राजस्थान के मशहूर किले और महल

रंग-रंगीला राजस्थान अपनी नायाब खूबसूरती व रजवाडी शान के प्रतीक किलों और महलों के कारण सदा ही पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा है. राजस्थान की पहचान उसके मूल निवासियों की जोशीली व् सरल जीवन शैली और ऐतिहासिक लड़ाइयों से है. राजस्थान को रंगों की धरती भी कहा जाता है. आइए  राजस्थान के खूबसूरत किलों और महलों के बारे में जानते है।

आमेर किला, जयपुर

aamber-fort-jaipurआमेर जयपुर नगर की सीमा में ही स्थित उपनगर है. आमेर किला लगभग दो शताब्दी पूर्व राजा मानसिंह, मिर्जा राजा जयसिंह और सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित महलों, मंडपों, बगीचों और मंदिरों का एक आकर्षक भवन है. यह मुगल और राजपूत वास्तुकला का समावेश है जिसे बनाने के लिए संगमरमर और लाल पत्थरों का प्रयोग हुआ है. मजबूत प्राचीन और सुंदर महल आमेर किले को राज्य का सबसे खास आकर्षण बनाते हैं. आमेर किले में स्थित माहोठा झील इस जगह की खूबसूरती में चार चाँद लगाती है. >> पढ़ें युनेस्को विश्व धरोहर स्थल: जयपुर का आमेर किला

जयगढ़ किला

jaigarh-fort–jaipurजयगढ़ किला, राजस्थान की राजधानी जयपुर में अरावली पर्वतमाला में चील का टीला नामक पहाड़ी पर बना है। जयगढ़ किले का निर्माण जयसिंह द्वितीय ने 1726 ई. में आमेर किला एवं महल परिसर की सुरक्षा हेतु करवाया था और इसका नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है। जयगढ़ किला जयपुर शहर की समृद्ध संस्कृति को दर्शाता है। >> पढ़ें जयगढ़ किले का इतिहास

नाहरगढ़ किला

नाहरगढ़ किले को जयपुर के राजा सवाई जय सिंह द्वारा बनाया गया था। इस किले का निर्माण कार्य 1734 में पूरा किया गया। नाहरगढ़ किला, अरावली पर्वत श्रृंखला में बना हुआ है। यह भारतीय व् यूरोपीय वास्‍तुकला का सुंदर समामेलन है। नाहरगढ़ से जयपुर शहर का नजारा देखने लायक होता है। दिन और रात दोनों ही समय जयपुर शहर लुभावना और खूबसूरत लगता है। >> पढ़ें: बाघों का निवास – नाहरगढ़ किला

सिटी पैलेस

city-palace–jaipurसिटी पैलेस जयपुर का प्रमुख लैंडमार्क और सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में से एक है। सिटी पैलेस का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह ने 1729 से 1732 के मध्य कराया था। यह एक राजस्थानी व मुगल शैलियों की मिश्रित रचना, एक पूर्व शाही निवास जो पुराने शहर के बीचों बीच खड़ा है। इस खूबसूरत परिसर में कई इमारतें, विशाल आंगन और आकर्षक बाग हैं जो इसके राजसी इतिहास की निशानी है। यहाँ की खूबसूरती को देखने के लिए सैलानी दुनिया भर से हजारों की संख्या में सिटी पैलेस में आते हैं। >> पढ़ें:  ख़ूबसूरती की मिसाल : सिटी पैलेस

चित्तौड़गढ़ किला

chittorgarh_fortचित्तौड़गढ़ किला एक भव्य और शानदार संरचना है जो चित्तौड़गढ़ के शानदार इतिहास को बताता है। यह चित्तौड़गढ़ का प्रमुख पर्यटन स्थल है। यह किला जमीन से लगभग 500 फुट ऊंचाई वाली एक पहाड़ी पर बना हुआ है। इस किले में कई सुंदर मंदिरों के साथ रानी पद्मिनी का शानदार महल भी हैं। >> पढ़ें:  चित्तौड़गढ़ किला- जौहर का गढ़

मेहरानगढ़ किला

mehrangarh-fort–jodhpurमेहरानगढ़ किला भारत के विशाल और शानदार किला है। मेहरानगढ़ किला एक बुलंद पहाड़ी पर 150 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। राव जोधा ने 12 मई 1459 को इस पहाडी पर किले की नीव डाली लेकिन महाराज जसवंत सिंह (1638-78) ने इसे पूरा किया था। इस विशाल किले के भीतर अनेक महल और मंदिर हैं। मेहरानगढ़ किले के दूसरे दरवाजे पर आज भी पिछले युद्धों के दौरान बने तोप के गोलों के निशान मौजूद हैं। >> पढ़ें:  मेहरानगढ़ किला- इस किले की ऊंचाई है कुतुब मीनार से भी ज़्यादा, जहां से दिखता है पाकिस्तान

जूनागढ़ का किला

Junagarth_Fort,_Bikanerजूनागढ़ का किला, राजस्थान राज्य के बीकानेर शहर में स्थित है। मूल रूप से इस किले का नाम चिंतामणि था जिसे 20वीं शताब्दी में बदलकर जूनागढ़ या पुराना किला रख दिया गया। इसे महाराजा राय सिंह ने बनवाया था। यहाँ राजा की समृद्ध विरासत के साथ उनकी कई हवेलियां और कई मंदिर भी हैं। यहाँ आपको संस्कृत और फारसी में लिखी गई कई पांडुलिपियां भी मिल जाएंगी। >> पढ़ें:  जूनागढ़ किला: तपते रेगिस्तान में सर्दी का माहौल

सोनार किला – जैसलमेर

sonar-kila-jaisalmerजैसलमेर राजस्थान का सबसे ख़ूबसूरत शहर है और जैसलमेर पर्यटन का सबसे आकर्षक स्थल माना जाता है। जैसलमेर का किला बारहवीं सदी के सुनहरे पत्थरों से बना है। सुबह जब सूर्य की चमकीली किरणें जब इस किले के सुनहरे पत्थरों पर पड़ती हैं तो यह किला पीले रंग से दमक उठता है। सोने सी आभा देने के कारण इसे सोनार किला या गोल्डन फोर्ट भी कहा जाता है। जैसलमेर के प्रमुख ऐतिहासिक स्मारकों में सर्वप्रमुख जैसलमेर किला वास्तु-कला का सुंदर नमूना है, जिसमें बारह सौ घर हैं। >> पढ़ें:  जानिए राजस्थान के सोनार किले की कुछ रहस्यमई बातें

हवा महल

Jaipur,_Hawa_Mahalजयपुर की पहचान माना जाने वाला हवा महल कई मजिलों पर बना हुआ महल है, जिसका निर्माण सवाई प्रताप सिंह ने 1799 में कराया था और श्री लाल चंद उस्‍ता इसके वास्‍तुकार थे। शाही हवा महल खूबसूरत गुलाबी शहर का शायद सबसे ज्यादा पसंदीदा पर्यटन स्थल है। 1799 में स्थापित यह महल राजस्थान के रंगीन इतिहास और संस्कृति का परिचायक है। >> पढ़ें:  5 मंजिलों वाले इस किले में ना तो है कोई सीढ़ी, ना है कोई कमरा

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उदयपुर सिटी पैलेस – उदयपुर

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सिटी पैलेस की स्थापना 16वीं शताब्दी में आरम्भ हुई। शाही शहर जयपुर में स्थित सिटी पैलेस वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। यह एक भव्य परिसर है। इस महल को बनाने में 22 राजाओं का योगदान रहा है। इस महल की खूबसूरती, संगमरमर की नक्काशी वाली आंतरिक सज्जा, शानदार खंभे, सैलानियों के लिए खास आकर्षण बनाती है। >> पढ़ें:  11 महलों वाले इस पैलेस में चलते है मिट्टी के तेल से पंखे

5 मंजिलों वाले इस किले में ना तो है कोई सीढ़ी, ना है कोई कमरा

भारत में बहुत सारे किले और महल है, जिनका अपना अलग- अलग इतिहास और महत्व रहा है। राजस्थान के किलों को भारत की शान माना जाता हैं। इन किलों में से एक है यहाँ का हवा महल।

इस महल का निर्माण 1799 ई. में राजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था। यह महल लाल और गुलाबी पत्थरों से बना हुआ है। इसकी इमारत पांच मंज़िला है। यह महल जयपुर के प्रसिद्ध जौहरी बाज़ार के पास स्थित है।

इतिहास

महल का डिजाइन लाल चंद उस्ताद ने हिन्दू देवता श्री कृष्ण के मुकुट के रूप में बनाया था। इस महल का बाहरी भाग मधुमक्खियों के शहद के छत्ते की तरह लगता है।

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इस महल में 953 छोटी खिड़कियां है, इन खिड़कियों में अनोखा जाली का काम किया गया है। इन जालियों को इस लिए लगवाया गया था, ताकि राजघराने की महिलाएं गली की रोजमर्रा की जिंदगी को देख सके। इन खिड़कियों को झरोखा भी कहा जाता है।

वह महिलाएं बाहर की ज़िन्दगी नहीं देख सकती थी, क्योंकि उनको “पर्दा” प्रथा (चेहरे को ढके रखना) का पालन करना होता था। इन जालियों के द्वारा महल के अंदर ठंडी हवा का संचार होता है। गर्मियों के उच्च तापमान में भी महल अंदर से ठंडा रहता है।

आइए जानते है हवा महल के बारे में कुछ और रोचक बातें:

  • इस महल की जालीनुमा खिडकियों से ठंडी हवाएं आतीं है, इसलिए इसको ‘पैलेस ऑफ़ विंड्स’ भी कहा जाता है। 87 डिग्री के एंगल पर बना यह पांच मंजिला महल आज भी ज्यों का त्यों खड़ा है।
  • यह पाँच मंजिला महल पुराने शहर की मुख्य सड़क पर दिखाई देता है और इस महल की कलाकारी सबको हैरान कर देने वाली है।
  • दिलचस्प बात ये है कि इस महल में अंदर जाने के लिए कोई दरवाजा नहीं है। अंदर जाने के लिए पीछे की तरफ से घूम कर जाना पड़ता है और महल के ऊपर जाने के लिए कोई सीढ़ी भी नहीं है। महल की ऊपरी मंजिल में जाने के लिए भी केवल ढालू रास्ता ही है।

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  • इसकी पाँच मंजिले पिरामिड के आकार में बनी हुई है।
  • यह महल सामने से तो किसी शानदार महल की तरह है, लेकिन इस महल के अंदर एक भी कमरा नहीं है। इस महल में सिर्फ गलियारे ही बने हुए है।
  • यह महल सबसे ज्यादा अपनी संस्कृति और इसकी डिजाइन के कारण मशहूर है।
  • इस महल में आपको गुंबददार छत, कमल, और बगीचों की कलाकारी देखने को मिलेगी।
  • इस महल में भारतीयों और अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों की शूटिंग भी होती है।
  • इस महल की अनोखी बनावट सबको अपनी और आकर्षित करती है।

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11 महलों वाले इस पैलेस में चलते है मिट्टी के तेल से पंखे

उदयपुर राजस्थान का बहुत ख़ूबसूरत शहर है। दुनिया भर से लोग यहां घूमने आते है। उदयपुर की खास महलों  में से घूमने के लिए जो सबसे ज़्यादा मशहूर है, वो है सिटी पैलेस। तक़रीबन 400 साल पहले इस पैलेस का निर्माण शुरू किया गया था। यह पैलेस एक पहाड़ी की चोटी पर बनाया गया है। आइए जानते है इस पैलेस के बारे में कुछ रोचक बातें:

इतिहास

यह पैलेस राजस्थान के बड़े शाही महलों में से एक है। सिटी पैलेस को महाराणा उदय सिंह ने 1569 में बनवाना शुरू किया था। इस के बाद जो भी इस पैलेस के राजा बने, उन्होंने इसे अपने-अपने शासन काल में पूरा करवाया।

इस पैलेस का निर्माण 11 पड़ांव में पूरा किया गया था। हैरानी की बात तो यह है इतने पड़ाँवों के पूरा होने के बाद भी इसके दिखने में कोई अंतर नहीं है। इस पैलेस को बनने में 400 साल लगे।

इस पैलेस से जुड़ी कुछ और रोचक बातें:

  • इस पैलेस के परिसर में 11 महल और भी मौजूद हैं। जिनमें 22 अलग- अलग राजाओं ने राज किया है। वैसे तो यह सभी महल देखने में सुंदर है, लेकिन इनमें शीश महल, मोर चौंक , मोती महल और कृष्णा विलास सबसे ज़्यादा अपनी और आकृषित करते है।
  • पैलेस के अंदर कई गुंबद, आंगन, गलियारे, कमरे, मंडप, टावर, और हैंगिंग गार्डन हैं, जो कि पैलेस की सुंदरता को और भी बढ़ाते हैं।
  • यह पैलेस पिछोला झील के किनारे एक पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ है। जहां से पूरे शहर को देखा जा सकता है।
  • ओर महलों की तरह इस महल में भी बहुत दरवाज़े है। ग्रेट गेट महल का मुख्य दरवाज़ा है। एक द्वार जिसके करीब एक क्षेत्र है जहाँ हाथियों की लड़ाई हुआ करती थी, उसको त्रिधनुषाकार द्वार या फिर त्रिपोलिया द्वार भी कहते है।
  • इस पैलेस में राजाओं को चांदी और सोने से तौला जाता था, तौलने के बाद जितना भी सोना और चांदी होता था, उसे गरीबों में बाँट दिया जाता था।
  • पैलेस की सबसे खास बात यह है कि यहां एक कमरे में पंखा रखा हुआ है। जिसे चलाने के लिये 220 वोल्ट के करेंट की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि यह पंखा मिट्टी के तेल से चलता है। पहले तेल जलता है, तो उसकी गर्मी से हवा का दबाव बनता है। हवा के इस दबाव से पंखे का अंदरूनी हिस्सा घूमता है और पंखा चलने लगता है।
  • भीम विलास नाम के महल को हिंदू देवी – देवता, राधा और कृष्ण के चित्रों के साथ सजाया गया है।
  • इस पैलेस के अंदर एक जगदीश मंदिर भी है, जिसे उदयपुर के सबसे बड़े मंदिर के रूप में जाना जाता है।
  • इस पैलेस में कई बड़ी हस्तियों की शादी हुई जिनका नाम है, रवीना टंडन और लखनऊ बेस्ड बिजनेसमैन गौरव शर्मा।
  • इस पैलेस में घूमने का समय सुबह 9:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक है। लेकिन इंडियन फेस्टिवल वाले दिनों में ये बंद होता है।

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पहले मुर्गी या अंडा, हिंदी में पहला सही जवाब यहाँ है!!

यदि आप इस पेज पर है तो इसका मतलब है कि आपने ‘पहले मुर्गी या अंडा’ की बहस पहले भी सुनी होगी। जिज्ञासु लोगों के दिमाग में हमेशा से ही यह यक्ष-प्रश्न घूमता रहा है कि पहले अंडा आया या मुर्गी. अगर अंडा पहले आया तो अंडा दिया किसने? अगर मुर्गी पहले आई तो बिना अंडे के कैसे आई?

अंडे का फंडा क्या है? बॉलीवुड कि हिट फिल्म जोड़ी न. 1 में पहले मुर्गी या अंडा बहस पर एक गाना भी है.

यह प्रश्न हमेशा से ही शोध का विषय रहा है. हिंदी में छपने वाली अधिकतर मीडिया साइटस कह रही हैं इसका ‘सही जवाब’ मिल गया है.

लेकिन रुकिए, क्या यह सही जवाब है? अधिकतर मीडिया साइटों ने सही जवाब कह कर पल्ला झाड़ लिया है. लेकिन वास्तव में सही जवाब बहस में खो गया है जिसे ढूंढ़ने कि हम यहाँ कोशिश करेंगे।

शेफील्ड और वारविक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की एक टीम इस विषय पर लम्बे समय से काम कर रही थी. काफी रिसर्च करने के बाद वैज्ञानिकों ने 3-4 साल दावा किया है कि धरती पर अंडे से पहले मुर्गी का जन्म हुआ था. इस दुनिया में पहले अंडा आया है या फिर मुर्गी आई है इस सवाल के जबाव में वैज्ञानिकों ने रिसर्च की तो पता चला कि ओवोक्लाइडिन नाम का प्रोटीन अंडे के खोल के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण होता है और यह प्रोटीन केवल और केवल मुर्गी के अंडाशय में पैदा होता है. इसलिए हम कह सकते हैं कि मुर्गी पहले आई न कि अंडा.

मुर्गी कहाँ से आयी?

लेकिन फिर मुर्गी कैसे आई? तो फिर मुर्गी किसी अन्य मुर्गी जैसे जीव के अंडे से आयी होगी। लेकिन फिर सवाल ये बनता है कि वो जीव पहले आया या उसका अंडा? और ये प्रश्न कुछ इस तरह ही घूमता रहेगा!

सच बात तो ये है कि यदि हम वर्तमान में पाए जाने वाली मुर्गी की बात कर रहे हैं तो हम 100% दावे से कह सकते हैं कि मुर्गी पहले आई. लेकिन मुर्गी कहाँ से आयी?

जहाँ से मुर्गी आई वह प्रक्रिया फिर से इस अंतहीन समय चक्र का हिस्सा भर है. हम कह सकते हैं कि वर्तमान में पाए जाने वाली मुर्गी, मुर्गी जैसी किसी जीव के अंडे से आयी और वो मुर्गी जैसा जीव, जैसे कि जंगली मुर्गी, अपने जैसे किसी जीव के अंडे से आई…

ये है असली वजह, करोड़ों सालों का जीवन चक्र

वैज्ञानिक शोधों से पता चलता है कि करोड़ों साल पहले पृथ्वी पर जीवन एक कोशिकीय जीव, जैसे अमीबा से शुरू हुआ. क्रमागत विकास (evolution) के चलते जीव में अनेक बदलाव होते रहे और इन करोड़ों सालों में करोड़ों अन्य जीवों की उत्पति हुई. तो आप समझ गए न कि यह प्रश्न केवल बहस का नहीं बल्कि इस धरती पर जीवन चक्र को समझने का माध्यम है.

Quora का ये प्रश्न शायद आपकी पहले मुर्गी या अंडा की जिज्ञासा को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सके. हम कोशिश कर रहे हैं कि इस पोस्ट में हम और ज्यादा जानकारी हिंदी में लेकर आएं. तो जल्दी ही फिर से साइट विजिट करियेगा, शायद पहले मुर्गी या अंडा पर कुछ और जानकारी तब तक हम आपके लिए तैयार कर सकें।

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ऐसे दस कारण जिसकी वजह से भारत दुनिया में सुपर पॉवर नहीं बन सकता

10 कारण जिसकी वजह से भारत कभी सुपर पॉवर देश नहीं बन पायेगा.
क्या भारत अमेरिका, रूस, चीन की तरह एक महाशक्ति (Super Power) देश बन पायेगा? इस सवाल का जवाब शायद हर भारतीय जानना चाहेगा. वर्तमान में भारत जिस तरह की समस्याओं का सामना कर रहा है, उस से तो लगता है कि भारत का महाशक्ति बनने का सपना सिर्फ सपना ही रह जायेगा.

धार्मिक उग्रवाद

भारत में धार्मिक उग्रवाद की समस्या बहुत लंबे समय से है, जो भारत की तरक्की के रास्ते को बहुत मुश्किल बना देती है. भारत के इतिहास में ऐसी कई घटनाएँ हो चुकी हैं, जिनके पीछे धार्मिक उग्रवाद मुख्य कारण था.

वामपंथी उग्रवाद

भारत में नक्सलियों द्वारा वामपंथी उग्रवाद चलाया जाता है, जो भारत की पिछले एक दशक से सबसे बढ़ी समस्या बनी हुई है. नक्सलियों ने भारत के कई हिस्सों में अपना अधिकार जमाया हुआ है और यह नक्सली साल में कई बार हमला करते हैं. यह नक्सली समाजिक और राजनितिक ताकतों में आने वाली अस्थिरता की वजह से वजूद में आये. इस उग्रवाद के चलते भारत कभी भी सुपर पॉवर बनने के बारे में सोच भी नहीं सकता.

भ्रष्टाचार

भारत में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ी समस्या है. जिसकी वजह से भारत में 2 जी, कैग जैसे घोटाले हुए. यह समस्या बहुत ही गंभीर है. जिसकी वजह से भारत में विदेशी निवेश बहुत कम है और जिससे दुनिया के विकसित देश यहां पर व्यपार चलाने का जोखिम नहीं लेते. इस समस्या से भारत में गरीब ओर गरीब और अमीर ओर अमीर होते जा रहे हैं.

सार्वजनिक संस्थाओं का पतन

भारत की उच्च न्यायपालिका को छोड़कर भारत के विश्वविद्यालय, पुलिस विभाग, सिविल सेवाएं, न्यापालिकाएं तेज़ी से पतन की तरफ जा रहे हैं. यह विभाग लोगों को अच्छी सेवाएं देने से बुरी तरह से असफल रहे हैं.

अमीर और गरीब में अंतर

भारत में अमीर और गरीब लोगों में खाई बढ़ती ही जा रही है, भारत में किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं ने ही पूरे देश का ध्यान यहां पर रहने वाले गरीबों की तरफ खींचा है. जिससे भारत में पिछले 10-15 वर्षों से गरीबों की स्थिति को सुधारने के प्रयास किये जा रहे हैं. भारत को अगर दुनिया में सुपर पॉवर बनना है, तो सबसे पहले देश में गरीबी की समस्या को खत्म करना होगा. जिसको शायद कई दशक लग जायेंगे.

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पर्यावरणीय दुर्दशा

भारत के पर्यावरण में भी एक स्थानीय स्तर पर गिरावट हो रही है, इसमें से नदियों में रसायनिक प्रदूशन, भूमिगत जलवाही स्तर में भारी कमी और नदियों के पानी का सूखना मुख्य हैं. जिसने लोगों के जीवन को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया है. भारत को विकसित देश बनने से पहले इन कुदरती स्रोतों को बचाना होगा.

मीडिया की उदासीनता

भारतीय मीडिया कई मुख्य मुद्दे जैसे की बढ़ती आय में असमानता और पर्यावरण की समस्याओं को कवर करने में बुरी तरह से असफल रही है.

राजनितिक अराजकता

भारत में राजनितिक अराजकता भी मुख्य मुद्दा है, जिसका मुख्य कारण यहां की केंद्र और राज्य की सरकारों के बीच गठबंधन की कमी है, जिसके परिणामस्वरूप लोगों के लिए लंबे समय की अच्छी स्वास्थ्य, शिक्षा आदि नीतियाँ बनाने में बहुत मुश्किलें आती है.

अस्थिर पढ़ोसी

भारत के लंबे समय से अपने पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान से सीमा को लेकर मतभेद दिन पर दिन बढ़ रहे हैं. जिसकी वजह से भारत की सरकार को सीमा रक्षा बजट भी बढ़ाना पड़ता है और ज्यादातर धन लोगों की भलाई में ना लगकर रक्षा बजट में लग जाता है.

सीमा विवाद

भारत में आज़ादी के 68 साल बाद भी अनसुलझे सीमा विवाद हैं. इन विवादों में मुख्य कश्मीर और भारत के उत्तर पूर्वी (नागालैंड और मणिपुर) हिस्से हैं. जो भारत का हिस्सा नहीं बनना चाहते और इन हिस्सों में आतंकवाद भी सबसे ज्यादा है.

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मेहरानगढ़ किला- इस किले की ऊंचाई है कुतुब मीनार से भी ज़्यादा, जहां से दिखता है पाकिस्तान

भारत का इतिहास राजाओं, महाराजाओं और उनके किलों से बहुत मशहूर है। यहां बहुत ऐसे किले मौजूद है जिनका इतिहास बहुत रोचक और डरावना है। इन में से एक किला है मेहरानगढ़ किला ( Mehrangarh Fort )। यह किला जोधपुर के सबसे बड़े किलों में से एक है। सबसे ज़्यादा लोग इस किले को देखने आते हैं। यह किला डेढ़ सौ मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर स्थित है। यह किला दिल्ली के कुतुब मीनार से 73 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद है।

इतिहास

इस किले को राव जोधा ने बनवाया था। जोधपुर के राजा रणमल की 24 संतानें थी, उनमें से एक थे राव जोधा, जो जोधपुर के 15वें राजा बने थे। राजा बनने के बाद राव जोधा ने एक वर्ष तक शासन की बागडोर संभाली। उसके बाद उनको लगा कि मंडोर का किला उनके लिए सुरक्षित नहीं है। इसलिए उन्होंने मंडोर किले से 9 कि.मी. दूर एक पहाड़ी पर नया किला बनवाया।

इस पहाड़ी पर पक्षियों का रहन बसेरा था, इसलिए इस पहाड़ी का नाम भोर चिड़िया पड़ा हुआ था। इस किले की नींव राव जोधा ने 12 मई 1459 को रखी थी। लेकिन इसे महाराज जसवंत सिंह ने 1638 -1678 में पूरा करवाया था। यह किला रानियों और राजकुमारियों की कुर्बानियों के लिए मशहूर हैं। रानियों और राजकुमारियों ने क़ुरबानी दे कर यह संदेश दिया कि, वे अपने पतियों के लिए कुछ भी कर सकतीं हैं।

आइए जानते है इस किले के बारे में और कुछ रोचक बातें:

  • 1818 में महाराजा मान सिंह इस किले के राजा बने। 1843 में महाराजा मान सिंह के निधन होने के बाद उनकी पत्नी रानी पद्मावती ने अग्नि कुण्ड में खुद को कुर्बान कर दिया था। उनकी स्मृति में किले के परिसर में सती माता का मंदिर बनवाया गया था ।
  • इस किले की दीवारों ने 10 किलोमीटर तक जगह घेरी हुई है। इन दीवारों की ऊंचाई 20 फुट से 120 फुट और चौड़ाई 12 फुट से 70 फुट तक है।
  • इस किले के मुख्य चार दरवाजें हैं। किले के अंदर भव्य महल, अद्भुत नक्काशीदार दरवाजें , जालीदार खिड़कियां हैं।
  • मेहरानगढ किले में 7 दरवाजें और भी हैं। हर एक दरवाजा अपनी एक अलग कहानी को दर्शाता है।
  • किले का अंतिम दरवाजा लोह पोल है, जो किले के परिसर के मुख्य भाग में बना हुआ है। जिन औरतों ने अपने पति को युद्ध में खोया था, उन्होंने भी खुद को रानी पद्मावती के साथ अग्नि कुण्ड में कुर्बान कर दिया था,  इस दरवाजे के बायीं तरफ उनके हाथों के निशान है।
  • 1965 में जब भारत-पाक का युद्ध हुआ तो उस युद्ध में मेहरानगढ़ के किले को भी निशाना बनाया गया था, लेकिन माना जाता है कि माता की कृपा से यहां किसी का कोई भी नुकशान नहीं हुआ था। इस किले की चोटी से पाकिस्तान की सीमा देखी जा सकती है।
  • किले के अंदर एक म्‍यूजि‍यम भी है। इस म्‍यूजि‍यम को देखने के लिए इस किले में बहुत लोग आतें हैं। इस म्‍यूजि‍यम में अलग- अलग आकार की शाही पालकियों के अलावा राठौर की सेना, पोशाक, चित्र और साज-सज्‍जा के सामान को संभाल कर रखा गया है।
  • इस किले के अंदर बहुत सारे सजे हुए महल भी है, जिनमें मोती महल, फूल महल, शीश महल, सिलेह खान और दौलत खान आदि महल है। साथ ही किले के म्यूजियम में पालकियों , पोशाकों , संगीत वाद्य, शाही पालनों  और फर्नीचर को रखा हुआ है। किले की दीवारों पर रखी तोपे इसकी सुन्दरता को चार चाँद लगाती है।
  • यह किला रोज सुबह 9:00 से शाम 5:00 बजे तक खुला रहता है। भारतीय पर्यटकों के लिए प्रवेश करने के 60 रुपये है और विदेशी पर्यटकों के लिए यह 400 रुपये है। कैमरा फीस 100 रुपये है।

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यात्रा को सफल बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण टिप्स

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अगर आप गर्मियों और सर्दियों की छुट्टिओं में किसी यात्रा पर जाने का मन बना रहे हैं तो आपको इन बातों का ख़ास ध्यान रखना पड़ेगा, जो आज हम आपको बताने जा रहे हैं। यह कुछ बातें निश्चित रूप से आपकी यात्रा को सुखदायक बनाएं गी।

यात्रा को सफल बनाने के लिए कुछ बेहतरीन उपाय

सबसे पहले सफऱ पर जाने से पहले एक अच्छी गाड़ी का चुनाव करें और इसके साथ स्पेयर व्हील भी जरुर लेकर जाए, अगर गाड़ी का टायर पंचर भी हो गया, तो आप उसको स्पेयर व्हील के साथ बदल सकते हैं।

किसी भी जगह पर जाने से पहले वहां पर इंटरनेट दुवारा किसी अच्छे से होटल में अपनी बुकिंग करवा लें, ता कि आपको वहां रहने में आसानी हो।

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एक अच्छे से और हलके बैग में अपने कपड़े डालें, इससे आपको बैग उठाने में आपको कोई दिक़्क़त नही होगी।

यात्रा पर जाते समय अपने साथ पानी की बोतल को आवश्यक रखना।

अगर आप कोई तरल पदार्थ साथ में लजा रहे हैं, तो उसको किसी लफ़ाफे में अच्छे से पैक करके रखना ता कि लीक होने से भी वह आपको कोई नुकसान न करे।

अपने साथ कुछ दवाईयां जरूर लेकर जाए, खासकर पेनकिलर, ता कि आप किसी भी तरह के दर्द को आसानी से काबू में कर सके।

अपके कपड़े और जूते आरामदायक होने चाहिए, इससे आपको घूमने-फिरने में कोई दिक्कत नहीं आएगी और आप अपने सफ़र का खूब आनंद मान सकते हैं।

सफ़र पर जाते समय किसी भी तरह के नशे या शराब का सेवन न करें, और अपनी सफ़र को यक़ीनन सफल बनाए।

एक बात का खास ध्यान रखना कि सफ़र के समय खर्चा अपने बजट के हिसाब से करें और अपने पास कुछ पैसों को सेव करके रखें, ता कि जरूरत पड़ने पर उन पैसों का उपयोग किया जाए।

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भानगढ़ का किला जहां शाम ढलते ही जाग उठती हैं आत्माएं

पुराने किले, मौत, हादसों, अतीत और रूहों का अपना एक अलग ही सबंध और संयोग होता है। ऐसी कोई जगह जहां मौत का साया बनकर रूहें घुमती हो, उन जगहों पर इंसान अपने डर पर काबू नहीं कर पाता है। दुनिया भर में कई ऐसे पुराने किले है जिनका अपना एक अलग ही काला अतीत है और वहां आज भी रूहों का वास है। भानगढ़ का किला भारत में सबसे प्रेतवाधित स्थान के रूप में जाना जाता है, और शायद सबसे बड़ा अनसुलझा रहस्य है। आइए जानते है इस भुतहा किले की कहानी:

इतिहास

भानगढ़ किला 16वीं शताब्दी में बनवाया गया था। इस क़िले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573  में बनवाया था। यह किला बसने के बाद लगभग 300 वर्षों तक यहां आबाद रहा। बाद में भगवंत दास के छोटे बेटे व अम्बर(आमेर ) के महान मुगल सेनापति, मानसिंह के छोटे भाई राजा माधो सिंह ने (1613) इसे अपनी रिहाइश बना लिया।

राजा माधो सिंह उस समय अकबर के सेना में जनरल के पद पर तैनात थे। उस समय भानगड़ की जनसंख्‍या तकरीबन 10,000 थी। भानगढ़ का किला अपने बर्बाद होने के इतिहास और रहस्यमयी घटनाओं के कारण मशहूर है। इस किले के उजाड़ होने के बारे में  दो कहानियाँ प्रचलित है।

पहली कहानी

पहली कहानी के अनुसार जहाँ भानगढ़ किले का निर्माण करवाया गया, वह स्थान योगी बालूनाथ का तपस्थल था। उसने इस वचन के साथ महाराजा भगवंतदास को भानगढ़ किले के निर्माण की अनुमति दी थी कि किले की परछाई किसी भी कीमत पर उसके तपस्थल पर नहीं पड़नी चाहिए।

महाराजा भगवंतदास ने तो अपने वचन का मान रखा, किंतु उसके वंशज माधोसिंह इस वचन की अवहेलना करते हुए किले की ऊपरी मंज़िलों का निर्माण करवाने लगे। ऊपरी मंज़िलों के निर्माण के कारण योगी बालूनाथ के तपस्थल पर भानगढ़ किले की परछाई पड़ गई।

ऐसा होने पर योगी बालूनाथ ने क्रोधित होकर श्राप दे दिया कि यह किला आबाद नहीं रहेगा। उनके श्राप के कारण यह किला उजाड़ हो गया।

दूसरी कहानी

कहते है कि भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती बेहद खुबसुरत थी। उस समय उनके रूप की चर्चा पूरे राज्‍य में थी और साथ देश कोने कोने के राजकुमार उनसे विवाह करने के इच्‍छुक थे। उस समय उनकी उम्र महज 18 वर्ष ही थी और उनका यौवन उनके रूप में और निखार ला चुका था।

एक दिन वह अपनी सखियों के साथ इत्र की दुकान पर गई। वो इत्रों को हाथों में लेकर उसकी खुशबू ले रही थी। उसी समय उस दुकान से कुछ ही दूरी एक सिंधु सेवड़ा नाम का व्‍यक्ति खड़ा होकर उन्‍हे बहुत ही गौर से देख रहा था। सिंधु सेवड़ा उसी राज्‍य में रहता था और वो काले जादू का महारथी था।

कहते है वह राजकुमारी को पागलों की तरह मन ही मन में प्रेम करने लगा था। वो हर हालत में राजकुमारी को पाना चाहता था। इसलिए उसने उस दुकान के पास आकर एक इत्र के बोतल जिसे रानी पसंद कर रही थी,उसने उस बोतल पर काला जादू कर दिया जो राजकुमारी के वशीकरण के लिए किया था। लेकिन इस बात का पता राजकुमारी को लग गया।

राजकुमारी रत्नाकवती ने उस इत्र की शीशी को उठाया, और वही पास के एक बड़े पत्थर पर ज़ोर से पटक दिया। जिससे वो शीशी टूट गयी और सारा इत्र उस पत्‍थर पर फ़ैल गया। कहते है की काले जादू के असर के कारण वह पत्थर तांत्रिक सिंधु सेवड़ा के पीछे चल पड़ा और तांत्रिक को कुचल दिया, जिससे कारण तांत्रिक की मौत हो गयी।

मरने से पहले तांत्रिक ने श्राप दिया कि इस किले में रहने वालें सभी लोग जल्‍द ही मर जायेंगे और वो दोबारा जन्‍म नहीं ले सकेंगे और  उनकी आत्‍माएं इस किले में भटकती रहेंगी। कहा जाता है की तांत्रिक के मृत्यु के कुछ समय के बाद ही भानगढ़ और अजबगढ़ के बीच लड़ाई हुई।

उस युद्ध में सभी लोग मारे गये। साथ ही राजकुमारी रत्नाचवती भी उस श्राप से नहीं बच पाई और उनकी भी मृत्यु हो गयी। लोगों का मानना है की भानगढ़ के किले में उनकी रू‍हें आज भी घुमती हैं।

रात को किले के अंदर जाना है वर्जित

लोगों की माने तो इस किले में रात में किसी के रोने और चिल्लाने की तेज़ आवाजें आती हैं। कई बार यहाँ एक साये को भी भटकते हुए देखने की बात कही गई है। इन बातों में कितनी सच्चाई है, ये कोई नहीं जानता। रहस्यमयी घटनाओं के कारण पुरातत्व विभाग द्वारा भानगढ़ किले को भुतहा घोषित कर दिया है। किले के प्रवेश द्वार पर उनके द्वारा बोर्ड लगाया गया है, जिसके अनुसार सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के उपरांत किले में प्रवेश वर्जित है।

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आज हम आपको राजस्थान के सोनार किले की कुछ रहस्यमई बातों के बारे में बताने जा रहे हैं। सबसे पहले आपको बता दें कि सोनार किला दुनिया के बड़े किलों में से एक है। यह किला जैसलमेर में स्थित है, जो कि भारत के राजस्थान राज्य में आता है।

सोनार किले का इतिहास

आपको बता दें कि 1156 ईस्वी में भाटी राजपूत शासक रावल जैसल ने इसे जैसलमेर में एक ताज की तरह बनवाया था। इस किले के चारों ओर 99 गढ़ बने हुए हैं, और इसकी ऊंचाई लगभग 30 मीटर है, इसीलिए यह किला दिखने में काफी विशाल लगता है।

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किले में आकर्षण चीजें

इस किले की आकर्षिता का अंदाजा लगाना वैसे तो बहुत मुश्किल है, क्योंकि इस किले को बनाया ही कुछ इस तरह से गया है। इसके प्रथम प्रवेश द्वार पर पत्थर की गई नक्काशी का शानदार नमूना बना हुआ है, जो कि पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षण करता है। दूसरा इस किले में दशहरा चौक भी प्रयटकों के लिए खास दर्शनीय स्थल बना हुआ है। यहां पर आप खूबसूरत दुकानों में जाकर खरीददारी का आनंद भी ले सकते हैं।

किले का राजमहल

आपको पता ही है कि राजमहल के बिना तो किले का कोई काम ही नहीं होता, क्योंकि राजमहल ही राजा महाराजाओं के निवास का मुख्य स्थल होता है। इस किले का तो राजमहल भी इतना खूबसूरत बना हुआ है जो कि पर्यटकों को वहां जाने के लिए बार-बार मजबूर करता है।

म्यूजियम

आपको एक बात और बता दें कि कुछ समय पहले इस महल के एक हिस्से को म्यूजियम के रूप में बना दिया गया है। म्यूजियम में प्रवेश होने के लिए भारतीयों के लिए 50 रुपए और विदेशियों के लिए 300 रुपए का टिकट लगता है।

सात जैन मंदिर

किले के आकर्षणों में सात जैन मंदिर भी शामिल हैं। इन मंदिरों में सबसे भव्य मंदिर जैन धर्म के 22 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित है। पार्श्वनाथ मंदिर के अलावा चंद्रप्रभु मंदिर, रिषभदेव मंदिर, संभवनाथ मंदिर आदि भी किले में बने हुए हैं।

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नर्मदा नदी: भारत की तीसरी सबसे लम्बी नदी के बारे में रोचक कहानी

भारत में बहने वाली गोदावरी और कृष्णा नदी के बाद तीसरे स्थान पर सबसे लम्बी नदी आती है नर्मदा नदी। विंध्य की पहाड़‍ियों में बसा अमरकंटक एक वन प्रदेश है। अमरकंटक को ही इस नदी का उद्गम स्थल माना गया है।

यह समुद्र तल से 3500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। कहते है कि इस नदी के दर्शन मात्र से भगतों के सब पापों का नाश होता है।

किवदंती

किवदंतियों में, नर्मदा नदी के विवाह के बारे में रोचक कहानी है जो इस प्रकार है:

राजा मैखल की पुत्री नर्मदा को रेवा के नाम से भी जाना जाता है। राजा मैखल ने नर्मदा के विवाह के लिए एक शर्त रखी कि जो राजकुमार गुलबकावली के फूल लेकर मेरी बेटी को देगा उससे इसका विवाह तय कर दिया जाएगा।

नर्मदा से शादी करने का मौका सोनभ्रद नाम के एक राजकुमार को मिला जो की नर्मदा के लिए वो पुष्प लाया था। अब विवाह में कुछ ही समय बचा था और सोनभ्रद से पहले कभी न मिले होने के कारण राजकुमारी नर्मदा ने अपनी दासी जुहिला के हाथ राजकुमार को एक संदेश भेजा।

राजकुमारी के वस्त्र और गहने पाकर जुहिला सोनभ्रद को मिलने चली गई। वहां पहुँच कर जुहिला ने राजकुमार को नहीं बताया कि वह दासी है, और उसे राजकुमारी समझ कर सोनभ्रद उस पर मोहित हो गया।

काफी समय बीतने के पश्चात जब जुहिला लौट कर ना आई तो राजकुमारी नर्मदा स्वयं सोनभ्रद से मिलने को चली गई। परन्तु वहाँ जाकर उसने देखा कि जुहिला और सोनभ्रद एक दूसरे के साथ थे।

यह दृश्य देख नर्मदा क्रोधित हो गई और घृणा से भर उठी। तुरंत वहां से विपरीत दिशा की ओर चल दी और कभी वापिस न आई। उसके पश्चात से नर्मदा बंगाल सागर की बजाए अरब सागर में जाकर मिल गईं और उन्होंने कसम उठाई कि वे कभी भी विवाह नहीं करेंगी, हमेशा कुंवारी ही रहेंगी।

कहते हैं कि आज तक भी सोनभ्रद को अपनी गलती पर पछतावा है परन्तु नर्मदा कभी लौट कर वापिस नहीं आई। कहा जाता है कि आज भी नर्मदा का विलाप और दुख की पीड़ा आज भी उनके जल की छल-छल की आवाज़ में सुनाई पड़ती है।

मिलती है अरब सागर में

भारत देश की सभी विशाल नदियां बंगाल सागर में आकर मिलती है, लेकिन नर्मदा एक ऐसी नदी है जो बंगाल सागर में नहीं बल्कि अरब सागर की में जाकर मिलती है।