पृथ्वी पर 10 सबसे अदभुत घटनाएँ

प्रकृति बहुत सुंदर और अदभुत है. इसके रंग निराले है. कभी-कभी प्रकृति ऐसे दृश्यों, संयोगों या घटनायों का निर्माण करती हैं जो हमें हैरत में डाल देते हैं और सोचने को मजबूर कर देते हैं कि क्या यह वास्तव में हैं या कोई सपना है.

हम आपको प्रकृति द्वारा निर्मित कुछ ऐसे ही चुनिन्दा 10 घटनाक्रम और दृश्य दिखाने जा रहे हैं जो वाकई में हैरतअंगेज हैं. लेकिन सच्चाई यही है कि यह दृश्य या घटनाएं वास्तविक हैं और प्रकृति द्वारा ही सृजित यानि उत्पन्न हैं.

अन्टार्कटिका में खून का गिरना

top-10-amazing-events-on-earth-Blood-Falls-in-Antarctica अंटार्कटिका (Antarctica) में टेलर ग्लेशियर (Tylor Glacier) के मुहाने से वेस्ट लेक बोन्नी (West Lake Bonney) में गिरने वाला पानी खून जैसा दिखता है. इस कलगी वाले नमकीन पानी में आयरन-ऑक्साइड की अधिकता होने के कारण इस पानी का रंग खून जैसा दिखता है. यह जगह पूर्वी अंटार्कटिका के विक्टोरिया लैंड(Victoria Land) में स्थित मैकमुरदो सूखी वैली (McMurdo Dry Valley) की टेलर वैली में है.

कैलुआ, हवाई में नीलगिरी के इंद्रधनुषी पेड़

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नीलगिरी (Eucalyptus deglupta) का पेड़ काफी ऊँचा होता है जिसे सामान्यत: इंद्रधनुषी नीलगिरी का पेड़ भी कहा जाता है. यह नीलगिरी पेड़ों की एकमात्र ऐसी किस्म है जो केवल न्यू-ब्रिटेन (New Britain), न्यू गिनी (New Guinea), सीरम(Ceram), सुलवेसी(Sulawesi) और मीदंनाओ(Mindanao) में पाई जाती है. अद्वितीय बहुरंगी छाल इस पेड़ का विशिष्ट गुण है. इस पेड़ की बाहरी छाल के हिस्से हर साल अलग अलग समय पर निकलते रहते हैं, जिनके निकलने पर हरे रंग की चमकीली परत निकल आती है. इसके धीरे-धीरे यह परत नीले, बैंगनी, नारंगी और फिर लाल रंग की परत में बदलती जाती है जिससे पूरा पेड़ इन्द्रधनुषी रंग में नज़र आता है.

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 अरिजोन की लहर

top-10-amazing-events-on-earth-the-wave-arizona अरिजोन की लहर जिसको “वेव ऑफ़ ओरिजिन” के नाम से भी जाना जाता है. अमेरिका के उत्तरी हिस्से में परिया घाटी में स्थित है. यह जगह संदूरी चट्टानों से घिरी हुई है. इन चट्टानों को संदूर-बलुआ पत्थर भी कहा जाता है. यह जगह फोटोग्राफरों और पर्यटकों की पसंदीदा जगह है.

वाढू के झिलमिलाते किनारे, मालदीव्स

top-10-amazing-events-on-earth-vaadhoo-island-maldivesसमुन्द्र के किनारों पर काँटों की रौशनी के जगमगाने का दृश्य मालदीव में देखने को मिलता है. चमकती हुई नीली लहरें, जैविक रौशनी असल समुंदरी जीवों द्वारा पैदा की जाती है. इस दृश्य से यह जगह धरती पर स्वर्ग सी लगती है. रात को यह जगह दुनिया की सबसे रोमांटिक जगह लगती है.

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मोस्को के ऊपर प्रकाश के स्तंभों का बनना

top-10-amazing-events-on-earth-light-pillars-over-moscowयह दृश्य तब बनता है जब आकाश में बर्फ के क्रिस्टलों पर रौशनी पडती है. यह रौशनी सूरज, चंद्रमा और कहीं से भी आ सकती है. बर्फ के क्रिस्टलों पर जब रौशनी पडती है तब यह क्रिस्टल आकाश में अलग-2 कलाकृतियाँ बनाते हैं.

बोलीविया की चिंतनशील साल्ट फ्लैट

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यह एक हैरान कर देने वाला दृश्य है. जिसमें आकाश और धरती मिलकर एक अदभुत दृश्य बनाते हैं. सलार दे उयुनी दुनिया की सबसे बढ़ी नमक वाली सपाट जगह है. यह जगह पानी से नही, पूरी तरह से नमक से ढकी हुई है. यह जगह आकाश के लिए शीशे का काम करती है.

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 मेक्सिको में भूमिगत प्राकृतिक फव्वारा

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मेक्सिको में ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जिनपर विश्वास करना बहुत कठिन है.यह भूमिगत प्रक्रतिक स्प्रिंग यानि फव्वारा भी उन जगहों में से एक है. इनको सेनोत भी कहा जाता है. यह एक कुदरती गड्डा होता है, जो चूना पत्थर के नीचे गिरने से बनता है.

 ज्वालामुखी का में बिजली और गर्जना

top-10-amazing-events-on-earth-volcanic-lightninज्वालामुखी के भयंकर तूफ़ान को “वोल्कानिक रौशनी” भी कहा जाता है. यह तूफ़ान असल में ज्वालामुखी के बादल होते हैं. जो बहुत भयंकर बिजली पैदा करते हैं. विज्ञानियों का मानना है कि यह रौशनी तब पैदा होती है जब ज्वालामुखी में पत्थर के टुकड़े, उसकी राख आपस में टकराते हैं.

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 पाकिस्तान में भूत जैसे दिखाई देने वाले पेड़

top-10-amazing-events-on-earth-spiderweb-cocooned-trees-in-pakistanपाकिस्तान में जब बाढ़ आई थी तो लाखों की तादाद में मकड़ियां बाढ़ के पानी से बचने के लिए इन पेड़ों पर चढ़ गई और इन पेड़ों पर जाल बिछा दिए. क्योंकि बाढ़ का पानी काफी समय तक रहा इसलिए इन मकड़ियों ने पूरे पेड़ों पर ही अपने जाल बिछा दिए. अब यह पेड़ भूतों की तरह दिखते हैं.

 कैंद्ली झील में पानी के नीचे वन

top-10-amazing-events-on-earth-underwater-forest-of-lake-kaindyयह धंसे हुए और पानी के भीतर जंगल कैंद्ली झील का हिस्सा हैं. यह जंगल 400 मीटर तक फैले हुए हैं. यह जगह अल्माती से 129 किलोमीटर दूर हैं. यह झील भूस्खलन से बनी हुई है, जो कि 1911 में भूकंप के कारण हुआ था. यह बहुत ही खूबसूरत और आनंदमय जगह है.

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डायनासोर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

डायनासोर का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में बहुत बड़े- बड़े जानवरों की छवियां आने लगती हैं। आज से करोड़ों साल पहले धरती पर सबसे बड़े जीव यानि डायनासोर का अस्तित्व था, लेकिन आज के युग में डायनासोर के केवल अवशेष ही पाये जाते हैं। डायनासोर एक बहुत बड़े आकार का जीव था। आइये जानतें हैं डायनासोर से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में :-

  • डायनासोर पृथ्वी पर करीब 150 करोड़ वर्ष पहले रहते थे, यह समय धरती के अस्तित्व का मध्य काल था।
  • डायनासोर शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले ब्रिटिश पलांटोलॉजिस्ट रिचर्ड ओवेन ने सन 1842 में किया इसका मतलब होता है “भयानक छिपकली” l
  • वैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ डायनासोर शाकाहारी और कुछ मांसाहारी हुआ करते थे। इसके अलावा कुछ डायनासोर दो पैरों से चलने वाले तो कुछ चार पैरों पर चलने वाले हुआ करते थे। ऐसा माना जाता था कि डायनासोर अपनी आवश्यकता के अनुसार दो और चार पैरों के रूप में अपने शरीर को बदल लेते थे।
  • वैसे तो अधिकतर डायनासोर बहुत विशालकाय शरीर वाले होते थे लेकिन कुछ डायनासोर की प्रजातियों का आकार इंसान के बराबर भी हुआ करता था।
  • जो डायनासोर छोटे आकार के होते थे उनका कद 4 से 5 फिट का होता था परन्तु विशालकाय डायनासोर का कद करीब 50 से 60 फीट भी होता था।
  • माना जाता है कि उस समय डायनासोर की लगभग 2468 प्रजातियां थी जिनमें से कुछ प्रजातियां उड़ भी सकती थी l
  • शाकाहारी डायनासोर 1 दिन में 1 टन पत्तियां खा जाते थे।
  • डायनासोर करीब 20 मील प्रति घंटे की तेज रफ्तार से दौड सकते थे।
  • जिस प्रकार पक्षी अपने अंडों के लिए घोंसला बनाते हैं वैसे ही डायनासोर भी अपने अंडे देने के लिए घोंसले बनाया करते थे। डायनासोर के अंडे टेनिस बॉल और फुटबॉल जितने बड़े हुआ करते थे।
  • डायनासोर की लगभग सभी प्रजातियां अंडे दिया करती थी, परन्तु वैज्ञानिक अभी तक करीब 40 तरह की प्रजातियों के  अंडों की खोज करने में सफल रहे है।
  • डायनासोर के मुंह में 50 दांत होते थे जिससे वह किसी भी अन्य जीव की हड्डियां आसानी से तोड़ सकते थे।
  • क्या आप जानते है डायनासोर की पूँछ करीब 45 फ़ीट लम्बी हुआ करती थी।
  • डायनासोर का शरीर बहुत विशालकाय हुआ करता था, लेकिन एक वयस्क डायनासोर के दिमाग का आकार इंसान के बच्चे के दिमाग से भी छोटा होता था।
  • जिस प्रकार सांप और छिपकली अपनी स्किन छोड़ते हैं वैसे ही डायनासोर भी समयानुसार अपनी स्किन छोड़ते थे।
  • डायनासोर के सर की खोपड़ी की हड्डियों में बड़े बड़े छेद होते थे जो कि उनके सर को हल्का बनाये रखने में उनकी मदद करते थे। डायनासोर के सर का आकार एक कार के आकार जितना होता था l
  • ऐसा माना जाता है कि डायनासोर का जीवन काल करीब 200 साल का हुआ करता था।
  • क्या आप जानते है की 65 करोड़ साल पहले मेक्सिको के पास एक बड़ा उल्कापिंड पृथ्वी से टकराया था जिससे 112 मील  चौड़ा गड्डा बन गया था। इसके बाद धीरे धीरे डायनासोर विलुप्त होने लगे।

फिटकरी से होने वाले चमत्कारी फायदे

फिटकरी से होने वाले चमत्कारी फायदे

हमारे रोजमर्रा के जीवन में फिटकरी बहुत उपयोगी होती है। फिटकरी का इस्तेमाल स्किन से लेकर गंभीर या हल्की चोटों तक बहुत सी स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने के लिए किया जा सकता है। इसलिए घर में फिटकरी का होना जरुरी है।  इसका प्रयोग पीने के पानी को साफ करने के लिए किया जाता है, ताकि पानी में मौजूद कीटाणु समाप्त हो जाएं। इसके अलावा त्वचा की सफाई के लिए भी फिटकरी का उपयोग किया जाता है। फिटकरी से बहते हुए खून को भी रोका जा सकता है। अधिकांश लोग इसे ही फिटकरी का सबसे बड़ा फायदा मानते हैं।

फिटकरी से होने वाले फायदे

चोट लगने पर

अगर चोट लग जाने की वजह से  शरीर से लगातार खून निकल रहा हो तो बहते हुए खून को रोकने के लिए फिटकरी का प्रयोग कर सकते हैं। फिटकरी को पानी में डुबोकर खून निकलने वाली जगह पर रगड़ने से खून का निकलना बंद हो जाता है।

चेहरे की झुर्रियां दूर करने में

चेहरे की झुर्रियां मिटाने के लिए फिटकरी के टुकड़े को पानी में डुबोकर चेहरे पर हल्के हाथ से मलना चाहिए। सूखने पर साफ पानी से धो लें। कुछ ही दिनों में झुर्रियां कम हो जाएंगी।

पसीने की बदबू दूर करने के लिए

अगर आप शरीर की दुर्गंध से परेशान हैं तो फिटकरी का इस्तेमाल कर सकते हैं। पैरों की बदबू दूर करने के लिए भी फिटकरी का प्रयोग किया जा सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार फिटकरी का इस्तेमाल त्वचा की दुर्गंध हटाने के लिए आफ्टरशेव, डिओडरेंट और बॉडी लोशन में भी किया जाता है।

माउथवॉश के लिए

मुंह की गंदी बदबू के मुख्य कारणों में से एक निश्चित रूप से बैक्टीरिया की उपस्थिति होती है, जो अक्सर विषाक्त पदार्थ और एसिड बनाते हैं। फिटकरी युक्त माउथवॉश से मुंह की सफाई करने से बैक्टीरिया के विकास को रोका जा सकता है। इस प्रकार आप फिटकरी का उपयोग करके मुंह से आने वाली बदबू को दूर कर सकते हैं।

फटी एड़ियों का उपचार

फटी एड़ियों का उपचार फिटकरी पाउडर के द्वारा किया जा सकता है। इसके लिए एक छोटे बर्तन में फिटकरी डालकर पानी को गर्म कर लें। जब फिटकरी पूरी तरह से पिघल जाये तो इसे ठंडा होने के लिए छोड़ दें। फिर इसे नारियल के तेल के साथ मिलाकर पैरों में लगाए। यह फटी एड़ियों को ठीक करने का सबसे अच्छा उपचार है।

मौसमी समस्या होगी दूर

एक अध्ययन के अनुसार, फिटकरी के इस्तेमाल से मौसमी एलर्जी जैसी बीमारियों से राहत पाई जा सकती है।

मुंहासों से परेशान

अगर आप मुंहासों से परेशान हैं तो फिटकरी आपके लिए फायदेमंद हो सकती है। फिटकरी एस्ट्रिजेंट गुणों से समृद्ध होती है। इसमें मौजूद एस्ट्रिजेंट के गुण मुंहासों को ठीक करने का काम करते हैं। मुंहासों से राहत पाने के लिए आप फिटकरी का पेस्ट प्रभावित जगह पर लगा सकते हैं।

जहरीले कीड़े के डंक का उपचार

अगर आपको बर्र, मधुमक्खी, बिच्छू या किसी अन्य जहरीले कीड़े ने काट लिया हो तो फिटकरी के पाउडर को पानी में डालकर एक गाढ़ा घोल बना लें। अब इस घोल को प्रभावित अंग पर लगाएं। इस घोल को लगाने से दर्द में राहत मिलती है तथा विष का असर भी खत्म होता है।

“मैं देशभक्त हूँ”, “आई लव इंडिया”…,”पर मुझे पैसा चाहिए!!”

मा.मोहन लाल, पूर्व परिवहन मंत्री, पंजाब

वर्षों से यह प्रश्न भारत के लोगों को उद्वेलित करता चला आ रहा है कि ‘विश्वगुरु‘ कहलाने वाला भारत देश 1250 साल तक गुलाम क्यों रहा? यह ‘सोने की चिड़िया‘ कहा जाने वाला भारत वर्ष इतने लम्बे समय तक गुलाम कैसे रहा?

सोते समय कई मर्तबा मेरे स्वयं के मन में यह विचार हिचकोले खाता रहता है कि इतने उच्च आदर्शों वाला यह देश इतनी शताब्दियों तक गुलाम क्यों बना रहा? इतनी लम्बी इसकी विरासत, इतनी सुशील इस देश की संस्कृति, इतनी श्रेष्ठ इसकी सभ्यता और फिर भी इतनी दीर्धावस्था तक यह देश गुलाम क्यों रहा? आश्चर्य है कि दुनिया के किसी मुल्क ने इतनी लम्बी गुलामी नहीं सही।

राम-कृष्ण का देश, नानक-गोबिंद सिंह का देश और फिर भी गुलाम? गुलाम ही नहीं, लम्बे समय तक गुलाम। जानते हो क्यों? क्योंकि जब भी यह देश संकट में आया कुछ काली भेड़ों ने इसे गुलाम बना दिया।

आज विश्व कोरोना वायरस से सहमा हुआ है। इस भयंकर महामारी से भारत त्रस्त है। नित नए केस कोरोना वायरस के डिटैक्ट हो रहे हैं, लोग मर रहे हैं और इधर ध्यान तो दो कि कुछ लोग ‘हैंड सैनेटाइजर‘ नकली बनाने को दौड़ पड़े। पैसे की खातिर हाथ धोने वाले लोशन तक को नकली बनाने लगे। निकम्मे और तुच्छ से लगने वाले ‘मास्कों‘ की पूर्ति को बाजारों से गायब कर दिया। और तो और प्रयोग किए गए मास्कों को झाड़-पोंछ कर पुन: बाजारों में बेचा जाने लगा। टके के मुंह ढांपने वाले मास्क को बीस रुपए में बेचा जाने लगा।

अच्छा होता यदि नये मास्क सरकार लोगों को इस संकट की घड़ी में मुफ्त बांटती, पर सरकारें चलो ऐसा न कर सकी तो क्या मास्कों की बनावटी कमी पैदा कर दी जाए? कोरोना वायरस की इस भयंकरता में हम प्रयोग किए जा चुके मास्कों को पुनः प्रयोग करने के लिए बीमारों को बाध्य करें? नकली हैंड सैनेटाइजर बनाने की होड़ में लग जाएं? संबंधित दवाइयों को छुपा लें व महंगे दामों पर बेचने लगें? यह तो इंसानी धर्म नहीं। यह तो आदमी-आदमी के बीच की एकता का प्रमाण नहीं। ऐसा करना तो इंसानियत के विरुद्ध है। संकट की इस भयानक बेला में इस प्रकार के काम तो देश के साथ गद्दारी ही कहे जाएंगे।

क्या ऐसे ही लोगों ने देश को गुलाम नहीं बनाया? जब छठी शताब्दी में मोहम्मद-बिन-कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया तो ऐसी ही वृत्ति के लोगों ने राजा दाहिर को उसके हालात पर छोड़ दिया होगा? अनिवार्य वस्तुओं को छुपा लिया होगा? उसे और उसकी युवा बेटियों की लुटती अस्मत पर मुस्कुराते होंगे।

प्लेग-संक्रमण और बंगाल में आए दुर्भिक्ष में जरूरी चीजों को पैसे के लालची ऐसे लोगों ने ही गायब कर दिया होगा और लोग मरते गए होंगे? अहमद शाह अब्दाली ने ऐसे ही तो भारत को लूटा नहीं होगा? उसे बुलाया तो किसी भारतवासी ने ही होगा? तैमूर लंग को भारत का रास्ता हमने ही तो बताया होगा।

महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी को भारत आने का निमंत्रण किसी और ने तो भेजा नहीं होगा? पृथ्वी राज चौहान को गौरी ने नहीं जयचंद ने ही मारा होगा? बाबर को भारत पर आक्रमण करने का बुलावा किसी अपने ने ही दिया होगा? महाराणा प्रताप के सामने कोई उसका अपना ही भाई शक्ति सिंह बन गया होगा?

अकबर की दक्षिण विजय में कोई राजा जयसिंह ही होगा? अंग्रेजों ने कई ‘मीर-जाफर‘ पाल रखे होंगे? गुरु गोबिंद सिंह के छोटे साहिबजादों को किसी अपने ने ही सरहिंद की दीवारों में चिनवाया होगा? मुझे तो साढ़े बारह सौ सालों की भारत गुलामी में अपने ही गद्दार दिखाए दिए हैं। भामाशाह तो सिर्फ एक ही मिला है।

हमें गुलाम किसी और ने नहीं बनाया, हमने स्वयं गुलामी को निमंत्रण दिया। पूछो क्यों? क्योंकि हमें पैसा चाहिए, हमें सत्ता चाहिए, हमें पद चाहिए, हमें अपनी अलग-अलग रियासत चाहिए। हमने कभी सोचा ही नहीं कि यह देश अपने पुरखों की हमें देन है। हमने कभी ध्यान ही नहीं किया कि समाज की पीड़ा हमारी अपनी पीड़ा है। हमें तो पैसा चाहिए।

एकदम स्वार्थी हैं हम। अपने एक पैसे को बचाने के लिए देश का करोड़ों रुपयों का नुक्सान होता है तो हो जाने दो। यह तो कोई बात नहीं हुई कि हमारे देश के प्रधानमंत्री कोरोना जैसी भयंकर बीमारी का हल खोजने के लिए सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों से विचार-विमर्श कर रहे हों और आप नकली ‘हैंड सैनेटाइजर‘ बनाने में जोर लगाने लग पड़ें क्योंकि इससे आपको पैसा मिलता है।

यह तो ‘मानव धर्म‘ नहीं हुआ कि एक तरफ सरकारें स्कूल-कालेज, रेल यातायात, हवाई सफर और सरकारी अदारे बंद कर कोरोना वायरस से जंग लड़ रही हैं और एक आप लोग हैं कि एक टके के मास्क को बीस रुपए में बेचने लग पड़े। सारे मास्क ही दबा लिए।

हमसे तो अमरीका अच्छा। चौंकिए मत। वहां के पैंतालीस नौजवान स्वयं साइंस लैबोरेटरियों में गए, वैज्ञानिकों से कहा, ‘कोरोना वायरस के कीटाणुओं को हममें इंजैक्ट करो। हम पर प्रयोग करो और पता लगाओ कि इस कोरोना वायरस से इंसानी जिंदगियों को कैसे बचाया जा सकता है। है न इंसानी प्यार? है न देशभक्ति?

हम सिर्फ देशभक्ति का ढिंढोरा पीटते हैं। देशभक्ति का मुखौटा ओढ़े बैठे हैं। भक्त सिंह जिंदाबाद, शहीदे आजम भगत सिंह अमर रहे, अमर रहे जैसे नारे जरूर लगाते हैं परन्तु अंदरखाते प्रभु से यही प्रार्थना करते हैं कि कहीं भगत सिंह हमारे घर में पैदा न हो?

अजीब देशभक्ति है हमारी? हमारा तो सब कुछ पैसा ही हुआ न? सामूहिक सोच, सामूहिक हित, देश भक्ति सिर्फ नारों में ही हम दिखाते हैं। मुझे तब घृणा हुई कि देश कोरोना जैसी महामारी की गिरफ्त में है और आप नकली दवाइयां, नकली सैनेटाइजर, नकली और गंदे मास्क महंगे दामों पर बेचने की होड़ में लगे हो? भयानक संकट है देश पर और आप लोगों को सिर्फ अपने लाभ की चिंता है?

सोचो यदि देश ही नहीं रहेगा तो तुम्हारा धन किस काम का? पैसा-पैसा-पैसा यह तो गुलाम मानसिकता है। पहले इस देश ने कम गुलामी देखी है? जला दो, फूंक दो इस गुलाम पैसे की मानसिकता को। याद रखो विश्वविजेता सिकंदर महान भी जब इस दुनिया से गया था तो उसके दोनों हाथ खाली थे।

पहले देश और समाज, फिर पैसा और पद की सोचो। देश के सामने पैसा ‘बिग जीरो‘ है।

पंजाब केसरी से साभार

जानिए अदरक से होने वाले जबरदस्त फायदों के बारे में

जानिए अदरक से होने वाले जबरदस्त फायदों के बारे में

अदरक एक आयुर्वेदिक औषधि है। अदरक का उपयोग हजारों वर्षों से विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं को ठीक करने के लिए किया जा रहा है:- जैसे सर्दी, उल्टी, गठिया, माइग्रेन और उच्च रक्तचाप। अदरक एक ऐसी औषधि है जो इन सब रोगों से लड़ सकता है।

  • अदरक में बुरे बैक्टीरिया, वायरस और अन्य जीवाणुओं को मारने की क्षमता होती है। सिर्फ अदरक के सेवन से बुरे बैक्टीरिया को मारने में मदद मिल सकती है। जिन लोगों को बार-बार संक्रमण रोग या इन्फेक्शन वाली बीमारियाँ होती हैं, उनके लिए ये बहुत फायदेमंद है। इसके लिए,अदरक को कच्चा भी खा सकते है या फिर पके हुए रूप में भी अदरक का सेवन किया जा सकता है।
  • अदरक में कैंसर जैसी भयानक बीमारी से शरीर को बचाए रखने का गुण होता है। यह कैंसर पैदा करने वाले सेल्स को खत्म करता है। एक रिसर्च से पता चला है कि अदरक स्तन कैंसर पैदा करने वाले सेल को बढ़ने से रोकता है।
  • अदरक में खून को पतला करने के नायाब गुण होते हैं और इसी वजह से यह ब्लड प्रेशर जैसी बीमारी में तुरंत लाभ के लिए जाना जाता है।
  • सर्दी-खांसी को दूर करने में भी अदरक एक महत्वपूर्ण औषधि है। इसीलिए सर्दियों के दिनों में इसका उपयोग बहुत अधिक बढ़ जाता है। सर्दी होने पर अदरक का काढ़ा बहुत फायदेमंद होता है।
  • गर्भावस्था के शुरूआती महीनों में आई परेशानियों जैसे मॉर्निंग सिकनेस अदरक से आसानी से दूर हो जाती है। अगर आपका  जी मिचला रहा हो तो अदरक के रस में नींबू का रस मिलाकर सेवन किया जा सकता है।
  • यदि अदरक के रस का सेवन किया जाए तो गठिया रोग ठीक हो सकता है। अदरक में सूजन को खत्म करने वाले गुण होते है। गठिया और थायराईड से ग्रस्त मरीजों के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है।
  • अदरक का रस दांत दर्द और सिरदर्द के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है।
  • अगर त्वचा से जुड़ी किसी भी प्रकार की समस्या हो तो अदरक के रस को नियमित तौर पर इस्तेमाल करने से मुहांसों और त्वचा की अन्य समस्यों से छुटकारा पाया जा सकता है।
  • कॉलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए भी अदरक का रस बहुत उपयोगी होता है। यह रक्त के थक्कों को जमने नहीं देता।
  • आजकल मधुमेह एक बहुत ही आम बीमारी हो गई है, इसके लिए यदि आप अदरक का सेवन करते हो तो यह आपको मधुमेह से आराम दिला सकता है। मधुमेह के लिए अदरक बहुत ही फायदेमंद उपचार है।
  • अगर आप घने और चमकदार बाल चाहते हैं तो अदरक के रस का नियमित उपयोग करने से आपकी यह इच्छा पूरी हो सकती है। अदरक का रस आप पी भी सकते हैं और सीधे सिर की त्वचा पर भी लगा सकते हैं। आपको सिर्फ यह ध्यान रखना है कि आप शुद्ध रस सिर पर लगाएं जिसमें पानी की मात्रा बिल्कुल न हो या फिर न के बराबर हो। यह न केवल बाल स्वस्थ बनाएगा बल्कि रूसी से भी छुटकारा दिलाएगा।
  • यदि पाचन संबंधी कोई भी समस्या है, तो समझ लीजिए कि यह समस्या अदरक से ठीक हो सकती है। अदरक एक ऐसी गुणकारी औषधि है जो आपको न केवल पाचन और गैस बल्कि सभी तरह के पेट दर्द से भी राहत दिलाता है।

कुदरत के रहस्यों को आज तक ना कोई समझ पाया और ना ही शायद कभी समझ पाएगा

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कुदरत के रहस्यों को आज तक ना कोई समझ पाया और ना ही शायद कभी समझ पाएगा। प्रकृति ने हमारी पृथ्वी को बेशुमार खूबसूरत और रोमांचक चीज़े प्रदान की है जो दुनियाभर में हमें  देखने को मिलती है। उन्ही में से एक है “कैनो क्रिस्टल्स नदी”l

वैसे तो दुनिया में बहुत सी खूबसूरत नदियां हैं। लेकिन एक ऐसी नदी है जो मौसम के साथ अपना रंग बदलती है। इस नदी का नाम है “कैनो क्रिस्टल्स”।

कैनो क्रिस्टल्स (Caño Cristales) नदी दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के  कोलंबिया के “सरानिया दी ला मैकरेना” (Serranía de la Macarena) इलाके में बहती है।  यह नदी आगे जाकर ग्वायाबैरो नामक बड़ी नदी में मिल जाती है।

कैनो क्रिस्टल्स नदी का रंग कभी पीला तो कभी हरा, कभी लाल और कभी नीला, कभी काला हो जाता है। इसलिए इसे “रिवर ऑफ फाइव कलर्स” भी कहा जाता है। इस नदी को ‘लिक्विड रेनबो’ के नाम से भी जाना जाता है।

यह नदी प्रकृति की एक अनूठी कला है जो हर किसी को आश्चर्यचकित कर देती है।

कैनो क्रिस्टल्स नदी की लंबाई करीब 100 किलोमीटर है, वहीं इसकी चौड़ाई करीब 20 मीटर है।

क्या है रंग बदलने का कारण

कुछ लोग नदी को देखकर ये सोचते हैं कि नदी का रंग किसी शैवाल या काई से के कारण बदल जाता है, परन्तु ऐसा नहीं है। दरअसल इस कैनो क्रिस्टल्स नदी में मैकारैनिया क्लैवीगैरा नाम का एक पौधा है, जिसके कारण इसका रंग बदलता रहता है।

इस पौधे को अगर निश्चित जल या निश्चित सूरज की रौशनी मिलती रहे तो इसका रंग हल्का या फिर गहरा लाल होता जाता है। ज़्यादातर दिनों में इस नदी का रंग हल्का या गहरा गुलाबी और हल्का या गहरा लाल होता है l कभी-कभी इसका रंग नीला, पीला, नारंगी और हरा भी हो जाता है।

कब बदलता है नदी का रंग

कैनो क्रिस्टल्स नदी के रंग बदलने की ये प्रक्रिया जून से लेकर नवंबर के बीच कुछ सप्ताह में दिखती है। प्रकृति का यह खूबसूरत नज़ारा बहुत ही अद्भुत होता है।

ऐतिहासिक रूप से इस नदी को विश्व की सबसे खूबसूरत नदी भी कहा जाता है। “नेशनल जिओग्राफिक” के अनुसार यह नहीं “गार्डन ऑफ एडेन”( The Garden of Eden) यानि देवताओं की नगरी में स्थित है।

यहाँ पर बड़ी संख्या में लोग घूमने आते है। यहां घूमने आने वाले ज़्यादातर लोग पास ही के टाउन ला मैकरेना और ट्रेक शहर के नेशनल पार्क से होते हुए यहां पहुंचते हैं।

प्रकृति की इस खूबसूरती के बरकरार रखने के लिए यहां कुछ नियम भी बनाए गए हैं, जैसे एक ग्रुप में 7 से ज़्यादा लोग यहां नहीं जा सकते और एक दिन में 200 से ज़्यादा लोगों को इस क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं है।

दुनिया भर में लॉकडाउन से धरती को हो रहा फायदा

कोरोना वायरस के कारण दुनिया भर के ज़्यादातर देशों में लॉकडाउन चल रहा है। इस लॉकडाउन के चलते सड़कें खाली पड़ी हैं, हर दिन धुंआ उगलने वाली फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं, जिसका सकारात्मक परिणाम धरती पर अब साफ नज़र आने लगा हैं। लॉकडाउन से पहले धरती में बहुत अधिक कंपन थी परन्तु जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है धरती में पहले से बहुत कम कंपन हो रही हैं। इन दिनों में हमारी धरती पहले से कहीं अधिक स्थिर हो गई हैं। सड़कों पर जानवरों को देखने से लेकर ताजी स्वच्छ हवा में सांस लेने तक पर्यावरण पर लॉकडाउन का सकारात्मक प्रभाव पड़ा है l

स्वच्छ वायु

लॉकडाउन का सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव वायु पर हो रहा है। दुनिया भर के शहरों में प्रदूषण के स्तर में गिरावट देखी जा रही है क्योंकि लोगों ने वाहनों, कार्यालयों और कारखानों में कम समय और घर पर अधिक समय बिताया है। हवा में मौजूद हानिकारक कण पदार्थ और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड में कमी पूरे ब्रिटेन के इलाकों में दर्ज की गई है, लंदन और कई अन्य प्रमुख शहरों में वायु में पाए जाने वाले सभी हानिकारक पदार्थों  में कमी  देखी गई  हैं। पिछले साल की तुलना में 14-25 मार्च तक नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का औसत स्तर घटा है।

साफ पानी

वेनिस घुमावदार नहरों के लिए जाना जाता है। कोरोनावायरस लॉकडाउन के चलते इटली में पानी की गुणवत्ता में  काफी सुधार हुआ है। शहर के निवासियों का मानना है कि हर साल आने वाले पर्यटकों की भीड़ द्वारा लाए जाने वाले नाव यातायात की कमी से जलमार्गों को फायदा हो रहा है।

मुक्त वन्यजीव

सार्वजनिक रूप से जिन जंगली जानवरों को जंगलों में देखा जाता था वे अब सड़कों पर देखे जा रहे है। यह परिवर्तन  ज्यादातर शहरों में शांति के कारण हुआ है, जिसने जानवरों को आवासीय क्षेत्रों की ओर आकर्षित किया है। भारत के विभिन्न हिस्सों में हिरण, नीलगाय और तेंदुए जैसे जानवरों को सड़को पर देखा गया है।

ओजोन परत पर सकारात्मक प्रभाव

दुनिया भर में प्रदूषण के स्तर में अचानक गिरावट से ओजोन परत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। सड़कों पर कम वाहनों और लोगों द्वारा अपनी गतिविधियों के बारे में सतर्कता के साथ, ओजोन परत को आखिरकार कुछ सांस लेने की जगह मिल गई है। एक वैज्ञानिक पत्र में प्रकाशित लेख के आधार पर पर्यावरण में आई गिरावट में अचानक सुधार हुआ है।

ध्वनि प्रदूषण में कमी

बेल्जियम में वैज्ञानिकों ने लॉकडाउन शुरू होने के बाद से व्यापक मानवीय शोर की मात्रा में कम से कम 30 प्रतिशत की कमी दर्ज की है। जिससे शोर के बराबर वाली उच्च तरंगों की ध्वनि क्षमता का पता लगाने में सुधार हुआ है। धरती की सतह पर मौजूद साउंड वाइब्रेशन में कमी भी महसूस की गई है। इसे सीसमिक नॉइज भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि लॉकडाउन के कारण मानव गतिविधियां कम हो गई है। सभी बड़े शहरों में लोगों का आना-जाना, मिलना-जुलना बंद है।

भूकंपीय गतिविधियों को मापने में सहायता

ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे ने सिस्मोमीटर जोकि एक भूकंप मापने वाला यंत्र है की मदद से जो डाटा एकत्रित किया गया है उसमे देखा गया कि इंसानी गतिविधियां कम होने के कारण पृथ्वी से आने वाली आवाज़ों में भी कमी आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि पृथ्वी से आने वाली कंपन की आवाज़ में कमी आने का सीधा कारण लॉकडाउन की वजह से लोगो का घर पर रहना है। वास्तव में लॉकडाउन होने के कारण भूकंप वैज्ञानिकों ने बताया कि धरती पर 24 घंटे होने वाली गतिविधियां बंद हो गई हैं। पूरी दुनिया इस समय ठहरी हुई है। इस समय दुनिया भर में कम हुए ध्वनि प्रदूषण के चलते उन्हें बहुत छोटे छोटे भूकंप को मांपने में भी कोई कठिनाई नहीं हो रही हैं, जबकि इससे पहले ये बड़ी मुश्किल से संभव हो पाता था ।

दुनिया के ऐसे विमान जो रहस्यमय तरीके से गायब हो गए

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बोइंग 727-223

बोइंग 727-223 विमान वाणिज्यिक विमानों में से एक था। मई 2003 को यह विमान एंगोला हवाई अड्डे से गायब हो गया था l गायब हो जाने के कुछ समय बाद अमेरिका की संघीय जांच ब्यूरो और सीआईए की ड्यूनिया में खोज शुरू गई, हालांकि उनके प्रयासों में विमान का कोई निशान नहीं मिला। यह एक अमेरिकी पायलट और फ्लाइट इंजीनियर बेन चार्ल्स पैडिल का बोर्ड था, जो कांगो गणराज्य के एक मैकेनिक थे।

फ्लाइंग टाइगर लाइन फ्लाइट 739

वर्ष 1962 में गुआम नाम की एक अमेरिकी सैन्य उड़ान भरी गई थी और विमान पर 90 से ज्यादा सैन्यकर्मी सवार थे। ये लोग फिलीपींस जा रहे थे, लेकिन इन लोगों की उड़ान कभी भी ‍फिलीपींस नहीं पहुंची। दुर्घटना का एक खास पहलू यह है कि विमान पायलटों ने किसी भी खतरे की कोई सूचना नहीं दी थी। अमेरिकी सेना के 1300 लोगों ने इस विमान की खोज की लेकिन उन्हें इसका भी कोई सुराग नहीं मिल सका। इस मामले में एक लाइबेरियन टैंकर शिप के चालक दल के सदस्यों का दावा है कि उड़ान के समय उन्होंने आसमान में ‘अत्यधिक चमकीली रोशनी’ देखी थी लेकिन अमेरिकन सिविल एयरोनॉटिक्स बोर्ड का मानना है कि वह इस दुर्घटना के संभावित कारणों का पता लगाने में सक्षम नहीं रहा।

एयर फ्रांस फ्लाइट 447

वर्ष 2009 में रियो डि जेनेरियो से पेरिस जा रहा एक विमान ए 330 अटलांटिक महासागर में गायब हो गया। इस दुर्घटना में सभी 228 यात्री और चालक दल के सदस्यों की मौत हो गई। इस दुर्घटना में मारे गए लोगों के शवों और मलबे  की खोज करने में बहुत समय लग गया था।  दुर्घटना का कारण तीन वर्ष बाद सामने आया कि बर्फ के टुकड़ों के कारण ऑटोपायलट अलग हो गया था। इस दुर्घटना में 74 यात्रियों के शवों का आज तक पता नही चला है।

एमीलिया इअरहार्ट

सबसे प्रसिद्ध विमान के लापता होने की घटना एक महिला विमान चालक एमीलिया इअरहार्ट से जुड़ी हुई है जिनका विमान 1937 में गायब हो गया था। एमीलिया इअरहार्टहवाई जहाज से विश्व परिभ्रमण करना चाहती थी। लापता होने के वक़्त एमीलिया इअरहार्ट विमान के कप्तान फ्रेड नूनान के साथ प्रशांत महासागर के ऊपर उड़ान भर रही थी।  काफ़ी खोज-बीन करने के बाद भी दो-इंजन वाले इस विमान का पता लगाने में खोजकर्ता असफल रहे। एमीलिया इअरहार्ट को दो सालों के बाद मृत घोषित कर दिया गया। लेकिन विमान की तलाश फिर भी जारी रही।

ब्रिटिश साउथ अमरीकन एयरवेज़ स्टार डस्ट

अगस्त 1947 में स्टार डस्ट नाम का ब्रिटिश एवरो लैंकासटरियन एयरलाइनर ब्यूनस एअर्स से सैंटिआगो, चिली  विमान गायब  हो गया था। इस विमान में  11 लोग सवार थे।  विमान को खोजने की उस वक़्त की कोशिशे नाकाम रही थी। लेकिन 50 साल के बाद 1998 में अर्जेंटीना के दो रॉक क्लाइम्बर्स को  एंडीज पर विमान के इंजन के कुछ टुकड़े मिले थे और इसके बाद सैन्य अभियान में लोगों के अवशेष भी मिले थे। कुछ लोगों का मानना  है कि  विमान माउंट तुपानगेटो से टकराया होगा और बर्फीले तूफान  की वजह से विमान के टुकड़े और लोगों की लाशें बर्फ में दब गई होगी।

मलेशिया एयरलाइंस की उड़ान 370

इतिहास में सबसे बड़ी विमान रहस्यों में से एक, मलेशियन एयरलाइंस विमान का गायब होना। मलेशिया एयरलाइंस की M H  370 में 239 यात्रियों और 12 चालक दल के सदस्य थे। यह उड़ान सुबह 12 बजे शुरू हुई और सुबह 1:00 बजे से 19 मिनट में वायु यातायात नियंत्रण के साथ आखिरी बातचीत हुई । इसके  ठीक 49 मिनट बाद विमान का ट्रांसपॉन्डर ऑफ हो गया। ट्रांसपॉन्डर के बंद होते ही विमान रडार की नजरों से ओझल हो गया। एविएशन रेडियो टेक्नॉलॉजी में इसे पायरेसी भी कहा जाता है।

उरूग्वे एयर फोर्स फ़्लाईट 571

वर्ष 1972 में सांतियागो, चिली से एक विमान ने उड़ान भरी थी। इसमें 45 लोग सवार थे। खराब मौसम के कारण हुई इस दुर्घटना में 12 लोगों की मौत हो गई थी। 72 दिनों तक अधिकारियों को इस बात का पता नहीं था कि शेष लोग जिंदा हैं या नहीं । इसी बीच आठ लोगों की बर्फीले तूफान के कारण मौत हो गई।  शेष 16 लोगों को जीवित रहने के लिए अपने मृत साथियों का मांस खाना पड़ा। इन लोगों का पता विमान गायब होने की घटना के दो माह बाद चला था।

मानव इतिहास में दर्ज़ 10 महामारियाँ जिनमें लाखों-करोड़ों लोग मारे गए

दुनिया भर में कोविड19 यानि कोरोना वायरस का खौफ हावी है। दुनिया भर में इससे संक्रमित लोगों की संख्या लगभग 21.9 करोड़ तक पहुंच गई है। अब तक करीब 45.5 लाख लोग इस वायरस के चलते अपनी जान गंवा चुके हैं।

स. रा. अमेरिका, भारत, ब्राज़ील, मेक्सिको इससे सबसे अधिक प्रभावित है। विश्व स्वास्थ संगठन ने इसे वैश्विक महामारी घोषित किया है।

हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी बीमारी ने दुनिया भर में इतनी अधिक दहशत फैलाई हो। हैजा, प्लेग, चिकनपॉक्स, इंफ्लूएंजा मानव इतिहास के सबसे बड़े वायरस में शामिल रहे हैं। इन बीमारियों ने करोड़ों लोगों की जान ली है।

आइए जानते हैं कुछ ऐसी वैश्विक महामारियों के बारे में जिन्होंनें लाखों-करोड़ों लोगों की जिन्दगी छीन ली।

स्पैनिश इंफ्लूएंजा 1918-19

मौतें : 5-10 करोड़ (अनुमानित)

किसी भी महामारी में इतनी जानें नहीं गई जितनी कि 1918-1919 में हुई स्पैनिश इन्फ्लुएंजा में गई थी। दुनिया भर में, लगभग 5 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई थी। वायरस से होने वाली इस बीमारी से कई शहरों का नामोनिशान मिट गया। पूरी दुनिया की एक तिहाई यानि 50 करोड़ आबादी इस महामारी की चपेट में आ गई थी।

सन 1918 में लॉरेंस, मास, कैलिफोर्निया, अमेरिका में टेंटों के बाहर ताजी हवा में इलाज के दौरान नर्सें स्पेनिश इन्फ्लूएंजा महामारी के शिकार लोगों की देखभाल करते हुए। (हॉल्टन आर्काइव / गेटी इमेजेज़)

इस महामारी से 50 वर्ष से कम तक के वयस्कों की मृत्यु दर सबसे ज्यादा थी। वर्ष 1918 की शरद ऋतु में स्पेन में हुए इस विनाशकारी फ्लू के कारण इसे स्पैनिश इन्फ्लुएंजा नाम दिया गया। अकेले भारत में ही करीब 1 से 2 करोड़ लोगों की मौत हुई थी।

द ब्लैक डेथ (प्लेग ) 1346-1353

मौतें : 7.5 करोड़ से 20 करोड़

1346 से 1353 की अवधि के अंदर यूरोप में प्लेग की महामारी फैली। प्लेग महामारी के कारण  अफ्रीका और एशिया में करोड़ों लोग मारे गए। अनुमान है कि इस महामारी से 7.5 करोड़ से 20 करोड़ लोग मारे गए। इसकी शुरुआत एशिया से हुई, ऐसा माना जाता है।

प्लेग चूहों से फैलता है और फिर कीड़ों के जरिए मनुष्य इससे संक्रमित होता है। यह समुद्री जहाजों के जरिए पूरी दुनिया तक पहुंचा। इसका मुख्य वाहक जलपोत बने, जहां चूहों का पनपना आम बात है।

फ्ल्यू (1918 )

मौतें : 2 से 5 करोड़

1918 से 1920 की अवधि में इस जानलेवा इंफ्लूंजा ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लिया। दुनिया की आबादी का एक-तिहाई हिस्सा इसका शिकार बना और करीब 20 से 50 करोड़ लोगों की जान गई। इस बीमारी से 50 करोड़ लोग प्रभावित हुए और मरने वालों का आंकड़ा 10 से 20 फीसदी के बीच रहा।

इस बीमारी से पहले सप्ताह में ही 2.5 करोड़ लोग मारे गए। इस इंफ्लूंजा की ख़ास बात यह थी कि यह अधिकतर स्वस्थ य़ुवाओं की जान लेता था और जो बच जाते थे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को घटा देता था। सामान्यत: इंफ्लूएंजा से उम्रदराज लोगों अधिक प्रभावित होते हैं।

एच आईवी एड्स, 1976 – से अब तक

मौतें: 3.6 करोड़

सन 1976 में एचआईवी(ह्युमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस) यानि एड्स (एक्वायर्ड इम्युनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम) की शुरुआत अफ्रीकी देश कॉन्गो से हुई थी। बाद में यह वायरस पूरी दुनिया में फैल गया। साल 1976 के बाद एड्स के कारण 3.6 करोड़ लोग इसका शिकार हो गए।

वर्तमान में लगभग 3.1 से 3.5 करोड़ लोग एचआईवी से संक्रमित हैं। एचआइवी से संक्रमित अधिकतर लोग अफ्रीकी देशों में हैं।

2005 से 2012 की अवधि में एचआइवी का इसका प्रभाव सबसे ज्यादा रहा । इसके बाद प्रतिवर्ष मृत्यु का आंकड़ा 22 लाख से 16 लाख प्रति वर्ष तक कम हुआ है। इसका इलाज अभी तक नहीं खोजा जा सका है।

जस्टिनियन प्लेग (541 से 42 )

मौतें : 2.5 करोड़

जस्टिनियन प्लेग या बुबोनिक प्लेग नामक बीमारी ने यूरोप की आधी आबादी को समाप्त कर दिया था। इस बीमारी का सबसे अधिक प्रभाव बिजेटिनियन साम्राज्य और मेडिटेरिनियन पोर्ट पर पड़ा। केवल एक साल के अंदर ही इस बीमारी के कारण 2.5 करोड़ लोग मौत के मुहं में चले गए थे।

हालाँकि यह पता नहीं चल सका कि इस बीमारी की शुरुआत कहाँ से हुई। लेकिन इस बीमारी के कारण पूरी दुनिया प्रभावित हुई है। शहर की 40 फीसदी आबादी को समाप्त कर दिया था। बुबोनिक प्लेग  से मृत्यु की औसतन दर 5,000 लोग प्रतिदिन थी।

एन्टोनाइन प्लेग 165

मौतें: 50 लाख

एन्टोनाइन प्लेग  ने उस समय के एशिया, मिस्र, यूनान (ग्रीस) और इटली को सबसे अधिक प्रभावित किया। इस बीमारी को गेलेने के नाम से भी जाना जाता है। कई लोगों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण चेचक या स्मॉलपॉक्स है। हालाँकि इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। इस बीमारी के कारण 50 लाख लोग मौत के मुहं में चले गए।

एशियन फ्ल्यू 1956 -58

मौतें: 20 लाख

एशियन फ्लू ए ग्रेड का इंफ्लूएंजा है, जो H2N2 से फैलता है। इसकी शुरुआत सन 1956 से के मध्य हुई और यह महामारी साल 1958 तक रही। यह महामारी सिंगापुर, हांगकांग और अमेरिका तक फैली । विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार इस बीमारी की वजह से 20 लाख लोग मौत के मुंह में चले गए जिसमें 69,800 लोग अमेरिकी थे।

हांगकांग फ्लू

मौतें: 10 लाख

इस दूसरी श्रेणी की फ्लू महामारी को हांगकांग फ्लू के नाम से भी जाना जाता है। इसका महामारी का कारण H3N2 कीटाणु है जो इंफ्लूएंजा महामारी पैदा करने वाले H2N2 वायरस की एक प्रजाति है।

हांगकांग फ्ल्यू माहामारी का पहला मामला 13 जुलाई सन 1968 में हांगकांग में आया था और मात्र 17 दिनों के अंदर ही यह बीमारी सिंगापुर और वियतनाम तक फ़ैल गई। इसके बाद केवल तीन महीने के अंदर ही यह बीमारी फिलिपींस, भारत, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और अमेरिका में भी फैली और कई लोग इस बीमारी का शिकार हो गए।

इस बीमारी के शिकार होने वाले सिर्फ 5 फीसदी लोगों की मौत होती थी, मगर इसने तब हांगकांग के 5 लाख लोगों यानि उसकी तत्कालीन 15 फीसदी आबादी को मौत की नींद सुला दिया था।

फ्ल्यू 1889-90

मौतें: 10 लाख

फ्ल्यू महामारी को शुरु में एशियाई फ्लू या रूसी फ्लू नाम दिया गया था। यह भी ए ग्रेड का इंफ्लूएंजा है, जो H2N2 से फैलता है। हालांकि, कई शोध में इसकी वजह ए ग्रेड के H3N8 वायरस को भी माना गया है।

सन 1889 में मध्य एशिया के तुर्किस्तान में इस बीमारी का पहला मामला ध्यान में आया था। बाद में  उत्तर-पश्चिमी कनाडा, ग्रीनलैंड में बढ़ते शहरीकऱण के कारण यह बीमारी अधिक तेजी से फैली।

बाद में इस बीमारी की चपेट में पूरी दुनिया आ गई थी ।फ्ल्यू को बैक्टिरिया और वायरस से फैलने वाली पहली महामारी माना जाता है। 1890 तक इसने 10 लाख लोगों की जिन्दगी लील ली थी।

तीसरी श्रेणी का हैजा 1852-60

मौतें : 10 लाख

यह बीमारी हैजा(कॉलेरा) की सात श्रेणियों में से इसे सबसे अधिक जानलेवा माना जाता है। इस रोग की शुरुआत 19वीं सदी में हुई थी। इस बीमारी ने सबसे अधिक प्रभावित सन 1852 से 1860 के दौरान किया।

हैजा की शुरुआत भारत से हुई और फिर यह एशिया, यूरोप, उत्तरी अमेरिका और अफ्रीका तक फैल गया। हैजा के कारण  10 लाख लोगों की जान चली गई ।

ब्रिटिश डॉक्टर जॉन स्नो ने पिछड़े इलाकों में रहते हुए इस बीमारी की पहचान की थी। उन्होंने यह पता लगाया कि इस बीमारी की वजह दूषित जल था। साल 1854 में इस बीमारी ने ग्रेट ब्रिटेन में 23,000 लोगों को मौत नींद सुला दिया था।

हैजा (1910)

मौतें : 8 लाख से अधिक

हैजा के कारण फैली हैजा महामारी की शुरुआत भारत से हुई और इस बीमारी ने करीब 8 लाख से अधिक लोगों की जान ले ली। हैजा बीमारी की चपेट में मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, पूर्वी यूरोप और रूस भी आ गए थे।

अमेरिका स्वास्थ विभाग इस महामारी के प्रति जल्दी एक्टिव हुए और वर्ष 1923 तक सिर्फ 11 अमेरिकियों की जान इस बीमारी की वजह से चली गई।

ब्रहमाण्ड का सबसे बड़ा ज्ञात अजूबा है हमारा सौर मंडल

हमारा सौर मंडल बहुत बड़ा है l सौर मंडल की उत्पति 5 अरब  साल पहले हुई थी, जिसमें 1 सूर्य, 8 ग्रह, 5 बौने ग्रह, 181 चंद्रमा, 555,300 उल्कापिंड और करीब 3 हजार धूमकेतु हैं। यह सभी चीज़े सूर्ये की ग्रेविटी के कारण बंधी हुई हैं और इसी की परिक्रमा करती हैं।

सूर्य सौर मंडल का मुखिया है l सूर्य का जन्म 4.6 अरब  साल पहले हुआ था। सूर्य पृथ्वी से लगभग 13 लाख गुना बड़ा है और पृथ्वी को इसके ताप का 2 अरब वां भाग मिलता है। पृथ्वी से सूर्य की दूरी लगभग 149 लाख किमी है।

सौर मंडल में ग्रहों को दो भागों में बांटा गया है :-आंतरिक ग्रह और बहरी गृह। इन  ग्रहो को दो भागो में बाँटने का कारण है क्षुद्रग्रह घेरा। यह घेरा मंगल और बृहस्पति के बीच में है इनकी संख्या हज़ारो लाखो की है।

आंतरिक ग्रह

बुध

बुध ग्रह सौरमंडल का सबसे छोटा ग्रह है। अन्य ग्रहों की तुलना में बुध सूर्य के सबसे नज़दीक है। 180,000 किमी / घंटा की गति पर, यह अंतरिक्ष मे यात्रा करने वाला सबसे तेज़ ग्रह है। यह 88 दिनों में सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरा करता है। बुध का कोई उपग्रह नहीं है।

शुक्र

शुक्र  सौर मंडल  का सबसे गरम ग्रह है। इस ग्रह का तापमान 475 डि ग्री सेल्सिअस रहता है। यहाँ पर दिन और रात का तापमान एक समान रहता है  इसका कारण है कि  यहाँ के वातावरण में 96 % कार्बन डाइऑक्साइड है। शुक्र ग्रह को पृथ्वी की बहन भी कहा जाता है क्योंकि दोनों के आकार इस जैसा है। रात के समय यह सबसे ज़्यादा चमकने वाला ग्रह है और धरती से आसानी से पहचाना जा सकता है। सौर मंडल में यही एक मात्र ऐसा ग्रह है जो पूर्व से पश्चिम की ओर घूमता है। शुक्र ग्रह 225 दिनों में सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरा करता है।

पृथ्वी

पृथ्वी सूर्य से निकटतम तीसरा ग्रह और ब्रह्माण्ड में एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ जीवन का अस्तित्व है। अगर आप पृथ्वी की तस्वीरें देखें तो इसमें तीन रंग नज़र आते है :- नीला ,सफ़ेद और हरा।  ये नीला रंग महासागरों और सागरों का है।  सफ़ेद  रंग बादलों का और हरा रंग वनस्पति का है। धरती एक ऐसे वातावरण से घिरी हुई है जिसमें  नायट्रोजन,  आक्सीजन और कुछ मात्रा मे कार्बनडाईऑक्साइएड  और जल वाष्प  शामिल है। इसमें एक ओज़ोन परत  भी है जो  सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों को अपने अंदर सोख लेती है l पृथ्वी 365 दिनों में सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरा करती है।

मंगल

मंगल ग्रह को “लाल ग्रह”  के नाम से भी जाना जाता है। इसका कारण है इसका लाल रंग  होना। यह धरती से मिलता जुलता ग्रह है। हमारे सौरमंडल का सबसे अधिक ऊँचा पर्वत, ओलम्पस मोन्स मंगल पर ही स्थित है। सौर मंडल के सभी ग्रहों में हमारी पृथ्वी के अलावा, मंगल ग्रह पर जीवन और पानी होने की संभावना सबसे अधिक है। मंगल के दो चन्द्रमा, फोबोस और डिमोज़ हैं। इस ग्रह को पृथ्वी से नंगी आँखों से देखा जा सकता है। मंगल ग्रह 687 दिनों में सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरा करता है।

बाहरी ग्रह

बृहस्पति

यह सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। शुक्र ग्रह के बाद कई बार यह ग्रह सबसे ज्यादा चमकता है। जिसका कारण है इसका विशाल आकार। इसका व्यास धरती से 11 गुना ज़्यादा है। यह ग्रह सूर्य की तरह ही हाइड्रोजन और हीलियम से बना हुआ है। इसके तेज गति से घूमने के कारण यहाँ अक्सर तूफान आते रहते हैं। बृहस्पति के कम से कम 64 चन्द्रमा है। इसमें गैनिमीड सबसे बड़ा चन्द्रमा है जिसका व्यास बुध ग्रह से भी बड़ा है। बृहस्पति 12 सालों में सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरा करता है।

शनि

शनि सूर्य से छठां ग्रह है तथा बृहस्पति के बाद सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह हैं। और यह इसके रिंग ( Ring ) के लिए जाना जाता है। माना जाता है कि शनि ग्रह के कई पतले रिंग हैं जो बर्फ के कणों से बने हुए हैं। शनि के कुल 62 चंद्रमा हैं। इनमें सबसे बड़ा चंद्रमा टाइटन है जो बृहस्पति के गैनिमीड के बाद दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह है। शनि ग्रह 29 सालों में सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरा करता है।

अरुण

अरुण हमारे सौर मण्डल में सूर्य से सातवाँ ग्रह है। व्यास के आधार पर यह सौर मण्डल का तीसरा बड़ा और द्रव्यमान के आधार पर चौथा बड़ा ग्रह है। यह बृहस्पति और शनि ग्रह जैसा ही है परन्तु इसका तापमान बहुत ठंडा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह सूर्य से बहुत ज़्यादा दूरी पर है। इसके भी इर्द गिर्द रिंग हैं जिनका रंग काला है। अरुण ग्रह 84 सालों में सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरा करता है।

वरुण

वरुण हमारे सौर मण्डल में सूर्य से आठवाँ ग्रह है। व्यास के आधार पर यह सौर मण्डल का चौथा बड़ा और द्रव्यमान के आधार पर तीसरा बड़ा ग्रह है। वरुण को नीला दैत्य भी कहा जाता है। यह धरती से बहुत दूर है । इस ग्रह के 11 चंद्रमा हैं। अरुण ग्रह की तरह इसके भी पतले रिंग हैं। यह सौर मंडल का चौथा सबसे बड़ा ग्रह है। यह सूर्य से पृथ्वी के मुकाबले तीस गुना अधिक है। वरुण ग्रह 165 सालों में सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरा करता है।

क्षुद्रग्रह

क्षुद्रग्रह घेरा कई छोटे चट्टानों से मिल कर बना है जोकि मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच में है। ये सब भी सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सीरीस क्षुद्रग्रह सबसे बड़ा क्षुद्रग्रह है।

उल्का और उल्कापिंड

उल्का चट्टानों या धातु के छोटे टुकड़े होते हैं। जब क्षुद्रग्रह टूटते हैं तो उल्का बन जाते हैं। यह उल्का जब रफ़्तार से यात्रा करते हैं तो इनमें हवा के कारण से आग लग आती है और तब ये उल्का से उल्कापिंड बन जाते हैं। कई लोग इस गिरते हुए जलते उल्कापिंड को टूटता हुआ तारा कहते हैं।

धूमकेतु

धूमकेतु को कई लोग पुच्छल तारा भी कहते हैं। इसका कारण है इसके पीछे एक छोटी चमकदार पूँछ का होना। ये धूमकेतु पत्थर, धूल, बर्फ और गैस से बने होते हैं। जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा के दौरान गैस और धुल के कण पूँछ का आकार ले लेते हैं। सूर्य के पास आने पर उसके प्रकाश से ये भी चमक उठते हैं।

बौना ग्रह

हमारे सौरमण्डल में पाँच  बौने ग्रह है :- यम , सीरीस , हउमेया , माकेमाके , ऍरिस। यम को पहेल ग्रह ही माना जाता था परन्तु 2006 में इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के सम्मलेन में वैज्ञानिकों ने इसे बौने ग्रह में शामिल कर दिया।