अनसुलझे रहस्यों से भरा पड़ा है पेरू का शहर “माचू पिच्चू”

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दुनियाभर में कई ऐसी जगह मौजूद हैं, जो अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐतिहासिक जगह मौजूद हैं, जिन्हें देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। माचू पिच्चू भी इन्हीं जगहों में से एक है।

माचू पिच्चू ( Machu Pikchu) दक्षिण अमेरिकी देश पेरू मे स्थित एक कोलम्बस-पूर्व युग, इंका सभ्यता से संबंधित ऐतिहासिक स्थल है।यह समुद्रतल से 2,430 मीटर (करीब 8000 फीट) की ऊँचाई पर उरुबाम्बा घाटी के ऊपर एक पहाड़ी पर स्थित है, जहां से प्राकृति का खूबसूरत नज़ारा दिखाई देता है।

इसे अक्सर “इंकाओं का खोया शहर “ भी कहा जाता है। माचू पिच्चू इंका साम्राज्य के सबसे परिचित प्रतीकों में से एक है।

peru mysterious place Machu Picchu
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कैसे हुआ था माचू पिच्चू शहर का निर्माण

1430 ई. के आसपास इंकाओं ने इसका निर्माण अपने शासकों के आधिकारिक स्थल के रूप में शुरू किया था, लेकिन इसके लगभग सौ साल बाद, जब इंकाओं पर स्पेनियों ने विजय प्राप्त कर ली तो वे इसे ऐसे ही छोड़ कर चले गए।

हालांकि स्थानीय लोग इसे शुरु से जानते थे परन्तु 1911 में एक अमेरिकी इतिहासकार हीरम बिंघम ने इसे सारे विश्व से परिचित करवाया। साल 2007 में “दुनिया के सात अद्भुत अजूबों ” में इसे शामिल किया गया। आज माचू पिच्चू एक महत्वपूर्ण पर्यटन आकर्षण बन गया है।

खूबसूरती का अनूठा उदाहरण है माचू पिच्चू

माचू पिच्चू एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और इसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक माना जाता है। ये दुनिया के लिए आश्चर्य इसलिए है क्योंकि शहर में कम से कम 3000 पत्थर की सीढ़ियां बनी हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि पूरा शहर धातु के औजारों और पहियों के बिना बनाया गया था।

mysterious place peru Machu Picchu
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इसमें केवल एक प्रवेश द्वार बनाया गया था ताकि आक्रमण के वक्त इसकी सुरक्षा करना आसान हो सके। इंका लोगों के पास पत्थर काटने की अद्भुत तकनीक थी और पत्थरों को बेहद मजबूती जोड़ा गया था। यही कारण है कि यह शहर भूकंपों जैसी प्राकृतिक आपदाओं को झेलने के बाद भी कई सदियों से ऐसे ही खड़ा है।

रहस्यों का शहर माचू पिच्चू

माचू पिच्चू एक अद्वितीय और रहस्यमय स्थल है। जिसका इतिहास इंका सभ्यता की गहराई से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इस जगह से जुड़े ऐसे कई रहस्य हैं, जिनका जवाब किसी के पास नहीं है। यही वजह है कि इस जगह को ‘रहस्यमय शहर‘ भी कहा जाता है।

mysterious place Machu Picchu
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माचू पिच्चू शहर का निर्माण क्यों कराया गया था, यह अब तक एक रहस्य ही है। कहते हैं कि इस जगह का इस्तेमाल इंसानों की बलि देने के लिए किया जाता था और उन्हें यहीं पर दफना दिया जाता था।

पुरातत्वविदों को यहां से कई कंकाल भी मिले हैं, लेकिन सबसे हैरानी की बात यह है कि इनमें से अधिकतर कंकाल महिलाओं के हैं। कहा जाता है कि इंका सूर्य देव को अपना भगवान मानते थे और उन्हें खुश करने के लिए कुंवारी कन्याओं की बलि देते थे। हालांकि, बाद में पुरुषों के भी कंकाल मिले जिससे इस तथ्य को नकार दिया गया था।

साधारण सा दिखता है दुनिया का सबसे जहरीला पेड़, ले सकता है पल भर में जान

पेड़ पौधों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। सरल भाषा में कहा जाए तो इनसे ही जीवन है। पेड़ पौधे हमें शुद्ध वायु के साथ-साथ छाया, फल देते हैं। लेकिन क्या होगा अगर जीवन देने वाले यही पेड़-पौधे हमारी जान लेने लगें।

जी हाँ आज हम आपको एक ऐसे पेड़ के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे दुनिया का सबसे जहरीला पेड़ कहा जाता है। यहाँ तक कि बारिश में इस पेड़ के नीचे खड़े होने से भी हमें नुकसान पहुंच सकता है। तो चलिए जानते हैं इस खतरनाक पेड़ के बारे में:-

poisonous manchineel tree fruit
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कहाँ पाया जाता है ये पेड़

इस पेड़ का नाम है मैंशीनील (manchineel)। यह फ्लोरिडा और कैरेबियन सागर के बीच तटों पर पाया जाता है। इसके पेड़ की ऊंचाई लगभग 50 फीट तक होती है। इसकी पत्तियां चमकदार और आकार में अंडाकार होती हैं।

इस पेड़ के बारे में कहा जाता है कि यह इतना जहरीला होता है कि अगर कोई इंसान इसके संपर्क में आ जाए तो उसके शरीर पर छाले पड़ जाते हैं।

अगर इस पेड़ का रस किसी की आंखों तक पहुंच जाए तो वह इंसान अंधा हो सकता है। इतना ही नहीं, इस पेड़ की लकड़ियों को जलाने पर निकलने वाला धुआं भी अगर आंखों तक पहुंच जाए तो आंखों की रोशनी जा सकती है।

इस पेड़ का हर हिस्सा जहरीला है लेकिन इसका फल सबसे ज्यादा जहरीला माना जाता है। अगर कोई इंसान इस फल का एक टुकड़ा भी खा ले तो उसकी मौत हो सकती है।

poisonous manchineel dangrous tree fruit
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यह पेड़ देखने में हानिरहित लगता है, लेकिन है दुनिया का सबसे खतरनाक पेड़। हांलांकि वैज्ञानिक इस फल को चखकर देख चुके हैं। यह फल छोटे से सेब के आकार का होता है।

निकोला एच स्ट्रिकलैंड नाम के एक साइंटिस्ट ने बताया कि एक बार वे और उनके कुछ दोस्तों ने टोबैगो के कैरेबियन आइलैंड के बीच पर इस फल को खा लिया था, जो बेहद ही कड़वा था। इसके फल को ‘लिटिल एप्पल ऑफ डेथ’ ( little apple of death) का नाम दिया है।

निकोला ने कहा कि फल खाने के कुछ देर बाद ही उन्हें जलन होने लगी और शरीर में सूजन आ गया। हालांकि, तुरंत इलाज की वजह से वे ठीक हो गए।

उनके मुताबिक, यदि कोई इसके सेब जैसे दिखने वाले फल को खा ले तो उसकी मृत्यु भी हो सकती है। इस कारण से पेड़ के आसपास चेतावनी वाले बोर्ड भी लगे होते हैं। गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी इस पेड़ का नाम :”दुनिया के सबसे ख़तरनाक पेड़” के नाम से दर्ज़ है।

poisonous manchineel tree fruit hindi
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भले ही यह पेड़ जहरीला हो लेकिन स्थानीय पारितंत्र में इस पेड़ की अहम भूमिका है। यह पेड़ कैरिबियाई सागर के तटों पर पाया जाता है और मिट्टी के कटाव को रोकने में सहायक होता है।

 

क्यों मनाते हैं गणेश चतुर्थी, जाने क्या है इसके पीछे पौराणिक कथा

गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को देश भर में धूमधाम से मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेशजी का जन्म हुआ था, इस उपलक्ष्य में पूरे देश में धूमधाम से गणेश चतुर्थी का उत्सव मनाया जाता है।

क्यों मनाते हैं गणेश चतुर्थी का त्यौहार

गणेश चतुर्थी का त्योहार पूरे देश में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है और इसके पीछे एक मुख्य वजह छिपी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार,एक बार माता पार्वती ने स्न्नान के लिए जाने से पूर्व अपने शरीर के मैल से एक सुंदर बालक को उत्पन्न किया और उसे गणेश नाम दिया।

पार्वतीजी ने उस बालक को आदेश दिया कि वह किसी को भी अंदर न आने दे, ऐसा कहकर पार्वती जी अंदर नहाने चली गई। जब भगवान शिव वहां आए ,तो बालक ने उन्हें अंदर आने से रोका और बोले अन्दर मेरी माँ नहा रही है, आप अन्दर नहीं जा सकते।

शिवजी ने गणेशजी को बहुत समझाया, कि पार्वती मेरी पत्नी है लेकिन  गणेशजी नहीं माने तब शिवजी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने गणेशजी की गर्दन अपने त्रिशूल से काट दी और अन्दर चले गये, जब पार्वतीजी ने शिवजी को अन्दर देखा तो बोली कि आप अन्दर कैसे आ गये।

मैं तो बाहर गणेश को बिठाकर आई थी। तब शिवजी ने कहा कि मैंने उसको मार दिया। तब पार्वती जी रौद्र रूप धारण क्र लिया और कहा कि जब आप मेरे पुत्र को वापिस जीवित करेंगे तब ही मैं यहाँ से चलूंगी अन्यथा नहीं।

Ganesh Chaturthi festival

अन्य कथा

इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं। उनमें से एक आज हम आपको बताने जा रहे हैं। कहा जाता है कि पौराणिक काल में एक बार महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना के लिए गणेशजी का आह्वान किया और उनसे महाभारत को लिपिबद्ध करने की प्रार्थना की।

गणेश जी ने कहा कि मैं जब लिखना प्रारंभ करूंगा तो कलम को रोकूंगा नहीं, यदि कलम रुक गई तो लिखना बंद कर दूंगा। तब व्यास जी ने कहा प्रभु आप विद्वानों में अग्रणी हैं और मैं एक साधारण ऋषि किसी श्लोक में त्रुटि हो सकती है, अतः आप निवारण करके ही श्लोक को लिपिबद्ध करना और तब व्यास जी ने श्लोक बोलना और गणेशजी ने महाभारत को लिपिबद्ध करना प्रारंभ किया।

उसके 10 दिन के पश्चात अनंत चतुर्दशी को लेखन कार्य समाप्त हुआ। इन 10 दिनों में गणेशजी एक ही आसन पर बैठकर महाभारत को लिपिबद्ध करते रहे, इस कारण 10 दिनों में उनका शरीर जड़वत हो गया और शरीर पर धूल, मिट्टी की परत जमा हो गई, तब 10 दिन बाद गणेशजी ने सरस्वती नदी में स्नान कर अपने शरीर पर जमी धूल और मिट्टी को साफ किया।

जिस दिन गणेशजी ने लिखना आरंभ किया उस दिन भाद्रमास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। इसी उपलक्ष्य में हर साल इसी तिथि को गणेशजी को स्थापित किया जाता है और दस दिन मन, वचन कर्म और भक्ति भाव से उनकी उपासना करके अनन्त चतुर्दशी पर विसर्जित कर दिया जाता है।

आध्यात्मिक महत्व

इसका आध्यात्मिक महत्व यह है कि हम दस दिन संयम से जीवन व्यतीत करें और दस दिन पश्चात अपने मन और आत्मा पर जमी हुई वासनाओं की धूल और मिट्टी को प्रतिमा के साथ ही विसर्जित कर एक निर्मल मन और आत्मा के रूप को प्राप्त करें।

शिकार होते-होते बचा शिकारी, बंदरों के हमले में बाल-2 बचा तेंदुआ

बीच सड़क में बंदरों की भारी भीड़ को देख कर तेंदुए को लगा होगा कि चलो खाने का बंदोबस्त तो हो गया। तेंदुए ने फिर किसी एक बंदर को निशाना बना कर उस पर झपट्टा मारने को सरपट दौड़ लगा दी। पर अगले ही पल तेंदुए को जान के लाले पड़ गए।

दक्षिण अफ्रीका के क्रूगर नेशनल पार्क में बैबून (बंदर की एक प्रजाति ) का एक पूरा झुंड बीच सड़क में अटखेलियाँ कर रहा था जब यह वाक़या घटा। यह घटना एक पर्यटक के कैमरे में क़ैद हो गयी जो उन्होंने LatestSightings नामक यू ट्यूब चैनल के साथ शेयर की है।

तुर्किये की 38 वर्षीय मर्व मेर्सिनलिगिल, अपने पति 44 वर्षीय वकील विक्टर सज़ोंटाघ के साथ अपनी पहली क्रूगर नेशनल पार्क सफारी पर थीं, जब उन्होंने यह सब कैमरे में कैद कर लिया। बाद में उसने अपनी कहानी और वीडीयो यू ट्यूब चैनल साथ साझा की।

सतारा कैंप में अपने हनीमून के दौरान मर्व और उनके पति कुछ घंटे पहले ही क्रूगर पहुंचे थे। वे पॉल क्रूगर गेट से त्शोकवाने की ओर गाड़ी चला रहे थे जब अचानक, उन्होंने सड़क के बगल में एक तेंदुए को चलते हुए देखा। वह बहुत सहज दिख रहा था और किसी खास जल्दी में नहीं लग रहा था।

तभी अचानक तेंदुआ घास में गायब हो गया और उन्हें लगा कि मामला ख़त्म हो गया। थोड़ा आगे जाकर उन्होंने देखा कि लगभग 50 बंदरों का एक झुंड सड़क पार कर रहा था, जिससे थोड़ी डेर के लिए ट्रैफिक जाम जैसा हो गया। हालाँकि बैबून सड़क पार करने की जल्दी में नहीं दिख रहे थे और सड़क के बीचों बीच उत्पात मचा रहे थे।

मैंने अपने पति से मज़ाक में कहा, “शायद हमें बंदरों को उस तेंदुए के बारे में बता देना चाहिए जिसे हमने अभी देखा है”। “मैं खूब हंसा, खासकर इसलिए क्योंकि यह अफ़्रीकी जंगल में मेरा पहला मौका था।” मर्व और उसके पति विक्टर ने कहा।

“लेकिन तेंदुआ बिलकुल यही सोच कर वहाँ आया था। उसको लगा होगा कि यहाँ उसे आसानी से भोजन मिल जाएगा। लेकिन यहाँ पर तेंदुए को सबक़ मिलने वाला था।”

जैसे ही तेंदुए ने हमला किया, एक भारी भरकम नर बैबून, जो कि बंदरों का सरदार लग रहा था, ने तेंदुए का रास्ता रोका और उस पर जवाबी हमला कर दिया। इसके साथ अन्य बंदरों ने भी उस पर धावा बोल दिया।

तेंदुए ने इतने ज़ोरदार जवाबी हमले की अपेक्षा नहीं की थी। जल्दी ही तेंदुए के पैर उखड़ गए और वह जैसे-तैसे जान बचा कर झाड़ियों में वापिस भाग गया। बंदरों ने भी मौक़े का फ़ायदा उठा कर उसे दूर तक खदेड़ दिया।

हमले के काफ़ी देर बाद तक बंदर पहरा देते रहे, यह सुनिश्चित करते हुए कि श्रीमान तेंदुए को स्पष्ट संदेश मिल जाए, कि, “हिम्मत है तो आ, फिर से बताते हैं तुझे!”

क्रूगर नेशनल पार्क

उत्तरपूर्वी दक्षिण अफ्रीका में क्रूगर नेशनल पार्क, अफ्रीका के सबसे बड़े वन्य-जीव अभयारण्यों में से एक है। यहाँ जंगली जानवरों की विशाल संख्या में 5 बड़े जानवर शामिल है: शेर, तेंदुआ, गैंडा, हाथी और भैंस। सैकड़ों अन्य स्तनधारी जानवर यहां पर रहते हैं।

साथ ही गिद्ध, चील और सारस जैसी विभिन्न पक्षी प्रजातियां भी यहां पायी जाती हैं। पहाड़, विशाल झाड़ीदार मैदान और घने उष्णकटिबंधीय जंगल सभी इस वन्य रिज़र्व का हिस्सा हैं। दुनिया भर से हज़ारों प्रकृति और वन्य-जीव प्रेमी हैं पर्यटन के लिए आते हैं।

भारत की आजादी के बारे में 10 दिलचस्प तथ्य!

भारत में हर वर्ष 15 अगस्त का दिन आजादी दिवस के रूप में मनाया जाता है. दो सौ साल की गुलामी के कठिन दौर और उसके बाद सौ साल के संघर्ष के बाद भारत 15 अगस्त, 1947 को आधी रात के समय अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो गया. इस तरह से यह दिन फिर भारत के इतिहास का सबसे बड़ा दिन बन गया.

यह हैं भारत की आजादी के बारे में 10 सबसे दिलचस्प तथ्य जिनके बारे में आपको बहुत कम जानकारी होगी.

पहला राष्ट्रीय ध्वज

गुलाम भारत में सबसे पहले 7 अगस्त 1906 को राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था और इस राष्ट्रीय ध्वज को तीन लाल, हरी और पीली रंग की पट्टीयों से डिजाईन किया गया था. इस ध्वज की हरी पट्टी में आठ सफेद कमल के फूल, लाल पट्टी में सफेद रंग से बना एक चंद्रमा व सूरज और बीच वाली पीली पट्टी में वन्दे मातरम् लिखा था

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वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज का डिजाईन

भारत के वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज के पहले संस्करण का डिजाईन तैयार करने का दारोमदार पिंगली वेंकय्या को जाता है. उन्होंने यह डिजाईन 1921 में तैयार किया था. इस ध्वज में तीन अलग-अलग रंग की पट्टीयां थी. इसमें से लाल और हरी पट्टी, भारत के दो प्रमुख समुदायों के रंग को दर्शाती थी और ऊपर की सफेद पट्टी अन्य समुदाय के लोगों के रंग को दर्शाती थी. इस ध्वज में एक चर्खी भी बनी हुई थी.

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राष्ट्रीय गीत

जब भारत आजाद हुआ उस समय भारत का कोई भी राष्ट्रीय गीत नहीं था. फिर “जन गण मन” को भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार कर लिया गया. इस गीत को मूलतः बंगाली में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखा गया था.

15 अगस्त को अन्य आजादी पाने वाले देश

उत्तरी कोरिया, दक्षिण कोरिया, रिपब्लिक ऑफ़ कांगो और बहरीन को भी 15 अगस्त के दिन आजादी मिली थी.

15 अगस्त को गाँधी का अनशन

जब भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ, उजी स समय गांधी कलकत्ता में थे. वह उस समय भारत में फैल रही साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन कर रहे थे.

कांग्रेस पार्टी का भविष्य

महात्मा गांधी देश की आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी को भंग करने के पक्ष में थे.

राष्ट्रीय भाषा

हिंदी भारत की राष्ट्रीय भाषा नहीं है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुछेद 343 के अनुसार हिंदी भारत की अधिकारिक भाषा है.

नाम का अर्थ

भारत(INDIA) का नाम इंडस(Indus) नदी के नाम से पड़ा, जो प्राचीन ज्ञात सभ्यताओं का घर थी. दूसरी तरफ भारत का संस्कृत नाम भारत प्राचीन चक्रवर्ती राजा भरत के नाम पर पड़ा है.

गोवा का विलय

भारत को जब आजादी मिली थी, उस समय भारत के राज्य गोवा को पुर्तगाली राज्य घोषित कर दिया गया था. फिर 19 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना द्वारा गोवा पर हमला कर के पुर्तगाल से आजाद करा लिया गया जिसके बाद गोवा भारत का राज्य बना.

नेहरु जैकेट

भारत की आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरु को वैश्विक स्टाइल आइकॉन के रूप में माना जाने लगा था उनके द्वारा पहनी जाने वाली प्रसिद्ध जैकेट जिसको नेहरु जैकेट भी कहते हैं, पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गयी. उन्होंने अपने इस स्टाइल से अपना नाम मशहूर वोग पत्रिका में दर्ज करा लिया था.

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भारत के स्वतंत्रता दिवस से जुड़े जानने योग्य रोचक तथ्य

15 अगस्त 2023 को भारत अपनी आज़ादी का 77वां साल मना रहा है। 200 सालों की गुलामी के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ था जो कि सन 1857 से शुरू हुई क्रांति से शुरू होकर लगभग 100 साल तक चले अनवरत संघर्ष का परिणाम था।

आज़ादी के लिए भारत के कई वीरों और वीरांगनाओं ने अपने जीवन का बलिदान दिया है जिसके कारण आज हम आजादी के ये दिन देख पा रहे है। जाहिर है कि इस दिन के साथ हमारे देश के लोगों की बहुत सी यादें जुडी हुई है।

हमने भारत की स्वतंत्रता पर कुछ रोचक तथ्य और जानकारियाँ एकत्रित की हैं जो हम यहाँ आपके साथ शेयर करना चाहते हैं।उम्मीद करते हैं कि आपको ये पसंद आयेंगे। स्वतंत्रता दिवस की ढेरों शुभकामनाएं!!

  • 14 अगस्त की मध्यरात्रि को जवाहर लाल नेहरू ने अपना ऐतिहासिक भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टनी’ दिया था। जबकि वे देश के पहले प्रधानमंत्री 15 अगस्त की सुबह बने थे। इस भाषण को पूरी दुनिया ने सुना था लेकिन महात्मा गांधी ने इसे नहीं सुना क्योंकि वे अपनी दिनचर्या के अनुसार जल्दी सोने चले गए थे।
  • 15 अगस्त, 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने दफ़्तर में काम किया। दोपहर में नेहरू ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल की सूची सौंपी और बाद में इंडिया गेट के पास प्रिसेंज गार्डेन में एक सभा को संबोधित किया।

  • भारत का राष्ट्रीय ध्वज पहली बार 7 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान स्क्वायर में फहराया गया था, लाल किले में नहीं, और इसमें लाल, पीले और हरे रंग की लम्बवत(horizontal) धारियां थीं।
  • जिस दिन 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, उस समय भारत का कोई राष्ट्रगान नही था. 1950 में “जन गण मन ” को भारत के राष्ट्रगान का गौरव मिला था लेकिन आजादी के वक्त केवल नेहरु जी के भाषण और लोगो में आजादी का उत्साह ही उनके राष्ट्रगान का प्रतीक था। वैसे हमारे राष्ट्रगान “जन गण मन ” को 1911 को ही लिखा जा चुका था।
  • भारत के अहिंसक स्वाधीनता आंदोलन का संचालन महात्मा गांधी ने किया था। लेकिन जब देश को 15 अगस्त, 1947 को आजादी मिली, तो वे इस जश्न में शामिल नहीं हुए थे, क्योंकि वह दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर बंगाल के नोआखली में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच हो रही सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन कर रहे थे।
  • जब तय हो गया कि भारत 15 अगस्त को आजाद होगा, तो जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी को एक पत्र भेजा। इस पत्र में लिखा था, 15 अगस्त हमारा पहला स्वाधीनता दिवस होगा। आप राष्ट्रपिता हैं, इसमें शामिल हो कर अपना आशीर्वाद दें। गांधी ने इस ख़त का जवाब भिजवाया, जब कलकत्ता में हिंदु-मुस्लिम एक दूसरे की जान ले रहे हैं, ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं। मैं दंगा रोकने के लिए अपनी जान दे दूंगा।
  • महात्मा गांधी भारत के विभाजन से मिलने वाली स्वाधीनता के घोर-विरुद्ध थे। उनका कहना था कि विभाजन उनकी लाश पर होगा, और अंतत: हुआ भी ऐसा ही, उनकी मौत का कारण भारत का विभाजन ही बना।
  • महात्मा गांधी अहिंसा के मार्ग पर चलकर आजादी चाहते थे लेकिन कुछ लोगों का मानना था कि आजादी किसी भी कीमत पर मिले मंजूर है। इसके चलते भगत सिंह, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे वीरों ने आज़ादी के लिए अलग रास्ता अपना लिया.
  • भारत अपना स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को मनाता है, जबकि पाकिस्तान 14 अगस्त को अपना आज़ादी दिवस मनाता हैं। इसका कारण यह है कि आजादी की घोषणा से एक दिन पहले भी भारत विभाजन की घोषणा कर दी गयी थी.
  • 15 अगस्त तक भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा का निर्धारण नहीं हुआ था। इसका फ़ैसला 17 अगस्त को रेडक्लिफ लाइन की घोषणा से हुआ।
  • यह लार्ड माउंटबेटन ही थे जिन्‍होंने निजी तौर पर भारत की स्‍वतंत्रता के लिए 15 अगस्‍त का दिन तय किया क्‍योंकि इस दिन को वह अपने कार्यकाल के लिए बेहद सौभाग्‍यशाली मानते थे।
  • स्वतंत्रता के बाद पुर्तगाल ने अपने संविधान में बदलाव करके एक खेल खेला और गोवा को अपना राज्य घोषित कर लिया, लेकिन 19 दिसम्बर 1961 को भारतीय सशस्त्र बलों ने गोवा पर कब्ज़ा कर लिया और इसे भारत में जोड़ा।
  • लालकिले पर झंडा भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा 15 अगस्त को फहराया जाता है, लेकिन 1947 में लाल किले पर नेहरु ने झंडा 15 को नहीं, बल्कि 16 अगस्त को फहराया था।
  • 15 अगस्त 1947 को शुक्रवार का दिन था।
  • 15 अगस्त को भारत के अलावा तीन अन्य देशों का भी स्वतंत्रता दिवस है।
  • दक्षिण कोरिया जापान से 15 अगस्त, 1945 को आज़ाद हुआ था।  ब्रिटेन से बहरीन 15 अगस्त, 1971 को और फ्रांस से कांगो 15 अगस्त, 1960 को आज़ाद हुआ था।

भारत के ये जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी, भारत की आज़ादी में है विशेष योगदान

आज 15 अगस्त, 2023 को देशभर में 77वां स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है। 15 अगस्त 1947 को भारत देश ने  अंग्रेजों के शासन से 200 वर्ष बाद आजादी प्राप्त की थी। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हज़ारों-लाखों जाने-अनजाने व्यक्तियों के योगदान से भारत आजाद हुआ है।

भारत के हर एक देशवासी ने अपने राज्य और क्षेत्र के स्तर से ऊपर उठ कर भारत को स्वाधीन करने का बीड़ा उठाया और आखिर 15 अगस्त 1947 को इन सबकी मेहनत रंग लायी। अंग्रेजों के खिलाफ इस संघर्ष में जहाँ देश भर के विशिष्ट राजनायकों, समाजसेवियों, क्रांतिकारियों ने योगदान दिया वहीँ सुदूर- दुर्गम क्षेत्रों में बसने वालीं जनजातियों ने भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया।

भारत के ये जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी, जिन्हें ज्यादा लोग नहीं जानते भारत के ऐसे महान सुपूत थे जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। भारतीय जनजाति समुदाय से सम्बंधित ऐसे ही कुछ महान स्वंतंत्रता नायकों की जानकारी हम आपके साथ इस पोस्ट के माध्यम से साँझा कर रहे हैं।

बिरसा मुंडा

मुंडा जनजाति के बिरसा मुंडा अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के महानायक थे। उन्होंने अंग्रेजों के साथ कई संघर्षों में मुंडा लोगों का नेतृत्व किया। उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया गया और ब्रिटिश रिकॉर्ड के अनुसार जेल में ही हैजा से उनकी मौत हो गई। हालाँकि कुछ स्रोतों के अनुसार 9 जून 1900 को रांची जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। जिस समय उनकी मौत हुई वह सिर्फ 25 साल के थे।

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 में हुआ था।  इनके जन्मदिन 15 नवंबर को देश में ‘जनजातीय गौरव दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है। बिरसा मुंडा की समाधि रांची के कोकर में स्थित है।  वे आदिवासियों के बीच भगवान की तरह पूजे जाते हैं और इन्हें भगवान बिरसा मुंडा कहा जाता है।

भीमा नायक

भीमा नायक का जन्म मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में हुआ था। वर्ष 1857 में हुए अंबापानी युद्ध में भीमा नायक की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अंग्रेज जब भीमा नायक को सीधे नहीं पकड़ पाए तो उन्होंने उन्हें धोखे से पकड़ा।

तत्कालीन समय में जब तात्या टोपे निमाड़ आए, तब उनकी मुलाकात भीमा से हुई। इसी दौरान भीमा ने उन्हें नर्मदा नदी पार करने में सहयोग किया था। भीमा नायक को निमाड़ का रॉबिनहुड़ कहा जाता है।

तांतिया भील

मध्यप्रदेश के रोबिन हुड के नाम से मशहूर तांतिया भील ने अंग्रेजों की धन-संपत्ति ले जा रही ट्रेनों में डकैती डाली और उस संपत्ति को अपने समुदाय के लोगों के बीच बांट दिया। उन्हें भी जाल बिछाकर पकड़ा और फांसी पर चढ़ा दिया गया।

तांतिया भील का जन्म मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में 1842 में हुआ था। इन्हें आदिवासी नायक, टंट्या मामा और ‘भारत के रॉबिनहुड‘ के नाम से भी जाना जाता है। अपने जीवनकाल में तांतिया भील मामा ने आजादी के अनेक विद्रोहों में भाग लिया। 1857 की क्रांति में इन्होंने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने गोरिल्ला युद्ध पद्धति के जरिए अंग्रेजों से लोहा लिया। 4 दिसंबर 1889 को उन्हें फांसी दी गई।

जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी

संस्कृति मंत्रालय ने 20 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों की कथाओं पर आधारित तीसरी कॉमिक बुक जारी की है। जिनमें ऊपर लिखित सेनानियों के आलावा इन सेनानियों की कहानियां सम्मिलित हैं।

  1. तिलका मांझी, जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ज्यादतियों के खिलाफ संघर्ष किया। वे पहाड़िय़ा जनजाति के सदस्य थे और उन्होंने अपने समुदाय को साथ लेकर कंपनी के कोषागार पर छापा मारा था। इसके लिए इन्हें फांसी की सजा दी गई।
  2. थलक्कल चंथू, कुरिचियार जनजाति के सदस्य थे और इन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ पाजासी राजा के युद्ध में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इन्हें फांसी दे दी गई।
  3. बुद्धु भगत, उरांग जनजाति के सदस्य थे। ब्रिटिश अधिकारियों के साथ हुई कई मुठभेड़ों में से एक में इन्हें, इनके भाई, सात बेटों और इनकी जनजाति के 150 लोगों के साथ गोली मार दी गई।
  4. खासी समुदाय के प्रमुख तीरत सिंह को अंग्रेजों की दोहरी नीति का पता लग गया था, इसलिए उन्होंने उनके खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। इन्हें पकड़ लिया गया, यातना दी गई और जेल में डाल दिया गया। जेल में ही इनकी मौत हो गई।
  5. राघोजी भांगरे, महादेव कोली जनजाति के थे। इन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया और उनकी मां को कैद किए जाने के बावजूद उनका संघर्ष जारी रहा। इन्हें पकड़ लिया गया और फांसी दे दी गई।
  6. सिद्धू और कान्हू मुर्मू, संथाल जनजाति के सदस्य थे, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। इन्होंने हुल विद्रोह में संथाल लोगों का नेतृत्व किया। दोनों को धोखा देकर पकड़ लिया गया और फांसी दे दी गई।
  7. रेन्डो मांझी और चक्रा विसोई, खोंद जनजाति के थे। जिन्होंने अपनी जनजाति के रिवाजों में हस्तक्षेप करने पर ब्रिटिश अधिकारियों का विरोध किया। रेन्डो को पकड़ कर फांसी पर लटका दिया गया जबकि चक्रा विसोई भाग गया और कहीं छिपे रहने के दौरान उसकी मौत हो गई।
  8. मेरठ में शुरू हुए भारतीय विद्रोह में खारवाड़ जनजाति के भोगता समुदाय के नीलांबर और पीतांबर ने खुलकर भाग लिया और ब्रिटिश उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने में अपने लोगों का नेतृत्व किया। दोनों को पकड़ लिया गया और फांसी दे दी गई।
  9. गोंड जनजाति के रामजी गोंड ने उस सामंती व्यवस्था का विरोध किया, जिसमें धनी जमींदार अंग्रेजों के साथ मिलकर गरीबों को सताते थे। इन्हें भी पकड़ कर फांसी पर चढ़ा दिया गया।
  10. खरिया जनजाति के तेलंगा खरिया ने अंग्रेजों की कर व्यवस्था और शासन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और इस बात पर अड़े रहे कि उनकी जनजाति का स्वशासन का पारंपरिक तरीका जारी रखा जाए। उन्होंने अंग्रेजों के कोषागार पर संगठित हमले किए। उन्हें धोखे से पकड़ कर गोली मार दी गई।
  11.  मणिपुर के मेजर पाउना ब्रजवासी, अपनी मणिपुर की राजशाही को बचाने के लिए लड़े। वे अंग्रजों और मणिपुर के राजा के बीच हुए युद्ध के हीरो थे। वे एक सिंह की तरह लड़े लेकिन उन्हें पकड़ कर उनका सर धड़ से अलग कर दिया गया।
  12. अरुणाचल प्रदेश की आदि जनजाति के मटमूर जमोह ब्रिटिश शासकों की अकड़ के खिलाफ लड़े। उनके गांव जला दिए गए जिसके बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ अंग्रेजों के सामने हथियार डाल दिए। उन्हें सेलुलर जेल भेज दिया गया, जहां उनकी मौत हो गई।
  13. उरांव जनजाति के ताना भगत अपने लोगों को अंग्रेज सामंतों के अत्याचार के बारे में बताते थे और ऐसा माना जाता है कि उन्हें लोगों को उपदेश देने का संदेश उनके आराध्य से मिला था। उन्हें पकड़ कर भीषण यातनाएं दी गईं। यातनाओं से जर्जर ताना भगत को जेल से रिहा तो कर दिया गया, लेकिन बाद में उनकी मौत हो गई।
  14. चाय बागान में काम करने वाले समुदाय की मालती मीम महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन से प्रभावित होकर उसमें शामिल हो गईं। उन्होंने अफीम की खेती पर अंग्रेजों के आधिपत्य के खिलाफ संघर्ष किया और लोगों को अफीम के नशे के खतरों के बारे में जागरूक किया। पुलिस के साथ मुठभेड़ में गोली लगने से उनकी मौत हो गई।
  15. भूयां जनजाति के लक्ष्मण नायक भी गांधी जी से प्रेरित थे और उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन में शामिल होने के लिए अपनी जनजाति के लोगों को काफी प्रेरित किया। अंग्रेजों ने उन्हें अपने ही एक मित्र की हत्या के आरोप में पकड़ कर फांसी की सजा दे दी।
  16. लेप्चा जनजाति की हेलन लेप्चा, महात्मा गांधी की जबरदस्त अनुयायी थीं। अपने लोगों पर उनके प्रभाव से अंग्रेज बहुत असहज रहते थे। उन्हें गोली मार कर घायल किया गया, कैद किया गया और प्रताड़ित किया गया लेकिन उन्होंने कभी साहस नहीं छोड़ा। 1941 में उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की उस समय जर्मनी भागने में मदद की जब वह घर में नजरबंद थे। उन्हें स्वाधीनता संघर्ष में अतुलनीय योगदान के लिए ‘ताम्र पत्र’ से पुरस्कृत किया गया।
  17. पुलिमाया देवी पोदार ने गांधीजी का भाषण तब सुना जब वह स्कूल में थीं। वे तुरंत स्वाधीनता संघर्ष में शामिल होना चाहती थीं। अपने परिवार के कड़े विरोध के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद न सिर्फ खुद आंदोलन में हिस्सा लिया बल्कि अन्य महिलाओं को भी इसके लिए प्रोत्साहित किया। विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण उन्हें कैद कर लिया गया। आजादी के बाद भी उन्होंने अपने लोगों की सेवा करना जारी रखा और उन्हें ‘स्वतंत्रता सेनानी’ की उपाधि दी गई।

स्वतंत्रता दिवस पर ये किया तो हो सकती है जेल!

इस बार, स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) को भारत की केंद्र सरकार ने सभी नागरिकों को सलाह दी है, कि वह प्लास्टिक के बने ‘ तिरंगे ‘ का उपयोग ना करे । देश के सभी राज्यों और केंद्र शाषित प्रदेशों को भी इस नियम का सख्ती से अनुपालन करने के लिए कहा गया है, अगर कोई स्वतंत्रता दिवस पर प्लास्टिक के  ‘तिरंगे ‘ का उपयोग करता है, तो उसे आजादी के बजाय सजा मिल सकती है.

राज्य  और केंद्र शाषित प्रदेशों को भेजी गई सलाहकार में गृह मंत्रालय ने कहा है, कि ‘तिरंगा’ भारत के लोगों की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए देश के तिरंगे को सम्मान देना हमारा फ़र्ज़ बनता है।

मंत्रालय ने कहा , कि यह उनके नोटिस में आया है, कि स्वतंत्रता दिवस को महत्वपूर्ण समारोहों में प्लास्टिक के तिरंगे  का उपयोग किया जाता है, जो की किसी अपराध से कम नहीं, क्योंकि भारत में प्लास्टिक की किसी भी वस्तु के उपयोग करने पर प्रतिबंध लगा हुआ है, और प्लास्टिक के तिरंगे स्वाभाविक रूप से नष्ट नहीं होते हैं, इसलिए स्वतंत्रता दिवस को इनका उपयोग ना किया जाए.

अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रीय तिरंगे का अपमान करता है या फिर स्वतंत्रता दिवस को प्लास्टिक के बने तिरंगे का उपयोग करता है, तो उसको राष्ट्रीय सन्मान के अपमान में नियम-1971 की धारा-2 के अनुसार 3 साल की जेल सजा के तौर पर हो सकती है. फ्लैग कोड ऑफ़ इंडिया-‘2002 ‘ की धारा  के अनुसार स्वतंत्रता दिवस को कागज़ के बने तिरंगो का ही उपयोग भारत के नागरिकों को करना होगा.

क्या आपने देखी है कभी टनल ऑफ़ लव

रोचक प्रसंग- डा. विक्रम साराभाई की ‘सादगी और भगवदगीता का वैज्ञानिक महत्व

चेन्नई में एक सज्जन धोती-शाल ओढ़े समुद्र तट पर बैठे श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ कर रहे थे। उसी समय एक लड़का वहां आया तथा उनको देखकर बोला, “क्या आप आज भी विज्ञान के इस युग में इतनी पुरानी किताब पढ़ते हैं? देखिए! हम चांद पर पहुंच गए हैं और आप इन्हीं में व्यस्त हैं।”

वह सज्जन भगवद्गीता से ध्यान हटा कर उस लड़के की ओर देख कर बोले, “तुम भगवद्गीता के बारे में क्या जानते हो?”

लड़के ने प्रश्न का उत्तर नहीं दिया और उत्साह से बोला, ” विज्ञान के इस युग में इन पुरानी किताबों को पढ़ कर क्या होगा। मैं इन सब में विश्वास नहीं करता। मैं विक्रम साराभाई रिसर्च इंस्टीच्यूट का छात्र और एक वैज्ञानिक हूँ। देखिए, दुनिया चांद पर पहुंच गई है और आप अब भी गीता और रामायण पर अटके हुए हैं।”

तभी दो बड़ी कारें वहां आकर रुकीं। एक कार से कुछ ब्लैक कमांडो उतरे और एक आदमी ने दूसरी कार का पिछला दरवाजा खोला, सलाम किया और झुक कर दरवाजे के पास खड़ा हो गया। जो सज्जन भगवद्गीता का पाठ कर रहे थे, धीमी गति से चल कर कार में बैठ गए। लड़के ने सोचा कि यह आदमी कोई प्रसिद्ध व्यक्ति लगता है। वह उनके पास गया और पूछा, “सर, आप कौन हैं?”

वह सज्जन बड़े शांत स्वर में बोले, “मैं विक्रम साराभाई हूं”। लड़के को जैसे बिजली का झटका लगा।

क्या आप जानते हैं कि यह लड़का कौन था? वह थे भारत के मिसाइलमैन डाक्टर एपीजे अब्दुल कलाम जो बाद में महान वैज्ञानिक बने तथा उन्होंने भारत राष्ट्रपति का पद भी सुशोभित किया।

श्री अब्दुल कलाम पर इस घटना का इतना प्रभाव पड़ा कि उन्होंने भगवद्गीता पढ़ने के साथ-साथ रामायण, महाभारत और अन्य धार्मिक पुस्तकें भी पढ़ीं। कहा जाता है कि इस घटना के बाद उन्होंने मांस का सेवन भी त्याग दिया था।

श्री अब्दुल कलाम ने अपनी आत्मकथा में लिखा, “गीता एक विज्ञान है और भारतीयों के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत का गर्व का बड़ा विषय है।”

खतरनाक “इंडियन ग्रीन-पिट वाईपर” से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

इंडियन ग्रीन पिट वाईपर (Craspedocephalus gramineus), मध्य, दक्षिणी भारत और उत्तर पूर्व के पहाड़ी प्रदेशों में पाया जाता है। यह पेड़ों पर रहने वाले एशियाई पिट वाइपर की लगभग 25 प्रजातियों में से एक है । इनमें से अधिकतर सांप हरे या पीले रंग के होते हैं और कुछ पर चमकीले निशान होते हैं।

इन सांपों के कई सामान्य नाम हैं, जिनमें स्टेजनेगर पिट वाइपर, बैम्बू वाइपर, चाइनीज पिट वाइपर, चाइनीज बैम्बू पिटवाइपर और चाइनीज ट्री वाइपर शामिल हैं। इस साँप के बहुत से स्थानीय नाम हैं जो इसके पाए जाने वाले स्थानों में रहने वाले लोगों द्वारा दिए गए हैं। हरे रंग का होने की वजह से स्थानीय भाषा में इसे आम तौर पर “हरा सांप” ही कहा जाता है।

green tree viper

इंडियन ग्रीन पिट वाईपर का आकार

यह प्रजाति अधिकांश पेड़ों पर रहने वाले साँपों की तरह हल्के शरीर वाली और काफी छोटी होती है। वे लगभग २ से ३ फुट तक लंबे होते हैं, जिसमें 14.5 सेंटीमीटर (5.7 इंच) की पूंछ की लंबाई भी शामिल है। जो आमतौर पर एक शाखा के चारों ओर से कसकर पकड़े हुए रहती है।

ये आमतौर पर त्रिकोणीय सिर वाले होते हैं। नाक और आंख के बीच एक गड्ढा होता है और ऊर्ध्वाधर(ऊपर की और उठती) पुतलियों के साथ लाल आंखें होती हैं। इनके नुकीले दांत बहुत लंबे होते हैं, और काटने से उनका जहर गहराई तक जा सकता है। इसका काटना घातक हो सकता है, लेकिन अगर समय पर इलाज किया जाए तो अधिकांश पीड़ित बच जाते हैं।

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आवास

पूर्वोत्तर भारत, नेपाल, म्यांमार, लाओस, ताइवान, वियतनाम और दक्षिणी चीन में पाया जाने वाला ट्री वाइपर (बांस का वाइपर) आम तौर पर पगडंडियों, नालों या पुलिया के किनारे वाले जंगली इलाकों में रहना पसंद करता है।

इंडियन ग्रीन पिट वाईपर ज्यादातर रात में सक्रिय होते हैं। दिन में वे पेड़ों की शाखाओं के बीच लिपटे रहते हैं या अन्य वनीय आवरण में छिपे रहते हैं। हरे रंग का होने के कारण ये सामान्यत नज़र नहीं आते हैं। अधिकतर पास आने पर वे आम तौर पर शांत रहते हैं, लेकिन अगर उन्हें छेड़ा जाए तो वे बहुत तेजी से हमला कर सकते हैं।

आहार

अन्य  सांपों की तरह यह भी विभिन्न प्रकार के छोटे शिकार खाता सकता है। इसके आहार में मुख्य रूप से छिपकलियां और मेंढक शामिल होते हैं, लेकिन इसमें छोटे स्तनधारी और पक्षी भी शामिल हो सकते हैं।

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प्रजनन

इस प्रजाति की मादाएं जून से अगस्त के बीच 3-10 बच्चों को जन्म देती हैं। जो हूबहू अपने माता-पिता की तरह दिखते हैं। जन्म के समय उनकी लंबाई केवल 4.5 इंच करीब होती है। वयस्क की लंबाई औसतन 30 इंच (76 सेंटीमीटर; 2.5 फुट) होती है।

बच्चों की पूँछ चमकदार होती हैं जिनका उपयोग वे छोटे मेंढकों और छिपकलियों को आकर्षित करने के लिए करते हैं ताकि उनका आसानी से शिकार किया जा सके।

काटने के लक्षण

इस प्रजाति के सांप काटते समय हेमोटॉक्सिक नामक जहर को ब्लड में छोड़ता है, जिसके कारण शरीर के थक्के जमने बंद हो जाते हैं, परिणाम स्वरूप शरीर के अंदरूनी भाग में ही रक्त बहने लगता है अर्थात आंतरिक रक्त स्राव होता है।

इसके काटने से असहनीय पीड़ा होती है जैसे कि गर्म लोहे से दाग दिया गया हो, और काटने के लगभग 24 घंटे बाद तक दर्द कम नहीं होता है। यदि समय पर इलाज न मिले तो कुछ ही समय में व्यक्ति की मृत्यु हो सकती  है।