अपार धन, समृद्धि और खुशी पाने के प्रमाणित आसान टिप्स

सिंधियों के लिए कहावत है ‘सिंधी कभी भीख नहीं मांगेगा।’ हिंदुस्तान का बंटवारा हुआ तो सिंधी शरणार्थी बनकर हिन्दुस्तान आए आए तब तो शरणार्थी थे लेकिन मेहनत करके वे पुरुषार्थी से परमार्थी होते जा रहे हैं।

मेहंदी का रंग दस दिन रहता है पर मेहनत का रंग पूरी जिंदगी को खुशहाल करता है इसलिए कहता हूं परिश्रम करो। हर आदमी अमीर बने, गरीबी अभिशाप है। हर आदमी को अमीर बनना चाहिए। अपरिग्रह का धर्म अमीर बनने के बाद धारण कीजिएगा। बेचारे गरीबों को क्या प्रेरणा देते हो अपरिग्रह धारण करने की, उनके पास अभी त्यागने जैसा कुछ नहीं है।

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पहले महावीर की तरह राजकुमार बनो, बुद्ध की तरह सम्पन्न बनो, उसके बाद अगर त्याग कर संन्यासी भी होना हो तो हो जाना क्योंकि उस त्याग को ही त्याग कहा जा सकेगा। उस त्याग से ही आनंद होगा। कुछ था ही नहीं तो क्या त्यागा? 7000 रुपए महीना कमाने वाला क्या त्यागेगा? आज मगर आपके यहां कोई लॉ इंस्टीच्यूट चलाते हैं, नर्सिंग इंस्टीच्यूट चलाते हैं, कोई फैक्टरी चलाते हैं, वे अगर कुछ त्याग करें तो वह त्याग कहलाएगा, पर पहले किसी स्तर पर पहुंचे तो सही हर आदमी सम्पन्न बने, हर व्यक्ति अमीर बने। नौकरी में संतोष मत करो, परिश्रम करो, पढ़ाई करो। कुछ ऐसे बनो कि तुम पर लोग गर्व कर सकें।

गरीबी अभिशाप है, व्यक्ति के लिए समाज के लिए, देश के लिए। गरीब आदमी को कोई नहीं पूछता। न घर में, न बाहर, कहीं नहीं। उसी को पूछा जाएगा जिसके पास अंटी में माल होगा इसलिए मालदार बनो, ईमानदारी से मेहनत करके माल कमाओ। पहले इज्जत कमाओ, उसके बाद त्याग के पथ पर आएंगे इसीलिए तो कहता हूं कि अगर भगवान हमें रोज 24 घंटे देता है तो यह हम लोगों पर निर्भर करता है कि उन 24 घंटों में क्या करते हैं और क्या नहीं करते। फालतू मत बैठो। 12 घंटे मेहनत करो, फिर चाहे वे 12 घंटे दिन के हों, चाहे रात के पर मुफ्त की मत खाओ। जो क्षेत्र हमें मिले हैं, उस क्षेत्र में मेहनत करेंगे।

जिंदगी ‘खंडप्रस्थ’ की तरह है। मेहनत और पुरुषार्थ से इस ‘खंडप्रस्थ’ को ‘इंद्रप्रस्थ’ बनाने का जज्बा अपने भीतर जगाओ। विश्वास रखो, ईश्वर उन लोगों के साथ है जो मेहनत करके खुद को और दुनिया को सुकून देते हैं। ईश्वर निकलता है भाग्य देने के लिए। ईश्वर को लगता है कि वह आदमी तो ऐसे ही पड़ा है आलसी की तरह, उसे देकर भी क्या करूंगा। अगर कोई आदमी आंख बंद करके सोया है और सूरज उसके लिए उग भी जाएगा तो वह करेगा क्या? एक कुत्ता कार के पीछे दौड़ता है, भौंकता है। सवाल यह है कि अगर वह कार को पकड़ भी लेगा तो करेगा क्या ? न कोई लक्ष्य है, न कोई परिणाम है बस भौंक रहा है।

हम जी रहे हैं तो जीने का मकसद तय करो। जीवन मूल्यवान है। समय आगे बढ़ रहा है, लगातार आगे बढ़ रहा है, पर कहीं हम ठहर तो नहीं गए हैं? ज्योतिषियों के चक्कर काट रहे हैं, यह सोचकर कि कहीं कोई ग्रह गोचर ठीक हो जाए। अरे भाई, हटाओ इन जन्म कुंडलियों का चक्कर।

ज्योतिषियों के चक्कर बहुत हो गए। ज्योतिषियों से तुम्हारा भला होगा कि नहीं होगा, उनका भला जरूर हो जाएगा। अपने सपनों को जगाओ, जीवन में कुछ कर गुजरने का जज्बा, संकल्प अपने भीतर पैदा करो।

।।राष्ट्रसंत चंद्रप्रभ।।

अटारी रेलवे स्टेशन : भारत का एक ऐसा रेलवे स्टेशन जहाँ पर जाने के लिए चाहिए पासपोर्ट और वीजा

भारत में प्रतिदिन करोड़ों लोग ट्रेन में सफर करते हैं। यात्रियों की सुविधा को देखते हुए भारतीय रेलवे हजारों ट्रेनों का संचालन कर रहा है। पूरे देश में रेलवे का नेटवर्क फैला हुआ है, जोकि सीमांत इलाकों को बड़े-बड़े महानगरों के साथ जोड़ता है। इसी वजह से इसको देश की लाइफलाइन भी कहा जाता है।

भारतीय रेलवे दुनिया की चौथी और एशिया की दूसरी सबसे बड़ी रेलवे है। भारत में रेलवे स्टेशनों की कुल संख्या 7,000 और 8,500 के बीच अनुमानित है। भारतीय रेलवे काफी एडवांस है और देश की ट्रेनें, स्टेशन काफी हाइटेक हो चुके हैं।

16 अप्रैल, 1853 को भारतीय रेलवे की स्थापना की गई थी। भारतीय रेलवे का मुख्यालय राजधानी दिल्ली में है। सालों पुराना भारतीय रेल आज भी सबसे सस्ता और पसंदीदा परिवहन है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा रेलवे स्टेशन भी है, जहां पर जाने के लिए आपको पासपोर्ट और वीजा की जरूरत होती है। यहां पर आप बिना वीजा के नहीं जा सकते हैं।

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इस रेलवे स्टेशन का नाम अटारी श्याम सिंह स्टेशन है। पहले इस रेलवे स्टेशन का नाम अटारी रेलवे स्टेशन था लेकिन अब इस रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर अटारी श्याम सिंह स्टेशन कर दिया गया है।

यह देश का इकलौता रेलवे स्टेशन है, जहां पर वीजा की जरूरत होती है। भारत का यह रेलवे स्टेशन अमृतसर जिले में है और फिरोजपुर रेलवे स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में आता है।

इस रेलवे स्टेशन पर जाने के लिए आपके पास पाकिस्तानी वीजा का होना जरूरी है। अटारी स्टेशन भारत का हिस्सा है, लेकिन यहां जाने के लिए पाकिस्तान की अनुमति की भी जरूरत होती है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस रेलवे स्टेशन पर जो भी भारतीय नागरिक बिना वीजा के पकड़े जाते हैं, उन पर फॉरन एक्ट 14 के तहत मामला दर्ज किया जाता है। इस एक्ट के तहत गिरफ्तार होने पर आपको जमानत मिलना भी बहुत मुश्किल हो जाता है।

पंजाब का आखिरी रेलवे स्टेशन

अटारी श्याम सिंह भारत का सबसे छोटा रेलवे स्टेशन है। इस रेलवे स्टेशन के एक तरफ अमृतसर और दूसरी तरफ लाहौर है। यह पंजाब का अंतिम रेलवे स्टेशन है।

यहां से चलने वाली इकलौती अंतरराष्ट्रीय ट्रेन है। अगर आप इससे यात्रा करना चाहते हैं, तो टिकट खरीदने के लिए पासपोर्ट नंबर देना होता है। समझौता एक्सप्रेस के लिए ही इस रेलवे स्टेशन को खोला जाता है।

अगर यह ट्रेन लेट होती है, तो भारत और पाकिस्तान दोनों के रजिस्टर में एंट्री की जाती है। यहां पर दिल्ली-अटारी एक्सप्रेस, अमृतसर-अटारी डीईएमयू, जबलपुर-अटारी स्पेशल ट्रेनें भी देखी जा सकती है, लेकिन इनमें कोई अटारी-लाहौर लाइन से नहीं जाती है।

फिलहाल यह स्टेशन और समझौता एक्सप्रेस दोनों बंद हैं। जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 को खत्म करने के बाद पाकिस्तान की तरफ से समझौता एक्सप्रेस को भी बंद कर दिया गया था।

फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार 2024 : पावर कपल रणबीर कपूर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और आलिया भट्ट सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री नामित, पढ़ें पूरी लिस्ट

गुजरात के गांधी नगर में रविवार को 69वें फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड्स का आयोजन किया गया। इस बार ये शो फिल्म निर्माता- करण जौहर, अभिनेता आयुष्मान खुराना और टीवी होस्ट मनीष पॉल द्वारा आयोजित किया।

फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों के लिए नामांकन सूची की घोषणा हाल ही में की गई थी। जिसमें शाहरुख खान, रणबीर कपूर, विक्रांत मैसी, विक्की कौशल, दीपिका पादुकोण, आलिया भट्ट जैसे कई और सितारों को नामित किया गया था।

फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार 2024 ने भारतीय सिनेमा में बेहतरीन उपलब्धियों का जश्न मनाया। यहां फिल्म उद्योग में उत्कृष्टता और प्रतिभा का प्रदर्शन करने वालों को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

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पावर कपल रणबीर कपूर और आलिया भट्ट ने पिछले साल रिलीज़ हुई फिल्मों में अपने प्रदर्शन के लिए शीर्ष सम्मान हासिल करके फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स के 69वें संस्करण में अपना दबदबा बनाया।

रणबीर कपूर को संदीप रेड्डी वांगा की विवादास्पद फिल्म एनिमल में उनके प्रदर्शन के लिए अग्रणी भूमिका (पुरुष) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया, जबकि आलिया भट्ट ने अग्रणी भूमिका (महिला) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री की प्रतिष्ठित ट्रॉफी जीती।

विधु विनोद चोपड़ा को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के रूप में मान्यता दी गई, उनकी जीवनी पर आधारित ड्रामा 12वीं फेल को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ताज पहनाया गया।

दूसरी ओर, देवाशीष मखीजा की थ्रिलर जोराम ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म (क्रिटिक्स) का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता, जबकि विक्रांत मैसी (12वीं फेल), रानी मुखर्जी (मिसेज चटर्जी बनाम नॉर्वे) और शेफाली शाह (थ्री ऑफ अस) ने प्रतिष्ठित पुरस्कार जीता। आलोचकों द्वारा सर्वश्रेष्ठ अभिनेता नामित किये जाने के बाद ब्लैक लेडी।

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विश्व के सर्वश्रेष्ठ विशिष्ट सैन्य-बल

JTF2 – कनाडा

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JTF2 का पूरा नाम ‘जॉइंट टास्क फोर्स 2’ हैं जिसका गठन 1993 में हुआ है। 11 सितम्बर 2001 को हुए आतंकी हमलों में JTF2 फोर्स ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इस फोर्स का मुख्य उदेश्य आतंकवाद का मुकाबला करना है। JTF2 की तुलना नेवी सील्स और SAS जैसी स्पेशल फोर्स के साथ की जाती है।

सयेरत मत्कल – इसराइल

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इजरायल की स्पेशल फौर्स यूनिट का मुख्य उदेश्य सैनिक परीक्षण, आतंकवाद विरोधी और बंधक बचाव पर ध्यान केंद्रित करना है। सयेरत मत्कल का गठन 1957 में हुआ था इजरायल स्पेशल फौर्स में वहीं उम्मीदवार चयनित होते है, जिनमें उच्च शारीरिक और बौद्धिक विशेषताओं हो। उम्मीदवारों को पैराशूट ट्रेनिंग, आतंकवाद का मुकाबला करने का प्रशिक्षण और सैनिक संबंधित परीक्षण दिया जाता है। इजरायल की स्पेशल फौर्स ने 1960 के दशक के बाद से कई बड़े अभियानों में भाग लिया है।

GIS इटली

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GIS (ग्रुप्पो इन्तेर्वेंतो स्पेशल) काराबिंरिन सैन्य पुलिस एक स्पेशल फौर्स आतंकवाद का मुकाबला सामरिक प्रतिक्रिया के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है। यह 1978 में इतालवी राज्य पुलिस द्वारा बनाए गई स्पेशल फौर्स है जो आतंकवाद खतरे से निपटने के प्याप्त है। यह स्पेशल फौर्स अपनी तेज निशानेबाजी के लिए जानी जाती है।

EKO कोबरा, ऑस्ट्रिया

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EKO (Einsatzkommando) कोबरा ऑस्ट्रिया के प्राथमिक आतंकवाद-विरोधी विशेष अभियान फौर्स है। यह मुख्य रूप से 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में इजरायली एथलीटों पर हमले से निपटने के लिए विशेष रूप से 1978 में गठन किया गया था। इस स्पेशल फौर्स का मुख्य काम आतंकवाद का मुक़ाबला करना है। 1996 में ग्राज़ – कार्लु जेल में एक बंधक बचाव और कई अन्य कार्यों शामिल है।

GIGN, फ्रांस

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GIGN (नेशनल गेंदार्मेरी इंटरवेंशन ग्रुप) फ्रेंच सशस्त्र बल के एक विशेष अभियान फौर्स है। यह फौर्स मुख्यतः आतंकवाद विरोधी और बंधक बचाव मिशन फ्रांस में या दुनिया में कहीं और प्रदर्शन करने के लिए प्रशिक्षित की जाती है। यह 1971 के ओलिंपिक खेलों में म्यूनिख हत्याकांड के बाद बनाई गई थी। इसका मूल लक्ष्य बेहद हिंसक हमलों में संभव भविष्य प्रतिक्रिया तैयार करने के लिए किया जाता था।

JW ग्रोम, पोलैंड

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JW ग्रोम (जेद्नोस्टका वोजस्कोवा ग्रोम) पोलैंड के अभिजात वर्ग आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए तैयार की गई फौर्स है। JW ग्रोम फौर्स आधिकारिक तौर पर आतंकवादी धमकियों के जवाब में 13 जुलाई 1990 को सक्रिय हो गया था।

JW ग्रोम फौर्स पोलिश सशस्त्र बलों के पांच विशेष ऑपरेशन बलों में से एक है। वे खतरों और दुश्मन के इलाक़े में आतंकवाद विरोधी कार्रवाई और सत्ता के प्रक्षेपण सहित अपरंपरागत युद्ध की भूमिका निभाने के लिए प्रशिक्षित किया है।

GSG 9, जर्मनी

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GSG 9 जर्मन संघीय पुलिस, जर्मन आतंकवाद का मुकाबला करने और विशेष अभियान के लिए बनाई गई स्पेशल फौर्स है। आधिकारिक तौर पर जर्मन पुलिस के कुप्रबंधन के बाद 1973 में स्थापित किया गया था 11 इजरायली एथलीटों जो ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों के दौरान म्यूनिख में अपहरण कर लिए गए थे। उनको सफलतापूर्वक बचा लिया गया था। GSG 9 को बन्धक अपहरण, आतंकवाद और जबरन वसूली के मामलों में तैनात किया गया है। 1972 से 2003 तक वे कथित तौर पर 1500 से अधिक मिशन पुरे कर चुके हैं।

डेल्टा फोर्स, यूनाइटेड स्टेट्स

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1 स्पेशल परिचालन टुकड़ी डेल्टा (1 SFOD-D) लोकप्रिय डेल्टा फोर्स के रूप में जानी जाती है। आधिकारिक तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रचारित आतंकवादी घटनाओं के बाद 1997 में अनुमोदित किया गया था। यह सबसे अच्छा और अमेरिका के सबसे गुप्त बलों में से एक है।

SFOD-D के संस्थापक / सह-संस्थापक पूर्व SAS ऑपरेटिव का मानना था कि अमेरिका को SAS स्पेशल फौर्स की तरह ही एक स्पेशल फौर्स की जरूरत थी। डेल्टा फोर्स के प्राथमिक कार्य है, आतंकवाद का मुकाबला, सीधी कार्रवाई, और राष्ट्रीय हस्तक्षेप संचालन करना है ।

नेवी सील्स, यूनाइटेड स्टेट्स

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नेवी सील्स भी संयुक्त राज्य अमेरिका के सागर, वायु और भूमि टीमों के रूप में जाना जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका नौसेना की टुकड़ी में पुरुष सदस्य हैं और संयुक्त राज्य के सबसे संभ्रांत विशेष वारफेयर लड़ाकों में से एक है। नेवी सील्स और CIA ने मिल कर बहुत से आतंकवाद हमलों में कम किया है और उनमे वियतनाम युद्ध प्रमुख है।

SAS, यूनाइटेड किंगडम

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SAS(स्पेशल एयर सर्विस) फौर्स ब्रिटेन में सबसे बेस्ट फौर्स में से एक है। SAS द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1941 में स्थापित किया गया था और दुनिया भर के स्पेशल फौर्स के लिए एक मॉडल के रूप में जाना जाता है। यह 1947 में प्रादेशिक सेना के रूप में गठन किया गया और 21 वीं बटालियन, SAS रेजिमेंट नामित किया गया था।

नियमित रूप से सेना 22 SAS ने सफलतापूर्वक लंदन में ईरानी दूतावास पर हमला और 1980 ईरानी दूतावास घेराबंदी के दौरान बंधकों का बचाव के बाद दुनिया भर में प्रसिद्धि और मान्यता प्राप्त की। वर्तमान में एक नियमित रेजिमेंट और दो टेरीटोरियल रेजीमेंटों शामिल हैं। SAS फौर्स यह प्राथमिक कार्य शांतिपूर्ण और युद्ध के समय में विशेष अभियान में आतंकवाद का मुकाबला करना है।

मानवता को दर्शाती यह वीडियो!

 

यह वीडियो मानवता, दयालुता, आशा और प्रेरणा को दर्शाती है. इस वीडियो में दिखाया गया है कि लोग जब दूसरों की मदद करते हैं तो उनसे दुसरे लोग भी प्रेरित होते हैं और उनमें भी दयालुता और आशा की भावना आती है.

 

भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक होमी जहांगीर भाभा के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य

डॉ. होमी जहांगीर भाभा भारत के प्रमुख दूरदर्शी परमाणु भौतिक वैज्ञानिकों में से एक थे। होमी जे. भाभा ने परमाणु विज्ञान के क्षेत्र में एक शक्तिशाली भारत की कल्पना की थी। उन्होने मुट्ठी भर वैज्ञानिकों की सहायता से मार्च 1944 में नाभिकीय उर्जा पर अनुसन्धान आरम्भ किया।

उन्हें भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। उन्होंने देश के परमाणु कार्यक्रम के भावी स्वरूप की मजबूत नींव रखी जिसके चलते भारत आज विश्व के प्रमुख परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा है। उन्हें ‘आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन एटॉमिक एनर्जी प्रोग्राम’ भी कहा जाता है।

इस लेख में हम जानेगें होमी जे. भाभा के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य , तो चलिए जानते हैं।

facts about Homi Jahangir Bhabha

  • होमी ने अपनी स्कूली शिक्षा कैथेड्रल और जॉन कॉनन स्कूल, बॉम्बे में की थी। साल 1930 में होमी भाभा ने इंग्लैंड के कैम्ब्रिज से मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री और 1934 में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी। साल 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान होमी ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज, (IISc) बैंग्लोर में बतौर रीडर जॉइन किया था।
  • वह एक चित्रकार, शास्त्रीय संगीत और ओपेरा के प्रेमी होने के साथ-साथ कला और संस्कृति में बहुत रुचि रखते थे।
  • परमाणु अनुसंधान में जाने से पहले उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की।
  • उन्होंने नील्स बोह्र ( जोकि एक एक डेनिश भौतिक विज्ञानी थे) के साथ काम किया और क्वांटम सिद्धांत के विकास में एक प्रमुख भूमिका निभाई।
  • भाभा को मेसन कण की पहचान करने का श्रेय दिया जाता है।
  • वह 20 अगस्त 1955 में “परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग” पर आयोजित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के पहले अध्यक्ष थे।
  • वह 2 प्रमुख अनुसंधान संस्थानों “टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च” और “भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर” के संस्थापक, निर्माता और निदेशक थे।
  • वह चाहते थे कि परमाणु ऊर्जा का उपयोग गरीबी उन्मूलन के लिए किया जाए और उन्होंने दुनिया भर में परमाणु हथियारों को गैरकानूनी घोषित करने की वकालत की।
  • 1954 में, उन्हें परमाणु विज्ञान में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने 1942 में एडम्स पुरस्कार भी जीता था और रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो से सम्मानित हुए। रॉयल सोसाइटी के फ़ेलोशिप पुरस्कार उन व्यक्तियों को दिया जाता है, जिन्होंने ” गणित , इंजीनियरिंग विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान सहित प्राकृतिक ज्ञान के सुधार में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो।
  • उन्होंने ब्रह्मांडीय विकिरण को बेहतर ढंग से समझने के लिए कैस्केड सिद्धांत विकसित करने के लिए जर्मन भौतिक विज्ञानी वाल्टर हेइटलर के साथ काम किया।
  • वह अपने काम के प्रति इतने जुनूनी थे कि वह जीवन भर कुंवारे रहे और अपना सारा समय विज्ञान को समर्पित कर दिया।
  • वह मालाबार हिल्स में मेहरानगीर नाम के एक विशाल औपनिवेशिक बंगले में रहते थे।
  • 24 जनवरी 1996 को माउंट ब्लैंक के पास एक रहस्यमय हवाई दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।
  • होमी भाभा की मृत्यु से ठीक 14 दिन पहले भारत के पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री की भी ताशकंद में रहस्यमय मौत हो गई थी।

जानिए किसने डिज़ाइन किया था भारतीय सम्मान “परमवीर चक्र”

परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च शौर्य सैन्य अलंकरण (गहना) है जो वीरता और बलिदान के लिए दिया जाता है। ज्यादातर स्थितियों में यह सम्मान मरणोपरांत दिया गया है।

इस पुरस्कार की स्थापना 26 जनवरी 1950 को की गयी थी जब भारत गणराज्य घोषित हुआ था। भारतीय सेना के किसी भी अंग के अधिकारी या कर्मचारी इस पुरस्कार के पात्र होते हैं एवं इसे देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न के बाद सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार समझा जाता है।

अब तक भारत में कुल 21 वीर योद्धाओं को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका डिजाइन किसने तैयार किया था? अगर नहीं जानते तो चलिए जानते हैं इस लेख के माध्यम से:-

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि देश के इस सर्वोच्च सैन्य सम्मान का डिजाइन एक विदेशी महिला ने तैयार किया था। उस महिला का नाम इवा योन्ने लिंडा था और वह स्विट्जरलैंड की रहने वाली थी। इनका जन्म 20 जुलाई 1913 को हुआ था उनकी मां रूसी और पिता हंगरी थे।

उनके पिता पेशे से लाइब्रेरियन थे इसलिए बचपन से ही उन्हें कई किताबें पढ़ने को मिलती रहीं। किताबों के जरिए ही उन्होंने भारतीय सभ्यता को जाना।

1929 में इवा की मुलाकात विक्रम रामजी खानोलकर से हुई। विक्रम इंडियन आर्मी कैडेट के सदस्य थे। वे ब्रिटेन के सेंडहर्स्ट में रॉयल मिलिट्री अकेडमी में ट्रेनिंग के लिए गए थे।

इवा रामजी से शादी करना चाहती थीं लेकिन उनके पिता इस बात के लिए राजी नहीं हुए। लेकिन कुछ सालों बाद इवा भारत आ गईं और 1932 में दोनों ने लखनऊ में मराठी रीति रिवाज के साथ शादी कर ली।

हिंदू धर्म अपनाने के बाद उन्होंने अपना नाम भी बदलकर सावित्री बाई खानोलकर कर लिया। पूरी तरह से इंडियन कल्चर में ढल चुकी सावित्री ने अपना पहनावा भी बदल लिया।

उन्होंने हिंदी, मराठी और संस्कृत भाषा भी सीखी। कुछ समय बाद प्रमोशन पाकर कैप्‍टन विक्रम मेजर बन गए और उनकी पोस्टिंग पटना में हो गई।

बस यहीं से सावित्री देवी की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। यहां उन्होंने पटना विश्‍वविद्यालय में दाखिला लिया और संस्कृत नाटक, वेद, और उपनिषद की शिक्षा ली।

स्वामी रामकृष्ण मिशन का हिस्सा बनकर वह सतसंग, संगीत और नृत्‍य में निपुण हो गई। तभी उनकी मुलाकात मशहूर उस्ताद पंडित उदय शंकर से हुई और वह उनकी शिष्‍या बन गईं।

इसी दौरान उन्‍होंने ‘सेंट्स ऑफ़ महाराष्ट्र‘ और ‘संस्कृत डिक्शनरी ऑफ़ नेम्स‘ नामक दो किताबें भी लिखी जोकि काफी फेमस हुई।

ऐसे मिला परमवीर च्रक डिजाइन करने का मौका

1947 में सरकार द्वारा भारत-पाक युद्ध में साहस दिखाने वाले वीरों को सम्‍मानित करने के लिए नए पदक पर काम चल रहा था, जिसकी जिम्मेदारी मेजर जनरल हीरा लाल अट्टल को सौंपी गई थी।

उन्होंने इस काम के लिए सावित्री बाई को चुना क्योंकि वो उन्हें ज्ञान का भंडार मानते थे और साथ ही वो एक अच्छी पेंटरआर्टिस्ट भी थीं।

बहुत मेहनत के बाद उन्होंने अट्टल जी को डिजाइन्स भेजा। इस डिजाइन को उसी समय स्वीकार कर लिया गया। डिजाइन पास होने के बाद उसे रंग-रूप दिया गया।

26 जनवरी 1950 को भारत के पहले गणतंत्र दिवस पर सैनानियों को इससे सम्मानित किया गया। सावित्री बाई द्वारा डिजाइन किया गया परमवीर चक्र सबसे पहले मेजर सोमनाथ शर्मा को प्रदान किया गया था।

कई भारतीय सम्मान किए डिजाइन

परमवीर चक्र को बैंगनी रंग की रिबन की पट्टी 3.5 सेमी व्‍यास वाले कांस्‍य धातु की गोलाकार कृति बनाई, जिसके चारों तरफ वज्र के 4 चिह्न, बीच में अशोक की लाट से लिए गए राष्‍ट्र चिह्न, दूसरी ओर कमल का चिह्न जिसमें हिंदी-अंग्रेजी में परमवीर चक्र लिखा गया था।

उसके बाद सावित्री ने महावीर चक्र, वीर चक्र और अशोक चक्र की डिजाइन भी तैयार किया। विक्रम के इस दुनिया से चले जाने के बाद सावित्री ने अपना जीवन समाज सेवा को समर्पित कर दिया।

1990 में उनकी मृत्यु के समय तक वे रामकृष्ण मिशन का हिस्सा रहीं।

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अयोध्या के 5 प्रसिद्ध मंदिर, यदि घूमने जा रहे हैं तो इन मंदिरों में भी टेकें माथा!

अयोध्या भगवान राम का जन्मस्थान है। त्रेता युग ले लेकर अब तक अयोध्या अपनी ऐतिहासिक और पौराणिक कहानियों, सुंदर मंदिरों, हिंदू महाकाव्य रामायण और विष्णु से जुड़ी किंवदंतियों के लिए प्रसिद्ध है। आध्यात्मिक महत्व का शहर होने के नाते, अयोध्या में घूमने के लिए बहुत सारे सुंदर और प्रसिद्ध मंदिर हैं जो शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने में अपना योगदान देते हैं।

यदि आप अयोध्या घूमने का मन बना रहे हैं तो इन मंदिरों को अपने टूर प्रोग्राम का हिस्सा बना सकते हैं।  तो आईये जानते हैं इन प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में जो अयोध्या आने पर आपके स्वागत के लिए तैयार हैं।

राम मंदिर अयोध्या

हिन्दू मान्यता के अनुसार त्रेता युग में भगवान विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम के रूप ने अयोध्या में राजा दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लिया। श्रीराम अपना बचपन अयोध्या में सरयू नदी के पास बिताया था। भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरूषोतम भी कहा जाता है जिनके राज में बाघ और बकरी एक घाट पर पानी पीते थे। इसके मतलब यह भी है कि हर कोई अपनी मर्यादा में रहता था क्योंकि भगवान राम स्वयं मर्यादा पुरूषोतम थे जिन्होंने अपने पिता के वचन के लिए १४ वर्ष वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया। वहीं पत्नी सीता को इसलिए त्याग दिया क्योंकि अयोध्या के एक आम नागरिक ने देवी सीता के चरित्र पर उँगली उठाई थी।

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राम जन्मभूमि स्थल 500 सालों तक विवादों में रहा। माना जाता है मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बाँकी ने सन १५२८ में तत्कालीन राम मंदिर को ध्वस्त करके वहाँ पर बाबरी मस्जिद का निर्माण करवा दिया था।  तब से लेकर विभिन्न हिंदू और राष्ट्रवादी संगठनों ने राम मंदिर को पुन: स्थापित करने के लिए दशकों तक संघर्ष किया। अंतत: अक्टूबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर बनाने के लिए जमीन को ट्रस्ट को सौंपने का आदेश दिया।

२२ जनवरी २०२४ को भव्य राम मंदिर में भगवान राम के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही यह मंदिर आगंतुको के लिए खुल गया। निर्माण की नागर शैली मैं बना यह मंदिर अपने आप में अनूठा है जिसकी विश्व भर में कोई मिसाल नहीं है। माना जा रहा है कि आस्था प्रेरित पर्यटन के लिहाज़ से यह मंदिर विश्व में नम्बर एक स्थान पर क़ाबिज़ होने वाला है, इसमें जरा भी संदेह नहीं है।

हनुमान गढ़ी

हनुमान गढ़ी, 10वीं शताब्दी में बना एक मंदिर है और साईं नगर के पास स्थित है। यह मंदिर भगवान हनुमान जी को समर्पित है। अयोध्या में राम मंदिर जाने से पहले हनुमान गढ़ी जाना आम बात है, जो इसे शहर के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक बनाता है। किंवदंती के अनुसार, भगवान हनुमान मंदिर के मैदान में रहते थे और दूर से अयोध्या पर नजर रखते थे।

Hanumangarhi temple ayodhya

पहाड़ी पर स्थित मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार तक 76 सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। मंदिर परिसर की एक आंतरिक गुफा में भगवान हनुमान और उनकी मां अंजनी की अनगिनत मूर्तियां हैं। हर साल, सैकड़ों भक्त भगवान हनुमान और भगवान राम के जन्म का जश्न मनाने के लिए हनुमान गढ़ी जाते हैं।

नागेश्वरनाथ मंदिर

अयोध्या में नागेश्वरनाथ मंदिर थेरी बाज़ार के ठीक बगल में है। यह मंदिर क्षेत्र के संरक्षक देवता भगवान नागेश्वरनाथ को समर्पित है।

Nageshwarnath Temple

पौराणिक कथा के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण भगवान राम के छोटे बेटे कुश ने करवाया था, जो महाकाव्य रामायण के एक महत्वपूर्ण पात्र थे।

एक बार कुशा ने सरयू नदी में स्नान करते समय अपना ताबीज खो दिया और उसे खोजने की बहुत कोशिश की लेकिन उसके सभी प्रयास विफल रहे।

लेकिन वह ताबीज वास्तव में एक नाग कन्या ने उठाया था जो उस पर मोहित हो गई थी। जब उसने युवा योद्धा को ताबीज लौटाया, तो उसने उसकी सराहना और प्रशंसा जीत ली। क्योंकि नाग कन्या भगवान शिव की प्रबल अनुयायी थी, कुश ने उसकी याद में अयोध्या में नागेश्वर मंदिर बनवाया था।

कनक भवन मंदिर

कनक भवन अयोध्या में राम जन्मभूमि, रामकोट के उत्तर-पूर्व में है। कनक भवन अयोध्या के सबसे बेहतरीन और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि यह भवन भगवान श्री राम से विवाह के तुरंत बाद रानी कैकेयी ने देवी सीता को उपहार में दिया था।

कनक भवन मंदिर अब भगवान राम और सीता के भक्तों के लिए सबसे अच्छे आकर्षणों में से एक है। यह स्थान भक्तों के बीच काफी प्रसिद्ध है। इस मंदिर में हर महीने भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

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सुमतिनाथ मंदिर

अयोध्या को न केवल हिंदू बल्कि जैन समुदाय भी तीर्थ के रूप में मानता है। यह मंदिर प्रसिद्ध जैन तीर्थक सुमतिनाथ को समर्पित है। सुमतिनाथ वर्तमान युग (अवसर्पिणी) के पांचवें जैन तीर्थंकर थे। कहा जाता है कि फैजाबाद के नवाब के कोषाध्यक्ष केसरी सिंह ने यहां कुछ जैन तीर्थंकरों के जन्मस्थान की स्मृति में इस मंदिर का निर्माण कराया था। यह जैन समुदाय के लिए अयोध्या में घूमने के लिए सबसे पवित्र स्थानों में से एक है।

 

Sumatinath Temple

राम की पैड़ी

राम की पैड़ी सरयू नदी के तट पर घाटों की एक श्रृंखला है। नदी का किनारा विशेष रूप से रोशनी वाली रात में एक उत्कृष्ट परिदृश्य प्रस्तुत करता है। ऐसा कहा जाता है कि ये भक्तों के लिए मंच के रूप में काम करते हैं, जो नदी में डुबकी लगाकर अपने पाप धोने आते हैं।

भारत की शान राष्ट्रीय ध्वज, जाने कैसे करें इसका सम्मान

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हमारे देश के मान और गौरव का प्रतीक है तिरंगा। क्या आप जानते हैं कि तिरंगे को किसने तैयार किया था और किस बात को लेकर राष्ट्रपिता को तिरंगे के डिजाइन से नाराजगी थी।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को इसके वर्तमान स्वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया था।

हमारे लिए तिरंगा बेहद महत्वपूर्ण और गौरव का विषय है। इस नाम के पीछे की वजह इसमें इस्तेमाल होने वाले तीन रंग हैं केसरिया, सफ़ेद और हरा। इसके मौजूदा स्वरूप का विकास भी कई पड़ावों में हुआ है।

अभी जो तिरंगा फहराया जाता है उसे 22 जुलाई 1947 को अपनाया गया था। तिरंगे को आंध्रप्रदेश के पिंगली वेंकैया ने बनाया था। इनकी मौत सन् 1963 में गुमनामी में हुई थी। मौत के 46 साल बाद डाक टिकट जारी करके इनको सम्मान दिया गया था।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि तिरंगे को फहराने के कुछ नियम भी हैं। जैसे किसी मंच पर तिरंगा फहराते समय जब बोलने वाले का मुंह श्रोताओं की तरफ हो तब तिरंगा हमेशा उसके दाहिने तरफ होना चाहिए।

तिरंगे से जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्य:-

  1. संसद भवन देश का एकमात्र ऐसा भवन हैं जिस पर एक साथ 3 तिरंगे फहराए जाते हैं।
  2. रांची का पहाड़ी मंदिर भारत का अकेला ऐसा मंदिर है जहां तिरंगा फहराया जाता है। 493 मीटर की ऊंचाई पर देश का सबसे ऊँचा झंडा भी रांची में फहराया गया है।
  3. देश में ‘फ्लैग कोड ऑफ इंडिया‘ (भारतीय ध्वज संहिता) नाम का एक कानून है, जिसमें तिरंगे को फहराने के नियम निर्धारित किए गए हैं। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को जेल भी हो सकती है।
  4. तिरंगा हमेशा कॉटन, सिल्क या फिर खादी का ही होना चाहिए। प्लास्टिक का झंडा बनाने की मनाही है ।
  5. तिरंगे का निर्माण हमेशा रेक्टंगल शेप में ही होगा, जिसका अनुपात 3:2 तय है। वहीं जबकि अशोक चक्र का कोई माप तय नही हैं सिर्फ इसमें 24 तिल्लियां होनी आवश्यक हैं।
  6. सबसे पहले लाल, पीले व हरे रंग की हॉरिजॉन्टल पट्टियों पर बने झंडे को 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क), कोलकाता में फहराया गया था।
  7. झंडे पर कुछ भी बनाना या लिखना गैरकानूनी है।
  8. किसी भी गाड़ी के पीछे, बोट या प्लेन में तिरंगा नहीं लगाया जा सकता और न ही इसका प्रयोग किसी बिल्डिंग को ढकने किया जा सकता है।
  9. किसी भी स्थिति में तिरंगा जमीन पर टच नहीं होना चाहिए। यह इसका अपमान होता है।
  10. तिरंगे को किसी भी प्रकार के यूनिफॉर्म या सजावट में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता।
  11. भारत में बेंगलुरू से 420 किमी स्थित हुबली एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान हैं जो झंडा बनाने का और सप्लाई करने का काम करता है।
  12. किसी भी दूसरे झंडे को राष्ट्रीय झंडे से ऊंचा या ऊपर नहीं लगा सकते और न ही बराबर रख सकते हैं।
  13. 29 मई 1953 में भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा सबसे ऊंची पर्वत की चोटी माउंट एवरेस्ट पर यूनियन जैक तथा नेपाली राष्ट्रीय ध्वज के साथ फहराता नज़र आया था। इस समय शेरपा तेनजिंग और एडमंड माउंट हिलेरी ने एवरेस्ट फतह की थी।
  14. आम नागरिकों को अपने घरों या ऑफिस में आम दिनों में भी तिरंगा फहराने की अनुमति 22 दिसंबर 2002 के बाद मिली।
  15. तिरंगे को रात में फहराने की अनुमति सन् 2009 में दी गई।
  16. पूरे भारत में 21 x 14 फीट के झंडे केवल तीन जगह पर ही फहराए जाते हैं। कर्नाटक का नारगुंड किला, महाराष्ट्र का पनहाला किला और मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में स्थित किला।
  17. राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय में एक ऐसा लघु तिरंगा हैं, जिसे सोने के स्तंभ पर हीरे-जवाहरातों से जड़ कर बनाया गया है।
  18. भारत के संविधान के अनुसार जब किसी राष्ट्र विभूति का निधन होने और राष्ट्रीय शोक घोषित होने पर कुछ समय के लिए ध्वज को झुका दिया जाता है। लेकिन सिर्फ उसी भवन का तिरंगा झुकाया जाता है जिस भवन में उस विभूति का पार्थिव शरीर रखा है। जैसे ही पार्थिव शरीर को भवन से बाहर निकाला जाता है, वैसे ही ध्वज को पूरी ऊंचाई तक फहरा दिया जाता है।
  19. देश के लिए जान देने वाले शहीदों और देश की महान शख्सियतों को तिरंगे में लपेटा जाता है। इस दौरान केसरिया पट्टी सिर की तरफ और हरी पट्टी पैरों की तरफ होनी चाहिए। शव को जलाने या दफनाने के बाद उसे गोपनीय तरीके से सम्मान के साथ जला दिया जाता है या फिर वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती हैं।
  20. कटे-फटे या रंग उड़े हुए तिरंगे को भी सम्मान के साथ जला दिया जाता है या फिर वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती है।

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अयोध्या राम मंदिर से जुड़े कुछ अद्भुत तथ्य

भगवान श्री राम को समर्पित अयोध्या राम मंदिर एक हिंदू मंदिर है जिसका निर्माण उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम जन्मभूमि (भगवान श्री राम की जन्मस्थली) पर किया गया है।

मंदिर का उद्घाटन 22 जनवरी, 2024 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था जिसमें दुनिया भर से लाखों भक्त शमिल हुए थे। यह मंदिर भगवान राम से जुड़ी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को दर्शाता है। यह मंदिर हिंदुओं के लिए बहुत महत्व रखता है।

इस लेख में हम आपको अयोध्या राम मंदिर से जुड़े कुछ अद्भुत तथ्य बताने जा रहे हैं, चलिए शुरू करते हैं।

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मंदिर का डिजाइन

मंदिर के मुख्य वास्तुकार चंद्रकांत बी. सोमपुरा (सीबीएस) हैं, जो गुजरात के मंदिर वास्तुकारों के परिवार से हैं। सोमपुरा परिवार ने भारत और विदेशों में 200 से अधिक मंदिरों का डिजाइन और निर्माण किया है, जिनमें दिल्ली और गांधीनगर में अक्षरधाम मंदिर, लंदन में स्वामीनारायण मंदिर और गुजरात में सोमनाथ मंदिर शामिल हैं। सीबीएस ने मंदिर को नागर शैली में डिजाइन किया है, जिसकी विशेषता गर्भगृह के ऊपर एक केंद्रीय टावर (शिखर) और मंडपों (हॉल) के ऊपर सहायक टावर हैं।

मंदिर का निर्माण

मंदिर का निर्माण उच्च गुणवत्ता वाली सामग्रियों का उपयोग करके किया गया है जो हजारों वर्षों तक टिके रहेंगे। मंदिर की नींव 14 मीटर मोटी रोल्ड कॉम्पैक्ट कंक्रीट से बनी है, जिसमें फ्लाई ऐश धूल और रसायनों से बने कॉम्पैक्ट कंक्रीट की 56 परतें शामिल हैं। मंदिर का चबूतरा कर्नाटक और तेलंगाना के ग्रेनाइट पत्थर से बना है, और दीवारें और खंभे राजस्थान के बांस पहाड़पुर के गुलाबी बलुआ पत्थर से बने हैं। मंदिर के दरवाजे सागौन की लकड़ी से बने हैं और उन पर सोना चढ़ाया गया है।

भारत का सबसे बड़ा मंदिर

मंदिर परिसर 70 एकड़ भूमि में फैला है, जिसे 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को आवंटित किया गया था। मुख्य मंदिर 2.77 एकड़ भूमि पर है, और इसकी लंबाई 380 फीट, 250 फीट चौड़ाई  और ऊंचाई 161 फीट है। मंदिर तीन मंजिलों वाला है, जिसमें कुल 392 खंभे और 44 दरवाजे हैं।

मंदिर में पांच मंडप भी हैं, अर्थात् नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना मंडप और कीर्तन मंडप। मंदिर परिसर में एक संग्रहालय, एक पुस्तकालय, एक अनुसंधान केंद्र, एक फूड कोर्ट, एक गेस्ट हाउस और एक राम कथा गैलरी भी शामिल है।

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थाईलैंड प्रतिरूप

अयोध्या के राम मंदिर के जैसा थाईलैंड में भी एक ऐसा मंदिर है, जिसे राजा भूमिबोल अदुल्यादेज की दूसरी बेटी राजकुमारी महा चक्री सिरिंधोर्न ने बनवाया था। वह भगवान राम की परम भक्त थी। 2003 में उन्होंने अयोध्या का दौरा किया था जहाँ वह रामायण से प्रेरित हुईं और उन्होंने अपने देश में राम मंदिर की तरह मंदिर बनाने का फैसला किया और इसका नाम धम्मकाया मंदिर रखा। यह मंदिर बैंकॉक के पास पथुम थानी प्रांत में स्थित है और 320 एकड़ क्षेत्र में फैला है। इस मंदिर का डिज़ाइन और संरचना अयोध्या के राम मंदिर के समान है। इसमें भगवान राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियाँ भी हैं।

मंदिर में जमीन से 2000 फीट नीचे दबा हुआ है टाइम कैप्सूल

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मंदिर की एक विशेष विशेषता यह है कि यहां एक टाइम कैप्सूल है जो मुख्य मंदिर की जमीन से 2000 फीट नीचे दबा हुआ है। टाइम कैप्सूल एक धातु का सिलेंडर है, जिसमें अयोध्या के इतिहास और भगवान राम के जन्मस्थान के साक्ष्य के बारे में संस्कृत में एक संदेश लिखा है।

संदेश चौपाल संस्कृत में लिखा गया है। यह संस्कृत का संक्षिप्त रूप है जो लंबे वाक्यों को कुछ शब्दों में व्यक्त कर सकता है। टाइम कैप्सूल का उद्देश्य भगवान राम के अस्तित्व और अयोध्या से उनके संबंध के प्रमाण को संरक्षित करना है, ताकि हजारों वर्षों के बाद भी कोई विवाद उत्पन्न न हो।

मंदिर में है राम रसोई

मंदिर परिसर में एक राम रसोई भी है, जो एक सामुदायिक रसोई है। यह आगंतुकों और जरूरतमंदों को मुफ्त भोजन परोसेगी। राम रसोई में एक समय में 10,000 लोगों को खाना खिलाने की क्षमता होगी और यह चौबीसों घंटे काम करेगी।

भोजन, सौर ऊर्जा और बायोगैस का उपयोग करके स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से तैयार किया जाएगा। भोजन शाकाहारी होगा और इसमें पूड़ी, सब्जी, दाल, चावल, खीर और हलवा जैसे व्यंजन शामिल होंगे। राम रसोई आसपास के गांवों और झुग्गियों में भोजन के पैकेट भी वितरित करेगी।

मंदिर परिसर में शहीदों के लिए स्मारक

मंदिर परिसर में उन शहीदों के लिए एक स्मारक बनाया गया है जिन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था। यह बाबरी मस्जिद से भगवान राम के जन्मस्थान को पुनः प्राप्त करने का अभियान था, जो 16 वीं शताब्दी में मुगल सम्राट बाबर द्वारा बनाई गई मस्जिद थी।

इस स्मारक में एक प्रसिद्धि दीवार है, जिस पर शहीदों के नाम और तस्वीरों के साथ-साथ उनकी कहानियां भी प्रदर्शित की गई हैं। यह स्मारक उन शहीदों के लिए श्रद्धांजलि और कृतज्ञता का स्थान होगा, जिन्होंने राम मंदिर के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। स्मारक में भगवान हनुमान की एक मूर्ति भी होगी, जिन्हें भक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता है।

मंदिर के समारोह में शामिल हुए अद्वितीय तत्व

मंदिर का 22 जनवरी, 2024 को एक भव्य उद्घाटन समारोह हुआ था, जिसमें कुछ अद्वितीय तत्व शामिल थे जिसमें दुनिया भर से 155 पवित्र नदियों का जल एकत्रित किया गया था, जिसका उपयोग भगवान राम के जलाभिषेक के लिए किया गया।

समारोह में भारत और विदेश के 2000 तीर्थ स्थलों की मिट्टी भी शामिल की गई थी, जिसका उपयोग मंदिर के भूमि पूजन के लिए किया गया था।

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अरुण योगीराज जिन्होंने रामलला की मूर्ति बनाई है

अष्टधातु से बनी है राम की मूर्ति

भगवान राम की मूर्ति आठ धातुओं सोना, चांदी, तांबा, जस्ता, सीसा, टिन, लोहा और पारा से बनाई गई है। इन धातुओं को सामूहिक रूप से अष्टधातु के रूप में जाना जाता है और इनमें दैवीय गुण माने जाते हैं।

राम की मूर्ति का वजन 2100 किलोग्राम होगा और इसे कीमती पत्थरों और रत्नों से सजाया गया है। भगवान राम की यह मूर्ति में अरुण योगीराज द्वारा बनाई गई है।

ज्योतिषीय नक्षत्रों पर आधारित है मंदिर

मंदिर परिसर में एक अनोखा उद्यान है, जो वैदिक ज्योतिष की अवधारणा पर आधारित है। बगीचे में 27 प्रकार के पौधे हैं, जो प्रत्येक 27 नक्षत्रों में से एक का प्रतिनिधित्व करेगा, जो हिंदू ज्योतिष में चंद्र नक्षत्र हैं। पौधों को गोलाकार पैटर्न में व्यवस्थित किया गया है, जिसके बीच में एक फव्वारा है।

बगीचे में एक धूपघड़ी भी है, जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार समय और तारीख बताएगी। यह उद्यान आगंतुकों के लिए ध्यान और सीखने का स्थान होगा, जो अपने नक्षत्र और उसके महत्व को जान सकेंगे।