स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहतमंद भी हैं ये 10 खाद्य पदार्थ

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हम सभी को पोषण की जरूरत होती है, ताकि शरीर का विकास हो सके और हम स्वस्थ रह सकें। ये पोषक तत्व हमें खाने-पीने की चीजों से मिलते हैं। ज्यादातर लोगों को लगता है कि हेल्दी चीजें हमेशा कम स्वादिष्ट होती हैं। इसलिए वो हेल्दी चीजें खाना कम पसंद करते हैं। मगर बहुत से ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहतमंद भी हैं।

आज हम आपको इस पोस्ट में कुछ ऐसे ही खाद्य पदार्थों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहतमंद भी हैं तो चलिए शुरू करते हैं :

एवोकाडो

एवोकाडो एक ऐसा फल है जिसे सेहत और सुंदरता दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। एवोकाडो को एलीगेटर नाशपाती (Alligator Pears) के रूप में भी जाना जाता है। एवोकाडो को सबसे ज्यादा सलाद के रूप में कच्चा खाया जाता है। ये खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है।

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एवोकाडो ​​में कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, पोटैशियम, जिंक, मैंग्नीज, फॉस्फोरस और कॉपर जैसे गुण पाए जाते हैं, जो शरीर को कई लाभ पहुचाने में मदद कर सकते हैं। एवोकाडो का सलाद खाने से वजन को कम करने में मदद मिल सकती है।

चिया सीड्स

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चिया के बीज, जिसे वैज्ञानिक रूप से “साल्विया हिस्पानिका” के रूप में जाना जाता है। इसे सबसे अच्छे सुपरफूड्स के रूप में भी जाना जाता है। ये बीज कैल्शियम, एंटीऑक्सीडेंट, प्रोटीन, फाइबर और ओमेगा-3 फैटी एसिड के लिए जाने जाते हैं। यह एंटीऑक्सीडेंट, कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, मैंगनीज, आयरन, नियासिन और जिंक से भी भरपूर होता है।

चिया सीड को पानी में डुबोकर खाने से ब्लड ग्लूकोज कंट्रोल में रखने में मदद मिल सकती है। चिया सीड्स में कैल्शियम होता है और दूध में भी होता है, इसलिए अगर आप दूध में चिया सीड्स डालकर खाते हैं तो आपकी हड्डियां मजबूत होती हैं।

बेल मिर्च

बाजार में हमें लाल, पीली, बैंगनी, नारंगी और हरी रंग की शिमला मिर्च नजर आती है। जहां इसे हिंदी में शिमला मिर्च कहा जाता है, तो इंग्लिश में कैप्सिकम और बेल पेपर (Bell Pepper) कहा जाता है।

शिमला मिर्च की मुख्य रूप से पांच प्रजातियां पाई जाती हैं, जिसे कैप्सिकम एनम, कैप्सिकम चिनेंस, कैप्सिकम फ्रूटसेन्स, कैप्सिकम बैक्टम, और कैप्सिकम प्यूबसेंस कहा जाता है। अगर सेहत के लिहाज से शिमला मिर्च की बात करें, तो इस मामले में भी यह बहुत फायदेमंद है।

Bell-peppers

शिमला मिर्च बहुत स्वादिष्ट होती है। अपने अद्भुत स्वाद के साथ-साथ यह विटामिन सी, विटामिन ए और फाइबर का अच्छा स्रोत है। इनमें एंटीऑक्सीडेंट गुण भी होते हैं, जो हृदय रोग और कुछ कैंसर जैसी बीमारियों से बचाने में मदद कर सकते हैं।

केल

केल एक हरी पत्तेदार सब्जी है, जिसे लीफ कैबेज भी कहते हैं। यह सिर्फ हरा ही नहीं, बल्कि बैंगनी रंग में भी पाया जाता है। इसे पत्तेदार सब्जियों की श्रेणी में रखा गया है।

यह पोषक तत्वों से भरपूर होता है, साथ ही इसका स्वाद भी काफी अच्छा होता है। इसका उपयोग अधिकतर सलाद के रूप में किया जाता है। यह ब्रोकली, पत्तागोभी और फूलगोभी के ही परिवार का है। केल पौष्टिक खाद्य पदार्थों में से एक है।

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इसमें विटामिन (ए, सी, के), कैल्शियम, पोटैशियम, फाइबर और कई अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो आपको स्वस्थ रखने का काम कर सकते हैं। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट गुण शरीर की कोशिकाओं की क्षति का बचाव कर कैंसर के जोखिम को कम कर सकते हैं।

सालमन फिश

सालमन फिश समुद्री और ताजे पानी में पाई जाने वाली मछली की एक प्रजाति है। सालमन फिश का रंग आमतौर पर गुलाबी होता है और भुनने के बाद ये मछली नारंगी रंग की हो जाती है। सैलमन मछली एक अत्यधिक पौष्टिक मात्रा में भरपूर होने के साथ-साथ स्वादिष्ट भी होती है।

हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक सालमन मछली कई न्यूट्रिएंट्स से भरा हुआ एक खजाना है, जिसमें विटामिन, मिनिरलिस के साथ-साथ विटामिन बी 12 और ओमेगा-3 फैटी एसिड भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है।

Salmon-Fish

सालमन मछली कैंसर होने से रोकने, मेटाबॉलिज्म को बढ़ाने, दिल की सेहत, मेंटल हेल्थ, हड्डी, स्किन और आंखों का स्वास्थ्य आदि जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए भी कारगर है।

क्विनोआ (बथुआ)

क्विनोआ को ‘चिनोपोडियम क्विनोआ’ के नाम से जाना जाता है। भारत में बथुआ के नाम से जाना जाता है। यह एक फूलदार पौधा है। यह ऊंचाई में करीब एक से दो मीटर तक बढ़ता है। मुख्य रूप से इसके बीजों को खाने के लिए उपयोग में लाया जाता है।

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इसमें कई औषधीय गुण पाए जाते हैं। क्विनोआ में फाइबर, कैल्शियम, प्रोटीन और पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। यह कहने में बहुत ही स्वादिष्ट होता है।

यहेजकेल ब्रेड

ईजेकील ब्रेड अंकुरित साबुत अनाज और फलियों से बनाई जाती है। ईजेकील ब्रेड में साबुत अनाज – जैसे गेहूं, जौ, बाजरा, और पोषक तत्वों से भरपूर फलियां – जैसे सोयाबीन और दाल शामिल होते हैं। इसमें सबसे अधिक फाइबर, विटामिन, खनिज, स्वस्थ वसा और सबसे कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है। यह खाने में जितनी स्वादिष्ट होती है उतनी ही हेल्दी भी।  इसको खाने से कोलेस्‍ट्रोल और वजन ठीक रहता है।

दालें

दालें कई प्रकार के होती हैं, जैसे मसूर, मूंग, अरहर, आदि, इन सभी दालों का सेवन सेहत को कई लाभ पहुंचाता है क्योंकि सभी दाल पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं।

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दाल में सबसे ज्यादा प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है, साथ ही दाल में कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, आयरन और विटामिन्स भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसलिए अगर आप दाल का सेवन करते हैं, तो इससे स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं दूर होती है। साथ ही शरीर स्वस्थ भी रहता है।

दही

दूध में जीवित बैक्टीरिया मिलाकर दही बनाया जाता है। वैसे तो हम किसी भी समय दही का सेवन कर लेते हैं परन्तु दही खाने का सही समय सुबह होता है।

सुबह नाश्ते में दही खाने से सेहत को कई लाभ मिलते हैं। दही में विटामिन, कैल्शियम, प्रोटीन, आयरन, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम और फोलिक एसिड जैसे कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं।

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ये सभी पोषक तत्व सेहत के लिए काफी फायदेमंद माने जाते हैं। रोज सुबह नाश्ते में दही खाने से शरीर को जरूरी पोषण और एनर्जी मिलती है।

दही में काफी अधिक मात्रा में प्रोबायोटिक्स मौजूद होते हैं, जो आंत में अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद करते हैं। नाश्ते में दही खाने से शरीर को हेल्दी रखने के साथ-साथ वजन घटाने में भी मदद मिल सकती है।

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नारियल का तेल

नारियल का तेल बालों, त्वचा के साथ ही सेहत के लिए भी लाभदायक होता है। आयुर्वेद के अनुसार नारियल के तेल को पित्त प्रकृत्ति के लोगों के लिए बेहद अच्छा माना जाता है।

दरअसल, नारियल के तेल की तासीर ठंडी होती है, जो पित्त को शांत करके शरीर को ठंडक देता है। इसके तेल में खाना बनाया जा सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक होता है।

नारियल के तेल में खाना बनाने से यह दिल को स्वस्थ रखता है, इम्यूनिटी बढ़ाता है और वजन कम करने में मदद करता है और पित्त प्रकृत्ति के लोगों के लिए भी फायदेमंद होता है। इससे खाना बेहद स्वादिष्ट और पौष्टिक बनता है।

 

गणेश चतुर्थी के दिन जरूर करें ये काम मिलेगा शुभ फल

सनातन धर्म के त्योहारों में गणेश चतुर्थी एक मुख्य त्यौहार है जो भाद्रपद शुक्लपक्ष चतुर्थी के दिन मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन गणेश जी दोपहर में अवतरित हुए थे, इसलिए यह गणेश चतुर्थी विशेष फलदायी बताई जाती है। पूरे देश में यह त्यौहार गणेशोत्सव के नाम से प्रसिद्ध है लोक भाषा में इस त्यौहार को डण्डा चौथ भी कहा जाता है।

हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विद्या-बुद्धि के प्रदाता, विघ्न-विनाशक, मंगलकारी, सिद्धिदायक, सुख-समृद्धि और यश-कीर्ति देने वाले देवता माना गया है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ‘ॐ’और स्वास्तिक को भी साक्षात गणेश जी का स्वरूप माना गया है। तभी तो कोई भी शुभ कार्य की शुरुआत इनसे ही होती है।

Ganesh Chaturthi festival

पूजा का शुभ मुहूर्त

गणेश चतुर्थी मंगलवार, सितम्बर 19, 2023 को मध्यान गणेश पूजा मुहूर्त –  सुबह 10:59 से 01:25 पी एम तक
अवधि – 02 घण्टे 26 मिनट्स
गणेश विसर्जन बृहस्पतिवार, सितम्बर 28, 2023 को
एक दिन पूर्व, वर्जित चन्द्रदर्शन का समय – 02:09 पी एम से 08:16 पीएम, सितम्बर 18
अवधि – 06 घण्टे 07 मिनट्स
वर्जित चन्द्रदर्शन का समय – 09:25 ए एम से 08:53 पी एम
अवधि – 11 घण्टे 27 मिनट्स
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ – सितम्बर 18, 2023 को 02:09 पी एम बजे चतुर्थी तिथि समाप्त सितम्बर 19, 2023 को 03:13 पी एम बजे

गणेश चतुर्थी व्रत व पूजन विधि

  • व्रती को चाहिए कि प्रातः स्नान करने के बाद सोने, तांबे, मिट्टी की गणेश प्रतिमा लें।
  • चौकी में लाल आसन के ऊपर गणेश जी को विराजमान करें।
  • गणेश जी को सिंदूर व दूर्वा अर्पित करके 21 लडडुओं का भोग लगाएं। इनमें से 5 लड्डू गणेश जी को अर्पित करके शेष लड्डू गरीबों या ब्राह्मणों को बाँट दें।
  • सांयकाल के समय गणेश जी का पूजन करना चाहिए। गणेश चतुर्थी की कथा, गणेश चालीसा व आरती पढ़ने के बाद अपनी दृष्टि को नीचे रखते हुए चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिए।
  • इस दिन गणेश जी के सिद्धिविनायक रूप की पूजा व व्रत किया जाता है।
  • ध्यान रहे कि तुलसी के पत्ते (तुलसी पत्र) गणेश पूजा में इस्तेमाल नहीं हों। तुलसी को छोड़कर बाकी सब पत्र-पुष्प गणेश जी को प्रिय हैं।
  • गणेश पूजन में गणेश जी की एक परिक्रमा करने का विधान है।

Ganesh Chaturthi festival hindi

गणेश चतुर्थी का महत्व

यह 10 दिनों का उत्सव है। गणेश के शरीर के विभिन्न अंगों का अलग महत्व है जिसमें सिर-आत्मान, शरीर- माया, हाथी का सिर- ज्ञान, ट्रंक- ओम का प्रतीक माना जाता है।

मूर्ति विसर्जन

गणपति स्थापना 19 सितम्बर को होगी और 10 के दिन बाद 28 सितम्बर को भगवान गणेश का विसर्जन होगा। इसी दिन लोग ‘गणपति बप्पा मोरिया अगले बरस तू जल्दी आ‘ के जयकारों के साथ गणेश विसर्जन करते हैं। इस दिन ही अनंत चतुदर्शी तिथि भी रहती है। गणेश विसर्जन के साथ ही 15 दिनों का पितृ पक्ष शुरू हो जाता है।

गणेश चतुर्थी के दिन जरूर करें ये उपाए

करे दूर्वा का ये उपाय

दूर्वा गणेश भगवान को अति प्रिय है। उनकी पूजा में दूर्वा का विशेष रूप से इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में आप दूर्वा की 11 गांठ और एक हल्दी की गांठ लेकर उसे पीले कपड़े में बांध दें।

इसके बाद गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक इसकी पूजा करें। इसके बाद इस कपड़े को अपनी तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रख दें। इससे घर में कभी भी धन की कमी नहीं होती।

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धन लाभ के लिए उपाय

गणेश चतुर्थी के शुभ अवसर पर सुबह स्नान करने के बाद भगवान गणेश को गुड़ में देसी घी मिलाकर भोग लगाएं। इसके बाद इसे किसी गाय को खिला दें।

ऐसा करने से व्यक्ति के लिए धन प्राप्ति के योग बनते हैं। वहीं, गणेश चतुर्थी के दिन गुड़ से छोटी-छोटी 21 गोलियां बनाकर गणेश मंदिर में दूर्वा के साथ इन गोलियों को अर्पित करने से मनचाही इच्छा पूरी होती है।

करें गणेश यंत्र की स्थापना

गणेश चतुर्थी के दिन विधिवत रूप से घर के मंदिर में गणेश यंत्र की स्थापना करें। इसके साथ ही नियमित रूप से भगवान गणेश के साथ इस यंत्र की भी पूजा करें। इससे घर में धन-समृद्धि और वैभव की वृद्धि होती है।

इसके साथ ही आप नियमित रूप से गणपति जी का अभिषेक करें। ऐसा करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ जरूर करें।

इनलैंड ताइपन – दुनिया के सबसे ज़हरीले सांपों में से एक

इनलैंड ताइपन (अंतर्देशीय ताइपन) ऑस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली साँप की एक अत्यंत ज़हरीली प्रजाति है जो अपने घातक जहर के लिए जानी जाती है। इनलैंड ताइपन (Inland Taipan) जहरीले सांपों की सूची में सबसे ऊपर आता है। इस सांप का वैज्ञानिक नाम ऑक्सीयूरेनस माइक्रोलेपिडोटस (Oxyuranus Nicrolepidotus) है।

इनलैंड ताइपन को इसके घातक जहर के कारण “भयंकर सांप” भी कहा जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार इसके ज़हर की मात्र दो से तीन बूंदें ही 100 व्यस्क लोगों को मार सकती है और तकरीबन 250,000 चूहों को भी। अंतर्देशीय ताइपन भारत के सबसे ज़हरीले सांप किंग कोबरा से 50 गुना ज़्यादा ज़हरीला होता है।

most poisonous Inland Taipan snake

आकार एवं स्वभाव

अंतर्देशीय ताइपन गहरे भूरे रंग का होता है, जिसमें स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाली शल्कें होती हैं। इस सांप की गर्दन और सिर का रंग आमतौर पर शरीर के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक गहरा होता है।

इसकी एक अनूठी विशेषता यह है कि अंतर्देशीय ताइपन की त्वचा का रंग मौसम के अनुसार बदलता है, गर्मी के महीनों में इसका रंग गहरा भूरा और सर्दियों के महीनों में हल्का पीला हो जाता है। गहरा रंग गर्मियों में इसे ठंडा रखने में मदद करता है। इसी तरह, त्वचा का हल्का रंग इसे सर्दियों के दौरान गर्म रहने में मदद करता है।

इसकी आँखों का आकार बड़ा होता है, जिनमें काले-भूरे रंग की पुतलियां होती हैं। अंतर्देशीय ताइपन की कुल लंबाई औसतन लगभग 1.8 मीटर (5.9 फीट) है, हालांकि एक रिसर्च के दौरान इसकी अत्यधिक लम्बाई 2.5 मीटर (8.2 फीट) मापी गई है। इसके नुकीले दांत 3.5 से 6.2 मिमी लंबे होते हैं।

यह सांप शर्मीले स्वभाव का होता है और ज्यादातर जमीन के नीचे रहना पसंद करता है। दुनिया में सबसे जहरीली साँप प्रजाति होने के बावजूद, अंतर्देशीय ताइपन काफी एकान्तप्रिय होते हैं। जब तक इस सांप को उकसाया न जाए तब तक वह किसी पर हमला नहीं करता है।

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आहार

इनका मुख्य शिकार छोटे चूहे, छिपकलियां और अन्य छोटे स्तनधारी जानवर होते हैं। इनके काटने के बाद इनके शिकार की मौत कुछ ही  मिंटो में ही हो जाती हैं इसके बाद ये इसे पूरा निगल जाते हैं।

यह केवल दिन के शुरुआती घंटों में स्तनधारियों पर हमला करता है। अंतर्देशीय ताइपन काफी फुर्तीला और तेज़ है और स्तनधारियों पर सटीकता से हमला करता है।

प्रजनन प्रक्रिया

इनलैंड ताईपन एक अंडा देने वाला सांप है यह एक बार में ये लगभग एक से दो दर्जन अंडे दे सकते हैं। ये अंडे लगभग दो महीने में फूट जाते हैं। इन्हें आमतौर पर बिलों और गहरी दरारों में रखा जाता है। अंडे से निकले बच्चों की लंबाई तकरीबन आधे फुट से 1 फुट तक के बीच में होती है। इनका जीवनकाल लगभग 10 से 15 साल तक का होता है।

most poisonous Inland Taipan snake sand

ज़हर

अंतर्देशीय ताइपन में प्रीसानेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन और पोस्टसिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन नामक ज़हर पाया जाता है। इस प्रजाति द्वारा वितरित जहर की औसत मात्रा 44 मिलीग्राम है, और दर्ज की गई अधिकतम मात्रा 110 मिलीग्राम है।

इंडलैंड ताइपन के काटने के लक्षणों में सिरदर्द, उल्टी, पेट में दर्द, और लकवा शामिल हैं। इसका ज़हर इतना खतरनाक होता कि मनुष्य के शरीर में प्रवेश करते ही तुरंत मांसपेशियों को जमा देता है।

एक ऐसे ‘इंजीनियर’ जिनके आगे अंग्रेज भी सिर झुकाते थे

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15 सितंबर को प्रतिवर्ष हमारे देश में इंजीनियर्स को सम्मानित करने के लिए राष्ट्रीय अभियंता दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन महान इंजीनियर, भारत रत्न एवं ब्रिटिश नाइटहुड पुरस्कार से सम्मानित डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

भारत सरकार द्वारा साल 1968 में डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जन्मतिथि को ‘अभियंता दिवस’ घोषित किया गया था। उसके बाद से हर साल 15 सितंबर को अभियंता दिवस मनाया जाता है। विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1860 को मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के एक तेलुगु परिवार में हुआ था।

एक इंजीनियर के रूप में डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का विशेष योगदान रहा है। उन्होंने देश में कई बांध बनवाए, जिसमें मैसूर में कृष्णराज सागर बांध, पुणे के खड़कवासला जलाशय में बांध और ग्वालियर में तिगरा बांध आदि महत्वपूर्ण हैं।

सिर्फ यही नहीं, हैदराबाद सिटी को बनाने का पूरा श्रेय डॉ. विश्वेश्वरैया को ही जाता है। उन्होंने वहां एक बाढ़ सुरक्षा प्रणाली तैयार की थी, जिसके बाद पूरे भारत में उनका नाम हो गया। विश्वेश्वरैया को मॉडर्न मैसूर स्टेट का पिता भी कहा जाता था।

इस वजह से अंग्रेज भी एम विश्वेश्वरैया के आगे सिर झुकाते थे

बात उस समय की है जब भारत अंग्रेजी गुलामी का दौर झेल रहा था। उस दौर में मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने अपनी इंजीनियरिंग के कौशल के साथ आम लोगों के हित का ऐसा दौर तैयार किया कि अंग्रेज भी उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह सके।

ब्रिटिश काल के दौरान एक रेलगाड़ी में बहुत से अंग्रेज सवार थे वहीँ एक डिब्बे में एक भारतीय यात्री गंभीर मुद्रा में बैठा था। सांवले रंग और मंझले कद का वह यात्री सादे कपड़ों में था और वहां बैठे अंग्रेज उन्हें अनपढ़ समझकर मजाक उड़ा रहे थे।

अचानक उसने उठकर गाड़ी की जंजीर खींच दी। ट्रेन कुछ ही पलों में रुक गई। सभी यात्री चेन खींचने वाले को भलाबुरा कहने लगे।

थोड़ी देर में गार्ड आ गया और सवाल किया कि जंजीर किसने खींची तो उसने उत्तर दिया, “मेरा अंदाजा है कि यहां से लगभग कुछ दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है।” गार्ड ने पूछा, “आपको कैसे पता?”

वह बोले, “गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर आया है और इसकी आवाज से मुझे खतरे का आभास हो रहा है।” गार्ड उन्हें लेकर जब कुछ दूर पहुंचा तो देख कर दंग रह गया कि वास्तव में एक जगह से रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए हैं। वह सांवले से व्यक्ति थे – मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया।

15 सितंबर 1860 में मैसूर के कोलार जिले में पैदा हुए डॉ. एम विश्वेश्वरैया के पिता श्रीनिवास शास्त्री संस्कृत के विद्वान और आयुर्वेद चिकित्सक थे। विश्वेश्वरैया की मां का नाम वेंकाचम्मा था।

साधारण परिवार में जन्मे एम विश्वेश्वरैया जब मात्र 12 वर्ष के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया।  परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा था, लिहाजा विश्वेश्वरैया गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ते रहे।

बी.ए. करने के बाद उन्होंने कुछ समय शिक्षक के रूप में भी काम किया। उनकी योग्यता देख मैसूर सरकार ने उन्हें स्कॉलरशिप दी, जिसके बाद उन्होंने पुणे के साइंस कालेज में सिविल इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम में दाखिला लिया और प्रथम स्थान प्राप्त किया। इंजीनियर बनते ही उनकी योग्यता देख महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक जिले के सहायक इंजीनियर के पद पर नियक्त किया।

इंजीनियर के रूप में विश्वेश्वरैया को असली ख्याति मिली पुणे के खड़कवासला बांध की भंडारण क्षमता में बिना ऊंचाई बढ़ाए बढ़ौतरी करने से।

बांधों की जल भंडारण स्तर में वृद्धि करने के लिए विश्वेश्वरैया ने स्वचालित जलद्वारों का उपयोग खड़कवासला बांध पर किया था।

वर्ष 1909 में उन्हें मैसर राज्य का मुख्य अभियंता नियुक्त किया गया। कृष्णराज सागर बांध के निर्माण के कारण मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का नाम पूरे विश्व में सबसे अधिक चर्चा में रहा।

इसका निर्माण स्वतंत्रता के करीब 40 वर्ष पहले हुआ था। वर्ष 1912 में उन्हें मैसूर राज्य का दीवान नियुक्त किया गया। उन्होंने चंदन तेल फैक्टरी, साबुन फैक्टरी, धातु फैक्टरी, क्रोम टेनिंग फैक्टरी प्रारंभ की। बांध निर्माण के साथ-साथ औद्योगिक विकास में भी उनका योगदान कम नहीं है।

वह उन शुरूआती लोगों में से एक थे, जिन्होंने बेंगलूर स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में वैमानिकी एवं इंजीनियरिंग जैसे अनेक विभागों को आरंभ करने का स्वप्न देखा था। वह वर्ष 1918 में मैसूर के दीवान के रूप में सेवानिवृत्त हो गए।

उन्हें 1955 में देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न‘ से नवाजा गया। 101 वर्ष की दीर्घायु में काम करते रहने वाले विश्वेश्वरैया का कहना था कि ‘जंग लग जाने से बेहतर है, काम करते रहना।’

भारत के अलावा इन देशों में मनाया जाता है अभियंता दिवस

अभियंता दिवस सिर्फ भारत में ही नहीं मनाया जाता बल्कि कई अन्य देशों में भी यह दिवस मनाया जाता है। जैसे कि- अर्जेंटीना में 16 जून को, बांग्लादेश में 7 मई को, इटली में 15 जून को, तुर्की में 5 दिसंबर को, ईरान में 24 फरवरी को, बेल्जियम में 20 मार्च को और रोमानिया में 14 सितंबर को अभियंता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

दरअसल, यह दिवस दुनियाभर के इंजीनियरों को प्रोत्साहित करने के लिए मनाया जाता है, ताकि वो देश-दुनिया को अपने हुनर की बदौलत तरक्की की नई राह पर ले जाएं।

भारत का एक खूबसूरत भूतिया बीच जहां पर शाम को टहलना मना है।

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भारत में कई ऐसी जगहें हैं जो बेहद प्रेतबाधित और भूतिया मानी जाती हैं। इन जगहों पर कई लोगों द्वारा भूत-प्रेत देखे जाने का दावा भी किया गया है। इन भूतिया स्थानों पर रात में ठहरने की सख़्त मनाही है और इन्हीं में से एक हैं “डुमस बीच” (Dumas Beach)।

दमस समुद्र तट?

‘डुमस समुद्र तट ’ गुजरात के सूरत एयरपोर्ट से महज 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह बीच दिखने में बेहद सुंदर व आकर्षक है। इस बीच को ‘लवर पॉइंट’ भी कहा जाता है, क्योंकि यहां युवा काफ़ी अधिक संख्या में आते हैं।

ख़ूबसूरती के मामले में इस बीच को भारत का सबसे अच्छा बीच माना जाता है। ख़ासकर तब जब चंद्रमा की छटा इस समुद्र तट की रेत पर पड़ती है, तब इसका दृश्य और भी मनमोहक हो जाता है।

mysterious Damas Beach Gujarat

डुमस बीच की सबसे ख़ास बात यह  है कि यहां की रेत सफ़ेद नहीं, बल्कि काली है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सदियों पहले यहां पर आत्माओं ने अपना बसेरा कर लिया था जिसके कारण यहाँ की रेत काली हो गई।

क्यों कहते हैं इसे भूतिया बीच?

कहा जाता है कि इस बीच पर काले साये का प्रकोप है जिसके चलते शाम ढलते ही लोग अपने अपने घरों को लौट जाते हैं। शाम को अंधेरा होने के बाद से ही इस समुद्र तट पर चीखने-चिल्लाने की आवाजें आने लगती हैं। चीख-पुकार की आवाज काफी दूर से भी सुनी जा सकती है।

कहा जाता है कि इस बीच पर रात के समय जो भी जाता है, वह वापस नहीं लौटता। यह बीच प्राकृतिक सौंदर्य से तो भरपूर है लेकिन इन भूतिया घटनाओं के चलते ज्यादातर वीरान ही रहता है।

Dumas Beach, Gujarat

स्थानीय लोगों के अनुसार काफी पहले इस जगह का इस्तेमाल श्मशान घाट के तौर पर किया जाता था। लोगों की मानें तो यहां पर आज भी कई प्रेत आत्माएं भटकती हैं। लोगों का कहना है कि रात के समय इस स्थान पर कुत्तों के स्वभाव में भी बदलाव आ जाता है। वे कई तरह की अजीबो-गरीब आवाजें निकालने लगते हैं।

डुमस बीच के बारे में यह भी कहा जाता है कि किसी ज़माने में ये नवाबों का बसेरा हुआ करता था, लेकिन वर्तमान में ये बीच मछुवारों का बसेरा है । हालांकि, मछुवारे भी यहां केवल दिन के समय में ही रहते है। रात होते ही वो भी अपने घरों को लौट जाते हैं।

स्थानीय किंवदंती

डुमस बीच के बारे में कई स्थानीय किंवदंतियां प्रचलित है। ऐसी ही एक कहानी दोस्तों के एक समूह की है जो रात के समय समुद्र तट पर टहलने के लिए चले गए और कभी वापिस लौट कर नहीं आये। स्थानीय लोगों द्वारा उन्हें बहुत खोजा गया परन्तु उनका कुछ पता नहीं चला।

कुछ लोगों ने डुमस बीच पर खींची गई तस्वीरों में ओर्ब्स की मौजूदगी के बारे में भी बताया है। ओर्ब्स एक अप्रत्याशित और गोलाकार कलाकृति है जो फ्लैश फोटोग्राफी में होती है। इनका उपयोग चित्र में आत्माओं की उपस्थिति के प्रमाण के रूप में किया जाता है।

लिनक्स (Linux) के जनक लिनस टोरवाल्ड्स के बारे में रोचक तथ्य

लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम(Linux Operating System) के निर्माता लिनस टोरवाल्ड्स(Linus Torvalds) का जन्म 28 दिसंबर, 1969 को हेलसिंकी, फ़िनलैंड में हुआ था। उनके दादाजी के पास कमोडोर VIC-20 था जिसके साथ उन्हें काम करने का अवसर मिला; VIC-20 एक 8-बिट होम कंप्यूटर है जिसे कमोडोर बिजनेस मशीन्स द्वारा बेचा गया था।

लिनस टोरवाल्ड्स महज़ दस साल की उम्र में ही प्रोग्रामिंग में रुचि लेने लगे थे। उन्होंने 1989 में हेलसिंकी विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और 1990 में उन्होंने अपनी पहली सी प्रोग्रामिंग(C-Programming) की पढाई की।

1991 में, टोरवाल्ड्स ने निर्णय लिया कि उनके नए MS-DOS-संचालित पर्सनल कंप्यूटर को एक वैकल्पिक ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकता है। मेहनती और मेधावी टोरवाल्ड्स ने 1 साल में ही इतनी प्रोग्रामिंग सीख ली थी कि उन्होंने एक नया ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने की ठान ली।

Linus Torvalds 2003 में
Linus Torvalds 2003 में – Photo Rights LINUXMAG.com

उनका लक्ष्य एक UNIX जैसा ऑपरेटिंग सिस्टम बनाना था जिसे वह घर पर उपयोग कर सकें। एक मार्गदर्शक के रूप में मैरिस जे. बाख की पुस्तक “डिज़ाइन ऑफ़ द यूनिक्स ऑपरेटिंग सिस्टम” का उपयोग करते हुए, उन्होंने कड़ी मेहनत करते हुए, 22 साल की उम्र में सिस्टम बनाने के लिए पहला काम चलाऊ संस्करण पूरा किया।

उन्होंने अपने सिस्टम को “लिनक्स” कहा, जो UNIX और उसके नाम का संयोजन है। उन्होंने मूल कोड (source code) को इंटरनेट पर निःशुल्क पोस्ट किया। टोरवाल्ड्स का मानना था कि यदि वह सॉफ्टवेयर को मूल कोड मुफ्त डाउनलोडिंग के लिए उपलब्ध कराता है, तो कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का ज्ञान और रुचि रखने वाला कोई भी व्यक्ति सिस्टम को संशोधित कर सकता है और अंततः इसे बेहतर बना सकता है, और/या इसे अपने विशिष्ट उद्देश्यों के लिए संशोधित कर सकता है।

एंड्रॉइड(Android) लिनक्स के एक संशोधित संस्करण पर आधारित है!

जल्दी ही हार्ड-कोर कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं के बीच लिनक्स तेजी से लोकप्रिय हो गया। जीएनयू जनरल पब्लिक लाइसेंस(GNU General Public License) के तहत लाइसेंस प्राप्त Linux सिस्टम किसी भी व्यक्ति के लिए निःशुल्क उपलब्ध है और इसे उपयोग कर सकता है, संशोधित कर सकता है, वितरित कर सकता है और कॉपी कर सकता है। सन 1999 तक अनुमानतः सत्तर लाख कंप्यूटर लिनक्स पर चल रहे थे।

जल्दी ही लिनक्स को व्यावसायिक हलकों में एक स्थिर ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में स्वीकृति मिल गयी। लिनक्स एक ऐसा ऑपरेटिंग सिस्टम सिद्ध हुआ जो शायद ही कभी क्रैश होता है। आने वाले कुछ सालों में आईबीएम, कॉम्पैक, इंटेल और डेल जैसे बड़े कंप्यूटर निगमों ने भी लिनक्स पर चलने वाली मशीनें विकसित करना शुरू कर दीं। लिनक्स ने उपभोक्ता PC बाजार में भी लोकप्रियता हासिल की।

टोरवाल्ड्स ने अपना निजी प्रतीक चिन्ह (LOGO) “टक्स” नामक पेंगुइन बनाया, जो दुनिया भर में लिनक्स के लिए एक पहचानने का एक जाना माना चेहरा बन गया।

टोरवाल्ड्स ने 1988-1997 तक हेलसिंकी विश्वविद्यालय में लिनक्स कर्नेल(Linux Kernel) के विकास के समन्वय और अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाने में बिताया। ट्रांसमेटा के लिए काम शुरू करने के लिए वह 1997 में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए, जहां उन्होंने बिजली की बचत करने वाले सीपीयू ट्रांसमेटा क्रूसो प्रोसेसर को डिजाइन करने में मदद की।

2003 में, टोरवाल्ड्स ने ओपन सोर्स डेवलपमेंट लैब्स (OSDL) के माध्यम से लिनक्स कर्नेल पर ध्यान केंद्रित करने के लिए ट्रांसमेटा को छोड़ दिया। OSDL का उद्देश्य Linux विकास को बढ़ावा देना था।

ओएसडीएल का जनवरी 2007 में द फ्री स्टैंडर्ड्स ग्रुप के साथ विलय हो गया और यह लिनक्स फाउंडेशन बन गया। मानक लिनक्स कर्नेल में कौन सा नया कोड शामिल किया जाए, इस पर फैसला लेने का अधिकार टोरवाल्ड्स के पास है।

सबसे ज्यादा इस्तेमाल किये जाने वाले ऑपरेटिंग सिस्टम लिनक्स के जनक टोरवाल्ड्स को कंप्यूटर तकनीक जगत में बेहद सम्मानित और सुविख्यात शख्स हैं। उन्हें 1997 नोकिया फाउंडेशन अवॉर्ड और यूनिफोरम पिक्चर्स लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड जैसे सम्मानों के साथ कंप्यूटर जगत के ढेर सारे सम्मानों से सम्मानित किया गया है।

गंगा नदी का उद्गम, महत्त्व एवं इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्य

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प्राचीन काल से ही भारत में बहने वाली पवित्र नदियों में गंगा का स्थान सबसे ऊपर माना गया है। इसके बाद सिंधु, सरस्वती, यमुना, नर्मदा, कावेरी, कृष्णा, गोदावरी, महानदी, ताप्ती, सरयू, शिप्रा, झेलम, ब्रह्मपुत्र आदि का नाम आता है। आखिकार गंगा नदी की उत्पत्ति कब और कहां हुई थी जाने इससे जुड़े कुछ खास तथ्य:

  • गंगा का उद्गम दक्षिणी हिमालय में तिब्बत सीमा के भारतीय हिस्से से होता है। गंगोत्री को गंगा का उद्गम माना गया है। परन्तु वास्तव में गंगा का उद्गम श्रीमुख नामक पर्वत से हुआ है। वहां गोमुख के आकार का एक कुंड है जिसमें से गंगा की धारा नकलती है। 4,023 मीटर ऊंचा गौमुख गंगा का उद्गम स्थल माना जाता है।
  • गोमुख से निकलकर गंगा कई धाराओं में विभाजित होकर कई नामों से जानी जाती है। प्रारंभ में यह हिमालय से निकलकर 12 धाराओं में विभक्त होती है। इसमें मंदाकिनी, भगीरथी, ऋषिगंगा, धौलीगंगा, गौरीगंगा और अलकनंदा प्रमुख है। यह नदी प्रारंभ में 3 धाराओं में बंटती है– मंदाकिनी, अलकनंदा और भगीरथी। गंगोत्री में गंगाजी को समर्पित एक मंदिर भी है।
  • माना जाता है ब्रह्मा से लगभग 23वीं पीढ़ी बाद और राम से लगभग 14वीं पीढ़ी पूर्व भगीरथ हुए। भगीरथ ही गंगा को पृथ्वी पर लेकर आये थे।

ganga river temple

  • पौराणिक मान्यता के अनुसार गंगा के पिता का नाम हिमालय है जो पार्वती के पिता भी हैं। गंगा ने अपने दूसरे जन्म में ऋषि जह्नु के यहां जन्म लिया था। एक अन्य कथा के अनुसार गंगा पर्वतों के राजा हिमवान और उनकी पत्नी मीना की पुत्री है, इस प्रकार वे देवी पार्वती की बहन भी है। कुछ जगहों पर उन्हें ब्रह्मा के कुल का बताया गया है।
  • देवप्रयाग में अलकनंदा और भगीरथी का संगम होने के बाद यह गंगा के रूप में दक्षिण हिमालय से ऋषिकेश के निकट बाहर आती है और हरिद्वार के बाद मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है।
  • हरिद्वार को गंगा का द्वार भी कहा जाता है। यहां से निकलकर गंगा आगे बढ़ती है। इस बीच इसमें कई नदियां मिलती हैं जिसमें प्रमुख हैं– सरयू, यमुना, सोन, रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कोसी, घुघरी, महानंदा, हुगली, पद्मा, दामोदर, रूपनारायण, ब्रह्मपुत्र और अंत में मेघना। फिर यहां से निकलकर गंगा पश्चिम बंगाल के गंगासागर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
  • यह नदी 3 देशों के क्षेत्र का उद्धार करती है – भारत, नेपाल और बांग्लादेश। नेपाल, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल और फिर दूसरी ओर से बांग्लादेश में प्रवेश कर बंगाल की खाड़ी में समा जाती है।

गंगा नदी के किनारे बसे शहर

जल से ही जीवन का आरम्भ हुआ। जल ही जीवन का आधार है। इसलिए प्राचीन काल में लोगों का निवास स्थान नदी के किनारे हुआ करता था। गंगा नदी भारत के पांच राज्यों से होकर गुजरती है उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड व पश्चिम बंगाल। सरकार के अनुसार 97 नगर गंगा नदी के किनारे बसे हैं।

ganga map

उत्तराखंड में बसे मुख्य शहर जैसे हरिद्वार, ऋषिकेश, तपोवन, श्री नगर, उत्तरकाशी, जोशीमठ, उत्तारप्रयाग, गौचर, कीर्तिनगर व बद्रीनाथ।

उत्तर प्रदेश में – कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, मिर्जापुर, फर्रुखाबाद, मुगलसराय, बलिया, बिजनौर, कन्नौज, गंगाघाट, राम नगर, चुनार, हस्तिनापुर, व बिठूर।

बिहार में – पटना, भागलपुर, मुंगेर, छपरा, दानापुर, हाजीपुर, बक्सर, जमालपुर, बेगूसराय, मोकामा, सुल्तानगंज, बख्तियारपुर, बड़हिया प्रखण्ड, सोनपुर, कहलगांव व बरौनी।

झारखंड में – साहेबगंज व राजमहल।

पश्चिम बंगाल में – बैद्याबती, बंसबेरिया, बारानगर, बरहामपुर, भद्रेश्वर, भतपारा, बज बज, चकदाह, चांपदनी, धूलिया, गरुलिया, हल्दिया, हालीसहर, हुगली चिनसराह, हावड़ा एमसी, जंगीपुर, जियागंज–अजीमगंज, कल्याणी, कमरहती, कांचरापाड़ा, कोलकाता एमसी, कृष्णनगर, मुर्शिदाबाद, नैहाटी, उत्तरी बैरकपुर, पानीहती, रिसरा, शांतिपुर, श्रीरामपुर, टीटागढ़ व उत्‍तरपाराकोतरूंग यह बसे प्रमुख नगर है।

गंगा किनारे बसे लोगों की आजीविका का एक मुख्य स्त्रोत

भारत का करीब सैंतालीस प्रतिशत उपजाऊ क्षेत्र गंगा बेसिन में है। करीब चालीस करोड़ लोग आजीविका के लिए किसी न किसी रूप में गंगा पर निर्भर रहते हैं, इसमें विशेषकर सिंचाई, उद्योगों के लिए पानी की उपलब्धता, मछली व्यापार, गंगा आरती, नौकायन, रिवर राफ्टिंग, टूरिस्ट गाइड, पर्यटन, नियंत्रित रेत खनन, मूर्ति एवं कुम्हार व्यवसाय हेतु चिकनी बलुई मिट्टी, स्नान पर्व, कुम्भ–अर्धकुम्भ आयोजन, प्रयाग में प्रति वर्ष माघ माह में कल्पवास, काशी में देव दीपावली महोत्सव, गंगा महोत्सव, घाटों की साफ़ सफाई, दर्शन–पूजा–पाठ, पुरोहित, अंतिम संस्कार आदि आते हैं।

आज भी ऐसे परिवारों की बड़ी संख्या है जो अपने धार्मिक संस्कार मुंडन, कर्ण छेदन, उपनयन, विवाहोपरांत गंगा पुजैया आदि गंगा किनारे करते हैं जिससे घाटों के किनारे पूजन सामग्री बेचने वालों, पुजारियों, नाविकों आदि को आजीविका प्राप्त होती है।

ganda river

गंगा नदी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

  • गंगाजल कभी अशुद्ध नहीं होता है और न ही यह कभी सड़ता है। लोग गंगाजल को सालों तक अपने घर में रखते हैं।
  • गंगा नदी को सदाबहार नदी भी कहा जाता है क्योंकि यह नदी सबसे ख़राब सूखे मौसम में भी बहती है व् इस नदी के पानी का बहाव तक़रीबन 1400 से 1600 m3/s रहता है।
  • गंगा के तटीय क्षेत्रों में दलदल तथा झीलों के कारण यहाँ लेग्यूम, मिर्च, सरसो, तिल, गन्ना और जूट की बहुत फसल होती है।
  • पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार गंगा का स्वर्ग से धरती पर आगमन हुआ था। गंगा के किनारे ही रहकर महर्षि वाल्मीकि ने महाग्रंथ रामायण की रचना की थी।
  • जियोलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया के सर्वेक्षण के अनुसार, गत पचास वर्षों में गंगा का गोमुख ग्लैशियर प्रतिवर्ष 10 से 30 मीटर की गति से सिकुड़ता जा रहा है।
  • भारतीय धर्म शास्त्रों की मान्यता के अनुसार यदि गंगाजल (गंगा नदी) का वर्णन किया जाए तो एक ´गंगा पुराण´ की रचना हो सकती है।
  • ‘आइने अकबरी‘ में लिखा है कि बादशाह अकबर पीने के लिए गंगाजल ही प्रयोग में लाते थे। इस जल को वह अमृत कहते थे।
  • वैज्ञानिक परीक्षणों से पता चला है कि गंगाजल से स्नान करने तथा गंगाजल को पीने से हैजा प्लेग, मलेरिया आदि रोगों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इस बात की पुष्टि के लिए एक बार डॉ. हैकिन्स, ब्रिटिश सरकार की ओर से गंगाजल से दूर होने वाले रोगों के परीक्षण के लिए आए थे।
  • डॉ. हैकिन्स ने गंगाजल के परिक्षण के लिए गंगाजल में हैजे (कालरा) के कीटाणु डाले,लेकिन हैजे के कीटाणु मात्र 6 घंटें में ही मर गए और जब उन कीटाणुओं को साधारण पानी में रखा गया तो वह जीवित होकर असंख्य हो गए। इस तरह देखा गया कि गंगाजल विभिन्न रोगों को दूर करने वाला जल है।
  • गंगा नदी को पापमोचनी और मोक्षदायिनी कहा गया है। भागीरथ के पूर्वजों को मुक्ति गंगाजल के स्पर्श से ही मिली थी। मान्यता है कि यदि मृत्यु के समय व्यक्ति के मुंह में गंगाजल डाल दिया जाए तो उसके पापकर्म नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 

भगवान श्रीकृष्‍ण से जुड़े कुछ अनसुने अदभुत तथ्य!

भगवान श्रीकृष्‍ण विष्णु के 8वें अवतार माने गए हैं। उनको कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी जाना जाता है।

भगवान श्रीकृष्‍ण का सभी अवतरों में सर्वोच्च स्थान है। संपूर्ण भारत में उन्हीं के सबसे अधिक और प्रसिद्ध मंदिर है। दुनियाभर में उन पर सबसे अधिक शोध हो रहे हैं। धार्मिक जगत में केवल हिन्दू ही नहीं बल्कि, अन्य धर्मों के लोग भी उनके अवतार को पसंद करते हैं।

आज इस पोस्ट के माध्यम से हम श्री कृष्ण के बारे में कुछ ऐसे तथ्य बताने जा रहे हैं जिनके बारे में आपने शायद ही सुना होगा।

  • श्रीकृष्‍ण 14 विद्या और 16 आध्‍यात्मिक और 64 सांसारिक कलाओं में पारंगत थे इसीलिए प्रभु श्रीकृष्‍ण जग के नाथ जगन्नाथ और जग के गुरु जगदगुरु कहलाते हैं।
  • भगवान श्री कृष्ण की तलवार का नाम नंदक, गदा का नाम कौमौदकी और शंख का नाम पांचजन्य था, जो गुलाबी रंग का था।
  • बहुत कम लोग ये जानते हैं कि श्री कृष्ण ने देवकी के छह मरे हुए बच्चों को भी वापस बुलाया था। श्री कृष्ण ने देवकी-वासुदेव की मुलाकात उनके छह मृत बच्चों से करवाई थी। यह छह बच्चे हिरणकश्यप के पोते थे और एक शाप में जी रहे थे।
  • भगवान श्रीकृष्ण ने कई अभियान और युद्धों का संचालन किया था, लेकिन इनमें तीन सबसे ज्यादा भयंकर थे। पहला- महाभारत, दूसरा- जरासंध और कालयवन के विरुद्ध तीसरा- नरकासुर के विरुद्ध।
  • भगवान श्रीकृष्ण का भगवान होना ही उनकी शक्ति का स्रोत है। वे विष्णु के 10 अवतारों में से एक आठवें अवतार थे, जबकि 24 अवतारों में उनका नंबर 22वां था। उन्हें अपने अगले पिछले सभी जन्मों की याद थी। सभी अवतारों में उन्हें पूर्णावतार माना जाता है।
  • श्रीकृष्ण की 16,008 पत्नियां थी। इनमें से आठ रानियां रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा थीं। इन आठ रानियों से श्री कृष्ण के 80 बच्चे थे। सभी आठ रानियों के 10-10 पुत्र थे।
  • मान्यता है कि नरकासुर नामक असुर ने 16000 कन्याओं को विवाह करने के लिए बलपूर्वक बंदी बना कर रखा था। श्रीकृष्ण ने नरकासुर को मार कर इन कन्याओं को मुक्त किया था। समाज द्वारा स्वीकृत न किए जाने के डर से इन कन्याओं ने वापिस अपने घर न जाने का निश्चय किया और श्रीकृष्ण को ही अपना पति मान कर उनसे उन्हें अपनाने की प्रार्थना की थी। हालाँकि श्रीकृष्ण ने इसे अनैतिक मान कर उनसे क्षमापूर्वक इनकार कर दिया था। कन्याओं द्वारा प्रार्थना करने पर और उनकी सहमति पर श्रीकृष्ण ने उनसे केवल सांकेतिक विवाह किया था। हालाँकि उनसे कभी अन्य कोई संबंध नहीं रखा। 
  • भगवान श्री कृष्ण की परदादी ‘मारिषा’ व सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) ‘नाग’ जनजाति की थीं।
  • भगवान श्रीकृष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं।
  • भगवान श्रीकृष्ण ने केवल 16 वर्ष की आयु में महाबली चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया। उन्होंने मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को मात्र हथेली के प्रहार से काट दिया।
  • दुनिया में वे ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने युद्ध के मैदान में ज्ञान दिया और वह भी ऐसा ज्ञान जिस पर दुनियाभर में हजारों भाष्य लिखे गए और जो आज भी प्रासंगिक है। असल में गीता को ही एक मात्र धर्मग्रंथ माना जाता है। उनके जीवन चरित श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित है।
  • श्रीकृष्‍ण ने गीता के अलावा भी और भी कई गीताएं कहीं हैं। जैसे अनु गीता, उद्धव गीता आदि। गीता में उन्होंने धर्म, ईश्‍वर और मोक्ष का सच्चा रास्ता बताया।
  • श्री कृष्ण के साथ भले ही राधा का नाम हमेशा से जुड़ा हो लेकिन क्या आप जानते हैं कि किसी भी धर्मग्रंथ में राधा का जिक्र तक नहीं है। महाभारत या श्रीमद भगवत गीता दोनों में से किसी भी धर्मग्रंथ में उनका नाम नहीं लिया गया है। जयदेव ने पहली बार राधा का जिक्र किया था और उसके बाद से श्री कृष्ण के साथ राधा का नाम जुड़ा हुआ है।
  • जैन परंपरा के मुताबिक, भगवान श्री कॄष्ण के चचेरे भाई तीर्थंकर नेमिनाथ थे जो हिंदू परंपरा में घोर अंगिरस के नाम से प्रसिद्ध हैं.
  • उन्होंने अक्रूरजी को अपना विराट स्वरूप दिखाया, फिर उद्धव को, फिर राजा मुचुकुंद को, फिर शिशुपाल को, फिर धृतराष्ट्र की सभा में, पिर अर्जुन को 3 बार विराट स्वरूप दिखाया। कहते हैं कि उन्होंने कलियुग में माधवदास को भी अपना विराट स्वरूप दिखाया था।
  • भगवान श्रीकृष्ण की त्वचा का रंग मेघश्यामल था और उनके शरीर से एक मादक गंध निकलती थी।
  • द्रौपदी चीरहरण के समय उनकी साड़ी श्रीकृष्ण ने बढ़ा दी थी यह सबको पता है लेकिन इसके पीछे की पूरी कहानी बहुत कम लोग जानते हैं। जब श्री कृष्ण ने शिशुपाल का वध अपने सुदर्शन चक्र से किया था तब उनकी उंगली थोड़ी सी कट गई थी। उस समय द्रौपदी ने अपनी साड़ी के पल्ला फाड़कर श्री कृष्ण की उंगली पर बांध दिया था। तब श्री कृष्ण ने उनसे कहा था कि द्रौपदी मैं तुम्हारे एक-एक सूत का कर्ज उतारूंगा।

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जानिए कौन से देश में कब मनाया जाता है शिक्षक दिवस

भारत में शिक्षक दिवस 5 सितंबर को मनाया जाता है जबकि अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस का आयोजन 5 अक्टूबर को होता है।

रोचक तथ्य यह है कि शिक्षक दिवस दुनिया भर में मनाया जाता है लेकिन सबने इसके लिए एक अलग दिन निर्धारित किया है। कुछ देशों में इस दिन अवकाश रहता है तो कहीं-कहीं यह कामकाजी दिन ही रहता है।

  • भारत में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में 5 सितम्बर को Teachers Day मनाया जाता है। इस दिन देश के द्वितीय राष्ट्रपति रहे राधाकृष्णन का जन्मदिवस होता है।
  • ईरान में वहां के प्रोफेसर अयातुल्लाह मोर्तेजा मोतेहारी की हत्या के बाद उनकी याद में दो मई को Teachers Day मनाया जाता है। मोतेहारी की 2 मई, 1980 को हत्या कर दी गई थी।
  • थाइलैंड में हर साल 16 जनवरी को राष्ट्रीय Teachers Day मनाया जाता है। यहां 21 नवंबर, 1956 को एक प्रस्ताव लाकर Teachers Day को स्वीकृति दी गई थी। पहला Teachers Day 1957 में मनाया गया था। इस दिन यहां स्कूलों में अवकाश रहता है।
  • चीन में 1931 में नेशनल सेंट्रल यूनिवर्सिटी में Teachers Day की शुरूआत की गई थी। चीन सरकार ने 1932 में इसे स्वीकृति दी। बाद में 1939 में कन्फ्यूशियस के जन्मदिवस, 27 अगस्त को Teachers Day घोषित किया गया लेकिन 1951 में इस घोषणा को वापस ले लिया गया। साल 1985 में 10 सितम्बर को Teachers Day घोषित किया गया। अब चीन के ज्यादातर लोग फिर से चाहते हैं कि कन्फ्यूशियस के जन्मदिवस को ही Teachers Day हो।
  • यूनेस्को ने 5 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय Teachers Day घोषित किया था। साल 1994 से ही इसे मनाया जा रहा है। शिक्षकों के प्रति सहयोग को बढ़ावा देने और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शिक्षकों के महत्व के प्रति जागरूकता लाने के मकसद से इसकी शुरुआत की गई थी।
  • तुर्की में 24 नवंबर को Teachers Day मनाया जाता है। वहां के पहले राष्ट्रपति कमाल अतातुर्क ने यह घोषणा की थी।
  • मलेशिया में इसे 16 मई को मनाया जाता है, वहां इस खास दिन को ‘हरि गुरु’ कहते हैं।
  • अमेरिका में मई के पहले पूर्ण सप्ताह के मंगलवार को Teachers Day घोषित किया गया है और वहां सप्ताहभर इसके आयोजन होते हैं।
  • रूस में 1965 से 1994 तक अक्टूबर महीने के पहले रविवार के दिन Teachers Day मनाया जाता है । साल 1994 से विश्व Teachers Day 5 अक्टूबर को ही मनाया जाने लगा।

दुनिया के अन्य देशों में कब मनाया जाता है शिक्षक दिवस

देश का नाम                                        तारीख

बांग्लादेश                                        5 अक्टूबर

ऑस्ट्रेलिया                                       अक्टूबर के आखिरी शुक्रवार

चीन                                            10 सितम्बर

जर्मनी                                           5 अक्टूबर

ग्रीस                                            30 जनवरी

मलेशिया                                         16 मई

पाकिस्तान                                        5 अक्टूबर

श्रीलंका                                           6 अक्टूबर

यूके                                              5 अक्टूबर

ईरान                                             2 मई

इसके अलावा दुनिया के 11 देश 28 फ़रवरी को Teachers Day मनाते हैं।

 

Happy Teachers Day: 5 सितंबर को इसलिए मनाया जाता है शिक्षक दिवस

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आज देशभर में शिक्षक दिवस धूमधाम से मनाया जा रहा है। शिक्षकों को समर्पित यह दिन खासतौर पर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में मनाया जाता है। उनका जन्म 5 सितंबर साल 1888 में हुआ था।

उन्होंने अपने जीवन के 40 साल एक शिक्षक के रूप में देश को समर्पित किए थे।  डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति होने के साथ ही एक महान विद्वान, दार्शनिक और भारत-रत्न प्राप्तकर्ता थे। भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

एक बार डॉ. राधाकृष्णन के कुछ छात्रों और दोस्तों ने उनसे कहा कि वो उनके जन्मदिन को सेलिब्रेट करना चाहते हैं। इसके जवाब में डॉ. राधा कृष्णन ने कहा कि मेरा जन्मदिन अलग से मनाने की बजाए इसे टीचर्स डे के रूप में मनाया जाएगा तो मुझे गर्व महसूस होगा। इसके बाद से राधाकृष्णन का जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

इस दिन हम महान शिक्षाविद् को याद करते हैं और अपने सभी शिक्षकों का सम्मानपूर्ण शुक्रिया कहते हैं जिन्होंने हमारी जिंदगी में ज्ञान के दीपक को जलाया है। राधाकृष्णन एक शिक्षक के साथ दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर भी थे।

शिक्षक दिवस आधुनिक भारत के महान शिक्षक और दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधा कृष्णन एक गरीब ब्राह्मण परिवार में 5 सितंबर को 1888 में पैदा हुए थे। वह बचपन से ही बहुत समझदार और मेहनती बच्चे थे।  जब वो कलकत्ता में एक प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाने के लिए जा रहे थे तो उनके छात्र उनका सामान और फूल लेकर उन्हें मैसूर यूनिवर्सिटी से लेकर रेलवे स्टेशन तक छोड़ने गए थे।

सभी लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। देश की सेवा के साथ भारत के शिक्षा क्षेत्र को कैसे बढ़ाया जाए इस पर सर्वपल्ली ने कार्य किया। उन्होंने अपने मूल कार्य को पहचाना तभी आज उनके जन्मदिवस पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

शिक्षक दिवस को स्कूल और कॉलेज में बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है और बच्चों को शिक्षा के जमीनी स्तर से जोड़ने की कोशिश की जाती है।

इस दिन कई शिक्षा संस्थान शिक्षकों को आराम देते हैं और उनके लिए अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षक दिवस मना कर उनके महत्व को समाज में और बढ़ाया जाता है।

एक शिक्षक ही एक बच्चे को विद्यार्थी में बदलता है और वही विद्यार्थी आगे चलकर देश का भविष्य बनता है। डॉ. राधाकृष्णन ने समाज में शिक्षकों और शिक्षा दोनों कि महत्वता को समझा है इसलिए उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में 1962 के बाद से मनाया जा रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

डॉ. राधाकृष्णन के विचारों का भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने आदर्शवाद के दर्शन की वकालत की, जिसमें शिक्षा में मूल्यों, नैतिकता और चरित्र विकास के महत्व पर जोर दिया गया।

राधाकृष्णन एक प्रतिष्ठित शिक्षक और विद्वान थे। उन्होंने एक प्रोफेसर के रूप में और बाद में आंध्र विश्वविद्यालय एवं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्य किया, जहां उन्होंने शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण सुधार किए।

डॉ. राधाकृष्णन ने पूर्वी और पश्चिमी शिक्षा को बढ़ावा दिया।

सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में कुछ रोचक तथ्य

  • जब वे भारत के राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने 10,000 रुपये के मासिक वेतन में से केवल 2500 रुपये स्वीकार किए, शेष प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में जा रहे थे।
  • राधाकृष्णन शेवनिंग स्कॉलरशिप और राधाकृष्णन मेमोरियल अवार्ड की स्थापना ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा की गई थी।
  • हेल्पेज इंडिया, वृद्धों और गरीबों के लिए एक गैर-लाभकारी संगठन, उनके द्वारा बनाया गया था।
  • राष्ट्रपति बनने से पहले, राधाकृष्णन ने 1947 से 1952 तक संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत के रूप में कार्य किया।
  • 1954 में उन्हें भारत रत्न और 1961 में जर्मन पुस्तक व्यापार शांति पुरस्कार दिया गया।
  • सर्वपल्ली राधाकृष्णन को 1954 में भारत रत्न और 1961 में जर्मन बुक ट्रेड के शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1963 में उन्हें ऑर्डर ऑफ मेरिट और 1975 में टेम्पलटन पुरस्कार दिया गया।
  • उन्हें 1931 में नाइट की उपाधि दी गई थी और 1947 में भारत की स्वतंत्रता तक उन्हें सर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से जाना जाता था। देश को आजादी मिलने के बाद उनका नाम बदलकर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन कर दिया गया।
  • उन्हें 1936 में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वी धर्मों और नैतिकता के स्पैल्डिंग प्रोफेसर नियुक्त किया गया था। इसके अलावा, उन्हें ऑल सोल्स कॉलेज के फेलो के रूप में चुना गया था।