंगे, तो चलिए जानते हैं :-

‘पिंक सिटी’ -जयपुर

आज देश-विदेश के कोने-कोने में जयपुर को पिंक सिटी’ यानी ‘गुलाबी नगर’ के नाम से जाना जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि इसका यह नाम कब और क्यों पड़ा?

दरअसल, जयपुर की स्थापना के 100 साल से भी ज्यादा समय बाद इस नगर को गुलाबी नगर की संज्ञा दी गई। इससे पहले इस शहर को केवल जयपुर के ही नाम से जाना जाता था।

महाराजा सवाई जयसिंह (द्वितीय) ने 1727 में इस शहर की नींव रखी थी और उन्हीं के नाम पर इस शहर का नामकरण हुआ। वर्ष 1876 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ और प्रिंस ऑफ वेल्स युवराज अल्बर्ट जयपुर आने वाले थे।

महाराजा को सूझा कि क्यों न पूरे शहर को एक रंग में रंग दिया जाए। उच्च अधिकारियों से मंत्रणा कर उन्होंने पूरे शहर को गुलाबी रंग से रंगवा दिया। तब से यह शहर गुलाबी हो गया, जो बाद में गुलाबी नगर कहलाया।

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‘गोल्डन सिटी’ जैसलमेर

यहां निकलने वाले पीले रंग के पत्थरों से बनी इमारतों पर जब सूरज की किरणें पड़ती हैं तो ये सभी सोने के समान दमकती नजर आती हैं। राजस्थान के थार रेगिस्तान में स्थित स्वर्णिम शहर जैसलमेर अपनी डेजर्ट सफारी और भव्य किले के लिए प्रसिद्ध है।

यह किला पीले बलुआ पत्थर से निर्मित है और शाम की रोशनी जब इस किले पर पड़ती है तो यह स्वर्णिम आभा ओढ़ लेता है। इसी कारण इसे सोनार किला भी कहा जाता है।

साथ ही यहां अन्य प्राचीन इमारतें भी इसी पीले बलुआ पत्थर से बनी हैं, इसीलिए इसे स्वर्णिम शहर यानी कि ‘गोल्डन सिटी’ की संज्ञा दी गई है।

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‘ब्लू सिटी’ जोधपुर

राजस्थान का जोधपुर ‘ब्लू सिटी’ कहलाता है। यह लगभग 558 साल पहले बसाया गया था। यह एक बहुत ही खूबसूरत शहर है और यह शहर अपने रंग की वजह से जाना जाता है।

इसके बारे में कहा जाता है कि 1459 में राव जोधा ने जोधपुर शहर बसाया था। जोधा राठौड़ समाज के मुखिया और जोधपुर के 15वें राजा थे। उनके नाम से ही इस शहर का नाम ‘जोधपुर’ पड़ा, इससे पहले इस शहर का नाम मारवाड़ था।

यह शहर रेगिस्तान के बीचो-बीच बसा हुआ है। यहां आपको सभी घर नीले रंग में रंगे दिखाई देंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मी से बचने के लिए यहां के सभी घरों में नीला रंग लगाया गया है।

यही वजह है कि इस शहर को नीला शहर यानी ‘ब्लू सिटी’ कहा जाता है। ब्लू सिटी में स्थित ऐतिहासिक किले, पुराने महल और प्राचीन मंदिर जोधपुर के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक हैं।

इस शहर का हस्तशिल्प, लोकनृत्य, भोजन और गीतसंगीत सभी अपने आप में निराले हैं, जो इस शहर की शोभा को कई गुना बढ़ा देते हैं। यह शहर सूर्योदय और सूर्यास्त के समय और भी खूबसूरत दिखाई देता है।

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‘व्हाइट सिटी’ उदयपुर

उदयपुर को व्हाइट सिटी इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां ज्यादातर इमारतें संगमरमर यानी मार्बल की बनी हैं। कई खूबसूरत झीलों के कारण इसे “पूर्व का वेनिस” भी कहते हैं।

साथ ही “झीलों का शहर”, “राजस्थान का कश्मीर” आदि कई और नामों से भी इसे पुकारा जाता है। उदयपुर शहर की स्थापना महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदयसिंह ने 1559 में की थी।

विभिन्न ऐतिहासिक स्मारक, सफेद संगमरमर के महल, सुंदर झीलें और बगीचे, मंदिर, रंगीन त्योहार दुनियाभर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

यहां हर वर्ष बड़ी तादाद में देश विदेश से पर्यटक पहुंचते हैं। यहां पर संगमरमर से बनी कई आकर्षक और अनोखी इमारतें हैं, इसी कारण इसे व्हाइट सिटी यानी ‘सफेद शहर’ के नाम से जाना जाता है।

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वायरल वीडियो :- यह मासूम बच्ची सुन नहीं सकती थी, कान में लगाई मशीन तो खिलखिला उठी

एक मासूम बच्ची का वीडियो बड़ा वायरल हो रहा है। दरअसल, यह बच्ची सुन नहीं सकती। लाइफ में पहली बार उसकी कान पर जब मशीन लगाई गई, उसने पहली बार किसी की आवाज सुनी तो वो बहुत ही खुश हुई और अब इसी बच्ची की खुशी ने लोगों को खुश कर दिया है।

 

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जैसे ही बच्ची पहली बार आवाज को सुनती है तो वो सोच में पड़ जाती है। इसके बाद बच्ची बहुत खुश होती है। वो हंसने लगती है।

@RexChapman ने यह वीडियो शेयर किया है। उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर यह वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि यह बच्ची सुन नहीं सकती थी, जब उसके कान में मशीन लगती है तो वह ख़ुशी से खिलखिला उठती है। वीडियो में आप देख सकते हैं कि बच्ची की खुशी का आलम ये होता है कि वो हंसती ही जा रही है।

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भगवान ब्रम्हा से जुड़ा है इस फूल का रहस्य, जिसे देखने के लिए तरसते हैं लोग!

दुनिया में बहुत सारे खूबसूरत फूल पाए जाते हैं। विभिन्न रंग, आकार और सुगन्धित फूल सबको अपनी ओर आकर्षित करते हैं। ऐसा ही एक खूबसूरत और रहसयमई फूल भगवान ब्रम्हा से जुड़ा है जिसका नाम है ‘ब्रह्म कमल’ और इसका वैज्ञानिक नाम ससोरिया ओबिलाटा (Saussurea obvallata) है।

‘ब्रह्म कमल’ का अर्थ है ‘ब्रह्मा का कमल’ और उन्ही के नाम से इस फूल का नाम रखा गया है। ऐसा माना जाता है कि केवल भग्यशाली लोग ही इस फूल को खिलते हुए देख पाते हैं और जो ऐसा देख लेता है, उसे सुख और संपत्ति की प्राप्ति होती है।

इस फूल को खिलने में 2 घंटे का समय लगता है। ये फूल मानसून के मध्य के महीनों के दौरान खिलता है। माना जाता है कि यह पुष्प मां नंदा का पसंदीदा फूल है। इसलिए इसे नंदा अष्टमी में तोड़ा जाता है।

अधिकतर यह हिमालय के राज्यों में ही पाया जाता है जिसे देखने के लिए लोग तरसते हैं। माना जाता है कि यह फूल अलौकिक शक्तियों से भरा है और इसे देखने के बाद लोगों को अलग ही तरह का एहसास होता है।

आज इस पोस्ट में हम इस खूबसूरत और रहसयमई फूल के बारे में बताने जा रहे हैं, चलिए जानते हैं :-

ऐसे हुई थी ब्रह्म कमल की उत्पत्ति

पौराणिक मान्यता है कि ब्रह्मकमल भगवान शिव का सबसे प्रिय पुष्प है। केदारनाथ और बद्रीनाथ के मंदिरों में ब्रह्म कमल ही प्रतिमाओं पर चढ़ाए जाते हैं। माना जाता है कि जब भगवान विष्णु हिमालय क्षेत्र में आए तो उन्होंने भोलेनाथ को 1000 ब्रह्म कमल चढ़ाए, जिनमें से एक पुष्प कम हो गया था।

तब विष्णु भगवान ने पुष्प के रुप में अपनी एक आंख भोलेनाथ को समर्पित कर दी थी। तभी से भोलेनाथ का एक नाम कमलेश्वर और विष्णु भगवान का नाम कमल नयन पड़ा।

हिमालय क्षेत्र में इन दिनों जगह-जगह ब्रह्म कमल खिलने शुरु हो गए हैं इसलिए कहा जाता है कि ब्रह्म कमल का फूल विशेष दिनों में केदारनाथ में चढ़ाने से शिवजी प्रसन्न होकर जातक की मनोकामना पूर्ण करते हैं।

महाभारत में भी है उल्लेख

इस पुष्प का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। ऐसा कहा जाता है कि इसे पाने के लिए द्रौपदी व्याकुल हो गई थी। तब भीम इसे लेने के लिए हिमालय की वादियों में गए थे और वहां उनका सामना हनुमानजी से हुआ था।

भीम ने उन्हें एक वानर समझकर उनकी पूंछ हटाने का कहा था परंतु हनुमानजी ने कहा था कि तुम शक्तिशाली हो तो यह पूंछ तुम ही हटा लो।

परंतु भीम ऐसा नहीं कर पाए तब उन्हें समझ में आया था कि ये कोई साधारण वानर नहीं हैं। तब भीम को अपनी भूल का अहसास हुआ था।

औषधीय गुण

माना जाता है कि इसकी पंखुड़ियों से अमृत की बूंदें टपकती हैं। इससे निकलने वाले पानी को पीने से थकान मिट जाती है। इससे पुरानी (काली) खांसी का भी इलाज किया जाता है।

इससे कैंसर सहित कई खतरनाक बीमारियों का इलाज होता है। यह तालों या पानी के पास नहीं बल्कि ज़मीन में उगता है। इसका वानस्पतिक नाम एपीथायलम ओक्सीपेटालम है।

इसमें कई एक औषधीय गुण होते हैं। चिकित्सकीय प्रयोग में इस फूल के लगभग 174 फार्मुलेशनस पाए गए हैं। वनस्पति विज्ञानियों ने इस दुर्लभ-मादक फूल की 31 प्रजातियां पाई जाती हैं।

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राशि अनुसार जानें भाई की कलाई के लिए किस रंग की राखी होगी शुभ

रक्षाबंधन का त्यौहार हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस साल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक यह त्यौहार 22 अगस्त को मनाया जाएगा।

राखी के दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं तो वहीं भाई जीवनभर अपनी बहनों को उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं।

ज्योतिष शास्त्र की मानें तो भाई की राशि के अनुसार राखी का रंग चुनने पर भाई के जीवन में खुशहाली आती है।

तो आइए जानते हैं राशि के अनुसार भाई की कलाई पर किस रंग की राखी बांधने से मिलेगा शुभ फल।

मेष राशि

इस राशि के भाई को रेड कलर के धागे की राखी बांधे। मीठे में उसे मालपुआ खिला सकती हैं।

वृष राशि

वृषभ राशि के स्वामी शुक्र देव होते हैं। इसलिए वृषभ राशि के भाइयों को अपनी बहनों से इस वर्ष नीले रंग की राखी बंधवाना अधिक फलदायी रहेगा।

मिथुन राशि

मिथुन राशि की स्वामी बुध ग्रह है, इस राशि के जातकों को हरे रंग की राखी बांधना शुभ होता है। इससे उनके जीवन में उन्नति और दीर्ध आयु की प्राप्ति होगी।

कर्क राशि

कर्क राशि वाले भाइयों को पीले रंग की रेशमी धागे वाली राखी बांधे, उन्हें मीठे में रबड़ी खिलाएं।

सिंह राशि

सूर्य देव को सिंह राशि का स्वामित्व प्राप्त होता है, इसलिए इस वर्ष यदि इस राशि के भाई अपनी कलाई पर बहनों द्वारा, पीले या लाल रंग की राखी बंधवाते हैं तो, उन्हें अपने कार्यक्षेत्र व करियर में अपार सफलता की प्राप्ति होना निश्चित है।

कन्या राशि

कन्या राशि का स्वामी भी बुध ग्रह होता है, इस राशि के जातकों को भी हरे रंग की राखी बांधना शुभ होगा।

तुला राशि

तुला राशि के भाई को हल्के पीले रंग की रेशमी डोरी की राखी बांधें और हलवे से मुंह मीठा करा दें ।

वृश्चिक राशि

वृश्चिक राशि के स्वामी लाल ग्रह मंगल को माना गया हैं. ऐसे में यदि इस दिन वृश्चिक राशि के भाइयों की कलाई पर उनकी बहनें लाल, या मेहरून रंग की राखी बांधें तो, इससे उनके भाई अपने जीवन की हर स्थिति में अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सक्षम हो सकेंगे।

धनु राशि

धनु राशि का स्वामी बृहस्पति ग्रह है, इस राशि के जातकों को सुनहरे पीले रंग की राखी बांधना शुभ है।

मकर राशि

मकर राशि के भाई को मल्टीकलर राखी बांधे और मीठे में रस वाली मिठाई खिलाएं ।

कुंभ राशि

कर्मफल दाता शनिदेव, कुंभ राशि के भी स्वामी होते है। ऐसे में कुंभ राशि वाले भाइयों को कलाई पर गहरे रंग की राखी बंधवाना शुभ रहेगा। क्योंकि इससे उनकी कुंडली में शनि देव से जुड़ा हर दोष तो खत्म होगा ही, साथ ही वे अपने कार्यक्षेत्र पर भी उत्तम फलों की प्राप्ति कर सकेंगे।

मीन राशि

मीन राशि के स्वामी गुरु बृहस्पति होते है। ऐसे में इस राशि के भाइयों की कलाई पर, उनकी बहनों द्वारा केवल पीले रंग की ही राखी बांधना अनुकूल रहेगा। क्योंकि इससे उन्हें अपने हर प्रकार के रोग से निजात मिलने की संभावना अधिक रहेगी।

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