इस साल करवा चौथ पर बन रहा बेहद शुभ योग, जाने शुभ मुहूर्त और पूजन विधि !!!

“करवा चौथ” यह व्रत सुहागन महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह व्रत पति-पत्नि के बीच आपसी प्यार और समझ को बढ़ाने वाला पर्व है। इस दिन महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले उठकर सरगी खाती हैं।

यह खाना उनकी सास बनाती हैं। इस दिन महिलाएं नए कपड़े पहन कर सजधज कर पूरे दिन भूखी-प्यासी रहती हैं। दिन में शिव, पार्वती और कार्तिक की पूजा की जाती है।

शाम को करवा देवी की पूजा होती है, जिसमें पति की लंबी उम्र की कामना की जाती है। चंद्रमा दिखने पर महिलाएं छलनी से पति और चंद्रमा की छवि देखती हैं। पति इसके बाद पत्नी को पानी पिलाकर व्रत खुलवाता है।

बन रहा है ये शुभ योग

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस वर्ष करवा चौथ के दिन अद्भुत संयोग का निर्माण भी हो रहा है, जिसमें शिवयोग और सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक सर्वार्थ सिद्धि योग में किया गया कार्य या पूजा शुभ फल प्रदान करती है। साथ ही इस दिन वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी भी मनाई जाएगी।

करवा चौथ तिथि और शुभ मुहूर्त

इस वर्ष कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 31 अक्टूबर मंगलवार को रात नौ बजकर तीस मिनट से शुरू होकर 1 नवंबर को रात नौ बजकर उन्नीस मिनट तक है।

ऐसे में उदया तिथि के अनुसार करवा चौथ्र का व्रत 1 नवंबर बुधवार को रखा जाएगा। करवा चौथ की पूजा 1 नवंबर को शाम पांच बजकर चौवालीस मिनट से सात बजकर दो मिनट तक की जा सकती है। उस दिन चंद्रोदय आठ बजकर छब्बीस मिनट पर होगा।

चांद निकलने का समय : व्रत खोलने के लिए चंद्रोदय (Chandrodaya) का समय सगभग रात 8:26 बजे है.

करवाचौथ का इतिहास

करवा चौथ की शुरुआत प्राचीन काल में सावित्री की पतिव्रता धर्म से हुई। सावित्री ने अपने पति की मृत्यु हो जाने पर भी यमराज को उन्हें अपने साथ नहीं ले जाने  दिया और अपने दृढ़ प्रतिज्ञा से पति को फिर से प्राप्त कर लिया।

दूसरी कहानी पांडवों की पत्नी द्रौपदी की है। वनवास काल में अर्जुन तपस्या करने नीलगिरि के पर्वत पर चले गए थे। द्रौपदी ने अुर्जन की जान बचाने के लिए अपने भाई भगवान कृष्ण से मदद मांगी थी।

तब उन्होंने पति की रक्षा के लिए द्रौपदी से वैसा ही उपवास रखने को कहा जैसा माता पार्वती ने भगवान शिव की रक्षा के लिए रखा था। द्रौपदी ने ऐसा ही किया और कुछ ही समय के पश्चात अर्जुन वापस सुरक्षित लौट आए।

ऐसे होती है व्रत की शुरुआत

करवा चौथ के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले जागकर सरगी खाती है, जिसमें  मिठाई, फल और मेवे होते हैं l यह सरगी उनकी सास दवारा दिया जाता है। फिर पूरा दिन महिलाएं व्रत रखती है, और रात को चाँद देखकर व्रत तोड़ती है।

व्रत की कथा

जो महिलाएं इस दिन उपवास रखती है, वो अपनी संस्कृति और परम्परा के अनुसार पूजा थाली लेकर एक घेरा बनाकर बैठ जाती हैं l उनमें से एक ज्येष्ठ (उम्र में बड़ी ) औरत करवा चौथ की कथा (गौरी, गणेश और शंकर) सुनाती हैं, और तब वे 7 बार फेरी (वृत्त में अपने थाल एक दूसरे से बदलना) लगाते हुए करवा चौथ का गीत गाती है। माना जाता है कि करवा चौथ के दिन व्रत कथा पढ़ने से पति की लम्बी उम्र की कामना की जाती है।

ऐसे मनाया जाता है त्यौहार

यह त्यौहार कार्तिक मास के शुक्‍ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। करवा का अर्थ है, मिट्टी का पात्र और चौथ का अर्थ चतुर्थी का दिन। इस महिलाएं नया करवा खरीदकर लाती हैं उसे और उसे सुंदर तरीके से सजाती हैं। करवा चौथ के दिन व्रत रखने वाली महिलाएं इन करवों को अन्य महिलाओं के साथ बदलती हैं।

करवा चौथ 2023: पूजा की थाली में है बेहद जरूरी है ये चीज़ें, तभी पूजा मानी जाती है सफल

हर साल विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं। इस साल करवा चौथ 1 नवंबर को मनाया जा रहा है। ऐसा माना जाता है कि करवा चौथ की पूजा अगर पूरी श्रद्धा से की जाए तो इसका फल जरूर मिलता है।

इस दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी खाकर दिनभर निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को चंद्रमा के दर्शन, अर्घ्य करने के साथ विधिवत पूजा करने के बाद ही व्रत खोलती है।

करवा चौथ के दिन भगवान शिव और पार्वती की पूजा की जाती है और रात को चंद्र देव के दर्शन करने के बाद व्रत खोला जाता है। इस दिन करवा चौथ की थाली का बहुत अधिक महत्व है। इसका इस्तेमाल करके ही पूजा की जाती है। जानिए करवा चौथ की थाली में कौन-कौन सी चीजें होनी चाहिए।

सुहाग का सामान

करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं न सिर्फ खुद 16 श्रृंगार करती हैं बल्कि पूजा की थाली में भी माता पार्वती को अर्पित करने के लिए श्रृंगार का सामान रखती हैं। इसके बाद यह सामान घर में किसी सुहागिन महिला को दे दिया जाता है।

सिंदूर

करवा चौथ विवाहित लोगों का दिन होता है इसलिए इस दिन पूजा की थाली में सिंदूर का विशेष महत्व होता है। करवा चौथ की पूजा के साथ-साथ इसका विशेष महत्व है। चंद्र देव की पूजा के बाद पति की पत्नी की मांग में सिंदूर भरना भी बहुत शुभ माना जाता है।

मिट्टी का करवा

मिट्टी का करवा पूजा की थाली में सबसे जरूरी और शुभ चीज होती है। इसे पूजा की थाली में शामिल करना न भूलें।

छलनी

चांद को देखने से पहले ही दोपहर की पूजा में सभी सामग्री के साथ एक छलनी को भी थाली में रख दिया जाता है। इस छलनी से पहले चाँद और फिर पति को देखते हैं।

पानी का लोटा

पानी का लोटा करवाचौथ की पूजा के लिए बहुत आवश्यक है। जब पत्नी पूजा कर लेती है तो इसी लोटे से पति उसे पानी पिलाता है। व्रत खोलने के लिए इस लोटे का इस्तेमाल होता है।

चावल

पूजा के दौरान थाली में अक्षत यानि चावल रखा जाता है। इसके बाद करवा चौथ की कथा सुनते हुए महिलाएं इसी अक्षत या चावल हाथ में लेकर बैठ जाती हैं। इसके बाद इसे करवा में डाल दिया जाता है।

मिठाई

करवा चौथ पर थाली में रखी मिठाई पति को खिलाई जाती है और पानी पीने के बाद पति वही मिठाई पत्नी को खिलाता है।

दीपक

पूजा की सामग्री में तेल का दीपक भी जलाया जाता है। जब आप अपने पति को छलनी से देखें तो इस दीपक को छलनी पर रख दें।

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जानिये क्यों और कैसे ठंडे पानी की बजाय गर्म पानी जल्दी जमता है!!

ठंडे पानी की बजाय गर्म पानी जल्दी जम जाता है। ऐसा क्यों होता है, यह सवाल सबसे पहले 1969 में तंजानिया के विद्यार्थी इरैस्टो एमपेम्बा ने किया था। लेकिन वैज्ञानिक भी काफी टाइम से इस पर अध्ययन कर रहे थे। आइए जानते है ठंडे पानी की बजाय गर्म पानी जल्दी क्यों बर्फ बनता है:-

एमपेम्बा ने खोजा कि अगर आइस्क्रीम के मिश्रण को फ्रिज में ठंडा करके रखने की बजाय सीधे ही गर्म मिश्रण को फ्रीज़र में रखा जाए तो मिश्रण ज़्यादा जल्दी जम जाता है। एमपेम्बा ने इस प्रभाव पर एक प्रोजेक्ट बनाया।

सबसे पहले, प्रोजेक्ट दर्शाता है कि पानी चाहे सीधे नल से लिया गया हो या आसुत जल हो, वह आइसक्रीम के मिश्रण जैसा ही व्यवहार करता है, इसके लिए रासायनिक संगठन इतना महत्वपूर्ण कारक नहीं है। दूसरा, यह दर्शाता है कि गर्म पानी से वाष्पीकरण के चलते पानी के आयतन में आई कमी की इस प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं है।

वैज्ञानिकों ने भी इस बात पर अपने अलग अलग अर्थ बयान किये है। जैसे कि गर्म पानी में से पानी भाप बनकर उड़ता है, जिससे गर्म पानी का आयतन कम हो जाता है और ठंडे पानी पर बर्फ की पतली कुचालक परत जम जाती है, जिसके कारण बचा हुआ पानी धीरे-धीरे ठंडा होता है।

वैज्ञानिकों ने यह बात भी कही है कि यह हमेशा नहीं होता कि ठंडे पानी की बजाय गर्म पानी जल्दी जम जाता है। कभी- कभी ठंडा पानी भी पहले जम जाता है। ऐसा भी कहना है कि ऐसा पानी में उपस्थित अशुद्धियों के कारण भी हो सकता है।

क्योंकि इस को एमपेम्बा ने खोजा था, गर्म पानी का तेजी से जमने के प्रभाव को एमपेम्बा प्रभाव कहते है। स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयार्क के रेडिएशन सेफ्टी ऑफिसर जेम्स ब्राउनरिज का कहना है, कि उन्होंने इस प्रभाव पर पिछले 10 सालों में बहुत से प्रयोग किए हैं और वह इस नतीज़े पर पहुंचे ऐसा पानी में घुली हुई अशुध्दियों के कारण ही होता है।

उनका कहना है कि पानी 10 डिग्री सेल्सियस पर कभी-कभी ही जमता है और आमतौर पर पानी शून्य से भी कम तापमान पर जमना शुरू हो जाता है। पानी में बहुत सी अशुध्दियां पाई जाती हैं, जैसे कि धूलकण, नमक और बैक्टीरिया। जिस अशुध्दि पर बर्फ के क्रिस्टल बनने का तापमान सबसे ज्यादा होगा, उसी तापमान पर पानी जमने लगेगा।

जानिये ठंडे पानी में नहाने से होने वाले यह अनोखे फायदे

सर्दियां शुरू होते ही हमारे मन में गर्म और ठंडे पानी से नहाने को लेकर दुविधा पैदा हो जाती है। सर्दीयों में ठंडे पानी से नहाना मुश्किल लगता है, इसलिए हम गर्म पानी से नहाते है, पर गर्म पानी से ज़्यादा ठंडे पानी से नहाने के फायदे होते है। रोजाना ठंडे पानी से नहाना सेहत के लिए अच्छा होता है। आइए जानते है ठंडे पानी से नहाने से क्या फायदे होते है।

आलस को करता है दूर

ठंडे पानी से नहाने से सारी सुस्ती दूर हो जाती है और हम तरो-ताजा महसूस करते हैं। ठंडा पानी जब शरीर को छूता है तो सांसे तेज़ और दिल की धड़कन थोड़ी बढ़ जाती है, जिससे शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है और हम तरो-ताजा महसूस करते हैं।

तनाव और चिंता से मुक्ति

ठंडे पानी से नहाने से तनाव, सिरदर्द और थकान से राहत मिलती है। एक स्टडी के मुताबिक कोल्ड शावर लेने से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। कोल्ड शावर लेने से शरीर के नुकसानदायक रसायन और हार्मोंन शरीर से बाहर निकल जाते है।

त्वचा होती है चमकदार

स्किन एक्सपर्ट्स कहते है कि कोल्ड शावर लेने से बाल और त्वचा चमकदार बनते हैं। मुहांसों से परेशान व्यक्ति को ठंडे पानी से नहाना चाहिए, क्योंकि इससे त्वचा रूखी और बेजान नहीं होगी।

इम्यूनिटी सिस्टम

कोल्ड शावर लेने से इम्यूनिटी सिस्टम मज़बूत होता है। अगर इम्यूनिटी सिस्टम मज़बूत होगा तो शरीर में वाइट ब्लड सेल्स बढ़ेगें। वाइट ब्लड सेल्स बहुत सी बिमारियों से लड़ने में मदद करते हैं। कोल्ड शावर लेने से प्रतिरक्षा प्रणाली और लसीका उत्तेजित होते है, जो कि संक्रमण के खिलाफ लड़ने वाली कोशिकाओं के उत्पादन को बढ़ाते है।

एनर्जी

एक शोध के मुताबिक जितना एक कप कॉफी पीने से एनर्जी मिलती है, उससे ज़्यादा सुबह कोल्ड शावर लेने से एनर्जी मिलती है। जिन लोगों पर स्टडी की गई थी, उनके अनुसार वह ठंडे पानी में कदम रखने के बाद पहले की अपेक्षा ज्यादा अलर्ट और ऊर्जा से भरपूर हो गए।

पुरुषों में प्रजनन क्षमता बढ़ाता है ठंडा पानी

वैज्ञानिक अध्ययनों के मुताबिक कोल्ड शावर लेने से पुरुषों में प्रजनन क्षमता बढ़ती है। क्योंकि गर्म पानी में नहाने से शुक्राणुओं की संख्या कम होती है, जिससे अंडकोष पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अगर आप घर में नए बच्चे को लाने की तैयारी कर रहे हैं तो ठंडे पानी से ही नहाएं।

नींद ना आने की बीमारी

अगर आपको नींद ना आने की बीमारी है तो ठंडे पानी से नहाएं। ठंडा पानी आपकी स्वसन प्रणाली को बेहतर बनाता है, जिससे सारी थकान खत्म हो जाती है और नींद ना आने की समस्या दूर हो जाती है।

अन्य फायदे

कोल्ड शावर लेने के कुछ मुख्य फायदे है, जैसे – तनाव कम होना, रक्त संचार अच्छा होना, उत्साह और जागरूकता में बढ़ोत्तरी होना, इम्यूनिटी सिस्टम बेहतर होना आदि। कोल्ड शावर लेने से आप उन परिस्थितियों से भी लड़ सकते है, जिनसे आप डरते और असहज महसूस करते हैं।

दुनिया के 10 सबसे ऊँचे पर्वत

दुनिया में बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि क्या इतने ऊँचे-ऊँचे पर्वतों पर पहुंचना संभव है। आज हम इस लेख में विश्व के सबसे ऊंचे पर्वतों के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां पर सिर्फ और सिर्फ जुनूनी लोग ही पहुंच सकते है। तो आइए जानें, दुनिया के 10 सबसे ऊँचे पर्वत:

माउंट एवरेस्ट (Mount Everest)

mount-everestमाउंट एवरेस्ट विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत माना जाता है। माउंट एवरेस्ट को पहले XV के नाम से तथा नेपाल के स्थानीय लोग इसे सागरमाथा नाम से जानते थे। सागरमाथा का अर्थ होता है “स्वर्ग का शीर्ष”।

माउंट एवरेस्ट की ऊँचाई 8,850 मीटर है। वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई हर साल 2 सेंटीमीटर बढ़ रही है। उनका यह भी मानना है कि माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई मौसम के हिसाब से कम-ज़्यादा होती रहती हैं।

माउंट एवरेस्ट का नाम 1830 से 1843 तक भारत में सर्वेयर जनरल रहे कर्नल सर जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखा गया है। एवरेस्ट पर्वत के बीच में दो-तिहाई भाग वायुमंडल के उस हिस्से में हैं, जहां ऑक्सीजन बहुत कम हैं। माउंट एवरेस्ट पर ऑक्सीजन की कमी, तेज़ हवाओं तथा अत्यधिक ठण्ड के कारण यहाँ जीवन असम्भव है।

K2 (Mount Godwin-Austen)

k2k2 विश्व का दूसरा सबसे ऊँचा पर्वत है। k2 पर्वत पीओके में कश्मीर के कराकोरम पर्वतमाला की सबसे ऊँची चोटी है। यह पर्वत चीन के तक्सकोर्गन ताजिक और गिलगित- बाल्टिस्तान की सीमाओं के बीच स्थित है।

विश्व के दूसरे सबसे ऊंचे पर्वत k2 की ऊँचाई 8,611 मीटर है। k2 को गाडविन आस्टिन पर्वत के नाम से भी जाना जाता है। गाडविन आस्टिन पर्वत को k2 का नाम 1852 में ब्रिटिश सर्वेक्षक टीजी मोंटगोमेर्य ने दिया था। k2 पर्वत काराकोरम पर्वत का हिस्सा है, इसलिए इसका k2 नाम रखा गया था।

कंचनजंघा (Kangchenjunga)

kangchenjungaविश्व की तीसरी सबसे ऊंची पर्वत चोटी का नाम कंचनजंघा है। इसकी ऊंचाई 8,586 मीटर है। यह सिक्किम के उत्तर पश्चिम भाग में नेपाल की सीमा पर स्थित है। कंचनजंघा का पहला मानचित्र 19 वीं शताब्दी में विद्वान अन्वेषणकर्ता रीनजिन नांगयाल ने तैयार किया था।

कंचनजंघा नाम की उत्पत्ति तिब्बती मूल के शब्दों से हुई है। इस शब्दों को यांग-छेन-दजो-ङ्गा लिखा जाता है। इनका अलग-अलग जगहों में अलग-अलग अर्थ निकलता है, जैसे कि सिक्किम में इसका अर्थ होता है, विशाल हिम की पांच निधियाँ तथा नेपाल में इसका अर्थ कुंभकरन लंगूर होता है।

ल्होत्से (Lhotse)

lhotseविश्व की चौथी सबसे ऊंची पर्वत चोटी का नाम ल्होत्से है। ल्होत्से पर्वत की ऊंचाई 8,516 मीटर है। जो कि माउंट एवरेस्ट पर्वत की दक्षिण घाटी से जुड़ी हुई है। ल्होत्से पर्वत के अगल-बगल में दो और पर्वत है। ल्होत्से के पूर्व में ल्होत्से मध्य है, जिसकी ऊँचाई 8,414 मीटर है और दूसरा पर्वत ल्होत्से शार है, जिसकी ऊंचाई 8,383 मीटर है।

मकालू (Makalu)

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मकालू विश्व की पांचवीं सबसे ऊंची पर्वत चोटी है। मकालू पर्वत एवरेस्ट से 11 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। मकालू पर्वत नेपाल और चीन की सीमा में बीच में स्थित है। मकालू सबसे अलग पर्वत चोटी है, जो कि एक चार मुखी पिरामिड के समान है।

चो ओयू (Cho Oyu)

cho-oyuचो ओयू पर्वत दुनिया का छठा सबसे ऊंचा पर्वत है। इसकी ऊंचाई 8,201 मीटर है। चो ओयू का तिब्बती में अर्थ होता है मरकत देवी। चो ओयू पर्वत तिब्बत और नेपाल की सीमा में स्थित हैं।

धौलागिरी (Dhaulagiri)

dhaulagiriधौलागिरी पर्वत दुनिया का सातवां सबसे ऊंची पर्वत चोटी है। इसकी ऊंचाई 8,167 मीटर है। धौलागिरी पर्वत हिमालय की चार प्रमुख पर्वतों में से एक है। धौलागिरी पर्वत नेपाल के उत्तर मध्य में स्थित है।

नेपाल में धौलागिरी का मतलब सफेद सुन्दर पहाड़ होता है। धौलागिरी पर्वत पर चढ़ाई करना सबसे खतरनाक माना जाता है और इसे पहले दुनिया की सबसे ऊँची चोटी भी कहा जाता था।

मनास्लु (Manaslu)

manasluमनास्लु विश्व का आठवीं सबसे ऊँचा पर्वत है। मनास्लु पर्वत नेपाल के पश्चिम मध्य भाग में स्थित है। मनास्लु का अर्थ होता है पर्वत की आत्मा। मनास्लु पर्वत की ऊंचाई 8,163 मीटर है।

नंगा पर्वत (Nanga Parbat)

nanga-parbatनंगा पर्वत विश्व के 10 सबसे ऊँचे पर्वतों में से है। इसकी ऊंचाई 8,126 मीटर है। नंगा पर्वत पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र गिलगित-बल्तिस्तान के क्षेत्र में आता है। नंगा पर्वत पर चढ़ते समय बहुत से लोगों की जान जा चुकी है, इसलिए इसे कातिल पहाड़ भी कहा जाता है।

अन्नपूर्णा (Annapurna)

annapurnaअन्नपूर्णा पर्वत विश्व की दसवीं सबसे ऊँची पर्वत छोटी है। इसकी ऊंचाई 8,091 मीटर हैं। अन्नपूर्णा पर्वत विश्व की सबसे खतरनाक पर्वतों में से है और यह नेपाल के उत्तर-मध्य भाग में स्थित है। माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने से पहले पर्वतारोही इस पर्वत पर अभ्यास करते है।

चींटियों के बारे में 30 रोचक तथ्य

चींटियाँ बहुत ही रोचक और अद्भुद प्राणी होती हैं। सबसे आम और आसानी से पाए जाने वाले कीड़ों में चींटियां भी शामिल हैं। ये अक्सर हमें अपने घरों में या उसके आस-पास देखने को मिल जाती हैं।

आपने चींटियों को अक्सर एक साथ एक लाइन बनाकर चलते देखा होगा वो इसलिए क्योंकि चींटियाँ बेहद सामाजिक होती हैं। चींटी अपने आप में कुदरत का बेहद खास क्रीचर है। आज हम आपको चीटियों के बारे में कुछ रोचक तथ्य बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं :

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चींटी की शारीरिक रचना

हमारे ग्रह पर प्रत्येक जीवित प्राणी के शरीर की एक अनूठी संरचना होती है जो उसे अपने पर्यावरण के अनुकूल ढालने में मदद करती है। इसी प्रकार, चींटी के शरीर को भी तीन मुख्य भागों में विभाजित किया गया है:

सिर: चींटी का सिर आमतौर पर एक बड़े आकार का होता है। इसके कान, नाक नहीं होते बल्कि इसके सिर के शीर्ष पर दो एंटीना होते हैं जो इसे छूने, महसूस करने, सूंघने में मदद करते हैं।

वक्ष: चींटी के मध्य भाग को वक्ष या मेसोसोमा के नाम से जाना जाता है। इसके सभी छह पैर इसी भाग से जुड़े हुए होते हैं। प्रत्येक पैर में दो हुक वाले पंजे होते हैं जो इसे चीजों को पकड़ने में सक्षम बनाते हैं।

डंठल: डंठल चींटी के वक्ष और पेट के बीच का भाग है। इसकी तुलना मनुष्य की कमर से की जा सकती है। इसमें एक (hinge) काज होता है, जो चींटी को अपने शरीर को मोड़ने और घुमाने की सुविधा देता है।

पेट: चींटी के पेट में उसका हृदय, पाचन तंत्र और प्रजनन अंग होते हैं। चींटियों की कुछ प्रजातियों के पेट पर डंक होते हैं जो जरूरत पड़ने पर उनके दुश्मनों पर जहर छोड़ते हैं।

चींटियाँ कैसे रहती हैं?

चींटियाँ सामूहिक रूप से बड़े समूहों में रहती हैं जिन्हें कालोनियाँ कहा जाता है। प्रत्येक कॉलोनी में एक रानी, नर चींटी और श्रमिक या सैनिक चींटियाँ होती हैं। रानी कॉलोनी की सबसे बड़ी चींटी है। वह अन्य चींटियों की माँ होती है और पूरी कॉलोनी को नियंत्रित करती है।

श्रमिक चींटियाँ वे होती हैं जो भोजन इकट्ठा करती हैं, खुदाई करती हैं और घोंसले बनाती हैं, और कॉलोनी की रक्षा करती हैं। किसी कॉलोनी में अधिकांश चींटियाँ ये सैनिक चींटियाँ ही होती हैं।

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चींटियाँ कहाँ रहती हैं?

चींटियों की कालोनियां लकड़ी में और भूमिगत दोनों में पाई जा सकती हैं। जमीन पर, वे अपनी छोटी टीले वाली चींटियों की पहाड़ियाँ बनाते हैं। अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और आइसलैंड जैसे अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों को छोड़कर चींटियां हर जगह पाई जाती है। वे हवाई और पोलिनेशिया जैसे ज्वालामुखीय क्षेत्रों से भी बचते हैं।

चींटियाँ क्या खाती हैं?

चींटियाँ सर्वाहारी होती हैं, यानी वे पौधों और जानवरों दोनों को खा सकती हैं। चींटियों की एक सेना अपने से कई गुना बड़े मरे हुए कीट को आसानी से उठाकर अपने घोंसले तक ले जा सकती है।

उन्हें शीर्ष आर्थ्रोपोड शिकारियों में भी सूचीबद्ध किया गया है, जिन्हें उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिक तंत्र में एक प्रमुख प्रजाति माना जाता है।

चीटियों के विकास के 4 चरण होते है : (1) अंडे (egg) (2) लार्वा (larva) (3) प्यूपा (pupa) (4) व्यस्क (adult)। लार्वा (larva) चरण में जो पोषण और देखभाल प्राप्त होती है, वही उसका व्यस्क रूप का निर्धारण करते है। जिन लार्वा (larva) को अच्छा पोषण मिलता है, उनमें पंखों का विकास होता है और वे रानी चींटियाँ (Queen Ants) बनती है।

रोचक तथ्य

  1. पृथ्वी पर इन जीवों की 12 हजार से अधिक प्रजातियां हैं, जो आकार और उपस्थिति में भिन्न हैं।
  2. एक बार जब एक रानी चींटी संभोग करती है, तो उसके पंख झड़ जाते है। चींटियों की कॉलोनी में काम करने वाली सभी श्रमिक चींटियाँ मादा होती है। ये सभी मादा चींटियाँ बाँझ (Sterile) होती है और प्रजनन में कोई योगदान नहीं देती।
  3. मरने के बाद चीटियों के शरीर से एक ‘Oleic Acid’ नामक केमिकल निकलता है, जिससे अन्य चींटियाँ ये जान लेती है कि वह चींटी मर चुकी है।
  4. पृथ्वी पर मनुष्य और चींटियाँ ही है, जो अपना भोजन संचय करके रखते है।
  5. आधिकारिक रूप से चींटियाँ दुनिया की सबसे स्मार्ट कीट है। इनमें 2,50,000 मस्तिष्क कोशिकाएं (brain cells) होती है।
  6. कई लोगों का मानना है कि चींटियों का खून नीले रंग का होता है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। चींटियों में खून नहीं बल्कि ‘हेमोलिम्फ‘ नामक एक तरल पदार्थ होता है जो शरीर के चारों ओर पोषक तत्वों की आवाजाही को सुविधाजनक बनाता है।
  7. दुनिया की सबसे छोटी चींटी सिर्फ 2 मिलीमीटर लंबी है।
  8. पृथ्वी पर मौजूद जीतने भी चींटियों के घोंसले है उन सभी का गंध अलग-अलग है। अलग-अलग गंध होने के कारण घोंसले के अंदर शत्रु के घुसपैठ के बारे में पता चलता है।
  9. हिम युग के दौरान पृथ्वी पर मौजूद ज़्यादातर प्राणियों का अस्तित्व ही मीट गया था। परंतु रोचक बात तो यह है कि, हिम युग के इतने प्रतिकूल वातावरण के बावजूद चींटियाँ अपने छोटे आकार के कारण बचीं रहीं और अब तक पृथ्वी में अपना अस्तित्व बचा कर रखी हुई है।
  10. 6 इंच लंबे पंखों वाली एक प्रागैतिहासिक चींटी की भी खोज की गई थी, जिसे टाइटेनोमाइरा गिगेंटम (Titanomymra Giganteum) के नाम से जाना जाता है। यह अब तक अस्तित्व में पाई गई सबसे बड़ी चींटी है30-interesting-facts-about--ants
  11. चींटियाँ अपने पैरों के माध्यम से ज़मीन से कंपन महसूस कर सकती हैं। इस तरह वे बिना कानों के “सुनते” हैं।
  12. चींटियों की कॉलोनी का आकार कुछ दर्जन चींटियों से लेकर लाखों चींटियों तक होता है।
  13. बुलेट चींटी (bullet ant) का डंक किसी भी कीटों में सबसे दर्दनाक होता है। इसके विष से भरे डंक का असर 24 घंटे तक रह सकता है। इसकी तुलना 240 वाल्ट सॉकेट में अपनी उंगली डालने से की गई है।
  14. Slave Making Ant ऐसी चींटियाँ है, जो चींटियों की अन्य कॉलोनी से अंडे चुराती है और उन अंडों से निकले बच्चों को अपना दास बना लेती है।
  15. अमेज़ॅन वर्षावन (Amazon Rainforest) में फायर चींटी (Fire Ant) अपने पैरों को एक साथ जोड़कर बेड़े जैसा आकार ले लेती है। यह उन्हें नदियों में तैरने और जंगल में यात्रा करने में सहायता करता है।
  16. फायर चींटी (Fire Ant) लगभग 9 घंटे/ प्रति दिन सोती है।
  17. लीफकटर चीटियों (Leafcutter Ants) के शरीर से एक एंटीबायोटिक स्त्रावित होता है, जो मशरूम की खेती में सहायक है।
  18. चींटियाँ अपना घोंसला धूल और रेत के कणों से बनाती हैं। घोंसलों में कई कक्ष होते हैं जिनका उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है, जैसे भोजन और अंडे का भंडारण और आराम करना।
  19. ये बात तो हम सब जानते हैं कि चींटी बहुत मेहनती होती है। एक औसत चींटी अपने शरीर का दस से 50 गुना वजन आसानी से उठा सकती है।
  20. एक आम अमेरिकी फील्ड चींटी की गर्दन का जोड़ अपने वजन से 5,000 गुना तक दबाव झेल सकता है।
  21. जब चींटियाँ भोजन की तलाश में निकलती हैं, तो वे अपने पीछे एक फेरोमोनी ट्रेल (गंध के निशान) छोड़ती हैं, जिससे अन्य चींटियाँ उनका पीछा कर सकती हैं और उसी रास्ते से अपने घोंसले में लौट सकती हैं।
  22. चींटियों की नाक या फेफड़े नहीं होते। उनके पूरे शरीर में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिन्हें स्पाइरैकल के नाम से जाना जाता है, जो उन्हें ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने में मदद करता है।
  23. चींटियाँ आम तौर पर अपनी रानी चींटी की जगह नहीं लेतीं। यदि रानी की मृत्यु हो जाती है, तो उसके बाद कुछ ही महीनों के भीतर बाकी कॉलोनी भी मर जाती है।
  24. अग्नि चींटियों की एक प्रजाति में, नर और मादा एक, नया नर और मादा जीन पूल बनाने के लिए खुद का क्लोन बना सकते हैं।
  25. इंसानों के अलावा चींटियाँ ही एकमात्र ऐसी प्राणी है, जो खेती करती हैं। वे अपने घोंसलों में एफिड्सी (aphids) पालते हैं और उन्हें सुरक्षित रखते हैं ताकि वे इन छोटे कीड़ों द्वारा स्रावित मीठा रस प्राप्त कर सकें।
  26. नर चींटियों की आवश्यकता केवल संभोग के लिए होती है। उसके बाद वे मर जाते हैं।
  27. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने ऑस्ट्रेलियाई बुलडॉग चींटी (मायरमेसिया पाइरिफोर्मिस) को दुनिया की सबसे खतरनाक चींटी का नाम दिया है। यह किसी हमले में अपने मजबूत जबड़े और डंक का एक साथ उपयोग करने के लिए जानी जाती है। 1936 से अब तक इसने कम से कम तीन लोगों की जान ले ली है।
  28. एक रानी चींटी लगभग दो से 20 साल तक जीवित रह सकती है। ऐसा माना जाता है कि लासियस नाइजर प्रजाति की एक रानी चींटी 28 साल से अधिक समय तक कैद में रही, जो किसी रानी चींटी के लिए अब तक का सबसे लंबा रिकॉर्ड है।
  29. जब लाखों चींटियाँ एक ही कॉलोनी में रहती हैं, तो इसे ‘सुपरकॉलोनी‘ के रूप में जाना जाता है। एक सुपरकॉलोनी में 300 मिलियन चींटियों का झुंड रह सकता है।
  30. आपको जानकर हैरानी होगी कि चीटियां सोती ही नहीं हैं। ये दिन भर में 250 बार झपकी लेती है और इससे ही इनका काम चल जाता। चीटियां 1 मिनट से कम समय की झपकी लेती हैं।

दशहरा 2023 : जानिए कब है दशहरा, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि!

दशहरा या विजय दशमी हिंदुओं का एक मनाया जाने वाला त्यौहार है जो लंका के राजा, दस सिर वाले राजा, रावण पर देवी सीता का अपहरण करने के बाद भगवान राम की विजय की याद दिलाता है।

यह त्यौहार हिंदू पंचांग के अनुसार अश्विन माह की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस त्यौहार का नाम संस्कृत के दो शब्दों से आया है- “दशा,” जिसका अर्थ है दस, और “हारा”, जिसका अर्थ है हार। यह एक ऐसा दिन है जो अयोध्या के राजा भगवान राम के साथ लड़ाई में रावण की हार का जश्न मनाता है।

इसके अलावा, यह दिन हिंदुओं के सबसे बड़े त्यौहार दिवाली की तैयारी की शुरुआत का प्रतीक है, जो दशहरा के 20 दिन बाद होता है।

दशहरा 2023 कब है?

इस साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि की शुरुआत 23 अक्तूबर को शाम 05 बजकर 44 मिनट से हो रही है। इसका समापन 24 अक्तूबर को दोपहर 03 बजकर 14 मिनट पर होगा। उदया तिथि 24 अक्तूबर को प्राप्त हो रही है, इसलिए दशहरा यानी विजयादशमी का पर्व 24 अक्तूबर को मनाया जाएगा।

दशहरा 2023 पर रावण दहन का मुहूर्त

दशहरा के दिन सूर्यास्त बाद प्रदोष काल में रावण के पुतले का दहन किया जाता है। इस साल रावण दहन 24 अक्तूबर को शाम 05 बजकर 43 मिनट के बाद से किया जाएगा।

दशहरा पर्व का महत्व

यह बुरे आचरण पर अच्छे आचरण की जीत की ख़ुशी में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं। सामान्यतः दशहरा एक जीत के जश्न के रूप में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं। जश्न की मान्यता सबकी अलग-अलग होती हैं। जैसे किसानों के लिए यह नयी फसलों के घर आने का जश्न हैं।

पुराने वक़्त में इस दिन औजारों एवम हथियारों की पूजा की जाती थी, क्योंकि वे इसे युद्ध में मिली जीत के जश्न के तौर पर देखते थे। लेकिन इन सबके पीछे एक ही कारण होता हैं बुराई पर अच्छाई की जीत। किसानो के लिए यह मेहनत की जीत के रूप में आई फसलो का जश्न एवम सैनिको के लिए युद्ध में दुश्मन पर जीत का जश्न हैं।

पूजन विधि

दशहरा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। फिर साफ कपड़े पहनें। गेहूं या फिर चूने से दशहरा की प्रतिमा बनाएं। फिर गाय के गोबर से नौ उपले बनाएं और उन पर जौ और दही लगाएं। फिर गोबर से ही 2 कटोरी बनाएं और इनमें से एक में सिक्‍के और दूसरी में रोली, चावल, फल, फूल, और जौ डाल दें।

इसके बाद गोबर से बनाई प्रतिमा पर केले, मूली, ग्वारफली, गुड़ और चावल चढ़ाएं। धूप-दीप जलाएं। ब्राह्मणों और निर्धनों को भोजन कराकर दान दें। रात में रावण दहन करें और बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लें।

मां दुर्गा के 32 नाम जपने से पूरे होंगे सारे कार्य, जानिए कैसे करें जाप!

नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा करने से सभी के दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-शांति की बरसात होती है। साल भर में दो बार आने वाली किसी भी नवरात्रि में दुर्गा माता, भगवती की पूजा करने से हर व्यक्ति के मन की मुराद पूरी होती है।

ऐसी मान्यता है कि नवरात्रि के दिनों में मां भगवती के 32 नामों का जाप करने से जीवन में आने वाली हर बाधा और कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। ॐ दुर्गा, दुर्गसाधिनी, दुर्गनाशिनी, दुर्गतिशमनी, दुर्गाद्विनिवारिणी समेत कुल 32 नामों का जाप करने से सभी के जीवन में उन्नति आती है।

कैसे करें दुर्गा के पावन नामों का जाप

  • किसी भी दिन या नवरात्रि में स्नानादि कार्यों से निवृत्त होने के बाद कुश या कंबल के आसन पर पूर्व या उत्तर की तरफ मुंह करके बैठें।
  • उसके बाद घी का दीपक जलाएं तथा मां दुर्गा को प्रिय उनके नामों की 5, 11 या 21 माला का जाप निरंतर नौ दिन तक करें।
  • साथ ही माता से अपनी सभी मनोकामना पूर्ण करने की याचना करें।

मां दुर्गा के 32 नाम

  1. ॐ दुर्गा,
  2. दुर्गतिशमनी,
  3. दुर्गाद्विनिवारिणी,
  4. दुर्गमच्छेदनी,
  5. दुर्गसाधिनी,
  6. दुर्गनाशिनी,
  7. दुर्गतोद्धारिणी,
  8. दुर्गनिहन्त्री
  9. दुर्गमापहा,
  10. दुर्गमज्ञानदा,
  11. दुर्गदैत्यलोकदवानला,
  12. दुर्गमा,
  13. दुर्गमालोका,
  14. दुर्गमात्मस्वरुपिणी,
  15. दुर्गमार्गप्रदा,
  16. दुर्गम विद्या,
  17. दुर्गमाश्रिता,
  18. दुर्गमज्ञान संस्थाना,
  19. दुर्गमध्यान भासिनी,
  20. दुर्गमोहा, दुर्गमगा,
  21. दुर्गमार्थस्वरुपिणी,
  22. दुर्गमासुर संहंत्रि,
  23. दुर्गमायुध धारिणी,
  24. दुर्गमांगी,
  25. दुर्गमता,
  26. दुर्गम्या,
  27. दुर्गमेश्वरी,
  28. दुर्गभीमा,
  29. दुर्गभामा,
  30. दुर्गमो,
  31. दुर्गोद्धारिणी
  32. दुर्गमापहा

लाभ

कोई भी व्यक्ति परेशानी या कठिनाई के समय में इन 32 नामों का उच्चारण करता है, तो कुछ ही समय में उसके सभी दुख दूर हो जाते है और वो आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करता है।

इस नाम स्त्रोत का प्रभाव अत्याधिक लाभदायक हैं। इस अदभुत स्त्रोत द्वारा जीवन के हर कष्ट व दुखों से हम तुरंत बहार निकल सकते हैं।

सदैव शुभ फलदायक होते हैं नवरात्र, जानें कुछ रोचक तथ्य

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में पावन पर्व शारदीय नवरात्र का आगमन होता है। इसमें मां भगवती जगतजननी आदिशक्ति मां जगदम्बा की सेवा तथा आराधना की जाती है। नवरात्र में देवी दुर्गा की कृपा सृष्टि की सभी रचनाओं पर समान रूप से बरसती है। इन नौ दिनों में भक्त मां भगवती दुर्गा जी के नौ रूपों की पूजा करते हैं।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
ससम कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना।l

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।

मां दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा पहले दिन होती है। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था।

मां दुर्गा की नवशक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रह्मचारिणी अर्थात तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है।

मां दुर्गा की तृतीय शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि विग्रह के तीसरे दिन इन का पूजन किया जाता है। मां का यह स्वरूप शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का आधा चद्र है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।

मां दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है। अपनी मंद हंसी से अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है।

मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। भगवान स्कन्द की माता होने के कारण मां के इस स्वरूप को स्कन्दमाता कहा जाता है।

chaitra navratri 2023

मां दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। विश्वप्रसिद्ध ऋषि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। माता ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलाई।

मां दुर्गा की सातवीं शक्ति ‘कालरात्रि‘ के नाम से जानी जाती है। इनके शरीर का रंग घने अंधकार की भांति काला है, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भांति चमकने वाली माला है। मां का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है परन्तु सदैव शुभ फलदायक है। अतः भक्तों को इनसे भयभीत नहीं होना चाहिए।

मां आदि शक्ति दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ गया था। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव जी ने इनको गौर वर्ण प्रदान किया। तभी से इनका नाम गौरी पड़ा।।

मां भगवती दुर्गा की नवम शक्ति का नाम ‘सिद्धि‘ है। सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली माता इन्हीं को माना गया है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां होती हैं।

देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। इन्हीं की अनुकम्पा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वह संसार में अर्द्धनारीश्वर‘ नाम से प्रसिद्ध हुए।

नवरात्र के दौरान मां भगवती को प्रसन्न करने के लिए दुर्गा सप्तशती का नियमित पाठ विधि-विधान से किया जाए तो माता बहुत प्रसन्न होती हैं।

पौराणिक कथानुसार प्राचीन काल में ‘दुर्गम’ नामक राक्षस ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न करलिया। उसने वेदों को अपने अधिकार में लेकर देवताओंको स्वर्ग से निष्कासित कर दिया जिससे पूरे संसार में वैदिक कर्म बंद हो गया।

इस कारण चारों ओर घोर अकाल पड़ जाने सेहर ओर हाहाकारमच गया। जीव-जंतु मरने लगे। सृष्टि का विनाश होने लगा। सृष्टि को बचाने के लिए देवताओं ने व्रत रखकर नौ दिन तक ‘मां जगदम्बा‘ की आराधना करके उनसे सृष्टि को बचाने की विनती की।

तब मां भगवती व असुर दुर्गम के बीच घमासान यद्ध हआ। मां भगवती ने दुर्गम का वध कर देवताओं को निर्भय कर दिया। देवताओं ने मां भगवती की प्रार्थना की:-

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य।l

देवताओं ने कहा, “हे शरणागतों के दुख दूर करने वाली देवी ! तुम प्रसन्न हो, हे सम्पूर्ण जगत की माता! तुम प्रसन्न हो। विन्ध्येश्वरी! तुम विश्व की रक्षा करो क्योंकि तुम इस चर और अचर की ईश्वरी हो।”

भगवान श्री राम जी ने भी लंका पर चढ़ाई से पूर्व मां भगवती दुर्गा की आश्विन में आने वाले शारदीय नवरात्रि में आराधना कर विजय का वर प्राप्त किया। तभी से आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम नौ दिनों में मां भगवती जगदम्बा की आराधना का यह पर्व आरम्भ हुआ। मां भगवती की कृपा पाने के लिए इस तरह आराधना करनी चाहिए :

सर्वमङ्गलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यातिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।।

हे नारायणी ! सम्पूर्ण मंगलों के मंगलरूप वाली! हे शिवे, हे सम्पूर्ण प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली ! हे शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली गौरी ! तुमको नमस्कार है, सृष्टि स्थिति तथा संहार की शक्तिभूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्व सुखमयी नारायणी तुमको नमस्कार है! हे शरण में आए हुए शरणागतों दीन-दुखियों की रक्षा में तत्पर, सम्पूर्ण पीड़ाओं को हरने वाली हे नारायणी ! तुमको नमस्कार है।

शारदीय नवरात्रि में 9 देवियों को लगाएं 9 तरह से भोग, माता रानी की बरसेगी अपार कृपा

शारदीय नवरात्रि का शुभ आरम्भ 15 अक्टूबर से होने जा रहा है। मां दुर्गा के भक्त नौ दिनों तक चलने वाले इस उत्सव को धूमधाम से मनाने के लिए तैयारी कर रहे हैं।

पूरे वर्ष में,चार नवरात्रि मनाई जाती है। आगामी नवरात्रि शारदीय होगी, जो आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक मनाई जाएगी।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, नवरात्रि के दौरान 9 दिनों तक माता रानी के अलग-अलग रूपों की विधि-विधान के साथ आराधना की जाती है। यदि आप नवरात्रि में मां दुर्गा को प्रसन्न करना चाहते हैं तो 9 दिनों में माता के 9 रूपों को अलग-अलग भोग लगा सकते हैं।

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कलश स्थापना हमेशा अभिजीत मुहूर्त और प्रतिपदा तिथि में करना ही शुभ माना गया है। इस बार 15 अक्टूबर को अभिजीत मुहूर्त प्रातः 11:38 मिनट सें शुरू हो रहा है और दोपहर 12:23 मिनट तक रहेगा।

इसके उपरांत 12:24 मिनट से वैधृति योग शुरू हो जाएगा। ऐसे में इस बार शारदीय नवरात्रि में कलश स्थापना के लिए मात्र 45 मिनट का ही शुभ मुहूर्त है।

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देवी मां को 9 दिन ये लगाएं भोग

  1. पहला दिन मां शैलपुत्री को कलाकंद का भोग लगाना चाहिए। गाय के दूध से बनी मिठाई का भोग लगाना शुभ होता है।
  2. दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाता है। इस दिन चीनी से तैयार किए गए पंचामृत का भोग लगाना चाहिए।
  3. तीसरा दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। तीसरे दिन दूध से बनी बर्फी का भोग जरूर लगाएं।
  4. चौथा दिन मां कुष्मांडा को मालपुए का भोग लगाना चाहिए। इस भोग को लगाने से देवी मां प्रसन्न होती है।
  5. पांचवें दिन मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाना चाहिए।
  6. नवरात्रि में छठवां दिन मां कात्यायनी को समर्पित होता है। इस दिन देवी मां को पान का भोग लगाना चाहिए।
  7. सातवां दिन मां काली की पूजा जाता है। इस दिन गुड़ की बनी मिठाई का भोग लगाना चाहिए।
  8. आठवां दिन मां महागौरी की पूजा आराधना की जाती है। देवी मां को नारियल से बनी मिठाई का भोग लगाना चाहिए।
  9. नवरात्रि में नौवां दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस दिन सूजी के हलवा, पुरी और काले चने का भोग लगाना चाहिए।