धनतेरस पर कुबेर यंत्र की पूजा भी है बेहद जरुरी, जाने विशेष नियम और ध्यान रखें ये बातें!!

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है। सनातन धर्म में धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरि की पूजा के साथ ही कुबेर यंत्र की भी पूजा का विधान है।

मान्यता है कि भगवान धनवंतरि की पूजा के साथ ही कुबेर यंत्र की भी पूजा का विधान है। मान्यता है कि धनतेरस के दिन अगर इस यंत्र की पूजा की जाए तो जीवन में धन की कमी नहीं होती है। तो आइए जानते हैं कि कुबेर यंत्र की पूजा और नियम :-

कुबेर यंत्र

यह धन अधिपति धनेश कुबेर का यंत्र है, इस यंत्र के प्रभाव से यक्षराज कुबेर प्रसन्न होकर अतुल सम्पत्ति की रक्षा करते हैं। यह यंत्र स्वर्ण और रजत पत्रों से भी निर्मित होता है, जहां लक्ष्मी प्राप्ति की अन्य साधनायें असफ़ल हो जाती हैं, वहां इस यंत्र की उपासना से शीघ्र लाभ होता है।

कुबेर यंत्र विजय दसमीं धनतेरस दीपावली तथा रविपुष्य नक्षत्र और गुरुवार या रविवार को बनाया जाता है। कुबेर यंत्र की स्थापना गल्ले, तिजोरियोंबन्द अलमारियों में की जाती है। लक्ष्मी प्राप्ति की साधनाओं में यह यंत्र अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

विशष नियम

  • धनतेरस के शुभ मुहूर्त में भगवान धनवंतरि की पूजा के बाद धन के स्वामी कुबेर की पूजा करें। लेकिन ध्यान रखें जब भी कुबेर महराज की पूजा करें तो वहां कुबेर यंत्र जरूर रखें।
  • इस यंत्र को दक्षिण दिशा की और मुख करके ही स्थापित करें। इसके बाद हाथ में गंगाजल लेकर विनियोग मंत्र ‘अस्य श्री कुबेर मंत्रस्य विश्वामित्र ऋषि:वृहती छन्द: शिवमित्र धनेश्वरो देवता समाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोग:’ पढ़ें।
  • विनियोग मंत्र पढ़ने के बाद हाथ में लिया हुआ जल भूमि पर छिड़क दें और कुबेर मंत्र ‘ऊं श्रीं, ऊं ह्रीं श्रीं, ऊं ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम:’ का जप करें। लेकिन ध्यान रखें कि मंत्र का स्पष्टरूप से उच्चारण करना जरूरी है।
  • इसकी पूजा करते समय इन मंत्रों में से कोई भी एक मंत्र पढ़ सकते हैं। इसमें अष्टाक्षर मंत्र ‘ऊं वैश्रवणाय स्वाहा:,’ षोडशाक्षर मंत्र ‘ ऊं श्री ऊं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नम:’ का जप भी कर सकते हैं। इसके अलावा पंच त्रिंशदक्षर मंत्र ‘ऊं यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये धनधान्या समृद्धि देहि दापय स्वाहा’ कहा जाता है कि इन मंत्रों के जप से धन के स्वामी कुबेरजी अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा से जीवन में कभी भी धन की कमी नहीं होती।

प्यार के बारे में 40 मनोवैज्ञानिक रोचक तथ्य

0

प्यार बहुत खूबसूरत एहसास है, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। लोग इस एहसास को विभिन्न तरीकों से महसूस करते हैं। यह व्यक्ति को ख़ुशी और गम दोनों देता हैं।

वे सभी पल, जिनमें प्यार शामिल है, हमारे मस्तिष्क और हृदय की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया है। हम जो महसूस करते हैं, वह हमारे शरीर, मन और आत्मा को प्रभावित करता है।

इस पोस्ट में हम आपको आज आपको प्यार के बारे में कुछ मनोवैज्ञानिक तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं तो चलिए शुरू करते हैं

psycology facts about love

प्यार के बारे में मनोवैज्ञानिक रोचक तथ्य

  1. प्रेम शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘लुभवति‘ से हुई है जिसका अर्थ है इच्छा।
  2. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार प्यार को जितना छिपाने की कोशिश की जाती है उतना ही वह सामने आ जाता है।
  3. प्यार को दर्शाने के लिए ‘दिल‘ के प्रतीक का इस्तेमाल 1250 से किया जा रहा है।
  4. पुरुष महिलाओं की तुलना में जल्दी प्यार में पड़ जाते हैं। जहाँ महिलाओं को 15 दिन लगते हैं, वहीँ पुरुषों को सिर्फ 8 सेकंड।
  5. आपके बता दें कि जब आपको किसी के प्यार में पड़ने का डर रहता है, तो उसको “फिलोफोबिआ” कहते हैं।
  6. आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि दुनिया भर के 2 प्रतिशत कपल्स अपने लव का इज़हार पहली बार किसी मॉल या सुपरमार्केट में करते हैं।
  7. पूरी दुनिया में रोजाना करीब 30 लाख लोग अपने पार्टनर के साथ डेट्स पर जाते हैं।psycology-facts-love
  8. मनोवैज्ञानिक के अनुसार किसी को गले लगाना आपके नर्वस सिस्टम में पेनकिलर की तरह असर करता हैं।
  9. लव में पड़ने के बाद कम से कम 2 दोस्त आपसे जरूर दूर हो जाते हैं।
  10. आपको बता दें कि रोमांटिक मूड में ही आपका दिमाग ज्यादा काम करता हैं।
  11. आपने जरूर सुना होगा प्यार अंधा होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह सच है, दो प्यार करने वालों को प्यार के सिवा कुछ नहीं दिखाई देता।
  12. दुनियाभर में प्रतिदिन करीब 30 लाख लोगों (स्त्री-पुरुष) को अपना पहला प्रेम होता है।
  13. प्यार के इजहार के मामलों में देखा गया है कि 90 % पुरूष ही स्त्री के सामने प्यार का इजहार करते हैं। सिर्फ 10 % स्त्री ही पुरूषों के सामने अपने प्यार का इजहार करती है।
  14. मनोविज्ञान के अनुसार प्यार में पड़ना को जैविक प्रक्रिया मानते है। यह प्रक्रिया हर किसी के शरीर में उत्पन्न तो होती है, पर उसे कुछ ही लोग अच्छे से बनाएं नहीं रख पाते हैं।
  15. वैज्ञानिकों के अनुसार, प्यार की वजह से शरीर के हार्मोन में एक तरह की गड़बड़ी हो जाती है। जैसे कुछ हार्मोन का घट जाना या बढ़ जाना।
  16. जिससे आप प्यार करते हैं उससे आप ज्यादा समय तक बात किए बिना नहीं रह सकते।
  17. हेल्थ एण्ड ह्यूमन सर्विसेज की एक रिर्पोट के अनुसार, प्यार में पड़ने पर स्त्री और पुरूष के शरीर और दिमाग पर काफी अच्छा प्रभाव पड़ता है। जिससे उनकी उम्र कुछ साल बढ़ जाती है।
  18. प्यार पर किए गए एक शोध के अनुसार, प्यार में पड़े इंसान का दिमाग नशा करने वाले इंसान की तरह काम करने लगता है। इससे उसे परमसुख की अनुभूति होती है।
  19. किसी के प्यार में पड़ जाने को मनोवैज्ञानिक मनोरोग कहते हैं। इस रोमांटिक रिलेशनशीप को ओब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर कहा जाता है।
  20. एक लंबे शोध में पता चला है कि नंवबर माह में सबसे ज्यादा पुरूष अपनी पसंद की स्त्री से आई लव यू कहते हैं।
  21. वैज्ञानिकों के अनुसार, किसी को किसी से प्यार उसके रंग, रूप या बाॅडी स्ट्रेक्चर देख कर नहीं बल्कि दिल की वजह से होता है। इसलिए कहा जाता है प्यार दिमाग से नहीं दिल से होता है।
  22. जब कोई प्यार में पड़ जाता है। उसका दिमाग काफी अच्छी तरह काम करता है। उसे दुनियादारी की काफी समझ आ जाती है। वह अधिक सोशल बन जाता है, लोगों की मदद करने लगता है। हर बूरे काम से तौबा कर लेता है।
  23. प्यार करने पर दिमाग में रोमांटिक मूड पैदा होता है। जिससे व्यक्ति को शान्त, खुशमिजाज और एनर्जेटिक बन जाते है।
  24. यह जानकर आपको हैरानी होगी कि सिर्फ इंसान ही नहीं जानवर और पक्षी भी प्यार का इजहार करते हैं। ऐसे कुछ जानवर और पक्षी है जो अपने लिए किसी एक को लाइफटाइम के लिये पार्टनर चुनते हैं। उसके बिछुड़ने पर तड़प-तड़प कर जान देते हैं या उसकी याद में जिंदगी गुजार देते हैं।
  25. जब आप किसी के साथ चलते हैं तो उस वक्त आप नार्मल स्पीड से चलते हैं। जबकि प्रेमी-प्रेमिका जब साथ चलते हैं। धीमी गति से चलते हैं। इसका मतलब कह सकते वे ज्यादा से ज्यादा एक-दूसरे के साथ गुजारना पसंद करते हैं।
  26. लड़के द्वारा किसी लड़की के प्यार में पड़ने पर उसके कम से कम दो दोस्त उससे दूर हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है, इस बारे में वैाानिक स्पष्ट नतीजे पर पहुंच नहीं पाएं है।
  27. एक रिर्पोट के अनुसार, ऑनलाइन प्यार में पड़ने वालों में से 23 प्रतिशत आगे चल कर शादी कर लेते हैं।
  28. एक जानकारी के अनुसार, 18 से 22 वर्ष की उम्र युवा प्यार में अधिक पड़ते हैं। इस उम्र में ब्रेकअप के मामले भी अधिक देखे गए है। 22 से 28 साल वाले काफी सर्तक होकर प्यार की ओर कदम बढ़ाते हैं। 28 के बाद कम ही युवा प्यार के बारे में सोचते हैं। समझा जाता है कि  तब तक उन्हें दुनियादारी की समझ आ जाती है।
  29. वैज्ञानिको का मानना है, सही उम्र में किया गया प्यार उम्र भर रहता है। कच्ची उम्र का प्यार अधिक दिनों तक नहीं चलता। मनोवैज्ञानिक कच्ची उम्र के प्यार को प्यार नहीं आकर्षण यानी अट्रैक्शन मानते हैं।
  30. प्यार और सेक्स को लेकर दिमाग अलग-अलग तरीके से सोचता है। प्यार के बारे में सोचने वाले शान्त होते हैं। जबकि सेक्स की सोचने वाले आक्रामक हो जाते हैं।
  31. अच्छे से सेटल लोगों की बजाएं स्ट्रगल करने वाले जैसे जाॅब की तलाश, कैरियर के स्ट्रगल में लगे, घर से दूर रहने वाले या फिर जिनका कोई सही ठिकाना ना ऐसे लोग जल्दी प्यार में पड़ जाते हैं।psycology-love-facts-
  32. शोध में पता चला है कि कुछ खास कलर जैस रेड, पींक, ग्रीन, यलो ड्रेस प्यार करने के लिए आकर्षित करती है।
  33. प्यार किसी भी इंसान के जीवन में काफी महत्तवपूर्ण होता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में लंबे समय तक किये गए अध्ययन में पता चला है सफल और असफल प्यार इंसान की जिंदगी बना सकता है बिगाड़ भी सकता है।
  34. दो प्यार करने वालों की पसंद और नापसंद एक जैसी होती है। यदि कोई चीज़ पसंद ना भी हो तो भी वे एक दूसरे की पसंद नापसंद को अपना लेते हैं।
  35. वैज्ञानिकों के अनुसार, लड़का जब प्यार करता है वह दिमाग से करता है। लड़की जब प्यार करती है। वह दिल से करती है। इसलिए वह अपने प्यार के लिए सबकुछ छोड़ने के लिए तैयार हो जाती है।
  36. प्यार में ब्रेकअप होने के बाद लड़के या लड़की दोनों को आहत पहुंता है। लड़की बहुत ही जल्द इससे निकल जाती है। जबकि लड़के इससे जल्दी निकल नहीं पाते हैं।
  37. प्यार हंमेशा सुखद हो ऐसा नहीं है यह हंसाता भी है रूलाता भी है। प्यार मिल गया तो सुखद नहीं तो दुखद। प्यार यदि किसी को क्रिएटिव बना सकता है तो क्रिमनल भी बना सकता है।
  38. जिंदगी को रोमांच बनाने के लिए लव की अपनी कुछ अलग ही अहमियत हैं। अगर किसी की जिंदगी में लव नहीं है, तो वो अवसाद और अकेलेपन का शिकार हो सकता हैं।
  39. लड़की अपने पहले प्यार को भूल नहीं पाती। जबकि लड़के किसी दूसरी लड़की के प्यार में पड़ जाने के बाद इसे भूल जाते हैं।
  40. ज्यादा बोलने वाली लड़कियां और कम बोलने वाले लड़कों में बहुत गहरा प्रेम होता है और इन दोनों लोगों का जोड़ा प्रेमियों में सबसे मजेदार होता है।

क्यों खरीदा जाता है धनतेरस पर झाड़ू, जानिए क्या है महत्व

कार्तिक माह (पूर्णिमान्त) की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र-मंन्थन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।

धनतेरस पर कुछ न कुछ वस्तु खरीदने की परम्परा है। मसलन बर्तन, सोना, चांदी, भूमि-मकान और वाहन। लेकिन इन सबके अलावा एक विशेष वस्तु है झाडू। जो कि धनतेरस के दिन खरीदना आवश्यक माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों किया जाता है? चलिए इस पोस्ट के माध्यम से जानते हैं :-

पौराणिक मान्यताएं

पौराणिक मान्यता के अनुसार धनतेरस के दिन जिन चीजों की खरीदारी की जाती है। इस दिन झाड़ू खरीदने की भी परंपरा है जिसे बहुत ही शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन घर में एक नई झाड़ू जरूर खरीदना चाहिए।

मत्स्य पुराण के अनुसार झाड़ू को मां लक्ष्मी का रूप माना जाता है। घर में झाड़ू के पैर लग जाए तो इसे भी अशुभ माानते हैं। इसलिए घर में झाड़ू से घर साफ करने के बाद ऐसी जगह रखा जाता है जहां पैर नहीं लगे। क्योंकि झाड़ू का मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है।

मान्यताओं के मुताबिक झाड़ू को सुख-शांति बढ़ाने और दुष्ट शक्तियों का सर्वनाश करने वाला भी बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि झाड़ू घर से दरिद्रता हटाती है। ऐसा भी माना जाता है कि धनतेरस पर घर में नई झाड़ू से झाड़ लगाने से कर्ज से भी मुक्ति मिलती है इसलिए इस दिन झाड़ू खरीदने की पुरानी परंपरा  है।

शास्त्रों के अनुसार धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने से लक्ष्मी माता रुठकर घर से बाहर नहीं जाती हैं और वह घर में स्थिर रहती है। इस दिन लोग झाड़ू खरीदकर अपने घरों में रखते हैं। झाड़ू से घर में सकारात्मकता का संचार होता है। यही वजह है कि हर घर में सफाई के तौर पर सबसे पहले झाड़ू लगाया जाता है।

दिवाली पर यह 5 उपाय करने से होगी धन की तंगी दूर !!!

दिवाली के 5 दिन धन के संकट को दूर करने के लिए सबसे शुभ माने गए हैं। शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति यदि अपने मूल कर्ज से निवृत्ति का उपाय नहीं करता है, तो उसे इस जीवन में अर्थ, उपकार, दया के रूप में किसी भी तरह का उधार लेना ही पड़ता है। इस उधार को उतारने के पश्चात ही मनुष्य लक्ष्मी को प्राप्त कर सकता है।

यह है वो उपाय जिससे धन की तंगी को दूर कर सकते है

  • दिवाली से पहले धन तेरस का त्यौहार आता है , इस दिन 13 दीपक जलाएं और हर दीपक में एक कौड़ी डाल दें। दीपक पूर्ण हो जाए तब ये 13 कौड़ी लेकर साफ करें और तिजोरी में रख दें।
  • नरक चतुर्दशी (रूप चतुर्दशी) के दिन पवित्रता से पांच प्रकार के फूल की माला में दूर्वा व बिल्वपत्र लगाकर देवी को अर्पित करें। अर्पित करते समय मौन रखें। यह प्रयोग प्रभावकारी होता है। ऐसा करने से यश में वृद्धि होती है।
  • दीपावली की रात्रि में ग्यारह बजे के बाद एकाग्रता से बैठकर आँखे बंद करके ध्यान करें l ध्यान करते समय ऐसा सोचें, जैसे की सामने महालक्ष्मी कमलासन पर विराजमान हो और आप उनके ऊपर कमल के फूल चढ़ा रहे हैं। ध्यान करते समय मन ही मन में कुल 108 मानसिक कमल पुष्प अर्पित करें। ऐसा करने से लक्ष्मी की कृपा होती है। साथ ही विष्णु सहस्रनाम या गोपाल सहस्रनाम का पाठ करें तो अति उत्तम है।
  • अन्नकूट के दिन भोजन बनाकर अपने कुल के देवता के मंदिर में, अपने पित्तरों को, गाय को, ऋषियों के निमित्त ब्राह्मण को, अपने कुल के पक्षी और किसी भिखारी को भोजन करवाए। साथ ही वृक्ष को जल चढ़ाए, सूर्य को जल चढ़ाए, अग्नि में घी अर्पित करें, चींटियों को आटा तथा मछली को आटे की गोली देने से घर में धन की कमी दूर होती है, और बरकत आती है।
  • भाईदूज के दिन सुबह शुद्ध पवित्र होकर पवित्र रेशमी धागा गुरु व ईष्ट देव को याद करके धूप दीप के बाद उनके दाहिने हाथ में यह डोरा बांधें। डोरा बांधते समय ईश्वर का स्मरण करते रहें। यह प्रयोग वर्षपर्यंत सुरक्षा देता है।

साल भर धन की कमी नहीं होगी, धनतेरस पर जरूर खरीदे ये 5 चीजें !!

धनतेरस पर मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए भक्तजन तमाम तरह के प्रयास करते हैं। लेकिन ज्योतिषशास्त्र की मानें तो यहां बताए गये कुछ आसान से टिप्स से ही मां लक्ष्मी आपके ऊपर प्रसन्न हो सकती हैं।

जी हां इसके लिए आपको कुछ विशेष करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि कुछ विशेष करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि कुछ 5 चीजें हैं, जिन्हें आपको धनतेरस के दिन खरीदना होगा। बस फिर देखिए कैसे मां लक्ष्मी की कृपा से आपके जीवन में धन वर्षा होने लगेगी…..

  • धनतेरस के दिन कुमकुम जरूर खरीद लाएं। इसके बाद उसे मां लक्ष्मी के चरणों में अर्पित करके खुद भी लगा लें। मान्यता है कि ऐसा करने से माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न होती हैं और जीवन को धन-धान्य से भर देती हैं।
  • धनतेरस के दिन मां लक्ष्मी के पचिह्न जरूर खरीद लाएं। इसे घर के मुख्य द्वार पर लगाएं। मान्यता है कि मां लक्ष्मी के पदचिह्न लगाने से माता लक्ष्मी अत्यंत प्रसन्न होती हैं क्योंकि यह उन्हें घर में आमंत्रित करने का निमंत्रण होता है। लेकिन ध्यान रखें कि मां लक्ष्मी के पचिह्न की आरती जरूर कर लें। इसके साथ ही मां से घर में वास करने की प्रार्थना करें।
  • धनतेरस के दिन से दीप जलाने की परंपरा शुरू हो जाती है। इसलिए इस दिन पांच रुपए का एक दीपक खरीद लाएं और रात्रि का भोजन करने के बाद उसे दक्षिण की ओर मुख करके जलाएं। लेकिन ध्यान रखें कि इसे जलाने के बाद इसे पीछे मुड़ कर नहीं देखें। मान्यता है कि यह दीपक अकाल मृत्यु से बचाकर घर के लोगों को निरोगी रखता है।
  • धनतेरस के दिन साबुत धनिया जरूर खरीद लाएं इसके बाद इसे मां लक्ष्मी और भगवान धनवंतरी के चरणों में अर्पित कर दें। इसके बाद लक्ष्मी माता और भगवान धनवंतरी के सामने घी का दीपक जलाकर आरती कर लें। फिर माता के चरणों में धनिया अर्पित कर दें और आरती के बाद धनिया को प्रसाद स्वरूप घर के सभी सदस्यों को बांट दें।
  • धनतेरस के दिन धनिया, दीपक, पचिह्न और कुमकुम की ही तरह बताशा खरीदना भी अत्यंत जरूरी होता है। मान्यता है कि यह माता लक्ष्मी का प्रिय भोग है। लेकिन ध्यान रखें कि रंगीन बताशा न लें बल्कि सफेद बताशा ही खरीदें। इसके बाद इसे माता लक्ष्मी को अर्पित कर दें। इसके साथ ही माता से प्रार्थना करें कि उनकी कृपा जीवन भर बनी रहे।

धनतेरस पर क्यों खरीदे जाते हैं बर्तन? जानिए इससे जुड़ी मान्यताएं!

दीपों के पर्व दीपावली में कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। दिवाली की शुरुआत धनतेरस से मानी जाती है। धनतेरस से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। धनतेरस पर लोग खरीदारी करते हैं। इस दिन लोग सोना, चांदी और विशेष रूप से बर्तन खरीदते हैं।

कहा जाता है कि धनतेरस के दिन आप जो कुछ भी खरीदते हैं वह तेरह गुना बढ़ जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इन सभी देवी-देवताओं की विधि-विधान से पूजा करने से घर धन-धान्य से भरा रहता है और भगवान धन्वंतरि की कृपा से सद्गुणों की प्राप्ति होती है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि धनतेरस के दिन बर्तन खरीदना इतना जरूरी क्यों है?

इसलिए खरीदें बर्तन जाते हैं बर्तन

पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं और राक्षसों ने अमृत कलश के लिए समुद्र मंथन किया था। फिर इस मंथन के दौरान एक-एक करके 14 रत्न प्राप्त हुए। मां लक्ष्मी जी को भी उन 14 रत्नों में से एक माना जाता है।

लक्ष्मी जी की तरह भगवान धन्वंतरि भी समुद्र मंथन के दौरान पैदा हुए थे। जब भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए तो उनके हाथ में अमृत का पात्र था। ऐसा माना जाता है कि इसी वजह से धनतेरस के दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है।

भगवान धन्वंतरि के जन्म के समय उनके हाथ में पीतल का कलश था, इसलिए इस दिन पीतल के बर्तन खरीदने का महत्व है।

धनतेरस के दिन लोग बर्तनों के साथ-साथ सोना-चांदी आदि भी खरीदते हैं। इस दिन किसी भी चीज की खरीदारी करना शुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार यदि आप धनतेरस के दिन कोई खरीदारी करते हैं तो वह 13 गुना अधिक बढ़ जाती है। इसलिए लोग बर्तन, चांदी और सोना खरीदते हैं।

इस दिन लोग चांदी के लक्ष्मी-गणेश, चांदी के सिक्के आदि भी घर लाते हैं, जिससे घर में आशीर्वाद बना रहता है और साथ ही साथ लक्ष्मी जी की कृपा भी बनी रहती है।

इस दिन आप किसी भी शुभ धातु जैसे तांबे-पीतल या चांदी के बर्तन खरीद सकते हैं। इन बर्तनों को घर में लाने से पहले इनमें कुछ चावल या पानी भर लें। घर में खाली बर्तन लाना भी अशुभ होने का संकेत है।

छोटी दिवाली क्यों मनाई जाती है? जानें क्या है इसके पीछे का रहस्य

छोटी दिवाली को रूप चौदस या नरक चतुर्दशी के रूप में भी जाना जाता है जो पूरे भारत में दिवाली से एक दिन पहले मनाई जाती है। लोग इसे मुख्य दिन की प्रतीक्षा के संकेत के रूप में अपने घरों में रोशनी करके और पटाखे फोड़कर मनाते हैं।

रोशनी का त्यौहार पांच दिनों के लिए मनाया जाता है जो धनतेरस से शुरू होता है, फिर नरक चतुर्दशी, मुख्य दिन दिवाली, फिर गोवर्धन पूजा, और भाई दूज के साथ समाप्त होता है।

यह पांच दिवसीय त्यौहार पूरे भारत में उत्साह से देवी लक्ष्मी की पूजा करके, रंगोली बनाकर, दिवाली के दीया से घर को सजाकर, दिवाली की मिठाई तैयार करके और भी बहुत कुछ किया जाता है। हम दिवाली उपहारों का आदान-प्रदान भी करते हैं।

जगह और प्रार्थना स्थान को रोशन करने के लिए आपको दिवाली मोमबत्तियों की एक बड़ी श्रृंखला भी मिलेगी। दिवाली एक शुभ त्योहार है क्योंकि यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है लेकिन, यदि आप जानते हैं, तो नरक चतुर्दशी भी हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण दिन है।

ज्यादातर समय, हम नहीं जानते कि हम इन दिनों को क्यों मनाते हैं और इसलिए, आज हमने आपको इस ब्लॉग को क्यूरेट किया है कि छोटी दिवाली क्यों मनाई जाती है।

छोटी दिवाली 2023 की तिथि 

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि शुरू – 11 नवंबर 2023, दोपहर 01.57

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि समाप्त – 12 नवंबर 2023, दोपहर 02.44

पौराणिक मान्यताएं

छोटी दिवाली को क्यों कहते हैं नरक चतुर्दशी?

पौराणिक कथाओं की मानें तो इतिहास में तीन घटनाएं घटी हैं और इसलिए नरक चतुर्दशी लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। किंवदंतियों के अनुसार, राक्षस राजा नरकासुर ने भगवान कृष्ण और अन्य देवताओं को हराया था।

उसने अन्य देवताओं की 16,000 कन्याओं को वश में कर लिया और देवी अदिति की बालियां छीन लीं। नरक चतुर्दशी से एक दिन पहले, भगवान कृष्ण ने नरकासुर को हराया, महिलाओं को मुक्त किया, और देवी अदिति के बालियां भी लाए।

यम का दीपक जलाएं

छोटी दिवाली के दिन यम के नाम का दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का खतरा पूरी तरह टल जाता है। इसके अलावा नरक में मिलने वाली यातनाओं से भी छुटकारा मिलता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि जो भी मनुष्य धरती पर अत्याधिक पाप करता है उसे उसकी सजा मृत्युलोक में भुगतना पड़ता है। इतना ही नहीं उसे तमाम तरह की यातनाओं से भी गुजरना पड़ता है।

यह भी पढ़ें :-

जानिए धनतेरस के बारे में कुछ खास बातें और क्या खरीदने से आएगी घर में खुशहाली !!!

दिवाली लक्ष्मी जी के पूजन का त्यौहार है। इस दिन धन-संपदा और शांति के लिए लक्ष्मी जी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। दिवाली से दो दिन पहले धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है। धनतेरस के दिन से ही दिवाली की शुरुआत हो जाती है।

समुद्र मंथन के दौरान धनतेरस के दिन भगवान धनवंतरी अपने साथ अमृत का कलश और आयुर्वेद लेकर प्रकट हुए थे। इसी वजह से भगवान धनवतंरी को औषधि का जनक भी कहा जाता है।

धनतेरस के दिन धन के देवता भगवान कुबेर की भी पूजा की जाती है। भगवान कुबेर को लक्ष्मी जी का खजांची कहा जाता है। धनतेरस वाले दिन खरीदारी करना बहुत शुभ माना जाता है।

दिवाली की खरीदारी भी इसी दिन की जाती है। माना जाता है, कि धनतेरस के दिन जिस वस्तु की खरीदारी की जाएगी उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है। वैसे तो सभी अपनी इच्छा अनुसार खरीदारी करते है परन्तु इस दिन कुछ विशेष चीजों की खरीदारी करनी चाहिए।

अब ऐसे में लोगों के मन में अक्सर ये सवाल आता है कि आखिर किस सामान की खरीदारी की जाए। तो आज हम आपको कुछ धनतेरस के दिन खरीदारी करने वाले वस्तुओं के बारे में बताने जा रहे हैं…

बर्तन की खरीदारी

धनतेरस के दिन बर्तन की खरीदारी करना शुभ माना जाता है। बर्तन की खरीदते समय पीतल धातु से बना बर्तन जरुर खरीदना चाहिए। बर्तन खरीदने के पीछे मान्यता है कि जब भगवान धनवंतरि प्रकट हुए तो वह एक पात्र में अमृत लेकर आए थे। इसलिए धनतेरस के दिन बर्तन की खरीदारी को शुभ माना जाता है।

dhanteras 2023

चांदी की खरीदारी

धनतेरस के दिन चांदी धातु की खरीदारी करना शुभ माना जाता है। इस दिन चांदी के सिक्के या बर्तन खरीदने चाहिए। चांदी चंद्रमा की धातु है। धनतेरस के दिन चांदी की खरीदारी करने से घर में यश, कीर्ति, ऐश्वर्य और संपदा में वृद्धि होती है।

कौड़ियां

समुद्र मंथन के दौरान जब लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं, तो उनके साथ कौड़ी भी आई थी। कमल के फूल की तरह ही कौड़ी भी लक्ष्मी जी को बहुत प्रिय है। धनतेरस के दिन आप कौड़ीयां खरीदकर दिवाली के दिन इनकी पूजा कर अपनी तिजोरी में रखें। मान्यता है कि तिजोरी में कौड़ियां रखने से धन की हानि नहीं होती है।

धनिया की खरीदारी

धनतेरस के दिन धनिया की खरीदारी करना भी शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन धनिए के बीज खरीदकर दिवाली वाले दिन उसे उगाएं। माना जाता है कि ऐसा करने से भी धन का नुकसान नहीं होता है।

दिवाली पूजन समाग्री

धनतेरस के दिन से ही दिवाली की शुरुआत हो जाती है। इसलिए दिवाली से संबंधित खरीदारी भी इसी दिन की जाती है। लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, खील-बताशे और मिट्टी के दिए धनतेरस के दिन ही खरीदने चाहिए।

धनतेरस के बारे में कुछ खास बातें

1 धनतेरस, धनवंतरी त्रयोदशी या धन त्रयोदशी दीपावली से पूर्व मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण त्यौहार है। इस दिन आरोग्य के देवता धनवंतरी, मृत्यु के अधिपति यम, वास्तविक धन संपदा की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी तथा वैभव के स्वामी कुबेर की पूजा की जाती है।

2  इस त्यौहार को मनाए जाने के पीछे मान्यता है कि लक्ष्मी के आह्वान के पहले आरोग्य की प्राप्ति और यम को प्रसन्न करने के लिए कर्मों का शुद्धिकरण अत्यंत आवश्यक है। कुबेर भी आसुरी प्रवृत्तियों का हरण करने वाले देव हैं।

3  धनवंतरी और मां लक्ष्मी का अवतरण समुद्र मंथन से हुआ था। दोनों ही कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसके साथ ही मां लक्ष्मी का वाहन ऐरावत हाथी भी समुद्र मंथन द्वारा प्रकट हुआ था।

4  श्री सूक्त में लक्ष्मी के स्वरूपों का विवरण कुछ इस प्रकार मिलता है। ‘धनमग्नि, धनम वायु, धनम सूर्यो धनम वसु:’ अर्थात् प्रकृति ही लक्ष्मी है और प्रकृति की रक्षा करके मनुष्य स्वयं के लिए ही नहीं, अपितु नि:स्वार्थ होकर पूरे समाज के लिए लक्ष्मी का सृजन कर सकता है।

5  श्री सूक्त में आगे यह भी लिखा गया है- ‘न क्रोधो न मात्सर्यम न लोभो ना अशुभा मति:’ इसका अर्थ यह है  कि जहां क्रोध और किसी के प्रति द्वेष की भावना होगी, वहां मन की शुभता में कमी आएगी, जिससे वास्तविक लक्ष्मी की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होगी। यानी किसी भी प्रकार की मानसिक विकृतियां लक्ष्मी की प्राप्ति में रुकावट हो सकती हैं।

6  आचार्य धनवंतरी के बताए गए मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी उपाय अपनाना ही धनतेरस का प्रयोजन है। श्री सूक्त में वर्णन है कि, लक्ष्मी जी भय और शोक से मुक्ति दिलाती हैं तथा धन-धान्य और अन्य सुविधाओं से युक्त करके मनुष्य को निरोगी शरीर और लंबी आयु देती हैं।

जाने धनतेरस की पूजा का शुभ मुहूर्त और महत्त्व !!

कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाया जाता है। यह छोटी दिवाली से एक दिन पहले आता है इस साल धनतेरस का पर्व 10 नवंबर, 2023 शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा ।

कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र-मंन्थन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है।

इस दिन भगवान धनवंतरि की पूजा की जाती है और इस दिन सोना, चांदी के आभूषण और बर्तन आदि चीजें खरीदना शुभ माना जाता है।

 धनतेरस पर पूजा का शुभ मुहूर्त

  • धनतेरस पूजा मुहूर्त – शाम 06:20 से रात 08:20 तक
  • त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 10, 2023 दोपहर 12:35 बजे
  • त्रयोदशी तिथि समाप्त – नवम्बर 11, 2023 दोपहर 01:57 बजे

धनतेरस का महत्व

दिवाली से पहले धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन लोग सोने-चांदी और बर्तनों की खरीदारी करते हैं। कार्तिेक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन के दौरान हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।

तभी से इस दिन बर्तन खरीदने का बहुत अधिक महत्व है। इस दिन विशेषकर पीतल और चांदी से बने बर्तन खरीदना बहुत शुभ माना जाता है।

पीतल को भगवान धन्वंतरि जी की धातु माना जाता है। पीतल व्यक्ति को आरोग्य, सौभाग्य और स्वास्थ्य संबंधी लाभ प्रदान करती है। इस दिन धन के देवता कुबेर का भी पूजन किया जाता है।

चांदी खरीदना माना जाता है शुभ

धनतेरस‘ के दिन लोग घरेलू बर्तन खरीदते हैं, वैसे इस दिन चांदी खरीदना शुभ माना जाता है क्योंकि चांदी चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है,और चन्द्रमा शीतलता का मानक है, इसलिए चांदी खरीदने से मन में संतोष रूपी धन का वास होता है क्योंकि जिसके पास संतोष है वो ही सही मायने में स्वस्थ, सुखी और धनवान है।

वाल्मीकि जयंती : जानिए आदिकवि महर्षि वाल्मीकि से जुड़ी रोचक बातें

महर्षि वाल्मीकि को प्राचीन वैदिक काल के महान ऋषियों की श्रेणी में प्रमुख स्थान प्राप्त है। पुराणों के अनुसार, उन्होंने कठोर तपस्या कर महर्षि का पद प्राप्त किया था। परमपिता ब्रह्मा के कहने पर उन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित “रामायण” नामक महाकाव्य लिखा। इन्हें “आदिकवि” भी कहा गया है।

इनके द्वारा रचित आदिकाव्य “रामायण” संसार का सर्वप्रथम काव्य माना गया है। महर्षि वाल्मीकि की जंयती पर आइए जानते है उनके जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें।

आदि काव्य रामायण के रचयिता और संस्कृत भाषा के परम ज्ञानी महर्षि वाल्मीकि की जंयती को देश भर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। महर्षि वाल्मीकि जयंती अश्विन मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है, इस बार वाल्मीकि की जयंती 28 अक्तूबर को है।

महर्षि वाल्मीकि के द्वारा संस्कृत भाषा लिखी गई रामायण को सबसे प्राचीन माना जाता है। रामायण महाकाव्य लगभग 21 भाषाओं में उपलब्ध है। संस्कृत के प्रथम महाकाव्य की रचना करने के कारण इन्हें “आदिकवि” भी कहा जाता है। महर्षि वाल्मीकि की लिखी गई रामायण पूरे विश्व में विख्यात है।

महर्षि वाल्मीकि का जीवन चरित्र

एक पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि बनने से पहले वाल्मीकि रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे तथा परिवार के पालन हेतु वह लोगों को लूटा करते थे।

एक बार उन्हें “निर्जन वन” में नारद मुनि मिले, तो रत्नाकर ने उन्हें लूटने का प्रयास किया। तब नारद जी ने रत्नाकर से पूछा कि- तुम यह कार्य क्यों करते हो, इस पर रत्नाकर ने उत्तर दिया और बोले कि अपने परिवार को पालने के लिए।

इस पर नारद जी ने प्रश्न किया कि तुम जो भी कार्य करते हो और जिस परिवार को पालन के लिए तुम इतने अपराध करते हो, क्या वह तुम्हारे पापों का भागीदार बनने को तैयार होंगे।

इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए रत्नाकर, नारद को पेड़ से बांधकर अपने घर गए। वहां जाकर वह यह जानकर हैरान रह गए कि परिवार का कोई भी व्यक्ति उसके इस पाप का भागीदार बनने को तैयार नहीं है। लौटकर उन्होंने नारद के चरण पकड़ लिए।

तब नारद मुनि ने कहा कि- हे रत्नाकर, यदि तुम्हारे परिवार वाले इस कार्य में तुम्हारे भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों उनके लिए यह पाप करते हो। इस तरह नारद जी ने इन्हें सत्य के ज्ञान से परिचित करवाया।

नारद मुनि से मिलकर और अपने परिवार वालों की बातें सुनकर रत्नाकर की आंखें खुल गईं थीं उन्होंने अन्याय और पाप की दुनिया तो छोड़ दी, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि आगे क्या करना चाहिए।

ऐसे में उन्होंने नारद से ही पूछा कि वह क्या करे। तब नारद ने उसे ‘राम’ नाम का जाप  करने की सलाह दी। परंतु वह ‘राम’ नाम का उच्चारण नहीं कर पाते थे।

तब नारद जी ने विचार करके उनसे मरा-मरा जपने के लिए कहा और मरा रटते-रटते यही ‘राम’ हो गया और निरंतर जप करते-करते हुए वह ऋषि वाल्मीकि बन गए।

कहते हैं कि रत्नाकर ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिस वजह से उसके शरीर पर चीटियों ने बाम्भी बना दी।  इस वजह से उनका नाम वाल्मीकि पड़ा।

वाल्मीकि को कैसे मिली रामायण लिखने की प्रेरणा

रामायण के अनुसार, एक बार महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर गए। वाल्मीकि क्रौंच पक्षी के एक जोड़े को निहार रहे थे। वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि एक शिकारी ने प्रेम-मग्न क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी को मार दिया।

इस पर मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके विलाप को सुनकर वाल्मीकि की करुणा जाग उठी और उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ा।

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकं वधीः काममोहितम्॥

इसका अर्थ यह है कि, “हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी शांति न मिले और तुझे भी वियोग झेलना पड़े”। जब महर्षि वाल्मीकि अपने आश्रम पहुंचे तब भी उनका ध्यान उस श्लोक की ओर ही था।

तभी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में भगवान ब्रह्मा आए और उनसे कहा कि- आपके मुख से निकला यह छंदोबद्ध वाक्य (गाया जाने वाला) श्लोक रूप ही होगा। मेरी प्रेरणा से ही आपके मुख से ऐसी वाणी निकली है। अत: आप श्लोक रूप में ही श्रीराम के संपूर्ण चरित्र का वर्णन करें।

इस प्रकार ब्रह्माजी के कहने पर महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य की रचना की और “आदिकवि वाल्मीकि” के नाम से अमर हो गये। रामायण में भगवान वाल्मीकि द्वारा 24,000 श्लोक लिखे गए हैं।

अपने महाकाव्य “रामायण” में उन्होंने अनेक घटनाओं के समय सूर्य, चंद्र तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के भी प्रकाण्ड ज्ञाता थे।