भारत में ही नहीं, विदेशों में भी कई लोकप्रिय शिव मंदिर हैं, हर साल लाखों लोग दर्शन के लिए आते हैं।

वैसे तो शिव की पूजा कई तरह से और कई जगहों पर की जाती है। मुख्य रूप से भारत और नेपाल में हिंदू धर्म के अनुयायी भगवान शिव को अपने सर्वश्रेष्ठ देवता के रूप में पूजते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के अलावा कुछ देश ऐसे भी हैं जहां भोलेनाथ के भक्त बड़ी संख्या में हैं। यही कारण है कि यहां पूजा करने के लिए शिव के कई लोकप्रिय मंदिर हैं।

इनमें कई ऐसे मंदिर हैं जो हजारों साल पुराने हैं और आज तक अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। आज हम इस पोस्ट में विदेशों में स्थित शिव मंदिरों के बारे में बताने जा रहें हैं, जो अपनी भव्यता और स्थापत्य शैली के कारण दुनिया में काफी लोकप्रिय हैं।

मुन्नेश्वरम मंदिर, श्रीलंका

श्रीलंका में मुन्नेश्वरम मंदिर शिव भक्तों के बीच बहुत लोकप्रिय है। आपको बता दें कि इस शिव मंदिर का निर्माण रामायण काल ​​में हुआ था और इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं।

[adinserter block=”1″]

कहा जाता है कि रावण को हराने के बाद श्री राम ने यहां बैठकर शिव की पूजा की थी। इस मंदिर में पांच मंदिर हैं, जिनमें से सबसे विशाल मंदिर भगवान शिव का है।

इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं भगवान राम ने की थी, इसलिए इसे रामलिंगम भी कहा जाता है। मंदिर का निर्माण दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली के मंदिरों की तरह किया गया है।

अरुल्मिगु श्रीराजा कलिअम्मन मंदिर, मलेशिया

[adinserter block=”1″]

मलेशिया के इस शिव मंदिर का निर्माण 1922 में हुआ था, जिसकी खूबसूरती हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है। इस भव्य मंदिर की वास्तुकला काफी आकर्षक है और यह मंदिर जोहर बारू के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है।

आपको बता दें कि कांच से बना यह पहला शिव मंदिर है। इस मंदिर की दीवार पर 3,00,000 रुद्राक्ष की मालाएं हैं, जो देखने में बेहद भव्य लगती हैं।

पशुपतिनाथ मंदिर, नेपाल

 

[adinserter block=”1″]

नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर भी बहुत प्रसिद्ध है। दुनिया भर से श्रद्धालु यहां मंदिर दर्शन के लिए आते हैं। भगवान शिव का यह अति प्राचीन मंदिर काठमांडू में स्थित है जो बागमती नदी के तट पर स्थित है।

भगवान शिव यहां के सभी शासकों के अधिष्ठाता देवता रहे हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर के दर्शन करने वाले भक्त फिर कभी पशु योनि में जन्म नहीं लेते हैं।

शिवा टैम्पल- ज़्यूरिख़, स्विट्ज़रलैंड

यह एक छोटा लेकिन सुंदर शिव मंदिर है। यहां के गर्भ गृह में शिवलिंग के पीछे भगवान शिव की नटराज स्वरूप में और देवी पार्वती की शक्ति से रूप में मूर्तियां स्थित है। इस मंदिर में भगवान शिव से जुड़े हुए सभी त्योहार बहुत ही धूम-धाम से मनाए जाते हैं।

[adinserter block=”1″]

शिवा-विष्णु मंदिर- मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया

[adinserter block=”1″]

भगवान शिव और विष्णु को समर्पित इस मंदिर का निर्माण लगभग 1987 के आस-पास किया गया था। मंदिर के उद्घाटन कांचीपुरम और श्रीलंका से दस पुजारियों ने पूजा करके किया था।

इस मंदिर की वास्तुकला हिन्दू और ऑस्ट्रेलियाई परंपराओं का अच्छा उदाहरण है। मंदिर परिसर के अंदर भगवान शिव और विष्णु के साथ-साथ अन्य हिंदू देवी-देवताओं की भी पूजा-अर्चना की जाती है।

शिवा मंदिर- ऑकलैंड, न्यूजीलैंड

न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में स्थित शिव मंदिर भी वाकई में बेहद खूबसूरत है। न्यूजीलैंड के इस मंदिर की स्थापना का मुख्य कारण लोगों के बीच हिंदू धर्म के प्रति आस्था और विश्वार बढ़ाना था।

कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी शिवेंद्र महाराज और यज्ञ बाबा के मार्गदर्शन में हिन्दू शास्त्रों के अनुसार किया गया था।

यहां भगवान शिव नवदेश्वर शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। आपको बता दें कि 2004 में पहली बार इस मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए थे।

[adinserter block=”1″]

यह भी पढ़ें :-

अजीबो गरीब परंपरा: एक ऐसा राज्य जहां बहनें भाइयों को मरने का श्राप देती हैं

आज भाई-बहन की प्यारी बॉन्डिंग का पर्व रक्षा बंधन है। यह पर्व सावन मास की पूर्णिमा के दिन पूरे देश में मनाया जाएगा। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं और उसके सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। यह पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को दर्शाता है।

वहीँ दूसरी ओर आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत के एक राज्य में बहनें अपने भाइयों को मरने का श्राप देती हैं। यह सुनकर आपको यकीन नहीं हो रहा होगा, लेकिन यह बिल्कुल सच है। हालांकि बहने इस श्राप का प्रायश्चित भी करती हैं।

आज हम इस पोस्ट में हम इसी अजीब परम्परा के बारे में बताने जा रहे है तो चलिए जानते हैं

कहां मनाई जाती है यह परंपरा

यह अजीबोगरीब परंपरा छत्तीसगढ़ में मनाई जाती है। राज्य के जशपुर जिले में एक विशेष समुदाय के लोग इसका पालन करते हैं। इस समुदाय की लड़कियां अपने भाइयों को मरने का श्राप देती हैं और ऐसा भाई दूज के दिन किया जाता है।

भाई दूज के दिन बहनें सुबह उठने के बाद भाइयों को श्राप देती हैं। इसका प्रायश्चित करने के लिए बहनें अपनी जीभ पर कांटा चुभाती हैं।

इसके बाद जशपुर जिले में विशेष समुदाय की लड़कियां भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं। सालों से इस परंपरा का पालन किया जा रहा है।

पौराणिक कहानी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार यमराज एक ऐसे व्यक्ति को मारने के लिए धरती पर आए, जिसकी बहन ने उसे कभी श्राप नहीं दिया था।

ऐसा व्यक्ति यमराज को भी मिल जाता है, लेकिन जब उसकी बहन को उसके बारे में पता चलता है तो वह उसे श्राप दे देती है  जिसकी वजह से यमराज उसके प्राण नहीं ले पाते हैं। इससे इस व्यक्ति का जीवन बच जाता है। तभी से यहाँ बहनों द्वारा अपने भाइयों को श्राप देने की परंपरा चली आ रही है।

यह भी पढ़ें :-

वायरल वीडियो: क्या आपने देखा तिरंगा झरना?

देश इस साल आजादी का 75वां साल मना रहा है और इसके लिए देशभर में तैयारियां जोरों पर हैं। इस अवसर पर भारत सरकार द्वारा ‘हर घर तिरंगा‘ अभियान भी चलाया जा रहा है। 15 अगस्त को देशभर की पुलिस भी हाई अलर्ट पर है और सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं।

आजादी के उत्सव के तहत सोशल मीडिया पर तरह-तरह के पोस्ट शेयर किए जा रहे हैं। एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है जो तिरंगे का झरना है और इसे देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है।

तिरंगा झरना

वायरल हो रहे इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि झरना पहाड़ी से हो रहा है और यह बिल्कुल तिरंगे के रंग का है। यह नजारा देखने के लिए वहां लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। इस अद्भुत नजारे को लोगों ने अपने कैमरों में कैद करना शुरू कर दिया।

वीडियो में आप आगे देखेंगे कि लोगों ने इस झरने को तिरंगे के रंग में रंग दिया है। इसके साथ ही इसे हर घर में तिरंगा अभियान से भी जोड़ा गया है। यह नजारा वाकई अद्भुत है।

तिरंगे जलप्रपात को देखने के लिए स्थानीय लोगों की पहाड़ी पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी। अब ये वीडियो कहां का है इस बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिल पाई है।

लेकिन 15 अगस्त के मौके पर ये वीडियो लोगों के दिलों को छू रहा है। वीडियो को सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर शेयर किया गया है। इसके साथ ही इस पर नेटिज़न्स भी अपने अपने रिएक्शन दे रहे हैं। @Jyoti789Singh नाम के एक ट्विटर यूजर ने इसे ट्विटर पर पोस्ट किया।

यह भी पढ़ें :-

रक्षाबंधन: 11 अगस्त को बन रहा दुर्लभ संयोग, भद्रा का असर नहीं, इस शुभ घड़ी में बांधें भाई को राखी

Raksha Bandhan 2022: रक्षाबंधन का त्योहार इस साल 11 अगस्त, दिन गुरुवार को मनाया जाएगा. धर्म शास्त्रों के मुताबिक, रक्षाबंधन का पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है और उनके मंगलमयी जीवन की कामना करती हैं। इसके बदले में भाई उन्हें रक्षा का वचन और कोई उपहार देते हैं. ज्योतिषियों का कहना है कि रक्षाबंधन पर 200 साल बाद एक बेहद दुर्लभ संयोग का निर्माण होने जा रहा है।

राखी बांधने का शुभ मुहुर्त 

इस वर्ष 11 अगस्त, गुरुवार के दिन रक्षाबंधन का शुभ मुहुर्त ज्योतिषनुसार दोपहर 12 बजकर 53 मिनट पर है. यह अभिजीत मुहूर्त है. इसके अलावा दोपहर 2 बजकर 39 मिनट से 3 बजकर 32 मिनट तक विजय मुहूर्त रहेगा. आखिरी मुहुर्त शाम 6 बजकर 55 मिनट से 8 बजकर 20 मिनट का है. इसमें अमृत काल लगेगा. इस एक घंटे 25 मिनट के मुहुर्त में भी राखी बांधी जा सकती है.

रक्षाबंधन पर कितने घंटे का शुभ मुहूर्त? (Raksha Bandhan Shubh Muhurt)

1. अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 12 बजे से 12 बजकर 53 मिनट तक
2. विजय मुहूर्त- दोपहर 02 बजकर 39 मिनट से लेकर 03 बजकर 32 मिनट तक
3. अमृत काल- शाम 06 बजकर 55 मिनट से 08 बजकर 20 मिनट तक

कुछ लोग बता रहे हैं कि 11 अगस्त को भद्रा होने पर इसे 12 अगस्त को मनाया जा सकता है लेकिन शास्त्रों के अनुसार रक्षाबंधन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है इसके बाद नहीं। चूँकि 12 अगस्त को सुबह 7 बजकर 8 मिनट पर पूर्णिमा समाप्त हो जाएगी इसलिए इस बार रक्षा बंधन को शास्त्र अनुसार केवल 11 अगस्त को ही मनाया जाएगा।

11 अगस्त को भद्रा केवल पाताल लोक में

वैसे तो 11 अगस्त को पूर्णिमा तिथि के लगने के साथ ही भद्रा शुरू हो जाएगी, लेकिन भद्रा का वास पाताल लोक में रहेगा। मुहूर्त शास्त्र चिंतामणि के अनुसार जब भद्रा का वास पृथ्वीलोक पर होता है तो इस दौरान शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जा सकते हैं, लेकिन यही भद्रा जब पाताललोक में निवास करे तो इसका असर पृथ्वी वासियों के ऊपर नहीं होता है। भद्रा जिस लोक में निवास करती हैं उसका असर उसी लोक में रहता है। ऐसे में 11 अगस्त को भद्रा का निवास पृथ्वी पर नहीं है इसलिए रक्षाबंधन 11 अगस्त को मनाया जा सकता है।

दोस्ती की वो कहानियां, जिनकी बुनियाद पर भारत फल-फूल रहा है!

दोस्ती एक खूबसूरत रिस्ता होता है और आज हम इस पोस्ट में आपको दोस्ती की उन कहानियों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी बुनियाद पर भारत फल-फूल रहा है, तो चलिए जानते हैं :-

आजाद,रुद्रनारायण दोस्त के लिए सरेंडर कर रहे थे आजाद

[adinserter block=”1″]

1 अगस्त 1925 को काकोरी ट्रेन घटना के बाद अंग्रेज हर हाल में क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को पकड़ लेना चाहते थे। सांडर्स की हत्या और असेंबली बमकांड के बाद आजाद अंग्रेजों के लिए बड़ी मुसीबत बन गए थे।

उन पर 25 हजार रु.का पुरस्कार रखा गया था। तब आजाद ने करीब साढ़े तीन साल का समय झांसी में अज्ञातवास में बिताया था। इस दौरान एक दोस्त रुद्र नारायण उनके मददगार बने थे।

रुद्र नारायण ने आजाद को अपने घर में छिपाकर रखा। वे पेशे से शिक्षक और अच्छे पेंटर भी थे और इस दौरान आजाद की वह प्रसिद्ध पेंटिंग उन्होंने ही बनाई थी, जिसमें आजाद एक हाथ में बंदूक और दूसरे से मूंछों पर ताव देते दिखाई देते हैं।

अंग्रेज, आजाद को पहचानते नहीं थे और जब उन्हें इस तस्वीर की जानकारी हुई तो वे मुंहमांगी रकम देने को तैयार हो गए थे। तब रुद्र नारायण की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।

आजाद को झांसी में अपने घर में आश्रय देने वाले रुद्रनारायण थे। तब आजाद को आश्रय देना अपनी जान को जोखिम में डालना था, पर रुद्रनारायण डरे नहीं।

ऐसे में आजाद ने रुद्रनारायण को यहां तक कहा था कि वह पलिस को मेरे बारे में सूचना दे दें, ताकि उनके सिर पर अंग्रेजों द्वारा रखा गया 25,000 रुपए का नकद इनाम उन्हें मिल जाए।

लेकिन रुद्रनारायण ने तुरंत आजाद के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। आज झांसी के उस इलाके को मास्टर रुद्रनारायण का नाम दिया गया है, जहां आजाद ने अपना लंबा समय बिताया था।

बिस्मिल, अशफाक ऐसे दोस्त जो फांसी तक साथ चले

[adinserter block=”1″]

काकोरी क्रांति मामले में चार लोगों- अशफाक उल्ला खान, राम प्रसाद विस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रौशन सिंह की पुलिस को तलाश थी।

26 सितंबर 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन अशफाक भाग निकले। अशफाक दिल्ली गए।

लेकिन एक साथी ने धोखा दे दिया और अशफाक को ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया गया। अशफाक जेल में खाली वक्त में डायरी लिखा करते थे। जेल में अपने अंतिम दिनों में विस्मिल ने अपनी आत्म-कथा लिखी और चुपके से इसे जेल के बाहर पहुंचाया।

आत्मकथा में अशफाक और अपनी दोस्ती के बारे में बहुत ही मार्मिक ढंग से लिखा है- “हिंदुओं और मुसलमानों के बीच चाहे कितने भी मुद्दे रहे, पर फिर भी तुम मेरे पास आर्य समाज के हॉस्टल में आते रहते। तुम्हारे अपने ही लोग तुम्हें काफिर कहते, पर तुम्हें सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम एकता की फिक्र थी। मैं जब हिंदी में लिखता, तो तुम कहते कि मैं उर्दू में भी लिखूं ताकि मुसलमान भाई भी मेरे विचारों को पढ़कर प्रभावित हों। तुम एक सच्चे मुसलमान और देशभक्त हो”।

जिंदगी भर दोस्ती निभाने वाले अशफाक और बिस्मिल, दोनों को अलग-अलग जगह पर फांसी दी गई। अशफाक को फैजाबाद में और विस्मिल को गोरखपुर में। पर दोनों साथ ही इस दुनिया से गए।

रामप्रसाद बिस्मिल,अशफाक उल्ला खान औरठाकुर रौशन सिंह को 19 दिसंबर 1927 को फांसी दी गई थी। यह दिन हर साल शहादत दिवस के रूप में याद किया जाता है।

लाल-बाल-पाल स्वतंत्रता आंदोलन में उग्र दौर शुरू किया

[adinserter block=”1″]

19वीं सदी के आरंभ में आजादी की लड़ाई का उग्र दौर शुरू हुआ। यह वो समय था, जब कांग्रेस दो भागों में बंट गई। गरम दल और नरम दल।

गरम दल के प्रमुख नेताओं में बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय शामिल थे। इन्हें लाल-बाल-पाल के रूप में याद किया जाता है। उनका मानना था कि शांति और विनती से अब काम नहीं चलने वाला।

इस त्रिमूर्ति ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की आलोचना की और सुधार व जागरण में जुट गए। तिलक ने लोगों को एकजुट करने के लिए महाराष्ट्र में गणेश उत्सव की शुरुआत की।

दूसरी तरफ विपिन चंद्र पाल ने सामाजिक सुधार के लिए एक विधवा से विवाह किया था जो उस समय दुर्लभ बात थी। इसके लिए उन्हें अपने परिवार से नाता तोड़ना पड़ा।

वहीं लाला लाजपत राय ने स्वामी दयानन्द सरस्वती के साथ मिलकर आर्य समाज को पंजाब में लोकप्रिय बनाया। 30 अक्टूबर 1928 को उन्होंने साइमन कमीशन के विरुद्ध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। इस दौरान हुए लाठी-चार्ज से वे घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

मौत से पहले उन्होंने कहा था, ‘मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।’ यह सही साबित हुआ। 20 वर्ष में भारत आजाद हो गया।

लाला लाजपत राय, बालगंगाधर तिलक,बिपिन चंद्रपाल को लाल बाल-पाल के नाम से जाना जाता है। इन्होंने समाज में आजादी के लिए जरूरी सामाजिक चेतना पैदा की।

यह भी पढ़ें :-

भाई को राखी बांधते समय रखें इन बातों का ध्यान !!

रक्षाबंधन का त्यौहार भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनके उज्जवल भविष्य और सलामती की कामना करती हैं तो वहीं भाई इस रक्षा सूत्र का धर्म निभाते हुए बहन की रक्षा का संकल्प लेते हैं। शास्त्रों के अनुसार भाई को राखी बांधते हुए बहनों को कुछ खास नियमों का पालन करना चाहिए। आइए जानते हैं कौन से हैं ये नियम…

रक्षाबंधन के दिन सबसे पहले स्नान करके पवित्र होना चाहिए और देवताओं को प्रणाम करना चाहिए। कुल देवी और देवताओं का आशीर्वाद जरूर लें और फिर अपना त्योहार शुरू करना चाहिए।

चांदी, पीतल या तांबे की थाली में राखी, अक्षत, रोली या सिंदूर एक छोटी कटोरी में रखें और जल या इत्र से गीला कर लें। राखी की थाल को पूजा स्थल में रखें और सबसे पहली राखी बाल गोपल या अपने ईष्ट देवता को अर्पित करें। भगवान से प्रार्थना करें। रक्षाबंधन पर बहन को राशि के अनुसार दें ये गिफ्ट, मजबूत होंगे रिश्ते

राखी बांधते समय भाई का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। इससे आपकी राखी को देवताओं का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।

राखी बंधवाते समय भाइयों को अपना सिर अच्छे से ढकना चाहिए। ऐसा करने से उनकी आयु लंबी होती है और सभी संकटों से रक्षा होती है।

बहन सबसे पहले भाई के माथे पर रोली या सिंदूर का टीका लगाएं। टीके के ऊपर अक्षत लगाएं और आशीर्वाद के रूप में भाई के ऊपर कुछ अक्षत छींटें। भाई की नज़र उतारने के लिए दीप से आरती करें और मन ही मन ईश्वर का ध्यान करें।

भाई की दायीं कलाई में राखी का पवित्र धागा, ईश्वर का स्मरण करते हुए बांधे। इससे राखी के धागों में शक्ति का संचार होता है। भाई बहन एक दूसरे को मिठाई खिलाकर मुंह मीठा कराएं और फिर भगवान के सामने सिर झुकाएं।

यह भी पढ़ें :-

बरसात के मौसम में खाने पीने का रखें खास ध्यान, जानिए कुछ जरूरी बातें

बरसात का मौसम चल रहा है। बरसात के मौसम में लोगों को खुद को स्वस्थ रखने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। लाइफस्टाइल से लेकर खान-पान तक, इसका ख्याल रखने की जरूरत है।

जानकारों के मुताबिक बरसात के मौसम में ज्यादा देर तक रखा हुआ खाना नहीं खाना चाहिए। इससे आपकी सेहत खराब हो सकती है और आप परेशानी का शिकार हो सकते हैं। आज इस पोस्ट में हम जानेंगे बरसात के मौसम में क्या खाएं और क्या न खाएं, तो चलिए जानते हैं :-

बरसात के मौसम में ज्यादा देर तक रखा हुआ खाना खाने से बचना चाहिए। कुछ ऐसी चीजें हैं, जो इस मौसम में जल्दी खराब हो जाती हैं और इन्हें खाने से पेट में संक्रमण समेत कई बीमारियां हो सकती हैं।

इस मौसम में लोगों को ताजा और घर का बना खाना ही खाना चाहिए। खाना बनाते समय साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखना चाहिए और फलों और सब्जियों को अच्छी तरह धोकर ही इस्तेमाल करना चाहिए। आप सब्जियों को गर्म पानी में नमक डालकर साफ कर सकते हैं।

ऐसे फलों का सेवन करना चाहिए

बारिश में फल खाते वक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। कोशिश करें कि कटे हुए फल न खरीदें। जिन फलों को छीलकर खाया जा सकता है, उनका सेवन करना चाहिए।

इसके अलावा पैकेट्स जूस की जगह ताजा जूस पीना सेहत के लिए फायदेमंद होता है। स्ट्रीट फूड से भी दूरी बना लेनी चाहिए, क्योंकि यह हाइजीन की दृष्टि से बहुत अच्छा नहीं माना जाता है।

इम्युनिटी कैसे मजबूत करें

इस मौसम में लोगों का इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है और अगर हम इसे मजबूत करें तो बीमारियों का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।

इम्युनिटी को मजबूत करने के लिए आपको अपनी डाइट में अदरक, लहसुन और नींबू को शामिल करना होगा। इसके साथ ही हेल्दी डाइट लेनी होती है।

साफ-सफाई का ध्यान रखना होगा और बाहर के खाने से परहेज करना होगा। अगर इन सभी बातों का ध्यान रखा जाए तो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाया जा सकता है।

यह भी पढ़ें :-

एकाग्रता और कौशल का बेहतरीन उदाहरण है यह वीडियो

ऐसा कहा जाता है कि कोई भी व्यक्ति जीवन में एकाग्रता से सब कुछ हासिल कर सकता है। कड़ी मेहनत और प्रशिक्षण के कारण लोग हर मंजिल को हासिल कर सकते हैं।

लेकिन यह बात तो सभी जानते हैं कि एकाग्रता हासिल करना इतना आसान नहीं है। एक शांत और एकाग्र चित्त पाना कठिन है। इन दिनों एक वीडियो चर्चा में है जिसमें व्यक्ति की कुशलता, मेहनत और एकाग्रता दिखाई दे रही है।

हाल ही में IPS ऑफिसर दीपांशु काबरा ने ट्विटर पर एक वीडियो अपलोड किया है। इस वीडियो की खास बात यह है कि इसमें एक शख्स जिस तरह से अपने शरीर पर तलवार के बैलेंस के साथ स्टंट कर रहा है और उससे तरह-तरह के करतब करता दिख रहा है, वह काबिले-ए-तारीफ है।

इसमें एक शख्स हाथों में बड़ी तलवार लिए नजर आ रहा है। वह इसे घुमाते हुए अपने कंधे पर नाचने लगते हैं, कभी अपने हाथों पर और फिर इसे अपने पैरों से संतुलित करने लगते हैं। वह तलवार को शरीर पर इस तरह से संतुलित करता है कि देखने वाले दंग रह जाते हैं।

इस वीडियो के कैप्शन में लिखा है- ”एकाग्रता, कौशल और वर्षों के अभ्यास का उदाहरण। मानो तलवार भी उन्हीं के शरीर का अंग हो…”

यह भी पढ़ें :-

जानिए पुत्रदा एकादशी की कथा और पूजा विधि के बारे में

हिंदू कैलेंडर में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के दौरान पड़ने वाली एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी के रूप में मनाया जाता है। पुत्रदा एकादशी, जिसे पवित्रा एकादशी और पवित्रोपन एकादशी के रूप में भी जाना जाता है, अंग्रेजी कैलेंडर पर जुलाई से अगस्त के बीच में आती है।

हमारी पिछली पोस्ट में हमने आपको पुत्रदा एकादशी के शुभ महूर्त और महत्व के बारे में बताया था और इस पोस्ट में हम जानेगें पुत्रदा एकादशी की कथा और पूजा विधि के बारे में तो चलिए जानते हैं।

शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर मनाया जाने वाला यह व्रत दशमी तिथि से शुरू हो जाता है। प्रत्येक एकादशी व्रत की एक विशिष्ट कथा होती है जोकि एक पौराणिक कथा भी जुड़ी होती है।

व्रत कथा

किंवदंती द्वापर युग की है महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था। वह उन सबसे अच्छे शासकों में से एक थे जिन्हें लोगों ने कभी देखा था। वह एक परोपकारी, दयालु, जिम्मेदार और उदार शासक था। उनके नेतृत्व में, उनकी प्रजा सुरक्षित महसूस करती थी।

लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। उसका मानना था कि जिसके संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई।

वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा- हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है। न मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन छीना है।

किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने नहीं ‍ली, प्रजा को पुत्र के समान पालता रहा। मैं अपराधियों को पुत्र तथा बाँधवों की तरह दंड देता रहा। कभी किसी से घृणा नहीं की। सबको समान माना है। सज्जनों की सदा पूजा करता हूँ। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मेरे पु‍त्र नहीं है। सो मैं अत्यंत दु:ख पा रहा हूँ, इसका क्या कारण है?

राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मं‍त्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए। राजा की उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि को देखते-फिरते रहे।

एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार, जितेंद्रीय, जितात्मा, जितक्रोध, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था।

सबने जाकर ऋषि को प्रणाम किया। उन लोगों को देखकर मुनि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूँगा। मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह मत करो।

लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले- हे महर्षे! आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं। अत: आप हमारे इस संदेह को दूर कीजिए। महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है। फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी है।

उन लोगों ने आगे कहा कि हम लोग उसकी प्रजा हैं। अत: उसके दु:ख से हम भी दु:खी हैं। आपके दर्शन से हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं। अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बतलाएँ।

यह वार्ता सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था।

निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म किए। यह एक गाँव से दूसरे गाँव व्यापार करने जाया करता था। एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्याह्न के समय वह जबकि वह दो दिन से भूखा-प्यासा था, एक जलाशय पर जल पीने गया। उसी स्थान पर एक तत्काल की ब्याही हुई प्यासी गौ जल पी रही थी।

राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसीलिए राजा को यह दु:ख सहना पड़ा। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है।

ऐसा सुनकर सब लोग कहने लगे कि हे ऋषि! शास्त्रों में पापों का प्रायश्चित भी लिखा है। अत: जिस प्रकार राजा का यह पाप नष्ट हो जाए, आप ऐसा उपाय बताइए।

इस पर लोमश ऋषि ने मंत्रियों से कहा कि अगर आप लोग चाहते हैं कि राजा को पुत्र की प्राप्ति हो तो श्रावण शुक्ल एकादशी का व्रत रखें और द्वादशी के दिन अपना व्रत राजा को दान कर दें।

मंत्रियों ने ऋषि के बताए विधि के अनुसार व्रत किया और व्रत का दान कर दिया। इससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई। इस कारण पवित्रा एकादशी को पुत्रदा एकादशी भी कहा जाता है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी विष्णु पूजा विधि

  • एकादशी तिथि पर, नहाने के पानी में कुछ बूंदें गंगा जल की अवश्य मिला लें।
  • स्नान करने के पश्चात साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु का ध्यान करें और श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत करने का संकल्प लें ।
  • अपने घर के पूजा कक्ष में पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं और सामने एक लकड़ी की चौकी रखें। अब इस चौकी पर थोड़ा सा गंगाजल छिड़क कर इसे शुद्ध करें। अब चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर की स्थापना करें।
  • भगवान गणेश की पूजा करें और उनका आशीर्वाद लें। फिर, भगवान विष्णु का आह्वान करें।
  • भगवान विष्णु के समक्ष घी का दीपक जलाएं। भगवान विष्णु को जल, पुष्पम, गंधम, दीप, धूप और नैवेद्य चढ़ाते समय ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय‘ का जाप करें।
  • फिर, पान, सुपारी, दो टुकड़ों में टूटा हुआ एक भूरा नारियल, केले या अन्य फल, चंदन, कुमकुम, हल्दी, अक्षत और दक्षिणा अर्पित करें। इस वस्तु के संग्रह को तंबूलम के नाम से भी जाना जाता है।
  • संध्याकाल में श्रावण पुत्रदा एकादशी की व्रत की कथा सुने और फलाहार करें। यदि आप पूरा दिन व्रत करने में सक्षम नहीं है तो आप दिन में भी फलहार कर सकते हैं।
  • अगले दिन सुबह स्नान करने के पश्चात ब्राह्मणों को भोजन करवाने के बाद उन्हें दान दक्षिणा दें और व्रत का पारण करें।
    श्रावण पुत्रदा एकादशी के दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

यह भी पढ़ें :-

पुत्रदा एकादशी 2022:- सावन के महीने में इस दिन करें यह व्रत शिव एवं विष्णु दोनों की होगी कृपा,जानिए शुभ मुहूर्त व महत्व

पुत्रदा एकादशी 2022: सावन का महीना भक्ति और आराधना का महीना होता है। लोग इस पूरे महीने में भगवान शिव की पूजा और आराधना करते हैं। लेकिन भगवान विष्णु की आराधना के लिए भी सावन के महीने में एक खास दिन आता है जिसे पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है।

हर महीने एकादशी दो बार आती है, और प्रत्येक एकादशी का अपना विशेष महत्व होता है। लेकिन इनमें से कुछ को बेहद शुभ और फलदायी माना जाता है। इन्हीं में से एक है पुत्रदा एकादशी।

हिंदू कैलेंडर में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के दौरान पड़ने वाली एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी के रूप में मनाया जाता है। पुत्रदा एकादशी, जिसे पवित्रा एकादशी और पवित्रोपन एकादशी के रूप में भी जाना जाता है, अंग्रेजी कैलेंडर पर जुलाई से अगस्त के बीच में आती है।

सभी एकादशी की तरह, यह एकादशी भी भगवान विष्णु को समर्पित है और यह एकादशी व्रत पति-पत्नी द्वारा एक साथ किया जाता है, ताकि पुत्र की प्राप्ति हो सके। यह दिन वैष्णवों के लिए विशेष रूप से अनुकूल है, जो विष्णु के अनुयायी हैं।

‘पुत्रदा‘ शब्द का अर्थ है ‘पुत्रों का दाता’ और इसलिए यह माना जाता है कि श्रावण के महीने में इस एकादशी का व्रत करने से पुत्र की इच्छा पूरी हो सकती है।

[adinserter block=”1″]

पुत्रदा एकादशी 2022: तिथि व शुभ मुहूर्त

श्रावण पुत्रदा एकादशी 08 अगस्त 2022 सोमवार को है। पुत्रदा एकादशी कामिका एकादशी के बाद और अजा एकादशी (भद्र कृष्ण पक्ष) से ​​पहले आती है। इसकी शुरुआत – 7 अगस्त, रविवार रात 11 बजकर 50 मिनट पर होगी और 8 अगस्त, सोमवार को रात 9 बजे तक रहेगी।

महत्व

हमारे हिंदू समाज में बेटे का होना महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि वह बुढ़ापे में अपने पिता और मां की देखभाल करता है। यहां तक ​​​​कि पूर्वज संस्कार केवल पुरुष बच्चे द्वारा ही किया जाता है।

हिंदू धर्म में मनाई जाने वाली 26 एकादशियों में से प्रत्येक का अपना विशिष्ट महत्व होता है। श्रावण शुक्ल पक्ष के दौरान पड़ने वाली एकादशी में निःसंतान दंपति को पुरुष संतान देने की शक्ति होती है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी के महत्व का उल्लेख ‘भविष्य पुराण‘ में राजा युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण के बीच चर्चा के रूप में किया गया है। यहां भगवान कृष्ण ने स्वयं इस पवित्र व्रत को करने के अनुष्ठानों और लाभों के बारे में बताया।

[adinserter block=”1″]

मंत्र:-

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः

यह भी पढ़ें :-