कानून व्यवस्था – अच्छे समाज के निर्माण के लिए कानून व्यवस्था अहम

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एक सभ्य और शांतिपूर्ण समाज के निर्माण के लिए कानून व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण इकाई होती है। यदि किसी देश के नागरिक कानून व्यवस्था का पालन करते हैं तो वह देश शीघ्र ही विकसित, रहने योग्य, शांतिपूर्ण और समृद्ध हो जाता है। वहीँ जिस देश की क़ानून व्यवस्था दोषपूर्ण होती है वहां के नागरिक हर पल असुरक्षा की भावना में जीते हैं और वह देश शीघ्र ही नष्ट भ्रष्ट हो जाता है।

किसी देश में कानून व्यवस्था कैसे काम करती है? वह किस कार्य के लिए जिम्मेदार होती है? इस पोस्ट के माध्यम से हम कुछ ऐसे ही आधारभूत नियमों के बारे में चर्चा करेंगे जिनका पालन करवाना क़ानून व्यवस्था का काम होता है।

 

जानिए कानून व्यवस्था के कार्य

किसी भी देश के नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना कानून व्यवस्था का मुख्य कार्य होता है। अगर देश में किसी भी तरह का राजनीतिक या सामाजिक टकराव या दंगे-फसाद हो तो है, या फिर देश का माहौल तनावपूर्ण हो, तो कानून व्यवस्था ही उसका समाधान करती है। यानी किसी क्षेत्र में अशांति या हिंसा होना कानून व्यवस्था की इकाई के लिए एक चुनौती होता है और इसका समाधान करना ही इसका मुख्य लक्ष्य होता है।

भारत का गृह मंत्रालय देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मामलों के लिए जिम्मेदार होता है. यह आपराधिक न्‍याय प्रणाली के लिए कानून अधिनियमित करता है।

देश में पुलिस बल को सार्वजनिक व्यवस्था का रख-रखाव करने और अपराधों की रोकथाम और उनका पता लगाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है. भारत के प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश का अपना अलग पुलिस बल है. राज्यों की पुलिस के पास ही कानून व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है.

भारतीय संविधान के तहत हर राज्य के दो विषय ‘पुलिस’ और ‘लोक व्यवस्था’ हैं. अपराध रोकना, दोषी का पता लगाना, दोषी पर केस दर्ज करना और मामले की जांच-पड़ताल करने की जिम्मेवारी पुलिस को दी गई है.

संविधान के तहत ही केन्द्र सरकार पुलिस के आधुनिकीकरण, अस्त्र-शस्त्र, संचार, उपस्कर, मोबिलिटी और अन्य अवसंरचना के लिए राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है.

आपको बता दें कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) गृह मंत्रालय की एक नोडल एजेंसी है, जो कि अपराधों को बेहतर ढंग से रोक कर देश की कानून व्यवस्था को कायम रखने में मदद करती है. राज्यों को अपराध संबंधी आंकड़े जुटाने का काम भी यही करती है.

‘लक्ज़म्बर्ग सिटी’ यूरोप के दूसरे स्विट्जरलैंड के कुछ रोचक तथ्य

यह है यूरोप का दूसरा रियट्जरलैंड कहे जाने वाले लक्ज़म्बर्ग की राजधानी ‘लक्ज़म्बर्ग सिटी’ । यह यूरोप के सबसे छोटे देशों में से एक है। इसके तीन तरफ बेल्जियम, फ्रांस और जर्मनी है। मात्र 6 लाख की आबादी वाले इस देश में पर्यटन के साथ-साथ एडवेंचर गतिविधियां भी अधिक हैं।

  • लक्ज़म्बर्ग पश्चिम यूरोप महाद्वीप में स्थित एक छोटा सा देश है।
  • लक्ज़म्बर्ग में ज़्यादातर जर्मन , फ्रांसीसी और लक्ज़म्बर्गी है।
  • लक्ज़म्बर्ग एक धर्मनिरपेक्ष देश है लेकिंन लगभग 87 प्रतिशत आबादी रोमन कैथलिक है।
  • यह दुनिया का दूसरा सबसे अमीर देश है।
  • लक्ज़म्बर्ग के प्रधान मंत्री जेवियर बेटेल एक ही लिंग के किसी भी व्यक्ति से शादी करने वाले पहले यूरोपियन संघ के नेता थे।
  • यह देश प्राकृतिक खूबसूरती और घने वनों से पूर्ण विशाल पर्वतमाला से घिरा हुआ है, इसलिए सर्दियों में यहां अच्छी खासी बर्फबारी होती है और यह दूसरा स्विटजरलैंड दिखने लगता है।
  • पैनोरमा व्यू में लक्जमबर्गा सिटी दिखाने वाले फोटोग्राफर ने बताया कि एलजेट नदी के किनारे स्थित सेंट जॉन चर्च वर्ष 1606 में बनी थी, जो आज भी ये मशहूर स्थल है।
  • लौह खनिज की अधिकता के कारण यहां दुनिया की सबसे बड़ी स्टील कंपनी आर्सेलर-मित्तल का मुख्यालय भी है।
  • 1970 के दशक में खनन कम होने के बाद यह देश ग्लोबल फाइनेंशियल सेंटर बनकर उभरा और बैंकिंग हब कहलाया।
  • 1815 में फ्रांस से स्वतंत्रता हासिल करने वाला यह देश यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्ट्र और नाटो जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों और संस्थाओं का संस्थापक सदस्य रहा है।

जानिये आखिर क्यूँ बढ़ती है हमारी उम्र और कैसे हो सकते है हम अमर ?

जानिये आखिर क्यूँ बढ़ती है हमारी उम्र और कैसे हो सकते है हम अमर ?

आज हम आपको हमारे शरीर का एक ऐसा रहस्य बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में अपने पहले कभी नहीं सुना होगा। वैसे तो हम सब जानते हैं कि जो दुनिया में जो आया है, उसको एक दिन जाना भी होगा मतलब मरना होगा, लेकिन क्या आप जानते हो कि आपकी उम्र क्यूँ बढती है, और इसका क्या कारण होता है? तो आइये जानिए इस रहस्य के बारे में।

जानिए कैसे बढ़ती है हमारी उम्र

सबसे पहले आपको बता दें कि हमारे शारीर में 2 तरह के सेल्स होते हैं। पहला सेल्स कामकाज(functioning) सेल्स और दूसरा होता है कामकाज न करने वाला सेल यानि (non-functioning)। कामकाज वाले सेल्स                  ( functioning cells) ही हमे जिंदा रखते हैं। पर जो non-functioning cells हैं वो समय के साथ-साथ हमारी शारीर में धीरे-धीरे जमा होने लगते हैं, non-functioning सेल्स की मात्रा बढ़ने से ही हम बूढ़े होने लग जाते हैं और हमारी उम्र बढ़ने लगती है।

यह सेल्स उन जगहों पर भी अपना घर बना लेते हैं जो functioning cells को चाहिए, इसके पश्चात ही हमारा शारीर अंदर से कमज़ोर होने लगता है, बुढा होने लगता है और टूटने लगता है।

आपको बता दें कि हर दिन ज्यादातर लोग बुढ़ापे के कारण ही मर जाते हैं।  Aubrey de Grey जो की एक शोधकर्ता थे उन्होंने अमर रेहने के लिए अनेक सिद्धांतों को निकाला था, उनका सिर्फ एकमात्र लक्ष्य यह था कि किसी भी तरह एक ऐसे तरीके का खोजा जाए जिससे लोगों की उम्र बढ़ने की प्रकरिया धीमी हो सके।

क्या आप जानते हैं कि आधुनिक युग में ऐसी कई क्रियाएं की जा रही है, जिससे किसी इंसानी दिमाग को एक कंप्यूटर में डाला जा सके, ता कि दिमाग में बसी उसकी सारे यादें, भावनाएं, उसके अनुभव को एक ‘कंप्यूटर’ में अपलोड करके सेव किया जाए। आप जिन लोगों से सबसे अधिक प्रेम करते हो उनसे आप हमेशा बात कर पाओ, इससे आप एक कंप्यूटर में अमर हो जाओगे।

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आखिर क्या है गंगा नदी के पवित्र होने का रहस्य

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अगर आप एक भारतीय हैं तो गंगा नदी का नाम आते है दिमाग़ में एक ही विचार सबसे पहले आता है, “पवित्र”। गंगा के नाम पर”गंगा जैसी पवित्र” और “गंगा माँ की क़सम” जैसी कहावतें और क़समें ही नहीं बनी बल्कि कई सारी फ़िल्में भी बनी।

क्या है गंगा के पवित्र होने का रहस्य? यह हम जानेंगे लेकिन उससे पहले गंगा नदी के बारे में कुछ आधारभूत तथ्य :

गंगा नदी हिमालय में स्थित गंगोत्री नामक स्थान से निकलती है। हिमालय की बर्फ पिघलकर इसमें आती रहती है। गंगा जल करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती है। इसके जल से लाखों एकड़ जमीन सिंचित होती है। गंगा नदी मछलियों की 140 से अधिक प्रजातियों और उभयचरों की 90 प्रजातियों का घर है।

गंगा भारत के अंदर बहने वाली सबसे लम्बी नदी मानी जाती है। हिमालय के गंगोत्री से शुरू होकर जब यह बंगाल की खड़ी में गिरती है तो लगभग 2525 किलोमीटर का सफ़र पूरा करती है।

यह नदी भारत, नेपाल, बांग्लादेश में बहती है।  इसकी आठ उपनदियां है- महाकाली, करनाली, कोसी, गंडक, घाघरा, युमना, सोन, महानंदा आदि।

ganda river

क्या है गंगा के पवित्र होने का रहस्य?

गंगा की पवित्रता के दो पक्ष हैं, धार्मिक पक्ष और वैज्ञानिक पक्ष। हम इन दोनों पक्षों पर विस्तार से चर्चा करेंगे, तो चलिए शुरू करते हैं :

धार्मिक पक्ष

धार्मिक मान्यता के अनुसार वेद, पुराण, रामायण, महाभारत और कई धार्मिक ग्रंथों में गंगा की महिमा का वर्णन मिलता है। यही कारण है कि गंगा को देवनदी भी कहा गया है। हिंदू धर्म में होने वाले विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम जैसे कि पूजा-अर्चना, अभिषेक, शुद्धिकरण गंगाजल के बिना अधूरे माने जाते हैं।

माना जाता है कि  इस नदी में स्नान करके पापों से मुक्ति पाई जाती है, इसीलिए इस नदी को भारतीय धर्मग्रंथों में पवित्र नदी के रूप में माना गया है। भारतियों के लिए गंगा केवल नदी ही नहीं, बल्कि एक संस्कृति भी है। गंगा नदी के तट पर अनेक पवित्र तीर्थों का भी निवास है। जिनमें शामिल हैं :

  • उत्तराखंड में गंगोत्री धाम,उत्तरकाशी,देवप्रयाग,ऋषिकेश,हरिद्वार
  • उत्तर प्रदेश में प्रयागराज (इलाहाबाद),वाराणसी,ज़मानिया
  • बिहार में बक्सर,पटना,सिमरिया घाट (बेगूसराय),सुल्तानगंज
  • झारखंड में साहिबगंज,गंगासागर

ganga map

पौराणिक कथाएं

इनमें सबसे प्रचलित और पौराणिक कथा के अनुसार राजा सगर (भगवान राम के कुल में एक राजा) को कठोर तपस्या के बाद साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति हुई थी। एक दिन राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ कराने का निश्चय किया। यज्ञ के लिए राजा को घोड़े की आवश्यक थी, जिसे इंद्र ने चुरा लिया था। राजा सगर ने अपने सभी पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया।

जब सगर पुत्र उन्हें ढूंढते हुए पाताल लोक पहुंचे तो उन्होंने घोड़े को ऋषि कपिल मुनि के समीप बंधा हुआ पाया। यह देखकर सगर के पुत्रों ने सोचा कि ऋषि ने ही घोड़े को चुराया था और उनका अपमान कर दिया।

तपस्या कर रहे ऋषि ने हजारों वर्ष बाद अपनी आँखें खोली और उनके क्रोध से सगर के सभी साठ हजार पुत्र जल कर वहीं भस्म हो गए। सगर के पुत्रों की आत्माओं को मुक्ति नहीं मिली, क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया था।

इन्हीं के वंशज भगीरथ ने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को धरती पर लाने के लिए कठोर तपस्या की। ताकि गंगा को पृथ्वी पर लाया जा सके। उनकी तपस्या से भगवान ब्रह्मा प्रसन्न हुए और गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर जाने का आदेश दिया ताकि सगर के पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति मिल सके।

इस पर गंगा ने कहा कि मैं इतनी ऊँचाई से जब पृथ्वी पर अवतरित होऊँगी तो पृथ्वी इतना वेग कैसे सह पाएगी? यह सुनने के बाद भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और भगवाब शिव ने अपनी जटाओं में गंगा के वेग को रोककर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा-सागर संगम तक गई, जहाँ सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। आपको बता दें कि गंगा का भागीरथी नाम राजा भगीरथ के नाम से ही पड़ा था।

वैज्ञानिक कारण

लखनऊ के नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट ने एक अनुसंधान के माध्यम से यह प्रमाणित किया है कि गंगा के पानी में किसी भी रोग को जन्म देने वाले कोलाई नामक बैक्टेरिया को मारने की क्षमता मौजूद है।

  • वैज्ञानिक कहते हैं कि गंगा के पानी में बैक्टीरिया को खाने वाले बैक्टीरियोफैज वायरस होते हैं। ये वायरस बैक्टीरिया की तादाद बढ़ते ही सक्रिय होते हैं और उन्हें नष्ट कर देते हैं।
  • वैज्ञानिकों को कहना है कि गंगा का पानी जब हिमालय से आता है तो कई तरह की मिट्टी, खनिज और जड़ी- बूटियों का असर इस पर होता है।
  • इसी वजह से गंगा का पानी लंबे समय तक खराब नहीं होता और इसके औषधीय गुण बने रहते हैं।
  • वैज्ञानिकों ने अपने शोध में ये भी पाया कि गंगा जल में वातावरण से ऑक्सीजन सोखने की अद्भुत क्षमता है।
  • गंगा के पानी में प्रचूर मात्रा में गंधक भी होता है, इसलिए यह लंबे समय तक खराब नहीं होता और इसमें कीड़े नहीं पैदा होते। यही कारण है कि गंगा जल को हिंदू धर्म में इतना पवित्र माना गया है।
  • आइने अकबरी‘ में लिखा है कि बादशाह अकबर पीने के लिए गंगाजल ही प्रयोग में लाते थे। इस जल को वह अमृत कहते थे।

गंगा किनारे बसे लोगों की आजीविका का एक मुख्य स्त्रोत

भारत का करीब सैंतालीस प्रतिशत उपजाऊ क्षेत्र गंगा बेसिन में है। करीब चालीस करोड़ लोग आजीविका के लिए किसी न किसी रूप में गंगा पर निर्भर रहते हैं, इसमें विशेषकर सिंचाई, उद्योगों के लिए पानी की उपलब्धता, मछली व्यापार, गंगा आरती, नौकायन, रिवर राफ्टिंग, टूरिस्ट गाइड, पर्यटन, नियंत्रित रेत खनन, मूर्ति एवं कुम्हार व्यवसाय हेतु चिकनी बलुई मिट्टी, स्नान पर्व, कुम्भअर्धकुम्भ आयोजन, प्रयाग में प्रति वर्ष माघ माह में कल्पवास, काशी में देव दीपावली महोत्सव, गंगा महोत्सव, घाटों की साफ़ सफाई, दर्शनपूजापाठ, पुरोहित, अंतिम संस्कार आदि आते हैं।

आज भी ऐसे परिवारों की बड़ी संख्या है जो अपने धार्मिक संस्कार मुंडन, कर्ण छेदन, उपनयन, विवाहोपरांत गंगा पुजैया आदि गंगा किनारे करते हैं जिससे घाटों के किनारे पूजन सामग्री बेचने वालों, पुजारियों, नाविकों आदि को आजीविका प्राप्त होती है।

ganga river map

दूषित हो चुकी है पवित्र गंगा

गंगा नदी चूंकि लोगों की धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी है इस कारण और अन्य नदियों का पानी जिस तरह प्रदूषित हुआ है उससे दोगुनी तेजी से गंगा नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। अब गंगा नदी के पानी में सिर्फ 25 प्रतिशत ही ऑक्सीजन है।

शवों को बहाना, अस्थियों का बड़ी संख्या में विसर्जन, विशेष अवसरों पर गंगा में बड़ी संख्या में स्नान आदि क्रियाओं ने गंगा को प्रदूषित किया है।  इस कारण गंगा विश्व की पांचवी सबसे प्रदूषित नदियों में शामिल हो गई ।

इसके बाद सन 1985 से लगातार सरकार के द्वारा गंगा विकास प्राधिकरण, गंगा एक्शन प्लान, नेशनल रिवर कन्जर्वेशन एक्ट, नमामि गंगे परियोजना, स्वच्छ गंगा अभियान के तहत गंगा को साफ करने की ओर अधिक ध्यान दिया गया तथा यह सुनिश्चित किया गया कि औद्योगिक कचरे को गंगा में प्रवाहित न किया जाए।

एक बात यहाँ फिर ध्यान देने योग्य है कि इतना प्रदूषण होने के बाद भी गंगा नदी का जल कभी खराब नहीं हुआ। इसकी विशेषता ज्यों की त्यों रही।

जानिए गोदावरी नदी के अनेक नामों की विशेषता के बारे में

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आज हम आपको भारत के दक्षिण की सबसे महत्वपूर्ण मानी जाने वाली गोदावरी नदी के बारे में बताने जा रहे हैं।आपको बता दें कि गोदावरी नदी भी भारत की सबसे लंबी नदियों में से एक है, और यह नदी महाराष्ट्र के नासिक नगर से 30 कि.मी.की दूरी पर पश्चिम में ब्रह्मगिरि पर्वत के एक कुंड से निकलक लगभग 1,450 कि.मी. तक की दूरी तय करती है। इसके बाद वह बंगाल की खाड़ी में विसर्जित हो जाती है।

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गोदावरी के अनेक नाम

कुछ विशेषजों के अनुसार, इसका नामकरण तेलुगु भाषा के शब्द ‘गोद’ से हुआ है, जिसका अर्थ मर्यादा होता है। एक बार महर्षि गौतम ने घोर तप किया था। इससे रूद्र प्रसन्न हो गए थे और उन्होंने एक बाल के प्रभाव से गंगा को प्रवाहित किया था। गंगाजल के स्पर्श से एक म्रत गाय पुनर्जीवित हो गयी थी।

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इसी कारण इसका नाम गोदावरी पड़ा था। गौतम से संबंध जुड़े जाने के कारण इसे गौतमी के नाम से भी जाना जाता हैं। इस नदी में नहाने से सारे पाप धुल जाते हैं, इसी लिए इसको “वृद्ध गंगा” या “प्राचीन गंगा” के नाम से भी जाना जाता है।

गोदावरी की सात धारा वसिष्ठा, कौशिकी, वृद्ध गौतमी, भारद्वाजी, आत्रेयी और तुल्या अतीव प्रसिद्ध है। सात भागों में विभाजित होने के कारण इसे सप्त गोदावरी भी कहते हैं।

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भारत के चार प्रदेशों से गुज़रती है गोदावरी

आपको बता दें कि गोदावरी नदी भारत के चार राज्य महाराष्ट्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और आन्ध्र प्रदेश में बहती है। इसके अलावा गोदावरी नदी केन्द्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी के गांव यनम से होकर भी गुज़रती है।

आखिर क्या है गंगा नदी के पवित्र होने का रहस्य

भारत का दूसरा सबसे बड़ा डेल्टा

गोदावरी नदी कृष्णा नदी के साथ मिलकर आन्ध्र प्रदेश में भारत के दूसरे सबसे बड़े डेल्टा कृष्णा-गोदावरी का निर्माण करती हैं। इस डेल्टा को बहुधा केजी डेल्टा भी कहा जाता है।

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गोदावरी की तीन शाखाएं

धवलेश्वर डैम के आगे गोदावरी तीन शाखा में विभाजित होती है, पूरब की शाखा को “वशिष्ठ गोदावरी” कहते है और बिज के शाखा को “वैष्णवी गोदावरी” कहते है। यह तीनों शाखाएं मिलके एक त्रिभुज क्षेत्र का निर्माण करती है।

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कुम्भकर्ण का मेला

आपको बता दें कि गोदावरी के तट पर  “पुष्करम” एक प्रमुख स्थान है, यहां पर हर बारह सालों बाद काफी संख्या में लोग नहाने के लिए आते है, इस त्यौहार को ‘कुम्भकर्ण का मेला’ भी कहते हैं।

ताजमहल के किनारे बहती यमुना नदी

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प्रमाण सहित: क्या सचमुच में कर्ण से प्रेम करती थीं द्रौपदी??

दरअसल यह अफवाह किसी अधकचरे लेखक की कपोल कल्पना भर है. यह शायद सनसनी पैदा करने और व्यूअर्स खींचने  के लिए खबर को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का एक प्रयास है, जिसमें झूठ को भी शामिल कर लिया गया. बाकि साइटों ने भेड़-चाल में इस झूठ को फैला दिया. (प्रमाण नीचे है)

क्या है सारा मामला?

“क्या आप जानते हैं कि पांच पतियों से विवाह करने वाली द्रौपदी को अर्जुन से नहीं, बल्कि महारथी कर्ण से प्रेम था”

“अर्जुन से नहीं कर्ण से करना चाहती थी द्रौपदी विवाह”

“द्रौपदी का विवाह पांडवों से हुआ, लेकिन विवाह से पहले उनका असली प्रेम कौन था, क्या आप जानते हैं?”

अर्जुन से नहीं कर्ण से करना चाहती थी द्रौपदी विवाह, पढ़िए महाभारत की अनोखी प्रेम कहानी

Gazabpost, जागरण जैसी ही कुछ वैब-साइट्स पर और अन्य कुछ वैब साइट्स पर यह स्टोरी ऐसी ही हैडलाइनस के साथ पोस्ट की गयी हैं.  पहले तो इन पोस्ट्स को पढ़ कर थोड़ी हैरत हुई. फिर सोचा यदि ऐसा है तो इसे मिर्च-मसाला लगाकर फंडाबुक के नियमित पाठकों के लिए पेश करूँ. लेकिन शंका जरुर हुई, इसलिए कॉमन सेन्स के अनुसार थोड़ी-बहुत रिसर्च करना जरुरी समझा.

घटिया मानसिकता और सस्ती पत्रकारिता की मिसाल

मैंने महाभारत को कई बार पढ़ा है और धारावाहिकों में भी देखा है लेकिन कभी इस बात के कहीं पर भी संकेत नहीं मिले जिनसे ऐसा लगा हो कि द्रौपदी कर्ण से “प्रेम” करती थी. जिस तरह से कुछ साइट्स द्रौपदी और कर्ण के संबंधों को बढ़ा-चढ़ा कर उन्हें प्रेमी-प्रेमिका के रूप में पेश कर रही हैं वह भी चौंकाने वाला है. यह न सिर्फ इतिहास से छेड़छाड़ करने जैसा है बल्कि द्रौपदी जैसी महान पतिव्रता स्त्री के चरित्र को शंका के दायरे में लाने जैसा भी है.

इसलिए हमने जरुरी समझा कि इस बात की तह तक जाया जाए और पता किया जाए कि क्या कुछ सचमुच में कुछ ऐसा था जिसमें द्रौपदी और कर्ण के बीच में पनपे प्रेम की बात को मैंने और मुझसे भी कहीं बेहतर समझ वाले महाभारत के जानकारों ने मिस कर दिया था?

आखिर क्या है सच्चाई??

उपलब्ध साहित्य, ग्रंथों और इंटरनेट में इस विषय के बारे में काफी सर्च करने के बाद जो कुछ भी सामने आया उससे केवल एक ही बात सामने आई कि द्रौपदी और कर्ण के बीच में प्रेम-व्रेम जैसा कुछ भी नहीं था. स्वयंवर के दौरान, जान-पहचान के सत्र के दौरान  द्रौपदी कर्ण की और आकर्षित जरुर हुई थी, लेकिन श्रीकृष्ण ने इस बात को ताड़ लिया था और द्रौपदी को कर्ण के सूत-पुत्र होने की बात बता कर मामला वहीँ ख़त्म कर दिया था.

समय बीतने के साथ-2 इन दोनों के बीच सिर्फ एक ही चीज़ बढ़ी थी और वह कड़वाहट और बाद में द्रौपदी की कर्ण के प्रति नफरत थी, जो कि मुख्यत:  द्यूत- सभा में कर्ण के द्वारा द्रौपदी को वेश्या कहने के बाद द्रौपदी के मन में पैदा हुई थी.

द्रौपदी: झूठ की एक बानगी देखिये
द्रौपदी: झूठ की एक बानगी देखिये

इस खबर के पीछे न तो कोई रिसर्च है न ही कोई प्रमाण हैं. लेकिन मेरी इस इस बात को कहने पीछे प्रमाण हैं जिन्हें में नीचे पेश कर रहा हूँ. देखिये:

स्वयंवर

द्रौपदी और कर्ण की पहली मुलाकात केवल स्वयंवर के दौरान हुई. अफवाह भरी पोस्टस में लिखा गया है कि “द्रौपदी अपनी सखियों के साथ भ्रमण करने के लिए जाया करती थी. द्रौपदी को देखते ही कर्ण को उनसे प्रेम हो गया”.  यह कोरी वकवास है. किसी भी ग्रंथ में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है जिससे यह पता चले कि कर्ण ने द्रौपदी को स्वयंवर से पहले कहीं देखा हो.

हाँ तो, द्रौपदी और कर्ण की पहली मुलाकात केवल स्वयंवर के दौरान हुई. जब कर्ण ने प्रतियोगिता में भाग लेने की कोशिश की तो द्रौपदी ने उसका पक्ष नहीं लिया.  द्रौपदी के जुड़वाँ भाई दृष्टदयुम्न ने श्रीकृष्ण के कहने पर कर्ण को सूत-पुत्र कहते हुए भाग लेने से मना कर दिया था, और द्रौपदी ने कोई विरोध नहीं किया न ही कर्ण के प्रति उस समय या कभी बाद में प्रेम या आकर्षण का प्रदर्शन किया.

गरीब ब्राहमण से विवाह और द्रौपदी का समर्पण

जब अर्जुन ने स्वयंवर में लक्ष्य को भेदा तो द्रौपदी ने बिना किसी दबाव के अर्जुन को अपना जीवन साथी चुना और अपनी ख़ुशी से अर्जुन के साथ चल पड़ी, यह जानते हुए भी कि वह एक गरीब ब्राहमण की जीवन संगिनी बन चुकी है. स्वयंवर जीतने के बाद कर्ण और दूसरे क्षत्रियों ने अर्जुन को युद्ध के लिया ललकारा और अर्जुन उसमे भी विजयी हुए. इतना सब होने के बाद भी द्रौपदी अर्जुन के प्रति समर्पित रही और उनके साथ डटी रहीं.

अर्जुन की असलियत जानने के बाद

जब द्रौपदी को पता चला कि अर्जुन एक गरीब ब्राहमण नहीं बल्कि कुरु वंश के भावी सम्राट हैं तो उनके लिए इससे अधिक ख़ुशी कोई नहीं हो सकती थी. यह न केवल उनके जन्म के उद्देश्य (कुरुवंश का विनाश) के अनुरूप था बल्कि वह एक सम्राज्ञी बनने जा रही थी इसलिए उनके मन में अपने पतियों के इलावा किसी और के प्रति प्रेम रखने का कोई औचित्य नहीं था. महाभारत में कहीं भी द्रौपदी और उनके पतियों के बीच टकराव या मनमुटाव का कोई भी प्रसंग नहीं है.

द्यूत सभा में अपमान के बाद

कपोल कल्पना करने वालों का एक तर्क यह है कि द्यूत सभा में उनके पतियों की उसको विफलता के बाद द्रौपदी के मन में आया कि शायद कर्ण उनकी बेहतर रक्षा करने में समर्थ था. लेकिन यह फ़ालतू तर्क तब दम तोड़ देता है जब उन्हें बताया जाए कि कर्ण ही वह शख्स था जिसने दुर्योधन को द्रौपदी को भरी सभा में लाकर उसे बेइज्जत करने का आइडिया दिया था. कर्ण ही था जिसने द्रौपदी को पांच पतियों से विवाह करने के कारण एक वेश्या होने का ताना दिया था. यदि द्रौपदी के मन में कर्ण के लिया कोई सहानुभूति थी भी तो यह कर्ण के इस कुकर्म के कारण नष्ट हो गयी.

 रक्षक की भूमिका

यदि मान भी लिया जाए कि द्रौपदी समझती थी कि कर्ण उसे बचा सकता था, तो वह जरुर अपने “तथाकथित प्रेम”  से अपनी इज्ज़त को बचाने के लिए गुहार लगाती. कोई भी समझदार  स्त्री अपने मान-सम्मान को बचाने के लिए अपनी इगो या आत्म-ग्लानि को जरुर त्याग देगी. इसलिए यह कहना कि “आत्मग्लानि के कारण द्रौपदी ने कर्ण से सहायता नहीं मांगी. वहीं कर्ण भी स्वयंवर में अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए मौन रहे” अपने आप में हास्यकर है.” बचकाने लेखक का यह कहना कि प्रतिशोध के लिए कर्ण चुप रहा, तो फिर प्रेम कहाँ गया?

ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि अर्जुन कर्ण से बेहतर धनुर्धर थे. गुरु द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा  में कौरवों और पांडवों को पांचाल देश पर चढ़ाई करने को कहा. पहले कौरवों ने पांचाल पर आक्रमण किया और वह कर्ण के होते हुए पांचालों से हार गये. बाद में अर्जुन के नेतृत्व में पांडव सेना ने पांचालों को हराया.

वफ़ादारी और सतीत्व

यदि बचकाने लेखक सतीत्व के अर्थ को समझ पायें तो इसका मतलब यह होता था, कि हर हाल में पति के साथ खड़े रहना, चाहे पति गलत राह भटक रहा हो, उसका साथ न छोड़ते हुए बेहतर राह की उम्मीद करना. महाभारत की द्यूत-सभा में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. दुर्योधन ने द्रौपदी के सामने विकल्प रखा कि यदि वह सबके सामने युधिष्ठिर के कृत्य को अधर्म के रूप में स्वीकार करे तो वह पांडवों और द्रौपदी को मुक्त कर देगा. चूंकि युधिष्ठिर ने जुए में खुद को हारने के बाद द्रौपदी को दांव पर लगाया था, और या एक अधर्म ही था, फिर भी द्रौपदी ने युधिष्ठिर के इस कदम की निंदा नहीं की और उनके साथ खड़ी रहीं. यह पतिव्रता धर्म और त्याग की ऐसी मिसाल थी जिसकी बराबरी करना दुर्लभ है. हालाँकि अकेले में द्रौपदी ने युधिष्ठिर की इस मजबूरी और निष्ठुरता की जम कर आलोचना की थी.

मेरी तरफ से निवेदन

ऐसी पतिव्रता और धर्म-परायण नारी के  व्यक्तित्व को महज़ कुछ सौ व्यूज़ और लाइक्स के लिए दांव पर लगाने के लिए मैं तथा-कथित मीडिया साइट्स की निंदा करता हूँ और आशा करता हूँ कि ऐसे मीडिया संस्थान भविष्य में जिम्मेदारी का एहसास करते हुए इतिहास से छेड़-छाड़ करने से गुरेज करेंगे.

कुछ कुतर्क समर्थकों का कहना है कि द्रौपदी और कर्ण एक दूसरे से प्रेम करते हैं लेकिन वे यह बात कभी एक दूसरे से कह नहीं पाए. भई, हमने तो कहीं नहीं पढ़ा, फिर आपने उन दोनों के मन की बात कैसे जान ली? कोई सौर्स से बात पता चली या फिर वे आप लोगों के सपने में आये थे? यदि आपको पता चले तो हमें भी जरुर बताएं.

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भारत के प्राचीन इतिहास से जुड़ी है ब्रह्मपुत्र नदी

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आज हम आपको भारत की सबसे लम्बी नदियों में से एक नदी ब्रह्मपुत्र के बारे में बताने जा रहे हैं। आपको बता दें कि यह नदी तिब्बत, भारत, और बांग्लादेश से होकर बहती है। इस नदी का उद्गम तिब्बत में स्थित चेमायुंग दुंग नामक हिमवाह से हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी की लम्बाई 2700 किलोमीटर हैं।

इसीलिए पड़ा ब्रह्मपुत्र नाम

सिंधु नदी की तरह यह नदी भी हिमालय के पवित्र मानसरोवर झील से निकलती है। इस नदी को ब्रह्मपुत्र इसीलिए कहते है, क्योंकि वह कैलाश पर्वत के ढाल से नीचे की ओर उतरती है।

ब्रह्मपुत्र का सफर

आपको बता दें कि यह नदी बंगाल की खाड़ी में समाने से पहले लगभग तीन हज़ार किलोमीटर का लंबा सफर तय करती है. इस सफर के दौरान वह 1625 किलोमीटर का सफर तिब्बत में तय करती है, इसके बाद भारत में 918 किलोमीटर तक बहती है और बांग्लादेश में वह 360 किलोमीटर की लम्बाई तक बहती है।

ब्रह्मपुत्र नदी के अनेक नाम

ब्रह्मपुत्र नदी को कई नामों से जाना जाता है, जैसे कि तिब्बत में इसका नाम सांपो, अरुणाचल में डिहं और असम में इसको ब्रह्मपुत्र के नाम से पुकारा जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश की सीमा में बहती गंगा की उप नदी ‘पद्मा’ के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इस नदी की पांच उपनदियाँ हैं- सुवनश्री, तिस्ता, तोर्सा, लोहित, बराक आदि।

भारत के प्राचीन इतिहास से जुड़ी है यह नदी

आपको बता दें कि ब्रह्मपुत्र एक नदी के साथ दर्शन सामान्य भी है, क्योंकि इस नदी के तटों पर आर्य-अनार्य, मंगोल-तिब्बती, बर्मी-द्रविड़, मुगल-आहोम जैसी कई संस्कृतियों का आपस में मिलाव हुआ था। इसके बाद यह संस्कृतियों ने मिलकर एक अलग संस्कृति का गठन किया है। इसीलिए यह प्राचीन भारत के इतिहास से जुड़ी नदी है।

अनेक नदियां होती है इसमें समाहित

अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड , मेघालय, भूटान, पश्चिम बंगाल और सिक्किम के पहाड़ों से निकली अन्य अनेक नदियां और उनकी उप-नदियां भी इसमें समाहित हो जाती है।

ब्रह्मपुत्र नदी भी सिंधु सभ्यता की नदी से कम नहीं है। भारत के सांस्कृति और धार्मिक इतिहास में इस नदी का भी काफी बड़ा योगदान रहा है। इस नदी के क्षेत्र में सैकड़ों गुफाएं, घने जंगल और कई प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष अभी भी पाएं जाते है।

गुरूग्राम का एम.जी. रोड़ जहाँ सफ़ेद साड़ी में चुड़ैल गाड़ी के पीछे भागती है!!

गुड़गांव शहर का एम.जी. रोड़, गुड़गांव का सबसे सुनसान और भयावह रोड है। इस सड़क पर बहुत से लोगों ने सफेद साड़ी पहने औरत को देखा है, जो कि दिखने में बहुत डरावनी है।

माना जाता है की इंसान की अकाल मौत होने की वजह से उसका भूत बन जाता है. या फिर इंसान की कोई ख्वाहिश पूरी ना हुई हो तब भी उसका भुतहा साया दिखाई देता है। ऐसा ही एक भूत गुरुग्राम के एमजी रोड में लोगों को अक्सर मिलता है।

इस सड़क पर ड्राइव करने वाले लोगों का मानना है कि उन्होंने ने भी कई बार इस सड़क पर सफेद साड़ी पहने औरत को देखा है, जो गाड़ियों के साथ-साथ भागती है। उसकी जीभ बांह जितनी लंबी और बाहर की तरफ उबली हुई आँखें हैं। कहते हैं कि इस औरत की मौत कुछ साल पहले इसी एरिया में हुई थी।

एम.जी. रोड़ पर भूत

एम.जी. रोड़ पर हॉरर एनकाउंटर

मंजय नाम का कैब ड्राइवर दिल्ली-गुड़गांव सड़क पर कैब चलाता है। एक रात वह एक यात्री को गुड़गांव साइबर सिटी छोड़ कर वापस आ रहा था। एम.जी सड़क पर ड्राइव करते हुए रात के 12 बजे उसे सड़क के किनारे एक सफेद साड़ी पहने औरत दिखाई दी। पहली नज़र में मंजय ने इसे नज़रअंदाज कर दिया।

लेकिन उसके पसीने तब छूटने लगे जब उसने कार के साइड मिरर में उस औरत को गाड़ी का पीछा करते हुए देखा। मंजय ने तेजी से गाड़ी दौड़ाई। इस बार जब मंजय ने फिर साइड मिरर में देखा तो उसकी जान में जान आई, क्योंकि वह औरत पीछा छोड़ चुकी थी, साइड मिरर में कोई नजर नहीं आ रहा था।

मंजय यह समझ नहीं पा रहा था की इतनी रात को भला सुनसान सड़क पर कौन औरत होगी, वो भी सफ़ेद साडी में। मंजय ने जैसे तैसे हनुमान जी का नाम लेकर एक-दो मिनट और गाड़ी चलाई ही थी, कि वो औरत अचानक उसकी कार के आगे आ गयी।

आखिर इतनी तेज गाड़ी चलाने के बाद भी वो सामने कैसे आ गयी? इसी असमंजसम में फंसे मंजय ने इस बार कार के फ्रंट डैक पर रखी हनुमान जी की छोटी मूर्ति को हाथ में लिया और बेहद तेज रफ्तार से गाड़ी चलाता रहा। वह औरत कैसे उसकी गाड़ी से आर-पार हो गई, वह यह समझ ही नहीं पाया और ना ही वह समझना चाहता था।

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जानिए अपने अवचेतन मन के बारे में कुछ तथ्य

एक अच्छा इंसान बनने के लिए सबसे पहले आपका दिमाग अच्छे से विकसित होना चाहिए। दिमाग को विकसित करने के लिए आपको ज्ञान होना भी जरूरी है। इसके लिए आप जो भी आज तक सोचते आये हो उसे अपने दिमाग से निकाल दो और अपने अवचेतन मन को अच्छे से समझने की कोशिश करें।

क्या है अवचेतन मन

अवचेतन मन एक शक्तिशाली मन है जो आपके जीवन के हर पहलू को कण्ट्रोल करता है और यह किसी भी विचार या आदेश जो इसको को दिया जाता है, वो अक्सर पर्याप्त समय में, उसे सत्य के रूप में स्वीकार कर लेता है भले ही वह आपको लाभ करे या नहीं।

आपको बता दें आपका अवचेतन मन सकारात्मक और नकारात्मक के बीच अंतर नहीं करता, इसीलिए आप जो सोचोगे वही होगा चाहे वो सकारात्मक हो या फिर नकारत्मक।

आपको बता दें कि जिस चीज़ से आप घिरे होते हैं आपका अवचेतन मन न उस पर ही ध्यान देता है, अगर आप सकारात्मक चीजों से घिरे हुए होंगे तो आपके साथ सकारात्मक चीज़े होंगी। इसीलिए अपने ज्यादातर लोगों से यही सुना होगा कि हमें सकारात्मक चीजों के बारे में सोचना चाहिए।

अगर आप सकारात्मक सोच के इंसान हैं और वास्तव में आप अवचेतन दिमाग की शक्ति में विश्वास करते हैं, चाहे आप जो भी चाहते हैं, अगर आप अपना लक्ष्य तय करके उसको पूरा कर रहे हो, तब आपका अवचेतन मन 100 प्रतिशत काम करेगा।

अवचेतन ही आपकी शारीरिक कार्यों को नियंत्रित करता है। आपकी जो सोच होती है, वो आपके अवचेतन दिमाग पर प्रभाव डालती है और आपका अवचेतन मन आपके हृदय की धड़कन, स्वास, रक्त का पम्पिंग, सेलुलर फ़ंक्शन, भौतिक अंगों के निरंतर संचालन आदि जैसे अवचेतन शारीरिक कार्यों को नियंत्रित करता है.

आपके विचार भी वास्तविकता बन जाएंगे अगर आप अवचेतन मन को सकारात्मक भावनाओं की अपेक्षाओं के साथ भरतें हैं, और इसके साथ ही अगर आप किसी भी चीज़ के बारे में सकारात्मक सोच रखेंगे तो उसका परिणाम भी अच्छा ही होगा।

कई बार लोगों दुवारा आपके अवचेतन मन का कभी-कभी गलत इस्तेमाल किया जाता है और इससे आपका ब्रेनवाश होता है। अगर आपके अवचेतन मन पर कब्जा कर लिया जाये तो किसी भी चीज़ को आपकी भावनाओं में घुसाया जा सकता है।

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सिंधु नदी – हजारों साल पुरानी सभ्यता की गवाह नदी

सिन्धु नदी (अंग्रेज़ी: Indus) एशिया की सबसे बड़ी और लंबी नदियों में से एक है। यह नदी पश्चिमी तिब्बत(चीन नियंत्रित), भारत और पाकिस्तान में से होकर बहती है। इस नदी की कुल लंबाई लगभग 2900 किलोमीटर है। सिन्धु नदी का उद्गम स्थल तिब्बत के मानसरोवर के निकट “सेंगे ख बब” नामक जलधारा को माना जाता है। भारत में से होकर बहने वाली यह सबसे लंबी नदी है।

पाकिस्तान के स्कर्दू प्रांत में सिंधु नदी
पाकिस्तान के स्कर्दू प्रांत में सिंधु नदी

उद्गम स्थल

तिब्बती भाषा में ‘सेंगे ख बब’ का मतलब ‘सिंह मुख नदी’ है, यानि सिंह के मुख से निकलने वाली नदी। ध्यान दें कि तिब्बत व भारत की बहुत-सी महत्वपूर्ण नदियों की स्रोत-धाराओं के नाम हिन्दू व बौद्ध आस्थाओं में धार्मिक महत्व रखने वाले जानवरों पर पड़े हैं। जैसे कि सतलुज के उद्गम स्थान को लंगचेन खबब’ अर्थात ‘हाथी के मुख से निकलने वाली नदी’ है। इसी तरह ब्रह्मपुत्र नदी उर्फ़ यरलुंग त्संगपो नदी का आरम्भिक नाम ‘तमचोग खबब’ अर्थात ‘अश्व के मुख से निकलने वाली नदी’ है। वहीं घाघरा नदी आरम्भिक स्थान ‘मगचा खबब’ अर्थात ‘मोर-मुख नदी’ है।

सिंधु से इंडिया तक की कहानी

सिंधु नदी के नाम का अर्थ ‘सागर या पानी का बड़ा समूह’ है। सबसे पहले ईरान के लोग इसे ‘हेंदु’ कहने लगे। इसके बाद ग्रीक लोग इसको ‘इंडोस’ कहने लगे। बाद में रोमन ने नाम को बदल कर ‘इंडस’ रख दिया। कालांतर में  ‘इंडस’ से इंडिया बन गया।

भारत के लेह-लद्दाख प्रांत में सिंधु घाटी
भारत के लेह-लद्दाख प्रांत में सिंधु घाटी

सिंधु घाटी सभ्यता का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक था। यह इंडस दरिया (indus river) के किनारे बसने वाली सभ्यता थी। थाईलैंड के निवासी अपनी भौगौलिक उच्चारण की भिन्नताओं की वजहों से अन्दुस को सिन्धु कहने लगे। हिंदी उच्चारण में इसे हिन्दू कहा जाने लगा।

सिंधु नदी का सफर

बहुत सारी अन्य नदियों की भांति सिंधु नदी हिमालय के पर्वतों में से निकलती है। यह नदी तिब्बत और कश्मीर के बीच बहती हैं। भारत में सिंधु नदी तिब्बत से लेह में प्रवेश करती है और इसके बाद कश्मीर से होते हुए पाकिस्तान में दाखिल होती है। इसकी उपनदी झेलम के किनारे पर कश्मीर राज्य की राजधानी श्रीनगर स्थित है। सिंधु नदी नंगा पर्वत के उतरी भाग से होकर दक्षिण पश्चिम में पाकिस्तान के बीचों-बीच से गुज़रती है। अंत में यह नदी कराची से गुज़रती हुई अरब सागर में शामिल हो जाती है।

इस नदी ने अपना रास्ता कई बार बदला है। 1245 ई. तक यह मुल्तान के पश्चिमी इलाके में बहती थी।

सिन्धु घाटी सभ्यता

सिन्धु घाटी सभ्यता (3300 ईसापूर्व से 1700 ईसापूर्व तक,परिपक्व काल: 2550 ई.पू. से 1750 ई.पू.) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित शोध के अनुसार यह सभ्यता कम से कम 8000 वर्ष पुरानी है। यह हड़प्पा सभ्यता और ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ के नाम से भी जानी जाती है। दिसम्बर 2014 में भिरड़ाणा को सिंधु घाटी सभ्यता का अब तक का खोजा गया सबसे प्राचीन नगर माना गया है। इतिहासकारों का अनुमान है कि यह अत्यंत विकसित सभ्यता थी और ये शहर अनेक बार बसे और उजड़े हैं।

यह सभ्यता सिन्धु नदी घाटी में फैली हुई थी इसलिए इसका नाम सिन्धु घाटी सभ्यता रखा गया। प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीकरण(township) भी कहा जाता है। सिन्धु घाटी सभ्यता के 1400 केन्द्रों को खोजा गया है जिसमें से 125 केन्द्र भारत में है। 80 प्रतिशत स्थल सिंधु की पुरातन सहायक नदी सरस्वती नदी और उसकी सहायक नदियों के आस-पास है।

किसी समय थी भारत और ईरान का बॉर्डर

जब भारत की सीमा पेशावर तक थी। तब ये नदी भारत और ईरान देश का बॉर्डर हुआ करती थी. भारत और पाकिस्तान का बंटवारा होने के बाद यह नदी का ज्यादातर भाग अब पाकिस्तान में चला गया।

पाकिस्तान की राष्ट्रीय नदी

हिमालय के दुर्गम स्थानों से गुजरती हुई सिंधु नदी कश्मीर और गिलगिट से होती पाकिस्तान में प्रवेश करती है और मैदानी इलाकों में बहती हुई 1610 किमी का रास्ता तय करती हुई कराची के दक्षिण में अरब सागर में मिल जाती है। सिंधु नदी लगभग 243 घन किलोमीटर पानी के बहाव के साथ यह नदी पाकिस्तान के अधिकतर क्षेत्रों में कृषि के लिए पानी की जरूरत को पूरा करती है।

सिंधु नदी की उपनदियाँ

सिंधु नदी की पांच उपनदियाँ हैं सतलुज, चनाब, रावी, जेहलम, व्यास. इनमें से सबसे बड़ी नदी सतलुज है। इसके अतिरिक्त गिलगिट, काबुल, स्वात, कुर्रम, टोची, गोमल, संगर आदि अन्य सहायक नदियाँ हैं। मार्च में बर्फ के पिघलने के कारण इसमें पानी का स्तर बढ़ जाता है। बरसात में मानसून के कारण भी जल का स्तर ऊँचा रहता है। इसके बाद सितंबर में जल स्तर नीचा हो जाता है और जाड़े भर कम ही रहता है।

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