दुनिया के सबसे खतरनाक कुत्तों में से एक है बॉक्सर नस्ल के कुत्ते

बॉक्सर जर्मनी में विकसित एक मध्यम आकार, छोटी बालों वाली नस्ल का कुत्ता है। बॉक्सर नस्ल को आमतौर पर  निगरानी, एथलेटिक और बहुत सारे खेलों के लिए जाना जाता है। बॉक्सर प्रजाति को शिकारी कुत्तो का वंशज भी कहा जाता है।

ये अपने मजबूत जबड़े से किसी को भी अपना शिकार बना सकते हैं। इनकी पहचान अड़ियल कुत्तों के रूप में भी की जाती है। बॉक्सर अंग्रेजी बुलडॉग और अब विलुप्त हो चुके बुलेनबीसर (Bullenbeisser) के संकरण से बनाई गयी नस्ल है और मोलोसर (Molosser), मासटिफ समूह (mastiff group) का हिस्सा है।

बॉक्सर को सबसे पहले 1895 में मुनिच में सेंट बर्नार्ड के लिए किये गए एक डॉग शो में प्रदर्शन के लिए लाया गया था, जो पहला बॉक्सर क्लब था।

यह नाम “बॉक्सर” इस नस्ल की प्रवृतियों से ही व्युत्पन्न हुआ है, क्योंकि ये कुत्ते अपनी पिछले टांगों पर खड़े हो जाते हैं और अपने सामने वाले पंजों से “बॉक्सिंग” कर सकते हैं।

इस पोस्ट में हम आज बॉक्सर नस्ल के कुत्ते के बारे में जानेंगे :

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रंग, आकार और स्वभाव

इनके सिर का आकार वर्गाकार होता है, चौड़ी और गहरी छाती होती है। कान मुड़े हुए होते हैं, इनके पंजे धनुषाकार और छोटी खाल होती है।

ये अधिकतर हलके पीले (Fawn) या चितकबरे रंग के होते हैं, अक्सर इनके पेट का नीचला हिस्सा, सामने वाला हिस्सा और सभी चारों पैर सफ़ेद होते हैं। ये सफ़ेद निशान जिन्हें फ्लैश कहा जाता है अक्सर गर्दन या चेहरे तक फैले होते हैं और जिन कुत्तों में ये निशान होते हैं, वे “फ्लैशी” कहलाते हैं।

बॉक्सर चंचल, उत्साही, जिज्ञासु, चौकस, प्रदर्शनकारी, समर्पित और मिलनसार होते हैं। यह कुत्ता एक सक्रिय परिवार के लिए एक आदर्श साथी है। बॉक्सर जिद्दी हो सकते हैं, लेकिन अपने मालिक के आदेशों के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायी होते हैं। वे दूसरे कुत्तों के प्रति आक्रामक होते हैं, लेकिन आम तौर पर अन्य पारिवारिक कुत्तों और पालतू जानवरों के साथ अच्छे होते हैं।

नर बॉक्सर का औसतन कद 2 फीट और मादा का औसतन कद 1 फुट 80 इंच होता है। इस नस्ल के नर का औसतन भार 30-35 किलो और मादा का औसतन भार 22-30 किलो होता है। इस नस्ल का औसतन जीवन काल 8-10 वर्ष होता है।

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भोजन

भोजन की मात्रा और किस्म, कुत्ते की उम्र और उसकी नस्ल पर निर्भर करती है। छोटी नस्लों को बड़ी नस्ल के मुकाबले भोजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है। भोजन उचित मात्रा में दिया जाना चाहिए नहीं तो कुत्ते सुस्त और मोटे हो जाते हैं।

संतुलित आहार जिसमें कार्बोहाइड्रेट्स, फैट, प्रोटीन, विटामिन और ट्रेस तत्व शामिल हैं, पालतू जानवरों को स्वस्थ और अच्छे आकार में रखने के लिए आवश्यक होते हैं। कुत्ते को 6 आवश्यक तत्व जैसे फैट, खनिज, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट्स, पानी और प्रोटीन की आवश्यकता होती है।

इसके साथ ही इन्हें सारा समय साफ पानी की आवश्यकता होती है। पिल्ले को 29 प्रतिशत प्रोटीन और प्रौढ़ कुत्ते को आहार में 18 प्रतिशत प्रोटीन की जरूरत होती है। हम उन्हें ये सारे आवश्यक तत्व उच्च गुणवत्ता वाले सूखा भोजन देकर दे सकते हैं।

स्वास्थ्य

प्रमुख स्वास्थ्य मुद्दे जो अक्सर बॉक्सर्स में देखे जाते हैं, उनमें शामिल हैं, कैंसर, ह्रदय रोग जैसे एओर्टिक स्टेनोसिस और एरिथ्मोजेनिक राईट वेंट्रिकुलर कार्डियोमायोपेथी, (तथाकथित “बॉक्सर कार्डियोमायोपेथी”) हाइपोथायरोइड, हिप डिसप्लाजिया और अपक्षयी माइलोपेथी और एपिलेप्सी; अन्य स्थितियां जो देखी जा सकती हैं, आमाशय का फैलाव और फूलना (ब्लोट), आन्त्रिय समस्याएं और एलर्जी।

ब्रिटेन के एक केनल क्लब स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, 38.5% बॉक्सर्स की मृत्यु कैंसर के कारण होती है, इसके बाद बड़ी उम्र के कारण (21.5%), ह्रदय रोगों के कारण (6.9%) और जठरांत्र सम्बंधित मुद्दों के कारण (6.9%) होती हैं।

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नस्ल की देख रेख

पिल्ले का चयन करते समय सावधानियां – पिल्ले का चयन आपकी जरूरत, उद्देश्य, उसके बालों की खाल, लिंग और आकार के अनुसार किया जाना चाहिए। पिल्ला वह खरीदें जो 8-12 सप्ताह का हो।

पिल्ला खरीदते समय उसकी आंखे, मसूड़े, पूंछ और मुंह की जांच करें। आंखे साफ और गहरी होनी चाहिए, मसूड़े गुलाबी होने चाहिए और पूंछ तोड़ी हुई नहीं होनी चाहिए और दस्त के कोई संकेत नहीं होने चाहिए।

आश्रय – कुत्ते को रहने के लिए अच्छी तरह से हवादार, साफ और सुरक्षित वातावरण प्रदान करें। आश्रय अत्याधिक बारिश और हवा और आंधी से सुरक्षित होना चाहिए। सर्दियों में कुत्तों को ठंड के मौसम से बचाने के लिए कंबल दें और गर्मियों में छाया और ठंडे स्थानों की आवश्यकता होती है।

पानी – कुत्ते के लिए 24 घंटे साफ पानी उपलब्ध होना चाहिए। पानी को साफ रखने के लिए प्रयोग किए जाने वाले बर्तन को आवश्यकतानुसार दिन में कम से कम दो बार या इससे अधिक समय में साफ करना चाहिए।

बालों की देख रेख – सप्ताह में दो बार बालों की देख रेख की जानी चाहिए। कंघी करने से अच्छा है प्रतिदिन ब्रशिंग करें। छोटे बालों वाली नस्ल के लिए सिर्फ ब्रशिंग की ही आवश्यकता होती है और लंबे बालों वाली नस्ल के लिए ब्रशिंग के बाद कंघी करनी चाहिए।

नहलाना – कुत्तों को 10-15 दिनों में एक बार नहलाना चाहिए। नहलाने के लिए औषधीय शैंपू की सिफारिश की जाती है।

ब्यांत समय में मादा की देखभाल – स्वस्थ पिल्लों के लिए गाभिन मादा की उचित देखभाल आवश्यक है। ब्यांत के समय या पहले उचित अंतराल पर टीकाकरण अवश्य देना चाहिए। ब्यांत का समय लगभग 55-72 दिन का होता है। उचित आहार, अच्छा वातावरण, व्यायाम और उचित जांच ब्यांत के समय के दौरान आवश्यक होती है।

नवजात पिल्लों की देखभाल – पिल्लों के जीवन के कुछ हफ्तों के लिए उनकी प्राथमिक गतिविधियों में अच्छे वातावरण, आहार और अच्छी आदतों का विकास शामिल है। कम से कम 2 महीने के नवजात पिल्ले को मां का दूध प्रदान करें और यदि मां की मृत्यु हो गई हो या किसी भी मामले में पिल्ला अपनी मां से अलग हो जाए तो शुरूआती फीड या पाउडरड दूध पिल्ले को दिया जाता है।

चिकित्सीय देखभाल – इंसानों की तरह, कुत्ते को भी हर 6-12 महीनों के बाद दांतों की जांच के लिए पशु चिकित्सक की आवश्यकता होती है। अपने कुत्ते के दांतों को नर्म ब्रश के साथ ब्रश करें और एक ऐसे पेस्ट का चयन करें जो फ्लोराइड मुक्त हो क्योंकि फ्लोराइड कुत्तों के लिए बहुत ही जहरीला होता है।

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टीकाकरण – पालतू जानवरों को नियमित टीकाकरण और डीवॉर्मिंग की आवश्यकता होती है ताकि उन्हें स्वास्थ्य समस्याएं ना हों।

6 सप्ताह के कुत्ते को canine distemper, canine hepatitis, corona viral enteritis, canine parainfluenza, parvo virus infection, leptospirosis का प्राथमिक टीकाकरण की आवश्यकता होती है और फिर दूसरा टीकाकरण 2-3 सप्ताह से 16 सप्ताह के कुत्ते को दें और फिर वार्षिक टीकाकरण देना चाहिए।

रेबीज़ बीमारी के लिए 3 महीने की उम्र के कुत्ते को पहला टीका लगवाना चाहिए, पहले टीके के 3 महीने बाद दूसरा टीका लगवाएं और फिर वार्षिक टीका लगवाना चाहिए।

हानिकारक परजीवियों से अपने पालतु जानवरों को बचाने के लिए डीवॉर्मिंग अवश्य करवानी चाहिए। 3 महीने और इससे कम उम्र के कुत्ते को प्रत्येक 15 दिनों के बाद डीवॉर्मिंग करवानी चाहिए।

6-12 महीने के बीच के कुत्ते को दो महीने में एक बार डीवॉर्मिंग करवानी चाहिए और फिर 1वर्ष या इससे ज्यादा उम्र के कुत्ते को प्रत्येक 3 सप्ताह बाद डीवॉर्मिंग करवानी चाहिए। डीवॉर्मिंग कुत्ते के भार के अनुसार विभिन्न होती है।

दुनिया की सबसे डरावनी जगहों में से एक है ऑस्ट्रेलिया में स्थित मोंटे क्रिस्टो रियासत

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मोंटे क्रिस्टो एक ऐतिहासिक रियासत है जोकि ऑस्ट्रेलिया में न्यू साउथ वेल्स के जुनी इलाके में स्थित है। क्रिस्टोफर विलियम क्रॉली ने पहली बार 1885 में इसका निर्माण किया था, जहां वह अपनी पत्नी एलिजाबेथ, उनके सात बच्चों और कई नौकरों के साथ रहते थे। क्रॉली (Crawley) एक धनी किसान और ज़मींदार थे। मोंटे क्रिस्टो होमस्टेड क्रॉली का समाज में काफी नाम था।

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इस हवेली को ऑस्ट्रेलिया के सबसे अधिक भुतहा और डरावनी जगहों में शुमार किया गया है। इसकी वजह वर्ष 1885 में इसके निर्माण के बाद से ही यहाँ हुई कई दुखद घटनाएँ हैं।

निर्माण के बाद मोंटे क्रिस्टो का मालिकाना हक क्रॉली परिवार के पास रहा और यह परिवार वर्ष 1948 तक यहाँ रहा। इस दौरान यहाँ कई अनहोनी घटनाएँ घटी, जिनमें से कईयों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था।

मोंटे क्रिस्टो का डरावना इतिहास यहाँ के कर्मचारियों के साथ शुरू हुआ। कहा जाता है कि एक युवा नौकरानी की  बालकनी में गिरकर मौत हो गई थी जिसके बाद यहाँ आधी रात में बालकनी पर कदमों की आवाज़ सुनाई देती है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि यहाँ किसी महिला की आत्मा भी दिखाई देती है।

कहा जाता है कि सामने की सीढ़ी पर अभी भी एक बड़ा सफेद निशान है जहां उन्होंने खून को हटाने के लिए ब्लीच का इस्तेमाल किया था।

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एक अन्य घटना के अनुसार मोंटे क्रिस्टो रियासत में एक लड़का रखवाली करता था, जिसका नाम हेरोल्ड था। कुछ समय के बाद वह पागल हो गया था और कभी-कभी हिंसक भी हो जाता था। इसलिए उसे लगभग 40 वर्षों तक लोहे के चेन से बांधकर घर में बंद रखा गया था।

एक दिन लोगों ने देखा कि वह अपनी मर चुकी माँ के शव के साथ लिपटा पड़ा है। इस घटना के बाद उसे पागलखाने भेज दिया गया, जहां कुछ दिनों बाद ही उसकी मौत हो गई।

अंततः लगातार हो रही अनहोनी और डरावनी घटनाओं से विचलित होकर क्रॉली परिवार ने वर्ष 1948 में उस जगह को छोड़ दिया। इस परिवार के जाने के बाद भी यहां हो रही अस्वाभाविक मौतों का सिलसिला नहीं थमा।

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1948 में क्रॉली के चले जाने के बाद मोंटे क्रिस्टो होमस्टेड काफी समय तक खाली रहा। 1963 में, ओलिव और रेगिनाल्ड रयान ने जर्जर हो चुकी इस जागीर को खरीदा उनके साथ और भी लोग वहां रहने के लिए आये थे।

परन्तु कुछ दिनों के अंदर ही उनमें से एक की वहां हत्या हो गई। इस हत्या के बाद बाकी बचे लोगों ने उस जगह को छोड़ दिया और तब से मोंटे क्रिस्टो वीरान पड़ा हुआ है। हैरानी की बात तो यह है कि इस भूतिया हवेली को देखने के लिए दूर दूर से टूरिस्ट आते हैं।

जीभ के बारे में कुछ रोचक तथ्य

मानव शरीर अनेक अद्भुत और विस्मयकारी अंगों से युक्त है। हमारे शरीर के प्रत्येक अंग की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। इन्हीं महत्वपूर्ण अंगों में से एक है हमारी “जीभ”। जीभ हमें भोजन का स्वाद अनुभव करने में मदद करती है और इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण कार्यों का निर्वाह करती है।

आज इस लेख के माध्यम से हम जीभ के बारे में कुछ तथ्यों को जानेगें, तो चलिए शुरू करते हैं।

जीभ के बारे में रोचक तथ्य

  • जीभ पर टेस्ट बड्स मौजूद होती हैं जो हमें हर तरह के स्वाद के बारे में बताती हैं। इन्हीं के कारण हमें खट्टे, मीठे, नमकीन, कड़वे जैसे स्वादों का पता चल पाता है।
  • खाना खाने के बाद दांतों में अन्न का कुछ हिस्सा फंसा रह जाता है जिसे निकालने का काम जीभ बहुत ही आसानी से कर देती है और ऐसा करने से दांत भी साफ हो जाते हैं और मुँह की भी सफाई हो जाती है इसलिए जीभ को नेचुरल क्लीनर कहा जा सकता है।

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  • अभी तक शायद आपको पता ना हो कि जीभ का लचीला हिस्सा उच्चारण करने में काफी सहायक होता है और इसके बिना सही उच्चारण करना संभव नहीं हो सकता।
  • लचीली जीभ का एक अहम काम ये भी है कि ये चोट लगने पर होने वाले घावों को शरीर के बाकी अंगों की तुलना में तेजी से भर लेती है क्योंकि इसका ज्यादातर हिस्सा स्केलटल मसल्स टिश्यूज से बनी होती है।
  • आपने ये अक्सर सुना होगा कि जीभ को साफ रखना चाहिए। ऐसा कहने के पीछे कारण ये है कि मुँह में बैक्टीरिया पाए जाते हैं जिनमें से लगभग 50% बैक्टीरिया तो हमारी जीभ पर ही होते हैं।
  • जीभ भले ही दिखने में सबसे नाजुक और लचीली होती है लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि जीभ हमारे शरीर की सबसे मजबूत मसल्स होती है।
  • आप अपनी स्वाद कलिकाएँ नहीं देख सकते, वे सूक्ष्मदर्शी होती हैं और जीभ पर उभार के ऊपर टिकी होती हैं। इन उभारों को पपीली कहा जाता है।
  • विशेषज्ञों ने सबसे लंबी जीभ लगभग 3.86 इंच लंबी और लगभग 3.1 इंच चौड़ी बताई है। पुरुषों की तुलना में  महिलाओं की जीभ की लंबाई कम होती है।
  • जीभ आपकी बॉडी में सबसे मजबूत मसल्स है और साथ ही यह बहुत लचीली भी है। यह अकेली ऐसी मांसपेशी है, जिसमें टेस्ट सेंसर मौजूद है और इस सेंसर में लगभग दस हजार से अधिक स्वाद मौजूद है।
  • सभी प्रकार के स्वाद आपकी जीभ पर स्थित नहीं होते। उनमें से लगभग दस प्रतिशत आपके गालों और मुंह के अन्दर ऊपर की तरफ मौजूद होते हैं।
  • पशु साम्राज्य में सबसे बड़ी जीभ ब्लू व्हेल की है, जिसका अनुमानित वजन 2.7 टन से अधिक है।
  • जानवरों के साम्राज्य में, जीभ केवल स्वाद लेने से कहीं अधिक दिलचस्प भूमिका निभाती है। उदाहरण के लिए, स्क्विड की जीभ पर छोटे-छोटे नुकीले दांतों की पंक्तियाँ होती हैं जो भोजन को टुकड़े-टुकड़े कर सकती हैं, बाघ और शेर जैसी बड़ी बिल्लियों की जीभ पर कई बार्ब जैसी संरचनाएँ होती हैं जो केवल चाटने से आपके मांस को छील सकती हैं।

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  • गिरगिट शिकार को पकड़ने के लिए अपनी लचीली जीभ का उपयोग करते हैं और संयोग से, जानवरों के साम्राज्य में इसकी सबसे तेज़ जीभ होती है।
  • जीभ खाने वाली जूं (एक आइसोपॉड) एक परजीवी है जो मछली की विभिन्न प्रजातियों की जीभ से चिपक जाती है। इस परजीवी व्यवहार का असामान्य हिस्सा यह है कि जूँ अनिवार्य रूप से मछली की जीभ को खाकर उसकी जगह ले लेती है।

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वायरल वीडियो : भुनी हुई दूध वाली चाय का ये वीडियो देखकर लोगों ने कहा “आता माझी सटकली”

कई लोगों के लिए चाय के बिना दिन की शुरूआत नहीं होती है। चाय एक ऐसा शब्द है जो हर भारतीय के चेहरे पर तुरंत मुस्कान ला सकता है। हम भारतीयों को चाय बहुत पसंद है और इसे बनाने का हर व्यक्ति का अपना अलग तरीका होता है।

भारत में चाय की विविध संस्कृति है और देश के कई हिस्सों में इसकी अलग-अलग किस्में उगाई जाती हैं। बाजार में आपको इसके कई अंतरराष्ट्रीय विकल्प भी मिल सकते हैं। हममें से अधिकांश लोगों ने अदरक चाय, मसाला चाय, हर्बल चाय, हरी चाय, कैमोमाइल चाय आदि के बारे में सुना होगा।

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लेकिन क्या आपने कभी “भुनी हुई दूध वाली चाय” के बारे में सुना है? अगर नहीं तो हमारे पास एक ऐसी ही अनोखी चाय का वीडियो है जिसमें चाय को एक अलग ही तरह से बनाया गया है।

इस चाय की रेसिपी में चाय की पत्ती को पानी में उबालने की बजाय उसे भूना गया है। जिसे देखकर टी लवर्स बोल रहें है “आता माझी सटकली” ।

दरअसल एक इंस्टाग्राम यूजर, @food_madness__ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक रील साझा की। रील में एक शख्स को बेहद अनोखे तरीके से चाय बनाते हुए दिखाया गया है। उस व्यक्ति ने चाय, चीनी और कुचली हुई इलायची को भून लिया, फिर चीनी धीरे-धीरे पिघलती है और सभी सामग्रियों के साथ मिल जाती है। इसके बाद पैन में दूध डाला जाता है। फिर चाय को एक कप में छान लिया जाता है और परोसा जाता है।

@food_madness__ द्वारा पोस्ट किया गया वीडियो बेंगलुरु का है और इंस्टाग्राम पर इसे अब तक 13 मिलियन से अधिक बार देखा जा चुका है। सभी सामग्रियों को सूखा भूनकर चाय बनाने का यह अनोखा तरीका नेटिज़न्स को पसंद नहीं आया।

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एलिजाबेथ बाथरी : दुनिया की सबसे खतरनाक महिला सीरियल किलर जो जवान रहने के लिए नहाती थी जवान लड़कियों के खून से

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इतिहास के पन्नों में ऐसी कई खौफनाक कहानियां और रहस्य दबे हुए हैं, जो अगर सामने आ जाएं तो आप सहम जाएंगे। ऐसी ही एक खौफनाक कहानी आज हम आपको इस लेख में बताने जा रहे हैं जिसे जानने के बाद आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे।

दरअसल यह कहानी जुड़ी है रानी एलिजाबेथ बाथरी से। एलिजाबेथ बाथरी हंगरी की रहने वाली थी। एलिजाबेथ बाथरी को इतिहास की सबसे खतरनाक और वहशी महिला सीरियल किलर के नाम से भी जाना जाता है।

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साल 1585 से 1610 के बीच बाथरी ने 600 से भी ज्यादा लड़कियों की जान ले ली थी। कहा जाता है कि किसी ने एलिजाबेथ को खूबसूरती बरकरार रखने के लिए कुंवारी लड़कियों के खून से नहाने की सलाह दी थी। एलिजाबेथ को यह तरीका इतना पसंद आया कि इसके लिए उसने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी।

एलिजाबेथ बाथरी की शादी 15 साल की उम्र में फेरेंक द्वितीय नाडास्डी नाम के एक व्यक्ति से हुई थी, जो 19 साल का था। वह तुर्कों के खिलाफ युद्ध में हंगरी का नायक था। एलिजाबेथ ने अपने पति के सामने ही यह अपराध करना शुरू कर दिया था। कुंवारी लड़कियों को मारना उसका शौक बन गया था।

शादी के लगभग 10 साल बाद एलिजाबेथ को तीन बेटियाँ और एक बेटा हुआ। एलिजाबेथ के पति की मृत्यु 1604 में 48 वर्ष की आयु में हो गई थी। अपने पति की मृत्यु के बाद, एलिज़ाबेथ उत्तर-पश्चिमी हंगरी में कास्टेल चली गईं, जिसे अब स्लोवाकिया के नाम से जाना जाता है।

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उसने अपने साथ कई नौकर रखे थे। कहा जाता है कि एलिजाबेथ बाथरी के इस भयानक अपराध में उसके तीन नौकर भी उसका साथ देते थे। चूँकि वह एक अत्यधिक कुशल महिला थी, इसलिए वह आस-पास के गाँवों की गरीब लड़कियों को अपने महल में अच्छे पैसे पर काम करने का लालच देकर बुलाती थी। लेकिन जैसे ही लड़कियां महल में आती थीं वो उन्हें अपना शिकार बना लेती थी।

कहा जाता है कि एलिजाबेथ पहले अपने शिकार पर अत्याचार करती थी। वह उन्हें मारती थी, यहां तक कि उनके हाथ जला देती थी या काट देती थी।

कई बार वह लड़कियों के चेहरे या शरीर के अन्य हिस्सों का मांस दांतों से काट लेती थी और अंत में उन्हें मारकर उनका खून एक टब में इकट्ठा कर लेती थी, जिसमें एलिजाबेथ बाथरी नहाती थी। इसका जिक्र बहुत सी किताबों में किया गया है। एलिजाबेथ बाथरी पर कई हॉलीवुड फ़िल्में भी बनाई गई हैं।

कहा जाता है कि जब इलाके में लड़कियों की संख्या काफी कम हो गई तो उसने ऊंचे घरानों की लड़कियों को अपना शिकार बनाना शुरू कर दिया।

जब हंगरी के राजा को इस बात का पता चला तो उन्होंने इस मामले की जांच करवाई। जांच टीम ने एलिजाबेथ के महल से कई लड़कियों के कंकाल और सोने-चांदी के आभूषण बरामद किए।

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साल 1610 में एलिजाबेथ बाथरी को उनके घृणित अपराध के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें उनके ही महल के एक कमरे में कैद कर दिया गया, जहां चार साल बाद 21 अगस्त 1614 को उनकी मृत्यु हो गई।

कहा जाता है कि एलिजाबेथ काफी खूबसूरत थीं और वह अपनी खूबसूरती बरकरार रखना चाहती थीं। इसीलिए उसने अपने महल में 600 से अधिक कुंवारी लड़कियों की हत्या कर दी थी। हालाँकि, यह भी कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के समय वह बहुत बदसूरत हो गई थीं।

जानिए सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी की जयंती पर उनके बारे में कुछ विशेष

श्री गुरु नानक देव जी का 550 वां पर्व 27 नवंबर को मनाया जा रहा है। सिख संप्रदाय के इस पर्व को मनाने की तैयारियां ज़ोर-शोर से चल रही है। श्री गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व को देखते हुए पूरे उत्साह के साथ समाज, संगत के लोग भव्य तैयारियों में लग गए हैं। सिख धर्म में  यह त्यौहार बहुत ही श्रद्धा व ख़ुशी के साथ मनाया जाता है । इस मौके पर शब्द  कीर्तन,  अटूट लंगर एवं गुरु की जीवनी पर प्रकाश डाला जाएगा।

गुरु नानक देव जी का बचपन

गुरु नानक देव के चेहरे पर बचपन से ही अजीब सा तेज दिखाई देता था। उनका जन्म लाहौर के पास तलवंडी नामक गांव में कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ। उनका परिवार कृषि करके अपना गुजरा करता था। गुरु नानक देव जी का जन्म  जहां हुआ था, वह स्थान आज उन्हीं के नाम से जाना जाता है। जिसे अब ननकाना साहिब कहा जाता है। ननकाना अब पाकिस्तान में है। बचपन से तीव्र बुद्धिवाले नानक देव जी सिख धर्म के संस्थापक रहे  हैं।  शादी के 16वें वर्ष के बाद नानक देव जी अपनी पत्नी और दोनों पुत्रों को छोड़कर धर्म के मार्ग पर निकल पड़ें। बचपन से ही उनका मन धर्म और अध्यात्म में लगता था।

गुरु नानक देव जी के आध्यात्म एवं बुद्धिमता की कुछ किस्से

गुरु देव जी की महानता के दर्शन उनके बचपन से ही होने लगे थे। कहा जाता है, की जब बचपन में उनका जनेऊ संस्कार किया जाने लगा और पंडितजी नानक देव जी के गले में जनेऊ धारण करवाने लगे तब गुरु देव जी ने उनका हाथ पकड़कर कहा- ‘पंडितजी, जनेऊ पहनने से हम लोगों का दूसरा जन्म होता है, जिसको आप आध्यात्मिक जन्म कहते हैं l तो इसके लिए जनेऊ भी किसी और किस्म का होना चाहिए, जो हमारी आत्मा को बांध सके। क्यूंकि आप जो जनेऊ मुझे दे रहे हो वह तो कपास के धागे का है, जो कि मैला हो जाएगा, टूट जाएगा, मरते समय शरीर के साथ चिता में जल जाएगा। तो फिर यह जनेऊ आत्मिक जन्म के लिए कैसे सहायक होगा? बालक नानक का यह जवाब सुनकर पंडितजी कुछ नहीं कह पाए और नानक जी ने जनेऊ धारण करने से इनकार कर दिया।

सच्चा सौदा

जब गुरु नानक देव जी बड़े हुए तो एक दिन  नानक देव जी के  पिता ने व्यापार करने के लिए उन्हें  20 रुपए दिए और कहा- ‘इन 20 रुपए से सच्चा सौदा करके आओ।  जब नानक देव जी सौदा करने  के लिए निकले तो रास्ते में उन्हें साधु-संतों की मंडली मिली। नानकदेव जी ने उस साधु मंडली को 20 रुपए का भोजन करवाया और  घर वापस लौट आए। जब घर आ कर पिताजी ने पूछा- क्या सौदा करके आए? उन्होंने  कहा-  ‘साधुओं को भोजन करवाया। यही तो सच्चा सौदा है।’

गुरु नानक देव जी दवारा प्रसिद्ध दोहे

अंतर मैल जे तीर्थ नावे तिसु बैकुंठ न जाना।

लोग पतीणे कछु ना होई नाही राम अजाना।।

इसका अर्थ यह है कि अगर मन के अंदर मैल हो तो तीर्थ नाहाने , वैकुंड जाने का क्या फायदा है ? सिर्फ तीर्थ नाहाने से मन साफ नहीं हो सकता। तीर्थयात्रा की महानता चाहे कितनी भी क्यों न हो। यह तीर्थयात्रा सफल हुई है या नहीं, इसका निर्णय हमारे कर्मो पर निर्भर करता है। इसके लिए प्रत्येक  मनुष्य को अपने अंदर झांककर देखना चाहिए कि, तीर्थ सनान करने के बाद भी मन में निंदा, ईर्ष्या, धन-लालसा, काम, क्रोध आदि कितने कम हुए हैं।

भेद भाव की भावना

गुरु नानक देव जी किसी भी व्यक्ति में फर्क नहीं करते थे। वे कहते हैं कि एक बार कुछ लोगों ने नानक देव जी से पूछा- आप हमें यह बताइए कि आपके मत अनुसार हिन्दू बड़ा है या मुसलमान। उन्होंने उत्तर दिया-

अवल अल्लाह नूर उपाइया कुदरत के सब बंदे।

एक नूर से सब जग उपजया को भले को मंदे।।

इसका मतलब यह है कि ईश्वर के सामने सभी एक समान है। न तो हिन्दू कहलाने वाला ईश्वर की नज़र में बड़ा है, न मुसलमान कहलाने वाला। ईश्वर की नज़र  में वही इंसान बड़ा है जिसका मन सच्चा और नेक ईमान हो।

जानिए गुरु नानक देव जी और उनके उपदेशों के बारे में

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव के जन्म दिवस के दिन गुरु पर्व या प्रकाश पर्व मनाया जाता है। गुरु नानक जयंती के दिन सिख समुदाय के लोग ‘वाहे गुरु, वाहे गुरु’ जपते हुए सुबह-सुबह प्रभात फेरी निकालते हैं।

गुरुद्वारे में शबद-कीर्तन करते हैं, प्रशाद चढ़ाते हैं और शाम के वक्त लोगों को लंगर खिलाते हैं। गुरु पर्व के दिन सिख धर्म के लोग अपनी श्रृद्धा के अनुसार सेवा करते हैं और गुरु नानक जी के उपदेशों यानी गुरुवाणी का पाठ करते हैं।

गुरु नानक जयंती कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। इस दिन देवों की दीवाली यानी देव दीपावली भी होती है। नानक जी का जन्म 15 अप्रैल, 1469 को पाकिस्तान के लाहौर के पास तलवंडी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। इस गांव को अब ननकाना साहिब के नाम से जाता है।

 

गुरु नानक जी बचपन से ही धार्मिक थे। गुरु नानक जी ने अपने पूरे जीवन में सभी धर्मों के लोगों को एकता का संदेश दिया। गुरु नानक जी का मानवतावाद में दृढ़ विश्वास था।

उनके विचार धर्म के सच्चे और शाश्वत मूल्यों में निहित थे, इसीलिए वह चाहते थे कि हर कोई जाति और धर्म से परे जाकर सभी एक साथ आए।

उनका कहना था, “कोई भी एक हिंदू नहीं है और कोई भी मुसलमान नहीं है, हम सभी मनुष्य हैं।” केवल एक ही भगवान है जिसने इस दुनिया को बनाया है। उनका मानना ​​था कि धर्म एक दर्शन है, दिखावा नहीं।

गुरु नानक जी के उपदेश

  • ईश्वर एक है, वह सर्वत्र विद्यमान है। हम सबका “पिता” वही है इसलिए सबके साथ प्रेम पूर्वक रहना चाहिए।
    तनाव मुक्त रहकर अपने कर्म को निरंतर करते रहना चाहिए तथा सदैव प्रसन्न रहना चाहिए।
  • गुरु नानक देव पूरे संसार को एक घर मानते थे जबकि संसार में रहने वाले लोगों को परिवार का हिस्सा।
  • किसी भी तरह के लोभ को त्याग कर अपने हाथों से मेहनत कर एवं न्यायोचित तरीकों से धन का अर्जन करना चाहिए।
  • कभी भी किसी का हक नहीं छीनना चाहिए बल्कि मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रुरतमंद को भी कुछ देना चाहिए।
  • लोगों को प्रेम, एकता, समानता, भाईचारा और आध्यत्मिक ज्योति का संदेश देना चाहिए।
  • धन को जेब तक ही सीमित रखना चाहिए। उसे अपने हृदय में स्थान नहीं बनाने देना चाहिए।
  • स्त्री-जाति का आदर करना चाहिए। वह सभी स्त्री और पुरुष को बराबर मानते थे।
  • संसार को जीतने से पहले स्वयं अपने विकारों पर विजय पाना अति आवश्यक है।
  • अहंकार मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देता अतः अहंकार कभी नहीं करना चाहिए बल्कि विनम्र हो सेवाभाव से जीवन गुजारना चाहिए।

गुरु नानक देव जी और उनके महत्वपूर्ण सिद्धांत

भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक गुरु को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यहां तक कि हमारी वैदिक संस्कृति के कई मंत्रों  ‘गुरुर्परमब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नम:’ में भी महत्वपूर्ण स्थान जाता है, इसका मतलब है कि गुरु को भगवान का दर्जा दिया जाता है। आध्यात्मिक गुरु जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिए रास्ता बताते है, साथ ही हमारी बुराइयों को नष्ट करने में  मदद करते है।

गुरु का अर्थ

गुरु वह होता है जो सामाजिक भेदभाव को मिटाकर समाज में मिलजुल कर रहने का पाठ पढ़ाये और सभी को एकता के साथ रहने का रास्ता दिखाए।  एक ऐसे ही धर्मगुरु हुए गुरु नानक देव जिन्होंने मूर्ति पूजा को त्यागकर निर्गुण भक्ति का पक्ष लिया l उनके अनुसार ईश्वर की भक्ति मन से होनी चाहिए। गुरु नानक देव के व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्म सुधारक, समाज सुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु के सारे गुण मिलते हैं। गुरु नानक देव का जन्म 15वीं सदी में 15 अप्रैल 1469 को उत्तरी पंजाब के तलवंडी गांव (वर्तमान पाकिस्तान में ननकाना) के एक हिन्दू परिवार में हुआ था। किंतु प्रचलित तिथि कार्तिक पूर्णिमा ही है, जो अक्टूबर-नवंबर में दीपावली के 15 दिन बाद पड़ती है।

उनका नाम नानक उनकी बड़ी बहन नानकी के नाम पर रखा गया था। वे अपनी माता तृप्ता व पिता मेहता कालू के साथ रहते थे। इनके पिता तलवंडी गांव में पटवारी थे। नानकदेव स्थानीय भाषा के साथ पारसी और अरबी भाषा में भी पारंगत थे। वे बचपन से ही अध्यात्म एवं भक्ति की तरफ आकर्षित थे। बचपन में नानक को पशु चराने का काम दिया गया था, और पशुओं को चराते समय वे कई घंटों ध्यान में रहते थे। एक दिन उनके पशुओं ने पड़ोसियों की फसल को बर्बाद कर दिया, तो उनको उनके पिता ने उनको बहुत डांटा। जब गांव का मुखिया राय बुल्लर वो फसल देखने गया तो फसल बिलकुल सही-सलामत थी। यही से उनके चमत्कार शुरू हो गए और इसके बाद वे संत बन गए।

दया भावना

जब नानक की आध्यात्मिकता अधिक बढ़ने लगी तो पिता मेहता कालू ने उन्हें व्यापार के धंधे में लगा दिया। परन्तु व्यापारी बनने के बाद भी उनका सेवा और परोपकार का भाव नहीं छूटा। वे अपनी कमाई के पैसों से भूखों को भोजन कराने लगे। यहीं से लंगर का इतिहास शुरू हुआ।

सिख धर्म के संस्थापक, महान दार्शनिक गुरु, गुरु नानक देव जी से आप सभी परिचित है। आइए जानते हैं उनके 10 महत्वपूर्ण सिद्धांत…
  • ईश्वर एक है।
  • सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो।
  • जगत का कर्ता सब जगह और सब प्राणी मात्र में मौजूद है।
  • सर्वशक्तिमान ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता।
  • ईमानदारी से मेहनत करके उदरपूर्ति करना चाहिए।
  • बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं।
  • सदा प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने को क्षमाशीलता मांगना चाहिए।
  • भोजन शरीर को जिंदा रखने के लिए जरूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।
  • सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं।
  • मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके उसमें से जरूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए।

मालचा महल – दिल्ली में स्थित एक भूतिया महल

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मालचा महल को विलायत महल के नाम से भी जाना जाता है। यह दिल्ली के चाणक्यपुरी क्षेत्र में स्थित है। इसका निर्माण 1325 में दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाले फ़िरोज़ शाह तुगलक द्वारा किया गया था।

इसे अवध की “बेगम विलायत महल” के नाम पर “विलायत महल” के नाम से जाना जाने लगा जिन्होंने खुद को अवध के शाही परिवार का सदस्य होने का दावा किया था।

वैसे तो दिल्ली के कई हॉन्टेड स्थानों के बारे में आपने सुना होगा पर मालचा महल (Malcha Mahal) की स्टोरी औरों से काफी दिलचस्प है।

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चाणक्यपुरी क्षेत्र स्थित मालचा महल में बेगम विलायत महल ने 10 सितंबर 1993 को, 62 वर्ष की आयु में आत्महत्या कर ली थी । कहा जाता है कि विलायत महल की आत्मा आज भी यहां भटकती है।

स्थानीय लोगो के अनुसार रात को यहां तरह-तरह की आवाजें सुनाई देती हैं। जंगल के बीच स्थित इस महल तक जाने का रास्ता भी काफी डरावना है।

करीब 1 किलोमीटर तक जंगल के बीच से होकर यहां पहुंचना होता है। घना जंगल की वजह से यहां बंदर, सियार, गाय-बैल आदि जानवर घूमते मिल जाते हैं।

चाणक्यपुरी क्षेत्र स्थित मालचा महल में बेगम विलायत महल ने 10 सितंबर 1993 को, 62 वर्ष की आयु में आत्महत्या कर ली थी । कहा जाता है कि विलायत महल की आत्मा आज भी यहां भटकती है।

स्थानीय लोगो के अनुसार रात को यहां तरह-तरह की आवाजें सुनाई देती हैं। जंगल के बीच स्थित इस महल तक जाने का रास्ता भी काफी डरावना है।

करीब 1 किलोमीटर तक जंगल के बीच से होकर यहां पहुंचना होता है। घना जंगल की वजह से यहां बंदर, सियार, गाय-बैल आदि जानवर घूमते मिल जाते हैं।

कौन थीं बेगम विलायत महल

इतिहास के अनुसार लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने 1856 में सत्ता से बेदखल कर दिया था। उनको कोलकाता की जेल में डाल दिया गया, जहां उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी 26 साल गुजारे थे।

उसके बाद वाजिद अली का परिवार बिखर गया था। बेगम विलायत महल अपने को वाजिद अली की आखिरी वारिस बताती थीं। जिसको देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1971 में कश्मीर में उन्हें रहने के लिए एक बंगला दिलवाया था।

कहा जाता है कि बाद में वह बंगला जल गया और उसके बाद बेगम विलायत महल रहने के लिए दिल्ली आ गईं। उनके साथ उनकी बेटी राजकुमारी सकीना महल, बेटे राजकुमार अली रजा उर्फ साइरस, 7 नौकर और 13 खूंखार कुत्ते भी आए थे।

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बेगम विलायत ने दिल्ली रेलवे स्टेशन के वीआईपी लाउंज में करीब 9 साल तक धरना दिया था। वह अपने लिए मुआवजे के तौर महल की मांग कर रही थीं। जब रेलवे के अफसर उनको हटाने आते, तो उनके खूंखार कुत्ते उन पर झपट पड़ते। कहा जात है वो अपने साथ सांप का ज़हर रखती थी और धमकी देतीं थी कि अगर कोई भी आगे आया, तो सांप का जहर पीकर वो जान दे देंगी।

अंततः तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा 1985 में बेगम विलायत महल को मालचा महल का मालिकाना हक दे दिया गया और इसके बाद वह यहां रहने लगीं।

महल में रहते हुए 10 सितंबर 1993 को बेगम विलायत महल ने 62 वर्ष की उम्र में आत्महत्या कर ली थी। उनका शव यहां 10 दिनों तक पड़ा रहा। बाद में उनके बेटे-बेटी ने उनके शव को महल परिसर में ही कब्र में दफना दिया।

24 जून 1994 को खजाने की खोज में कुछ लोग महल में घुस आए। बेगम विलायत महल के बेटे और बेटी को डर हो गया कहीं ये लोग उनकी मां की कब्र न खोद दें। फिर दोनों ने खुद उनकी कब्र को खोदकर उनके शरीर को जला दिया और उनकी राख को एक बर्तन में रख दिया। इस घटना के बाद दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने उनको रिवॉल्वर मुहैया कराई।

बेगम विलायत महल की मौत के बाद से ही बेगम सकीना महल और प्रिंस अली रजा अपने कुत्तों और नौकरों के साथ रहने लगे। एक-एक कर कुत्ते और नौकर मरते गए। कुछ कुत्तों को तो उन लोगों ने मार दिया, जो अक्सर महल से खजाना लूटने की फिराक में लगे रहते थे। लोगों ने उनके महल से काफी सोना चांदी भी चुरा लिया था।

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बेगम सकीना महल और प्रिंस अली रजा बहुत पढ़े-लिखे थे। सकीना महल ने तो अपनी मां के ऊपर एक किताब भी लिखी थी। किताब का नाम है –‘प्रिंसेस विलायत महल : अनसीन प्रेजन्स’।

सकीना महल ने न्यूयॉर्क टाइम्स को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि मुझे यह समझ आ गया है कि ये दुनिया कुछ नहीं है। ये क्रूर प्रकृति हमारी बर्बादी में खुश होती है। हम जिंदा लाशों के खानदान बन गए हैं। सकीना महल कहती थीं कि आम होना एक जुर्म ही नहीं है, बल्कि पाप है।

2017 को मालचा महल में प्रिंस अली रजा मृत पाए गए थे। इनके अंतिम संस्कार के लिए जब कोई नहीं आया तब कई दिन बाद दिल्ली पुलिस ने वक्फ बोर्ड की मदद से दिल्ली गेट के पास उनके शव को दफन करवा दिया था।

इससे कुछ महीने बाद बेगम सकीना महल की भी मृत्यु हो गई। इस तरह से नवाब के परिवार ने गुमनामी की जिंदगी जीते हुए दम तोड़ दिया। बेगम विलायत महल और उनके बेटे-बेटी अपने अतीत को भुला नहीं सके। वो मरने तक खुद को नवाब की तरह समझते रहे।

महल तक आने और मिलने को किसी को इजाजत नहीं थी। महल के गेट पर ही लिखा था कि यहां किसी बाहरी व्यक्ति को देखते ही गोली मार दी जाएगी। बेगम सकीना महल और प्रिंस अली रजा सिर्फ विदेशी पत्रकारों को छोड़कर किसी और से नहीं मिलते थे।

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हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के बारे में कुछ आश्चर्यजनक तथ्य

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दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध संस्थानों में से एक है हार्वर्ड विश्वविद्यालय। यह समृद्ध इतिहास और दिलचस्प तथ्यों का भंडार है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका के मैसाचुसेट्स शहर के कैंब्रिज में स्थित है। इसकी शुरुआत में इसे न्यू कॉलेज और द कॉलेज ऑफ न्यू टाउन के नाम से जाना जाता था।

इस लेख में हम आपको हार्वर्ड विश्वविद्यालय के बारे में कुछ आश्चर्यजनक तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनके बारे में आप शायद ही जानते होंगे, तो चलिए जानते हैं।

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  • हार्वर्ड विश्वविद्यालय की स्थापना 1636 में हुई थी जिससे यह संयुक्त राज्य अमेरिका में उच्च शिक्षा का सबसे पुराना संस्थान बन गया। इसका एक समृद्ध इतिहास है जो चार शताब्दियों तक फैला हुआ है। 13 मार्च 1639 को इसका नाम बदलकर हार्वर्ड कॉलेज रखा गया।
  • हार्वर्ड विश्वविद्यालय का नाम जॉन हार्वर्ड के सम्मान में रखा गया था, जिन्होंने अपनी लाइब्रेरी और अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा संस्थान के लिए छोड़ दिया था। जॉन हार्वर्ड ने इस इंस्टीट्यूट को चार सौ किताबों की लाइब्रेरी और 779 डॉलर की राशि दान में दी थी।
  • इस यूनिवर्सिटी में 2100 से अधिक फैकल्टी हैं। हर साल यहां 21 हजार से ज्यादा स्टूडेंट्स एडमिशन लेते हैं। इनमें 7 हजार से ज्यादा विदेशी स्टूडेंट्स होते हैं।
  • हार्वर्ड यार्ड, जिसे विश्वविद्यालय का हृदय भी कहा जाता हैं परिसर का सबसे पुराना हिस्सा है। यह एक सुरम्य और ऐतिहासिक स्थान है जो छात्रों, शिक्षकों और आगंतुकों के लिए एक सभा स्थल के रूप में कार्य करता है।
  • जॉन हार्वर्ड प्रतिमा को “तीन झूठों की मूर्ति” का उपनाम दिया गया है।
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  • हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों की एक प्रभावशाली सूची है, जिसमें आठ अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ-साथ कई व्यापारिक नेता, नोबेल पुरस्कार विजेता और पुलित्जर पुरस्कार विजेता शामिल हैं। (जॉन एफ कैनेडी, बराक ओबामा, विलियम हेनरी गेट्स, नताली पोर्टमैन, रूथ बेडर गिन्सबर्ग, मार्क जुकरबर्ग, मैट डेमन, टीएस एलियट, जॉर्ज बुश, रतन टाटा, हेलेन केलर, रॉबर्ट ओपेनहाइमर, आनंद महिंद्रा, मिशेल ओबामा, फ्रैंक डेलानो रूजवेल्ट, नील डेग्रसे टायसन, कॉनन ओ’ब्रायन, माइकल ब्लूमबर्ग, मार्गरेट एटवुड, टॉमी ली जोन्स)
  • हार्वर्ड क्रिमसन हार्वर्ड विश्वविद्यालय का छात्र समाचार पत्र है जिसकी स्थापना 1873 में हुई थी। यह पूरी तरह से हार्वर्ड कॉलेज के स्नातक छात्रों द्वारा चलाया जाता था, इसने कई वर्षों तक कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स में एकमात्र दैनिक समाचार पत्र के रूप में कार्य किया।
  • हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अत्यधिक प्रतिस्पर्धी प्रवेश प्रक्रिया है, जिसमें स्वीकृति दर 5% से कम है। हर साल, दुनिया भर से बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली और निपुण छात्र हार्वर्ड के प्रतिष्ठित स्नातक कार्यक्रम में स्थान पाने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
  • हार्वर्ड लाइब्रेरी प्रणाली में 70 से अधिक पुस्तकालय शामिल हैं, जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी शैक्षणिक पुस्तकालय प्रणालियों में से एक बनाता है। इसमें पुस्तकों, पांडुलिपियों और डिजिटल संसाधनों का एक विशाल संग्रह है।
Harvard-University-library
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  • $40 बिलियन से अधिक की एंडोमेंट (लाइफ़ इंश्योरेंस कवर) के साथ, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पास विश्व स्तर पर किसी भी विश्वविद्यालय की तुलना में सबसे बड़ी बंदोबस्ती होने का प्रतिष्ठित खिताब है। यह वित्तीय संसाधन अनुसंधान, छात्रवृत्ति और चल रही परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है।
  • हार्वर्ड विश्वविद्यालय में एथलेटिक टीमों हार्वर्ड क्रिमसन के उपनाम से जाना जाता है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय फुटबॉल, बास्केटबॉल और रोइंग सहित कई खेलों में एनसीएए डिवीजन स्तर पर प्रतिस्पर्धा करती हैं।
  • हार्वर्ड का परिसर मेमोरियल हॉल, वाइडनर लाइब्रेरी और हार्वर्ड कला संग्रहालय सहित प्रतिष्ठित स्थलों से भरा हुआ है।
  • हार्वर्ड विश्वविद्यालय छात्रों को छात्र क्लबों और संगठनों से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामुदायिक सेवा पहलों तक ढेर सारे अवसर प्रदान करता है। ये गतिविधियाँ समग्र छात्र अनुभव को बढ़ाती हैं और व्यक्तिगत वृद्धि और विकास को बढ़ावा देती हैं।
  • हार्वर्ड लॉ स्कूल दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित लॉ स्कूलों में से एक है। इसे लगातार विश्व स्तर पर शीर्ष लॉ स्कूलों में स्थान दिया गया है।