अबू धाबी में बनने जा रहा ” पहला हिन्दू मंदिर” जाने कुछ खास बातें

संयुक्त अरब अमीरात अबू धाबी में पहला हिंदू मंदिर उद्घाटन के लिए तैयार है। यह मंदिर एक पारंपरिक हिंदू पूजा स्थल है जिसे संयुक्त अरब अमीरात के अबू धाबी में बीएपीएस स्वामीनारायण संस्था द्वारा बनाया जा रहा है ।

यह मंदिर संयुक्त अरब अमीरात में सांस्कृतिक विविधता और सहिष्णुता का प्रतीक है, साथ ही भारत और यूएई के बीच गहरे संबंधों को भी दिखाता है। 14 फरवरी को पीएम मोदी इस मंदिर का उद्घाटन करेंगे। दोनों देशों में मौजूद हिंदू समुदाय के लिए यह मंदिर बेहद महत्व रखता है।

बीएपीएस मंदिर सहयोग, विश्वास और विविधता में एकता की शक्ति का एक प्रमाण है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत के रूप में कार्य करेगा। पश्चिम एशिया का यह सबसे बड़ा मंदिर होगा। यह पूरी तरह से पत्थर का बना है।

इस लेख में हम जानेगें इस मंदिर से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में, तो चलिए शुरू करते हैं।

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  • इस मंदिर की ऊंचाई 108 फीट, लंबाई 262 फीट और चौड़ाई 180 फीट है। मंदिर अबू धाबी में ‘अल वाकबा‘ नाम की जगह पर 27 एकड़ जमीन पर बनाया गया है, हाइवे से सटा अल वाकबा अबू धाबी से तकरीबन 30 मिनट की दूरी पर है।
  • मंदिर में नक्काशी के माध्यम से प्रामाणिक प्राचीन कला और वास्तुकला को पुनर्जीवित किया गया है। ऐतिहासिक मंदिर का काम समुदाय के समर्थन, भारत और यूएई के नेतृत्व से आगे बढ़ रहा है।
  • मंदिर में स्वामी नारायण, अक्षर पुरुषोत्तम, राधा-कृष्ण, राम-सीता, लक्ष्मण, हनुमान, शिव-पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, पद्मावती- वेंकटेश्वर, जगन्नाथ और अयप्पा की मूर्तियां होंगी।
  • यह पश्चिम एशिया का सबसे बड़ा मंदिर होगा जिसमें 10,000 लोगों की क्षमता होगी। इसकी अन्य वास्तुशिल्प विशेषताओं में शामिल हैं दो घुमट (गुम्बद), सात शिखर (संयुक्त अरब अमीरात में सात अमीरात के प्रतीक), 12 समरन और 402 स्तम्भ इसमें बलुआ पत्थर की इमारत की पृष्ठभूमि में संगमरमर की नक्काशी की गई है।
  • मंदिर भारत में कुशल कारीगरों द्वारा तराशे गए 25,000 से अधिक पत्थरों से बना है। प्रत्येक शिखर के भीतर रामायण, शिव पुराण, भागवतम, महाभारत की कहानियों और जगन्नाथ, स्वामीनारायण, वेंकटेश्वर के जीवन को चित्रित करने वाली नक्काशी है।
  • डोम ऑफ हार्मनी पांच प्राकृतिक तत्वों- पृथ्वी, जल,अग्नि, वायु और अंतरिक्ष को प्रदर्शित करता है। यहां घोड़ों और ऊंट जैसे जानवरों की नक्काशी भी है, जो संयुक्त अरब अमीरात का प्रतिनिधित्व करती है।
  • भारतीय दूतावास के आंकड़ों के मुताबिक, यूएई में तकरीबन 26 लाख भारतीय रहते हैं, जो वहां की आबादी का लगभग 30% हिस्सा है।
  • यूएई सरकार ने अबू धाबी में मंदिर बनाने के लिए 20,000 वर्ग मीटर जमीन दी थी। यूएई सरकार ने साल 2015 में उस वक्त ऐलान किया था, जब प्रधानमंत्री मोदी दो दिवसीय दौरे पर वहां गए थे। पीएम नरेंद्र मोदी ने 2018 में दुबई के दौरे पर वहां के ओपेरा हाउस से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था ने मंदिर की आधारशिला रखी थी।

वसंत पंचमी 2024 : जाने माँ सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि

वसंत पंचमी को ‘सरस्वती पंचमी’ या ‘श्री पंचमी’ के नाम से भी जाना जाता है। यह त्यौहार मुख्य रूप से ज्ञान, विद्या, संगीत और कला की देवी मां सरस्वती को समर्पित है।

इस दिन माँ सरस्वती का जन्म हुआ था। मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती हाथों में पुस्तक, विणा और माला लिए श्वेत कमल पर विराजमान हो कर प्रकट हुई थीं, इसलिए इस दिन माँ सरस्वती की विषेश पूजा-अर्चना की जाती है।

यह त्यौहार भारतीय धर्मों में क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। वसंत पंचमी हिंदू कैलेंडर के ‘माघ’ महीने में शुक्ल पक्ष की ‘पंचमी’ (पांचवें दिन) को मनाई जाती है, जो अंग्रेजी कैलेंडर में जनवरी-फरवरी के महीने में आती है। यह भारत में वसंत ऋतु की शुरुआत का प्रतीक है। वसंत पंचमी को होली की तैयारी की शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है, जो चालीस दिन बाद होती है।

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वसंत पंचमी 2024 की तिथि

पंचांग के अनुसार माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि की शुरुआत 13 फरवरी को दोपहर 02 बजकर 41 मिनट से हो रही है। अगले दिन 14 फरवरी को दोपहर 12 बजकर 09 मिनट पर इसका समापन होगा। उदया तिथि 14 जनवरी को है, इसलिए इस साल वसंत पंचमी का पर्व 14 फरवरी को मनाया जाएगा।

14 फरवरी को वसंत पंचमी वाले दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 1 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा। ऐसे में इस दिन पूजा के लिए करीब 5 घंटे 35 मिनट तक का समय है।

वसंत पंचमी का महत्व

वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन किया जाता है। इस दिन मां सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सरस्वती स्तोत्रम् का पाठ करना चाहिए। इस दिन सभी स्कूल-कॉलेज में मां सरस्वती की पूजा की जाती है। वसंत पंचमी को पीले वस्त्र पहनने और दान करने का काफी महत्व माना जाता है।

मान्यता है कि इस दिन सरस्वती मां की पूजा करने से ज्ञान और बुद्धि का आशीर्वाद मिलता है। कई जगह वसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती के साथ साथ विष्णु भगवान की पूजा भी की जाती है। इस दिन मां सरस्वती को खिचड़ी और पीले चावल का भोग लगाया जाता है।

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वसंत पंचमी की पूजा विधि

  • वसंत पंचमी के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर पीले या सफेद रंग का वस्त्र पहनें। उसके बाद सरस्वती पूजा का संकल्प लें।
  • पूजा स्थान पर माँ सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। माँ सरस्वती को गंगाजल से स्नान कराएं। फिर उन्हें पीले वस्त्र पहनाएं।
  • इसके बाद पीले फूल, अक्षत, सफेद चंदन या पीले रंग की रोली, पीला गुलाल, धूप, दीप, गंध आदि अर्पित करें।
  • इस दिन सरस्वती माता को गेंदे के फूल की माला पहनाएं। साथ ही पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं।
  • इसके बाद सरस्वती वंदना एवं मंत्र से माँ सरस्वती की पूजा करें।
  • आप चाहें तो पूजा के समय सरस्वती कवच का पाठ भी कर सकते हैं।
  • आखिर में हवन कुंड बनाकर हवन सामग्री तैयार कर लें और ‘ओम श्री सरस्वत्यै नमः स्वहा” मंत्र की एक माला का जाप करते हुए हवन करें।
  • फिर अंत में खड़े होकर माँ सरस्वती की आरती करें।

तिब्बती नव-वर्ष के त्यौहार “लोसर” से जुड़े कुछ रोचक तथ्य और जानकारी

“लोसर” (लोसार, Tibetan: ལོ་སར་ English: Losar) तिब्बत, नेपाल और भूटान का सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध त्यौहार है। यह त्यौहार भारत के असम और सिक्किम राज्यों में भी मनाया जाता है। लोसर तिब्बती भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है – नया वर्ष ( लो = नया, सर = वर्ष ; युग) यानी लोसर मतलब नया साल।

लोसर त्यौहार चंद्र-सौर तिब्बती कैलेंडर के पहले दिन से शुरू होता है जो ग्रेगोरियन कैलेंडर में फरवरी या मार्च की तारीख से मेल खाता है। इस वर्ष यह त्यौहार 10 फरवरी से शुरू हो रहा है। तिब्बती लोग इस त्यौहार को नए साल के साथ साथ फसल के मौसम की शुरुआत के रूप में भी मनाते हैं।

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लोसर का इतिहास और महत्व

लोसर का उत्सव बौद्ध-पूर्व काल से चला आ रहा है जब तिब्बती लोग बॉन धर्म का पालन करते थे। उस समय हर सर्दियों में एक आध्यात्मिक समारोह आयोजित किया जाता था जिसमें स्थानीय देवताओं और आत्माओं को धूप जलाने की परंपरा थी। इस विश्वास के साथ कि वे लोगों की भलाई और रक्षा करेंगे। इस प्रकार यह धार्मिक त्यौहार किसानों का त्यौहार बन गया जो खुबानी के पेड़ों पर फूल खिलने के दौरान मनाया जाने लगा।

9वें तिब्बती राजा, पुडे गुंग्याल के शासनकाल के दौरान, एक बुजुर्ग महिला ने लोगों को चंद्रमा के विभिन्न चरणों के आधार पर समय की गणना करना सिखाया। चंद्र कैलेंडर की स्थापना के बाद ही किसानों ने इस त्यौहार को लोसर के रूप में मनाना शुरू किया।

पूरे भारत में लोसर का त्यौहार

लोसर 3 दिवसीय त्यौहार है लेकिन आम तौर पर यह उत्सव 15 दिनों तक चलता है जिसमें तिब्बती समुदाय के लोग अपने घरों को अच्छी तरह से साफ करते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और अपने भगवान को ताजा पका हुआ भोजन चढ़ाते हैं। मुख्य उत्सव पहले तीन दिनों तक होता है।

पहला दिन: लामा लोसर

पहले दिन, लोग अपने घरों की साफ सफाई करते हैं और उन्हें सजाते हैं। इस दिन प्रसिद्ध गुथुक सूप और चांगकोई नामक बीयर तैयार की जाती है। यह पारंपरिक तिब्बती नूडल सूप, थुकपा भटुक का एक रूप है, जो छोटे भातसा नूडल्स से बनाया जाता है। सूप नौ सामग्रियों से बनाया जाता है – बीफ, बीफ स्टॉक, प्याज, लहसुन, मूली, मटर, टमाटर, पालक और सूखा पनीर।

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दूसरा दिन: ग्यालपो लोसर

दूसरे दिन को ग्यालपो लोसर या किंग्स लोसर के नाम से जाना जाता है और इसमें धार्मिक समारोह आयोजित किए जाते हैं। लोग स्थानीय मठों में जाते हैं और भिक्षुओं को उपहार देते हैं। पटाखे जलाए जाते हैं। माना जाता है कि पटाखे आस-पास छिपी किसी भी प्रकार की बुरी आत्मा को डरा देते हैं।

तीसरा दिन: चोए-क्योंग लोसर

तीसरे दिन, लोग जल्दी उठते हैं, नए कपड़े पहनते हैं, देवताओं को प्रसाद चढ़ाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। पूजा के बाद सारा परिवार एकजुट होकर काप्से (एक प्रकार का केक) और चांग (एक स्थानीय पेय) खाते हैं।

लोग एक-दूसरे को ‘हैप्पी लोसर ‘ या “लोसर ताशी डेलेक” कहकर बधाई देते हैं। प्राथमिक लोसर त्यौहार तीसरे दिन समाप्त हो जाता है लेकिन उत्सव 12 दिनों तक जारी रहता है, जहां लोग रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने जाते हैं।

लीजेंड- सीपी कृष्णन नायर जिन्होंने 65 की उम्र में पत्नी के नाम से शुरू की “लीला होटल” चेन

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सी. पी. कृष्णन नायर का जन्म 9 फरवरी 1922 को केरल के कन्नूर में हुआ था। उनका पूरा नाम चित्तरत पूवक्कट्ट कृष्णन नायर था। वह एक भारतीय व्यवसायी थे जिन्होंने “द लीला ग्रुप” की स्थापना की थी।

भारतीय सेना में उनकी सेवा के कारण उन्हें कैप्टन नायर के नाम से भी जाना जाता था। इनके पिता अप्पू नायर ब्रिटिश सरकार में बिल कलेक्टर थे जबकि उनकी मां माधवी एक गृहणी थीं।

सी. पी. कृष्णन नायर ने अपने करियर की शुरुआत भारतीय सेना में एक कैप्टन के तौर की थी। उनकी पहली पोस्टिंग एबटाबाद (पाकिस्तान) में वायरलैस ऑफिसर के रूप में हुई थी। और उनका काम दो मुख्य धुरी ताकतों जर्मनी और जापान के बीच संदेशों को पकडऩा था।

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आर्मी में रहते हुए ही इनकी शादी कन्नूर के एक कारोबारी ए के नायर की बेटी लीला नायर से हो गयी। 1951 में कृष्णन नायर ने आर्मी से रिटायरमेंट ले लिया और अपने ससुर के हैंडलूम के कारोबार को जॉइन कर लिया। उन्होंने एक सेल्स एजेंट के रूप में काम करना शुरू किया। कारोबार बढ़ाने के लिए उन्होंने कई देशों की यात्रा की।

इस दौरान उन्हें एक ऐसा होटल तैयार करने का आइडिया आया जो अपनी लग्जरी खूबियों के लिए जाना जाए और दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाए। इसी आइडिये के साथ उन्होंने 1983 में होटल लीलावेंचर लिमिटेड की शुरुआत की।

उनका पहला लीला होटल 1987 में मुंबई में खुला। इसके बाद बैंगलोर में “लीला पैलेस”, “द लीला” गोवा में और तिरुवनंतपुरम में लीला बीच रिज़ॉर्ट खोला गया।

ताज और ओबेरॉय को दी कड़ी टक्कर

जिस दौर में “द लीला” की शुरुआत हुई उस दौर में ताज और ओबेरॉय जैसे फाइव स्टार लोगों की जुबान पर थे। इन्हें कॉम्पिटीशन देना और आगे बढ़ना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन द लीला का लग्जीरियस इंफ्रास्ट्रक्चर और हॉस्पिटैलिटी के कारण इसने अपनी अलग पहचान बनाई और समय के साथ पॉपुलैरिटी बढ़ती गई।

1991 में कंपनी ने अपना दूसरा होटल गोवा में खोला। इतना ही नहीं, कंपनी ने अरब सागर और साल नदी के पास अपना रिजॉर्ट विकसित किया। यह इंटरनेशनल टूरिस्ट का गढ़ बना।

साल 2000 के बाद ग्रुप ने बड़े भारतीय शहरों की ओर रुख करना शुरू किया। जैसे- बेंगलुरू, केरल, उदयपुर और गुरुग्राम में अपनी चेन खोलीं।

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सी. पी. कृष्णन नायर और उनकी पत्नी लीला

पुरस्कार

  • अमेरिकन एकेडमी ऑफ हॉस्पिटैलिटी साइंसेज (AAHS) ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने उन्हें 1999 में ग्लोबल 500 रोल ऑफ ऑनर अवार्ड से सम्मानित किया था।
  • उन्हें 2009 में जिनेवा, स्विट्जरलैंड स्थित इंटरनेशनल होटल्स एंड रेस्तरां एसोसिएशन द्वारा “होटलियर ऑफ द सेंचुरी” पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
  • 2010 में उन्हे भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड भी मिल चुके हैं।
  • उन्होंने 7 फरवरी को होटल “द लीला” के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। 2013 में उन्होंने अपने बड़े बेटे, विवेक नायर ने उनका उत्तराधिकारी बनाया।
  • उनकी मृत्यु 92 वर्ष की आयु में 17 मई 2014 को मुम्बई, महाराष्ट्र में हुई थी।

‘खुदा गवाह’ से जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा जिसमें अमिताभ बच्चन ने श्रीदेवी को मनाने के लिए भेजा था गुलाबों से भरा ट्रक

बॉलीवुड के शहँशाह यानी अमिताभ बच्चन और दिवंगत एक्ट्रेस श्रीदेवी कभी हिंदी सिनेमा के सबसे पॉपुलर स्टार रहे हैं। इन दोनों की एक्टिंग का हर कोई दीवाना है।

अमिताभ बच्चन के साथ कई एक्ट्रेसेस की जोड़ी बनी लेकिन श्रीदेवी के साथ उनकी जोड़ी को सबसे ज्यादा पसंद किया गया था। उस दौरान हर दूसरा एक्टर अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिए अमिताभ बच्चन के साथ काम करना चाहता था।

हालांकि श्रीदेवी के मामले में ऐसा नहीं था। श्रीदेवी को मनाने के लिए अमिताभ बच्चन को बहुत पापड़ बेलने पड़े थे। जी हाँ इस लेख में हम आपको श्रीदेवी से जुड़ा एक मजेदार किस्सा बताने जा रहे हैं।

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अमिताभ बच्चन ने श्रीदेवी पर की थी फूलों की बारिश

दरअसल 1992 में आई फिल्म ‘खुदा गवाह’ के लिए श्रीदेवी को मनाने के लिए बिग बी को काफी जद्दोजहद करनी पड़ी थी।

सत्यार्थ नायक ने एक किताब लिखी है ‘श्रीदेवी: द इटरनल स्क्रीन गॉडेस‘। इस किताब में उस किस्से का ज़िक्र किया गया है जिसका दिवंगत कोरियोग्राफर सरोज खान ने खुलासा किया था।

उन्होंने कहा कि श्रीदेवी उनके साथ एक गाने पर काम कर रही थी और गाने के सेट पर एक फूलों से भरा ट्रक आया। ”जब ट्रक आया तो हम एक गाना फिल्मा रहे थे। उन्होंने श्रीदेवी को इसके पास खड़ा किया और पूरा कैरियर झुकाकर उन पर गुलाब के फूल बरसाए। यह काफी खूबसूरत सीन था।

अमिताभ बच्चन के इस खूबसूरत अंदाज़ ने श्रीदेवी को काफी इम्प्रेस किया लेकिन वह अभी भी आश्वस्त नहीं थीं क्योंकि उन्हें लगा कि उनके पास इस फिल्म में करने के लिए कुछ खास काम नहीं है। वो फिल्म में साइड कैरेक्टर प्ले नहीं करना चाहती थीं। वो महिला केंद्रित फिल्मों का हिस्सा बनना चाहती थीं।

खुदा गवाह के मेकर्स के सामने श्रीदेवी ने एक शर्त रखी थी। उन्होंने कहा था कि वो फिल्म एक ही शर्त पर करने के लिए हां कहेंगी। अगर उन्हें अमिताभ बच्चन के साथ लीड रोल और उनकी बेटी दोनों का रोल करने दिया जाएगा।

फिल्ममेकर मनोज देसाई और मुकुंद आनंद ने उनकी शर्त मान ली थी और इस तरह से श्रीदेवी खुदा गवाह की एक्ट्रेस बन गई थीं। ये फिल्म सुपरहिट साबित हुई थी।

38वें फिल्मफेयर पुरस्कारों में, खुदा गवाह को सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (अमिताभ बच्चन), सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (श्रीदेवी) और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री (शिरोडकर) सहित 9 नामांकन प्राप्त हुए और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (आनंद) और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता सहित 4 पुरस्कार जीते थे।

आखिरी बार श्रीदेवी और अमिताभ बच्चन साथ में गौरी शिंदे की इंग्लिश विंग्लिश में नजर आए थे। ये फिल्म 2012 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म में बिग बी का कैमियो था तो श्रीदेवी लीड रोल में नजर आईं थीं।

 

एक रहस्यमयी मंदिर जिसका दरवाज़ा खुलता है सिर्फ महाशिवरात्रि पर

भारत में कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक शिव मंदिर है, जिनके दर्शन करने हर साल लाखों की तादाद में भक्त पहुंचते हैं। भारत में कई शिव मंदिर ऐसे भी हैं,जहां तक पहुँचने के लिए भक्तों को काफी दुर्गम यात्रा भी करनी होती है।

आज हम आपको भगवान शिव के ऐसे रहस्यमयी मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां मत्था टेकने के लिए पूरे साल इंतजार करना पड़ता है। एक ऐसा मंदिर जो साल में सिर्फ एक बार खुलता है।

हम बात कर रहे हैं, जयपुर स्थित एकलिंगेश्वर महादेव मंदिर की, जो साल में सिर्फ शिवरात्रि के दिन ही खुलता है। इसे शंकर गढ़ी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

जयपुर में मोतीडूंगरी शंकरगढ़ की पहाड़ी स्थित एकलिंगजी और चांदनी चौक के राज-राजेश्वर मंदिर ऐसे दो मंदिर है जो वर्ष में सिर्फ एक बार खुलते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर ही यहां श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन होते हैं। यही कारण है कि यहां अलसुबह से भक्तों का तांता लगना शुरू हो जाता है।

जयपुर का यह मंदिर बिरला मंदिर के पीछे मोती डूंगरी के पास शिवडूंगरी पर स्थित है। इस मंदिर के पुजारी ने बताया कि इसकी स्थापना बहुत पुरानी है। यह जयपुर की स्थापना से भी पहले बनाया गया था। शिवरात्रि के दिन ही इसके पट आम भक्तों के लिए खुलते हैं।

यह महादेव मंदिर जयपुर राज परिवार का निजी मंदिर है और इस मंदिर में खुद जयपुर के महाराजा और महारानियां पूजा-अर्चना करने आते थे। खुद जयपुर की राजमाता गायत्री देवी तक कई बार यहाँ महादेव की पूजा करने पहुँचती थीं। आमजन को सालभर शिवरात्रि का ही इंतजार करना पड़ता है जब मंदिर के पट खुलते हैं और उन्हें एकलिंग जी के दर्शन होते है।

इस मंदिर में पहले शिव भगवान के साथ माता पार्वती और उनके पुत्र गणेश की मूर्ति की स्थापना की गयी थी, लेकिन कुछ समय बाद वह मूर्तियां अपने आप गायब हो गयी थी, लेकिन फिर से मूर्तियों की स्थापना की गयी, जो एक बार फिर से विचित्र तरीके से विलुप्त हो गयीं। जिसके बाद किसी ने भी दुबारा मंदिर में भगवान शंकर के अलावा किसी भी मूर्ति की स्थापना करने का साहस नहीं किया।

सावन के महीने में या किसी बड़े पारिवारिक कार्यक्रम में राज परिवार के सदस्य यहां पूजा-पाठ करने पहुंचते हैं। इस मंदिर से जुड़े सभी खर्च शाही परिवार द्वारा वहन किए जाते हैं।

चूंकि यह मंदिर साल में एक ही बार खुलता है इसलिए शिवरात्रि के दिन इसके प्रति श्रद्धालुओं में विशेष आकर्षण होता है। करीब एक किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ कर एवं कई घंटों तक लाइन में खड़े होकर लोग यहां भगवान के दर्शन करते हैं।

वैलेंटाइन डे से जुड़े कुछ अद्भुत तथ्य!

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फरवरी का महीना लव बर्ड्स के लिए बेहद खास और महत्वपूर्ण माना जाता है। हर साल वैलेंटाइन वीक 7 से 14 फरवरी को मनाया जाता है।

इस वीक में लोग अपने चाहने वालों को गिफ्ट्स सरप्राइज देते है साथ ही क्वालिटी टाइम भी बिताते है। वैलेंटाइन वीक में ऐसे कई मौके आते हैं, जिसमें कपल्स अपने प्यार का इजहार करते हैं और अपने पार्टनर को स्पेशल फील कराते हैं।

रोज़ डे वैलेंटाइन वीक की शुरुआत का प्रतीक है, जहां लोग गुलाब का आदान-प्रदान करके अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं।

गुलाब के विभिन्न रंग विशिष्ट अर्थ रखते हैं, सफेद रंग सद्भाव या पवित्रता का प्रतीक है, पीला दोस्ती का और लाल प्यार का प्रतीक है। इसके बाद प्रपोज़ डे, चॉकलेट डे, टेडी डे, प्रॉमिस डे, हग डे, किस डे और समापन वैलेंटाइन डे के साथ होता है।

संत वैलेंटाइन

वैलेंटाइन डे का नाम संत वैलेंटाइन के नाम पर रखा गया। दरअसल रोम में क्लॉडियस नाम का राजा था। जिसका मानना था कि शादी करने से पुरुषों की शक्ति और बुद्धी खत्म हो जाती है। यही सोच के चलते क्लॉडियस ने अपने राज्य में ये आदेश जारी कर दिया कि उसके राज्य का कोई भी अधिकारी या कर्मचारी शादी नहीं करेगा।

वहीं संत वैलेंटाइन ने क्लॉडियस के इस आदेश का विरोध करते हुए सभी को शादी करने के लिए प्रेरित किया, और अधिकारियों व कर्मचारियों की शादी करवाई। जब क्लॉडियस को इस बात का पता चला तो उसने संत वैलेंटाइन को जेल में डलवा दिया।

वहां वैलेंटाइन ने जेलर की नेत्रहीन बेटी को अपनी आंखें निस्वार्थ भाव से दान कर दी और उसने एक खत में लिखा ‘तुम्हारा वैलेंटाइन’। उसके बाद क्लॉडियस ने 14 फरवरी सन 269 को संत वैलेंटाइन को फांसी पर चढ़ाया गया था। तब से उनकी याद में ये दिन मनाया जाता है।

रोचक तथ्य

  • ‘वैलेंटाइन डे‘ की शुरूआत भारत में 1992 में हुई थी।
  • कार्ड भेजने के लिए वैलेंटाइन डे साल का दूसरा सबसे लोकप्रिय दिन है और क्रिसमस पहला सबसे लोकप्रिय दिन माना जाता है।
  • वैलेंटाइन डे एक ऐसा प्रेम दिवस है जो कि यूरोपीय देशों से शुरू हुआ है लेकिन आज के समय में ये दुनियाभर के सभी लोगों द्वारा मनाया जाता है क्योंकि ये एक प्रेम दिवस है इसलिए नव युवक और युवती एक दूसरे के साथ इस दिन समय बिताना ज़्यादा पसंद करते हैं।

  • प्रत्येक वर्ष लगभग 1 बिलियन वैलेंटाइन डे कार्ड का आदान-प्रदान किया जाता है।
  • इस दिन फूल खरीदने वालों में लगभग केवल 27 प्रतिशत महिलाएं हैं बाकि 73% पुरुष हैं।
  • यह दिवस दिल के साथ जुड़ा हुआ है क्योंकि इसे सभी मानवीय भावनाओं का स्रोत माना जाता है।
  • 1800 के अंत में रिचर्ड कैडबरी ने पहला वैलेंटाइन डे कैंडी बॉक्स का आविष्कार किया था।
  • प्रत्येक वर्ष इस दिवस पर लगभग 220,000 शादी के प्रस्तावों की औसत संख्या आंकी गई है।
  • वैलेंटाइन नाम लैटिन शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ “वीरता” है।
  • जापान में सिर्फ पुरुष ही वैलेंटाइन डे मनाते है।
  • इस दिन 35 मिलियन से ज़्यादा दिल के आकार वाली चॉकलेट बिक जाती हैं।
  • इस दिन के मौके पर सबसे ज्यादा प्रयोग किये जाने वाले लाल गुलाब को प्यार का प्रतीक माना जाता है क्योंकि लाल रंग प्यार को रोमांटिक भावनाओं को प्रदर्शित करने वाला रंग माना जाता है।
  • औसतन पुरुष वैलेंटाइन डे के उपहारों पर महिलाओं की तुलना में दोगुना पैसा खर्च करते हैं।
  • शेक्सपियर के नाटक रोमियो और जूलियट में कहा गया है कि वे वेरोना इटली में रहते थे। जूलियट को संबोधित वेरोना में हर साल हजारों वैलेंटाइन डे कार्ड भेजे जाते हैं।
  • अमेरिका के 60% लाल गुलाब कैलिफोर्निया राज्य में उगाए जाते हैं
  • कम से कम 9 मिलियन लोग अपने पालतू जानवरों को वैलेंटाइन डे के दिन उपहार देते हैं।
  • विक्टोरियन के समय में इस कार्ड पर हस्ताक्षर करना अपशकुन माना जाता था।
  • सबसे पुराना ज्ञात वैलेंटाइन कार्ड लंदन में ब्रिटिश संग्रहालय में प्रदर्शित किया जाता है। यह 1400 के दशक का है।
  • फिनलैंड के लोग वैलेंटाइन डे को “फ्रेंड्स डे” के रूप में मनाते हैं। वहां इस दिन दोस्तों को याद किया जाता है।

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चॉकलेट हिल्स : प्रकृति का बेहद खूबसूरत नज़ारा

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दुनिया में बहुत सी ऐसी खूबसूरत जगहें हैं जिन्हें देखकर मन गदगद हो जाता है। जो लोग घूमने-फिरने के शौकिन होते हैं वो हमेशा ही नई और खूबसूरत जगहों की तलाश में रहते हैं।

बहुत से ऐसी जगहें हैं, जो अपनी खूबसूरती के प्रसिद्ध हैं और यही वजह है कि लोग लाखों रुपये खर्च करके इन जगहों को देखने और समय बिताने के लिए जाते हैं।

आज हम आपको इस लेख में ऐसी ही एक खूबसूरत जगह के बारे में बताने जा रहें है जिसका नाम है “चॉकलेट हिल्स“। यह खूबसूरत जगह फिलिपींस के बोहोल प्रांत में स्थित है। प्रकृति के इस मनमोहक नज़ारे को देखने के लिए पर्यटक दूर-दूर से आते हैं।

इस हिल्स की खूबसूरती और अद्भुत नजारों की वजह से लोग इसे दुनिया का आठवां अजूबा भी कहते हैं। यह हिल्स सागबयान, बतूआन, कारमेन, बिलार, सिएरा बुलोन्स और वैलेन्सिया शहर में फैली हुई है।

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चॉकलेट हिल्स

क्यों कहा जाता है चॉकलेट हिल्स?

यह चॉकलेट हिल्स चूना पत्थर की बनी है और सिर्फ घास से ढकी रहती है। यहां की घास शंकु (तिकोने) के आकार की होती है और करीब-करीब सबका आकार एक बराबर ही होता है। गर्मी के मौसम में जब घास सूख जाती है तो यह भूरे रंग की हो जाती है।

उसका रंग बिल्कुल चॉकलेट के रंग जैसा होता है। इसी वजह से हिल्स को चॉकलेट हिल्स कहा जाता है। चॉकलेट हिल्स में 1,268 से ज्यादा तिकोने आकार की पहाड़ियां हैं। चॉकलेट हिल्स को फिलिपींस की राष्ट्रीय भूविज्ञानी कमेटी द्वारा तीसरा राष्ट्रीय भूविज्ञानी स्मारक घोषित किया गया है।

यहां दो रेजॉर्ट भी हैं। एक कारमेन शहर में है जिसको चॉकलेट हिल्स कंप्लेक्स के नाम से जाना जाता है और दूसरा सागबयान में है जिसे सागबयान पीक के नाम से जाना जाता है। इन दोनों में सबसे पुराना रेजॉर्ट कारमेन कंप्लेक्स है जो शहर से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर है। चॉकलेट हिल्स कंप्लेक्स सरकार के अधीन है। यहां एक रेस्ट्रॉन्ट, स्विमिंग पुल और एक होटल भी है।

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चॉकलेट हिल्स

चॉकलेट हिल्स से जुड़ी किंदंतियां

इस पहाड़ी से जुड़ीं तीन किंदंतियां भी हैं। पहली किंवदंती के अनुसार यहाँ दो राक्षसों के बीच झगड़ा हुआ था। उन्होंने एक-दूसरे पर कीचड़, चट्टान और बालू से हमला किया। कई दिनों तक वे लड़ते रहे और अंत में जब थक गए तो झगड़ना बंद कर दिया। लेकिन कीचड़, पत्थर और बालू वहीं रहे जो हजारों साल बाद पहाड़ी में बदल गए।

दूसरी किंवदंती बहुत रोमांटिक है। कहा जाता है कि एक अरोगो नाम के एक युवा और शक्तिशाली राक्षस को एक बार एलोया नाम के एक लड़की से प्यार हो जाता है। दोनों की शादी हो जाती है लेकिन कुछ दिनों बाद बीमार होकर लड़की की मौत हो जाती है। इससे राक्षस काफी दुखी हो जाता है और फूट-फूटकर रोता है। उसके आंसू गिर-गिरकर जमीन पर ढेर हो गए जिससे चॉकलेट हिल्स बनी।

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तीसरी किंवदंती में कहा जाता है कि कारमेन की समतल भूमि कभी राक्षसों के बच्चों के लिए खेल का मैदान थी। एक दिन उन्होंने एक प्रतियोगिता का आयोजन किया।

उनके बीच प्रतियोगिता थी की जो ज्यादा केक बनाएगा, वह जीत जाएगा। उन्होंने कीचड़ और बालू का केक बनाया और उसे धूप में सूखने रख दिया। हालाँकि, प्रतियोगिता समाप्त होने से पहले, बच्चों को घर बुला लिया गया। थोड़ी देर के बाद, जब वे घर से आए तो देखा कि उनके केक पक गए हैं लेकिन उन्होंने अपनी कलाकृति को नहीं तोड़ने का फैसला किया और वैसे ही रहने दिया जो बाद में चॉकलेट हिल्स बन गई।

X यूजर ने AI की मदद से तैयार की अद्भुत तस्वीरें

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से भगवान राम के नाम की ही गूंज है। अयोध्या के राम मंदिर में भगवान राम के बाल रूप की प्राण प्रतिष्ठा के बाद से हर तरफ भगवान श्री राम की चर्चा है।

सोशल मीडिया इस प्रतीक्षित अवसर पर लोगों के विभिन्न नजरिए और अनुभवों को साझा कर रहा है। यह एक शानदार डिजिटल लहर है जो दिखाती है कि राम मंदिर निर्माण का कितना अद्वितीय प्रभाव हुआ है। ऐसा लगता है कि हर कोई इस महत्वपूर्ण अवसर को अपने अनुभवों के रूप में स्वागत कर रहा है।

हालांकि एक X (ट्विटर) यूजर ने कुछ ऐसा कमाल किया है कि जिसे देखकर हर कोई दंग रह जाएगा है। ‘माधव कोहली‘ नाम के एक X यूजर ने (AI) एआई की मदद से पूरी की पूरी रामायण ही तैयार कर डाली है।

माधव कोहली ने सदियों पुरानी इस कहानी को बहुत ही अनोखे और आधुनिक तरीके से प्रस्तुत किया है। इसके उन्होंने AI तकनीक का इस्तेमाल किया है। तस्वीरों के जरिए शानदार प्रदर्शन के लिए उन्होंने नैचुरल लेंग्वेज प्रोसेसिंग, इमेज जेनरेशन एल्गोरिदम का इस्तेमाल किया है। इससे रामायण का एक बेहद अलग और खूबसूरत रूप सामने आया है।

उन्होंने महज 60 पोस्ट में रामायण की पूरी कहानी शेयर की। उन्होंने थ्रेड को कैप्शन दिया, “महर्षि वाल्मिकी द्वारा संपूर्ण रामायण।

60 वर्षों से केवल ‘चाय’ पीकर जिंदा है यह महिला

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यह कहावत तो सभी ने सुनी होगी कि हम अपने शरीर को जैसे ढाल लेते हैं, शरीर वैसे ही ढल जाता है। कुछ ऐसी ही एक कहानी पश्चिम बंगाल की 79 वर्षीय दादी की है, जिन्होंने पिछले 55- 60 सालों से अन्न् का एक भी दाना ग्रहण नहीं किया है। वह एकदम स्वस्थ हैं और उन्हें किसी भी प्रकार की कोई बीमारी नहीं है। इस महिला का नाम अनिमा चक्रवर्ती है।

अनिमा चक्रवर्ती कोलकाता के गोघाट श्याम बाजार ग्राम पंचायत के बेलडीहा गांव की रहने वाली हैं। बचपन से गरीब परिवार में पली-बढ़ी अनिमा शादी के बाद दूसरों के घरों में काम करती थीं। गरीबी के कारण घर में कुछ अनाज नहीं रहता था। इसी वजह से वह समय पर खाना नहीं खा पाती थीं।

79 वर्षीय अनिमा चक्रवर्ती के बेटे ने बताया कि 50-60 साल पहले हमारे परिवार की स्थिति अच्छी नहीं थी। मेरी मां लोगों के घरों में काम करने जाती थीं। वह वहां से जो चावल लाती थीं, वे हम सभी बच्चों को खिला देती थीं।

फिर वह भूखी सो जाती थीं। इस तरह अनिमा करीब-करीब हर रोज चाय पीकर गुजारा कर लेती थीं तभी से उनको चाय पीकर दिन गुजारने की आदत पड़ गई।

धीरे-धीरे उनका खाना पूरी तरह छूट गया। ये बातें करीब 60 साल पहले की हैं। एक तरफ अनिमा चक्रवर्ती का खाना छूटा और दूसरी तरफ उनकी चाय पर निर्भरता बढ़ गई। आज वह सिर्फ चाय पीकर जिंदा हैं। वह सालों से बिना कुछ खाए स्वस्थ और सामान्य जीवन जी रही हैं।

उनके बेटे ने यह भी बताया कि वह पहले दिन में दो से तीन बार चाय पीती थीं, लेकिन अब वह दो बार से ज्यादा चाय भी नहीं पीती। उनको कोई बीमारी नहीं है, लेकिन दो से अधिक बार चाय लेने पर उन्हें उल्टी आ जाती है।

वह आज भी कोई ठोस आहार नहीं खा रहीं। वह पूरे दिन घर के काम में व्यस्त रहती हैं। सुबह और रात में दो बार दूध वाली चाय पीती हैं।

पंजाब केसरी से साभार