दुनिया के कुछ रोचक तथ्य !

दुनिया में कुछ ऐसे रोचक तथ्य हैं। जिनके बारे में हम नहीं जानते। इन रोचक तथ्यों में हमारे जीवन से जुड़ी कई बातें  हैं, जो हमारे लिए बहुत उपयोगी हो सकती हैं। आइये जानते है कुछ ऐसे ही रोचक तथ्यों के बारे

  • दुनिया में 11 प्रतिशत लोग बाएं हाथ का इस्तेमाल करते हैं।
  • विश्व की दो सबसे अधिक कॉमन इस्तेमाल होने वाली भाषाएं मैंड्रियन चायनीज, स्पैनिश और अंग्रेजी है।
  • इंसान की सबसे छोटी हड्डी कान में होती है।
  • पैसा पहले नंबर की ऐसी चीज है जिसके बारे में जोड़े सबसे अधिक बहस करते हैं।
  • एक दिन में हम इतनी बार पलके झपकाते हैं कि वह आधे घंटे की आंखें बंद होने के बराबर होता है।
  • इंसान की जीभ सबसे अधिक तेजी से ठीक होती है।
  • जब आसमान की बिजली गिरती है तब तापमान 30,000 डिग्री तक हो सकता है।
  • हर बार जब भीहु हम पूरा चांद देखते हैं तो हर बार इसकी एक ही साइड ही दिखती है।
  • शहद अकेला ऐसा प्राकृतिक पदार्थ है जो कभी खराब नहीं होता।
  • ऑस्ट्रेलिया अकेला ऐसा महाद्वीप है, जहां कोई भी एक्टिव ज्वालामुखी नहीं है।
  • दुनिया की सबसे लंबी स्ट्रीट टोरंटो की योंगे स्ट्रीट है। कनाडा स्थित यह स्ट्रीट 1,896 किमी लंबी है।
  • अगले 40 सालों में रोबोट मानव से भी बुद्धिमान हो जायेंगे। इस बात को इंटेल (Intel) कंपनी ने सिद्ध किया है कि आने वाले 40 सालों में रोबोट वह कार्य करने में सक्षम हो जायेंगे जो मानव कभी भी नहीं कर सकता।
  • इंटेल ऐसे पावरफुल सिस्टम को तैयार कर रही है जो वायरलेस होगा और इसमें किसी भी तार का इस्तेमाल नहीं होगा।
  • स्विट्जरलैंड में दुनिया में सबसे अधिक चॉकलेट खाई जाती है। यहां हर व्यक्ति एक साल में 10 किलो के औसत से चॉकलेट खाता है।
  • पानी जिसको हम साइंस में H2O  कहते हैं, पानी हमारे जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। वैज्ञानिकों को अभी तक यह नहीं पता लग पाया है कि पानी कार्य कैसे करता है।
  • मानव के आधे से भी ज्यादा हड्डियाँ हाथों और पैरों में होती हैं।
  • अगर आप लगातार 8 साल, 7 महीने और 6 दिनों तक चिल्लाते रहेंगे तो आप इतनी ऊर्जा उत्पाद कर सकते हैं जिससे आप एक कॉफ़ी के कप को गर्म कर सकें।
  • उत्तर कोरिया में इन्टरनेट इस्तेमाल करने वालों की कुल आबादी सिर्फ 605 है।
  • ओसामा बिन लादेन और हिट्लर दोनों की मौत 1 मई को हुई थी।
  • दुनिया के 85 प्रतिशत पौधे समुद्र के अंदर होते हैं।
  • अगर आपका दिमाग जहाज के दुर्घटना होने से 90 सेकंड पहले शांत अवस्था में है तो आपके बचने की संभावना ज्यादा होती है।
  • आपके शरीर की कोशिकाएं आपके दिमाग के द्वारा नियंत्रण की जाती हैं अगर आपके दिमाग में नकरात्मक विचार आ रहे हैं तो आप की पाचन प्रक्रिया कि क्षमता पहले से कम हो जाती है।
  • हमारा दिमाग एक मिनट में 1,000 शब्दों को पढ़ सकता है।

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क्यों पितृपक्ष में कौए को दिया जाता है भोजन, जानिए क्या है महत्व

पितृपक्ष शुरू हो चुके हैं। अपने पूर्वजों को स्मरण करने, श्रद्धा और भक्ति से उन्हें सेवा करने और जल तर्पण करने का समय चल है। इस समय पितरों को जल देकर और कौवों को भोजन देकर उन्हें तृप्त कराया जाता है। इस दौरान कौवे का आना और भोजन ग्रहण करना शुभ होता है।

महत्व

पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध में भोजन का एक अंश कौओं को भी दिया जाता है। पितृपक्ष में कौओं को भोजन देने का विशेष महत्व होता है। ​कौआ यमराज का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि कौआ आपके श्राद्ध का भोजन ग्रहण कर लेता है, तो आपके पितर आपसे प्रसन्न और तृप्त माने जाते हैं। यदि कौआ भोजन नहीं करता है तो इसका अर्थ है कि आपके पितर आपसे नाराज़ और अतृप्त हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कौओं को देवपुत्र माना जाता है। व्य​क्ति जब शरीर का त्याग करता है और उसके प्राण निकल जाते हैं तो वह सबसे पहले कौआ का जन्म पाता है। माना जाता है कि कौए को दिया गया भोजन पितरों को ही प्राप्त होता है।

कौआ अतिथि के आने की सूचना देने वाला तथा पितरों का आश्रम स्थल माना गया है। ऐसी भी मान्यता है कि कौए ने अमृत का पान कर लिया था, जिससे उसकी स्वाभाविक मौत नहीं होती है।

माता सीता से जुड़ी है यह कथा

एक मान्यता के अनुसार त्रेता युग में जयंत ने कौए का रूप धारण कर माता सीता के पैर में चोंच मारकर उनको कष्ट पहुंचाया था।

यह देखते ही प्रभु श्रीराम उस कौए पर क्रोधित हुए और उन्होंने तिनके को अस्त्र बनाकर उसकी एक आँख पर प्रहार किया, जिससे उसकी एक आँख क्षतिग्रस्त हो गई।

पश्चाताप होने पर कौए रुपी जयंत ने अपने अपराध के लिए प्रभु श्रीराम से क्षमा मांगी। तब प्रभु ने उसके उस रूप को वरदान दिया कि उसे अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा। तभी से श्राद्ध में कौवों को भोजन कराया जाता है।

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आज है गूगल का 20वां जन्मदिन

आज इंटरनेट के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल का 20वां जन्मदिन है। इस मौके को यादगार बनाने के लिए गूगल ने एक ख़ास तरह का डूडल बनाया है। 25वें बर्थडे पर गूगल ने (G20GLE) लिखा है। इस डूडल में गूगल ने बीते 20 साल के दौरान बनाए गए बेहतरीन डूडल का एक संग्रह तैयार किया है। इन डूडल्स को देख आप यकीनन गूगल की पुरानी दिलचस्प यादों में खो जाएंगे।

किसने बनाया था गूगल को

साथ ही गूगल ने एक वीडियो दिखाया है। जहां वो गूगल का पूरा सफर दिखा रहा है। गूगल की शुरुआत दो छात्रों ने की थी.यह एक कॉलेज प्रोजेक्ट था जिसे आज हम गूगल के नाम से जानते हैं। लैरी पेज और सर्जी बिन 1995 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (में पी.एच.डी.) कर रहे थे। उन्होंने Google.stanford.edu एड्रेस पर एक इंटरनेट सर्च इंजन बनाया था.पहले इसका नाम BackRub रखा गया। जिसके बाद उसका नाम GOOGLE रखा दिया गया।

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15 सितंबर 1995 को रजिस्टर हुआ गूगल का डोमेन

15 सितंबर 1995 को रजिस्टर हुआ था गूगल डॉट कॉम (google.com) का डोमेन. इस लिहाज़ से गूगल का जन्मदिन 15 सितंबर को होना चाहिए. हालांकि सर्च इंजन के संस्थापक लैरी पेज और सर्जी बिन ने 4 सितंबर 1998 को गूगल को एक कंपनी के तौर पर रजिस्टर किया और कंपनी के नाम पर पहला बैंक अकाउंट भी खुलवाया था.इस लिहाज़ से 4 सितंबर को भी गूगल का जन्मदिन मनाया जा सकता है.

साल में चार बार आता है गूगल का जन्मदिन

गूगल अब तक चार अलग-अलग तारीखों पर अपना जन्मदिन मना चुका है. गूगल के 15वें जन्मदिन पर कंपनी ने खुद यह बात स्वीकार की थी कि उन्हें नहीं पता कि गूगल का असली जन्मदिन कब है. गूगल ने अलग-अलग सालों में 7 सितंबर, 8 सितंबर, 26 सितंबर और 27 सितंबर को अपना जन्मदिन मनाया है.

साल 2002 में गूगल ने 27 सितंबर को अपना चौथा जन्मदिन मनाया था. इसके अगले साल 7 सितंबर और उसके अगले साल 8 सितंबर को भी गूगल ने अपना जन्मदिन मनाया था. हालांकि साल 2006 से अब तक गूगल 27 सितंबर को ही अपना जन्मदिन मनाता आ रहा है.

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पितृ पक्ष 2023: जानिए सपने में पूर्वजों का दिखना क्या संकेत देता है

इस साल पितृ पक्ष 29 सितंबर से प्रारंभ हो रहा है, जो 14 अक्टूबर तक रहेगा। 14 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। पूरे वर्ष में 15 दिन होते हैं जिन्हें श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष के रूप में जाना जाता है। साल के ये 15 दिन पूरी तरह से पितरों को समर्पित होते हैं।

इस दौरान लोग अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं और उनके लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे अनुष्ठान करते हैं ताकि उनके पूर्वजों को शांति और संतुष्टि मिल सके।

अक्सर आपने पूर्वजों के सपने में आने की बात जरूर सुनी होगी। स्वप्न शास्त्र के मुताबिक, सपने में पितरों के आने की कोई ना कोई खास वजह जरूर होती है।

आज इस पोस्ट में हम जानेंगे सपने में पूर्वजों का दिखना क्या संकेत देता है, तो चलिए जानते हैं :-

 

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सपने में कब और क्यों आते हैं पितृ?

ऐसी मान्यताएं हैं कि मृत्यु होने के बाद जब किसी इंसान की ख्वाहिश अधूरी रह जाती है तो वो अपने वंशजों को सपने में में दिखाई देने लगते हैं। ऐसा कहते हैं कि पितृ केवल उन्हीं लोगों को दिखाई देते हैं जो उनकी अधूरी इच्छाओं को पूरा कर पाने में योग्य हैं।

जब तक उनकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं होती, तब तक उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है। हालांकि ऐसे सपनों का अर्थ पितरों की मुद्रा या भाव पर भी निर्भर करता है।

  • यदि सपने में आपके पितृ आपको हंसते हुए या खुश दिखाई दें तो ये उनके प्रसन्न होने का संकेत होता है। पितृ जब किसी इंसान से खुश होते हैं तो उनके जीवन की सारी बाधाएं, सारी समस्याएं खुद-ब-खुद समाप्त होने लगती हैं। पितरों का आशीर्वाद मिलने से वे जीवन में बड़ी उपलब्धियां भी भी हासिल कर सकते हैं।
  • यदि सपने में पितृ आपको बाल संवारते हुए दिखाई दें तो इसका भी एक खास मतलब होता है। इसका अर्थ है कि आप पर जो मुसीबत आने वाली थी, पितरों ने आपको उससे बचा लिया है। इसे एक शुभ संकेत की तरह समझें।
  • यदि सपने में पितृ आपको शांत मुद्रा में दिखाई दे रहे हैं तो समझ लीजिए, वे आपसे पूर्णत: संतुष्ट हैं। ये कोई बड़ी खुशखबरी मिलने का भी संकेत हो सकता है। आपको संतान पक्ष से कोई शुभ समाचार मिल सकता है। पेशवर जीवन या करियर के मोर्चे पर कोई बड़ी सफलता भी आपके हाथ लग सकती है। यदि आपको सपने में रोते हुए पितृ दिखाई दे रहे हैं तो ये बहुत ही अशुभ संकेत है। ऐसा होने पर आपको सावधानी बरतनी चाहिए।
  • पितरों का रोना आप पर किसी भारी संकट के आने का संकेत हो सकता है। इसे इग्नोर करने की बजाए पहचानने की जरूरत है। ऐसे में पितरों की शांति के लिए श्राद्ध कर्म और पिंडदान करना बहुत जरूरी हो जाता है।

भारत के इस जगह में पूर्णिमा की रात चांद जैसी चमकती है धरती, बेहद खूबसूरत होता है नज़ारा

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भारत में ऐसी बहुत सी ऐसी जगहें हैं जो बेहद खूबसूरत और आकर्षक हैं। दुनिया भर से लोग भारत की इन खूबसूरत जगहों का दीदार करने के लिए आते हैं। ऐसी ही एक जगह भारत के लेह ज़िले में स्थित है।

इस जगह को चांद की धरती भी कहा जाता है। इस जगह का नाम लामायुरू या लामायुरो (Lamayouro) है। दरअसल यह एक गांव है जहाँ दुनियाभर से लोग घूमने आते हैं।

इस पोस्ट में हम आपको इसी खूबसूरत जगह के बारे में बताने जा रहे हैं तो चलिए शुरू करते हैं :

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लामायुरु गांव

चांद की धरती कहा जाना वाला यह गांव लेह से 127 किमी दूर बसा है। समुद्र से 3510 मीटर ऊंचे और माइनस 40 डिग्री तापमान होने के बावजूद भी यहां घूमने का सपना हर सैलानी का होता है।

पूर्णिमा की रात को यहां की जमीन चांद की तरह चमकने लगती है इसलिए इस जगह को मूनलैण्ड के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर लामायुरु मोनेस्ट्री है जिसे देखने के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

लामायुरू मोनेस्ट्री से जुड़ी किंवदंती

लामायुरू मोनेस्ट्री लद्दाख के सबसे पुराने मठों में से एक है, जबकि यह लद्दाख में सबसे बड़ा मौजूदा गोम्पा भी है। इसके साथ कई किंवदंतियाँ जुड़ी हुई हैं, जिनमें से एक यह है कि लामायुरू में एक विशाल झील मौजूद थी। इस झील को महासिद्धाचार्य नरोपा ने गाँव और मठ की नींव रखने के लिए सुखा दिया था।

इस प्रकार, पानी सूखने के बाद, भूमि पर चाँद जैसे गड्ढे और संरचनाएँ बनने लगीं। बेशक, इस किंवदंती का कोई ठोस प्रमाण नहीं है और यह केवल एक कहानी है जो सदियों से बताई जाती रही है।

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लामायुरू मठ सबसे अधिक आश्चर्यजनक स्तूपों और रंगीन चट्टानों का घर है जिन पर जटिल विवरण में प्रार्थनाएं उकेरी गई हैं। मठ में कार्डिनल राजाओं की कई उज्ज्वल और ज्वलंत प्राचीन पेंटिंग भी हैं।

इसमें मूल रूप से पांच मुख्य इमारतें थीं, लेकिन वर्तमान में, केवल एक केंद्रीय इमारत मौजूद है, जो अपने आप में दुनिया भर के यात्रियों, भक्तों और फोटोग्राफरों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

लामायुरु लद्दाख में सबसे बड़े और सबसे पुराने गोम्पों में से एक है, जिसकी आबादी लगभग 150 स्थायी भिक्षुओं की है। अतीत में, इसमें 400 भिक्षु रहते थे, जिनमें से कई अब आसपास के गांवों में गोम्पों में स्थित हैं।

पिंडदान और तर्पण के लिए प्रसिद्ध हैं भारत के ये दस स्थान!

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का अत्यधिक महत्व है। पितृ पक्ष के 15 दिनों की अवधि के दौरान, लोग अपने पूर्वजों की आत्माओं की मुक्ति के लिए पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण भोज आदि करते हैं। मान्यताओं के अनुसार सिद्ध और धार्मिक स्थलों पर पिंडदान और तर्पण करने से व्यक्ति को उचित फल की प्राप्ति होती है।

ऐसे में भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐसे स्थान हैं जहां लोग सफलतापूर्वक पितृ पक्ष श्राद्ध कर सकते हैं। आज हम आपको इस पोस्ट में 10 ऐसी जगहों के बारे में बताएंगे जहां आप पिंडदान कर सकते हैं।

काशी – उत्तर प्रदेश के मोक्ष शहर से जाना जाने वाला काशी श्राद्ध और तर्पण के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहां किए गए अनुष्ठानों से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती है।

गया-बिहार का गया शहर भी सिद्ध स्थानों में गिना जाता है। यही कारण है कि इस स्थान पर श्राद्ध कर्म करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

हरिद्वार– उत्तराखंड में स्थित हरिद्वार को देव नगरी के नाम से भी जाना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान, लाखों लोग इस स्थान पर इकट्ठा होते हैं और श्राद्ध अनुष्ठान करते हैं।

पुष्कर– राजस्थान में मौजूद इस सिद्ध स्थल में एक प्राचीन सरोवर मौजूद है, जहां लोग मुक्ति कर्म करते हैं।

लक्ष्मण बाण– कर्नाटक में मौजूद इस सिद्ध स्थल के तार रामायण काल ​​से जुड़े हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री राम ने इसी स्थान पर अपने पिता का श्राद्ध कर्म किया था। ऐसे में तर्पण और पिंडदान के लिए इस स्थान का महत्व और भी बढ़ जाता है।

नासिक– गोदावरी नदी जिसे दक्षिण गंगा के नाम से भी जाना जाता है, महाराष्ट्र में स्थित नासिक शहर से बहती है। ऐसे में यह सिद्ध स्थान श्राद्ध के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

प्रयाग– उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर लोग श्राद्ध कर्म करते हैं। यह वह स्थान है जहाँ तीन देव नदियाँ गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती नदी मिलती है।

ब्रह्मकपाल– उत्तराखंड में स्थित यह धार्मिक स्थल श्राद्ध के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जिन पितरों को किसी अन्य स्थान पर मोक्ष नहीं मिलता, उन्हें इस स्थान पर मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है।

पिंडारक– गुजरात में स्थित पिंडारक भी पिंडदान के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर पांडवों ने पिंडदान किया था।

लौहनगर– राजस्थान में मौजूद इस स्थान का महत्व भी बहुत ज्यादा है। मान्यता है कि इस स्थान पर मौजूद सूरजकुंड में पांडवों ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए श्राद्ध किया था।

पितृ पक्ष 2023: श्राद्ध का भोजन बनाते और खिलाते समय इन बातों का ध्यान रखें

श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों के लिए अनुष्ठान और तर्पण किया जाता है। इस दिन प्रसाद के साथ-साथ पकवान और भोजन बनाकर पितरों को अर्पण किया जाता है ताकि वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद दें।

शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध का भोजन बनाते समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए नहीं तो पितर नाराज भी हो सकते हैं। हर चीज साफ और स्वच्छ होनी चाहिए।

आज हम आपको इस पोस्ट में बताने जा रहे हैं कि किन बातों का ध्यान श्राद्ध का भोजन बनाते समय रखना चाहिए।

श्राद्ध के लिए भोजन बनाते समय इन बातों का रखें ध्यान

श्राद्ध के लिए खाना बनाते समय उसमें खीर का होना बहुत जरूरी है। कोशिश करें कि खीर गाय के दूध से बने न कि भैंस के दूध से। श्राद्ध में दूध, दही और घी तीनों ही गाय के होने चाहिए।

इनके सेवन से ब्राह्मण तृप्त होते हैं, जिससे पितरों को भी सुख की प्राप्ति होती है। इसके अलावा खीर के सेवन से देवता भी प्रसन्न होते हैं।

श्राद्ध के लिए भोजन बनाते समय प्याज और लहसुन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह सात्विक भोजन है। ऐसे में ध्यान रखें कि लहसुन और प्याज से दूर ही रहना ही बेहतर है।

श्राद्ध भोजन हमेशा बिना चप्पल पहने ही बनाना चाहिए। आप चाहें तो लकड़ी की चप्पलें पहन सकते हैं क्योंकि लकड़ी को बहुत पवित्र और पवित्र माना जाता है लेकिन चमड़े के जूते या चप्पल पहनकर सात्त्विक भोजन नहीं बनाना चाहिए।

श्राद्ध के लिए भोजन बनाते समय दिशा का ध्यान रखें। हमेशा पूर्व की ओर मुंह करके खाना बनाना चाहिए और दक्षिण की ओर मुंह करके खाना नहीं बनाना चाहिए।

पितृ पक्ष 29 सितम्बर से 14 अक्टूबर तक, किस तिथि पर किसका श्राद्ध करना चाहिए

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए संतान का होना जरुरी माना जाता हैl श्राद्ध की तिथियों में लोग अपने पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करते है और उन्हें जल और पिंड दान देते हैं।

कौन कहलाते हैं पितर

पितर वे व्यक्ति कहलाते है, जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है, उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है।

श्राद्ध क्या होता है

हिन्दू धर्म में भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि से आरम्भ होने वाले पितर पक्ष का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा ही चुकाया जा सकता है। पितर पक्ष में श्राद्ध करने से पितर गण प्रसन्न रहते हैं। श्राद्ध में पितरों को उम्मीद रहती है, कि हमारे पुत्र-पौत्रादि पिंडदान और तिलांजलि प्रदान करेंगे। हिंदू धर्म शास्त्रों में पितर पक्ष में श्राद्ध अवश्य करने के लिए कहा गया है।

कब से शुरू हो रहे है श्राद्ध

इस वर्ष में श्राद्ध पक्ष 29 सितम्बर से 14 अक्टूबर तक तक रहेगें । पूर्णिमा से अमावस्या तक 15 तिथियां पितरों के निमित श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन 15 तिथियों में सभी अपने-अपने पितर को याद करते है और उनका श्राद्ध करते हैं।

पूर्णिमा, 29 सितंबर
जिन लोगों की मृत्यु पूर्णिमा को हुई हो, उनका श्राद्ध इस दिन करना चाहिए। इस तिथि से पितर पक्ष शुरू होता है।
प्रतिपदा, 30 सितंबर
इस तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी महीनें के किसी भी पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर हुई हो। जैसे  नाना-नानी के परिवार में किसी की मृत्यु हुई हो, और उसकी मृत्यु की तारीख पता न हो, तो उसका श्राद्ध प्रतिपदा पर किया जाता है।
द्वितिया, 1 अक्टबर
द्वितिया तिथि को मृत लोगों का श्राद्ध किया जाता है।
तृतीया, 2 अक्टूबर
जिसकी मृत्यु तृतीया तिथि पर हुई हो, उसका श्राद्ध इस दिन किया जाता है। इस बार दो दिन तृतीया तिथि रहेगी।
चतुर्थी, 3 अक्टूबर
इस तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु चतुर्थी तिथि को हुई हो।
पंचमी, 4 अक्टूबर
पंचमी तिथि पर मृत व्यक्ति का श्राद्ध किया जाता है। और अगर किसी अविवाहित व्यक्ति की मृत्यु पंचमी तिथि को हुई है, तो उसका श्राद्ध  भी इस तिथि पर करना चाहिए।
षष्ठी, 5 अक्टूबर
षष्ठी तिथि पर उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु षष्ठी तिथि पर हुई हो।
सप्तमी, 6 अक्टूबर
जिस व्यक्ति की मृत्यु किसी भी महीनें और किसी भी पक्ष मे हुई हो , उसका श्राद्ध इस तिथि पर किया जाता है।
अष्टमी, 7 अक्टूबर
जिन लोगों का देहांत किसी माह की अष्टमी तिथि पर हुई है, उनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है।
नवमी , 8 अक्टूबर
माता की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध न करके नवमी तिथि पर उनका श्राद्ध करना चाहिए. ऐसा माना जाता है कि, नवमी तिथि को माता का श्राद्ध करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती हैं. वहीं जिन महिलाओं की मृत्यु तिथि याद न हो उनका श्राद्ध भी नवमी तिथि को किया जा सकता है ।
दशमी,  9 अक्टूबर
दशमी तिथि को जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध महालय की दसवीं तिथि के दिन किया जाता है.
एकादशी, 10 अक्टूबर
इस तिथि पर मृत लोगों का और संन्यासियों का श्राद्ध किया जाता है।
द्वादशी,11 अक्टूबर 
इस दिन मृत लोगों का श्राद्ध द्वादशी तिथि पर किया जाता है।
त्रयोदशी, 12 अक्टूबर
अगर किसी बच्चे की मौत हो गई है तो उसका श्राद्ध इस तिथि पर करना चाहिए।
चतुर्दशी, 13 अक्टूबर
जिन लोगों की मौत किसी दुर्घटना में हो गई है, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि पर करना चाहिए।
अमावस्या, 14 अक्टूबर
सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के लिए मोक्ष अमावस्या का श्राद्ध करना चाहिए।

पितर पक्ष में कैसे करें श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष के दिनों में पूजा और तर्पण करें। पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक ग्रास गाय, दूसरा हिस्सा कुत्ते, तीसरा टुकड़ा कौए और एक भाग मेहमान के लिए रख दें। गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। जो श्रद्धा पूर्वक किया जाएं उसे श्राद्ध कहते हैं।

पुराणों के अनुसार मनुष्य का अगला जीवन पिछले संस्कारों से बनता है। श्राद्ध कर्म इस भावना से किया जाता है, कि अगला जीवन बेहतर हो। जिन पितरों का हम श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे हमारी मदद करते हैं।

पितर पक्ष में नई वस्‍तुओं की खरीदारी शुभ या अशुभ, जानिए क्या हैं मान्यताएं

श्राद्ध पक्ष को लेकर लोगों के मन में आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है, कि यह अशुभ समय होता है और इस दौरान कोई भी नया काम करने या कोई भी नई चीज खरीदना शुभ नहीं माना जाता। ऐसा करने से पितरगण नाराज हो जाते हैं।

यही वजह है कि इस धारणा के कई व्‍यापार और उद्योग पितर पक्ष के दिनों में मंदे पड़ जाते हैं। वहीं  शास्‍त्रों में इस बात का उल्‍लेख कहीं नहीं मिलता है, कि पितर पक्ष में खरीदारी करने से अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं l

कुछ विद्वानों का मानना है कि पितर पक्ष में हमारे पूर्वज धरती का रुख करते हैं। ऐसे में हमें उनकी सेवा में और श्राद्ध कर्म में मन लगाना चाहिए। सेवा करने की बजाए यदि हम नई वस्तुओं की और ध्यान लगाए तो पितृ नाराज हो सकते हैं l यही वजह है कि पितृ पक्ष में नई वस्‍तु नहीं खरीदी जाती।

बीगल्स : सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला और पालने योग्य नस्ल का कुत्ता

बीगल्स नस्ल के कुत्ते बहुत ही शांत स्वभाव के होते हैं। बीगल्स नस्ल के कुत्तों के कान लम्बे होते हैं। इस नस्ल के कुत्तों में सूंघने की जबरदस्त क्षमता होती हैं। ये कुत्ते सक्रिय रहने के लिए बाहर समय बिताना अधिक पसंद करते हैं। बीगल बहुत प्यारे होते हैं और उन्हें खेलना कूदना बहुत पसंद होता है।

यह छोटे आकार की नस्ल है जो कि मुख्य रूप से शिकार के उद्देश्य के लिए विकसित की गई है। इस नसल के कुत्तों का अैसतन कद 1 फुट होता है और औसतन भार 9-15 किलो होता है।

इस नस्ल का औसतन जीवन काल 13-16 वर्ष होता है। इनके मैत्रीपूर्ण स्वभाव की कारण इनकी देखभाल भी आसानी से की जा सकती है। इसे पॉकेट बीगल के नाम से भी जाना जाता है ।

Beagles most liked dog breed hindi

बीगल सबसे ज्यादा काले और गहरे भूरे रंग में पाये जाते हैं। इनकी छाती, पेट और टांगे सफेद रंग की होती है। गहरे भूरे रंग का सिर होता है और पूंछ का ऊपरी सिरा सफेद रंग का होता है। इसकी गर्दन, मुंह, टांगे और पूंछ के सिरे पर लाल रंग के धब्बे होते हैं।

बीगल डॉग इतिहास

यह कुत्ता एक छोटे शिकारी कुत्ते की नस्ल है जिसकी उत्पत्ति 1500 के दशक में इंग्लैंड में हुई थी। ऐसा माना जाता है कि यह हैरियर का वंशज है, एक शिकारी कुत्ता जो खरगोशों और अन्य छोटे जानवरों का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। ये कुत्ता अपनी गंध की गहरी समझ और पैदल खेल को ट्रैक करने की क्षमता के कारण शिकारियों के बीच काफी लोकप्रिय है।

1800 के दशक में, बीगल कुत्ते को संयुक्त राज्य अमेरिका में लाया गया, जहां यह एक लोकप्रिय पारिवारिक पालतू और साथी कुत्ता बन गया। अब इसे अमेरिकी केनेल क्लब द्वारा हाउंड समूह के सदस्य के रूप में मान्यता दी गई है।

भोजन

भोजन की मात्रा और किस्म, कुत्ते की उम्र और उसकी नसल पर निर्भर करती है। छोटी नस्लों को बड़ी नसल के मुकाबले भोजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है। भोजन उचित मात्रा में दिया जाना चाहिए नहीं तो कुत्ते सुस्त और मोटे हो जाते हैं।

संतुलित आहार जिसमें कार्बोहाइड्रेट्स, फैट, प्रोटीन, विटामिन और ट्रेस तत्व शामिल हैं, पालतू जानवरों को स्वस्थ और अच्छे आकार में रखने के लिए आवश्यक होते हैं।

कुत्ते को 6 आवश्यक तत्व जैसे फैट, खनिज, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट्स, पानी और प्रोटीन की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही इन्हें सारा समय साफ पानी की आवश्यकता होती है।

Beagles most liked dog breed
A beautiful hound dog sits on a green grass lawn looking at the camera, with sunlight backlighting her head. Horizontal with copy space.

पिल्ले को 29 प्रतिशत प्रोटीन और प्रौढ़ कुत्ते को आहार में 18 प्रतिशत प्रोटीन की जरूरत होती है। हम उन्हें ये सारे आवश्यक तत्व उच्च गुणवत्ता वाले सूखा भोजन देकर दे सकते हैं। इन्हें दिन में दो बार ¾ -1½ कप उच्च गुणवत्ता वाला सूखा भोजन देना चाहिए।

पिल्ले का चयन करते समय सावधानियां

  • पिल्ले का चयन आपकी जरूरत, उद्देश्य, उसके बालों , लिंग और आकार के अनुसार किया जाना चाहिए। पिल्ला वह खरीदें जो 8-12 सप्ताह का हो।
  • पिल्ला खरीदते समय उसकी आंखे, मसूड़े, पूंछ और मुंह की जांच करें। आंखे साफ और गहरी होनी चाहिए, मसूड़े गुलाबी होने चाहिए और पूंछ तोड़ी हुई नहीं होनी चाहिए और दस्त के कोई संकेत नहीं होने चाहिए।

देख रेख

  • कुत्ते को रहने के लिए अच्छी तरह से हवादार, साफ और सुरक्षित वातावरण प्रदान करें। आश्रय अत्याधिक बारिश और हवा और आंधी से सुरक्षित होना चाहिए। सर्दियों में कुत्तों को ठंड के मौसम से बचाने के लिए कंबल दें और गर्मियों में छाया और ठंडे स्थानों की आवश्यकता होती है।
  • कुत्ते के लिए 24 घंटे साफ पानी उपलब्ध होना चाहिए। पानी को साफ रखने के लिए प्रयोग किए जाने वाले बर्तन को आवश्यकतानुसार दिन में कम से कम दो बार या इससे अधिक समय में साफ करना चाहिए।
  • सप्ताह में दो बार बालों की देख रेख की जानी चाहिए। कंघी करने से अच्छा है प्रतिदिन ब्रशिंग करें। छोटे बालों वाली नसल के लिए सिर्फ ब्रशिंग की ही आवश्यकता होती है और लंबे बालों वाली नसल के लिए ब्रशिंग के बाद कंघी करनी चाहिए।

Beagles most liked dog breed

  • कुत्तों को 10-15 दिनों में एक बार नहलाना चाहिए। नहलाने के लिए औषधीय शैंपू की सिफारिश की जाती है।
  • स्वस्थ पिल्लों के लिए गर्भवती मादा की उचित देखभाल की आवश्यकता होती है। ब्यांत के समय या पहले उचित अंतराल पर टीकाकरण अवश्य देना चाहिए। ब्यांत का समय लगभग 55-65 दिन का होता है। उचित आहार, अच्छा वातावरण, व्यायाम और उचित जांच ब्यांत के समय के दौरान आवश्यक होती है।
  • पिल्लों के जीवन के कुछ हफ्तों के लिए उनकी प्राथमिक गतिविधियों में अच्छे वातावरण, आहार और अच्छी आदतों का विकास शामिल है।
  • कम से कम 2 महीने के नवजात पिल्ले को मां का दूध प्रदान करें और यदि मां की मृत्यु हो गई हो या किसी भी मामले में पिल्ला अपनी मां से अलग हो जाए तो शुरूआती फीड या पाउडरड दूध पिल्ले को दिया जाता है।
  • कुत्ते को भी हर 6-12 महीनों के बाद दांतों की जांच के लिए पशु चिकित्सक की आवश्यकता होती है। अपने कुत्ते के दांतों को नर्म ब्रश के साथ ब्रश करें और एक ऐसे पेस्ट का चयन करें जो फ्लोराइड मुक्त हो क्योंकि फ्लोराइड कुत्तों के लिए बहुत ही जहरीला होता है।
  • पालतू जानवरों को नियमित टीकाकरण और डीवॉर्मिंग की आवश्यकता होती है ताकि उन्हें स्वास्थ्य समस्याएं ना हों।
BEAGLE DOG OWNERS GUIDE : The Practical Owner’s Manual on Raising Beagle Dog from Puppy Till Old Ageयदि आपके पास बीगल है तो यह (BEAGLE DOG OWNERS GUIDE) किताब इसके स्वभाव को समझने और इसे आपके और करीब लाने में मदद कर सकती है। यह किताब आपके पालतू  की psychology यानि मनोविज्ञान को समझने में बहुत अधिक सहायक हो रही है ऐसा हजारों लोगों का मानना है।

बीगल नस्ल की प्रजजन

बीगल की गर्भधारण अवधि आम तौर पर लगभग 60 से 65 दिन या लगभग 2 महीने की होती है। एक बार में ये लगभग पांच से छह पिल्लों को जन्म देती है।

भारत में बीगल की कीमत

भारत में बीगल पिल्लों की औसत कीमत 15,000 रुपये से 40,000 रुपये तक है। बीगल पिल्लों की कीमत पिल्ले की नस्ल, लिंग, उम्र और आकार पर निर्भर करती है।

जानिए कब से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध, कौन कहलाते हैं पितर

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए संतान का होना जरुरी माना जाता है। श्राद्ध की तिथियों में लोग अपने पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करते है और उन्हें जल और पिंड दान देते हैं।

कौन कहलाते हैं पितर

पितर वे व्यक्ति कहलाते है, जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है, उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है।

श्राद्ध क्या होता है

हिन्दू धर्म में भाद्र मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि से आरम्भ होने वाले पितर पक्ष का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा ही चुकाया जा सकता है।

पितर पक्ष में श्राद्ध करने से पितर गण प्रसन्न रहते हैं। श्राद्ध में पितरों को उम्मीद रहती है, कि हमारे पुत्र-पौत्रादि पिंडदान और तिलांजलि प्रदान करेंगे। हिंदू धर्म शास्त्रों में पितर पक्ष में श्राद्ध अवश्य करने के लिए कहा गया है।

इस बार पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 29 सितंबर से होकर 14 अक्टूबर तक रहेगा इसीलिए तारीख तो दो है परंतु तिथि एक ही है।

29 सितंबर 2023, शुक्रवार: पूर्णिमा श्राद्ध

30 सितंबर 2023, शनिवार: द्वितीया श्राद्ध

01 अक्टूबर 2023, रविवार: तृतीया श्राद्ध

02 अक्टूबर 2023, सोमवार: चतुर्थी श्राद्ध

03 अक्टूबर 2023, मंगलवार: पंचमी श्राद्ध

04 अक्टूबर 2023, बुधवार: षष्ठी श्राद्ध

05 अक्टूबर 2023, गुरुवार: सप्तमी श्राद्ध

06 अक्टूबर 2023, शुक्रवार: अष्टमी श्राद्ध

07 अक्टूबर 2023, शनिवार: नवमी श्राद्ध

08 अक्टूबर 2023, रविवार: दशमी श्राद्ध

09 अक्टूबर 2023, सोमवार: एकादशी श्राद्ध

11 अक्टूबर 2023, बुधवार: द्वादशी श्राद्ध

12 अक्टूबर 2023, गुरुवार: त्रयोदशी श्राद्ध

13 अक्टूबर 2023, शुक्रवार: चतुर्दशी श्राद्ध

14 अक्टूबर 2023, शनिवार: सर्व पितृ अमावस्या

कब से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध

इस वर्ष में श्राद्ध पक्ष 29 सितंबर से 14 अक्टूबर तक रहेगें । पूर्णिमा से अमावस्या तक 15 तिथियां पितरों के निमित श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन 15 तिथियों में सभी अपने-अपने पितर को याद करते है और उनका श्राद्ध करते हैं।

पितर पक्ष में कैसे करें श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष के दिनों में पूजा और तर्पण करें। पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक ग्रास गाय, दूसरा हिस्सा कुत्ते, तीसरा टुकड़ा कौए और एक भाग मेहमान के लिए रख दें।

गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। जो श्रद्धा पूर्वक किया जाएं उसे श्राद्ध कहते हैं। पुराणों के अनुसार मनुष्य का अगला जीवन पिछले संस्कारों से बनता है।

श्राद्ध कर्म इस भावना से किया जाता है, कि अगला जीवन बेहतर हो। जिन पितरों का हम श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे हमारी मदद करते हैं।