पिंडदान और तर्पण के लिए प्रसिद्ध हैं भारत के ये दस स्थान!

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का अत्यधिक महत्व है। पितृ पक्ष के 15 दिनों की अवधि के दौरान, लोग अपने पूर्वजों की आत्माओं की मुक्ति के लिए पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण भोज आदि करते हैं। मान्यताओं के अनुसार सिद्ध और धार्मिक स्थलों पर पिंडदान और तर्पण करने से व्यक्ति को उचित फल की प्राप्ति होती है।

ऐसे में भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐसे स्थान हैं जहां लोग सफलतापूर्वक पितृ पक्ष श्राद्ध कर सकते हैं। आज हम आपको इस पोस्ट में 10 ऐसी जगहों के बारे में बताएंगे जहां आप पिंडदान कर सकते हैं।

काशीउत्तर प्रदेश के मोक्ष शहर से जाना जाने वाला काशी श्राद्ध और तर्पण के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहां किए गए अनुष्ठानों से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती है।

गया-बिहार का गया शहर भी सिद्ध स्थानों में गिना जाता है। यही कारण है कि इस स्थान पर श्राद्ध कर्म करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

हरिद्वारउत्तराखंड में स्थित हरिद्वार को देव नगरी के नाम से भी जाना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान, लाखों लोग इस स्थान पर इकट्ठा होते हैं और श्राद्ध अनुष्ठान करते हैं।

पुष्कर– राजस्थान में मौजूद इस सिद्ध स्थल में एक प्राचीन सरोवर मौजूद है, जहां लोग मुक्ति कर्म करते हैं।

लक्ष्मण बाण– कर्नाटक में मौजूद इस सिद्ध स्थल के तार रामायण काल ​​से जुड़े हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री राम ने इसी स्थान पर अपने पिता का श्राद्ध कर्म किया था। ऐसे में तर्पण और पिंडदान के लिए इस स्थान का महत्व और भी बढ़ जाता है।

नासिकगोदावरी नदी जिसे दक्षिण गंगा के नाम से भी जाना जाता है, महाराष्ट्र में स्थित नासिक शहर से बहती है। ऐसे में यह सिद्ध स्थान श्राद्ध के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

प्रयाग– उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर लोग श्राद्ध कर्म करते हैं। यह वह स्थान है जहाँ तीन देव नदियाँ गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती नदी मिलती है।

ब्रह्मकपाल– उत्तराखंड में स्थित यह धार्मिक स्थल श्राद्ध के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जिन पितरों को किसी अन्य स्थान पर मोक्ष नहीं मिलता, उन्हें इस स्थान पर मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है।

पिंडारक– गुजरात में स्थित पिंडारक भी पिंडदान के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर पांडवों ने पिंडदान किया था।

लौहनगर– राजस्थान में मौजूद इस स्थान का महत्व भी बहुत ज्यादा है। मान्यता है कि इस स्थान पर मौजूद सूरजकुंड में पांडवों ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए श्राद्ध किया था।

पितृ पक्ष 2023: श्राद्ध का भोजन बनाते और खिलाते समय इन बातों का ध्यान रखें

श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों के लिए अनुष्ठान और तर्पण किया जाता है। इस दिन प्रसाद के साथ-साथ पकवान और भोजन बनाकर पितरों को अर्पण किया जाता है ताकि वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद दें।

शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध का भोजन बनाते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए नहीं तो पितर नाराज भी हो सकते हैं। हर चीज साफ और स्वच्छ होनी चाहिए।

आज हम आपको इस पोस्ट में बताने जा रहे हैं कि किन बातों का ध्यान श्राद्ध का भोजन बनाते समय रखना चाहिए।

श्राद्ध के लिए भोजन बनाते समय इन बातों का रखें ध्यान

श्राद्ध के लिए खाना बनाते समय उसमें खीर का होना बहुत जरूरी है। कोशिश करें कि खीर गाय के दूध से बने न कि भैंस के दूध से। श्राद्ध में दूध, दही और घी तीनों ही गाय के होने चाहिए।

इनके सेवन से ब्राह्मण तृप्त होते हैं, जिससे पितरों को भी सुख की प्राप्ति होती है। इसके अलावा खीर के सेवन से देवता भी प्रसन्न होते हैं।

श्राद्ध के लिए भोजन बनाते समय प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह सात्विक भोजन है। ऐसे में ध्यान रखें कि लहसुन और प्याज से दूर ही रहना ही बेहतर है।

श्राद्ध भोजन हमेशा बिना चप्पल पहने ही बनाना चाहिए। आप चाहें तो लकड़ी की चप्पलें पहन सकते हैं क्योंकि लकड़ी को बहुत पवित्र और पवित्र माना जाता है लेकिन चमड़े के जूते या चप्पल पहनकर सात्त्विक भोजन नहीं बनाना चाहिए।

श्राद्ध के लिए भोजन बनाते समय दिशा का ध्यान रखें। हमेशा पूर्व की ओर मुंह करके खाना बनाना चाहिए और दक्षिण की ओर मुंह करके खाना नहीं बनाना चाहिए।

पितृ पक्ष 29 सितम्बर से 14 अक्टूबर तक, किस तिथि पर किसका श्राद्ध करना चाहिए

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए संतान का होना जरुरी माना जाता हैl श्राद्ध की तिथियों में लोग अपने पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करते है और उन्हें जल और पिंड दान देते हैं।

कौन कहलाते हैं पितर

पितर वे व्यक्ति कहलाते है, जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है, उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है।

श्राद्ध क्या होता है

हिन्दू धर्म में भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि से आरम्भ होने वाले पितर पक्ष का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा ही चुकाया जा सकता है। पितर पक्ष में श्राद्ध करने से पितर गण प्रसन्न रहते हैं। श्राद्ध में पितरों को उम्मीद रहती है, कि हमारे पुत्र-पौत्रादि पिंडदान और तिलांजलि प्रदान करेंगे। हिंदू धर्म शास्त्रों में पितर पक्ष में श्राद्ध अवश्य करने के लिए कहा गया है।

कब से शुरू हो रहे है श्राद्ध

इस वर्ष में श्राद्ध पक्ष 29 सितम्बर से 14 अक्टूबर तक तक रहेगें । पूर्णिमा से अमावस्या तक 15 तिथियां पितरों के निमित श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन 15 तिथियों में सभी अपने-अपने पितर को याद करते है और उनका श्राद्ध करते हैं।

पूर्णिमा, 29 सितंबर
जिन लोगों की मृत्यु पूर्णिमा को हुई हो, उनका श्राद्ध इस दिन करना चाहिए। इस तिथि से पितर पक्ष शुरू होता है।
प्रतिपदा, 30 सितंबर
इस तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी महीनें के किसी भी पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर हुई हो। जैसे  नाना-नानी के परिवार में किसी की मृत्यु हुई हो, और उसकी मृत्यु की तारीख पता न हो, तो उसका श्राद्ध प्रतिपदा पर किया जाता है।
द्वितिया, 1 अक्टबर
द्वितिया तिथि को मृत लोगों का श्राद्ध किया जाता है।
तृतीया, 2 अक्टूबर
जिसकी मृत्यु तृतीया तिथि पर हुई हो, उसका श्राद्ध इस दिन किया जाता है। इस बार दो दिन तृतीया तिथि रहेगी।
चतुर्थी, 3 अक्टूबर
इस तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु चतुर्थी तिथि को हुई हो।
पंचमी, 4 अक्टूबर
पंचमी तिथि पर मृत व्यक्ति का श्राद्ध किया जाता है। और अगर किसी अविवाहित व्यक्ति की मृत्यु पंचमी तिथि को हुई है, तो उसका श्राद्ध  भी इस तिथि पर करना चाहिए।
षष्ठी, 5 अक्टूबर
षष्ठी तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु षष्ठी तिथि पर हुई हो।
सप्तमी, 6 अक्टूबर
जिस व्यक्ति की मृत्यु किसी भी महीनें और किसी भी पक्ष मे हुई हो , उसका श्राद्ध इस तिथि पर किया जाता है।
अष्टमी, 7 अक्टूबर
जिन लोगों का देहांत किसी माह की अष्टमी तिथि पर हुई है, उनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है।
नवमी , 8 अक्टूबर
माता की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध न करके नवमी तिथि पर उनका श्राद्ध करना चाहिए. ऐसा माना जाता है कि, नवमी तिथि को माता का श्राद्ध करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती हैं. वहीं जिन महिलाओं की मृत्यु तिथि याद न हो उनका श्राद्ध भी नवमी तिथि को किया जा सकता है ।
दशमी,  9 अक्टूबर
दशमी तिथि को जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध महालय की दसवीं तिथि के दिन किया जाता है.
एकादशी, 10 अक्टूबर
इस तिथि पर मृत लोगों का और संन्यासियों का श्राद्ध किया जाता है।
द्वादशी,11 अक्टूबर 
इस दिन मृत लोगों का श्राद्ध द्वादशी तिथि पर किया जाता है।
त्रयोदशी, 12 अक्टूबर
अगर किसी बच्चे की मौत हो गई है तो उसका श्राद्ध इस तिथि पर करना चाहिए।
चतुर्दशी, 13 अक्टूबर
जिन लोगों की मौत किसी दुर्घटना में हो गई है, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि पर करना चाहिए।
अमावस्या, 14 अक्टूबर
सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के लिए मोक्ष अमावस्या का श्राद्ध करना चाहिए।

पितर पक्ष में कैसे करें श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष के दिनों में पूजा और तर्पण करें। पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक ग्रास गाय, दूसरा हिस्सा कुत्ते, तीसरा टुकड़ा कौए और एक भाग मेहमान के लिए रख दें। गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। जो श्रद्धा पूर्वक किया जाएं उसे श्राद्ध कहते हैं।

पुराणों के अनुसार मनुष्य का अगला जीवन पिछले संस्कारों से बनता है। श्राद्ध कर्म इस भावना से किया जाता है, कि अगला जीवन बेहतर हो। जिन पितरों का हम श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे हमारी मदद करते हैं।

पितर पक्ष में नई वस्‍तुओं की खरीदारी शुभ या अशुभ, जानिए क्या हैं मान्यताएं

श्राद्ध पक्ष को लेकर लोगों के मन में आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है, कि यह अशुभ समय होता है और इस दौरान कोई भी नया काम करने या कोई भी नई चीज खरीदना शुभ नहीं माना जाता। ऐसा करने से पितरगण नाराज हो जाते हैं।

यही वजह है कि इस धारणा के कई व्‍यापार और उद्योग पितर पक्ष के दिनों में मंदे पड़ जाते हैं। वहीं  शास्‍त्रों में इस बात का उल्‍लेख कहीं नहीं मिलता है, कि पितर पक्ष में खरीदारी करने से अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं l

कुछ विद्वानों का मानना है कि पितर पक्ष में हमारे पूर्वज धरती का रुख करते हैं। ऐसे में हमें उनकी सेवा में और श्राद्ध कर्म में मन लगाना चाहिए। सेवा करने की बजाए यदि हम नई वस्तुओं की और ध्यान लगाए तो पितृ नाराज हो सकते हैं l यही वजह है कि पितृ पक्ष में नई वस्‍तु नहीं खरीदी जाती।

बीगल्स : सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला और पालने योग्य नस्ल का कुत्ता

बीगल्स नस्ल के कुत्ते बहुत ही शांत स्वभाव के होते हैं। बीगल्स नस्ल के कुत्तों के कान लम्बे होते हैं। इस नस्ल के कुत्तों में सूंघने की जबरदस्त क्षमता होती हैं। ये कुत्ते सक्रिय रहने के लिए बाहर समय बिताना अधिक पसंद करते हैं। बीगल बहुत प्यारे होते हैं और उन्हें खेलना कूदना बहुत पसंद होता है।

यह छोटे आकार की नस्ल है जो कि मुख्य रूप से शिकार के उद्देश्य के लिए विकसित की गई है। इस नसल के कुत्तों का अैसतन कद 1 फुट होता है और औसतन भार 9-15 किलो होता है।

इस नस्ल का औसतन जीवन काल 13-16 वर्ष होता है। इनके मैत्रीपूर्ण स्वभाव की कारण इनकी देखभाल भी आसानी से की जा सकती है। इसे पॉकेट बीगल के नाम से भी जाना जाता है ।

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बीगल सबसे ज्यादा काले और गहरे भूरे रंग में पाये जाते हैं। इनकी छाती, पेट और टांगे सफेद रंग की होती है। गहरे भूरे रंग का सिर होता है और पूंछ का ऊपरी सिरा सफेद रंग का होता है। इसकी गर्दन, मुंह, टांगे और पूंछ के सिरे पर लाल रंग के धब्बे होते हैं।

बीगल डॉग इतिहास

यह कुत्ता एक छोटे शिकारी कुत्ते की नस्ल है जिसकी उत्पत्ति 1500 के दशक में इंग्लैंड में हुई थी। ऐसा माना जाता है कि यह हैरियर का वंशज है, एक शिकारी कुत्ता जो खरगोशों और अन्य छोटे जानवरों का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। ये कुत्ता अपनी गंध की गहरी समझ और पैदल खेल को ट्रैक करने की क्षमता के कारण शिकारियों के बीच काफी लोकप्रिय है।

1800 के दशक में, बीगल कुत्ते को संयुक्त राज्य अमेरिका में लाया गया, जहां यह एक लोकप्रिय पारिवारिक पालतू और साथी कुत्ता बन गया। अब इसे अमेरिकी केनेल क्लब द्वारा हाउंड समूह के सदस्य के रूप में मान्यता दी गई है।

भोजन

भोजन की मात्रा और किस्म, कुत्ते की उम्र और उसकी नसल पर निर्भर करती है। छोटी नस्लों को बड़ी नसल के मुकाबले भोजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है। भोजन उचित मात्रा में दिया जाना चाहिए नहीं तो कुत्ते सुस्त और मोटे हो जाते हैं।

संतुलित आहार जिसमें कार्बोहाइड्रेट्स, फैट, प्रोटीन, विटामिन और ट्रेस तत्व शामिल हैं, पालतू जानवरों को स्वस्थ और अच्छे आकार में रखने के लिए आवश्यक होते हैं।

कुत्ते को 6 आवश्यक तत्व जैसे फैट, खनिज, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट्स, पानी और प्रोटीन की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही इन्हें सारा समय साफ पानी की आवश्यकता होती है।

Beagles most liked dog breed
A beautiful hound dog sits on a green grass lawn looking at the camera, with sunlight backlighting her head. Horizontal with copy space.

पिल्ले को 29 प्रतिशत प्रोटीन और प्रौढ़ कुत्ते को आहार में 18 प्रतिशत प्रोटीन की जरूरत होती है। हम उन्हें ये सारे आवश्यक तत्व उच्च गुणवत्ता वाले सूखा भोजन देकर दे सकते हैं। इन्हें दिन में दो बार ¾ -1½ कप उच्च गुणवत्ता वाला सूखा भोजन देना चाहिए।

पिल्ले का चयन करते समय सावधानियां

  • पिल्ले का चयन आपकी जरूरत, उद्देश्य, उसके बालों , लिंग और आकार के अनुसार किया जाना चाहिए। पिल्ला वह खरीदें जो 8-12 सप्ताह का हो।
  • पिल्ला खरीदते समय उसकी आंखे, मसूड़े, पूंछ और मुंह की जांच करें। आंखे साफ और गहरी होनी चाहिए, मसूड़े गुलाबी होने चाहिए और पूंछ तोड़ी हुई नहीं होनी चाहिए और दस्त के कोई संकेत नहीं होने चाहिए।

देख रेख

  • कुत्ते को रहने के लिए अच्छी तरह से हवादार, साफ और सुरक्षित वातावरण प्रदान करें। आश्रय अत्याधिक बारिश और हवा और आंधी से सुरक्षित होना चाहिए। सर्दियों में कुत्तों को ठंड के मौसम से बचाने के लिए कंबल दें और गर्मियों में छाया और ठंडे स्थानों की आवश्यकता होती है।
  • कुत्ते के लिए 24 घंटे साफ पानी उपलब्ध होना चाहिए। पानी को साफ रखने के लिए प्रयोग किए जाने वाले बर्तन को आवश्यकतानुसार दिन में कम से कम दो बार या इससे अधिक समय में साफ करना चाहिए।
  • सप्ताह में दो बार बालों की देख रेख की जानी चाहिए। कंघी करने से अच्छा है प्रतिदिन ब्रशिंग करें। छोटे बालों वाली नसल के लिए सिर्फ ब्रशिंग की ही आवश्यकता होती है और लंबे बालों वाली नसल के लिए ब्रशिंग के बाद कंघी करनी चाहिए।

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  • कुत्तों को 10-15 दिनों में एक बार नहलाना चाहिए। नहलाने के लिए औषधीय शैंपू की सिफारिश की जाती है।
  • स्वस्थ पिल्लों के लिए गर्भवती मादा की उचित देखभाल की आवश्यकता होती है। ब्यांत के समय या पहले उचित अंतराल पर टीकाकरण अवश्य देना चाहिए। ब्यांत का समय लगभग 55-65 दिन का होता है। उचित आहार, अच्छा वातावरण, व्यायाम और उचित जांच ब्यांत के समय के दौरान आवश्यक होती है।
  • पिल्लों के जीवन के कुछ हफ्तों के लिए उनकी प्राथमिक गतिविधियों में अच्छे वातावरण, आहार और अच्छी आदतों का विकास शामिल है।
  • कम से कम 2 महीने के नवजात पिल्ले को मां का दूध प्रदान करें और यदि मां की मृत्यु हो गई हो या किसी भी मामले में पिल्ला अपनी मां से अलग हो जाए तो शुरूआती फीड या पाउडरड दूध पिल्ले को दिया जाता है।
  • कुत्ते को भी हर 6-12 महीनों के बाद दांतों की जांच के लिए पशु चिकित्सक की आवश्यकता होती है। अपने कुत्ते के दांतों को नर्म ब्रश के साथ ब्रश करें और एक ऐसे पेस्ट का चयन करें जो फ्लोराइड मुक्त हो क्योंकि फ्लोराइड कुत्तों के लिए बहुत ही जहरीला होता है।
  • पालतू जानवरों को नियमित टीकाकरण और डीवॉर्मिंग की आवश्यकता होती है ताकि उन्हें स्वास्थ्य समस्याएं ना हों।
BEAGLE DOG OWNERS GUIDE : The Practical Owner’s Manual on Raising Beagle Dog from Puppy Till Old Ageयदि आपके पास बीगल है तो यह (BEAGLE DOG OWNERS GUIDE) किताब इसके स्वभाव को समझने और इसे आपके और करीब लाने में मदद कर सकती है। यह किताब आपके पालतू  की psychology यानि मनोविज्ञान को समझने में बहुत अधिक सहायक हो रही है ऐसा हजारों लोगों का मानना है।

बीगल नस्ल की प्रजजन

बीगल की गर्भधारण अवधि आम तौर पर लगभग 60 से 65 दिन या लगभग 2 महीने की होती है। एक बार में ये लगभग पांच से छह पिल्लों को जन्म देती है।

भारत में बीगल की कीमत

भारत में बीगल पिल्लों की औसत कीमत 15,000 रुपये से 40,000 रुपये तक है। बीगल पिल्लों की कीमत पिल्ले की नस्ल, लिंग, उम्र और आकार पर निर्भर करती है।

जानिए कब से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध, कौन कहलाते हैं पितर

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए संतान का होना जरुरी माना जाता है। श्राद्ध की तिथियों में लोग अपने पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करते है और उन्हें जल और पिंड दान देते हैं।

कौन कहलाते हैं पितर

पितर वे व्यक्ति कहलाते है, जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है, उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है।

श्राद्ध क्या होता है

हिन्दू धर्म में भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि से आरम्भ होने वाले पितर पक्ष का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा ही चुकाया जा सकता है।

पितर पक्ष में श्राद्ध करने से पितर गण प्रसन्न रहते हैं। श्राद्ध में पितरों को उम्मीद रहती है, कि हमारे पुत्र-पौत्रादि पिंडदान और तिलांजलि प्रदान करेंगे। हिंदू धर्म शास्त्रों में पितर पक्ष में श्राद्ध अवश्य करने के लिए कहा गया है।

इस बार पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 29 सितंबर से होकर 14 अक्टूबर तक रहेगा इसीलिए तारीख तो दो है परंतु तिथि एक ही है।

29 सितंबर 2023, शुक्रवार: पूर्णिमा श्राद्ध

30 सितंबर 2023, शनिवार: द्वितीया श्राद्ध

01 अक्टूबर 2023, रविवार: तृतीया श्राद्ध

02 अक्टूबर 2023, सोमवार: चतुर्थी श्राद्ध

03 अक्टूबर 2023, मंगलवार: पंचमी श्राद्ध

04 अक्टूबर 2023, बुधवार: षष्ठी श्राद्ध

05 अक्टूबर 2023, गुरुवार: सप्तमी श्राद्ध

06 अक्टूबर 2023, शुक्रवार: अष्टमी श्राद्ध

07 अक्टूबर 2023, शनिवार: नवमी श्राद्ध

08 अक्टूबर 2023, रविवार: दशमी श्राद्ध

09 अक्टूबर 2023, सोमवार: एकादशी श्राद्ध

11 अक्टूबर 2023, बुधवार: द्वादशी श्राद्ध

12 अक्टूबर 2023, गुरुवार: त्रयोदशी श्राद्ध

13 अक्टूबर 2023, शुक्रवार: चतुर्दशी श्राद्ध

14 अक्टूबर 2023, शनिवार: सर्व पितृ अमावस्या

कब से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध

इस वर्ष में श्राद्ध पक्ष 29 सितंबर से 14 अक्टूबर तक रहेगें । पूर्णिमा से अमावस्या तक 15 तिथियां पितरों के निमित श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन 15 तिथियों में सभी अपने-अपने पितर को याद करते है और उनका श्राद्ध करते हैं।

पितर पक्ष में कैसे करें श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष के दिनों में पूजा और तर्पण करें। पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक ग्रास गाय, दूसरा हिस्सा कुत्ते, तीसरा टुकड़ा कौए और एक भाग मेहमान के लिए रख दें।

गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। जो श्रद्धा पूर्वक किया जाएं उसे श्राद्ध कहते हैं। पुराणों के अनुसार मनुष्य का अगला जीवन पिछले संस्कारों से बनता है।

श्राद्ध कर्म इस भावना से किया जाता है, कि अगला जीवन बेहतर हो। जिन पितरों का हम श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे हमारी मदद करते हैं।

स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहतमंद भी हैं ये 10 खाद्य पदार्थ

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हम सभी को पोषण की जरूरत होती है, ताकि शरीर का विकास हो सके और हम स्वस्थ रह सकें। ये पोषक तत्व हमें खाने-पीने की चीजों से मिलते हैं। ज्यादातर लोगों को लगता है कि हेल्दी चीजें हमेशा कम स्वादिष्ट होती हैं। इसलिए वो हेल्दी चीजें खाना कम पसंद करते हैं। मगर बहुत से ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहतमंद भी हैं।

आज हम आपको इस पोस्ट में कुछ ऐसे ही खाद्य पदार्थों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहतमंद भी हैं तो चलिए शुरू करते हैं :

एवोकाडो

एवोकाडो एक ऐसा फल है जिसे सेहत और सुंदरता दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। एवोकाडो को एलीगेटर नाशपाती (Alligator Pears) के रूप में भी जाना जाता है। एवोकाडो को सबसे ज्यादा सलाद के रूप में कच्चा खाया जाता है। ये खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है।

avocado

एवोकाडो ​​में कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, पोटैशियम, जिंक, मैंग्नीज, फॉस्फोरस और कॉपर जैसे गुण पाए जाते हैं, जो शरीर को कई लाभ पहुचाने में मदद कर सकते हैं। एवोकाडो का सलाद खाने से वजन को कम करने में मदद मिल सकती है।

चिया सीड्स

chia-seeds

चिया के बीज, जिसे वैज्ञानिक रूप से “साल्विया हिस्पानिका” के रूप में जाना जाता है। इसे सबसे अच्छे सुपरफूड्स के रूप में भी जाना जाता है। ये बीज कैल्शियम, एंटीऑक्सीडेंट, प्रोटीन, फाइबर और ओमेगा-3 फैटी एसिड के लिए जाने जाते हैं। यह एंटीऑक्सीडेंट, कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, मैंगनीज, आयरन, नियासिन और जिंक से भी भरपूर होता है।

चिया सीड को पानी में डुबोकर खाने से ब्लड ग्लूकोज कंट्रोल में रखने में मदद मिल सकती है। चिया सीड्स में कैल्शियम होता है और दूध में भी होता है, इसलिए अगर आप दूध में चिया सीड्स डालकर खाते हैं तो आपकी हड्डियां मजबूत होती हैं।

बेल मिर्च

बाजार में हमें लाल, पीली, बैंगनी, नारंगी और हरी रंग की शिमला मिर्च नजर आती है। जहां इसे हिंदी में शिमला मिर्च कहा जाता है, तो इंग्लिश में कैप्सिकम और बेल पेपर (Bell Pepper) कहा जाता है।

शिमला मिर्च की मुख्य रूप से पांच प्रजातियां पाई जाती हैं, जिसे कैप्सिकम एनम, कैप्सिकम चिनेंस, कैप्सिकम फ्रूटसेन्स, कैप्सिकम बैक्टम, और कैप्सिकम प्यूबसेंस कहा जाता है। अगर सेहत के लिहाज से शिमला मिर्च की बात करें, तो इस मामले में भी यह बहुत फायदेमंद है।

Bell-peppers

शिमला मिर्च बहुत स्वादिष्ट होती है। अपने अद्भुत स्वाद के साथ-साथ यह विटामिन सी, विटामिन ए और फाइबर का अच्छा स्रोत है। इनमें एंटीऑक्सीडेंट गुण भी होते हैं, जो हृदय रोग और कुछ कैंसर जैसी बीमारियों से बचाने में मदद कर सकते हैं।

केल

केल एक हरी पत्तेदार सब्जी है, जिसे लीफ कैबेज भी कहते हैं। यह सिर्फ हरा ही नहीं, बल्कि बैंगनी रंग में भी पाया जाता है। इसे पत्तेदार सब्जियों की श्रेणी में रखा गया है।

यह पोषक तत्वों से भरपूर होता है, साथ ही इसका स्वाद भी काफी अच्छा होता है। इसका उपयोग अधिकतर सलाद के रूप में किया जाता है। यह ब्रोकली, पत्तागोभी और फूलगोभी के ही परिवार का है। केल पौष्टिक खाद्य पदार्थों में से एक है।

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इसमें विटामिन (ए, सी, के), कैल्शियम, पोटैशियम, फाइबर और कई अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो आपको स्वस्थ रखने का काम कर सकते हैं। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट गुण शरीर की कोशिकाओं की क्षति का बचाव कर कैंसर के जोखिम को कम कर सकते हैं।

सालमन फिश

सालमन फिश समुद्री और ताजे पानी में पाई जाने वाली मछली की एक प्रजाति है। सालमन फिश का रंग आमतौर पर गुलाबी होता है और भुनने के बाद ये मछली नारंगी रंग की हो जाती है। सैलमन मछली एक अत्यधिक पौष्टिक मात्रा में भरपूर होने के साथ-साथ स्वादिष्ट भी होती है।

हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक सालमन मछली कई न्यूट्रिएंट्स से भरा हुआ एक खजाना है, जिसमें विटामिन, मिनिरलिस के साथ-साथ विटामिन बी 12 और ओमेगा-3 फैटी एसिड भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है।

Salmon-Fish

सालमन मछली कैंसर होने से रोकने, मेटाबॉलिज्म को बढ़ाने, दिल की सेहत, मेंटल हेल्थ, हड्डी, स्किन और आंखों का स्वास्थ्य आदि जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए भी कारगर है।

क्विनोआ (बथुआ)

क्विनोआ को ‘चिनोपोडियम क्विनोआ’ के नाम से जाना जाता है। भारत में बथुआ के नाम से जाना जाता है। यह एक फूलदार पौधा है। यह ऊंचाई में करीब एक से दो मीटर तक बढ़ता है। मुख्य रूप से इसके बीजों को खाने के लिए उपयोग में लाया जाता है।

quinoa

इसमें कई औषधीय गुण पाए जाते हैं। क्विनोआ में फाइबर, कैल्शियम, प्रोटीन और पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। यह कहने में बहुत ही स्वादिष्ट होता है।

यहेजकेल ब्रेड

ईजेकील ब्रेड अंकुरित साबुत अनाज और फलियों से बनाई जाती है। ईजेकील ब्रेड में साबुत अनाज – जैसे गेहूं, जौ, बाजरा, और पोषक तत्वों से भरपूर फलियां – जैसे सोयाबीन और दाल शामिल होते हैं। इसमें सबसे अधिक फाइबर, विटामिन, खनिज, स्वस्थ वसा और सबसे कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है। यह खाने में जितनी स्वादिष्ट होती है उतनी ही हेल्दी भी।  इसको खाने से कोलेस्‍ट्रोल और वजन ठीक रहता है।

दालें

दालें कई प्रकार के होती हैं, जैसे मसूर, मूंग, अरहर, आदि, इन सभी दालों का सेवन सेहत को कई लाभ पहुंचाता है क्योंकि सभी दाल पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं।

Lentils

दाल में सबसे ज्यादा प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है, साथ ही दाल में कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, आयरन और विटामिन्स भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसलिए अगर आप दाल का सेवन करते हैं, तो इससे स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं दूर होती है। साथ ही शरीर स्वस्थ भी रहता है।

दही

दूध में जीवित बैक्टीरिया मिलाकर दही बनाया जाता है। वैसे तो हम किसी भी समय दही का सेवन कर लेते हैं परन्तु दही खाने का सही समय सुबह होता है।

सुबह नाश्ते में दही खाने से सेहत को कई लाभ मिलते हैं। दही में विटामिन, कैल्शियम, प्रोटीन, आयरन, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम और फोलिक एसिड जैसे कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं।

curd

ये सभी पोषक तत्व सेहत के लिए काफी फायदेमंद माने जाते हैं। रोज सुबह नाश्ते में दही खाने से शरीर को जरूरी पोषण और एनर्जी मिलती है।

दही में काफी अधिक मात्रा में प्रोबायोटिक्स मौजूद होते हैं, जो आंत में अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद करते हैं। नाश्ते में दही खाने से शरीर को हेल्दी रखने के साथ-साथ वजन घटाने में भी मदद मिल सकती है।

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नारियल का तेल

नारियल का तेल बालों, त्वचा के साथ ही सेहत के लिए भी लाभदायक होता है। आयुर्वेद के अनुसार नारियल के तेल को पित्त प्रकृत्ति के लोगों के लिए बेहद अच्छा माना जाता है।

दरअसल, नारियल के तेल की तासीर ठंडी होती है, जो पित्त को शांत करके शरीर को ठंडक देता है। इसके तेल में खाना बनाया जा सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक होता है।

नारियल के तेल में खाना बनाने से यह दिल को स्वस्थ रखता है, इम्यूनिटी बढ़ाता है और वजन कम करने में मदद करता है और पित्त प्रकृत्ति के लोगों के लिए भी फायदेमंद होता है। इससे खाना बेहद स्वादिष्ट और पौष्टिक बनता है।

 

गणेश चतुर्थी के दिन जरूर करें ये काम मिलेगा शुभ फल

सनातन धर्म के त्योहारों में गणेश चतुर्थी एक मुख्य त्यौहार है जो भाद्रपद शुक्लपक्ष चतुर्थी के दिन मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन गणेश जी दोपहर में अवतरित हुए थे, इसलिए यह गणेश चतुर्थी विशेष फलदायी बताई जाती है। पूरे देश में यह त्यौहार गणेशोत्सव के नाम से प्रसिद्ध है लोक भाषा में इस त्यौहार को डण्डा चौथ भी कहा जाता है।

हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विद्या-बुद्धि के प्रदाता, विघ्न-विनाशक, मंगलकारी, सिद्धिदायक, सुख-समृद्धि और यश-कीर्ति देने वाले देवता माना गया है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ‘’और स्वास्तिक को भी साक्षात गणेश जी का स्वरूप माना गया है। तभी तो कोई भी शुभ कार्य की शुरुआत इनसे ही होती है।

Ganesh Chaturthi festival

पूजा का शुभ मुहूर्त

गणेश चतुर्थी मंगलवार, सितम्बर 19, 2023 को मध्यान गणेश पूजा मुहूर्त –  सुबह 10:59 से 01:25 पी एम तक
अवधि – 02 घण्टे 26 मिनट्स
गणेश विसर्जन बृहस्पतिवार, सितम्बर 28, 2023 को
एक दिन पूर्व, वर्जित चन्द्रदर्शन का समय – 02:09 पी एम से 08:16 पीएम, सितम्बर 18
अवधि – 06 घण्टे 07 मिनट्स
वर्जित चन्द्रदर्शन का समय – 09:25 ए एम से 08:53 पी एम
अवधि – 11 घण्टे 27 मिनट्स
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ – सितम्बर 18, 2023 को 02:09 पी एम बजे चतुर्थी तिथि समाप्त सितम्बर 19, 2023 को 03:13 पी एम बजे

गणेश चतुर्थी व्रत व पूजन विधि

  • व्रती को चाहिए कि प्रातः स्नान करने के बाद सोने, तांबे, मिट्टी की गणेश प्रतिमा लें।
  • चौकी में लाल आसन के ऊपर गणेश जी को विराजमान करें।
  • गणेश जी को सिंदूर व दूर्वा अर्पित करके 21 लडडुओं का भोग लगाएं। इनमें से 5 लड्डू गणेश जी को अर्पित करके शेष लड्डू गरीबों या ब्राह्मणों को बाँट दें।
  • सांयकाल के समय गणेश जी का पूजन करना चाहिए। गणेश चतुर्थी की कथा, गणेश चालीसाआरती पढ़ने के बाद अपनी दृष्टि को नीचे रखते हुए चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।
  • इस दिन गणेश जी के सिद्धिविनायक रूप की पूजा व व्रत किया जाता है।
  • ध्यान रहे कि तुलसी के पत्ते (तुलसी पत्र) गणेश पूजा में इस्तेमाल नहीं हों। तुलसी को छोड़कर बाकी सब पत्र-पुष्प गणेश जी को प्रिय हैं।
  • गणेश पूजन में गणेश जी की एक परिक्रमा करने का विधान है।

Ganesh Chaturthi festival hindi

गणेश चतुर्थी का महत्व

यह 10 दिनों का उत्सव है। गणेश के शरीर के विभिन्न अंगों का अलग महत्व है जिसमें सिर-आत्मान, शरीर- माया, हाथी का सिर- ज्ञान, ट्रंक- ओम का प्रतीक माना जाता है।

मूर्ति विसर्जन

गणपति स्थापना 19 सितम्बर को होगी और 10 के दिन बाद 28 सितम्बर को भगवान गणेश का विसर्जन होगा। इसी दिन लोग ‘गणपति बप्पा मोरिया अगले बरस तू जल्दी आ‘ के जयकारों के साथ गणेश विसर्जन करते हैं। इस दिन ही अनंत चतुदर्शी तिथि भी रहती है। गणेश विसर्जन के साथ ही 15 दिनों का पितृ पक्ष शुरू हो जाता है।

गणेश चतुर्थी के दिन जरूर करें ये उपाए

करे दूर्वा का ये उपाय

दूर्वा गणेश भगवान को अति प्रिय है। उनकी पूजा में दूर्वा का विशेष रूप से इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में आप दूर्वा की 11 गांठ और एक हल्दी की गांठ लेकर उसे पीले कपड़े में बांध दें।

इसके बाद गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक इसकी पूजा करें। इसके बाद इस कपड़े को अपनी तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रख दें। इससे घर में कभी भी धन की कमी नहीं होती।

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धन लाभ के लिए उपाय

गणेश चतुर्थी के शुभ अवसर पर सुबह स्नान करने के बाद भगवान गणेश को गुड़ में देसी घी मिलाकर भोग लगाएं। इसके बाद इसे किसी गाय को खिला दें।

ऐसा करने से व्यक्ति के लिए धन प्राप्ति के योग बनते हैं। वहीं, गणेश चतुर्थी के दिन गुड़ से छोटी-छोटी 21 गोलियां बनाकर गणेश मंदिर में दूर्वा के साथ इन गोलियों को अर्पित करने से मनचाही इच्छा पूरी होती है।

करें गणेश यंत्र की स्थापना

गणेश चतुर्थी के दिन विधिवत रूप से घर के मंदिर में गणेश यंत्र की स्थापना करें। इसके साथ ही नियमित रूप से भगवान गणेश के साथ इस यंत्र की भी पूजा करें। इससे घर में धन-समृद्धि और वैभव की वृद्धि होती है।

इसके साथ ही आप नियमित रूप से गणपति जी का अभिषेक करें। ऐसा करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ जरूर करें।

इनलैंड ताइपन – दुनिया के सबसे ज़हरीले सांपों में से एक

इनलैंड ताइपन (अंतर्देशीय ताइपन) ऑस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली साँप की एक अत्यंत ज़हरीली प्रजाति है जो अपने घातक जहर के लिए जानी जाती है। इनलैंड ताइपन (Inland Taipan) जहरीले सांपों की सूची में सबसे ऊपर आता है। इस सांप का वैज्ञानिक नाम ऑक्सीयूरेनस माइक्रोलेपिडोटस (Oxyuranus Nicrolepidotus) है।

इनलैंड ताइपन को इसके घातक जहर के कारण “भयंकर सांप” भी कहा जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार इसके ज़हर की मात्र दो से तीन बूंदें ही 100 व्यस्क लोगों को मार सकती है और तकरीबन 250,000 चूहों को भी। अंतर्देशीय ताइपन भारत के सबसे ज़हरीले सांप किंग कोबरा से 50 गुना ज़्यादा ज़हरीला होता है।

most poisonous Inland Taipan snake

आकार एवं स्वभाव

अंतर्देशीय ताइपन गहरे भूरे रंग का होता है, जिसमें स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाली शल्कें होती हैं। इस सांप की गर्दन और सिर का रंग आमतौर पर शरीर के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक गहरा होता है।

इसकी एक अनूठी विशेषता यह है कि अंतर्देशीय ताइपन की त्वचा का रंग मौसम के अनुसार बदलता है, गर्मी के महीनों में इसका रंग गहरा भूरा और सर्दियों के महीनों में हल्का पीला हो जाता है। गहरा रंग गर्मियों में इसे ठंडा रखने में मदद करता है। इसी तरह, त्वचा का हल्का रंग इसे सर्दियों के दौरान गर्म रहने में मदद करता है।

इसकी आँखों का आकार बड़ा होता है, जिनमें काले-भूरे रंग की पुतलियां होती हैं। अंतर्देशीय ताइपन की कुल लंबाई औसतन लगभग 1.8 मीटर (5.9 फीट) है, हालांकि एक रिसर्च के दौरान इसकी अत्यधिक लम्बाई 2.5 मीटर (8.2 फीट) मापी गई है। इसके नुकीले दांत 3.5 से 6.2 मिमी लंबे होते हैं।

यह सांप शर्मीले स्वभाव का होता है और ज्यादातर जमीन के नीचे रहना पसंद करता है। दुनिया में सबसे जहरीली साँप प्रजाति होने के बावजूद, अंतर्देशीय ताइपन काफी एकान्तप्रिय होते हैं। जब तक इस सांप को उकसाया न जाए तब तक वह किसी पर हमला नहीं करता है।

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आहार

इनका मुख्य शिकार छोटे चूहे, छिपकलियां और अन्य छोटे स्तनधारी जानवर होते हैं। इनके काटने के बाद इनके शिकार की मौत कुछ ही  मिंटो में ही हो जाती हैं इसके बाद ये इसे पूरा निगल जाते हैं।

यह केवल दिन के शुरुआती घंटों में स्तनधारियों पर हमला करता है। अंतर्देशीय ताइपन काफी फुर्तीला और तेज़ है और स्तनधारियों पर सटीकता से हमला करता है।

प्रजनन प्रक्रिया

इनलैंड ताईपन एक अंडा देने वाला सांप है यह एक बार में ये लगभग एक से दो दर्जन अंडे दे सकते हैं। ये अंडे लगभग दो महीने में फूट जाते हैं। इन्हें आमतौर पर बिलों और गहरी दरारों में रखा जाता है। अंडे से निकले बच्चों की लंबाई तकरीबन आधे फुट से 1 फुट तक के बीच में होती है। इनका जीवनकाल लगभग 10 से 15 साल तक का होता है।

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ज़हर

अंतर्देशीय ताइपन में प्रीसानेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन और पोस्टसिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन नामक ज़हर पाया जाता है। इस प्रजाति द्वारा वितरित जहर की औसत मात्रा 44 मिलीग्राम है, और दर्ज की गई अधिकतम मात्रा 110 मिलीग्राम है।

इंडलैंड ताइपन के काटने के लक्षणों में सिरदर्द, उल्टी, पेट में दर्द, और लकवा शामिल हैं। इसका ज़हर इतना खतरनाक होता कि मनुष्य के शरीर में प्रवेश करते ही तुरंत मांसपेशियों को जमा देता है।

एक ऐसे ‘इंजीनियर’ जिनके आगे अंग्रेज भी सिर झुकाते थे

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15 सितंबर को प्रतिवर्ष हमारे देश में इंजीनियर्स को सम्मानित करने के लिए राष्ट्रीय अभियंता दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन महान इंजीनियर, भारत रत्न एवं ब्रिटिश नाइटहुड पुरस्कार से सम्मानित डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

भारत सरकार द्वारा साल 1968 में डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जन्मतिथि को ‘अभियंता दिवस’ घोषित किया गया था। उसके बाद से हर साल 15 सितंबर को अभियंता दिवस मनाया जाता है। विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1860 को मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के एक तेलुगु परिवार में हुआ था।

एक इंजीनियर के रूप में डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का विशेष योगदान रहा है। उन्होंने देश में कई बांध बनवाए, जिसमें मैसूर में कृष्णराज सागर बांध, पुणे के खड़कवासला जलाशय में बांध और ग्वालियर में तिगरा बांध आदि महत्वपूर्ण हैं।

सिर्फ यही नहीं, हैदराबाद सिटी को बनाने का पूरा श्रेय डॉ. विश्वेश्वरैया को ही जाता है। उन्होंने वहां एक बाढ़ सुरक्षा प्रणाली तैयार की थी, जिसके बाद पूरे भारत में उनका नाम हो गया। विश्वेश्वरैया को मॉडर्न मैसूर स्टेट का पिता भी कहा जाता था।

इस वजह से अंग्रेज भी एम विश्वेश्वरैया के आगे सिर झुकाते थे

बात उस समय की है जब भारत अंग्रेजी गुलामी का दौर झेल रहा था। उस दौर में मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने अपनी इंजीनियरिंग के कौशल के साथ आम लोगों के हित का ऐसा दौर तैयार किया कि अंग्रेज भी उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह सके।

ब्रिटिश काल के दौरान एक रेलगाड़ी में बहुत से अंग्रेज सवार थे वहीँ एक डिब्बे में एक भारतीय यात्री गंभीर मुद्रा में बैठा था। सांवले रंग और मंझले कद का वह यात्री सादे कपड़ों में था और वहां बैठे अंग्रेज उन्हें अनपढ़ समझकर मजाक उड़ा रहे थे।

अचानक उसने उठकर गाड़ी की जंजीर खींच दी। ट्रेन कुछ ही पलों में रुक गई। सभी यात्री चेन खींचने वाले को भलाबुरा कहने लगे।

थोड़ी देर में गार्ड आ गया और सवाल किया कि जंजीर किसने खींची तो उसने उत्तर दिया, “मेरा अंदाजा है कि यहां से लगभग कुछ दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है।” गार्ड ने पूछा, “आपको कैसे पता?”

वह बोले, “गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर आया है और इसकी आवाज से मुझे खतरे का आभास हो रहा है।” गार्ड उन्हें लेकर जब कुछ दूर पहुंचा तो देख कर दंग रह गया कि वास्तव में एक जगह से रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए हैं। वह सांवले से व्यक्ति थे – मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया।

15 सितंबर 1860 में मैसूर के कोलार जिले में पैदा हुए डॉ. एम विश्वेश्वरैया के पिता श्रीनिवास शास्त्री संस्कृत के विद्वान और आयुर्वेद चिकित्सक थे। विश्वेश्वरैया की मां का नाम वेंकाचम्मा था।

साधारण परिवार में जन्मे एम विश्वेश्वरैया जब मात्र 12 वर्ष के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया।  परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा था, लिहाजा विश्वेश्वरैया गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ते रहे।

बी.ए. करने के बाद उन्होंने कुछ समय शिक्षक के रूप में भी काम किया। उनकी योग्यता देख मैसूर सरकार ने उन्हें स्कॉलरशिप दी, जिसके बाद उन्होंने पुणे के साइंस कालेज में सिविल इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम में दाखिला लिया और प्रथम स्थान प्राप्त किया। इंजीनियर बनते ही उनकी योग्यता देख महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक जिले के सहायक इंजीनियर के पद पर नियक्त किया।

इंजीनियर के रूप में विश्वेश्वरैया को असली ख्याति मिली पुणे के खड़कवासला बांध की भंडारण क्षमता में बिना ऊंचाई बढ़ाए बढ़ौतरी करने से।

बांधों की जल भंडारण स्तर में वृद्धि करने के लिए विश्वेश्वरैया ने स्वचालित जलद्वारों का उपयोग खड़कवासला बांध पर किया था।

वर्ष 1909 में उन्हें मैसर राज्य का मुख्य अभियंता नियुक्त किया गया। कृष्णराज सागर बांध के निर्माण के कारण मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का नाम पूरे विश्व में सबसे अधिक चर्चा में रहा।

इसका निर्माण स्वतंत्रता के करीब 40 वर्ष पहले हुआ था। वर्ष 1912 में उन्हें मैसूर राज्य का दीवान नियुक्त किया गया। उन्होंने चंदन तेल फैक्टरी, साबुन फैक्टरी, धातु फैक्टरी, क्रोम टेनिंग फैक्टरी प्रारंभ की। बांध निर्माण के साथ-साथ औद्योगिक विकास में भी उनका योगदान कम नहीं है।

वह उन शुरूआती लोगों में से एक थे, जिन्होंने बेंगलूर स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में वैमानिकी एवं इंजीनियरिंग जैसे अनेक विभागों को आरंभ करने का स्वप्न देखा था। वह वर्ष 1918 में मैसूर के दीवान के रूप में सेवानिवृत्त हो गए।

उन्हें 1955 में देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न‘ से नवाजा गया। 101 वर्ष की दीर्घायु में काम करते रहने वाले विश्वेश्वरैया का कहना था कि ‘जंग लग जाने से बेहतर है, काम करते रहना।’

भारत के अलावा इन देशों में मनाया जाता है अभियंता दिवस

अभियंता दिवस सिर्फ भारत में ही नहीं मनाया जाता बल्कि कई अन्य देशों में भी यह दिवस मनाया जाता है। जैसे कि- अर्जेंटीना में 16 जून को, बांग्लादेश में 7 मई को, इटली में 15 जून को, तुर्की में 5 दिसंबर को, ईरान में 24 फरवरी को, बेल्जियम में 20 मार्च को और रोमानिया में 14 सितंबर को अभियंता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

दरअसल, यह दिवस दुनियाभर के इंजीनियरों को प्रोत्साहित करने के लिए मनाया जाता है, ताकि वो देश-दुनिया को अपने हुनर की बदौलत तरक्की की नई राह पर ले जाएं।

भारत का एक खूबसूरत भूतिया बीच जहां पर शाम को टहलना मना है।

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भारत में कई ऐसी जगहें हैं जो बेहद प्रेतबाधित और भूतिया मानी जाती हैं। इन जगहों पर कई लोगों द्वारा भूत-प्रेत देखे जाने का दावा भी किया गया है। इन भूतिया स्थानों पर रात में ठहरने की सख़्त मनाही है और इन्हीं में से एक हैं “डुमस बीच” (Dumas Beach)।

दमस समुद्र तट?

डुमस समुद्र तट ’ गुजरात के सूरत एयरपोर्ट से महज 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह बीच दिखने में बेहद सुंदर व आकर्षक है। इस बीच को ‘लवर पॉइंट’ भी कहा जाता है, क्योंकि यहां युवा काफ़ी अधिक संख्या में आते हैं।

ख़ूबसूरती के मामले में इस बीच को भारत का सबसे अच्छा बीच माना जाता है। ख़ासकर तब जब चंद्रमा की छटा इस समुद्र तट की रेत पर पड़ती है, तब इसका दृश्य और भी मनमोहक हो जाता है।

mysterious Damas Beach Gujarat

डुमस बीच की सबसे ख़ास बात यह  है कि यहां की रेत सफ़ेद नहीं, बल्कि काली है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सदियों पहले यहां पर आत्माओं ने अपना बसेरा कर लिया था जिसके कारण यहाँ की रेत काली हो गई।

क्यों कहते हैं इसे भूतिया बीच?

कहा जाता है कि इस बीच पर काले साये का प्रकोप है जिसके चलते शाम ढलते ही लोग अपने अपने घरों को लौट जाते हैं। शाम को अंधेरा होने के बाद से ही इस समुद्र तट पर चीखने-चिल्लाने की आवाजें आने लगती हैं। चीख-पुकार की आवाज काफी दूर से भी सुनी जा सकती है।

कहा जाता है कि इस बीच पर रात के समय जो भी जाता है, वह वापस नहीं लौटता। यह बीच प्राकृतिक सौंदर्य से तो भरपूर है लेकिन इन भूतिया घटनाओं के चलते ज्यादातर वीरान ही रहता है।

Dumas Beach, Gujarat

स्थानीय लोगों के अनुसार काफी पहले इस जगह का इस्तेमाल श्मशान घाट के तौर पर किया जाता था। लोगों की मानें तो यहां पर आज भी कई प्रेत आत्माएं भटकती हैं। लोगों का कहना है कि रात के समय इस स्थान पर कुत्तों के स्वभाव में भी बदलाव आ जाता है। वे कई तरह की अजीबो-गरीब आवाजें निकालने लगते हैं।

डुमस बीच के बारे में यह भी कहा जाता है कि किसी ज़माने में ये नवाबों का बसेरा हुआ करता था, लेकिन वर्तमान में ये बीच मछुवारों का बसेरा है । हालांकि, मछुवारे भी यहां केवल दिन के समय में ही रहते है। रात होते ही वो भी अपने घरों को लौट जाते हैं।

स्थानीय किंवदंती

डुमस बीच के बारे में कई स्थानीय किंवदंतियां प्रचलित है। ऐसी ही एक कहानी दोस्तों के एक समूह की है जो रात के समय समुद्र तट पर टहलने के लिए चले गए और कभी वापिस लौट कर नहीं आये। स्थानीय लोगों द्वारा उन्हें बहुत खोजा गया परन्तु उनका कुछ पता नहीं चला।

कुछ लोगों ने डुमस बीच पर खींची गई तस्वीरों में ओर्ब्स की मौजूदगी के बारे में भी बताया है। ओर्ब्स एक अप्रत्याशित और गोलाकार कलाकृति है जो फ्लैश फोटोग्राफी में होती है। इनका उपयोग चित्र में आत्माओं की उपस्थिति के प्रमाण के रूप में किया जाता है।