ये हैं भारत के 5 सबसे स्वच्छ शहर!!

भारत दुनिया के सबसे बड़े विकासशील देश के रूप में जाना जाता है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चलाए गए स्वच्छता अभियान के तहत किए गए कार्यों के कारण, देश में स्वच्छता अभियान जोरों पर है।

इस अभियान के तहत देशवासियों ने भी अपनी भागीदारी दर्ज कराई है। इसके तहत हर कोई अपने शहर को साफ रखने की कोशिश कर रहा है।

आज इस पोस्ट में हम जानेंगें भारत के 5 सबसे स्वच्छ शहरों के बारे में तो आइए जानते हैं इस लिस्ट में शामिल 5 स्वच्छ शहरों के बारे में:-

इंदौर

इंदौर शहर को मध्य प्रदेश की वाणिज्यिक राजधानी के रूप में जाना जाता है और इस सूची में इंदौर सबसे ऊपर है। इंदौर अब भारत के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में जाना जाता है।

लगभग 20 लाख की जनसँख्या वाला यह शहर समुद्र तल से 550 मीटर पर बसा हुआ है। आपको बता दे कि इंदौर को मिनी मुंबई भी कहते है क्योंकि इस शहर की ग्रोथ रेट काफी अच्छी है और यहाँ पर ज्यादातर अमीर और मिडिल क्लास के लोग रहते हैं। इंदौर को सबसे स्वच्छ शहर के रूप में सम्मानित भी किया गया था।

भोपाल

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल इस सूची में दूसरे स्थान पर है। शहर को भारत के दूसरे सबसे स्वच्छ शहर के रूप में सम्मानित किया गया है।

इस शहर की जनसँख्या भी इंदौर के बराबर लगभग 20 लाख है यह समुद्र तल से 527 मीटर ऊंचाई पर बसा हुआ है। सफाई के मामले में यहां की नगरपालिका और यहाँ के लोग काफी जागरूक हैं इस वजह से ये काफी स्वच्छ शहर है।

विशाखापत्तनम

आंध्र प्रदेश में विशाखापत्तनम अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है क्योंकि यह एक समुद्र तटीय शहर है  भारत का तीसरा सबसे साफ शहर जाना जाता है। विशाखापत्तनम आंध्र प्रदेश की वित्तीय राजधानी है और राज्य का प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र है।

समुद्र तल से 45 मीटर की ऊंचाई में बसे विशाखापट्टनम में करीब 18 लाख लोग रहते हैं। समुद्र के किनारे बसा होने के कारण इस शहर का मौसम ज्यादातर समय में सुहाना बना रहता हैं।

इस शहर का तापमान हमेशा संतुलित रहता है। वहीं साफ सफाई की बात करे तो यहां के लोग इस बात का काफी ख्याल रखते हैं।

सूरत

सूरत शहर गुजरात के सबसे मुख्य और सबसे बड़े औधोगिक शहर में से एक है। यह भारत के सबसे साफ शहरों की सूची में चौथे स्थान पर आता है सूरत भी विशाखापट्टनम की तरह समुद्र के किनारे बसा हुआ है और इसकी समुद्र तल से ऊंचाई करीब 13 मीटर है।

हालाकि औधोगिक शहर होने की वजह से यहां की फैक्ट्रीयों से काफी प्रदूषण होता है फिर भी यहाँ के लोग साफ सफाई का खास ख्याल रखते हैं।

मैसूर

मैसूर अब पूरी दुनिया में अपनी साफ-सफाई के लिए जाना जाता है। इस सूची में पांचवे स्थान पर मैसूर को रखा गया है. यह कर्नाटक राज्य के प्रमुख शहरों में से एक है जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई 763 मीटर है।

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कीड़ाजड़ी उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती है इसे दुनिया का सबसे महंगा फंगस भी कहा जाता है। बाजार में यह 10 लाख रुपए किलो तक बिकता है। दुनिया के इस सबसे महंगे फंगस को भारत के हिमालयी क्षेत्र में ‘कीड़ाजड़ी’ और ‘यारशांगुबा’ कहते हैं।

क्या है कीड़ाजड़ी

यह एक तरह का जंगली मशरूम है, जो एक खास कीड़े की इल्लियों यानी कैटरपिलर्स को मारकर उसके ऊपर पनपता है। इस जड़ी का वैज्ञानिक नाम कॉर्डिसेप्स साइनेसिस है।

जिस कीड़े के कैटरपिलर्स पर यह उगता है, उसे हैपिलस फैब्रिकस कहते हैं। स्थानीय लोग इसे कीड़ाजड़ी कहते हैं, क्योंकि यह आधा कीड़ा और आधा जड़ी है। चीन और तिब्बत में इसे यारशागुंबा भी कहा जाता है।

कई बीमारियों में असरदार

कीड़ा जड़ी का इस्तेमाल प्राकृतिक स्टीरॉयड की तरह किया जाता है। इसके सेवन से यौन स्वास्थ्य संबंधी कई बीमारियां दूर हो जाती हैं। साथ ही कई तरह के शारीरिक विकार भी ठीक हो सकते हैं।

इसी वजह से इसे हिमालयन वायग्रा के नाम से जाना जाता है। जहां अंग्रेजी वायग्रा के इस्तेमाल से दिल के कमजोर होने का खतरा रहता है, वहीं इस जड़ी के इस्तेमाल से स्वास्थ्य पर कोई खराब असर नहीं पड़ता है।

कैंसर जैसी बीमारी के इलाज में भी इस जड़ी को काफी असरदार माना जाता है। आयुर्वेद के मुताबिक, सांस और गुर्दे की बीमारी को सही करने में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही यह जड़ी शरीर में रोगरोधी क्षमता को भी बढ़ाती है।

यह है वजह महंगे होने की

इसके इतने महंगे होने की एक वजह यह है कि कीड़ा जड़ी हिमालय में समुद्र तल से 3,500 से लेकर 5,000 मीटर तक की ऊंचाई पर ही मिलती है। उत्तराखंड में कुमाऊं के धारचुला और गढ़वाल के चमोली में कई परिवारों के लिए यह आजीविका का साधन है।

वह इन जड़ी को इकट्ठा करके बेचते हैं। भारत के उत्तराखंड के अलावा यह जड़ी चीन, नेपाल और भूटान के हिमालयी क्षेत्रों में भी मिलती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह जड़ी करीब 18 लाख रुपये किलो बिकती है।

सिर्फ स्थानीय लोगों को निकालने का अधिकार

कीड़ाजड़ी निकालने का अधिकार संबंधित पर्वतीय इलाके के वन पंचायत क्षेत्र से जुड़े लोगों को होता है। कीड़ाजड़ी निकालने के बाद लोग उसे भेषज संघ या वन विभाग में पंजीकृत ठेकेदारों को बेचते हैं। उत्तराखंड के तीन जिलों में इसके जरिए करीब सात-आठ हजार लोगों की आजीविका चलती है।

युवती ने घर खरीदने के लिए अपनाया यह रास्ता, जान कर रह जायेंगे दंग!

एक घर खरीदना या बनाना लगभग हर व्यक्ति का सपना होता है। इस सपने को पूरा करने के लिए लोग कई तरीके अपनाते हैं, लेकिन चीन की युवती ने ऐसा तरीका अपनाया जिसे सुनकर आप दंग रह जायेंगे।

चीन के शेनजेन की रहने वाली शिआयो ली (काल्पनिक नाम) ने 1,20,000 युआन का घर खरीदने के लिए एक ही समय में 20 बॉयफ्रेंडस बनाये और उन सभी से 1-1 आईफोन 7 गिफ्ट में ले लिया। बाद में इन 20 आईफोन्स को उसने एक वेबसाइट पर बेच दिया और इससे मिले पैसे से उसने एक घर खरीद लिया।

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इस बात का खुलासा तब हुआ जब इस लड़की की कहानी एक ब्लॉग फोरम के माध्यम से सामने आई जिसे उसके साथ काम करने वाली एक महिला ने शेयर किया था।

इसमें उसने लिखा कि उसके ऑफिस के लोग उस युवती के बारे में बातें कर रहे थे जिसने 20 बॉयफ्रेंडस को फंसा कर उनसे आईफोन बटोर कर ऑनलाइन बेच दिया।

उसने बताया कि वह लड़की गरीब परिवार से थी और उसकी माँ गृहणी है और पिता प्रवासी मजदूर। परिवार में सबसे बड़ी होने के नाते घर खरीदने की जिम्मेदारी उस पर थी लेकिन विश्वास नहीं होता कि घर खरीदने के लिए वह ऐसा तरीका अपनाएगी।

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उसकी कहानी शेयर होने पर कुछ लोगों ने उसे बेशर्म कहा, हालाँकि कुछ लोगों ने उसकी प्रशंसा भी की।

एक महिला ने लिखा, “मैं एक बॉयफ्रेंड नहीं खोज पा रही हूँ और उसने एक साथ 20 बॉयफ्रेंड्स रखे। मैं चाहती हूँ कि वह मुझे ऐसे कौशल सिखाये”।

मेक्सिको में पानी के नीचे मिली दुनिया की सबसे अद्भुत और बड़ी गुफा !

दुनिया इतनी नायाब चीजों से भरी पड़ी हैं कि मनुष्य हर दिन एक नई जगह एक नई खोज से वाकिफ़ होता रहता है। मेक्सिको में गोताखोरों के एक ग्रुप ने मेक्सिको में पानी में डूबी दुनिया की सबसे अद्भुत गुफा खोजी है। यह गुफा 347 किलोमीटर लंबी हैं।

मेक्सिको को युकातान प्रायद्वीप के नीचे मिली ये गुफा पानी में डूबी दो गुफाओं को जोड़ती है। इस खोज में 14 साल की मेहनत और कई घंटों का समय लगा।

वैज्ञानिकों का मानना है कि 10,000 से 12,000 साल पहले इन गुफाओं का इस्तेमाल माया साम्राज्य किया करता था। इसी वजह से इस प्रोजेक्ट को ग्रेट माया एक्विफर नाम दिया गया है।

यह खोज ग्रैन एक्यूफेरो माया (GAM) के पुरातत्वविदों के नेतृत्व में 10 महीने के लंबे अभियान के परिणामस्वरूप हुई है। दोनों गुफा प्रणाली वास्तव में एक थीं।

वैसे अगर हम आकार की बात करें तो इसके हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी गुफा अमेरिका में “मैमथ कैव” कही जाने वाली गुफा 650 किलोमीटर लंबी है।

साक आक्तुन और दोस ओजोस को गुफा के बारे में पहले से ही पता था लेकिन तुलुम शहर के पास मौजूद ये गुफाएं आपस में जुड़ी हैं, यह किसी को पता नहीं था। अब इस पूरे तंत्र को साक आक्तुन सिस्टम नाम दिया गया है।

जर्मन गोताखोर रॉबर्ट श्मिटनर के अनुसार “यह 20 वर्षों से अधिक का प्रयास है, मुख्य रूप से इस विशालकाय साक आक्तुन सिस्टम को खोजने में 14 साल लग गए।

अब यह सबकी जिम्मेदारी है कि वे इसकी सुरक्षा करें। मेक्सिको के युकातान में ही सेनोते नामक एक और गुफा भी है। यह गुफा पर्यटकों में खासी लोकप्रिय है।

युकाटन प्रायद्वीप अपने समुद्र तटों, मायन खंडहरों और सेनोतों या बड़े पैमाने पर सिंकहोल्स के लिए जाना जाता है। क्विंटाना रो राज्य में, 300 से अधिक सेनोट हैं।

मेक्सिको के युकातान में ही सेनोते नाम की गुफा भी है। पर्यटकों में खासी लोकप्रिय यह गुफा साक आक्तुन सिस्टम से जुड़ी हैं। अब सेनोते में डुबकी लगाने वाले लोगों को पता चलेगा इस पानी के नीचे कितनी खूबसूरत दुनिया है।

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प्रदूषण का भयानक चेहरा देखना है? तो देखें इन 12 तस्वीरों को!!

विश्व की बढ़ती जनसंख्या का सीधा प्रभाव पर्यावरण और प्रकृति पर पड़ता है. इससे न केवल हमारा आर्थिक संतुलन बिगड़ रहा है बल्कि समस्त जैवमण्डल और जीवन श्रृंखला प्रभावित हो रहे हैं.

यह केवल तेजी से बढ़ती जनसंख्या का ही दुष्परिणाम है कि प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है, जिससे प्राकृतिक आपदाएं, जलवायु परिवर्तन तथा  ग्लोबल वार्मिंग जैसी गंभीर चुनौतियां पैदा हो रही हैं.

पर्यावरण संरक्षण समय की जरुरत

महात्मा गांधी ने प्राकृतिक संसाधनों के अत्याधिक दोहन को देखते हुए ही यह बात कह दी थी कि मनुष्य की मूलभूत आवश्कयताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति के पास सब कुछ है लेकिन मनुष्य की महत्वकांक्षा और लालच के आगे कुछ भी नहीं है.

वहीँ 18वीं सदी के महान अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस ने अपने एक लेख में चेतावनी दी थी कि यदि आत्म-नियंत्रण और कृत्रिम साधन से बढ़ती जनसंख्या को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो प्रकृति खुद अपने क्रूर हाथों से नियंत्रित करने का प्रयास करेगी.

इस लेख कुछ ऐसी ही भयावह तस्वीरें दिखने जा रहे हैं जो पर्यावरण की मौजूदा चिंताजनक हालत को खुद-ब-खुद बयान कर रही हैं.

  1. इंडोनेशिया का जावा द्वीप दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला द्वीप है. तस्वीर में आप देख सकते है कि कैसे लोग कचरे से भरी लहर पर सर्फिंग करने को मजबूर हैं.

    विश्व पर्यावरण दिवस, इंडोनेशिया

  2. विल्मेट नेशनल फॉरेस्ट अमेरिका के ओरेगन के कैसकेड रेंज के मध्य भाग में स्थित एक राष्ट्रीय वन है. इस वन का लगभग 99% भाग काट दिया गया है.

  3. अमेरिका के कैलिफोर्निया का केन नदी तेल क्षेत्र, जिसका 1899 के बाद से दोहन किया गया है.

    पर्यावरण को नुक्सान

  4. कनाडा के अल्बर्टा में तारकोल से भरी जगह, जोकि खनन और टॉक्सिक कचरे से बर्बाद हो चुकी है.

  5. नार्थ पैसिफिक के मिडवे आइलैंड में प्लास्टिक खाने से मरा हुआ एक अल्बाट्रोस(Albatross) पक्षी. हर साल 1 लाख समुद्री स्तनपाई जीव और 10 लाख पक्षी प्लास्टिक खाने से मारे जाते हैं.

  6. बांग्लादेश में कचरे से भरा विशाल क्षेत्र

  7. ग्लोबल वार्मिंग के कारण मालदीव आगामी 50 वर्षों में डूब जायेगा

  8. ग्लोबल वार्मिंग के कारण नॉर्वे में स्वाल्बार्ड द्वीप के पास विशाल हिमशैल पिघल रहा है.

  9. यह तस्वीर दिल्ली में पिछले साल नवंबर में आयोजित मैराथन “नई दिल्ली 10 हजार चैलेंज” की है, जिसमें भारी प्रदूषण के चलते लोग मास्क पहन कर दौड़ रहे हैं

  10. जकार्ता इंडोनेशिया की राजधानी एवं सबसे बड़ा नगर है. यह उत्तर-पश्चिमी तट पर स्थित है. यह तस्वीर दिसंबर 2016 की है. यहाँ के लोग गंदे पानी और कूड़े से भरी इस नदी को देख कर भी अनदेखा करते है.

  11. ब्राजील का इपोजुका बीच में प्लास्टिक से लिपटा एक मरा हुआ कछुआ. तस्करों से लेकर प्रदूषण तक, समुद्री कछुओं को भारी खतरों का सामना करना पड़ रहा है. WWF ने कछुओं की लगभग प्रजातियों को विलुप्ति के कगार पर खड़ा घोषित किया है.

  12. रूस की मीर नामक हीरे की खान(Mir mine). 1200 मीटर व्यास वाली और 525 गहरी यह विशाल खान दुनिया की सबसे बड़ी हीरे की खान है.

भारत में बसा है दुनिया का सबसे बड़ा परिवार, जिसमें 181 सदस्य रहते हैं…

आज के महंगाई के दौर में चार-पांच लोगों के परिवार का पालन-पोषण करना भी एक बड़ी चुनौती है लेकिन मिजोरम में दुनिया का सबसे बड़ा परिवार एक साथ रहता है और खुश है। इस शानदार परिवार में 181 सदस्य हैं।

अपने बेटों के साथ बढ़ई का काम करने वाले जियोना चाना का परिवार मिजोरम में खूबसूरत पहाडि़यों के बीच बटवंग गांव में एक बड़े से मकान में रहता है। इस मकान में 100 कमरे हैं।

जिओना चाना मिजोरम के बटवंग में एक बड़े घर में 39 पत्नियों, 94 बच्चों, 14 बहुओं और 33 पोते-पोतियों के साथ रहती हैं। घर में कुल 100 कमरे हैं। जियोना कहते हैं कि उन्हें को दुनिया के सबसे बड़े परिवार का मुखिया होने पर गर्व है।

आम परिवार के महीने भर का राशन जिओना का परिवार एक दिन में खा जाता है। उन्हें एक दिन के खाना पकाने के लिए 40 किलो चावल, 40 किलो चिकन, 24 किलो दाल, 50 किलो सब्जियां चाहिए। डाइनिंग हॉल में 50 टेबल हैं। जियोना की पत्नियां खाना बनाती हैं, जबकि उनकी बेटियां घर का काम करती हैं।

जियोना खुद को महाराजा समझते हैं

जियोना खुद को महाराजा समझते हैं उन्होंने ग्राउंड फ्लोर पर अपनी कई बड़ी तस्वीरें लगाई है। 39 पत्नियों की देखभाल करने वाला जियोना सच में अनोखा है। जिओना खाने की टेबल पर अपनी सबसे युवा पत्नियों के साथ बैठते हैं।

दूसरी पंक्ति में उनकी बुजुर्ग पत्नियां बैठती हैं। उनकी सबसे छोटी पत्नी 33 साल की हैं। उसका नाम सिमथंगी है। इनकी शादी 2000 में हुई थी।

खास बात तो ये है कि 39 शादियां करने के बाद भी जियोना की ख्वाहिश है कि अगर भगवान ने चाहा तो वे 40वीं शादी भी कर लेंगे। जियोना के परिवार का नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी शामिल है।

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जानिए कैसा था बचपन इन महापुरुषों का !!!

यह आवश्यक नहीं कि जो बच्चा बचपन में कुशाग्र बुद्धि होगा वही आगे चल कर महान और महापुरुष बनेगा। आज इस पोस्ट में हम आपको कुछ ऐसे महापुरुषों के बारे में बताने जा रहे हैं जो बचपन में सुस्त, मूर्ख या खिलाड़ी समझे जाते थे, वही आगे चल कर महान वैज्ञानिक, साहित्यकार और राजनीतिज्ञ बने।

तो चलिए जानते हैं :-

अल्बर्ट आइंस्टीन

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन जब म्यूनिख में पढ़ते थे, तब उन्हें बुद्धिमान बालक नहीं समझा जाता था। कक्षा में चुपचाप बैठते थे।

बोलते बहुत कम थे। शिक्षक उन्हें सुस्त और आलसी कहा करते थे। 26 वर्ष की आयु में ही उन्होंने एक नवीन प्रयोग कर दिखाया, जिससे वह रातों-रात चमक गए।

एक बार आइंस्टीन बस से कहीं जा रहे थे। कंडक्टर ने उनसे टिकट के पैसे लेकर शेष वापस कर दिए। उन्होंने दो-तीन बार शेष पैसे गिने पर ठीक प्रकार हिसाब न लगा सके। इस पर कंडक्टर ने उनके हाथ से रेजगारी लेकर झुंझलाते हुए कहा, “जनाब लगता है आप गणित में बहुत कमजोर हैं।”

बेचारे कंडक्टर को ज्ञान न था कि वह संसार के महान वैज्ञानिक से बात कर रहा है। कंडक्टर की इस बात पर वह हंस पड़े।

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विंस्टन चर्चिल

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने वाले विंस्टन चर्चिल का मन बचपन से पढ़ाई में नहीं लगता था परंतु वह बहुत उद्यमी थे। कई बार अनुत्तीर्ण होने के कारण उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा।

किसी तरह दूसरे स्कूल में प्रवेश मिला जो महिलाओं द्वारा संचालित किया जाता था। इस विद्यालय में भी वह मूर्ख, उदंड सिद्ध हुए।

स्थिति यहां तक पहुंची कि उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। बाद में उन्होंने अपना मन पढ़ाई में लगाया और आगे चल कर ब्रिटेन के चर्चित प्रधानमंत्री रहे।

न्यूटन

न्यूटन का बचपन, किशोरावस्था और युवापन खेलकूद में ही गुजरा। वह खेलने में मस्त रहा करते थे। गणित में बहुत कमजोर थे इसलिए उन्हें कम बुद्धि का विद्यार्थी समझा जाता था।

वह पतंग उड़ाते, लकड़ी की घड़ियां बनाते और जल चक्र आदि से खेलते। आगे चल कर उन्होंने कई महान आविष्कार किए और महान वैज्ञानिक कहलाए।

एक दिन न्यूटन अपने अनुसंधान में खोए हए थे। भोजन करने का समय हो गया था। उनकी नौकरानी भोजन का थाल चुपके से आकर पीछे रखी हुई मेज पर रख कर चली गई। इसी बीच एक बिल्ली आकर सारा भोजन चट कर गई।

बहुत देर बाद जब न्यूटन ने अपनी कुर्सी पर बैठे हुए ही पीछे की ओर देखा तो भोजन की थाली खाली मिली। तब उनके मुंह से अनायास निकल पड़ा, “चलो अच्छा हुआ आज मैंने समय पर खाना खा लिया”। इतना कह कर वह पुनः अपने काम में लग गए।

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चार्ल्स डार्विन

चार्ल्स डार्विन का विद्यार्थी जीवन में पढ़ने लिखने में बिल्कुल मन नहीं लगता था। उन्हें कक्षा में मूर्ख समझा जाता था। कक्षा में ही नहीं बल्कि उन्हें पूरे विद्यालय में ही वर्ष का सबसे कम बुद्धि का विद्यार्थी घोषित किया। यही डॉर्विन आगे चल कर महान वैज्ञानिक बने।

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बच्चों का आत्मविश्वास कम करती हैं माता पिता की यह आदतें

माता पिता बच्चों में बचपन से ही अच्छी आदतें डालना और उन्हें परफैक्ट बनाना चाहते हैं। इस दौरान वह अपने बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार कर जाते हैं, जिससे वह खुद परिचित नहीं होते।

ऐसे व्यवहार का बच्चों की पर्सनैलिटी पर उल्टा असर पड़ता है। आपका बच्चा सब जानते हुए भी कुछ नहीं कर पाता। एक शोध के मुताबिक, माता-पिता द्वारा हर बात पर उपेक्षा, मारना-पीटना, कमियां निकलना उनमें डर का भाव पैदा करता है।

बच्चों को लगता है कि उनके पेरेंट्स उन्हें पसंद नहीं करते। आज हम पेरेंट्स की कुछ ऐसी आदतों के बारे में बता रहे हैं जिससे बच्चों का कॉन्फिडेंस लूज़ हो सकता है:-

टोका टाकी

भले ही आप को बच्चों का बैड पर कूदना, दौड़ना -भागना और उल्टे सीधे काम करना अजीब लगे लेकिन बच्चों के लिए यह बड़ी बात होती है जब पेरेंट्स बच्चों को हर समय टोकते रहते हैं तो उनमें उस काम को लेकर डर बैठता है इसलिए जरूरी है बच्चों को टोकने की जगह प्यार से समझाएं कभी-कभी उनकी इन आदतों को इग्नोर करें।

तुलना करना

पेरेंट्स के अंदर सबसे बुरी आदत होती है कि वे अपने बच्चों की पड़ोसी या फिर रिश्तेदारों के बच्चों से तुलना करते हैं। ऐसा करने से बच्चों की मनोस्थिति पर बुरा असर पड़ता है।

उनमें हीन भावना जन्म लेती है, जो आगे चलकर खतरनाक रूप धारण कर सकती है। भूल कर भी बच्चे के सामने उसकी तुलना दूसरे बच्चों से ना करें।

मजाक बनाना

कुछ पेरेंट्स ऐसे हैं जो बिना सोचे समझे बच्चों की बचकानी बातों का मजाक उड़ाने रखते हैं। ऐसा आप भले ही मजाक में करते हो लेकिन भावुक बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ता है। वह इस बात को दिल में रखते हैं। इसलिए जरूरी है कि बच्चों की हर बात को ध्यान से और प्यार से सुने और जवाब दें।

छोटी-छोटी बातों पर पीटना

बचपन में बच्चों का गलती करना आम बात है। बचपन में उनकी कोई भी गलती इतनी बड़ी नहीं होती जिसे लेकर उन्हें मारा-पीटा जाए। अक्सर ऐसा होने से वह खुद को देख सुरक्षित महसूस नहीं करते।

उनमें असुरक्षा की भावना पैदा होगी। पेरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चे को मारने- पीटने की जगह प्यार से समझाएं या फिर हल्की सजा देकर छोड़ दें।

कमी निकालना

बचपन इम्परफैक्ट होता है जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है वह परफैक्शन की तरफ रुख करता है लेकिन कई माँ-बाप को अपने बच्चों में बचपन से ही परफैक्ट चीजें चाहिए होती हैं।

जैसे बच्चा पेंटिंग करता है लेकिन वह परफैक्ट न बने तो पेरेंट्स उसमें कमियां निकालने लगते हैं। ऐसा व्यवहार करने से बच्चे का उस काम के प्रति कॉन्फिडैंस लूज़ हो सकता है। पेरेंट्स को चाहिए कि वे समय-समय पर बच्चों की तारीफ करते रहें ।

ध्यान रखें यह बातें

  • समय-समय पर बच्चों की तारीफ करते रहें।
  • बाहरी व्यक्ति के सामने कभी भी बच्चे के कामों की बुराई न करें।
  • बात-बात पर बच्चों को टोकना और मारना बंद करें
  • बचपन में ही परफैक्ट बनाने का ख्याल मन से निकाल दें।
  • बच्चों की कुछ आदतों को इग्नोर करें।
  • गलती करने पर प्यार से समझाएं।

पंजाब केसरी से साभार

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लाखों बांसों से बनी है ये भूल-भुलैया, एक बार खो गये तो समझो…

उत्तरी इटली में पार्मा शहर के पास एक भूल-भुलैया है। यूं तो हर कहीं जगह -जगह पर मक्के के खेतों में भूल-भुलैया बनी मिल जाती हैं लेकिन बांसों से बनी इस भूल-भुलैया के रास्ते 3 किलोमीटर में फैले हैं और इसका क्षेत्रफल 70000 वर्ग मीटर है।

इस लिहाज से यह ‘लाबिरिंतो डेला मासोने’ यूरोप की सबसे बड़ी भूल-भुलैया है। पेशे से प्रकाशक रहे फ्रांको मारियो रिची ने इस भूलभुलैया का सपना 30 साल पहले देखा था जब वह नौजवान थे।

दरअसल पार्मा शहर के बाहर उनका एक वीक एंड हाउस हुआ करता था । वहां उनके दोस्त और उनके प्रकाशन गृह से जुड़े लेखक अर्जेटीना के खॉर्गे लुइस बोर्गेस भी आकर रहा करते थे।

बोर्गेस की रचनाओं का एक विषय लेवरिंथ भी था। 1899 में जन्मे बोर्गेस की 55 साल के होते होते आंखों की रोशनी पूरी तरह चली गई थी।

फोंटानेलाटो में अपने वीकेंड हाउस में उनका हाथ पकड़ इधर-उधर ले जाते रिकी को इस बात का अहसास हुआ कि जीवन में अनिश्चितआएं कितनी महत्वपूर्ण होती हैं, जब आप चीजों को देख ना सके या उनका आभास ना कर सके और इसी एहसास से फ्रांको मारियो रिची के उस अपने का जन्म हुआ जिसे उन्होंने बाद में अपनी जमीन पर साकार किया ।

हकीकत में बदला एक सपना

फ्रांको मारियो रिची अपने अनुभवों को दुनिया के बहुत से दूसरे लोगों के साथ सांझा करना चाहते थे, उन्हें जिंदगी की भूल भुलैया की याद दिलाने के लिए एक कृत्रिम भूल भुलैया में ले जाना चाहते थे तो अपनी जमीन पर उन्होंने बांस के लगभग 2 लाख पेड़ लगाए।

बाँस हमेशा हरे भरे रहते हैं और 15 मीटर तक बढ़ सकते हैं। जो लोग गांव में रहते हैं और उनके पास बांस के बगीचे हैं उन्हें पता है कि बांस के पेड़ बहुत तेजी से बढ़ते हैं, और बांस के पेड़ अगर बड़े इलाके में फैले तो उनके झुरमुट में कोई भी रास्ता भूल सकता है।

फ्रांको की भूल-भुलैया में घुसने का एक ही रास्ता है और निकलने का भी लेकिन उनके बीच इतने सारे रास्ते हैं कि आदमी उनमें खो ही जाता है।

सारे रास्ते एक जैसे लगते हैं और लोगों को लगता है कि उन्हें तो यह रास्ता पता है और फिर लगता है कि यह तो बिल्कुल ही अलग है जगह है। पता ही नहीं चलता कि वह कहां है और वहां से बाहर कैसे निकले ।

लबिरिंनतो डेला मासोने एक ज्योमैट्रिक डिजाइन पर आधारित है और रोमन दौर की याद दिलाती है। सीधे-सीधे रास्ते हैं जो 90 डिग्री के कोण पर मुड़ते हैं इसलिए उन्हें याद रखना और मुश्किल हो जाता है लेकिन यह भूल भुलैया इतनी भी बड़ी नहीं है कि उससे बाहर न निकाला जा सके और वह घबराने लगें। लोग यहां इतनी कंफ्यूज होते हैं उतने ही मंत्र मुग्ध भी।

इमरजेंसी की स्थिति में वे मदद मांग सकते हैं। भूलभुलैया में जगह-जगह पर पहचान के लिए पोजीशन मार्क लगे हैं। फोन करके खोये हुए लोग अपनी पोजीशन बताते हैं और उसके बाद भूल भुलैया के डायरेक्टर और एदुआर्दो पेपिनो उन्हें खुद लेने पहुंचते हैं और बाहर लेकर आते हैं।

वहां बताते हैं की इस “भूलभुलैया” का मूल अर्थ बहुत ही गंभीर और महत्वपूर्ण है, यह हमारे जीवन का प्रतीक है ऐसी ही मुश्किल चीजों से हमारा वास्ता अपने जीवन में पड़ता है और ऐसी ही मुश्किलों रास्तों से हम गुजरते हैं और आखिर में हमें अपनी मुक्ति का रास्ता मिल ही जाता है ।

भूल-भुलैया बीच है एक “संग्रहालय”

भूल भुलैया के केंद्र में एक इमारत है या यूं कहें नियो क्लासिकल इमारतें । इनमें एक म्यूजियम है जहां वह कलाकृतियां प्रदर्शित हैं जो फ्रेंको ने अपने जीवन में इकठ्ठी कीं। इसके अलावा उनका किताबों का संग्रह और वे सारी किताबें जो उनके प्रकाशन ने 50 सालों में छापीं,वहां देखी जा सकती हैं।

पक्षी ‘हजारों मील’ का सफर कैसे करते हैं?

कुछ पक्षी प्रत्येक मौसम में प्रवास करते हैं। वे हजारों मील की यात्रा करते हुए बहुत लंबी दूरियां तय करते हैं। सबसे लंबी दूरी तय करने वालों पक्षियों में ‘बार टेल्ड गॉडविट’ भी शामिल हैं।

वैज्ञानिकों ने इनका पीछा किया तो पाया कि ये न्यूजीलैंड से अलास्का तक का सफर 3 टुकड़ों में तय करते हैं। यह दूरी 30 हजार किलोमीटर है जिसे ये पक्षी 20 दिन में तय।करते हैं। न्यूजीलैंड या ऑस्ट्रेलिया से उड़कर ये एशिया तक आते हैं।

यंहा से उड़कर ये अमेरिका के अलास्का प्रान्त तक जाते हैं। अलास्का से घर वापसी का सफर ये बिना रुके करते हैं । यह दूरी भी करीब 11,800 किलोमीटर बैठती है।

लंबी दूरी तय करने वाले कई पक्षी बिना रुके पहाड़ों, जंगलों, शहरों तथा समुद्रों के ऊपर से उडा़न भरते हैं। वे विशेषज्ञ मार्ग निर्देशक (नेवीगेटर) होते हैं। मगर वे अपना रास्ता कैसे ढूंढ लेते हैं, यह अभी तक रहस्य बना हुआ है।

वे महाद्वीपों को पार करते हैं और उसी स्थान तथा उसी घोंसले पर लौट आते हैं, जहां से उन्होंने शुरुआत की थी। वे ऐसा कैसे कर लेते हैं?

कौन-सी चीज़ उन्हें अपना पिछले वर्ष वाला घोंसला तथा घर ढूंढने में मदद करती है? वे कैसे जाने और वापिस लौटने के लिये अपना मार्ग खोज लेते हैं?

‘हडसोनियन गॉडविट्स‘ पक्षी उत्तर अमेरिका में अलास्का से दक्षिण अमरीका के सुदूर चिलोई टापू तक लम्बा सफर करते हैं

यहां तक कि नवजात तथा कम आयु के पक्षी, जिन्होंने पहले कभी उस मार्ग पर यात्रा नहीं की थी, पूरी सटीकता से इसे अंजाम देते हैं? घर वापिस लौटने का उनका यह कौशल वास्तव में हैरानी जनक है।

एक अनुमान यह है कि अपने गतंव्य तक पहुंचने के लिए मार्ग खोजने हेतु पक्षियों की मदद प्रसिद्ध जमीनी पहचान स्थल (लैंडमार्क्स) करते हैं। मगर रात को वे क्या करते होंगे?

यह भी सोचा जा सकता है कि रात को अपनी उड़ान के लिए वे जाने- पहचाने सितारों व तारामंडलों की मदद लेते होंगें।मगर तब क्या, जब आसमान में बादलों तथा आंधी वगैरह के कारण तारे दिखाई नहीं देते?

फिर भी नवजात पक्षी कैसे अपना रास्ता खोज लेते होंगे, जिन्होंने न तो कभी जमीनी पहचान स्थल देखे होते हैं और न ही कभी माता- पिता के साथ उस मार्ग पर गए होते हैं?

एक अन्य सिद्धांत यह है कि यात्रा के दौरान पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र उनकी मदद करता है। चुंबकीय बल की रेखाएं पृथ्वी के दो चुंबकीय ध्रुवों जोड़ती हैं। ऐसा बताया जाता है कि ये चुंबकीय रेखाएं ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रवास करने में उनकी मदद करती हैं।

जहां तक पक्षियों के प्रवास का प्रश्न है, सच यह है कि हम अभी तक अंधेरे में हाथ – पांव मार रहे हैं। इसका सटीक उत्तर अभी खोजा जाना है।

पंजाब केसरी से साभार।

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