आज है सावन का पहला सोमवार, आयुष्मान योग में करें महादेव की पूजा-अर्चना

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हिंदू धर्म में सावन का महीना बहुत महत्वपूर्ण होता है। ये महीना विशेष रूप से भगवान शिव को समर्पित होता है। शिवभक्तों के लिए ये महीना बहुत महत्वपूर्ण होता है। कहते हैं कि इस महीने में विधि- विधान से भगवान शिव की पूजा करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।

इस वर्ष सावन की शुरुआत श्रवण नक्षत्र और आयुष्मान योग से हो रही है। मान्यता है कि इस महीने में भगवान विष्णु पाताल लोक में रहते हैं और इसी वजह से इस महीने भगवान शिव ही पालनकर्ता होते हैं। सावन के महीने में त्रिदेवों की सारी शक्तियां भगवान शिव के पास ही होती हैं।

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श्रावण का अर्थ

श्रावण शब्द श्रवण से बना है जिसका अर्थ है सुनना। अर्थात सुनकर धर्म को समझना। इस माह में सत्संग का महत्व है। इस माह में पतझड़ से मुरझाई हुई प्रकृति पुनर्जन्म लेती है। श्रावण माह में सिर्फ सावन सोमवार ही नहीं संपूर्ण माह ही व्रत रखना जाता है।
जिस तरह गुड फ्राइडे के पहले ईसाइयों में 40 दिन के उपवास चलते हैं और जिस तरह इस्लाम में रमजान माह में रोजे (उपवास) रखे जाते हैं उसी तरह हिन्दू धर्म में श्रावण मास को पवित्र और व्रत रखने वाला माह माना गया है।

सावन महीने का यह पर्व विशेष फलदायी

ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक आयुष्मान योग के प्रभाव से कोरोना संक्रमण की तीव्रता काफी हद तक कम होगी। सावन माह में चार सोमवार, दो प्रदोष और महीने की शिवरात्रि का विशेष पर्व के रूप में फलदायी होगा।

भोले शंकर की अर्चना, महामृत्युंजय अनुष्ठान, रुद्राभिषेक, शिवपुराण सहित अन्य अनुष्ठान होंगे। सभी धर्म स्थलों, नदियों व द्वादश ज्योतिर्लिंगों पर विशेष अनुष्ठान होंगे। रक्षा बंधन के साथ ही सावन के अनुष्ठान खत्म हो जाएंगे।

रोगों से दिलाएगा मुक्ति

महादेव के प्रिय सावन मास का आगाज रविवार को श्रवण नक्षत्र से हुआ। आज दोपहर बाद 3:27 बजे तक आयुष्मान योग लग रहा है।

यह योग रोगों से छुटकारा दिलवाने के साथ ही भक्तों को लंबी आयु प्रदान करने वाला माना जाता है। सावन का समापन 22 अगस्त को धनिष्ठा नक्षत्र में होगा, इसी दिन रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा।

आधी परिक्रमा करना ही शुभ

शिवलिंग से दक्षिण दिशा में ही बैठकर पूजन करने से मनोकामना पूर्ण होती है। शिवलिंग पूजा में दक्षिण दिशा में बैठकर भक्त को भस्म का त्रिपुण्ड लगाना चाहिए।

रुद्राक्ष की माला पहननी चाहिए और बिना कटे-फटे हुए बेलपत्र अर्पित करने चाहिए। शिवलिंग की कभी पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। आधी परिक्रमा करना ही शुभ होती है।

शिव पूजा का वैज्ञानिक कारण

शिव ब्रह्मांड की शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। शिवलिंग काले पत्थर का ही होता है, जो वातावरण और ब्रह्मांड से ऊर्जा अवशोषित करता रहता है।

इस ऊर्जा को पूर्ण रूप से शिवलिंग में समाहित करने के लिए इसे साफ-सुथरा रखने और जल, दूध आदि से अभिषेक करने की प्रथा शुरू हुई।

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