भारत के प्राचीन इतिहास से जुड़ी है ब्रह्मपुत्र नदी

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आज हम आपको भारत की सबसे लम्बी नदियों में से एक नदी ब्रह्मपुत्र के बारे में बताने जा रहे हैं। आपको बता दें कि यह नदी तिब्बत, भारत, और बांग्लादेश से होकर बहती है। इस नदी का उद्गम तिब्बत में स्थित चेमायुंग दुंग नामक हिमवाह से हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी की लम्बाई 2700 किलोमीटर हैं।

इसीलिए पड़ा ब्रह्मपुत्र नाम

सिंधु नदी की तरह यह नदी भी हिमालय के पवित्र मानसरोवर झील से निकलती है। इस नदी को ब्रह्मपुत्र इसीलिए कहते है, क्योंकि वह कैलाश पर्वत के ढाल से नीचे की ओर उतरती है।

ब्रह्मपुत्र का सफर

आपको बता दें कि यह नदी बंगाल की खाड़ी में समाने से पहले लगभग तीन हज़ार किलोमीटर का लंबा सफर तय करती है. इस सफर के दौरान वह 1625 किलोमीटर का सफर तिब्बत में तय करती है, इसके बाद भारत में 918 किलोमीटर तक बहती है और बांग्लादेश में वह 360 किलोमीटर की लम्बाई तक बहती है।

ब्रह्मपुत्र नदी के अनेक नाम

ब्रह्मपुत्र नदी को कई नामों से जाना जाता है, जैसे कि तिब्बत में इसका नाम सांपो, अरुणाचल में डिहं और असम में इसको ब्रह्मपुत्र के नाम से पुकारा जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश की सीमा में बहती गंगा की उप नदी ‘पद्मा’ के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इस नदी की पांच उपनदियाँ हैं- सुवनश्री, तिस्ता, तोर्सा, लोहित, बराक आदि।

भारत के प्राचीन इतिहास से जुड़ी है यह नदी

आपको बता दें कि ब्रह्मपुत्र एक नदी के साथ दर्शन सामान्य भी है, क्योंकि इस नदी के तटों पर आर्य-अनार्य, मंगोल-तिब्बती, बर्मी-द्रविड़, मुगल-आहोम जैसी कई संस्कृतियों का आपस में मिलाव हुआ था। इसके बाद यह संस्कृतियों ने मिलकर एक अलग संस्कृति का गठन किया है। इसीलिए यह प्राचीन भारत के इतिहास से जुड़ी नदी है।

अनेक नदियां होती है इसमें समाहित

अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड , मेघालय, भूटान, पश्चिम बंगाल और सिक्किम के पहाड़ों से निकली अन्य अनेक नदियां और उनकी उप-नदियां भी इसमें समाहित हो जाती है।

ब्रह्मपुत्र नदी भी सिंधु सभ्यता की नदी से कम नहीं है। भारत के सांस्कृति और धार्मिक इतिहास में इस नदी का भी काफी बड़ा योगदान रहा है। इस नदी के क्षेत्र में सैकड़ों गुफाएं, घने जंगल और कई प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष अभी भी पाएं जाते है।

गुरूग्राम का एम.जी. रोड़ जहाँ सफ़ेद साड़ी में चुड़ैल गाड़ी के पीछे भागती है!!

गुड़गांव शहर का एम.जी. रोड़, गुड़गांव का सबसे सुनसान और भयावह रोड है। इस सड़क पर बहुत से लोगों ने सफेद साड़ी पहने औरत को देखा है, जो कि दिखने में बहुत डरावनी है।

माना जाता है की इंसान की अकाल मौत होने की वजह से उसका भूत बन जाता है. या फिर इंसान की कोई ख्वाहिश पूरी ना हुई हो तब भी उसका भुतहा साया दिखाई देता है। ऐसा ही एक भूत गुरुग्राम के एमजी रोड में लोगों को अक्सर मिलता है।

इस सड़क पर ड्राइव करने वाले लोगों का मानना है कि उन्होंने ने भी कई बार इस सड़क पर सफेद साड़ी पहने औरत को देखा है, जो गाड़ियों के साथ-साथ भागती है। उसकी जीभ बांह जितनी लंबी और बाहर की तरफ उबली हुई आँखें हैं। कहते हैं कि इस औरत की मौत कुछ साल पहले इसी एरिया में हुई थी।

एम.जी. रोड़ पर भूत

एम.जी. रोड़ पर हॉरर एनकाउंटर

मंजय नाम का कैब ड्राइवर दिल्ली-गुड़गांव सड़क पर कैब चलाता है। एक रात वह एक यात्री को गुड़गांव साइबर सिटी छोड़ कर वापस आ रहा था। एम.जी सड़क पर ड्राइव करते हुए रात के 12 बजे उसे सड़क के किनारे एक सफेद साड़ी पहने औरत दिखाई दी। पहली नज़र में मंजय ने इसे नज़रअंदाज कर दिया।

लेकिन उसके पसीने तब छूटने लगे जब उसने कार के साइड मिरर में उस औरत को गाड़ी का पीछा करते हुए देखा। मंजय ने तेजी से गाड़ी दौड़ाई। इस बार जब मंजय ने फिर साइड मिरर में देखा तो उसकी जान में जान आई, क्योंकि वह औरत पीछा छोड़ चुकी थी, साइड मिरर में कोई नजर नहीं आ रहा था।

मंजय यह समझ नहीं पा रहा था की इतनी रात को भला सुनसान सड़क पर कौन औरत होगी, वो भी सफ़ेद साडी में। मंजय ने जैसे तैसे हनुमान जी का नाम लेकर एक-दो मिनट और गाड़ी चलाई ही थी, कि वो औरत अचानक उसकी कार के आगे आ गयी।

आखिर इतनी तेज गाड़ी चलाने के बाद भी वो सामने कैसे आ गयी? इसी असमंजसम में फंसे मंजय ने इस बार कार के फ्रंट डैक पर रखी हनुमान जी की छोटी मूर्ति को हाथ में लिया और बेहद तेज रफ्तार से गाड़ी चलाता रहा। वह औरत कैसे उसकी गाड़ी से आर-पार हो गई, वह यह समझ ही नहीं पाया और ना ही वह समझना चाहता था।

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जानिए अपने अवचेतन मन के बारे में कुछ तथ्य

एक अच्छा इंसान बनने के लिए सबसे पहले आपका दिमाग अच्छे से विकसित होना चाहिए। दिमाग को विकसित करने के लिए आपको ज्ञान होना भी जरूरी है। इसके लिए आप जो भी आज तक सोचते आये हो उसे अपने दिमाग से निकाल दो और अपने अवचेतन मन को अच्छे से समझने की कोशिश करें।

क्या है अवचेतन मन

अवचेतन मन एक शक्तिशाली मन है जो आपके जीवन के हर पहलू को कण्ट्रोल करता है और यह किसी भी विचार या आदेश जो इसको को दिया जाता है, वो अक्सर पर्याप्त समय में, उसे सत्य के रूप में स्वीकार कर लेता है भले ही वह आपको लाभ करे या नहीं।

आपको बता दें आपका अवचेतन मन सकारात्मक और नकारात्मक के बीच अंतर नहीं करता, इसीलिए आप जो सोचोगे वही होगा चाहे वो सकारात्मक हो या फिर नकारत्मक।

आपको बता दें कि जिस चीज़ से आप घिरे होते हैं आपका अवचेतन मन न उस पर ही ध्यान देता है, अगर आप सकारात्मक चीजों से घिरे हुए होंगे तो आपके साथ सकारात्मक चीज़े होंगी। इसीलिए अपने ज्यादातर लोगों से यही सुना होगा कि हमें सकारात्मक चीजों के बारे में सोचना चाहिए।

अगर आप सकारात्मक सोच के इंसान हैं और वास्तव में आप अवचेतन दिमाग की शक्ति में विश्वास करते हैं, चाहे आप जो भी चाहते हैं, अगर आप अपना लक्ष्य तय करके उसको पूरा कर रहे हो, तब आपका अवचेतन मन 100 प्रतिशत काम करेगा।

अवचेतन ही आपकी शारीरिक कार्यों को नियंत्रित करता है। आपकी जो सोच होती है, वो आपके अवचेतन दिमाग पर प्रभाव डालती है और आपका अवचेतन मन आपके हृदय की धड़कन, स्वास, रक्त का पम्पिंग, सेलुलर फ़ंक्शन, भौतिक अंगों के निरंतर संचालन आदि जैसे अवचेतन शारीरिक कार्यों को नियंत्रित करता है.

आपके विचार भी वास्तविकता बन जाएंगे अगर आप अवचेतन मन को सकारात्मक भावनाओं की अपेक्षाओं के साथ भरतें हैं, और इसके साथ ही अगर आप किसी भी चीज़ के बारे में सकारात्मक सोच रखेंगे तो उसका परिणाम भी अच्छा ही होगा।

कई बार लोगों दुवारा आपके अवचेतन मन का कभी-कभी गलत इस्तेमाल किया जाता है और इससे आपका ब्रेनवाश होता है। अगर आपके अवचेतन मन पर कब्जा कर लिया जाये तो किसी भी चीज़ को आपकी भावनाओं में घुसाया जा सकता है।

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सिंधु नदी – हजारों साल पुरानी सभ्यता की गवाह नदी

सिन्धु नदी (अंग्रेज़ी: Indus) एशिया की सबसे बड़ी और लंबी नदियों में से एक है। यह नदी पश्चिमी तिब्बत(चीन नियंत्रित), भारत और पाकिस्तान में से होकर बहती है। इस नदी की कुल लंबाई लगभग 2900 किलोमीटर है। सिन्धु नदी का उद्गम स्थल तिब्बत के मानसरोवर के निकट “सेंगे ख बब” नामक जलधारा को माना जाता है। भारत में से होकर बहने वाली यह सबसे लंबी नदी है।

पाकिस्तान के स्कर्दू प्रांत में सिंधु नदी
पाकिस्तान के स्कर्दू प्रांत में सिंधु नदी

उद्गम स्थल

तिब्बती भाषा में ‘सेंगे ख बब’ का मतलब ‘सिंह मुख नदी’ है, यानि सिंह के मुख से निकलने वाली नदी। ध्यान दें कि तिब्बत व भारत की बहुत-सी महत्वपूर्ण नदियों की स्रोत-धाराओं के नाम हिन्दू व बौद्ध आस्थाओं में धार्मिक महत्व रखने वाले जानवरों पर पड़े हैं। जैसे कि सतलुज के उद्गम स्थान को लंगचेन खबब’ अर्थात ‘हाथी के मुख से निकलने वाली नदी’ है। इसी तरह ब्रह्मपुत्र नदी उर्फ़ यरलुंग त्संगपो नदी का आरम्भिक नाम ‘तमचोग खबब’ अर्थात ‘अश्व के मुख से निकलने वाली नदी’ है। वहीं घाघरा नदी आरम्भिक स्थान ‘मगचा खबब’ अर्थात ‘मोर-मुख नदी’ है।

सिंधु से इंडिया तक की कहानी

सिंधु नदी के नाम का अर्थ ‘सागर या पानी का बड़ा समूह’ है। सबसे पहले ईरान के लोग इसे ‘हेंदु’ कहने लगे। इसके बाद ग्रीक लोग इसको ‘इंडोस’ कहने लगे। बाद में रोमन ने नाम को बदल कर ‘इंडस’ रख दिया। कालांतर में  ‘इंडस’ से इंडिया बन गया।

भारत के लेह-लद्दाख प्रांत में सिंधु घाटी
भारत के लेह-लद्दाख प्रांत में सिंधु घाटी

सिंधु घाटी सभ्यता का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक था। यह इंडस दरिया (indus river) के किनारे बसने वाली सभ्यता थी। थाईलैंड के निवासी अपनी भौगौलिक उच्चारण की भिन्नताओं की वजहों से अन्दुस को सिन्धु कहने लगे। हिंदी उच्चारण में इसे हिन्दू कहा जाने लगा।

सिंधु नदी का सफर

बहुत सारी अन्य नदियों की भांति सिंधु नदी हिमालय के पर्वतों में से निकलती है। यह नदी तिब्बत और कश्मीर के बीच बहती हैं। भारत में सिंधु नदी तिब्बत से लेह में प्रवेश करती है और इसके बाद कश्मीर से होते हुए पाकिस्तान में दाखिल होती है। इसकी उपनदी झेलम के किनारे पर कश्मीर राज्य की राजधानी श्रीनगर स्थित है। सिंधु नदी नंगा पर्वत के उतरी भाग से होकर दक्षिण पश्चिम में पाकिस्तान के बीचों-बीच से गुज़रती है। अंत में यह नदी कराची से गुज़रती हुई अरब सागर में शामिल हो जाती है।

इस नदी ने अपना रास्ता कई बार बदला है। 1245 ई. तक यह मुल्तान के पश्चिमी इलाके में बहती थी।

सिन्धु घाटी सभ्यता

सिन्धु घाटी सभ्यता (3300 ईसापूर्व से 1700 ईसापूर्व तक,परिपक्व काल: 2550 ई.पू. से 1750 ई.पू.) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित शोध के अनुसार यह सभ्यता कम से कम 8000 वर्ष पुरानी है। यह हड़प्पा सभ्यता और ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ के नाम से भी जानी जाती है। दिसम्बर 2014 में भिरड़ाणा को सिंधु घाटी सभ्यता का अब तक का खोजा गया सबसे प्राचीन नगर माना गया है। इतिहासकारों का अनुमान है कि यह अत्यंत विकसित सभ्यता थी और ये शहर अनेक बार बसे और उजड़े हैं।

यह सभ्यता सिन्धु नदी घाटी में फैली हुई थी इसलिए इसका नाम सिन्धु घाटी सभ्यता रखा गया। प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीकरण(township) भी कहा जाता है। सिन्धु घाटी सभ्यता के 1400 केन्द्रों को खोजा गया है जिसमें से 125 केन्द्र भारत में है। 80 प्रतिशत स्थल सिंधु की पुरातन सहायक नदी सरस्वती नदी और उसकी सहायक नदियों के आस-पास है।

किसी समय थी भारत और ईरान का बॉर्डर

जब भारत की सीमा पेशावर तक थी। तब ये नदी भारत और ईरान देश का बॉर्डर हुआ करती थी. भारत और पाकिस्तान का बंटवारा होने के बाद यह नदी का ज्यादातर भाग अब पाकिस्तान में चला गया।

पाकिस्तान की राष्ट्रीय नदी

हिमालय के दुर्गम स्थानों से गुजरती हुई सिंधु नदी कश्मीर और गिलगिट से होती पाकिस्तान में प्रवेश करती है और मैदानी इलाकों में बहती हुई 1610 किमी का रास्ता तय करती हुई कराची के दक्षिण में अरब सागर में मिल जाती है। सिंधु नदी लगभग 243 घन किलोमीटर पानी के बहाव के साथ यह नदी पाकिस्तान के अधिकतर क्षेत्रों में कृषि के लिए पानी की जरूरत को पूरा करती है।

सिंधु नदी की उपनदियाँ

सिंधु नदी की पांच उपनदियाँ हैं सतलुज, चनाब, रावी, जेहलम, व्यास. इनमें से सबसे बड़ी नदी सतलुज है। इसके अतिरिक्त गिलगिट, काबुल, स्वात, कुर्रम, टोची, गोमल, संगर आदि अन्य सहायक नदियाँ हैं। मार्च में बर्फ के पिघलने के कारण इसमें पानी का स्तर बढ़ जाता है। बरसात में मानसून के कारण भी जल का स्तर ऊँचा रहता है। इसके बाद सितंबर में जल स्तर नीचा हो जाता है और जाड़े भर कम ही रहता है।

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राजस्थान के मशहूर किले और महल

रंग-रंगीला राजस्थान अपनी नायाब खूबसूरती व रजवाडी शान के प्रतीक किलों और महलों के कारण सदा ही पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहा है. राजस्थान की पहचान उसके मूल निवासियों की जोशीली व् सरल जीवन शैली और ऐतिहासिक लड़ाइयों से है. राजस्थान को रंगों की धरती भी कहा जाता है. आइए  राजस्थान के खूबसूरत किलों और महलों के बारे में जानते है।

आमेर किला, जयपुर

aamber-fort-jaipurआमेर जयपुर नगर की सीमा में ही स्थित उपनगर है. आमेर किला लगभग दो शताब्दी पूर्व राजा मानसिंह, मिर्जा राजा जयसिंह और सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित महलों, मंडपों, बगीचों और मंदिरों का एक आकर्षक भवन है. यह मुगल और राजपूत वास्तुकला का समावेश है जिसे बनाने के लिए संगमरमर और लाल पत्थरों का प्रयोग हुआ है. मजबूत प्राचीन और सुंदर महल आमेर किले को राज्य का सबसे खास आकर्षण बनाते हैं. आमेर किले में स्थित माहोठा झील इस जगह की खूबसूरती में चार चाँद लगाती है. >> पढ़ें युनेस्को विश्व धरोहर स्थल: जयपुर का आमेर किला

जयगढ़ किला

jaigarh-fort–jaipurजयगढ़ किला, राजस्थान की राजधानी जयपुर में अरावली पर्वतमाला में चील का टीला नामक पहाड़ी पर बना है। जयगढ़ किले का निर्माण जयसिंह द्वितीय ने 1726 ई. में आमेर किला एवं महल परिसर की सुरक्षा हेतु करवाया था और इसका नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है। जयगढ़ किला जयपुर शहर की समृद्ध संस्कृति को दर्शाता है। >> पढ़ें जयगढ़ किले का इतिहास

नाहरगढ़ किला

नाहरगढ़ किले को जयपुर के राजा सवाई जय सिंह द्वारा बनाया गया था। इस किले का निर्माण कार्य 1734 में पूरा किया गया। नाहरगढ़ किला, अरावली पर्वत श्रृंखला में बना हुआ है। यह भारतीय व् यूरोपीय वास्‍तुकला का सुंदर समामेलन है। नाहरगढ़ से जयपुर शहर का नजारा देखने लायक होता है। दिन और रात दोनों ही समय जयपुर शहर लुभावना और खूबसूरत लगता है। >> पढ़ें: बाघों का निवास – नाहरगढ़ किला

सिटी पैलेस

city-palace–jaipurसिटी पैलेस जयपुर का प्रमुख लैंडमार्क और सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में से एक है। सिटी पैलेस का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह ने 1729 से 1732 के मध्य कराया था। यह एक राजस्थानी व मुगल शैलियों की मिश्रित रचना, एक पूर्व शाही निवास जो पुराने शहर के बीचों बीच खड़ा है। इस खूबसूरत परिसर में कई इमारतें, विशाल आंगन और आकर्षक बाग हैं जो इसके राजसी इतिहास की निशानी है। यहाँ की खूबसूरती को देखने के लिए सैलानी दुनिया भर से हजारों की संख्या में सिटी पैलेस में आते हैं। >> पढ़ें:  ख़ूबसूरती की मिसाल : सिटी पैलेस

चित्तौड़गढ़ किला

chittorgarh_fortचित्तौड़गढ़ किला एक भव्य और शानदार संरचना है जो चित्तौड़गढ़ के शानदार इतिहास को बताता है। यह चित्तौड़गढ़ का प्रमुख पर्यटन स्थल है। यह किला जमीन से लगभग 500 फुट ऊंचाई वाली एक पहाड़ी पर बना हुआ है। इस किले में कई सुंदर मंदिरों के साथ रानी पद्मिनी का शानदार महल भी हैं। >> पढ़ें:  चित्तौड़गढ़ किला- जौहर का गढ़

मेहरानगढ़ किला

mehrangarh-fort–jodhpurमेहरानगढ़ किला भारत के विशाल और शानदार किला है। मेहरानगढ़ किला एक बुलंद पहाड़ी पर 150 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। राव जोधा ने 12 मई 1459 को इस पहाडी पर किले की नीव डाली लेकिन महाराज जसवंत सिंह (1638-78) ने इसे पूरा किया था। इस विशाल किले के भीतर अनेक महल और मंदिर हैं। मेहरानगढ़ किले के दूसरे दरवाजे पर आज भी पिछले युद्धों के दौरान बने तोप के गोलों के निशान मौजूद हैं। >> पढ़ें:  मेहरानगढ़ किला- इस किले की ऊंचाई है कुतुब मीनार से भी ज़्यादा, जहां से दिखता है पाकिस्तान

जूनागढ़ का किला

Junagarth_Fort,_Bikanerजूनागढ़ का किला, राजस्थान राज्य के बीकानेर शहर में स्थित है। मूल रूप से इस किले का नाम चिंतामणि था जिसे 20वीं शताब्दी में बदलकर जूनागढ़ या पुराना किला रख दिया गया। इसे महाराजा राय सिंह ने बनवाया था। यहाँ राजा की समृद्ध विरासत के साथ उनकी कई हवेलियां और कई मंदिर भी हैं। यहाँ आपको संस्कृत और फारसी में लिखी गई कई पांडुलिपियां भी मिल जाएंगी। >> पढ़ें:  जूनागढ़ किला: तपते रेगिस्तान में सर्दी का माहौल

सोनार किला – जैसलमेर

sonar-kila-jaisalmerजैसलमेर राजस्थान का सबसे ख़ूबसूरत शहर है और जैसलमेर पर्यटन का सबसे आकर्षक स्थल माना जाता है। जैसलमेर का किला बारहवीं सदी के सुनहरे पत्थरों से बना है। सुबह जब सूर्य की चमकीली किरणें जब इस किले के सुनहरे पत्थरों पर पड़ती हैं तो यह किला पीले रंग से दमक उठता है। सोने सी आभा देने के कारण इसे सोनार किला या गोल्डन फोर्ट भी कहा जाता है। जैसलमेर के प्रमुख ऐतिहासिक स्मारकों में सर्वप्रमुख जैसलमेर किला वास्तु-कला का सुंदर नमूना है, जिसमें बारह सौ घर हैं। >> पढ़ें:  जानिए राजस्थान के सोनार किले की कुछ रहस्यमई बातें

हवा महल

Jaipur,_Hawa_Mahalजयपुर की पहचान माना जाने वाला हवा महल कई मजिलों पर बना हुआ महल है, जिसका निर्माण सवाई प्रताप सिंह ने 1799 में कराया था और श्री लाल चंद उस्‍ता इसके वास्‍तुकार थे। शाही हवा महल खूबसूरत गुलाबी शहर का शायद सबसे ज्यादा पसंदीदा पर्यटन स्थल है। 1799 में स्थापित यह महल राजस्थान के रंगीन इतिहास और संस्कृति का परिचायक है। >> पढ़ें:  5 मंजिलों वाले इस किले में ना तो है कोई सीढ़ी, ना है कोई कमरा

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उदयपुर सिटी पैलेस – उदयपुर

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सिटी पैलेस की स्थापना 16वीं शताब्दी में आरम्भ हुई। शाही शहर जयपुर में स्थित सिटी पैलेस वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। यह एक भव्य परिसर है। इस महल को बनाने में 22 राजाओं का योगदान रहा है। इस महल की खूबसूरती, संगमरमर की नक्काशी वाली आंतरिक सज्जा, शानदार खंभे, सैलानियों के लिए खास आकर्षण बनाती है। >> पढ़ें:  11 महलों वाले इस पैलेस में चलते है मिट्टी के तेल से पंखे

5 मंजिलों वाले इस किले में ना तो है कोई सीढ़ी, ना है कोई कमरा

भारत में बहुत सारे किले और महल है, जिनका अपना अलग- अलग इतिहास और महत्व रहा है। राजस्थान के किलों को भारत की शान माना जाता हैं। इन किलों में से एक है यहाँ का हवा महल।

इस महल का निर्माण 1799 ई. में राजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था। यह महल लाल और गुलाबी पत्थरों से बना हुआ है। इसकी इमारत पांच मंज़िला है। यह महल जयपुर के प्रसिद्ध जौहरी बाज़ार के पास स्थित है।

इतिहास

महल का डिजाइन लाल चंद उस्ताद ने हिन्दू देवता श्री कृष्ण के मुकुट के रूप में बनाया था। इस महल का बाहरी भाग मधुमक्खियों के शहद के छत्ते की तरह लगता है।

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इस महल में 953 छोटी खिड़कियां है, इन खिड़कियों में अनोखा जाली का काम किया गया है। इन जालियों को इस लिए लगवाया गया था, ताकि राजघराने की महिलाएं गली की रोजमर्रा की जिंदगी को देख सके। इन खिड़कियों को झरोखा भी कहा जाता है।

वह महिलाएं बाहर की ज़िन्दगी नहीं देख सकती थी, क्योंकि उनको “पर्दा” प्रथा (चेहरे को ढके रखना) का पालन करना होता था। इन जालियों के द्वारा महल के अंदर ठंडी हवा का संचार होता है। गर्मियों के उच्च तापमान में भी महल अंदर से ठंडा रहता है।

आइए जानते है हवा महल के बारे में कुछ और रोचक बातें:

  • इस महल की जालीनुमा खिडकियों से ठंडी हवाएं आतीं है, इसलिए इसको ‘पैलेस ऑफ़ विंड्स’ भी कहा जाता है। 87 डिग्री के एंगल पर बना यह पांच मंजिला महल आज भी ज्यों का त्यों खड़ा है।
  • यह पाँच मंजिला महल पुराने शहर की मुख्य सड़क पर दिखाई देता है और इस महल की कलाकारी सबको हैरान कर देने वाली है।
  • दिलचस्प बात ये है कि इस महल में अंदर जाने के लिए कोई दरवाजा नहीं है। अंदर जाने के लिए पीछे की तरफ से घूम कर जाना पड़ता है और महल के ऊपर जाने के लिए कोई सीढ़ी भी नहीं है। महल की ऊपरी मंजिल में जाने के लिए भी केवल ढालू रास्ता ही है।

भानगढ़ का किला जहां शाम ढलते ही जाग उठती हैं आत्माएं

  • इसकी पाँच मंजिले पिरामिड के आकार में बनी हुई है।
  • यह महल सामने से तो किसी शानदार महल की तरह है, लेकिन इस महल के अंदर एक भी कमरा नहीं है। इस महल में सिर्फ गलियारे ही बने हुए है।
  • यह महल सबसे ज्यादा अपनी संस्कृति और इसकी डिजाइन के कारण मशहूर है।
  • इस महल में आपको गुंबददार छत, कमल, और बगीचों की कलाकारी देखने को मिलेगी।
  • इस महल में भारतीयों और अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों की शूटिंग भी होती है।
  • इस महल की अनोखी बनावट सबको अपनी और आकर्षित करती है।

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11 महलों वाले इस पैलेस में चलते है मिट्टी के तेल से पंखे

उदयपुर राजस्थान का बहुत ख़ूबसूरत शहर है। दुनिया भर से लोग यहां घूमने आते है। उदयपुर की खास महलों  में से घूमने के लिए जो सबसे ज़्यादा मशहूर है, वो है सिटी पैलेस। तक़रीबन 400 साल पहले इस पैलेस का निर्माण शुरू किया गया था। यह पैलेस एक पहाड़ी की चोटी पर बनाया गया है। आइए जानते है इस पैलेस के बारे में कुछ रोचक बातें:

इतिहास

यह पैलेस राजस्थान के बड़े शाही महलों में से एक है। सिटी पैलेस को महाराणा उदय सिंह ने 1569 में बनवाना शुरू किया था। इस के बाद जो भी इस पैलेस के राजा बने, उन्होंने इसे अपने-अपने शासन काल में पूरा करवाया।

इस पैलेस का निर्माण 11 पड़ांव में पूरा किया गया था। हैरानी की बात तो यह है इतने पड़ाँवों के पूरा होने के बाद भी इसके दिखने में कोई अंतर नहीं है। इस पैलेस को बनने में 400 साल लगे।

इस पैलेस से जुड़ी कुछ और रोचक बातें:

  • इस पैलेस के परिसर में 11 महल और भी मौजूद हैं। जिनमें 22 अलग- अलग राजाओं ने राज किया है। वैसे तो यह सभी महल देखने में सुंदर है, लेकिन इनमें शीश महल, मोर चौंक , मोती महल और कृष्णा विलास सबसे ज़्यादा अपनी और आकृषित करते है।
  • पैलेस के अंदर कई गुंबद, आंगन, गलियारे, कमरे, मंडप, टावर, और हैंगिंग गार्डन हैं, जो कि पैलेस की सुंदरता को और भी बढ़ाते हैं।
  • यह पैलेस पिछोला झील के किनारे एक पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ है। जहां से पूरे शहर को देखा जा सकता है।
  • ओर महलों की तरह इस महल में भी बहुत दरवाज़े है। ग्रेट गेट महल का मुख्य दरवाज़ा है। एक द्वार जिसके करीब एक क्षेत्र है जहाँ हाथियों की लड़ाई हुआ करती थी, उसको त्रिधनुषाकार द्वार या फिर त्रिपोलिया द्वार भी कहते है।
  • इस पैलेस में राजाओं को चांदी और सोने से तौला जाता था, तौलने के बाद जितना भी सोना और चांदी होता था, उसे गरीबों में बाँट दिया जाता था।
  • पैलेस की सबसे खास बात यह है कि यहां एक कमरे में पंखा रखा हुआ है। जिसे चलाने के लिये 220 वोल्ट के करेंट की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि यह पंखा मिट्टी के तेल से चलता है। पहले तेल जलता है, तो उसकी गर्मी से हवा का दबाव बनता है। हवा के इस दबाव से पंखे का अंदरूनी हिस्सा घूमता है और पंखा चलने लगता है।
  • भीम विलास नाम के महल को हिंदू देवी – देवता, राधा और कृष्ण के चित्रों के साथ सजाया गया है।
  • इस पैलेस के अंदर एक जगदीश मंदिर भी है, जिसे उदयपुर के सबसे बड़े मंदिर के रूप में जाना जाता है।
  • इस पैलेस में कई बड़ी हस्तियों की शादी हुई जिनका नाम है, रवीना टंडन और लखनऊ बेस्ड बिजनेसमैन गौरव शर्मा।
  • इस पैलेस में घूमने का समय सुबह 9:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक है। लेकिन इंडियन फेस्टिवल वाले दिनों में ये बंद होता है।

भारत के पांच स्थान जहां दशहरा पर होती है रावण की पूजा

 

पहले मुर्गी या अंडा, हिंदी में पहला सही जवाब यहाँ है!!

यदि आप इस पेज पर है तो इसका मतलब है कि आपने ‘पहले मुर्गी या अंडा’ की बहस पहले भी सुनी होगी। जिज्ञासु लोगों के दिमाग में हमेशा से ही यह यक्ष-प्रश्न घूमता रहा है कि पहले अंडा आया या मुर्गी. अगर अंडा पहले आया तो अंडा दिया किसने? अगर मुर्गी पहले आई तो बिना अंडे के कैसे आई?

अंडे का फंडा क्या है? बॉलीवुड कि हिट फिल्म जोड़ी न. 1 में पहले मुर्गी या अंडा बहस पर एक गाना भी है.

यह प्रश्न हमेशा से ही शोध का विषय रहा है. हिंदी में छपने वाली अधिकतर मीडिया साइटस कह रही हैं इसका ‘सही जवाब’ मिल गया है.

लेकिन रुकिए, क्या यह सही जवाब है? अधिकतर मीडिया साइटों ने सही जवाब कह कर पल्ला झाड़ लिया है. लेकिन वास्तव में सही जवाब बहस में खो गया है जिसे ढूंढ़ने कि हम यहाँ कोशिश करेंगे।

शेफील्ड और वारविक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की एक टीम इस विषय पर लम्बे समय से काम कर रही थी. काफी रिसर्च करने के बाद वैज्ञानिकों ने 3-4 साल दावा किया है कि धरती पर अंडे से पहले मुर्गी का जन्म हुआ था. इस दुनिया में पहले अंडा आया है या फिर मुर्गी आई है इस सवाल के जबाव में वैज्ञानिकों ने रिसर्च की तो पता चला कि ओवोक्लाइडिन नाम का प्रोटीन अंडे के खोल के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण होता है और यह प्रोटीन केवल और केवल मुर्गी के अंडाशय में पैदा होता है. इसलिए हम कह सकते हैं कि मुर्गी पहले आई न कि अंडा.

मुर्गी कहाँ से आयी?

लेकिन फिर मुर्गी कैसे आई? तो फिर मुर्गी किसी अन्य मुर्गी जैसे जीव के अंडे से आयी होगी। लेकिन फिर सवाल ये बनता है कि वो जीव पहले आया या उसका अंडा? और ये प्रश्न कुछ इस तरह ही घूमता रहेगा!

सच बात तो ये है कि यदि हम वर्तमान में पाए जाने वाली मुर्गी की बात कर रहे हैं तो हम 100% दावे से कह सकते हैं कि मुर्गी पहले आई. लेकिन मुर्गी कहाँ से आयी?

जहाँ से मुर्गी आई वह प्रक्रिया फिर से इस अंतहीन समय चक्र का हिस्सा भर है. हम कह सकते हैं कि वर्तमान में पाए जाने वाली मुर्गी, मुर्गी जैसी किसी जीव के अंडे से आयी और वो मुर्गी जैसा जीव, जैसे कि जंगली मुर्गी, अपने जैसे किसी जीव के अंडे से आई…

ये है असली वजह, करोड़ों सालों का जीवन चक्र

वैज्ञानिक शोधों से पता चलता है कि करोड़ों साल पहले पृथ्वी पर जीवन एक कोशिकीय जीव, जैसे अमीबा से शुरू हुआ. क्रमागत विकास (evolution) के चलते जीव में अनेक बदलाव होते रहे और इन करोड़ों सालों में करोड़ों अन्य जीवों की उत्पति हुई. तो आप समझ गए न कि यह प्रश्न केवल बहस का नहीं बल्कि इस धरती पर जीवन चक्र को समझने का माध्यम है.

Quora का ये प्रश्न शायद आपकी पहले मुर्गी या अंडा की जिज्ञासा को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सके. हम कोशिश कर रहे हैं कि इस पोस्ट में हम और ज्यादा जानकारी हिंदी में लेकर आएं. तो जल्दी ही फिर से साइट विजिट करियेगा, शायद पहले मुर्गी या अंडा पर कुछ और जानकारी तब तक हम आपके लिए तैयार कर सकें।

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ऐसे दस कारण जिसकी वजह से भारत दुनिया में सुपर पॉवर नहीं बन सकता

10 कारण जिसकी वजह से भारत कभी सुपर पॉवर देश नहीं बन पायेगा.
क्या भारत अमेरिका, रूस, चीन की तरह एक महाशक्ति (Super Power) देश बन पायेगा? इस सवाल का जवाब शायद हर भारतीय जानना चाहेगा. वर्तमान में भारत जिस तरह की समस्याओं का सामना कर रहा है, उस से तो लगता है कि भारत का महाशक्ति बनने का सपना सिर्फ सपना ही रह जायेगा.

धार्मिक उग्रवाद

भारत में धार्मिक उग्रवाद की समस्या बहुत लंबे समय से है, जो भारत की तरक्की के रास्ते को बहुत मुश्किल बना देती है. भारत के इतिहास में ऐसी कई घटनाएँ हो चुकी हैं, जिनके पीछे धार्मिक उग्रवाद मुख्य कारण था.

वामपंथी उग्रवाद

भारत में नक्सलियों द्वारा वामपंथी उग्रवाद चलाया जाता है, जो भारत की पिछले एक दशक से सबसे बढ़ी समस्या बनी हुई है. नक्सलियों ने भारत के कई हिस्सों में अपना अधिकार जमाया हुआ है और यह नक्सली साल में कई बार हमला करते हैं. यह नक्सली समाजिक और राजनितिक ताकतों में आने वाली अस्थिरता की वजह से वजूद में आये. इस उग्रवाद के चलते भारत कभी भी सुपर पॉवर बनने के बारे में सोच भी नहीं सकता.

भ्रष्टाचार

भारत में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ी समस्या है. जिसकी वजह से भारत में 2 जी, कैग जैसे घोटाले हुए. यह समस्या बहुत ही गंभीर है. जिसकी वजह से भारत में विदेशी निवेश बहुत कम है और जिससे दुनिया के विकसित देश यहां पर व्यपार चलाने का जोखिम नहीं लेते. इस समस्या से भारत में गरीब ओर गरीब और अमीर ओर अमीर होते जा रहे हैं.

सार्वजनिक संस्थाओं का पतन

भारत की उच्च न्यायपालिका को छोड़कर भारत के विश्वविद्यालय, पुलिस विभाग, सिविल सेवाएं, न्यापालिकाएं तेज़ी से पतन की तरफ जा रहे हैं. यह विभाग लोगों को अच्छी सेवाएं देने से बुरी तरह से असफल रहे हैं.

अमीर और गरीब में अंतर

भारत में अमीर और गरीब लोगों में खाई बढ़ती ही जा रही है, भारत में किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं ने ही पूरे देश का ध्यान यहां पर रहने वाले गरीबों की तरफ खींचा है. जिससे भारत में पिछले 10-15 वर्षों से गरीबों की स्थिति को सुधारने के प्रयास किये जा रहे हैं. भारत को अगर दुनिया में सुपर पॉवर बनना है, तो सबसे पहले देश में गरीबी की समस्या को खत्म करना होगा. जिसको शायद कई दशक लग जायेंगे.

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पर्यावरणीय दुर्दशा

भारत के पर्यावरण में भी एक स्थानीय स्तर पर गिरावट हो रही है, इसमें से नदियों में रसायनिक प्रदूशन, भूमिगत जलवाही स्तर में भारी कमी और नदियों के पानी का सूखना मुख्य हैं. जिसने लोगों के जीवन को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया है. भारत को विकसित देश बनने से पहले इन कुदरती स्रोतों को बचाना होगा.

मीडिया की उदासीनता

भारतीय मीडिया कई मुख्य मुद्दे जैसे की बढ़ती आय में असमानता और पर्यावरण की समस्याओं को कवर करने में बुरी तरह से असफल रही है.

राजनितिक अराजकता

भारत में राजनितिक अराजकता भी मुख्य मुद्दा है, जिसका मुख्य कारण यहां की केंद्र और राज्य की सरकारों के बीच गठबंधन की कमी है, जिसके परिणामस्वरूप लोगों के लिए लंबे समय की अच्छी स्वास्थ्य, शिक्षा आदि नीतियाँ बनाने में बहुत मुश्किलें आती है.

अस्थिर पढ़ोसी

भारत के लंबे समय से अपने पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान से सीमा को लेकर मतभेद दिन पर दिन बढ़ रहे हैं. जिसकी वजह से भारत की सरकार को सीमा रक्षा बजट भी बढ़ाना पड़ता है और ज्यादातर धन लोगों की भलाई में ना लगकर रक्षा बजट में लग जाता है.

सीमा विवाद

भारत में आज़ादी के 68 साल बाद भी अनसुलझे सीमा विवाद हैं. इन विवादों में मुख्य कश्मीर और भारत के उत्तर पूर्वी (नागालैंड और मणिपुर) हिस्से हैं. जो भारत का हिस्सा नहीं बनना चाहते और इन हिस्सों में आतंकवाद भी सबसे ज्यादा है.

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मेहरानगढ़ किला- इस किले की ऊंचाई है कुतुब मीनार से भी ज़्यादा, जहां से दिखता है पाकिस्तान

भारत का इतिहास राजाओं, महाराजाओं और उनके किलों से बहुत मशहूर है। यहां बहुत ऐसे किले मौजूद है जिनका इतिहास बहुत रोचक और डरावना है। इन में से एक किला है मेहरानगढ़ किला ( Mehrangarh Fort )। यह किला जोधपुर के सबसे बड़े किलों में से एक है। सबसे ज़्यादा लोग इस किले को देखने आते हैं। यह किला डेढ़ सौ मीटर ऊंची एक पहाड़ी पर स्थित है। यह किला दिल्ली के कुतुब मीनार से 73 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद है।

इतिहास

इस किले को राव जोधा ने बनवाया था। जोधपुर के राजा रणमल की 24 संतानें थी, उनमें से एक थे राव जोधा, जो जोधपुर के 15वें राजा बने थे। राजा बनने के बाद राव जोधा ने एक वर्ष तक शासन की बागडोर संभाली। उसके बाद उनको लगा कि मंडोर का किला उनके लिए सुरक्षित नहीं है। इसलिए उन्होंने मंडोर किले से 9 कि.मी. दूर एक पहाड़ी पर नया किला बनवाया।

इस पहाड़ी पर पक्षियों का रहन बसेरा था, इसलिए इस पहाड़ी का नाम भोर चिड़िया पड़ा हुआ था। इस किले की नींव राव जोधा ने 12 मई 1459 को रखी थी। लेकिन इसे महाराज जसवंत सिंह ने 1638 -1678 में पूरा करवाया था। यह किला रानियों और राजकुमारियों की कुर्बानियों के लिए मशहूर हैं। रानियों और राजकुमारियों ने क़ुरबानी दे कर यह संदेश दिया कि, वे अपने पतियों के लिए कुछ भी कर सकतीं हैं।

आइए जानते है इस किले के बारे में और कुछ रोचक बातें:

  • 1818 में महाराजा मान सिंह इस किले के राजा बने। 1843 में महाराजा मान सिंह के निधन होने के बाद उनकी पत्नी रानी पद्मावती ने अग्नि कुण्ड में खुद को कुर्बान कर दिया था। उनकी स्मृति में किले के परिसर में सती माता का मंदिर बनवाया गया था ।
  • इस किले की दीवारों ने 10 किलोमीटर तक जगह घेरी हुई है। इन दीवारों की ऊंचाई 20 फुट से 120 फुट और चौड़ाई 12 फुट से 70 फुट तक है।
  • इस किले के मुख्य चार दरवाजें हैं। किले के अंदर भव्य महल, अद्भुत नक्काशीदार दरवाजें , जालीदार खिड़कियां हैं।
  • मेहरानगढ किले में 7 दरवाजें और भी हैं। हर एक दरवाजा अपनी एक अलग कहानी को दर्शाता है।
  • किले का अंतिम दरवाजा लोह पोल है, जो किले के परिसर के मुख्य भाग में बना हुआ है। जिन औरतों ने अपने पति को युद्ध में खोया था, उन्होंने भी खुद को रानी पद्मावती के साथ अग्नि कुण्ड में कुर्बान कर दिया था,  इस दरवाजे के बायीं तरफ उनके हाथों के निशान है।
  • 1965 में जब भारत-पाक का युद्ध हुआ तो उस युद्ध में मेहरानगढ़ के किले को भी निशाना बनाया गया था, लेकिन माना जाता है कि माता की कृपा से यहां किसी का कोई भी नुकशान नहीं हुआ था। इस किले की चोटी से पाकिस्तान की सीमा देखी जा सकती है।
  • किले के अंदर एक म्‍यूजि‍यम भी है। इस म्‍यूजि‍यम को देखने के लिए इस किले में बहुत लोग आतें हैं। इस म्‍यूजि‍यम में अलग- अलग आकार की शाही पालकियों के अलावा राठौर की सेना, पोशाक, चित्र और साज-सज्‍जा के सामान को संभाल कर रखा गया है।
  • इस किले के अंदर बहुत सारे सजे हुए महल भी है, जिनमें मोती महल, फूल महल, शीश महल, सिलेह खान और दौलत खान आदि महल है। साथ ही किले के म्यूजियम में पालकियों , पोशाकों , संगीत वाद्य, शाही पालनों  और फर्नीचर को रखा हुआ है। किले की दीवारों पर रखी तोपे इसकी सुन्दरता को चार चाँद लगाती है।
  • यह किला रोज सुबह 9:00 से शाम 5:00 बजे तक खुला रहता है। भारतीय पर्यटकों के लिए प्रवेश करने के 60 रुपये है और विदेशी पर्यटकों के लिए यह 400 रुपये है। कैमरा फीस 100 रुपये है।

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