धनतेरस पर क्यों खरीदे जाते हैं बर्तन? जानिए इससे जुड़ी मान्यताएं!

दीपों के पर्व दीपावली में कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। दिवाली की शुरुआत धनतेरस से मानी जाती है। धनतेरस से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। धनतेरस पर लोग खरीदारी करते हैं। इस दिन लोग सोना, चांदी और विशेष रूप से बर्तन खरीदते हैं।

कहा जाता है कि धनतेरस के दिन आप जो कुछ भी खरीदते हैं वह तेरह गुना बढ़ जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इन सभी देवी-देवताओं की विधि-विधान से पूजा करने से घर धन-धान्य से भरा रहता है और भगवान धन्वंतरि की कृपा से सद्गुणों की प्राप्ति होती है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि धनतेरस के दिन बर्तन खरीदना इतना जरूरी क्यों है?

इसलिए खरीदें बर्तन जाते हैं बर्तन

पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं और राक्षसों ने अमृत कलश के लिए समुद्र मंथन किया था। फिर इस मंथन के दौरान एक-एक करके 14 रत्न प्राप्त हुए। मां लक्ष्मी जी को भी उन 14 रत्नों में से एक माना जाता है।

लक्ष्मी जी की तरह भगवान धन्वंतरि भी समुद्र मंथन के दौरान पैदा हुए थे। जब भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए तो उनके हाथ में अमृत का पात्र था। ऐसा माना जाता है कि इसी वजह से धनतेरस के दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है।

भगवान धन्वंतरि के जन्म के समय उनके हाथ में पीतल का कलश था, इसलिए इस दिन पीतल के बर्तन खरीदने का महत्व है।

धनतेरस के दिन लोग बर्तनों के साथ-साथ सोना-चांदी आदि भी खरीदते हैं। इस दिन किसी भी चीज की खरीदारी करना शुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार यदि आप धनतेरस के दिन कोई खरीदारी करते हैं तो वह 13 गुना अधिक बढ़ जाती है। इसलिए लोग बर्तन, चांदी और सोना खरीदते हैं।

इस दिन लोग चांदी के लक्ष्मी-गणेश, चांदी के सिक्के आदि भी घर लाते हैं, जिससे घर में आशीर्वाद बना रहता है और साथ ही साथ लक्ष्मी जी की कृपा भी बनी रहती है।

इस दिन आप किसी भी शुभ धातु जैसे तांबे-पीतल या चांदी के बर्तन खरीद सकते हैं। इन बर्तनों को घर में लाने से पहले इनमें कुछ चावल या पानी भर लें। घर में खाली बर्तन लाना भी अशुभ होने का संकेत है।

छोटी दिवाली क्यों मनाई जाती है? जानें क्या है इसके पीछे का रहस्य

छोटी दिवाली को रूप चौदस या नरक चतुर्दशी के रूप में भी जाना जाता है जो पूरे भारत में दिवाली से एक दिन पहले मनाई जाती है। लोग इसे मुख्य दिन की प्रतीक्षा के संकेत के रूप में अपने घरों में रोशनी करके और पटाखे फोड़कर मनाते हैं।

रोशनी का त्यौहार पांच दिनों के लिए मनाया जाता है जो धनतेरस से शुरू होता है, फिर नरक चतुर्दशी, मुख्य दिन दिवाली, फिर गोवर्धन पूजा, और भाई दूज के साथ समाप्त होता है।

यह पांच दिवसीय त्यौहार पूरे भारत में उत्साह से देवी लक्ष्मी की पूजा करके, रंगोली बनाकर, दिवाली के दीया से घर को सजाकर, दिवाली की मिठाई तैयार करके और भी बहुत कुछ किया जाता है। हम दिवाली उपहारों का आदान-प्रदान भी करते हैं।

जगह और प्रार्थना स्थान को रोशन करने के लिए आपको दिवाली मोमबत्तियों की एक बड़ी श्रृंखला भी मिलेगी। दिवाली एक शुभ त्योहार है क्योंकि यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है लेकिन, यदि आप जानते हैं, तो नरक चतुर्दशी भी हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण दिन है।

ज्यादातर समय, हम नहीं जानते कि हम इन दिनों को क्यों मनाते हैं और इसलिए, आज हमने आपको इस ब्लॉग को क्यूरेट किया है कि छोटी दिवाली क्यों मनाई जाती है।

छोटी दिवाली 2023 की तिथि 

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि शुरू – 11 नवंबर 2023, दोपहर 01.57

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि समाप्त – 12 नवंबर 2023, दोपहर 02.44

पौराणिक मान्यताएं

छोटी दिवाली को क्यों कहते हैं नरक चतुर्दशी?

पौराणिक कथाओं की मानें तो इतिहास में तीन घटनाएं घटी हैं और इसलिए नरक चतुर्दशी लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। किंवदंतियों के अनुसार, राक्षस राजा नरकासुर ने भगवान कृष्ण और अन्य देवताओं को हराया था।

उसने अन्य देवताओं की 16,000 कन्याओं को वश में कर लिया और देवी अदिति की बालियां छीन लीं। नरक चतुर्दशी से एक दिन पहले, भगवान कृष्ण ने नरकासुर को हराया, महिलाओं को मुक्त किया, और देवी अदिति के बालियां भी लाए।

यम का दीपक जलाएं

छोटी दिवाली के दिन यम के नाम का दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का खतरा पूरी तरह टल जाता है। इसके अलावा नरक में मिलने वाली यातनाओं से भी छुटकारा मिलता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि जो भी मनुष्य धरती पर अत्याधिक पाप करता है उसे उसकी सजा मृत्युलोक में भुगतना पड़ता है। इतना ही नहीं उसे तमाम तरह की यातनाओं से भी गुजरना पड़ता है।

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दिवाली लक्ष्मी जी के पूजन का त्यौहार है। इस दिन धन-संपदा और शांति के लिए लक्ष्मी जी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। दिवाली से दो दिन पहले धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है। धनतेरस के दिन से ही दिवाली की शुरुआत हो जाती है।

समुद्र मंथन के दौरान धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरी अपने साथ अमृत का कलश और आयुर्वेद लेकर प्रकट हुए थे। इसी वजह से भगवान धनवतंरी को औषधि का जनक भी कहा जाता है।

धनतेरस के दिन धन के देवता भगवान कुबेर की भी पूजा की जाती है। भगवान कुबेर को लक्ष्मी जी का खजांची कहा जाता है। धनतेरस वाले दिन खरीदारी करना बहुत शुभ माना जाता है।

दिवाली की खरीदारी भी इसी दिन की जाती है। माना जाता है, कि धनतेरस के दिन जिस वस्तु की खरीदारी की जाएगी उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है। वैसे तो सभी अपनी इच्छा अनुसार खरीदारी करते है परन्तु इस दिन कुछ विशेष चीजों की खरीदारी करनी चाहिए।

अब ऐसे में लोगों के मन में अक्सर ये सवाल आता है कि आखिर किस सामान की खरीदारी की जाए। तो आज हम आपको कुछ धनतेरस के दिन खरीदारी करने वाले वस्तुओं के बारे में बताने जा रहे हैं…

बर्तन की खरीदारी

धनतेरस के दिन बर्तन की खरीदारी करना शुभ माना जाता है। बर्तन की खरीदते समय पीतल धातु से बना बर्तन जरुर खरीदना चाहिए। बर्तन खरीदने के पीछे मान्यता है कि जब भगवान धनवंतरि प्रकट हुए तो वह एक पात्र में अमृत लेकर आए थे। इसलिए धनतेरस के दिन बर्तन की खरीदारी को शुभ माना जाता है।

dhanteras 2023

चांदी की खरीदारी

धनतेरस के दिन चांदी धातु की खरीदारी करना शुभ माना जाता है। इस दिन चांदी के सिक्के या बर्तन खरीदने चाहिए। चांदी चंद्रमा की धातु है। धनतेरस के दिन चांदी की खरीदारी करने से घर में यश, कीर्ति, ऐश्वर्य और संपदा में वृद्धि होती है।

कौड़ियां

समुद्र मंथन के दौरान जब लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं, तो उनके साथ कौड़ी भी आई थी। कमल के फूल की तरह ही कौड़ी भी लक्ष्मी जी को बहुत प्रिय है। धनतेरस के दिन आप कौड़ीयां खरीदकर दिवाली के दिन इनकी पूजा कर अपनी तिजोरी में रखें। मान्यता है कि तिजोरी में कौड़ियां रखने से धन की हानि नहीं होती है।

धनिया की खरीदारी

धनतेरस के दिन धनिया की खरीदारी करना भी शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन धनिए के बीज खरीदकर दिवाली वाले दिन उसे उगाएं। माना जाता है कि ऐसा करने से भी धन का नुकसान नहीं होता है।

दिवाली पूजन समाग्री

धनतेरस के दिन से ही दिवाली की शुरुआत हो जाती है। इसलिए दिवाली से संबंधित खरीदारी भी इसी दिन की जाती है। लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, खील-बताशे और मिट्टी के दिए धनतेरस के दिन ही खरीदने चाहिए।

धनतेरस के बारे में कुछ खास बातें

1 धनतेरस, धनवंतरी त्रयोदशी या धन त्रयोदशी दीपावली से पूर्व मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण त्यौहार है। इस दिन आरोग्य के देवता धनवंतरी, मृत्यु के अधिपति यम, वास्तविक धन संपदा की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी तथा वैभव के स्वामी कुबेर की पूजा की जाती है।

2  इस त्यौहार को मनाए जाने के पीछे मान्यता है कि लक्ष्मी के आह्वान के पहले आरोग्य की प्राप्ति और यम को प्रसन्न करने के लिए कर्मों का शुद्धिकरण अत्यंत आवश्यक है। कुबेर भी आसुरी प्रवृत्तियों का हरण करने वाले देव हैं।

3  धनवंतरी और मां लक्ष्मी का अवतरण समुद्र मंथन से हुआ था। दोनों ही कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसके साथ ही मां लक्ष्मी का वाहन ऐरावत हाथी भी समुद्र मंथन द्वारा प्रकट हुआ था।

4  श्री सूक्त में लक्ष्मी के स्वरूपों का विवरण कुछ इस प्रकार मिलता है। ‘धनमग्नि, धनम वायु, धनम सूर्यो धनम वसु:’ अर्थात् प्रकृति ही लक्ष्मी है और प्रकृति की रक्षा करके मनुष्य स्वयं के लिए ही नहीं, अपितु नि:स्वार्थ होकर पूरे समाज के लिए लक्ष्मी का सृजन कर सकता है।

5  श्री सूक्त में आगे यह भी लिखा गया है- ‘न क्रोधो न मात्सर्यम न लोभो ना अशुभा मति:’ इसका अर्थ यह है  कि जहां क्रोध और किसी के प्रति द्वेष की भावना होगी, वहां मन की शुभता में कमी आएगी, जिससे वास्तविक लक्ष्मी की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होगी। यानी किसी भी प्रकार की मानसिक विकृतियां लक्ष्मी की प्राप्ति में रुकावट हो सकती हैं।

6  आचार्य धनवंतरी के बताए गए मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी उपाय अपनाना ही धनतेरस का प्रयोजन है। श्री सूक्त में वर्णन है कि, लक्ष्मी जी भय और शोक से मुक्ति दिलाती हैं तथा धन-धान्य और अन्य सुविधाओं से युक्त करके मनुष्य को निरोगी शरीर और लंबी आयु देती हैं।

जाने धनतेरस की पूजा का शुभ मुहूर्त और महत्त्व !!

कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाया जाता है। यह छोटी दिवाली से एक दिन पहले आता है इस साल धनतेरस का पर्व 10 नवंबर, 2023 शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा ।

कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र-मंन्थन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है।

इस दिन भगवान धनवंतरि की पूजा की जाती है और इस दिन सोना, चांदी के आभूषण और बर्तन आदि चीजें खरीदना शुभ माना जाता है।

 धनतेरस पर पूजा का शुभ मुहूर्त

  • धनतेरस पूजा मुहूर्त – शाम 06:20 से रात 08:20 तक
  • त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 10, 2023 दोपहर 12:35 बजे
  • त्रयोदशी तिथि समाप्त – नवम्बर 11, 2023 दोपहर 01:57 बजे

धनतेरस का महत्व

दिवाली से पहले धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन लोग सोने-चांदी और बर्तनों की खरीदारी करते हैं। कार्तिेक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन के दौरान हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।

तभी से इस दिन बर्तन खरीदने का बहुत अधिक महत्व है। इस दिन विशेषकर पीतल और चांदी से बने बर्तन खरीदना बहुत शुभ माना जाता है।

पीतल को भगवान धन्वंतरि जी की धातु माना जाता है। पीतल व्यक्ति को आरोग्य, सौभाग्य और स्वास्थ्य संबंधी लाभ प्रदान करती है। इस दिन धन के देवता कुबेर का भी पूजन किया जाता है।

चांदी खरीदना माना जाता है शुभ

‘धनतेरस‘ के दिन लोग घरेलू बर्तन खरीदते हैं, वैसे इस दिन चांदी खरीदना शुभ माना जाता है क्योंकि चांदी चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है,और चन्द्रमा शीतलता का मानक है, इसलिए चांदी खरीदने से मन में संतोष रूपी धन का वास होता है क्योंकि जिसके पास संतोष है वो ही सही मायने में स्वस्थ, सुखी और धनवान है।

वाल्मीकि जयंती : जानिए आदिकवि महर्षि वाल्मीकि से जुड़ी रोचक बातें

महर्षि वाल्मीकि को प्राचीन वैदिक काल के महान ऋषियों की श्रेणी में प्रमुख स्थान प्राप्त है। पुराणों के अनुसार, उन्होंने कठोर तपस्या कर महर्षि का पद प्राप्त किया था। परमपिता ब्रह्मा के कहने पर उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित “रामायण” नामक महाकाव्य लिखा। इन्हें “आदिकवि” भी कहा गया है।

इनके द्वारा रचित आदिकाव्य “रामायण” संसार का सर्वप्रथम काव्य माना गया है। महर्षि वाल्मीकि की जंयती पर आइए जानते है उनके जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें।

आदि काव्य रामायण के रचयिता और संस्कृत भाषा के परम ज्ञानी महर्षि वाल्मीकि की जंयती को देश भर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। महर्षि वाल्मीकि जयंती अश्विन मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है, इस बार वाल्मीकि की जयंती 28 अक्तूबर को है।

महर्षि वाल्मीकि के द्वारा संस्कृत भाषा लिखी गई रामायण को सबसे प्राचीन माना जाता है। रामायण महाकाव्य लगभग 21 भाषाओं में उपलब्ध है। संस्कृत के प्रथम महाकाव्य की रचना करने के कारण इन्हें “आदिकवि” भी कहा जाता है। महर्षि वाल्मीकि की लिखी गई रामायण पूरे विश्व में विख्यात है।

महर्षि वाल्मीकि का जीवन चरित्र

एक पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि बनने से पहले वाल्मीकि रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे तथा परिवार के पालन हेतु वह लोगों को लूटा करते थे।

एक बार उन्हें “निर्जन वन” में नारद मुनि मिले, तो रत्नाकर ने उन्हें लूटने का प्रयास किया। तब नारद जी ने रत्नाकर से पूछा कि- तुम यह कार्य क्यों करते हो, इस पर रत्नाकर ने उत्तर दिया और बोले कि अपने परिवार को पालने के लिए।

इस पर नारद जी ने प्रश्न किया कि तुम जो भी कार्य करते हो और जिस परिवार को पालन के लिए तुम इतने अपराध करते हो, क्या वह तुम्हारे पापों का भागीदार बनने को तैयार होंगे।

इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए रत्नाकर, नारद को पेड़ से बांधकर अपने घर गए। वहां जाकर वह यह जानकर हैरान रह गए कि परिवार का कोई भी व्यक्ति उसके इस पाप का भागीदार बनने को तैयार नहीं है। लौटकर उन्होंने नारद के चरण पकड़ लिए।

तब नारद मुनि ने कहा कि- हे रत्नाकर, यदि तुम्हारे परिवार वाले इस कार्य में तुम्हारे भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों उनके लिए यह पाप करते हो। इस तरह नारद जी ने इन्हें सत्य के ज्ञान से परिचित करवाया।

नारद मुनि से मिलकर और अपने परिवार वालों की बातें सुनकर रत्नाकर की आंखें खुल गईं थीं उन्होंने अन्याय और पाप की दुनिया तो छोड़ दी, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि आगे क्या करना चाहिए।

ऐसे में उन्होंने नारद से ही पूछा कि वह क्या करे। तब नारद ने उसे ‘राम’ नाम का जाप  करने की सलाह दी। परंतु वह ‘राम’ नाम का उच्चारण नहीं कर पाते थे।

तब नारद जी ने विचार करके उनसे मरा-मरा जपने के लिए कहा और मरा रटते-रटते यही ‘राम’ हो गया और निरंतर जप करते-करते हुए वह ऋषि वाल्मीकि बन गए।

कहते हैं कि रत्नाकर ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिस वजह से उसके शरीर पर चीटियों ने बाम्भी बना दी।  इस वजह से उनका नाम वाल्मीकि पड़ा।

वाल्मीकि को कैसे मिली रामायण लिखने की प्रेरणा

रामायण के अनुसार, एक बार महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर गए। वाल्मीकि क्रौंच पक्षी के एक जोड़े को निहार रहे थे। वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि एक शिकारी ने प्रेम-मग्न क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी को मार दिया।

इस पर मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके विलाप को सुनकर वाल्मीकि की करुणा जाग उठी और उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ा।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकं वधीः काममोहितम्॥

इसका अर्थ यह है कि, “हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी शांति न मिले और तुझे भी वियोग झेलना पड़े”। जब महर्षि वाल्मीकि अपने आश्रम पहुंचे तब भी उनका ध्यान उस श्लोक की ओर ही था।

तभी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में भगवान ब्रह्मा आए और उनसे कहा कि- आपके मुख से निकला यह छंदोबद्ध वाक्य (गाया जाने वाला) श्लोक रूप ही होगा। मेरी प्रेरणा से ही आपके मुख से ऐसी वाणी निकली है। अत: आप श्लोक रूप में ही श्रीराम के संपूर्ण चरित्र का वर्णन करें।

इस प्रकार ब्रह्माजी के कहने पर महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य की रचना की और “आदिकवि वाल्मीकि” के नाम से अमर हो गये। रामायण में भगवान वाल्मीकि द्वारा 24,000 श्लोक लिखे गए हैं।

अपने महाकाव्य “रामायण” में उन्होंने अनेक घटनाओं के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के भी प्रकाण्ड ज्ञाता थे।

जानिए कब है अहोई अष्टमी, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा की विधि !!!

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन रखा जाता है। करवा चौथ के व्रत की तरह ही यह व्रत भी निर्जल रहकर रखने का विधान वर्णित है।

अहोई अष्टमी का त्यौहार हिंदू धर्म में बहुत ही खास माना गया है क्योंकि अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना से रखती हैं।

वहीं जो महिलाएं संंतान प्राप्ति की चाह रखती हैं उनके लिए भी अहोई अष्टमी का व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण और फलदायी माना गया है।  इस साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है।

Ahoi Ashtami

अहोई अष्टमी के शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार इस साल यह तिथि 4 नवंबर की मध्यरात्रि को शुरू होगी और 5 नवंबर की रात 3 बजकर 19 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार अहोई अष्टमी का व्रत 5 नवंबर को रखा जाएगा।

अहोई अष्टमी के दिन पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 33 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 52 मिनट तक रहेगा। चूंकि यह व्रत तारों को देखने के बाद खोलते हैं। ऐसे में तारों के दर्शन के लिए मुहूर्त शाम 5 बजकर 58 मिनट है।

अहोई अष्टमी का महत्व

माताओं के लिए कार्तिक मास की अष्टमी तिथि बहुत ही खास होती है क्योंकि इस दिन अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। माताएं यह व्रत संतान की लंबी उम्र और बेहतर स्वास्थ्य के लिए रखती हैं।

इस दिन अहोई माता का पूजन किया जाता है और दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद रात्रि में तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करते हैं। कहते हैं कि अहोई अष्टमी का व्रत रखने से बच्चों पर आने वाले सभी संकट दूर होते हैं और उन्हें जीवन में तरक्की मिलती है।

वहीं जो महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना रखती हैं उनके लिए भी अहोई का व्रत बहुत ही फलदायी माना गया है। इस व्रत को रखने से संतान प्राप्ति की कामना पूरी होती है।

ऐसे करें अहोई माता की पूजा

  • सुबह के समय जल्दी उठकर सबसे पहले स्नान आदि करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • अब मंदिर की दीवार पर गेरू और चावल से अहोई माता यानी कि मां पार्वती और स्याहु व उसके सात पुत्रों का चित्र बनाएं। आप चाहें तो बाज़ार में मिलने वाले पोस्टर का इस्तेमाल भी कर सकती हैं।
  • अब एक नए मटके में पानी भरकर रखें, उस पर हल्दी से स्वास्तिक बनाएं, अब मटके के ढक्कन पर सिंघाड़े रखें।
  • घर में मौजूद सभी बुजुर्ग महिलाओं को बुलाकर सभी के साथ मिलकर अहोई माता का ध्यान करें और उनकी व्रत कथा पढ़ें। सभी के लिए एक-एक नया परिधान भी रखें। कथा खत्म होने के बाद परिधान को उन महिलाओं को भेंट कर दें।
  • रखे हुए मटके का पानी खाली ना करें इस पानी से दीवाली के दिन पूरे घर में पोंछा लगाएं। इससे घर में बरकत आती है।
  • रात के समय सितारों को जल से अर्घ्य दें और फिर ही उपवास को खोलें।

क्या वजह है पति का चेहरा छननी से देखने की और क्यों की जाती है चंद्रमा की पूजा ?

करवा चौथ हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। यह भारत के पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान का पर्व है। यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।

यह पर्व सुहागिन स्त्रियाँ मनाती हैं। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है।

करवा चौथ व्रत पति-पत्नी के रिश्ते को अधिक मजबूत करने वाला पर्व है। इस दिन चंद्रमा की पूजा की जाती है। करवा चौथ व्रत का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व होता है। इस दिन पूजा करने पर पति की आयु भी लंबी होती है।

आखिर क्या वजह है पति का चेहरा छननी से देखने की

करवा चौथ की पूजा के दौरान सुहागन महिलाएं चाँद को देखने से पहले छननी में सबसे पहले दीपक रखती हैं और फिर चांद का दीदार करती हैं और फिर पति का चेहरा देखती हैं।

इसके बाद पति अपनी पत्नी को पानी पिलाकर मिठाई खिलाकर व्रत को पूरा करते हैं। करवा चौथ के व्रत में महिलाएं निर्जल व्रत रखती हैं, इसलिए इसे निर्जला व्रत भी कहा जाता है।

क्यों की जाती है चंद्रमा की पूजा

करवा चौथ व्रत कुवांरी लड़कियां भी करती हैं, जिनकी शादी की उम्र हो चुकी है या शादी होने वाली है। करवा चौथ महज एक व्रत नहीं है, यह पति-पत्नी के रिश्ते को अधिक मजबूत करने वाला पर्व भी है।

चंद्रमा को आयु, सुख और शांति का कारक माना जाता है और इनकी पूजा से वैवाहिक जीवन सुखमय बनता है और पति की आयु भी लंबी होती है। यही कारण है करवाचौथ को चंद्रमा की पूजा की जाती है ।

क्यों लगती हैं महिलाएं मांग में सिंदूर, जाने कुछ रोचक तथ्य

हिन्दू धर्म के अनुसार सिंदूर का बेहद खास महत्व है, यह एक विवाहिता के लिए उसके सुहाग की निशानी होती है। जब भी हम किसी विवाहित स्त्री को देखते हैं तो उसकी मांग में सिंदूर जरूर लगा दिखाई देता है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि पति की लंबी उम्र के लिए मांग में सिंदूर भरा जाता है। इस सिंदूर को ना केवल शादी के प्रतीक के रूप में लगाया जाता है बल्कि इसे लगाने के पीछे और भी कई कारण हैं जो आज हम आपको बताने जा रहे हैं। तो चलिए जानते हैं :-

महत्व

हिन्दू परंपरा के अनुसार एक शादीशुदा औरत को सिंदूर के बिना अधूरा माना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में सिंदूर का आध्यात्मिक महत्व माना जाता है।

सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए इसे मांग में सजाती हैं। हमारी सभ्‍यता से जुड़े सभी धार्मिक कार्यों में भी सिंदूर का प्रयोग किया जाता रहा है।

सुहागन के 16 श्रृंगार में एक सिंदूर अखंड सुहागन होने की निशानी होती है। ऐसी मान्यता है कि सिंदूर लगाने से पति की आयु और स्त्री के सौभाग्य में वृद्धि होती है।

कैसे बनता सिंदूर

सिंदूर कमीला जतन नामक पौधे की फली में से निकलता है। यह वृक्ष 20 से 25 फीट ऊंचे होते हैं जिसमें फली गुच्छे के रूप में लगती है। फली का आकार मटर की फली की तरह होता है यह वृक्ष शरद ऋतु में इन फलियों से लद जाता है।

इन फलियों के अंदर सरसों के आकार से थोड़े मोटे दाने होते हैं जो लाल रंग के होते हैं जिससे विशुद्ध सिंदूर निकलता है। कमीला को रोरी, सिंदूरी, कपीला, कमूद, रैनी, सेरिया आदि नामों से भी जाना जाता है।

धार्मिक कारण

सिंदूर लगाने की परंपरा का प्रमाण रामायण काल में मिलता है। कहा जाता है कि माता सीता रोज श्रृंगार करते समय मांग में सिंदूर भरती थीं।

एक बार हनुमान जी ने माता सीता से पूछा कि वे रोज सिंदूर क्यों लगाती हैं? तो सीता ने बताया कि भगवान राम को सिंदूर बेहद पसंद है।

इससे उन्हें प्रसन्नता होती है और उनका मन प्रसन्न होता है। प्रसन्नता शरीर और स्वास्थ्य के लिए वरदान है और स्वस्थ रहने से व्यक्ति की आयु बढ़ती है।

इस तरह सिंदूर लगाने से पति की आयु बढ़ती है और इसी समय से सुहागिनों में सिंदूर से मांग भरने प्रथा शुरू हो गई।

वैज्ञानिक कारण

महिलाएं जिस स्थान पर सिंदूर लगाती हैं वह स्थान ब्रह्मरन्ध्र और अध्मि नामक कोमल स्थान के ठीक ऊपर होता है। सिंदूर में मौजूद तत्व इस स्थान से शरीर में मौजूद वैद्युतिक उर्जा को नियंत्रित करती है। इससे बाहरी दुष्प्रभाव से भी बचाव होता है।

माना जाता है कि सिंदूर के माध्यम से ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है। ये मन को शांत रखता है जिससे स्वास्थ भी अच्छा रहता है। यह दिमाग शांत रखने में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

घरेलू उपाय: करवा चौथ के लिए चाहिए स्पेशल लुक, तो घर पर बनाएं ये 5 फेस पैक

“करवा चौथ” हर महिला के लिए एक खास दिन होता है। यह दिन उन महिलाओं के लिए और भी खास है जो शादी के बाद पहली बार करवा चौथ का व्रत रख रही हैं।

इस दिन, सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए उपवास करती हैं। इस व्रत के लिए महिलाओं की तैयारी कुछ सप्ताह पहले से शुरू हो जाती है।

इस दिन महिलाएं अपने हाथों पर मेहंदी लगाती हैं और लाल रंग की विशेष पोशाक पहनती हैं। कई महिलाएं करवा चौथ के दिन अपने लुक को खास बनाने के लिए ब्यूटी पार्लरों में भी जाती हैं।

करवा चौथ पर हर महिला खूबसूरत और ग्लैमरस दिखना चाहती है लेकिन इसके लिए आपको पार्लर जाकर पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है।आप घर पर भी प्राकृतिक तरीकों से आपने आप को एक खूबसूरत लुक दे सकती हैं।

इसके लिए आप घर पर ही प्राकृतिक चीज़ों से फेस पैक बना सकती हैं। ये चीजें आपको घर पर आसानी से मिल जाएँगी या फिर आप इन्हें ऑनलाइन भी मंगवा सकते हैं। यह आपकी त्वचा को पोषक तत्व प्रदान करता है और कोई नुकसान भी नहीं पहुँचती।

Karwa-Chauth

चावल का आटा और चंदन का फेस पैक

किराने की दुकान से चावल का आटा खरीदें या आप घर पर भी येआटा बना सकती हैं। आप इस आटे को स्क्रब के रूप में भी इस्तेमाल कर सकती हैं।

पैक बनाने के लिए एक चम्मच चावल का आटा, आधा चम्मच चंदन पाउडर और एक बड़ा चम्मच गुलाब जल मिलाएं। इस पेस्ट को चेहरे पर पांच मिनट के लिए लगाएं, फिर ठंडे पानी से अपने चेहरे को धो लें।

दही और हल्दी का फेस पैक

यह फेस पैक त्वचा की रंगत और बनावट में सुधार करने में मदद करता है साथ ही टैनिंग की समस्या को भी दूर करता है जिससे त्वचा कोमल और मुलायम हो जाती है।

फेस पैक बनाने के लिए आधा चम्मच हल्दी में दो बड़े चम्मच दही मिलाएं। पेस्ट तैयार होने के बाद इसे चेहरे पर लगाएं और सूखने के बाद अपने चेहरे को ठंडे पानी से धो लें।

चंदन का फेस पैक

चंदन में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं। चंदन से चेहरे पर पिम्पल्स और मुँहासे के निशान से छुटकारा मिलता है।

इसके लिए दो से तीन बूंदें चंदन का तेल, बादाम का तेल और एक चम्मच शहद मिलाएं। मिश्रण तैयार होने के बाद इसे चेहरे पर 15 से 20 मिनट के लिए लगाएं। लेप सूखने के बाद त्वचा को ठन्डे पानी से धो लें।

शहद और नींबू का फेस पैक

नींबू में पोषक तत्व होते हैं जो डेड स्किन की समस्या को खत्म करने का काम करते हैं लेकिन नींबू का रस सीधे चेहरे पर लगाने की गलती कभी न करें।

इससे त्वचा को नुकसान हो सकता है। वहीं शहद में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो आपकी त्वचा को गहराई से साफ़ करने और चेहरे को एक प्राकृतिक चमक देने में मदद करता है।

फेस पैक बनाने के लिए एक कटोरी में एक चम्मच शहद और एक चम्मच नींबू का रस मिलाएं। इस मिश्रण को त्वचा पर कुछ मिनटों के लिए लगाएं और ठंडे पानी से चेहरे को धो लें।

ओटमील, हल्दी और चंदन का फेस पैक

दलिया सनटैन और डेड स्किन की समस्याओं से छुटकारा पाने में मदद करता है।  इसके लिए आप  ओटमील, चंदन और हल्दी का फेस पैक बनाएं और इसे चेहरे पर लगाएं।

यह फेस पैक त्वचा को चमकदार बनाने में मदद करता है। इसके लिए आप  एक कटोरी में उबले हुए ओटमील का एक बड़ा चमचा, दो से तीन बूंद चंदन का तेल, एक चुटकी हल्दी और गुलाब जल मिलाएं।

फेस पैक तैयार करने के बाद, इसे त्वचा पर लगाएं और धीरे से अपने हाथों से त्वचा की मालिश करें। लेप सूखने के बाद अपने चेहरे को ठंडे पानी से धो लें।

करवा चौथ 2023: ​​जानिए राशि के अनुसार किस रंग के कपड़े पहने 

करवा चौथ का शुभ अवसर इस साल 1 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं।

महिलाएं, विशेष रूप से शाम की पूजा के दौरान, अपने बेहतरीन पोशाक पहनती हैं, और अपनी हथेलियों पर मेहंदी भी लगाती हैं। तो करवा चौथ पर आपको कौन से रंग पहनने चाहिए और किन रंगों से बचना चाहिए?

इस पोस्ट के माध्यम से हम जानेगें कि राशि के अनुसार करवा चौथ पर किस रंग के कपड़े पहनें :-

मेष राशि

मेष राशि के लोग स्वभाव से साहसी होते हैं और इनका ग्रह मंगल होता है। मंगल ग्रह का रंग लाल होता है। यदि आपकी राशि मेष है तो करवा चौथ के दिन आपको लाल रंग के कपड़े पहनने।

यदि आप इस रंग के या इससे मिलते जुलते रंगों के कपड़े पहनती हैं तो ये आपके वैवाहिक जीवन के लिए बहुत शुभ होगा। लाल रंग को प्रेम का रंग भी माना जाता है, इसलिए ये रंग आपसी प्रेम को बढ़ाने में मदद करेगा।

वृषभ राशि

वृषभ राशि को शुक्र द्वारा संचालित ग्रह माना जाता है। यदि आपकी राशि वृषभ है तो आपको करवा चौथ के दिन गुलाबी रंग के कपड़े पहनने चाहिए।

यह रंग आपके लिए बहुत शुभ होगा और आपके रिश्तों में सामंजस्य बनाने में मदद करेगा। यह रंग आपके व्यक्तित्व को भी निखारने में मदद करेगा।

मिथुन राशि

मिथुन राशि वाले शांतचित्त स्वभाव के होते हैं। यदि आप करवा चौथ पूजा में हरे रंग के कपड़े पहनती हैं तो उत्साह को बढ़ाएगा। आप हरे से मिलते-जुलते शेड्स भी पहन सकती हैं।

ये रंग आपके जीवन में शांति लाने में और वैवाहिक जीवन में प्रेम बढ़ाने में मदद करेंगे। जीवनसाथी के साथ प्रेम और उनकी अच्छी सेहत के लिए यह रंग बहुत शुभ होगा।

कर्क राशि

कर्क राशि का स्वामी ग्रह चन्द्रमा है, इसलिए अगर आप करवा चौथ के दिन आइवरी रंग ( हल्के पीले रंग ) के कपड़े पहनती हैं तो आपके लिए शुभ होगा। यह रंग चन्द्रमा का रंग माना जाता है और शांति को दिखाता है। आप यदि इसी रंग के कपड़े पहनकर करवा चौथ की पूजा कर रही हैं तो रिश्ते में सामंजस्य बना रहता है।

सिंह राशि

सिंह राशि के लोगों के लिए बैंगनी रंग बहुत शुभ माना जाता है और यदि आप करवा चौथ के दिन इसी रंग के कपड़े पहनती हैं तो आपके लिए बहुत शुभ होगा। इस रंग से आपको सौभाग्य का आशीष मिलेगा और प्रेम बना रहेगा।

कन्या राशि

कन्या राशि के लिए शुभ रंग पीला माना जाता है। पीला रंग खुशी और हंसी से जुड़ा होता है। यदि आप करवा चौथ के दिन इस रंग के कपड़े पहनती हैं तो जीवन में सदैव खुशहाली बनी रहती है। यह रंग आपके जीवनसाथी के साथ संबंधों में मजबूती लाने में मदद करता है।

तुला राशि

तुला राशि शुक्र गृह द्वारा शासित होती है और इनका शुभ रंग नीला होता है। यदि आप नीले रंग के कपड़े पहनती हैं या फिर मजेंटा रंग के कपड़े करवा चौथ के दिन पहनती हैं तो ये आपके लिए शुभ होगा। मैजेंटा रंग भी प्रेम का रंग माना जाता है और यह शांति प्रदान करने वाला रंग है।

वृश्चिक राशि

वृश्चिक राशि की महिलाओं के लिए करवा चौथ के दिन भगवा रंग के कपड़े पहनना शुभ होगा यानी कि केसरिया रंग आपके रिश्तों में प्रेम बढ़ाने में मदद करेगा। अगर आपकी राशि वृश्चिक है तो आप करवा चौथ के दिन इसी रंग के कपड़े पहनें।

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धनु राशि

धनु राशि का स्वामी बृहस्पति को माना जाता है। धनु राशि के लोग मिलनसार होते हैं और प्रकृति का अवलोकन करना पसंद करते हैं। इस साल करवा चौथ पर यदि आप पीले रंग के कपड़े पहनेंगी तो आपके लिए शुभ होगा और जीवन में प्रेम का संचार होगा।

मकर राशि

शनि ग्रह द्वारा शासित मकर राशि की महिलाओं को करवा चौथ के उत्सव के दौरान फिरोजी रंग के कपड़े पहनने की सलाह दी जाती है और ऐसा माना जाता है कि यह रंग उनके जीवन में शांति ला सकता है।

आप इस दिन नीले रंग के कोई भी शेड के कपड़े पहनेंगी तो आपके लिए शुभ होगा। यह रंग किसी भी नकारात्मक ऊर्जा को कम करने में मदद करता है।

कुंभ राशि

कुंभ राशि पर भी शनि का शासन होता है और उन्हें करवा चौथ के दिन बैंगनी या लैवेंडर रंग के कपड़े पहनने की सलाह दी जाती है, जिससे उनके रिश्ते अच्छे बने रहें। यदि आपकी राशि कुंभ है तो ये रंग आपके जीवन में खुशहाली ला सकते हैं।

मीन राशि

मीन राशि के लोगों के लिए करवा चौथ के दिन यदि आप लाल या चेरी रंग के कपड़े पहनती हैं तो आपके वैवाहिक जीवन के लिए बहुत शुभ माना जाता है। यह रंग रिश्तों में प्रेम को बढ़ाने का संकेत देते हैं।