लिनक्स (Linux) के जनक लिनस टोरवाल्ड्स के बारे में रोचक तथ्य

लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम(Linux Operating System) के निर्माता लिनस टोरवाल्ड्स(Linus Torvalds) का जन्म 28 दिसंबर, 1969 को हेलसिंकी, फ़िनलैंड में हुआ था। उनके दादाजी के पास कमोडोर VIC-20 था जिसके साथ उन्हें काम करने का अवसर मिला; VIC-20 एक 8-बिट होम कंप्यूटर है जिसे कमोडोर बिजनेस मशीन्स द्वारा बेचा गया था।

लिनस टोरवाल्ड्स महज़ दस साल की उम्र में ही प्रोग्रामिंग में रुचि लेने लगे थे। उन्होंने 1989 में हेलसिंकी विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और 1990 में उन्होंने अपनी पहली सी प्रोग्रामिंग(C-Programming) की पढाई की।

1991 में, टोरवाल्ड्स ने निर्णय लिया कि उनके नए MS-DOS-संचालित पर्सनल कंप्यूटर को एक वैकल्पिक ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकता है। मेहनती और मेधावी टोरवाल्ड्स ने 1 साल में ही इतनी प्रोग्रामिंग सीख ली थी कि उन्होंने एक नया ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने की ठान ली।

Linus Torvalds 2003 में
Linus Torvalds 2003 में – Photo Rights LINUXMAG.com

उनका लक्ष्य एक UNIX जैसा ऑपरेटिंग सिस्टम बनाना था जिसे वह घर पर उपयोग कर सकें। एक मार्गदर्शक के रूप में मैरिस जे. बाख की पुस्तक “डिज़ाइन ऑफ़ द यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम” का उपयोग करते हुए, उन्होंने कड़ी मेहनत करते हुए, 22 साल की उम्र में सिस्टम बनाने के लिए पहला काम चलाऊ संस्करण पूरा किया।

उन्होंने अपने सिस्टम को “लिनक्स” कहा, जो UNIX और उसके नाम का संयोजन है। उन्होंने मूल कोड (source code) को इंटरनेट पर निःशुल्क पोस्ट किया। टोरवाल्ड्स का मानना था कि यदि वह सॉफ्टवेयर को मूल कोड मुफ्त डाउनलोडिंग के लिए उपलब्ध कराता है, तो कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का ज्ञान और रुचि रखने वाला कोई भी व्यक्ति सिस्टम को संशोधित कर सकता है और अंततः इसे बेहतर बना सकता है, और/या इसे अपने विशिष्ट उद्देश्यों के लिए संशोधित कर सकता है।

एंड्रॉइड(Android) लिनक्स के एक संशोधित संस्करण पर आधारित है!

जल्दी ही हार्ड-कोर कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं के बीच लिनक्स तेजी से लोकप्रिय हो गया। जीएनयू जनरल पब्लिक लाइसेंस(GNU General Public License) के तहत लाइसेंस प्राप्त Linux सिस्टम किसी भी व्यक्ति के लिए निःशुल्क उपलब्ध है और इसे उपयोग कर सकता है, संशोधित कर सकता है, वितरित कर सकता है और कॉपी कर सकता है। सन 1999 तक अनुमानतः सत्तर लाख कंप्यूटर लिनक्स पर चल रहे थे।

जल्दी ही लिनक्स को व्यावसायिक हलकों में एक स्थिर ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में स्वीकृति मिल गयी। लिनक्स एक ऐसा ऑपरेटिंग सिस्टम सिद्ध हुआ जो शायद ही कभी क्रैश होता है। आने वाले कुछ सालों में आईबीएम, कॉम्पैक, इंटेल और डेल जैसे बड़े कंप्यूटर निगमों ने भी लिनक्स पर चलने वाली मशीनें विकसित करना शुरू कर दीं। लिनक्स ने उपभोक्ता PC बाजार में भी लोकप्रियता हासिल की।

टोरवाल्ड्स ने अपना निजी प्रतीक चिन्ह (LOGO) “टक्स” नामक पेंगुइन बनाया, जो दुनिया भर में लिनक्स के लिए एक पहचानने का एक जाना माना चेहरा बन गया।

टोरवाल्ड्स ने 1988-1997 तक हेलसिंकी विश्वविद्यालय में लिनक्स कर्नेल(Linux Kernel) के विकास के समन्वय और अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाने में बिताया। ट्रांसमेटा के लिए काम शुरू करने के लिए वह 1997 में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए, जहां उन्होंने बिजली की बचत करने वाले सीपीयू ट्रांसमेटा क्रूसो प्रोसेसर को डिजाइन करने में मदद की।

2003 में, टोरवाल्ड्स ने ओपन सोर्स डेवलपमेंट लैब्स (OSDL) के माध्यम से लिनक्स कर्नेल पर ध्यान केंद्रित करने के लिए ट्रांसमेटा को छोड़ दिया। OSDL का उद्देश्य Linux विकास को बढ़ावा देना था।

ओएसडीएल का जनवरी 2007 में द फ्री स्टैंडर्ड्स ग्रुप के साथ विलय हो गया और यह लिनक्स फाउंडेशन बन गया। मानक लिनक्स कर्नेल में कौन सा नया कोड शामिल किया जाए, इस पर फैसला लेने का अधिकार टोरवाल्ड्स के पास है।

सबसे ज्यादा इस्तेमाल किये जाने वाले ऑपरेटिंग सिस्टम लिनक्स के जनक टोरवाल्ड्स को कंप्यूटर तकनीक जगत में बेहद सम्मानित और सुविख्यात शख्स हैं। उन्हें 1997 नोकिया फाउंडेशन अवॉर्ड और यूनिफोरम पिक्चर्स लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड जैसे सम्मानों के साथ कंप्यूटर जगत के ढेर सारे सम्मानों से सम्मानित किया गया है।

गंगा नदी का उद्गम, महत्त्व एवं इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्य

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प्राचीन काल से ही भारत में बहने वाली पवित्र नदियों में गंगा का स्थान सबसे ऊपर माना गया है। इसके बाद सिंधु, सरस्वती, यमुना, नर्मदा, कावेरी, कृष्णा, गोदावरी, महानदी, ताप्ती, सरयू, शिप्रा, झेलम, ब्रह्मपुत्र आदि का नाम आता है। आखिकार गंगा नदी की उत्पत्ति कब और कहां हुई थी जाने इससे जुड़े कुछ खास तथ्य:

  • गंगा का उद्गम दक्षिणी हिमालय में तिब्बत सीमा के भारतीय हिस्से से होता है। गंगोत्री को गंगा का उद्गम माना गया है। परन्तु वास्तव में गंगा का उद्गम श्रीमुख नामक पर्वत से हुआ है। वहां गोमुख के आकार का एक कुंड है जिसमें से गंगा की धारा नकलती है। 4,023 मीटर ऊंचा गौमुख गंगा का उद्गम स्थल माना जाता है।
  • गोमुख से निकलकर गंगा कई धाराओं में विभाजित होकर कई नामों से जानी जाती है। प्रारंभ में यह हिमालय से निकलकर 12 धाराओं में विभक्त होती है। इसमें मंदाकिनी, भगीरथी, ऋषिगंगा, धौलीगंगा, गौरीगंगा और अलकनंदा प्रमुख है। यह नदी प्रारंभ में 3 धाराओं में बंटती हैमंदाकिनी, अलकनंदा और भगीरथी। गंगोत्री में गंगाजी को समर्पित एक मंदिर भी है।
  • माना जाता है ब्रह्मा से लगभग 23वीं पीढ़ी बाद और राम से लगभग 14वीं पीढ़ी पूर्व भगीरथ हुए। भगीरथ ही गंगा को पृथ्वी पर लेकर आये थे।

ganga river temple

  • पौराणिक मान्यता के अनुसार गंगा के पिता का नाम हिमालय है जो पार्वती के पिता भी हैं। गंगा ने अपने दूसरे जन्म में ऋषि जह्नु के यहां जन्म लिया था। एक अन्य कथा के अनुसार गंगा पर्वतों के राजा हिमवान और उनकी पत्नी मीना की पुत्री है, इस प्रकार वे देवी पार्वती की बहन भी है। कुछ जगहों पर उन्हें ब्रह्मा के कुल का बताया गया है।
  • देवप्रयाग में अलकनंदा और भगीरथी का संगम होने के बाद यह गंगा के रूप में दक्षिण हिमालय से ऋषिकेश के निकट बाहर आती है और हरिद्वार के बाद मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।
  • हरिद्वार को गंगा का द्वार भी कहा जाता है। यहां से निकलकर गंगा आगे बढ़ती है। इस बीच इसमें कई नदियां मिलती हैं जिसमें प्रमुख हैंसरयू, यमुना, सोन, रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कोसी, घुघरी, महानंदा, हुगली, पद्मा, दामोदर, रूपनारायण, ब्रह्मपुत्र और अंत में मेघना। फिर यहां से निकलकर गंगा पश्चिम बंगाल के गंगासागर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
  • यह नदी 3 देशों के क्षेत्र का उद्धार करती है भारत, नेपाल और बांग्लादेशनेपाल, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल और फिर दूसरी ओर से बांग्लादेश में प्रवेश कर बंगाल की खाड़ी में समा जाती है।

गंगा नदी के किनारे बसे शहर

जल से ही जीवन का आरम्भ हुआ। जल ही जीवन का आधार है। इसलिए प्राचीन काल में लोगों का निवास स्थान नदी के किनारे हुआ करता था। गंगा नदी भारत के पांच राज्यों से होकर गुजरती है उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड व पश्चिम बंगाल। सरकार के अनुसार 97 नगर गंगा नदी के किनारे बसे हैं।

ganga map

उत्तराखंड में बसे मुख्य शहर जैसे हरिद्वार, ऋषिकेश, तपोवन, श्री नगर, उत्तरकाशी, जोशीमठ, उत्तारप्रयाग, गौचर, कीर्तिनगर व बद्रीनाथ।

उत्तर प्रदेश में – कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, मिर्जापुर, फर्रुखाबाद, मुगलसराय, बलिया, बिजनौर, कन्नौज, गंगाघाट, राम नगर, चुनार, हस्तिनापुर, व बिठूर।

बिहार में – पटना, भागलपुर, मुंगेर, छपरा, दानापुर, हाजीपुर, बक्सर, जमालपुर, बेगूसराय, मोकामा, सुल्तानगंज, बख्तियारपुर, बड़हिया प्रखण्ड, सोनपुर, कहलगांव व बरौनी।

झारखंड में – साहेबगंज व राजमहल।

पश्चिम बंगाल में – बैद्याबती, बंसबेरिया, बारानगर, बरहामपुर, भद्रेश्वर, भतपारा, बज बज, चकदाह, चांपदनी, धूलिया, गरुलिया, हल्दिया, हालीसहर, हुगली चिनसराह, हावड़ा एमसी, जंगीपुर, जियागंजअजीमगंज, कल्याणी, कमरहती, कांचरापाड़ा, कोलकाता एमसी, कृष्णनगर, मुर्शिदाबाद, नैहाटी, उत्तरी बैरकपुर, पानीहती, रिसरा, शांतिपुर, श्रीरामपुर, टीटागढ़ व उत्‍तरपाराकोतरूंग यह बसे प्रमुख नगर है।

गंगा किनारे बसे लोगों की आजीविका का एक मुख्य स्त्रोत

भारत का करीब सैंतालीस प्रतिशत उपजाऊ क्षेत्र गंगा बेसिन में है। करीब चालीस करोड़ लोग आजीविका के लिए किसी न किसी रूप में गंगा पर निर्भर रहते हैं, इसमें विशेषकर सिंचाई, उद्योगों के लिए पानी की उपलब्धता, मछली व्यापार, गंगा आरती, नौकायन, रिवर राफ्टिंग, टूरिस्ट गाइड, पर्यटन, नियंत्रित रेत खनन, मूर्ति एवं कुम्हार व्यवसाय हेतु चिकनी बलुई मिट्टी, स्नान पर्व, कुम्भअर्धकुम्भ आयोजन, प्रयाग में प्रति वर्ष माघ माह में कल्पवास, काशी में देव दीपावली महोत्सव, गंगा महोत्सव, घाटों की साफ़ सफाई, दर्शनपूजापाठ, पुरोहित, अंतिम संस्कार आदि आते हैं।

आज भी ऐसे परिवारों की बड़ी संख्या है जो अपने धार्मिक संस्कार मुंडन, कर्ण छेदन, उपनयन, विवाहोपरांत गंगा पुजैया आदि गंगा किनारे करते हैं जिससे घाटों के किनारे पूजन सामग्री बेचने वालों, पुजारियों, नाविकों आदि को आजीविका प्राप्त होती है।

ganda river

गंगा नदी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

  • गंगाजल कभी अशुद्ध नहीं होता है और न ही यह कभी सड़ता है। लोग गंगाजल को सालों तक अपने घर में रखते हैं।
  • गंगा नदी को सदाबहार नदी भी कहा जाता है क्योंकि यह नदी सबसे ख़राब सूखे मौसम में भी बहती है व् इस नदी के पानी का बहाव तक़रीबन 1400 से 1600 m3/s रहता है।
  • गंगा के तटीय क्षेत्रों में दलदल तथा झीलों के कारण यहाँ लेग्यूम, मिर्च, सरसो, तिल, गन्ना और जूट की बहुत फसल होती है।
  • पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार गंगा का स्वर्ग से धरती पर आगमन हुआ था। गंगा के किनारे ही रहकर महर्षि वाल्मीकि ने महाग्रंथ रामायण की रचना की थी।
  • जियोलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया के सर्वेक्षण के अनुसार, गत पचास वर्षों में गंगा का गोमुख ग्लैशियर प्रतिवर्ष 10 से 30 मीटर की गति से सिकुड़ता जा रहा है।
  • भारतीय धर्म शास्त्रों की मान्यता के अनुसार यदि गंगाजल (गंगा नदी) का वर्णन किया जाए तो एक ´गंगा पुराण´ की रचना हो सकती है।
  • आइने अकबरी‘ में लिखा है कि बादशाह अकबर पीने के लिए गंगाजल ही प्रयोग में लाते थे। इस जल को वह अमृत कहते थे।
  • वैज्ञानिक परीक्षणों से पता चला है कि गंगाजल से स्नान करने तथा गंगाजल को पीने से हैजा प्लेग, मलेरिया आदि रोगों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इस बात की पुष्टि के लिए एक बार डॉ. हैकिन्स, ब्रिटिश सरकार की ओर से गंगाजल से दूर होने वाले रोगों के परीक्षण के लिए आए थे।
  • डॉ. हैकिन्स ने गंगाजल के परिक्षण के लिए गंगाजल में हैजे (कालरा) के कीटाणु डाले,लेकिन हैजे के कीटाणु मात्र 6 घंटें में ही मर गए और जब उन कीटाणुओं को साधारण पानी में रखा गया तो वह जीवित होकर असंख्य हो गए। इस तरह देखा गया कि गंगाजल विभिन्न रोगों को दूर करने वाला जल है।
  • गंगा नदी को पापमोचनी और मोक्षदायिनी कहा गया है। भागीरथ के पूर्वजों को मुक्ति गंगाजल के स्पर्श से ही मिली थी। मान्यता है कि यदि मृत्यु के समय व्यक्ति के मुंह में गंगाजल डाल दिया जाए तो उसके पापकर्म नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

भगवान श्रीकृष्‍ण से जुड़े कुछ अनसुने अदभुत तथ्य!

भगवान श्रीकृष्‍ण विष्णु के 8वें अवतार माने गए हैं। उनको कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी जाना जाता है।

भगवान श्रीकृष्‍ण का सभी अवतरों में सर्वोच्च स्थान है। संपूर्ण भारत में उन्हीं के सबसे अधिक और प्रसिद्ध मंदिर है। दुनियाभर में उन पर सबसे अधिक शोध हो रहे हैं। धार्मिक जगत में केवल हिन्दू ही नहीं बल्कि, अन्य धर्मों के लोग भी उनके अवतार को पसंद करते हैं।

आज इस पोस्ट के माध्यम से हम श्री कृष्ण के बारे में कुछ ऐसे तथ्य बताने जा रहे हैं जिनके बारे में आपने शायद ही सुना होगा।

  • श्रीकृष्‍ण 14 विद्या और 16 आध्‍यात्मिक और 64 सांसारिक कलाओं में पारंगत थे इसीलिए प्रभु श्रीकृष्‍ण जग के नाथ जगन्नाथ और जग के गुरु जगदगुरु कहलाते हैं।
  • भगवान श्री कृष्ण की तलवार का नाम नंदक, गदा का नाम कौमौदकी और शंख का नाम पांचजन्य था, जो गुलाबी रंग का था।
  • बहुत कम लोग ये जानते हैं कि श्री कृष्ण ने देवकी के छह मरे हुए बच्चों को भी वापस बुलाया था। श्री कृष्ण ने देवकी-वासुदेव की मुलाकात उनके छह मृत बच्चों से करवाई थी। यह छह बच्चे हिरणकश्यप के पोते थे और एक शाप में जी रहे थे।
  • भगवान श्रीकृष्ण ने कई अभियान और युद्धों का संचालन किया था, लेकिन इनमें तीन सबसे ज्यादा भयंकर थे। पहला- महाभारत, दूसरा- जरासंध और कालयवन के विरुद्ध तीसरा- नरकासुर के विरुद्ध।
  • भगवान श्रीकृष्ण का भगवान होना ही उनकी शक्ति का स्रोत है। वे विष्णु के 10 अवतारों में से एक आठवें अवतार थे, जबकि 24 अवतारों में उनका नंबर 22वां था। उन्हें अपने अगले पिछले सभी जन्मों की याद थी। सभी अवतारों में उन्हें पूर्णावतार माना जाता है।
  • श्रीकृष्ण की 16,008 पत्नियां थी। इनमें से आठ रानियां रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा थीं। इन आठ रानियों से श्री कृष्ण के 80 बच्चे थे। सभी आठ रानियों के 10-10 पुत्र थे।
  • मान्यता है कि नरकासुर नामक असुर ने 16000 कन्याओं को विवाह करने के लिए बलपूर्वक बंदी बना कर रखा था। श्रीकृष्ण ने नरकासुर को मार कर इन कन्याओं को मुक्त किया था। समाज द्वारा स्वीकृत न किए जाने के डर से इन कन्याओं ने वापिस अपने घर न जाने का निश्चय किया और श्रीकृष्ण को ही अपना पति मान कर उनसे उन्हें अपनाने की प्रार्थना की थी। हालाँकि श्रीकृष्ण ने इसे अनैतिक मान कर उनसे क्षमापूर्वक इनकार कर दिया था। कन्याओं द्वारा प्रार्थना करने पर और उनकी सहमति पर श्रीकृष्ण ने उनसे केवल सांकेतिक विवाह किया था। हालाँकि उनसे कभी अन्य कोई संबंध नहीं रखा। 
  • भगवान श्री कृष्ण की परदादी ‘मारिषा’ व सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) ‘नाग’ जनजाति की थीं।
  • भगवान श्रीकृष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं।
  • भगवान श्रीकृष्ण ने केवल 16 वर्ष की आयु में महाबली चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया। उन्होंने मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को मात्र हथेली के प्रहार से काट दिया।
  • दुनिया में वे ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने युद्ध के मैदान में ज्ञान दिया और वह भी ऐसा ज्ञान जिस पर दुनियाभर में हजारों भाष्य लिखे गए और जो आज भी प्रासंगिक है। असल में गीता को ही एक मात्र धर्मग्रंथ माना जाता है। उनके जीवन चरित श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित है।
  • श्रीकृष्‍ण ने गीता के अलावा भी और भी कई गीताएं कहीं हैं। जैसे अनु गीता, उद्धव गीता आदि। गीता में उन्होंने धर्म, ईश्‍वर और मोक्ष का सच्चा रास्ता बताया।
  • श्री कृष्ण के साथ भले ही राधा का नाम हमेशा से जुड़ा हो लेकिन क्या आप जानते हैं कि किसी भी धर्मग्रंथ में राधा का जिक्र तक नहीं है। महाभारत या श्रीमद भगवत गीता दोनों में से किसी भी धर्मग्रंथ में उनका नाम नहीं लिया गया है। जयदेव ने पहली बार राधा का जिक्र किया था और उसके बाद से श्री कृष्ण के साथ राधा का नाम जुड़ा हुआ है।
  • जैन परंपरा के मुताबिक, भगवान श्री कॄष्ण के चचेरे भाई तीर्थंकर नेमिनाथ थे जो हिंदू परंपरा में घोर अंगिरस के नाम से प्रसिद्ध हैं.
  • उन्होंने अक्रूरजी को अपना विराट स्वरूप दिखाया, फिर उद्धव को, फिर राजा मुचुकुंद को, फिर शिशुपाल को, फिर धृतराष्ट्र की सभा में, पिर अर्जुन को 3 बार विराट स्वरूप दिखाया। कहते हैं कि उन्होंने कलियुग में माधवदास को भी अपना विराट स्वरूप दिखाया था।
  • भगवान श्रीकृष्ण की त्वचा का रंग मेघश्यामल था और उनके शरीर से एक मादक गंध निकलती थी।
  • द्रौपदी चीरहरण के समय उनकी साड़ी श्रीकृष्ण ने बढ़ा दी थी यह सबको पता है लेकिन इसके पीछे की पूरी कहानी बहुत कम लोग जानते हैं। जब श्री कृष्ण ने शिशुपाल का वध अपने सुदर्शन चक्र से किया था तब उनकी उंगली थोड़ी सी कट गई थी। उस समय द्रौपदी ने अपनी साड़ी के पल्ला फाड़कर श्री कृष्ण की उंगली पर बांध दिया था। तब श्री कृष्ण ने उनसे कहा था कि द्रौपदी मैं तुम्हारे एक-एक सूत का कर्ज उतारूंगा।

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जानिए कौन से देश में कब मनाया जाता है शिक्षक दिवस

भारत में शिक्षक दिवस 5 सितंबर को मनाया जाता है जबकि अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस का आयोजन 5 अक्टूबर को होता है।

रोचक तथ्य यह है कि शिक्षक दिवस दुनिया भर में मनाया जाता है लेकिन सबने इसके लिए एक अलग दिन निर्धारित किया है। कुछ देशों में इस दिन अवकाश रहता है तो कहीं-कहीं यह कामकाजी दिन ही रहता है।

  • भारत में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में 5 सितम्बर को Teachers Day मनाया जाता है। इस दिन देश के द्वितीय राष्ट्रपति रहे राधाकृष्णन का जन्मदिवस होता है।
  • ईरान में वहां के प्रोफेसर अयातुल्लाह मोर्तेजा मोतेहारी की हत्या के बाद उनकी याद में दो मई को Teachers Day मनाया जाता है। मोतेहारी की 2 मई, 1980 को हत्या कर दी गई थी।
  • थाइलैंड में हर साल 16 जनवरी को राष्ट्रीय Teachers Day मनाया जाता है। यहां 21 नवंबर, 1956 को एक प्रस्ताव लाकर Teachers Day को स्वीकृति दी गई थी। पहला Teachers Day 1957 में मनाया गया था। इस दिन यहां स्कूलों में अवकाश रहता है।
  • चीन में 1931 में नेशनल सेंट्रल यूनिवर्सिटी में Teachers Day की शुरूआत की गई थी। चीन सरकार ने 1932 में इसे स्वीकृति दी। बाद में 1939 में कन्फ्यूशियस के जन्मदिवस, 27 अगस्त को Teachers Day घोषित किया गया लेकिन 1951 में इस घोषणा को वापस ले लिया गया। साल 1985 में 10 सितम्बर को Teachers Day घोषित किया गया। अब चीन के ज्यादातर लोग फिर से चाहते हैं कि कन्फ्यूशियस के जन्मदिवस को ही Teachers Day हो।
  • यूनेस्को ने 5 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय Teachers Day घोषित किया था। साल 1994 से ही इसे मनाया जा रहा है। शिक्षकों के प्रति सहयोग को बढ़ावा देने और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शिक्षकों के महत्व के प्रति जागरूकता लाने के मकसद से इसकी शुरुआत की गई थी।
  • तुर्की में 24 नवंबर को Teachers Day मनाया जाता है। वहां के पहले राष्ट्रपति कमाल अतातुर्क ने यह घोषणा की थी।
  • मलेशिया में इसे 16 मई को मनाया जाता है, वहां इस खास दिन को ‘हरि गुरु’ कहते हैं।
  • अमेरिका में मई के पहले पूर्ण सप्ताह के मंगलवार को Teachers Day घोषित किया गया है और वहां सप्ताहभर इसके आयोजन होते हैं।
  • रूस में 1965 से 1994 तक अक्टूबर महीने के पहले रविवार के दिन Teachers Day मनाया जाता है । साल 1994 से विश्व Teachers Day 5 अक्टूबर को ही मनाया जाने लगा।

दुनिया के अन्य देशों में कब मनाया जाता है शिक्षक दिवस

देश का नाम                                        तारीख

बांग्लादेश                                        5 अक्टूबर

ऑस्ट्रेलिया                                       अक्टूबर के आखिरी शुक्रवार

चीन                                            10 सितम्बर

जर्मनी                                           5 अक्टूबर

ग्रीस                                            30 जनवरी

मलेशिया                                         16 मई

पाकिस्तान                                        5 अक्टूबर

श्रीलंका                                           6 अक्टूबर

यूके                                              5 अक्टूबर

ईरान                                             2 मई

इसके अलावा दुनिया के 11 देश 28 फ़रवरी को Teachers Day मनाते हैं।

 

Happy Teachers Day: 5 सितंबर को इसलिए मनाया जाता है शिक्षक दिवस

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आज देशभर में शिक्षक दिवस धूमधाम से मनाया जा रहा है। शिक्षकों को समर्पित यह दिन खासतौर पर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में मनाया जाता है। उनका जन्म 5 सितंबर साल 1888 में हुआ था।

उन्होंने अपने जीवन के 40 साल एक शिक्षक के रूप में देश को समर्पित किए थे।  डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति होने के साथ ही एक महान विद्वान, दार्शनिक और भारत-रत्न प्राप्तकर्ता थे। भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

एक बार डॉ. राधाकृष्णन के कुछ छात्रों और दोस्तों ने उनसे कहा कि वो उनके जन्मदिन को सेलिब्रेट करना चाहते हैं। इसके जवाब में डॉ. राधा कृष्णन ने कहा कि मेरा जन्मदिन अलग से मनाने की बजाए इसे टीचर्स डे के रूप में मनाया जाएगा तो मुझे गर्व महसूस होगा। इसके बाद से राधाकृष्णन का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

इस दिन हम महान शिक्षाविद् को याद करते हैं और अपने सभी शिक्षकों का सम्मानपूर्ण शुक्रिया कहते हैं जिन्होंने हमारी जिंदगी में ज्ञान के दीपक को जलाया है। राधाकृष्णन एक शिक्षक के साथ दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर भी थे।

शिक्षक दिवस आधुनिक भारत के महान शिक्षक और दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधा कृष्णन एक गरीब ब्राह्मण परिवार में 5 सितंबर को 1888 में पैदा हुए थे। वह बचपन से ही बहुत समझदार और मेहनती बच्चे थे।  जब वो कलकत्ता में एक प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाने के लिए जा रहे थे तो उनके छात्र उनका सामान और फूल लेकर उन्हें मैसूर यूनिवर्सिटी से लेकर रेलवे स्टेशन तक छोड़ने गए थे।

सभी लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। देश की सेवा के साथ भारत के शिक्षा क्षेत्र को कैसे बढ़ाया जाए इस पर सर्वपल्ली ने कार्य किया। उन्होंने अपने मूल कार्य को पहचाना तभी आज उनके जन्मदिवस पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

शिक्षक दिवस को स्कूल और कॉलेज में बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है और बच्चों को शिक्षा के जमीनी स्तर से जोड़ने की कोशिश की जाती है।

इस दिन कई शिक्षा संस्थान शिक्षकों को आराम देते हैं और उनके लिए अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षक दिवस मना कर उनके महत्व को समाज में और बढ़ाया जाता है।

एक शिक्षक ही एक बच्चे को विद्यार्थी में बदलता है और वही विद्यार्थी आगे चलकर देश का भविष्य बनता है। डॉ. राधाकृष्णन ने समाज में शिक्षकों और शिक्षा दोनों कि महत्वता को समझा है इसलिए उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में 1962 के बाद से मनाया जा रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

डॉ. राधाकृष्णन के विचारों का भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने आदर्शवाद के दर्शन की वकालत की, जिसमें शिक्षा में मूल्यों, नैतिकता और चरित्र विकास के महत्व पर जोर दिया गया।

राधाकृष्णन एक प्रतिष्ठित शिक्षक और विद्वान थे। उन्होंने एक प्रोफेसर के रूप में और बाद में आंध्र विश्वविद्यालय एवं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्य किया, जहां उन्होंने शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण सुधार किए।

डॉ. राधाकृष्णन ने पूर्वी और पश्चिमी शिक्षा को बढ़ावा दिया।

सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में कुछ रोचक तथ्य

  • जब वे भारत के राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने 10,000 रुपये के मासिक वेतन में से केवल 2500 रुपये स्वीकार किए, शेष प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में जा रहे थे।
  • राधाकृष्णन शेवनिंग स्कॉलरशिप और राधाकृष्णन मेमोरियल अवार्ड की स्थापना ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा की गई थी।
  • हेल्पेज इंडिया, वृद्धों और गरीबों के लिए एक गैर-लाभकारी संगठन, उनके द्वारा बनाया गया था।
  • राष्ट्रपति बनने से पहले, राधाकृष्णन ने 1947 से 1952 तक संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत के रूप में कार्य किया।
  • 1954 में उन्हें भारत रत्न और 1961 में जर्मन पुस्तक व्यापार शांति पुरस्कार दिया गया।
  • सर्वपल्ली राधाकृष्णन को 1954 में भारत रत्न और 1961 में जर्मन बुक ट्रेड के शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1963 में उन्हें ऑर्डर ऑफ मेरिट और 1975 में टेम्पलटन पुरस्कार दिया गया।
  • उन्हें 1931 में नाइट की उपाधि दी गई थी और 1947 में भारत की स्वतंत्रता तक उन्हें सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से जाना जाता था। देश को आजादी मिलने के बाद उनका नाम बदलकर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन कर दिया गया।
  • उन्हें 1936 में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वी धर्मों और नैतिकता के स्पैल्डिंग प्रोफेसर नियुक्त किया गया था। इसके अलावा, उन्हें ऑल सोल्स कॉलेज के फेलो के रूप में चुना गया था।

गोल्डन रिट्रीवर: बच्चों के साथ जल्दी घुल मिल जाने वाली बहुत ही प्यारी नस्ल

गोल्डन रिट्रीवर कुत्तों की सबसे पसंदीदा नस्लों में से एक है। इस नस्ल के कुत्ते बहुत सहनशील और बुद्धिमान होते हैं। गोल्डन रिट्रीवर नस्ल के कुत्ते खेलकूद में बहुत तेज़ होते हैं। गोल्डन रिट्रीवर नस्ल के कुत्ते बच्चों वाले घर में अधिक पसंद किये जाते हैं।

गोल्डन रिट्रीवर को भारत में बहुत पसंद किया जाता है, क्योंकि ये बच्चों के साथ जल्दी घुल मिल जाने और खेलने कूदने के लिए जाने जाते हैं। इनकी खास बात यह भी है कि ये कुत्ते अपने मालिकों के साथ घूमना और उनके पैरों पर सोना पसंद करते हैं।

Golden Retriever breed

गोल्डन रिट्रीवर का स्वभाव

गोल्डन रिट्रीवर एक शांत और मधुर स्वभाव वाली नस्ल है। गोल्डन रिट्रीवर को सभ्य और आज्ञाकारी बनाने के लिए इसे छोटी उम्र से ही जरूरी ट्रेनिंग देना बहुत आवश्यक होता है। इन्हें प्रशिक्षित करना बहुत आसान होता है।

गोल्डन रिट्रीवर अपने मालिक और परिवार के प्रति बहुत वफादार और समर्पित होते हैं तथा अपने मालिक की आज्ञा का पूर्ण रूप से पालन करते हैं। यह एक फैमिली डॉग ब्रीड है । इसे आप अकेले एक स्थान पर बांध कर नहीं रख सकते ऐसा करने पर यह मायूस और उदास हो जाते हैं।

शारीरिक संरचना

गोल्डन रिट्रीवर एक मध्यम आकार वाली नस्ल है। इनका सिर मध्यम आकार का होता है तथा आंखे गहरी और अंदर की ओर होती हैं । थूथन चौड़ा और मजबूत होता है। कान सिर के समांतर में सामने की ओर लटके हुए होते हैं।

गोल्डन रिट्रीवर की पूछ लंबी होती है जो घने बालों से ढकी हुई होती है। इस नस्ल के कुत्ते मुख्य रूप से गोल्डन और क्रीम कलर में ही देखने को मिलते हैं।

एक व्यस्क गोल्डन रिट्रीवर का वजन 25–35 किलोग्राम एवम हाईट 55–61 सेंटीमीटर तक हो सकती हैं। मादा आम तौर पर नर की तुलना में थोड़ी छोटी होती है।

Golden Retriever breed facts

भोजन

भोजन की मात्रा और किस्म, कुत्ते की उम्र और उसकी नस्ल पर निर्भर करती है। छोटी नस्लों को बड़ी नस्ल के मुकाबले भोजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है।

भोजन उचित मात्रा में दिया जाना चाहिए नहीं तो कुत्ते सुस्त और मोटे हो जाते हैं। संतुलित आहार जिसमें कार्बोहाइड्रेट्स, फैट, प्रोटीन, और विटामिन  शामिल हैं, पालतू जानवरों को स्वस्थ और अच्छे आकार में रखने के लिए आवश्यक होते हैं।

कुत्ते को 6 आवश्यक तत्व जैसे फैट, खनिज, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट्स, पानी और प्रोटीन की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही इन्हें सारा समय साफ पानी की आवश्यकता होती है।

पिल्ले को 29 प्रतिशत प्रोटीन और प्रौढ़ कुत्ते को आहार में 18 प्रतिशत प्रोटीन की जरूरत होती है। हम उन्हें ये सारे आवश्यक तत्व उच्च गुणवत्ता वाले सूखा भोजन देकर दे सकते हैं। इन्हें दिन में दो बार 2-3 कप उच्च गुणवत्ता वाला सूखा भोजन देना चाहिए।

कुत्ते को खाने में क्या क्या नहीं देना चाहिए यह जानने के लिए आप ये पोस्ट पढ़ सकते हैं।

पढ़ें : पैट गाइड: कुत्ते को भूल कर भी खाने को न दें ये चीज़ें, हो सकतीं है घातक

स्वास्थ्य

गोल्डन रिट्रीवर्स आम तौर पर स्वस्थ नस्ल है लेकिन बाकी अन्य नस्लों की तरह ही यह भी कुछ अनुवांशिक स्वास्थय समस्यायों से प्रभावित होते हैं जोकि इन्हें अपने पूर्वजों द्वारा विरासत (genetics) में मिली हैं। जिनमें एलर्जी, आंखों की समस्याएं और कभी-कभी चिड़चिड़ापन भी शामिल है।

इस नस्ल में असामान्य रूप से कैंसर होने का खतरा रहता है, संयुक्त राज्य अमेरिका के एक अध्ययन में लगभग 50% मृत्यु का कारण कैंसर पाया गया है, जो अध्ययन में दूसरा सबसे बड़ा कारण है।

Golden Retriever breed facts

देख रेख

  • कुत्ते को रहने के लिए हवादार, साफ और सुरक्षित वातावरण प्रदान करें। आश्रय बारिश, हवा और आंधी से सुरक्षित होना चाहिए।
  • कुत्ते के लिए 24 घंटे साफ पानी उपलब्ध होना चाहिए। पानी को साफ रखने के लिए बर्तन को आवश्यकतानुसार दिन में कम से कम दो बार या इससे अधिक बार साफ करना चाहिए।
  • सप्ताह में दो बार बालों को कंघी करें, प्रतिदिन ब्रशिंग करें। छोटे बालों वाली नस्ल के लिए सिर्फ ब्रशिंग की ही आवश्यकता होती है लेकिन लंबे बालों वाली नस्ल के लिए ब्रशिंग के बाद कंघी करना आवश्यक होता है।
  • कुत्तों को 10-15 दिनों में एक बार नहलाना चाहिए। नहलाने के लिए औषधीय शैंपू का इस्तेमाल करें।
  • स्वस्थ पिल्लों के लिए गर्भवती मादा की उचित देखभाल करना बहुत आवश्यक होता है। गर्भकाल के समय या पहले उचित अंतराल पर टीकाकरण अवश्य लगवाना चाहिए। गर्भकाल का समय लगभग 55-72 दिन का होता है। गर्भकाल के समय के दौरान अच्छा आहार, वातावरण, व्यायाम और उचित जांच आवश्यक होती है।
  • पिल्लों के जीवन के कुछ हफ्तों के लिए उनकी प्राथमिक गतिविधियों में अच्छे वातावरण, आहार और अच्छी आदतों का विकास शामिल है। कम से कम 2 महीने के नवजात पिल्ले को मां का दूध बहुत आवश्यक होता हैं और यदि मां की मृत्यु हो गई हो या किसी भी मामले में पिल्ला अपनी मां से अलग हो जाए तो शुरूआती फीड या पाउडरड दूध पिल्ले को दिया जाता है।
  • हर 6-12 महीनों के बाद कुत्ते के दांतों की जांच करवाना आवश्यकता होता है।
  • पालतू जानवरों को नियमित टीकाकरण और डीवॉर्मिंग की आवश्यकता होती है ताकि उन्हें स्वास्थ्य समस्याएं ना हों।

पढ़ें : पैट गाइड: कुत्ते की देखभाल के लिए ज़रूरी बातें और सावधानियाँ

पिल्ले का चयन करते समय सावधानियां

पिल्ले का चयन आपकी जरूरत, उद्देश्य, उसके बालों की खाल, लिंग और आकार के अनुसार किया जाना चाहिए। पिल्ला वह खरीदें जो 8-12 सप्ताह का हो।

पिल्ला खरीदते समय उसकी आंखे, मसूड़े, पूंछ और मुंह की जांच करें। आंखे साफ और गहरी होनी चाहिए, मसूड़े गुलाबी होने चाहिए और पूंछ तोड़ी हुई नहीं होनी चाहिए और दस्त के कोई संकेत नहीं होने चाहिए।

कीमत

भारत में एक गोल्डन रिट्रीवर डॉग की कीमत 15,000 रुपये से 30,000 रुपये है।

इतिहास का सबसे भीषण स्कूली आतंकी हमला जिसमें मारे गए थें सैंकड़ों बच्चे

सितंबर 2004 में रूस के बेसलान में हुए इस स्कूल बंधक कांड(Beslan school siege) में 330 लोगों की मौत हो गई थी जिनमें 156 स्कूली बच्चे शामिल थे। इसे इतिहास की सबसे घातक स्कूली गोलीबारी माना जाता है।

यह आतंकवादी हमला 1 सितंबर 2004 को शुरू हुआ और तीन दिनों तक चला। रूसी बलों द्वारा किये गए बचाव अभियान में बेसलान नरसंहार में शामिल सभी 31 चेचेन आतंकवादी शामिल मारे गए थे। यह आतंकवादी हमला रियाद-उस सालिहीन(Riyad-us SaliheenIslamic Brigade of Shaheeds)) द्वारा प्रायोजित था।

इस हमले का मकसद चेचेन्या से रूसी सेना को बाहर निकलने के लिए रूस के शीर्ष नेतृत्व को मजबूर करना था। हालाँकि ऐसा नहीं हुआ और इसमें कई बेकसूर आम नागरिक और बच्चे मारे गए।

घटनाक्रम

1 सितंबर स्थानीय स्कूली शिक्षा प्रणाली का पहला दिन होता है। यह एक उत्सव की तरह होता है जिसमें नए और पुराने छात्रों के अभिभावक स्कूल समारोह में बच्चों के साथ भाग लेते हैं। चेचेन अतिवादिओं ने जानबूझ कर इस दिन को चुना ताकि अधिक से लोगों को बंधक बना कर रूस के साथ सौदा किया जा सके।

बेसलान स्कूल में प्रभावित स्थल में विलाप करती औरत

इसी विचार को ध्यान में रखकर चेचेन आतंकियों ने 1 सितंबर को बेसलान के स्कूल में बच्चों सहित 1000 से भी ज्यादा लोगों को बंधक बना लिया। बेसलान के वन स्कूल में दो नकाबपोश महिलाएं और 30 पुरुष विस्फोटक बेल्ट पहने हुए और गोलियां चलाते हुए घुस गए। स्कूल में दाखिल होते ही आतंकियों ने वहां मौजूद गार्ड समेत दस लोगों को मार दिया, जिससे कोई उन्हें रोक न सके। आतंकियों ने बंधकों को स्कूल के स्पोर्ट्स हॉल में रखा था और बास्केबॉल कोर्ट पर विस्फोटक लगा रखे थे।

हमले की जिम्मेवारी

ऐसी रिपोर्टें थीं कि जुलाई 2004 के दौरान मरम्मत करने वालों के वेश में लोगों ने स्कूल में हथियार और विस्फोटक छुपाए थे, जिसे अधिकारियों ने बाद में नकार दिया था। हालाँकि, कई गवाहों के अनुसार उन्हें स्कूल में छिपे हथियारों को निकालने में मदद करने के लिए मजबूर किया गया था। ऐसे भी दावे थे कि स्पोर्ट्स-हॉल की छत पर एक “स्नाइपर का गोदाम” पहले से ही बनाया गया था।

बेसलान स्कूल घेराबंदी में प्रभावित एक माँ (2006)

हमलावरों ने न्यूयॉर्क टाइम्स के संवाददाता को बताया कि वे रियाद अल-सलीहिन नामक आतंकवादी संगठन से संबंधित हैं, जिसका नेतृत्व कुख्यात चेचन सरगना शमिल बसयेव करता था।

किसी भी स्कूल में सबसे क्रूर नरसंहार

बेसलान नरसंहार को अब तब का सबसे क्रूर नरसंहार माना जाता है। आतंकियों ने यहां निर्दयता की सारी हदें लांग दी थीं। आतंकियों ने सभी लोगों और बच्चों को भूखे प्यासे तीन दिन तक रखा। ऐसे में भूखे-प्यासे बच्चों को पेशाब पीने पर मजबूर होना पड़ा।

BBC द्वारा प्रकाशित हमले में हताहत बच्चों और अन्य लोगों की सूची

कौन हैं चेचेन आतंकवादी

1864 में रूस के तत्कालीन शासक ने चेचेन्या पर कब्जा कर लिया था, लेकिन चेचेन्या ने कभी अपने आपको रूस का हिस्सा नहीं माना। इसके बाद से ही रूस के सैनिकों और चेचेन आतंकियों के बीच से खूनी संघर्ष होता आ रहा है। रूस हमेशा हथियारों के दम पर चेचेन आतंकियों को रोकने की कोशिश करता रहा है।

चेचेन्या के लोग मूल रूप से उत्तरी काकेशस के निवासी हैं। वे काकेशसी भाषा बोलते हैं। ये इस्लाम धर्म के सुन्नी समुदाय के हैं। चेचेन्या का कुल क्षेत्रफल लगभग 6 हजार वर्ग किलोमीटर है और यहां की आबादी तकरीबन 12 लाख 67 हजार है।

बच्चियों से रेप की खबर, लेकिन गवाहों के अनुसार रेप नहीं हुआ

कई हिंदी वैब साइट के अनुसार आतंकियों ने 8 साल की बच्चियों का रेप किया था और ब्लीडिंग के कारण उनकी मौत हो गयी थी। लेकिन अधिकतर बंधक गवाहों के अनुसार ऐसा कुछ नहीं हुआ था। इसके विपरीत इस्लामी आतंकियों ने कुछ बच्चियों को उनके भड़काऊ वस्त्रों के लिए लताड़ लगायी और उनकों अपने अंगों को ढकने के लिए कहा।

रूस की नाकामी

इस घटना के प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार रूस ने घटना में आतंकियों से निपटने के दौरान भारी युद्ध सामग्री जैसे टैंको और रॉकेट्स का वेवजह इस्तेमाल किया था जिसकी वजह से अधिक हानि हुई। रूस की ख़ुफ़िया एजेंसी ने इस वारदात का पहले से अंदेशा जताया था लेकिन सरकार और प्रशासन इससे निपटने में नाकाम रहा।

बमों के असमय फटने, छत ढहने और जहरीली गैस की वजह से अधिक मौतें

आतंकियों ने जिम्नेजियम हाल में माइंस और बम प्लांट कर रखे थे जिनमें अकारण ( अस्पष्ट वजह से ) विस्फोट हो गया। इसमें कई बंधकों की मौत हो गयी। इसके कुछ समय के बाद जिम की छत ढह गयी दब कर बहुत सारे बंधकों और कुछ आतंकियों की मौत हो गयी।

रूसी सुरक्षाबलों ने आतंकियों से निपटने और संकट को हल करने के लिए लोगों बेहोश करने के लिए जहरीली गैस का इस्तेमाल किया जिसमें कई बच्चों की मौत हो गयी।

अन्य तथ्य

  • आतंक का यह सिलसिला करीब तीन दिनों तक चला था। रूसी सैनिक बच्चों के चलते कोई आक्रामक कार्रवाई नहीं कर पा रहे थे।
  • चेचेन आतंकियों की डिमांड थी रूसी सरकार चेचेन्या से रशियन आर्मी को हटा ले, लेकिन रूस ने इससे साफ इनकार कर दिया था।
  • रूसी सरकार ने आतंकियों के सामने न झुकते हुए कमांडो कार्रवाई का आदेश दिया था। स्कूल में आतंकियों समेत सभी लोगों के बेहोश करने के लिए जहरीली गैस का भी उपयोग किया था, लेकिन गैस की ज्यादा मात्रा से कई बच्चों की दम घुटने से मौत हो गई थी। इसके अलावा सैकड़ों बच्चे आर्मी और आतंकियों के बीच हुई मुठभेड़ में मारे गए थे। ऑपरेशन 3 सितंबर को खत्म हुआ था।
  • तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के अनुसार, “इस घटना में हुई मौतें एक बार फिर ये याद दिलाती हैं कि आतंकवादी सभ्य समाज को भयभीत करने के लिए किस हद तक जा सकते हैं”।

कब है जन्माष्टमी और क्या है इसका महत्व

कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन मनाई जाती है। इस दिन भगवान कृष्ण के बाल गोपाल स्वरूप की पूजा की जाती है।

भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में यह पर्व देशभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कृष्ण जन्मोत्सव के दिन लोग व्रत रखते हैं और रात में 12 बजे कान्हा के जन्म के बाद उनकी पूजा करके व्रत का पारण करते हैं। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल गोपाल स्वरूप की पूजा की जाती है।

ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से भगवान श्री कृष्ण सभी मुरादें शीघ्र पूर्ण कर देते हैं। वहीं महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना के साथ यह व्रत करती हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल को प्रसन्न करने के लिए कई तरह के पकवान अर्पित किए जाते हैं। उन्हें झूला झुलाया जाता है। ऐसे में चलिए जानते हैं साल 2023 में कृष्ण जन्माष्टमी कब है-

कृष्ण जन्माष्टमी 2023 कब है?

 पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 6 सितंबर 2023 को दोपहर 03 बजकर 37 मिनट से हो रही है। वहीं इस तिथि का समापन अगले दिन 7 सितंबर 2023 शाम 04 बजकर 14 मिनट पर होगा।

जन्माष्टमी का महत्व

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है और इसे हिंदुओं के प्रमुख त्यौहारों में से एक माना जाता है।

माना जाता है कि सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में आंठवा अवतार लिया था। देश के सभी राज्यों में अलग-अलग तरीके से इस त्यौहार को मनाया जाता है।

इस दिन बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी लोग अपनी श्रद्धानुसार दिनभर व्रत रखते हैं और भगवान कृष्ण की महिमा का गुणगान करते हैं। दिनभर घरों और मंदिरों में भगवान कृष्ण के भजन कीर्तन चलते हैं वहीं मंदिरों में झांकियां भी निकाली जाती हैं।

पूजन विधि

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। घर के मंदिर में साफ- सफाई करें।
  • घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
  • सभी देवी-देवताओं का जलाभिषेक करें।
  • इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप यानी लड्डू गोपाल की पूजा की जाती है।
  • लड्डू गोपाल का जलाभिषेक करें।
  • इस दिन लड्डू गोपाल को झूले में बैठाएं।
  • लड्डू गोपाल को झूला झूलाएं।
  • अपनी इच्छानुसार लड्डू गोपाल को भोग लगाएं। इस बात का ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है।
  • लड्डू गोपाल की सेवा पुत्र की तरह करें।
  • इस दिन रात्रि पूजा का महत्व होता है, क्योंकि भगवान श्री कृष्ण का जन्म रात में हुआ था।
  • लड्डू गोपाल को मिश्री, मेवा का भोग भी लगाएं। लड्डू गोपाल की आरती करें।
  • इस दिन अधिक से अधिक लड्डू गोपाल का ध्यान रखें। 

कृष्ण जन्माष्टमी पर करें बांसुरी से जुड़े ये वास्तु उपाय, आएगी जीवन में खुशहाली!

हिंदू कैलेंडर के अनुसार हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि बांसुरी भगवान कृष्ण को सबसे प्रिय है।

वास्तु शास्त्र में भी बांसुरी को बहुत शुभ माना गया है। ऐसे में बांसुरी से जुड़े कुछ उपाय करके आप अपने जीवन को खुशहाल बना सकते हैं। आइए जानते हैं क्या हैं ये उपाय…

वास्तु दोष दूर होगा

बांसुरी भगवान कृष्ण को बहुत प्रिय थी। वह हमेशा बांसुरी अपने साथ रखते थे। ऐसे में अगर आपके घर में वास्तु दोष है और इससे आप परेशान हैं तो जन्माष्टमी के दिन घर में एक बांसुरी लाकर रात्रि में कृष्ण जी की पूजा में अर्पित करें और दूसरे दिन उस बांसुरी को अपने घर में पूर्व की दीवार पर तिरछी लगा दें। वास्तु के अनुसार, ऐसा करने से आपके घर का वास्तु दोष धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा।

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व्यापार में लाभ के लिए

वास्तु शास्त्र के अनुसार जिस घर में लकड़ी की बांसुरी होती है उस घर में कान्हा की कृपा हमेशा बनी रहती है। बांसुरी को शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

ऐसे में घर के मुख्य द्वार पर बांस की सुंदर बांसुरी टांगना समृद्धि को आमंत्रित करेगा। इसके अलावा यदि आपका व्यवसाय अच्छा नहीं चल रहा है तो अपने कार्यालय या दुकान के मुख्य द्वार के ऊपर दो बांसुरी लगाएं।

चली जाएगी नकारात्मक ऊर्जा

बांसुरी बजाने पर उससे उत्पन्न ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार वातावरण में होता है। ऐसे में अगर आपको लगता है कि घर में नकारात्मक शक्तियों का वास है तो भगवान कृष्ण को चांदी की बांसुरी चढ़ाएं।

यदि आप चांदी की बांसुरी नहीं खरीद सकते हैं, तो आप बांस की बांसुरी भी खरीद सकते हैं। श्रीकृष्ण को बांसुरी अर्पित करने के बाद उस बांसुरी को अपने घर के ड्राइंग रूम में रख दें।

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दाम्पत्य जीवन में प्यार के लिए

यदि पति-पत्नी के बीच अनबन हो तो जन्माष्टमी के दिन एक बांसुरी लेकर आएं और उस बांसुरी को भगवान कृष्ण को अर्पित करने के बाद उस बांसुरी को अपने बिस्तर के पास रखें। ऐसा करने से आपका दांपत्य जीवन सुखमय रहेगा।

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जन्माष्टमी: कब और कैसे करें जन्माष्टमी व्रत

जन्माष्टमी हिन्दू धर्म में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। इस पर्व को बाल-गोपाल श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पूरी श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है।

हर साल हिन्दू कैलेंडर के भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। हिन्दू धर्म की मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म पांच हजार साल पहले भाद्रपद मास में रोहिणी नक्षत्र में अष्टमी तिथि की आधी रात को हुआ था।

जन्माष्टमीकब है जन्माष्टमी व्रत

इस साल 2023 को स्मार्त यानि गृहस्थियों के लिए जन्माष्टमी व्रत 6 सितम्बर को है l परंपरा के अनुसार अष्टमी की आधी रात के बाद ही भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद पूजा की जाती है।

इस दिन व्रतानुष्ठान अष्टमी तिथि से शुरू होती है और अगले दिन नवमी पर खत्म होती है। फिर भी कई लोग, अर्द्धरात्रि पर रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी और अष्टमी पर व्रत रखते हैं। कुछ भक्तगण उदयव्यापिनी अर्थात शुरू होती अष्टमी पर उपवास करते हैं।

शास्त्रकारों ने व्रत -पूजन, जपादि के लिए अर्द्धरात्रि अर्थात अष्टमी और नवमी के बीच की रात्रि में रहने वाली तिथि को ही मान्यता दी है।

विशेषकर स्मार्त लोग अर्द्धरात्रिव्यापिनी अष्टमी को यह व्रत करते हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, चंडीगढ़ आदि में में स्मार्त धर्मावलम्बी अर्थात गृहस्थ लोग इसी परम्परा का अनुसरण करते हुए सप्तमी युक्ता अर्द्धरात्रिकालीन वाली अष्टमी को व्रत, पूजा आदि करते आ रहे हैं जबकि मथुरा, वृंदावन सहित उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में उदयकालीन अष्टमी के दिन ही कृष्ण जन्मोत्सव मनाते आ रहे हैं।

भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा की परम्परा को आधार मानकर मनाई जाने वाली जन्माष्टमी के दिन ही केन्द्रीय सरकार अवकाश की घोषणा करती है। वैष्णव संप्रदाय के अधिकांश लोग उदयकालिक नवमी युता जन्माष्टमी व्रत के लिए ग्रहण करते हैं।

कैसे करें जन्माष्टमी व्रत

व्रत अष्टमी तिथि से शुरू होता है। इस दिन सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद घर के मंदिर को साफ सुथरा करें और जन्माष्टमी की तैयारी शुरू करें।

रोज की तरह पूजा करने के बाद बाल कृष्ण लड्डू गोपाल जी की मूर्ति मंदिर में रखें और इसे अच्छे से सजाएं। माता देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा जी का चित्र भी लगा सकते हैं।

इसके बाद, जप-ध्यान व व्रतानुष्ठान करके ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र जाप करें। पूरा दिन व्रत रखें। फलाहार कर सकते हैं। इसके साथ ही यथा संभव भगवान का भजन-कीर्तन, स्वाध्यान, पाठ व भगवान से संबन्धित प्रसंगों का अध्ययन व सेवन करें।

मन और वाणी को संयम में रखें। काम, क्रोध, लोभ, द्वेष, हिंसा, क्लेश, दुर्वचन, ठेस लगाना आदि अप्रिय कार्यों और मांस-मदिरा आदि दुर्व्यसनों से दूर रहने का अभ्यास करना ही उपवास है। इसके लिए ध्यान करें। उपवास केवल अन्न से सिद्ध नहीं होता बल्कि यह क्रिया-कलापों और आचरण से भी परिलक्षित होना अनिवार्य है।

जन्माष्टमी पर मंत्र साधना

भगवान कृष्ण की आराधना के लिए आप यह मंत्र पढ़ सकते हैं

ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्त ज्योतिशां पते!
नमस्ते रोहिणी कान्त अध्य मे प्रतिगृह्यताम्!!

संतान प्राप्ति के लिए: संतान की इच्छा रखने वाले दंपति, संतान गोपाल मंत्र का जाप पति-पत्नी दोनों मिलकर करें।

देवकीसुत गोविंद वासदेव जगत्पते!
देहिमे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:!! दूसरा मंत्र:
क्लीं ग्लौं श्यामल अंगाय नमः!!

विवाह में हो रहे विलम्ब के लिए:

ओम् क्ली कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।

इन मंत्रों की एक माला अर्थात 108 मंत्र कर सकते हैं।

जन्माष्टमी व्रत यानि व्रतराज

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूजन के साथ-साथ व्रत रखना बहुत फलदायी माना जाता है। इसे व्रत व्रतराज भी कहा जाता है। इस व्रत का विधि-विधान से पालन करने से कई गुना पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत सबसे आसान व्रत कहा जा सकता है जिसमें फलाहार, उबले आलू, साबुदाना आदि का सेवन किया जा सकता है।

रात्रि बारह बजे तक व्रत का पालन

जन्माष्टमी का व्रत रात बारह बजे तक किया जाता है। इस व्रत को करने वाले रात बारह बजे तक कृष्ण जन्म का इंतजार करते हैं। उसके पश्चात् पूजा आरती होती है और फिर प्रसाद मिलता है। प्रसाद के रूप में धनिया और माखन मिश्री दिया जाता है क्योंकि ये दोनों ही वस्तुएं श्री कृष्ण को अत्यंत प्रिय हैं। उसके पश्चात् प्रसाद ग्रहण करके व्रत पारण किया जा सकता है। हालांकि सभी के यहां परम्पराएं अलग-अलग होती हैं। कोई प्रात:काल सूर्योदय के बाद व्रत पारण करते हैं तो कोई रात में प्रसाद खाकर व्रत खोल लेते हैं। आप अपने परिवार की परम्परा के अनुसार ही व्रत पारण करें।।

दिन भर अन्न ग्रहण नहीं करें। मध्य रात्रि को एक बार फिर पूजा की तैयारी शुरू करें। रात को 12 बजे भगवान के जन्म के बाद भगवान की पूजा करें और भजन करें। गंगा जल से श्री कृष्ण को स्नान कराएं और उन्हें सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाएं। भगवान को झूला झुलाएं और फिर भजन, गीत-संगीत के बाद प्रसाद का वितरण करें।