चींटियों के बारे में 30 रोचक तथ्य

चींटियाँ बहुत ही रोचक और अद्भुद प्राणी होती हैं। सबसे आम और आसानी से पाए जाने वाले कीड़ों में चींटियां भी शामिल हैं। ये अक्सर हमें अपने घरों में या उसके आस-पास देखने को मिल जाती हैं।

आपने चींटियों को अक्सर एक साथ एक लाइन बनाकर चलते देखा होगा वो इसलिए क्योंकि चींटियाँ बेहद सामाजिक होती हैं। चींटी अपने आप में कुदरत का बेहद खास क्रीचर है। आज हम आपको चीटियों के बारे में कुछ रोचक तथ्य बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं :

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चींटी की शारीरिक रचना

हमारे ग्रह पर प्रत्येक जीवित प्राणी के शरीर की एक अनूठी संरचना होती है जो उसे अपने पर्यावरण के अनुकूल ढालने में मदद करती है। इसी प्रकार, चींटी के शरीर को भी तीन मुख्य भागों में विभाजित किया गया है:

सिर: चींटी का सिर आमतौर पर एक बड़े आकार का होता है। इसके कान, नाक नहीं होते बल्कि इसके सिर के शीर्ष पर दो एंटीना होते हैं जो इसे छूने, महसूस करने, सूंघने में मदद करते हैं।

वक्ष: चींटी के मध्य भाग को वक्ष या मेसोसोमा के नाम से जाना जाता है। इसके सभी छह पैर इसी भाग से जुड़े हुए होते हैं। प्रत्येक पैर में दो हुक वाले पंजे होते हैं जो इसे चीजों को पकड़ने में सक्षम बनाते हैं।

डंठल: डंठल चींटी के वक्ष और पेट के बीच का भाग है। इसकी तुलना मनुष्य की कमर से की जा सकती है। इसमें एक (hinge) काज होता है, जो चींटी को अपने शरीर को मोड़ने और घुमाने की सुविधा देता है।

पेट: चींटी के पेट में उसका हृदय, पाचन तंत्र और प्रजनन अंग होते हैं। चींटियों की कुछ प्रजातियों के पेट पर डंक होते हैं जो जरूरत पड़ने पर उनके दुश्मनों पर जहर छोड़ते हैं।

चींटियाँ कैसे रहती हैं?

चींटियाँ सामूहिक रूप से बड़े समूहों में रहती हैं जिन्हें कालोनियाँ कहा जाता है। प्रत्येक कॉलोनी में एक रानी, नर चींटी और श्रमिक या सैनिक चींटियाँ होती हैं। रानी कॉलोनी की सबसे बड़ी चींटी है। वह अन्य चींटियों की माँ होती है और पूरी कॉलोनी को नियंत्रित करती है।

श्रमिक चींटियाँ वे होती हैं जो भोजन इकट्ठा करती हैं, खुदाई करती हैं और घोंसले बनाती हैं, और कॉलोनी की रक्षा करती हैं। किसी कॉलोनी में अधिकांश चींटियाँ ये सैनिक चींटियाँ ही होती हैं।

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चींटियाँ कहाँ रहती हैं?

चींटियों की कालोनियां लकड़ी में और भूमिगत दोनों में पाई जा सकती हैं। जमीन पर, वे अपनी छोटी टीले वाली चींटियों की पहाड़ियाँ बनाते हैं। अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और आइसलैंड जैसे अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों को छोड़कर चींटियां हर जगह पाई जाती है। वे हवाई और पोलिनेशिया जैसे ज्वालामुखीय क्षेत्रों से भी बचते हैं।

चींटियाँ क्या खाती हैं?

चींटियाँ सर्वाहारी होती हैं, यानी वे पौधों और जानवरों दोनों को खा सकती हैं। चींटियों की एक सेना अपने से कई गुना बड़े मरे हुए कीट को आसानी से उठाकर अपने घोंसले तक ले जा सकती है।

उन्हें शीर्ष आर्थ्रोपोड शिकारियों में भी सूचीबद्ध किया गया है, जिन्हें उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिक तंत्र में एक प्रमुख प्रजाति माना जाता है।

चीटियों के विकास के 4 चरण होते है : (1) अंडे (egg) (2) लार्वा (larva) (3) प्यूपा (pupa) (4) व्यस्क (adult)। लार्वा (larva) चरण में जो पोषण और देखभाल प्राप्त होती है, वही उसका व्यस्क रूप का निर्धारण करते है। जिन लार्वा (larva) को अच्छा पोषण मिलता है, उनमें पंखों का विकास होता है और वे रानी चींटियाँ (Queen Ants) बनती है।

रोचक तथ्य

  1. पृथ्वी पर इन जीवों की 12 हजार से अधिक प्रजातियां हैं, जो आकार और उपस्थिति में भिन्न हैं।
  2. एक बार जब एक रानी चींटी संभोग करती है, तो उसके पंख झड़ जाते है। चींटियों की कॉलोनी में काम करने वाली सभी श्रमिक चींटियाँ मादा होती है। ये सभी मादा चींटियाँ बाँझ (Sterile) होती है और प्रजनन में कोई योगदान नहीं देती।
  3. मरने के बाद चीटियों के शरीर से एक ‘Oleic Acid’ नामक केमिकल निकलता है, जिससे अन्य चींटियाँ ये जान लेती है कि वह चींटी मर चुकी है।
  4. पृथ्वी पर मनुष्य और चींटियाँ ही है, जो अपना भोजन संचय करके रखते है।
  5. आधिकारिक रूप से चींटियाँ दुनिया की सबसे स्मार्ट कीट है। इनमें 2,50,000 मस्तिष्क कोशिकाएं (brain cells) होती है।
  6. कई लोगों का मानना है कि चींटियों का खून नीले रंग का होता है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। चींटियों में खून नहीं बल्कि ‘हेमोलिम्फ‘ नामक एक तरल पदार्थ होता है जो शरीर के चारों ओर पोषक तत्वों की आवाजाही को सुविधाजनक बनाता है।
  7. दुनिया की सबसे छोटी चींटी सिर्फ 2 मिलीमीटर लंबी है।
  8. पृथ्वी पर मौजूद जीतने भी चींटियों के घोंसले है उन सभी का गंध अलग-अलग है। अलग-अलग गंध होने के कारण घोंसले के अंदर शत्रु के घुसपैठ के बारे में पता चलता है।
  9. हिम युग के दौरान पृथ्वी पर मौजूद ज़्यादातर प्राणियों का अस्तित्व ही मीट गया था। परंतु रोचक बात तो यह है कि, हिम युग के इतने प्रतिकूल वातावरण के बावजूद चींटियाँ अपने छोटे आकार के कारण बचीं रहीं और अब तक पृथ्वी में अपना अस्तित्व बचा कर रखी हुई है।
  10. 6 इंच लंबे पंखों वाली एक प्रागैतिहासिक चींटी की भी खोज की गई थी, जिसे टाइटेनोमाइरा गिगेंटम (Titanomymra Giganteum) के नाम से जाना जाता है। यह अब तक अस्तित्व में पाई गई सबसे बड़ी चींटी है30-interesting-facts-about--ants
  11. चींटियाँ अपने पैरों के माध्यम से ज़मीन से कंपन महसूस कर सकती हैं। इस तरह वे बिना कानों के “सुनते” हैं।
  12. चींटियों की कॉलोनी का आकार कुछ दर्जन चींटियों से लेकर लाखों चींटियों तक होता है।
  13. बुलेट चींटी (bullet ant) का डंक किसी भी कीटों में सबसे दर्दनाक होता है। इसके विष से भरे डंक का असर 24 घंटे तक रह सकता है। इसकी तुलना 240 वाल्ट सॉकेट में अपनी उंगली डालने से की गई है।
  14. Slave Making Ant ऐसी चींटियाँ है, जो चींटियों की अन्य कॉलोनी से अंडे चुराती है और उन अंडों से निकले बच्चों को अपना दास बना लेती है।
  15. अमेज़ॅन वर्षावन (Amazon Rainforest) में फायर चींटी (Fire Ant) अपने पैरों को एक साथ जोड़कर बेड़े जैसा आकार ले लेती है। यह उन्हें नदियों में तैरने और जंगल में यात्रा करने में सहायता करता है।
  16. फायर चींटी (Fire Ant) लगभग 9 घंटे/ प्रति दिन सोती है।
  17. लीफकटर चीटियों (Leafcutter Ants) के शरीर से एक एंटीबायोटिक स्त्रावित होता है, जो मशरूम की खेती में सहायक है।
  18. चींटियाँ अपना घोंसला धूल और रेत के कणों से बनाती हैं। घोंसलों में कई कक्ष होते हैं जिनका उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है, जैसे भोजन और अंडे का भंडारण और आराम करना।
  19. ये बात तो हम सब जानते हैं कि चींटी बहुत मेहनती होती है। एक औसत चींटी अपने शरीर का दस से 50 गुना वजन आसानी से उठा सकती है।
  20. एक आम अमेरिकी फील्ड चींटी की गर्दन का जोड़ अपने वजन से 5,000 गुना तक दबाव झेल सकता है।
  21. जब चींटियाँ भोजन की तलाश में निकलती हैं, तो वे अपने पीछे एक फेरोमोनी ट्रेल (गंध के निशान) छोड़ती हैं, जिससे अन्य चींटियाँ उनका पीछा कर सकती हैं और उसी रास्ते से अपने घोंसले में लौट सकती हैं।
  22. चींटियों की नाक या फेफड़े नहीं होते। उनके पूरे शरीर में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिन्हें स्पाइरैकल के नाम से जाना जाता है, जो उन्हें ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने में मदद करता है।
  23. चींटियाँ आम तौर पर अपनी रानी चींटी की जगह नहीं लेतीं। यदि रानी की मृत्यु हो जाती है, तो उसके बाद कुछ ही महीनों के भीतर बाकी कॉलोनी भी मर जाती है।
  24. अग्नि चींटियों की एक प्रजाति में, नर और मादा एक, नया नर और मादा जीन पूल बनाने के लिए खुद का क्लोन बना सकते हैं।
  25. इंसानों के अलावा चींटियाँ ही एकमात्र ऐसी प्राणी है, जो खेती करती हैं। वे अपने घोंसलों में एफिड्सी (aphids) पालते हैं और उन्हें सुरक्षित रखते हैं ताकि वे इन छोटे कीड़ों द्वारा स्रावित मीठा रस प्राप्त कर सकें।
  26. नर चींटियों की आवश्यकता केवल संभोग के लिए होती है। उसके बाद वे मर जाते हैं।
  27. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने ऑस्ट्रेलियाई बुलडॉग चींटी (मायरमेसिया पाइरिफोर्मिस) को दुनिया की सबसे खतरनाक चींटी का नाम दिया है। यह किसी हमले में अपने मजबूत जबड़े और डंक का एक साथ उपयोग करने के लिए जानी जाती है। 1936 से अब तक इसने कम से कम तीन लोगों की जान ले ली है।
  28. एक रानी चींटी लगभग दो से 20 साल तक जीवित रह सकती है। ऐसा माना जाता है कि लासियस नाइजर प्रजाति की एक रानी चींटी 28 साल से अधिक समय तक कैद में रही, जो किसी रानी चींटी के लिए अब तक का सबसे लंबा रिकॉर्ड है।
  29. जब लाखों चींटियाँ एक ही कॉलोनी में रहती हैं, तो इसे ‘सुपरकॉलोनी‘ के रूप में जाना जाता है। एक सुपरकॉलोनी में 300 मिलियन चींटियों का झुंड रह सकता है।
  30. आपको जानकर हैरानी होगी कि चीटियां सोती ही नहीं हैं। ये दिन भर में 250 बार झपकी लेती है और इससे ही इनका काम चल जाता। चीटियां 1 मिनट से कम समय की झपकी लेती हैं।

दशहरा 2023 : जानिए कब है दशहरा, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि!

दशहरा या विजय दशमी हिंदुओं का एक मनाया जाने वाला त्यौहार है जो लंका के राजा, दस सिर वाले राजा, रावण पर देवी सीता का अपहरण करने के बाद भगवान राम की विजय की याद दिलाता है।

यह त्यौहार हिंदू पंचांग के अनुसार अश्विन माह की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस त्यौहार का नाम संस्कृत के दो शब्दों से आया है- “दशा,” जिसका अर्थ है दस, और “हारा”, जिसका अर्थ है हार। यह एक ऐसा दिन है जो अयोध्या के राजा भगवान राम के साथ लड़ाई में रावण की हार का जश्न मनाता है।

इसके अलावा, यह दिन हिंदुओं के सबसे बड़े त्यौहार दिवाली की तैयारी की शुरुआत का प्रतीक है, जो दशहरा के 20 दिन बाद होता है।

दशहरा 2023 कब है?

इस साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि की शुरुआत 23 अक्तूबर को शाम 05 बजकर 44 मिनट से हो रही है। इसका समापन 24 अक्तूबर को दोपहर 03 बजकर 14 मिनट पर होगा। उदया तिथि 24 अक्तूबर को प्राप्त हो रही है, इसलिए दशहरा यानी विजयादशमी का पर्व 24 अक्तूबर को मनाया जाएगा।

दशहरा 2023 पर रावण दहन का मुहूर्त

दशहरा के दिन सूर्यास्त बाद प्रदोष काल में रावण के पुतले का दहन किया जाता है। इस साल रावण दहन 24 अक्तूबर को शाम 05 बजकर 43 मिनट के बाद से किया जाएगा।

दशहरा पर्व का महत्व

यह बुरे आचरण पर अच्छे आचरण की जीत की ख़ुशी में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं। सामान्यतः दशहरा एक जीत के जश्न के रूप में मनाया जाने वाला त्यौहार हैं। जश्न की मान्यता सबकी अलग-अलग होती हैं। जैसे किसानों के लिए यह नयी फसलों के घर आने का जश्न हैं।

पुराने वक़्त में इस दिन औजारों एवम हथियारों की पूजा की जाती थी, क्योंकि वे इसे युद्ध में मिली जीत के जश्न के तौर पर देखते थे। लेकिन इन सबके पीछे एक ही कारण होता हैं बुराई पर अच्छाई की जीत। किसानो के लिए यह मेहनत की जीत के रूप में आई फसलो का जश्न एवम सैनिको के लिए युद्ध में दुश्मन पर जीत का जश्न हैं।

पूजन विधि

दशहरा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। फिर साफ कपड़े पहनें। गेहूं या फिर चूने से दशहरा की प्रतिमा बनाएं। फिर गाय के गोबर से नौ उपले बनाएं और उन पर जौ और दही लगाएं। फिर गोबर से ही 2 कटोरी बनाएं और इनमें से एक में सिक्‍के और दूसरी में रोली, चावल, फल, फूल, और जौ डाल दें।

इसके बाद गोबर से बनाई प्रतिमा पर केले, मूली, ग्वारफली, गुड़ और चावल चढ़ाएं। धूप-दीप जलाएं। ब्राह्मणों और निर्धनों को भोजन कराकर दान दें। रात में रावण दहन करें और बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लें।

मां दुर्गा के 32 नाम जपने से पूरे होंगे सारे कार्य, जानिए कैसे करें जाप!

नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा करने से सभी के दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-शांति की बरसात होती है। साल भर में दो बार आने वाली किसी भी नवरात्रि में दुर्गा माता, भगवती की पूजा करने से हर व्यक्ति के मन की मुराद पूरी होती है।

ऐसी मान्यता है कि नवरात्रि के दिनों में मां भगवती के 32 नामों का जाप करने से जीवन में आने वाली हर बाधा और कष्टों से मुक्ति मिल जाती है। ॐ दुर्गा, दुर्गसाधिनी, दुर्गनाशिनी, दुर्गतिशमनी, दुर्गाद्विनिवारिणी समेत कुल 32 नामों का जाप करने से सभी के जीवन में उन्नति आती है।

कैसे करें दुर्गा के पावन नामों का जाप

  • किसी भी दिन या नवरात्रि में स्नानादि कार्यों से निवृत्त होने के बाद कुश या कंबल के आसन पर पूर्व या उत्तर की तरफ मुंह करके बैठें।
  • उसके बाद घी का दीपक जलाएं तथा मां दुर्गा को प्रिय उनके नामों की 5, 11 या 21 माला का जाप निरंतर नौ दिन तक करें।
  • साथ ही माता से अपनी सभी मनोकामना पूर्ण करने की याचना करें।

मां दुर्गा के 32 नाम

  1. ॐ दुर्गा,
  2. दुर्गतिशमनी,
  3. दुर्गाद्विनिवारिणी,
  4. दुर्गमच्छेदनी,
  5. दुर्गसाधिनी,
  6. दुर्गनाशिनी,
  7. दुर्गतोद्धारिणी,
  8. दुर्गनिहन्त्री
  9. दुर्गमापहा,
  10. दुर्गमज्ञानदा,
  11. दुर्गदैत्यलोकदवानला,
  12. दुर्गमा,
  13. दुर्गमालोका,
  14. दुर्गमात्मस्वरुपिणी,
  15. दुर्गमार्गप्रदा,
  16. दुर्गम विद्या,
  17. दुर्गमाश्रिता,
  18. दुर्गमज्ञान संस्थाना,
  19. दुर्गमध्यान भासिनी,
  20. दुर्गमोहा, दुर्गमगा,
  21. दुर्गमार्थस्वरुपिणी,
  22. दुर्गमासुर संहंत्रि,
  23. दुर्गमायुध धारिणी,
  24. दुर्गमांगी,
  25. दुर्गमता,
  26. दुर्गम्या,
  27. दुर्गमेश्वरी,
  28. दुर्गभीमा,
  29. दुर्गभामा,
  30. दुर्गमो,
  31. दुर्गोद्धारिणी
  32. दुर्गमापहा

लाभ

कोई भी व्यक्ति परेशानी या कठिनाई के समय में इन 32 नामों का उच्चारण करता है, तो कुछ ही समय में उसके सभी दुख दूर हो जाते है और वो आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करता है।

इस नाम स्त्रोत का प्रभाव अत्याधिक लाभदायक हैं। इस अदभुत स्त्रोत द्वारा जीवन के हर कष्ट व दुखों से हम तुरंत बहार निकल सकते हैं।

सदैव शुभ फलदायक होते हैं नवरात्र, जानें कुछ रोचक तथ्य

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में पावन पर्व शारदीय नवरात्र का आगमन होता है। इसमें मां भगवती जगतजननी आदिशक्ति मां जगदम्बा की सेवा तथा आराधना की जाती है। नवरात्र में देवी दुर्गा की कृपा सृष्टि की सभी रचनाओं पर समान रूप से बरसती है। इन नौ दिनों में भक्त मां भगवती दुर्गा जी के नौ रूपों की पूजा करते हैं।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
ससम कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना।l

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।

मां दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा पहले दिन होती है। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था।

मां दुर्गा की नवशक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रह्मचारिणी अर्थात तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है।

मां दुर्गा की तृतीय शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि विग्रह के तीसरे दिन इन का पूजन किया जाता है। मां का यह स्वरूप शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का आधा चद्र है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।

मां दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है। अपनी मंद हंसी से अंड अर्थात ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है।

मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। भगवान स्कन्द की माता होने के कारण मां के इस स्वरूप को स्कन्दमाता कहा जाता है।

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मां दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। विश्वप्रसिद्ध ऋषि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। माता ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलाई।

मां दुर्गा की सातवीं शक्ति ‘कालरात्रि‘ के नाम से जानी जाती है। इनके शरीर का रंग घने अंधकार की भांति काला है, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भांति चमकने वाली माला है। मां का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है परन्तु सदैव शुभ फलदायक है। अतः भक्तों को इनसे भयभीत नहीं होना चाहिए।

मां आदि शक्ति दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ गया था। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव जी ने इनको गौर वर्ण प्रदान किया। तभी से इनका नाम गौरी पड़ा।।

मां भगवती दुर्गा की नवम शक्ति का नाम ‘सिद्धि‘ है। सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली माता इन्हीं को माना गया है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां होती हैं।

देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। इन्हीं की अनुकम्पा से भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वह संसार में अर्द्धनारीश्वर‘ नाम से प्रसिद्ध हुए।

नवरात्र के दौरान मां भगवती को प्रसन्न करने के लिए दुर्गा सप्तशती का नियमित पाठ विधि-विधान से किया जाए तो माता बहुत प्रसन्न होती हैं।

पौराणिक कथानुसार प्राचीन काल में ‘दुर्गम’ नामक राक्षस ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न करलिया। उसने वेदों को अपने अधिकार में लेकर देवताओंको स्वर्ग से निष्कासित कर दिया जिससे पूरे संसार में वैदिक कर्म बंद हो गया।

इस कारण चारों ओर घोर अकाल पड़ जाने सेहर ओर हाहाकारमच गया। जीव-जंतु मरने लगे। सृष्टि का विनाश होने लगा। सृष्टि को बचाने के लिए देवताओं ने व्रत रखकर नौ दिन तक ‘मां जगदम्बा‘ की आराधना करके उनसे सृष्टि को बचाने की विनती की।

तब मां भगवती व असुर दुर्गम के बीच घमासान यद्ध हआ। मां भगवती ने दुर्गम का वध कर देवताओं को निर्भय कर दिया। देवताओं ने मां भगवती की प्रार्थना की:-

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य।l

देवताओं ने कहा, “हे शरणागतों के दुख दूर करने वाली देवी ! तुम प्रसन्न हो, हे सम्पूर्ण जगत की माता! तुम प्रसन्न हो। विन्ध्येश्वरी! तुम विश्व की रक्षा करो क्योंकि तुम इस चर और अचर की ईश्वरी हो।”

भगवान श्री राम जी ने भी लंका पर चढ़ाई से पूर्व मां भगवती दुर्गा की आश्विन में आने वाले शारदीय नवरात्रि में आराधना कर विजय का वर प्राप्त किया। तभी से आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम नौ दिनों में मां भगवती जगदम्बा की आराधना का यह पर्व आरम्भ हुआ। मां भगवती की कृपा पाने के लिए इस तरह आराधना करनी चाहिए :

सर्वमङ्गलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यातिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।।

हे नारायणी ! सम्पूर्ण मंगलों के मंगलरूप वाली! हे शिवे, हे सम्पूर्ण प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली ! हे शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली गौरी ! तुमको नमस्कार है, सृष्टि स्थिति तथा संहार की शक्तिभूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्व सुखमयी नारायणी तुमको नमस्कार है! हे शरण में आए हुए शरणागतों दीन-दुखियों की रक्षा में तत्पर, सम्पूर्ण पीड़ाओं को हरने वाली हे नारायणी ! तुमको नमस्कार है।

शारदीय नवरात्रि में 9 देवियों को लगाएं 9 तरह से भोग, माता रानी की बरसेगी अपार कृपा

शारदीय नवरात्रि का शुभ आरम्भ 15 अक्टूबर से होने जा रहा है। मां दुर्गा के भक्त नौ दिनों तक चलने वाले इस उत्सव को धूमधाम से मनाने के लिए तैयारी कर रहे हैं।

पूरे वर्ष में,चार नवरात्रि मनाई जाती है। आगामी नवरात्रि शारदीय होगी, जो आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक मनाई जाएगी।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, नवरात्रि के दौरान 9 दिनों तक माता रानी के अलग-अलग रूपों की विधि-विधान के साथ आराधना की जाती है। यदि आप नवरात्रि में मां दुर्गा को प्रसन्न करना चाहते हैं तो 9 दिनों में माता के 9 रूपों को अलग-अलग भोग लगा सकते हैं।

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कलश स्थापना हमेशा अभिजीत मुहूर्त और प्रतिपदा तिथि में करना ही शुभ माना गया है। इस बार 15 अक्टूबर को अभिजीत मुहूर्त प्रातः 11:38 मिनट सें शुरू हो रहा है और दोपहर 12:23 मिनट तक रहेगा।

इसके उपरांत 12:24 मिनट से वैधृति योग शुरू हो जाएगा। ऐसे में इस बार शारदीय नवरात्रि में कलश स्थापना के लिए मात्र 45 मिनट का ही शुभ मुहूर्त है।

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देवी मां को 9 दिन ये लगाएं भोग

  1. पहला दिन मां शैलपुत्री को कलाकंद का भोग लगाना चाहिए। गाय के दूध से बनी मिठाई का भोग लगाना शुभ होता है।
  2. दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाता है। इस दिन चीनी से तैयार किए गए पंचामृत का भोग लगाना चाहिए।
  3. तीसरा दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। तीसरे दिन दूध से बनी बर्फी का भोग जरूर लगाएं।
  4. चौथा दिन मां कुष्मांडा को मालपुए का भोग लगाना चाहिए। इस भोग को लगाने से देवी मां प्रसन्न होती है।
  5. पांचवें दिन मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाना चाहिए।
  6. नवरात्रि में छठवां दिन मां कात्यायनी को समर्पित होता है। इस दिन देवी मां को पान का भोग लगाना चाहिए।
  7. सातवां दिन मां काली की पूजा जाता है। इस दिन गुड़ की बनी मिठाई का भोग लगाना चाहिए।
  8. आठवां दिन मां महागौरी की पूजा आराधना की जाती है। देवी मां को नारियल से बनी मिठाई का भोग लगाना चाहिए।
  9. नवरात्रि में नौवां दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस दिन सूजी के हलवा, पुरी और काले चने का भोग लगाना चाहिए।

शैतान की केतली के नाम से जानी जाती है ये जगह, जहाँ पूरी की पूरी नदी समा जाती है

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कुदरत द्वारा बनाई गई ये दुनिया बहुत ही अजीबो-ग़रीब चीज़ों और रहस्यों से भरी पड़ी है। इन रहस्यों को सुलझाने के लिए हमारे वैज्ञानिक और विशेषज्ञ लगातार कोशिश करते रहते हैं। कुछ रहस्यों पर से तो पर्दा उठ गया है लेकिन कुछ रहस्य अभी भी अनसुलझे हैं।

इन्हीं में से एक है (The Devil’s Kettle) ‘द डेविल्स कैटल’। ये अमेरिका में स्थित एक झरना है, जिसके पास एक कड़ाहीनुमा छेद है, जिसमें पूरी नदी का पानी समा जाता है। ये आश्चर्यचकित करने वाली बात है कि छोटे से इस छेद में कैसे पूरी नदी का पानी समा जाता है और ये पानी आखिर जाता कहां है?

आज के इस लेख में हम आपको इसी रहस्य्मयी झरने के बारे में बताने जा रहे हैं, तो चलिए शुरू करते हैं।

mysterious place The Devil's Kettle

रहस्यों से भरा ये ख़ूबसूरत झरना ‘सुपीरियर लेक’ के उत्तरी किनारे पर (Minnesota) मिनेसोटा में (Judge C. R. Magney State Park) जज सीआर मैगनेसी पार्क में है।

इस झरने का स्तोत्र ब्रुल नदी का पानी है, जो घुमावदार, संकरीले चट्टानी रास्तों से नीचे की ओर गिरता है। झरने की तरह गिरता हुआ ये पानी एक छोटे से छेद में समा जाता है। इस झरने के नाम है ‘द डेविल्स कैटल’ जिसका मतलब ‘शैतान की कड़ाही’ होता है। इसे शैतान की केतली के नाम से भी जाना जाता है।

हालांकि, वैज्ञानिकों ने कई बार इस बात का पता लगाने की कोशिश की है कि आख़िर ये पानी कहां जाता है? लेकिन वे इसके रहस्य से पर्दा उठाने में विफल रहे हैं।

वैज्ञानिकों ने पानी का रास्ता पता लगाने के लिए वॉटरफ़ॉल में पिंग-पॉन्ग बॉल, कलर डाई आदि डाला, ताकि ये रहस्य खुल सके, लेकिन इससे भी कुछ हासिल नहीं हुआ।

झरने का गैलनों लीटर पानी इस कुंड से कहां ग़ायब हो जाता है इसका पता लगाने के कई प्रयास किए गए, लेकिन ये रहस्य अभी तक ज्यों का त्यों है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, सदियों पहले जब साइंस इतना ज्यादा डेवलप नहीं हुआ था तब लोग हर तरह की अनोखी और रहस्यमी चीजों को या तो भगवान से जोड़ देते थे, या तो फिर शैतान से। माना जाता है कि पूरी की पूरी नदी के समा जाने के बाद भी यह कुंड कभी भरता नहीं । इस वजह से स्थानीय लोग इसे Devil’s Kettle कहने लगे।

जाने कैसा रहेगा शारदीय नवरात्रि 2023 का आपकी राशियों पर प्रभाव

शारदीय नवरात्रि का आरंभ आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होता है। इस साल शारदीय नवरात्रि 15 अक्टूबर 2023 से शुरू होने जा रही है। जो 24 अक्टूबर को समाप्त होगा। विजयादशमी यानी दशहरा 24 अक्टूबर को है।

नवरात्रि के नौ दिन बहुत पवित्र माने जाते हैं। हर साल मां अंबे के भक्त पूरी श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ शारदीय नवरात्रि का त्योहार मनाते हैं। इस दौरान मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है।

शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि स्वरूप का दर्शन-पूजन किया जाता है। नौ शक्तियों के मिलन को नवरात्रि कहते हैं।

नवरात्रि में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियों में वृद्धि के लिए उपवास, संयम, नियम, भजन,पूजन और योग साधना करते हैं। नौ दिनों तक दुर्गासप्तशती का पाठ, हवन और कन्या पूजन अवश्य करना चाहिए।

Shardiya Navratri

नवरात्रि पर्व का राशियों पर होने वाला असर

नवरात्रि पर्व सभी के लिए बहुत-सी खुशियां लेकर आता है। प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में सुख-समृद्धि, यश-वैभव, आर्थिक-मानसिक एवं शारीरिक सुख की चाहत रखता है। जानिए चैत्र नवरात्रि का आपकी राशियों पर क्या प्रभाव होगा।

मेष राशि– मेष राशि का स्वामी मंगल ग्रह को माना गया है। अगर आप नवरात्रि में नौ दिनों तक सिद्धिकुंजिकस्तोत्र का पाठ करते है तो माता आपको मकान, जमीन या वाहन सम्बंधित सुख पा सकते है। इसके साथ ही आप शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक किसी असहाय लोगों की मदद करते है तो आपके ऊपर माता रानी की कृपा हमेशा बनी रहेगी।

वृष राशि – वृष राशि का स्वामी शुक्र ग्रह को माना गया है। आप नवरात्रि में नौ दिनों तक सप्तश्लोकी दुर्गा का पाठ करते है तो माता की विशेष कृपा आप पर बनी रहेगी। वित्तीय स्थिति बहुत बेहतर होगी। इसके साथ आप माता के नाम का जप निरन्तर करते रहें। ऐसा करने से आपको जीवन में कभी भी कोई बड़ी बिमारियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

मिथुन राशि– मिथुन राशि का स्वामी बुध ग्रह को माना गया है। आप नवरात्रि में दुर्गासप्तशती का पाठ करते है तो माता रानी आप पर प्रसन्न रहेगी। इसके साथ ही आपको जमीन या मकान व वाहन सुख मिलेगा। आपके जीवन से सभी तरह के अनिष्ट का नाश हो जाता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। इसके साथ ही चिंताओं, क्लेश, शत्रु बाधा से मुक्ति मिलेगी।

कर्क राशि – कर्क का स्वामी चंद्रमा को माना गया है। आप नवरात्रि में माता की उपासना के साथ- साथ शिव उपासना भी करें। ऐसा करने से माता रानी आपको साहसी और पराक्रमी बनने का वरदान देगी। इसके साथ ही जातक को आध्यात्मिक शक्ति मिलती है। धन में कभी भी कमी नहीं आती है। परिवार में खुशियां बनी रहती है।

सिंह राशि – सिंह राशि का स्वामी सूर्य देव को माना गया है। अगर आप शारदीय नवरात्रि में नौ दिनों तक सिद्धिकुंजिकस्तोत्र का पाठ करते है तो संतान को करियर में सफलता मिलेगी। धन की प्राप्ति होगी। इसके साथ आपको श्री रामचरितमानस का सम्पूर्ण पाठ करनी चाहिए, जिसके आपके जीवन में माता रानी के साथ- साथ भगवान राम की कृपा आपके ऊपर बनी रहेगी।

कन्या राशि – कन्या राशि का स्वामी बुध ग्रह होता है। आप पूरे नवरात्रि में प्रतिदिन दुर्गासप्तशती एवं अरण्यकाण्ड का पाठ करने से आपके जीवन से सभी प्रकार के कलह का नाश हो जायेगा। इसके साथ ही छात्रों को विदेश यात्रा करने का मौका भी मिल सकता है और छात्रों को नौकरी में सफलता मिलेगी।

तुला राशि – तुला राशि का स्वामी शुक्र ग्रह को माना गया है। तुला राशि के जातक को इस नवरात्रि में सप्तश्लोकी दुर्गा का 8 बार पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से आपके जीवन में धन तथा सुख समृद्धि ‘ में वृद्धि आएगी। इसके साथ ही समस्त अमंगलों का नाश होता है। माता की कृपा से सुख-शातिं, यश-कीर्ति, धन-धान्य, आरोग्य, बल बुद्धि की प्राप्ति होगी।

वृश्चिक राशि – वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल ग्रह को माना गया है। आप नवरात्रि में दुर्गासप्तशती एवं श्री रामचरितमानस का पाठ करें। इस उपाय को करने से साधक को मानसिक और शारीरिक सुख मिलेगा। कोर्ट-कचहरी आदि से जुड़े मामलों में विजय प्राप्ति का वरदान मिलेगा। इसके साथ ही शत्रु बाधा भी दूर होती है।

धनु राशि – धनु राशि का स्वामी बृहस्पति ग्रह को बताया गया है। आप इस नवरात्रि में दुर्गासप्तशती का सम्पूर्ण पाठ करें। ऐसा करने से आपको धन की प्राप्ति के साथ- साथ कोई बड़ा पुरस्कार प्राप्त होगा। मकान व वाहन सुख की प्राप्ति होगी। इसके साथ ही आप सिद्धिकुंजिकस्तोत्र व सप्तश्लोकी दुर्गा का भी पाठ करें, जिससे आपके जीवन में सुख समृद्धि आएगी।

मकर राशि – मकर राशि का स्वामी शनि है। मकर राशि के जातकों के लिए 4, व 8 के अंक भाग्यशाली होते हैं। मकर राशि के व्यक्ति अति महत्वाकांक्षी होते हैं। यह सम्मान और सफलता प्राप्त करने के लिए लगातार कार्य कर सकते हैं। शनिदेव का प्रिय रंग काला और नीला है। ऐसे में इस राशि के जातकों को नीले रंग के फूलों से मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए।

कुम्भ राशि – कुम्भ राशि का स्वामी शनि ग्रह को माना गया है। आप शारदीय नवरात्रि में राम रक्षा स्तोत्र का पाठ एवं माता के नाम का 100 बार जप करते है तो आपकी संतान को नौकरी में सफलता मिलेगी। धन की प्राप्ति होगी। इसके साथ ही आपके जीवन में सभी तरह की विपत्तियों से रक्षा होगी। आप भय व कष्टों से मुक्ति मिलेगी।

मीन राशि – मीन राशि का स्वामी गुरु ग्रह को माना गया है। अगर आप पूरे नवरात्रि में दुर्गासप्तशती का पाठ करते है तो आपके जीवन में माता रानी की कृपा बनी रहेगी। इसके साथ ही आपको सुख समृद्धि एवं वाहन सुख मिलेगी। अगर आप व्यापार करने तो आपको उसमे लाभ होगी।

नवरात्रि के एक दिन पहले लगने जा रहा है साल का आखिरी सूर्य ग्रहण

साल का आखिरी सूर्य ग्रहण शारदीय नवरात्रि के शुरू होने से एक दिन पहले यानी 14 अक्तूबर को लगेगा। यह साल 2023 का दूसरा और आखिरी सूर्य ग्रहण होगा। भारतीय समय के अनुसार यह सूर्य ग्रहण 14 अक्तूबर की रात 08 बजकर 34 मिनट से शुरू होगा जो मध्य रात्रि 2 बजकर 24 मिनट तक चलेगा।

यह सूर्य ग्रहण वलयाकार में होगा। जिसमें आसमान में सूर्य एक अंगूठी यानी रिंग के आकार में नजर आएगा। जिस कारण इसे रिंग ऑफ फायर कहा जाता है।

सूर्य ग्रहण में 12 घंटे पहले से ही सुतक काल लग जाता है, इसलिए इस सूर्य ग्रहण का सूतक काल सुबह 8 बजकर 34 मिनट से शुरू हो जाएगा। वैसे तो साल का आखिरी सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए यहां इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा।

सूर्य ग्रहण क्या है?

सूर्य ग्रहण अमावस्या के दिन होता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है और जब तीनों वस्तुएं संरेखित होती हैं। आंशिक सूर्य ग्रहण तब होगा जब चंद्र डिस्क आंशिक रूप से सौर डिस्क को कवर कर लेगी।

कहां-कहां दिखाई देगा यह सूर्य ग्रहण

साल का आखिरी सूर्य ग्रहण को उत्तरी अमेरिका, कनाडा, आइलैंड, अर्जेटीना, क्यूबा, पेरु, उरुग्वे और ब्राजील में देखा जा सकेगा। भारत में यह सूर्य ग्रहण नहीं दिखाई देगा।

ग्रहण के वक्त इन बातों का रखे ध्यान

सूर्य ग्रहण के दौरान कोशिश करना चाहिए कि रखा हुआ भोजन ना करें। मान्यता है कि सूर्य की किरणें, ग्रहण के प्रभाव से दूषित हो जाती हैं, जो आप के रखे हुए भोजन को भी विशैला बना देती है।

ग्रहण के बाद व्यक्ति को स्नान करना चाहिए, साथ ही घर की भा साफ-सफाई करनी चाहिए। यदि आप के घर में पूजा स्थान या मंदिर हो तो उसकी भी सफाई जरूर करें। इससे घर की नकरात्मकता और दोष दूर होते हैं।

सूर्य ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाओं को कुछ खास सावधानियां बरतनी चाहिए। ग्रहण के वक्त उन्हें घर के अंदर ही रहना चाहिए। साथ ही कोशिश करें कि ग्रहण के वक्त वो सोए नहीं, बल्कि ध्यान और जप करें।

सूर्य ग्रहण के बारे में रोचक तथ्य और जानकारी

सूर्य ग्रहण तब लगता है जब चन्द्रमा, धरती और सूर्य के बीच में से होकर गुजरता है। धरती से देखने पर सूर्य पूर्ण अथवा आंशिक रूप से चन्द्रमा द्वारा ढक जाता है।

सूर्य ग्रहणग्रहण से धरती का जो हिस्सा प्रभावित होता है उसे छाया क्षेत्र कहा जाता है।

सूर्य ग्रहण मुख्यत: तीन तरह का होता है। पूर्ण सूर्य ग्रहण, आंशिक सूर्य ग्रहण और वलयाकार सूर्य ग्रहण।

सूर्य ग्रहण तीन प्रकार का होता है
सूर्य ग्रहण तीन प्रकार का होता है
  1. पूर्ण सूर्य ग्रहण

पूर्ण सूर्य ग्रहण उस समय घटित होता है जब चन्द्रमा पृथ्वी के नजदीक रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है। धरती के काफी नजदीक होने के कारण चन्द्रमा धरती के उस भाग को पूरी तरह अपने छाया क्षेत्र में ले लेता है।

इसके फलस्वरूप सूर्य की रोशनी पृ्थ्वी तक पहुँच नहीं पति और पृ्थ्वी पर अंधकार जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसमेँ पूरे के पूरा सूर्य दिखाई नहीं देता। इस प्रकार होने वाला ग्रहण पूर्ण सूर्य ग्रहण कहलाता है।

  1. आंशिक सूर्य ग्रहण

आंशिक सूर्यग्रहण में सूर्य का केवल कुछ ही भाग चन्दमा द्वारा ढका जाता है। इससे सूर्य का कुछ भाग ग्रहण ग्रास में तथा कुछ भाग ग्रहण से अप्रभावित रहता है। पृथ्वी के उस क्षेत्र विशेष में लगा ग्रहण आंशिक सूर्य ग्रहण कहलाता है।

  1. वलयाकार सूर्य ग्रहण

वलयाकार सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा पृथ्वी के काफ़ी दूर रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है। चन्द्रमा सूरज को इस प्रकार से ढकता है, कि सूरज का केवल बीच वाला हिस्सा ही छाया क्षेत्र में आता है।

पृथ्वी से देखने पर चन्द्रमा द्वारा सूर्य पूरी तरह ढका दिखाई नहीं देता है और सूर्य के बाहर का हिस्सा प्रकाशित होने के कारण यह कंगन या वलय यानि छल्ले के रूप में चमकता दिखाई देता है। कंगन आकार में बने सूर्यग्रहण को ही वलयाकार सूर्य ग्रहण कहलाता है।

सूर्य ग्रहण के बारे में रोचक तथ्य

  • इतिहासकारों और खगोलविदों के अनुसार 14 अक्टूबर, 2134 ई.पू. यानि आज से 4154 साल पहले प्राचीन चीन में  लगने वाला सूर्य ग्रहण मानव इतिहास में दर्ज़ पहला सूर्य ग्रहण था।
  • माना जाता है कि चीनियों की तरह बेबीलोन के निवासी भी ग्रहण की भविष्यवाणी करने में समर्थ थे। उनके द्वारा दर्ज़ पहला ग्रहण मई 3, 1375 ई॰पू॰ में घटित हुआ था।
  • प्राचीन चीनियों की तरह, बेबीलोन के लोगों का भी मानना था कि सूर्य ग्रहण राजाओं और शासकों के लिए अपशकुन था।
  • किंवदंती के अनुसार चीन में सौर ग्रहणों को सम्राट के स्वास्थ्य और सफलता के साथ जुड़ा माना जाता था। और यह अनुमान लगाने में नाकाम रहने का मतलब था कि सम्राट को खतरे में डालना।
  • सूर्य ग्रहण की भविष्यवाणी करने समर्थ होने के बाद वे ग्रहण के दौरान सम्राट की गद्दी पर एक अस्थाई सम्राट की नियुक्ति कर देते थे। इससे असली सम्राट देवताओं के कोप से बच जाता था, ऐसा उनका मानना था।
  • ह्सी (Hsi) और हो (Ho) नाम के दो चीनी ज्योतिषियों को सूर्य ग्रहण की भविष्यवाणी करने में विफल रहने के लिए मृत्युदंड दे दिया गया था। यही पहला दर्ज़ सूर्य ग्रहण था।
  • ग्रीक इतिहासकार हेरोडोटस के अनुसार, 585 ईसा पूर्व में एक सूर्य ग्रहण की वजह से लिडियन और मेड्स के बीच युद्ध रुक गया। दोनों पक्षों ने दिन में अंधेरे आसमान को एक दूसरे के साथ शांति बनाने के संकेत के रूप में देखा।
  • प्राचीन यूनानी खगोलशास्त्रियों ने सबसे पहले ग्रहणों की सटीक भविष्यवाणी करना शुरू किया था।
  • सूर्यग्रहण क्यों होता है, पहले इस बात के कयास ही लगाए जाते थे लेकिन सटीक जानकारी नहीं थी। सन 1609 में  खगोल विज्ञानी जोहान्स केपलर ने पहली बार सूर्यग्रहण का पूर्ण वैज्ञानिक विवरण दिया।
  • 1973 में वैज्ञानिकों ने कॉनकार्ड विमान में अपने उपकरणों के साथ ग्रहण पट्टी पर ग्रहण का तीन हजार किमी तक पीछा किया था और लगभग 72 मिनट तक ग्रहण का अध्ययन किया था।
  • भारत में धारणा है कि ग्रहण के दौरान पका हुआ भोजन दूषित हो जाता है (की मनाही है) लेकिन भारत के खगोलशास्त्री इससे सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार यह केवल भ्रांति है।

नवरात्रि के 9 दिनों में, जानिए किस दिन कौन सा भोग लगाएं!!

नवरात्रि का हिन्दु धर्म में बहुत महत्व है। नवरात्रि में दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यता यह है कि जो व्यक्ति मां दुर्गा की पूजा आराधना सच्ची श्रद्धा और निष्ठा से करता है उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

नवरात्रि के पर्व के दौरान माता को प्रसन्न करने के लिए प्रतिदिन माता के स्वरूप के अनुसार, भोग लगाने का भी विधान है। नवरात्रि के नौ दिनों में माता के नौ रूपों- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।

यह सब माता दुर्गा के स्वरूप हैं। आइए अब जानते हैं कि नवरात्रि के नौ दिनों में माता के इन रूपों को प्रसन्न करने के लिए किन पदार्थों का भोग लगाना शुभ माना जाता है।

माता शैलपुत्री

इस दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है। शैलपुत्री शब्द का अर्थ है पहाड़ों की पुत्री। इस दिन व्रत के बाद रात्रि के समय माता की पूजा करते समय, केले का भोग माता शैलपुत्री को लगाना चाहिए।

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माता ब्रह्मचारिणी

नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इस दिन दुर्गा माता के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है, और उन्हें घी या दूध से बने पदार्थों का भोग लगाना शुभ माना जाता है।

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चंद्रघंटा माता

तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा की जाती है और माता को नमकीन पदार्थों अथवा मक्खन का भोग लगाया जाता है। चंद्रघंटा का अर्थ है चांद के समान चमकने वाली।

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कूष्माण्डा माता

नवरात्रि के चौथे दिन माता कूष्माण्डा की पूजा की जाती है। इस दिन माता के कूष्माण्डा स्वरूप को मिश्री का भोग लगाना चाहिए इसके अलावा आप मिठे पदार्थों का भोग भी माता को लगा सकते हैं।

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स्कंद माता

पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है, और माता को सफेद खीर या दूध का भोग लगाना शुभ माना जाता है।

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कात्यायनी माता

माता कात्यायनी की पूजा नवरात्रि के षष्ठम दिन की जाती है। माता को प्रसन्न करने के लिए इस दिन मालपुए का भोग लगाना चाहिए।

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कालरात्रि माता

माता कालरात्रि की पूजा नवरात्रि के सातवें दिन की जाती है। इस दिन दुर्गा माता के कालरात्रि स्वरूप को प्रसन्न करने के लिए शहद का भोग लगाया जाता है।

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महागौरी

नवरात्रि के आठवें दिन माता महागौरी का पूजन किया जाता है। माता महागौरी को इस दिन गुड़ या नारियल का भोग लगाया जाता है।

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सिद्धिदात्री

नवरात्रि के अंतिम दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि माता सर्व सिद्धि देने वाली हैं। इस दिन माता को धान के हलवे का भोग लगाना शुभ माना जाता है।