13 अक्टूबर का इतिहास

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13 अक्टूबर का इतिहास

  • 1542 – मुगल बादशाह अकबर का सिंध के अमरकोट में जन्म।
  • 1713 – चार्ल्‍स मेसरी ने वर्लपूल गैलेक्‍सी की खोज कीl
  • 1884 – आज के दिन यह तय किया गया था कि ग्रीनविच मीन टाइम, दुनिया का मानक समय होगा l ग्रीनविच दक्षिण पूर्वी लंदन का हिस्सा है l
  • 1911 – भगिनी निवेदिता का दार्जिलिंग में निधन।
  • 1976 – बोलीविया में बोइंग सक दुर्घटनाग्रस्त, करीब 100 मरे।
  • 1987 – कोस्टारिका के राष्ट्रपति ऑस्कर आरियास को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला।
  • 1978 – बोलवियन बोईग 707 के क्रैश हो जाने से 100 लोगों की मौत हो गई.
  • 1987 – सदाबहार एक्‍टर, सिंगर किशोर कुमार ने दुनिया को अ‍लविदा कहा था.
  • 1987 – कोस्टारिका के राष्ट्रपति ऑस्कर आरियास को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला।
  • 1999 – अटल बिहारी वाजपेयी तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने।
  • 1999 – कोलम्बिया विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री प्रो. राबर्ट मुंडेल को वर्ष 1999 को नोबेल पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा।
  • 2000 – दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति किम दाई जुंग को शांति को नोबेल पुरस्कार।
  • 2001 – नाइजीरिया में अमेरिका विरोधी प्रदर्शन के दौरान भड़की साम्प्रदायिक हिंसा में लगभग 200 व्यक्ति मारे गये।
  • 2003 – डलास में एक साल चिकित्सकीय योजना और 26 घंटे तक चले जटिल आपरेशन के बाद मिस्र के जुड़वां बच्चों के आपस में जुड़े सिर को अलग करने में आपरेशन सफल रहा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के लिए एक भारतीय छात्र का चयन। जर्मनी ने स्वीडन को हराकर पहली बार विश्व कप फ़ुटबाल टूर्नामेंट जीता।
  • 2006 – बंगलादेश के माे. युनुस और उनके द्वारा स्थापित ग्रामीण बैंक को नोबेल पुरस्कार।
  • 2008 – रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री की स्थापना के लिए दी गई ज़मीन के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने यथास्थिति बनाये रखने के आदेश दिए।
  • 2012 – पाकिस्तान के दारा अदम में आत्मघाती हमले में 15 लोगों की मौत।
  • 2013 – मध्य प्रदेश के दतिया जिले में भगदड़ से 109 लोगों की मौत।
  • 2011 – दफ़्तरों में इस्तेमाल होने वाले हिंदी के कठिन शब्दों की जगह उर्दू, फ़ारसी, सामान्य हिंदी और अंग्रेज़ी के शब्दों का उपयोग करने के निर्देश दिए हैं। गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग की सचिव वीणा उपाध्याय ने इस सिलसिले में सभी मंत्रालयों और विभागों को दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
  • 2012 – पाकिस्तान के दारा अदम में आत्मघाती हमले में 15 लोगों की मौत।
  • 2013 – मध्य प्रदेश के दतिया जिले में भगदड़ से 109 लोगों की मौत।

शेर पर सवार, घंटे की गूंज वाली मां: चंद्रघंटा की पावन कथा

नवरात्र का तीसरा दिन मां चंद्रघंटा को समर्पित है। वे मां दुर्गा की तीसरी शक्ति मानी जाती हैं। मां ब्रह्मचारिणी ने तप किया। मां चंद्रघंटा उस तप के बाद का रूप हैं। यानी जब मन मजबूत हो जाए, तो डर अपने आप भागने लगता है। आइए, मां की कथा आसान भाषा में जानते हैं।

Maa Chandraghanta_ Lion-Riding Divine

नाम का मतलब क्या है

शब्द मतलब
चंद्र चंद्रमा
घंटा घंटी
चंद्रघंटा जिसके माथे पर घंटे जैसा अर्धचंद्र सजा है

मां के माथे पर आधा चांद है। वह देखने में घंटे जैसा लगता है। इसीलिए उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा।

कथा की शुरुआत: तपस्या के बाद

मां पार्वती ने सालों तक कठोर तप किया था। उसी तप से उन्हें भगवान शिव मिलने वाले थे। अब विवाह की तैयारियां शुरू हुईं। हिमालय के महल में खुशी की लहर थी। सजावट हो रही थी। मेहमान आ रहे थे। सबको बारात का इंतजार था। पर किसी को अंदाजा नहीं था कि बारात कैसी होगी।

शिव जी की अनोखी बारात

भगवान शिव बारात लेकर निकले। लेकिन यह बारात दुनिया की सबसे अलग बारात थी।

शिव जी की बारात में कैसा नजारा था
सवारी बैल (नंदी)
गले में लिपटे हुए सांप
शरीर पर भस्म (राख)
बाराती भूत, प्रेत, गण और अनगिनत अजीब जीव
माहौल नाच-गाना और शोर

कोई शिव जी के साथ नाच रहा था। कोई उछल-कूद कर रहा था। कुछ बाराती देखने में बड़े डरावने थे।

जब मां मैना घबरा गईं

बारात हिमालय के महल के पास पहुंची। मां पार्वती की माता, रानी मैना, उसे देखने आईं। जैसे ही उन्होंने बारात देखी, वे सहम गईं। उन्होंने सोचा, “मेरी फूल सी बेटी इस भयानक बारात के साथ कैसे जाएगी?” घबराहट इतनी बढ़ी कि वे बेहोश हो गईं। महल में हड़कंप मच गया। लोग इधर-उधर भागने लगे। हर तरफ डर और परेशानी का माहौल था।

मां पार्वती का फैसला

पार्वती जी ने यह सब देखा। वे जानती थीं कि शिव जी दिल के बहुत भोले हैं। उनका रूप अलग है, पर मन बहुत साफ है। उन्हें यह भी पता था कि अगर अभी हालात न संभाले गए, तो सब बिगड़ जाएगा। उन्होंने रोने या घबराने के बजाय शांति से काम लेने का फैसला किया। और तब उन्होंने धारण किया चंद्रघंटा रूप।

  • माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र।
  • सोने जैसा चमकता शरीर।
  • दस हाथ, हर हाथ में कुछ खास।
  • शेर पर सवारी।
  • चेहरे पर शांति और आंखों में तेज।

यह रूप देखते ही महल में सन्नाटा छा गया। लोगों का डर गायब हो गया।

शिव जी से विनती

फिर मां चंद्रघंटा शिव जी के पास गईं। उन्होंने बहुत प्यार से कहा:

“प्रभु, मेरे परिवार को आपका यह रूप देखकर डर लग रहा है। कृपया आप अपना सुंदर रूप धारण करें।”

शिव जी मुस्कुराए। उन्होंने पार्वती की बात का मान रखा। वे तुरंत एक सुंदर और तेजस्वी रूप में आ गए। इस रूप को देखकर हिमालय का पूरा महल खुश हो उठा। रानी मैना को भी होश आ गया। सबने शिव जी का प्रेम से स्वागत किया। इसके बाद विवाह की सारी रस्में खुशी-खुशी पूरी हुईं।

इस कथा की एक खास बात

इस कथा में मां ने न किसी से लड़ाई की, न किसी को डांटा। उन्होंने सिर्फ अपनी समझदारी और शांत स्वभाव से बात संभाल ली। यही मां चंद्रघंटा की असली ताकत है। वे बताती हैं कि हर मुश्किल का हल गुस्से में नहीं, समझदारी में छिपा होता है।

दूसरी कथा: महिषासुर और घंटे की गूंज

मां चंद्रघंटा की एक और लोकप्रिय कथा है। यह देवताओं की रक्षा से जुड़ी है।

राक्षसों का अत्याचार

बहुत पहले देवताओं और राक्षसों के बीच भीषण युद्ध हुआ। राक्षसों का राजा महिषासुर था। वह बहुत ताकतवर था और उसे अपनी ताकत का घमंड भी था। उसने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। इंद्र का सिंहासन भी छीन लिया। देवता दर-दर भटकने लगे।

त्रिदेव के पास गुहार

परेशान होकर देवता ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी के पास पहुंचे। उन्होंने पूरी बात बताई। यह सुनकर तीनों देवताओं को बहुत क्रोध आया। उनके क्रोध से एक तेज निकला। वही तेज दूसरे देवताओं के तेज से मिल गया। उसी से देवी प्रकट हुईं।

अस्त्र-शस्त्र का उपहार

हर देवता ने देवी को कुछ न कुछ दिया।

किसने दिया क्या दिया
भगवान शिव त्रिशूल
भगवान विष्णु चक्र
इंद्र घंटा
अन्य देवता अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र और शक्तियां
हिमालय सवारी के लिए शेर

घंटे की गूंज से कांपे राक्षस

इस रूप में देवी युद्ध में उतरीं। कहा जाता है कि उनके घंटे की आवाज इतनी तेज थी कि उसे सुनकर राक्षस कांप उठे। कई तो सिर्फ आवाज से ही घबरा गए। फिर देवी ने महिषासुर और उसकी सेना का अंत किया। स्वर्ग देवताओं को वापस मिल गया।

(यह कथा देवी महात्म्य जैसे ग्रंथों में अलग-अलग रूप में मिलती है।)

मां का स्वरूप और उसका संदेश

स्वरूप क्या सिखाता है
माथे पर घंटे जैसा चांद मन शांत रखो, चांद की तरह शीतल बनो
सोने जैसा तेज अंदर की रोशनी को पहचानो
शेर की सवारी हिम्मत और निडरता
दस हाथ हर मुश्किल से निपटने की ताकत
हाथों में अस्त्र-शस्त्र जरूरत पर बुराई से लड़ने की तैयारी
अभय मुद्रा भक्तों से कहना, “डरो मत”
शांत चेहरा ताकतवर इंसान को चिल्लाना नहीं पड़ता

इस कथा से हम क्या सीखें

1. मुश्किल में घबराएं नहीं
जब पूरा महल घबरा रहा था, तब मां शांत रहीं। उन्होंने सबसे पहले हालात को समझा।

2. शांति सबसे बड़ी ताकत है
गुस्से में लिए फैसले अक्सर गलत होते हैं। शांत मन से लिया फैसला काम बना देता है।

3. प्यार से बात मनवाओ
मां ने शिव जी से बहुत नरमी से विनती की। नतीजा यह हुआ कि बात बन गई।

4. जरूरत पर डटकर खड़े हो जाओ
मां सिर्फ शांत ही नहीं हैं। जब राक्षसों से सामना हुआ, तो वे पीछे नहीं हटीं।

5. अपनों की रक्षा करो
मां ने परिवार को भी बचाया और देवताओं को भी।

आज की जिंदगी में यह कथा क्यों जरूरी है

हमारी जिंदगी में भी कई “बेकाबू बारातें” आती हैं। कभी ऑफिस का तनाव। कभी घर की परेशानी। कभी परीक्षा का डर। ऐसे वक्त में मां चंद्रघंटा की कथा याद रखिए:

  • घबराहट में कोई फैसला न लें।
  • पहले गहरी सांस लें।
  • हालात को समझें।
  • फिर शांति से हल निकालें।

अगर घर में कोई झगड़ा हो, तो ऊंची आवाज की जगह नरम बोली अपनाइए। अक्सर वही काम कर जाती है।

कथा सुनने के बाद पूजा कैसे करें

अगर आप आज मां की पूजा कर रहे हैं, तो ये आसान स्टेप अपनाएं।

  1. सुबह नहाकर साफ कपड़े पहनें।
  2. कलश के पास मां की तस्वीर रखें।
  3. रोली, चंदन और चावल चढ़ाएं।
  4. फूल अर्पित करें।
  5. घी का दीया जलाएं।
  6. दूध की खीर या दूध की मिठाई का भोग लगाएं।
  7. मंत्र का जाप करें।
  8. घंटी बजाकर आरती करें।

मां को घंटे की आवाज प्रिय मानी जाती है। इसलिए आज पूजा में घंटी जरूर बजाएं।

बीज मंत्र

ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मां को प्रिय भोग

भोग मान्यता
दूध की खीर मां को सबसे प्रिय मानी जाती है
दूध से बनी मिठाई रसमलाई, बर्फी या पेड़ा
शहद थोड़ी मात्रा में चढ़ा सकते हैं
फल केला, सेब या अनार

माना जाता है कि मां को दूध का भोग लगाने से घर में सुख-शांति बनी रहती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. मां चंद्रघंटा कौन हैं?
वे मां दुर्गा का तीसरा रूप हैं। यह मां पार्वती का वह रूप है जो विवाह के समय सामने आया।

2. उनके माथे पर क्या है?
घंटे के आकार का अर्धचंद्र।

3. उनका वाहन क्या है?
सिंह, यानी शेर।

4. मां के कितने हाथ हैं?
दस हाथ। उनमें अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र और कमल सजे हैं।

5. उनकी पूजा में घंटी क्यों बजाई जाती है?
मान्यता है कि घंटे की आवाज से नकारात्मकता दूर होती है। मां के नाम और कथा, दोनों में घंटे का खास स्थान है।

6. यह कथा किन ग्रंथों में मिलती है?
इसका उल्लेख शिव पुराण और देवी महात्म्य जैसे ग्रंथों और लोक परंपराओं में अलग-अलग रूप में मिलता है।

मां चंद्रघंटा की कथा बहुत सीधी बात कहती है। शांत रहो, समझदारी से काम लो, और डर को पास मत आने दो। आज मां के आगे दीया जलाइए। घंटी बजाइए। अपने मन के सारे डर उनके चरणों में रख दीजिए। मां चंद्रघंटा आपको हिम्मत, शांति और सुख दें।

जय माता दी! 

घंटे की गूंज से भागते हैं डर: मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, भोग, मंत्र और आरती

आज हम नवरात्र के तीसरे दिन की बात करेंगे। आज मां दुर्गा की तीसरी शक्ति, मां चंद्रघंटा, की पूजा होती है। पहले दिन मां ने हमें मजबूती सिखाई। दूसरे दिन उन्होंने धैर्य सिखाया। तीसरे दिन मां का संदेश है: डर को छोड़ो और हिम्मत से आगे बढ़ो। मां का रूप सुंदर भी है और शक्तिशाली भी। वे भक्तों के लिए शांत और दयालु हैं, पर बुराई के लिए सिंहनी हैं।

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तीसरा नवरात्र कब है

शारदीय नवरात्र का तीसरा दिन 13 अक्टूबर, मंगलवार को पड़ रहा है। यह तृतीया तिथि है। मंगलवार का दिन होने से इस दिन का महत्व और बढ़ जाता है। मंगलवार को हनुमान जी और शक्ति की उपासना के लिए भी खास माना जाता है।

ध्यान दें: तिथि और पूजा का सही समय हर शहर में थोड़ा अलग होता है। अपने स्थानीय पंचांग या पंडित जी से एक बार मिला लें।

मां का नाम “चंद्रघंटा” क्यों

नाम दो शब्दों से बना है।

शब्द मतलब
चंद्र चंद्रमा
घंटा घंटी
चंद्रघंटा जिसके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है

मां के माथे पर आधा चांद सजा है। वह देखने में घंटे जैसा लगता है। इसी वजह से उन्हें चंद्रघंटा कहते हैं।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप

मां का रूप बहुत तेजस्वी है। उनका शरीर सोने जैसा चमकता है। मां शेर पर सवार होती हैं।

स्वरूप खास बात
माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र
रंग सोने जैसा चमकता हुआ
वाहन सिंह (शेर)
भुजाएं दस हाथ
हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडल, धनुष, बाण, कमल और माला
एक हाथ में वरदान की मुद्रा
दूसरे हाथ में अभय की मुद्रा, यानी “डरो मत”
भाव शांत चेहरा, पर युद्ध के लिए तैयार

मां के हाथों में हथियार हैं, फिर भी चेहरे पर शांति है। यही उनकी खासियत है। वे बताती हैं कि असली ताकत शांत रहकर भी दिखाई जा सकती है।

मां चंद्रघंटा की कथा

इस रूप को लेकर कई कथाएं मिलती हैं। यहां दो लोकप्रिय कथाएं दी गई हैं।

पहली कथा: शिव जी की अनोखी बारात

मां पार्वती की तपस्या सफल हुई। भगवान शिव उनसे विवाह के लिए तैयार हो गए। विवाह का दिन आया। शिव जी बारात लेकर हिमालय के महल की तरफ चले। लेकिन यह बारात बिल्कुल अलग थी।

  • शिव जी बैल पर सवार थे।
  • उनके गले में सांप लिपटे थे।
  • शरीर पर भस्म लगी थी।
  • बारात में भूत, प्रेत और गण नाचते-गाते चल रहे थे।

जब बारात महल के पास पहुंची, तो मां मैना ने यह नजारा देखा। वे बहुत डर गईं। घबराहट के मारे वे बेहोश हो गईं। महल में हलचल मच गई। तब पार्वती जी ने हालात संभालने का फैसला किया। उन्होंने अपना चंद्रघंटा रूप धारण किया। उनका यह रूप देखकर सब शांत हो गए। इसके बाद उन्होंने शिव जी से विनती की। उन्होंने कहा, “प्रभु, आप अपना सुंदर रूप धारण कर लें।”शिव जी ने पार्वती की बात मान ली। वे सुंदर और तेजस्वी रूप में आ गए। इसके बाद विवाह खुशी-खुशी पूरा हुआ। इस कथा से सीख मिलती है कि समझदारी और शांति से बड़ी से बड़ी मुश्किल हल हो सकती है।

दूसरी कथा: राक्षसों का अत्याचार

एक समय की बात है। देवताओं और राक्षसों में बहुत बड़ा युद्ध छिड़ा। राक्षसों का राजा महिषासुर था। वह बहुत ताकतवर और घमंडी था।उसने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। इंद्र का सिंहासन भी छीन लिया। देवता परेशान होकर त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे। देवताओं की बात सुनकर तीनों को बहुत गुस्सा आया। उनके क्रोध से एक तेज निकला। यह तेज दूसरे देवताओं के तेज से भी मिल गया। इसी से देवी प्रकट हुईं।

भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल दिया। विष्णु जी ने चक्र दिया। इंद्र ने घंटा दिया। सूर्य ने तेज दिया। बाकी देवताओं ने भी अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दिए। इस रूप में देवी ने राक्षसों का सामना किया। कहा जाता है कि उनके घंटे की आवाज इतनी तेज थी कि उसे सुनकर राक्षस कांप उठे। कई तो घंटे की गूंज से ही डर गए। इसके बाद देवी ने महिषासुर और उसकी सेना का अंत किया। देवताओं को उनका स्वर्ग वापस मिल गया।

(यह कथा देवी महात्म्य जैसे ग्रंथों में मिलती है। अलग-अलग परंपराओं में इसे थोड़े अलग रूप में बताया जाता है।)

इस कथा से हम क्या सीखें

सीख मतलब
शांति में भी ताकत है हर बार चिल्लाने की जरूरत नहीं होती
डर का सामना करो डर से भागने से वह बढ़ता है
समझदारी से काम लो मां ने मुश्किल हालात संभाले, बिना झगड़े के
बुराई के आगे मत झुको जरूरत पड़े तो डटकर खड़े रहो
दूसरों की रक्षा करो मां ने देवताओं और भक्तों को बचाया

तीसरे दिन इनकी पूजा क्यों

मान्यता है कि मां चंद्रघंटा की पूजा से:

  • डर दूर होता है। मन में हिम्मत आती है।
  • गुस्सा शांत होता है। स्वभाव में नरमी आती है।
  • परेशानियां घटती हैं। नकारात्मक सोच से राहत मिलती है।
  • आवाज और व्यक्तित्व में निखार आता है।
  • घर में सुख-शांति रहती है।

मान्यता यह भी है कि मां की साधना से मणिपुर चक्र मजबूत होता है। यह चक्र आत्मविश्वास से जुड़ा माना जाता है। लोग इसे अपनी श्रद्धा के अनुसार मानते हैं।

पूजा की सामग्री

सामग्री किसलिए
मां की तस्वीर या मूर्ति पूजा के लिए
रोली, चंदन और अक्षत (चावल) तिलक और पूजा के लिए
फूल और माला मां को चढ़ाने के लिए
घी का दीपक आरती के लिए
धूप और अगरबत्ती वातावरण शुद्ध करने के लिए
गंगाजल शुद्धि के लिए
घंटी पूजा और आरती के समय बजाने के लिए
दूध से बनी मिठाई या खीर भोग के लिए
फल और मेवे प्रसाद के लिए

मां को घंटे की ध्वनि बहुत प्रिय मानी जाती है। इसलिए आज पूजा में घंटी जरूर बजाएं।

पूजा की आसान विधि

पहला कदम: स्नान करें
सुबह जल्दी उठें और नहाएं। साफ कपड़े पहनें।

दूसरा कदम: जगह साफ करें
पूजा की जगह पर गंगाजल छिड़कें। कलश के पास मां की तस्वीर रखें।

तीसरा कदम: संकल्प लें
हाथ में जल और चावल लें। मन में कहें कि आप आज श्रद्धा से मां की पूजा कर रहे हैं।

चौथा कदम: कलश की पूजा करें
सबसे पहले कलश पर रोली और अक्षत चढ़ाएं। फिर उसके आगे दीया जलाएं।

पांचवां कदम: मां का ध्यान करें
आंखें बंद करें। मां के शेर पर सवार तेजस्वी रूप को याद करें। ध्यान मंत्र पढ़ें।

छठा कदम: पूजन करें
मां को रोली, चंदन और अक्षत चढ़ाएं। फूल अर्पित करें। फिर धूप और दीप दिखाएं।

सातवां कदम: भोग लगाएं
मां को दूध की खीर या दूध से बनी मिठाई चढ़ाएं।

आठवां कदम: मंत्र जाप
मंत्र का जाप करें। माला से करेंगे तो गिनती आसान होगी।

नौवां कदम: घंटी बजाकर आरती करें
आरती के समय घंटी जरूर बजाएं। अंत में प्रसाद बांटें।

मां चंद्रघंटा को क्या भोग लगाएं

मां को दूध से बनी चीजें पसंद मानी जाती हैं। खासकर खीर का भोग शुभ माना जाता है।

भोग खास बात
दूध की खीर सबसे प्रिय भोग माना जाता है
दूध से बनी मिठाई रसमलाई, बर्फी या पेड़ा
शहद थोड़ी मात्रा में चढ़ा सकते हैं
फल केला, सेब या अनार
मेवे बादाम, किशमिश या काजू

ध्यान रहे: भोग साफ-सफाई से बनाएं। उसमें लहसुन-प्याज न डालें। भोग का कुछ हिस्सा गाय या जरूरतमंद को दें, तो और अच्छा।

मां चंद्रघंटा के मंत्र

बीज मंत्र

ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥

ध्यान मंत्र

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

जितना हो सके, उतना ही पढ़ें। भाव सबसे जरूरी है।

मां चंद्रघंटा की आरती

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम।
पूर्ण कीजो मेरे काम॥
चंद्र समान तू शीतल दाती।
चंद्र तेज किरणों में समाती॥
क्रोध को शांत करने वाली।
मीठे बोल सिखाने वाली॥
मन की मालक मन भाती हो।
चंद्रघंटा तुम वर दाती हो॥
सुंदर भाव को लाने वाली।
हर संकट में बचाने वाली॥
हर बुधवार जो तुझे ध्याये।
श्रद्धा सहित जो विनय सुनाए॥
मूर्ति चंद्र आकार बनाए।
सन्मुख घी की ज्योति जलाए॥
शीश झुका कहे मन की बाता।
पूर्ण आस करो जगदाता॥
कांची पुर स्थान तुम्हारा।
करनाटिका में मान तुम्हारा॥
नाम तेरा रटू महारानी।
भक्त की रक्षा करो भवानी॥

क्या करें और क्या न करें

क्या करें क्या न करें
सुबह जल्दी उठकर पूजा करें पूजा में जल्दबाजी न करें
साफ कपड़े पहनें गंदे या फटे कपड़े न पहनें
घंटी बजाकर आरती करें शोर-शराबा और झगड़ा न करें
शांत स्वभाव रखें गुस्से में कड़वे शब्द न बोलें
सात्विक भोजन करें लहसुन-प्याज और मांसाहार न खाएं
जरूरतमंद की मदद करें किसी को नीचा न दिखाएं
घर के बड़ों का आशीर्वाद लें बड़ों की बात को अनसुना न करें

व्रत रखने वालों के लिए सुझाव

  • दिन में फल, दूध और मेवे लेते रहें।
  • खूब पानी पिएं।
  • सेंधा नमक का ही इस्तेमाल करें।
  • ज्यादा तला-भुना न खाएं।
  • सेहत ठीक न हो, तो डॉक्टर की सलाह से ही व्रत रखें। अपना ध्यान रखना भी जरूरी है।

आज की जिंदगी में मां का संदेश

आज हम सब किसी न किसी डर से जूझ रहे हैं। कोई नौकरी जाने से डरता है। कोई परीक्षा के रिजल्ट से। किसी को लोगों की बातों का डर है। मां चंद्रघंटा कहती हैं:

  • डर को नाम दो और उसका सामना करो।
  • अपनी बात शांति से रखो, पर साफ रखो।
  • गलत के आगे चुप मत रहो।
  • खुद पर भरोसा रखो।

जब मां के हाथों में अभय की मुद्रा है, तो हमें किस बात की चिंता? बस अपना काम ईमानदारी से करते रहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. नवरात्र के तीसरे दिन किसकी पूजा होती है?
मां चंद्रघंटा की।

2. मां का वाहन क्या है?
सिंह, यानी शेर।

3. मां को कौन सा भोग पसंद है?
दूध से बनी चीजें, खासकर खीर।

4. मां के माथे पर क्या है?
घंटे के आकार का अर्धचंद्र।

5. मां के कितने हाथ हैं?
दस हाथ। उनमें अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र और कमल सजे हैं।

6. पूजा में घंटी क्यों बजाते हैं?
मान्यता है कि घंटे की आवाज से नकारात्मकता दूर होती है। मां के नाम में भी घंटा जुड़ा है।

7. क्या घर में अकेले पूजा की जा सकती है?
बिल्कुल। मां श्रद्धा देखती हैं, भीड़ नहीं।

मां चंद्रघंटा की कथा हमें सिखाती है कि शांत रहना कमजोरी नहीं है। और जरूरत पड़ने पर डटकर खड़े होना भी जरूरी है। तीसरे दिन मां के आगे दीया जलाइए। घंटी बजाइए। मन से सारे डर निकाल दीजिए। मां चंद्रघंटा आपको हिम्मत, शांति और सुख दें।

जय माता दी! 

तपस्या की देवी: मां ब्रह्मचारिणी की पावन कथा, जो सिखाती है हार न मानना

नवरात्र का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। वे मां दुर्गा की दूसरी शक्ति मानी जाती हैं। मां की पूजा से ज्यादा लोग उनकी कथा सुनते हैं। वजह साफ है। यह कथा सिर्फ एक देवी की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जिसने ठान लिया और फिर पीछे नहीं हटा। आइए, इस कथा को आसान भाषा में शुरू से जानते हैं।

Maa-Brahmacharini-Devotional-Poster

नाम का मतलब क्या है

पहले नाम को समझ लेते हैं।

शब्द मतलब
ब्रह्म तप, तपस्या
चारिणी आचरण करने वाली
ब्रह्मचारिणी तप का आचरण करने वाली देवी

यानी जिसने अपना पूरा जीवन तप को दे दिया। इसी वजह से मां के हाथ में माला और कमंडल दिखाई देते हैं।

कथा की शुरुआत: सती से पार्वती तक

बहुत समय पहले की बात है। राजा दक्ष की बेटी थीं सती। उनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। एक बार राजा दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ किया। उसमें उन्होंने सबको बुलाया, पर शिव जी को नहीं। ऊपर से उन्होंने शिव जी का अपमान भी किया। सती यह सहन नहीं कर पाईं। उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। पर कथा यहीं खत्म नहीं होती। सती ने संकल्प लिया था कि अगले जन्म में भी वे शिव जी की ही अर्धांगिनी बनेंगी। उनका अगला जन्म हुआ पर्वतराज हिमालय के घर। तब उनका नाम पड़ा पार्वती। उन्हें शैलपुत्री भी कहा गया। नवरात्र के पहले दिन इन्हीं की पूजा होती है।

नारद जी का आना

जब पार्वती बड़ी हुईं, तो एक दिन देवर्षि नारद हिमालय के महल में आए। नारद जी ने पार्वती का भविष्य बताया। उन्होंने कहा:

“यह कन्या बहुत भाग्यशाली है। इसका विवाह भगवान शिव से होगा।”

यह सुनकर हिमालय और उनकी पत्नी मैना बहुत खुश हुए। फिर नारद जी ने एक बात और कही। उन्होंने बताया कि शिव जी सांसारिक सुखों से दूर रहने वाले योगी हैं। उन्हें पाना आसान नहीं होगा। इसके लिए कठिन तपस्या करनी पड़ेगी। पार्वती ने यह बात गांठ बांध ली। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया कि मुझे शिव जी ही चाहिए। और अगर तप ही रास्ता है, तो मैं तप करूंगी।

माता-पिता को मनाना

पार्वती ने अपने माता-पिता से तपस्या के लिए जाने की अनुमति मांगी। मां मैना का दिल घबरा गया। वे बेटी को कष्ट में नहीं देखना चाहती थीं। उन्होंने बहुत समझाया और कहा, “उ मा”, यानी “बेटी, मत करो।” कहा जाता है कि इसी वजह से पार्वती का एक नाम उमा पड़ा। लेकिन पार्वती का इरादा पक्का था। आखिर माता-पिता ने उन्हें जाने की आज्ञा दे दी।

तपस्या के वे कठिन साल

अब शुरू हुई असली परीक्षा। पार्वती राजमहल का सुख छोड़कर वन में चली गईं। कथाओं के अनुसार उनकी तपस्या कुछ इस तरह आगे बढ़ी:

समय क्या किया
शुरुआती हजार साल सिर्फ फल और फूल खाकर तप किया
अगले सौ साल सिर्फ साग और पत्ते खाए
कई सालों तक खुले आसमान के नीचे रहीं
धूप, बारिश और ठंड हर मौसम सहा, पर तप नहीं छोड़ा
कई हजार साल सूखे बेलपत्र खाकर साधना की
आखिर में सूखे पत्ते भी छोड़ दिए

जब उन्होंने पत्ते खाना भी छोड़ दिया, तब उनका नाम अपर्णा पड़ा। अपर्णा का मतलब है, जिसने पत्ता तक न खाया। सोचिए, कितना धैर्य होगा। कोई शॉर्टकट नहीं था। कोई जल्दी नहीं थी। बस रोज की साधना थी।

जब सारे लोक हिल गए

मां की तपस्या इतनी कठोर थी कि उसकी चर्चा तीनों लोकों में होने लगी। उनका शरीर बहुत कमजोर हो गया था। फिर भी चेहरे पर तेज था। देवता, ऋषि और मुनि सब मां की प्रशंसा करने लगे। सबने माना कि ऐसी तपस्या पहले किसी ने नहीं की। तब ब्रह्मा जी की आकाशवाणी हुई। उसमें कहा गया:

“देवी, तुम्हारे जैसी तपस्या आज तक किसी ने नहीं की। तुम्हारी मनोकामना जरूर पूरी होगी। अब तप छोड़कर घर लौट जाओ। तुम्हें शिव जी पति के रूप में मिलेंगे।”

परीक्षा की एक और घड़ी

कुछ कथाओं में एक और प्रसंग आता है। कहते हैं कि शिव जी ने पार्वती की सच्चाई परखने के लिए सप्तऋषियों को भेजा। बाद में वे खुद भी भेष बदलकर आए। उन्होंने पार्वती से कहा, “शिव तो श्मशान में रहते हैं। वे तुम्हारे लायक नहीं हैं। किसी और को चुन लो।” पार्वती ने साफ जवाब दिया। उन्होंने कहा कि मैं उन्हें जानती हूं। मेरा मन बदलने वाला नहीं है। चाहे करोड़ों साल तप करना पड़े, मैं शिव जी को ही चुनूंगी। इस जवाब से शिव जी प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने पार्वती को अपनाया।

(यह प्रसंग अलग-अलग पुराणों और परंपराओं में थोड़े अलग रूप में मिलता है।)

कथा का अंत

इसके बाद शिव जी और पार्वती का विवाह हुआ। मां की सालों की साधना सफल हुई। यही रूप, यानी तप में लगी हुई पार्वती, मां ब्रह्मचारिणी के नाम से पूजा जाता है।

मां का स्वरूप और उसका संदेश

मां के रूप की हर चीज कुछ कहती है।

स्वरूप इसका संदेश
सफेद वस्त्र मन की पवित्रता
दाएं हाथ में माला रोज की साधना और लगन
बाएं हाथ में कमंडल सादगी और संयम
बिना वाहन के चलना बिना सहारे के भी आगे बढ़ने का हौसला
शांत चेहरा धैर्य और स्थिरता

इस कथा से हम क्या सीखें

1. लक्ष्य साफ रखें
मां को पता था कि उन्हें क्या चाहिए। जब मंजिल साफ होती है, तो रास्ता भी मिल जाता है।

2. धैर्य रखें
मां ने सालों इंतजार किया। आज हम दो दिन में थक जाते हैं। मां की कथा याद दिलाती है कि बड़े काम में समय लगता है।

3. मुश्किल में भी डटे रहें
धूप, बारिश, ठंड और भूख, सब सहा। फिर भी मां पीछे नहीं हटीं।

4. दूसरों की बातों से न डिगें
लोगों ने कहा, “रुक जाओ।” पर मां ने अपने मन की सुनी।

5. सादगी में भी ताकत है
मां के पास न राजसी ठाठ था, न कोई वाहन। फिर भी वे सबसे ताकतवर साबित हुईं।

आज की जिंदगी में यह कथा क्यों जरूरी है

आज के समय में हम सब जल्दी में हैं। हर चीज तुरंत चाहिए। नतीजा न मिले, तो हम हार मान लेते हैं। ऐसे में मां ब्रह्मचारिणी की कथा एक सहारा है। यह कहती है:

  • विद्यार्थी हो, तो रोज पढ़ो। एक दिन में रिजल्ट नहीं आता।
  • नौकरी ढूंढ रहे हो, तो कोशिश मत छोड़ो।
  • अपना काम शुरू किया हो, तो टिके रहो।
  • कोई सपना हो, तो उसे रोज थोड़ा-थोड़ा पूरा करो।

इसीलिए इस दिन को खासतौर पर विद्यार्थियों और मेहनत करने वालों के लिए शुभ माना जाता है।

कथा सुनने के बाद पूजा कैसे करें

अगर आप आज मां की पूजा कर रहे हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें।

पूजा की आसान विधि:

  1. सुबह नहाकर साफ कपड़े पहनें।
  2. कलश के पास मां की तस्वीर रखें।
  3. रोली, चावल और सफेद फूल चढ़ाएं।
  4. घी का दीया जलाएं।
  5. चीनी, मिश्री या पंचामृत का भोग लगाएं।
  6. मंत्र का जाप करें।
  7. आरती करके प्रसाद बांटें।

बीज मंत्र:

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

प्रार्थना मंत्र:

या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मां को प्रिय भोग

भोग मान्यता
चीनी मां को बहुत प्रिय मानी जाती है
मिश्री शुद्धता का प्रतीक
पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और चीनी से बनता है

माना जाता है कि इस भोग से घर के सदस्यों को लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है। भोग का एक हिस्सा घर के बड़ों को जरूर दें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. मां ब्रह्मचारिणी कौन हैं?
वे मां दुर्गा का दूसरा रूप हैं। वे पार्वती जी का वह रूप हैं जब उन्होंने शिव जी को पाने के लिए तप किया था।

2. उनका नाम अपर्णा क्यों पड़ा?
कठिन तप में उन्होंने पत्ते खाना भी छोड़ दिया था। इसलिए उन्हें अपर्णा कहा गया।

3. उन्हें उमा क्यों कहते हैं?
कथा के अनुसार, मां मैना ने उन्हें तप से रोकने के लिए “उ मा” कहा था। यहीं से यह नाम चला।

4. मां के हाथ में क्या होता है?
दाएं हाथ में माला और बाएं हाथ में कमंडल।

5. यह कथा किन ग्रंथों में मिलती है?
इसका उल्लेख शिव पुराण, देवी भागवत और रामचरितमानस जैसे ग्रंथों में अलग-अलग रूप में मिलता है।

मां ब्रह्मचारिणी की कथा हमें एक सीधी बात सिखाती है। जो टिका रहता है, वही पाता है। आज मां के आगे एक दीया जलाइए। अपने सपने मन ही मन उन्हें बता दीजिए। फिर उन्हें पूरा करने में जुट जाइए। मां ब्रह्मचारिणी आपको धैर्य, ज्ञान और हिम्मत दें।

जय माता दी! 

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा: तपस्या से मिलती है हर मंजिल, जानें पूजा विधि, कथा, भोग, मंत्र और आरती

आज शारदीय नवरात्र का दूसरा दिन है। आज मां दुर्गा के दूसरे रूप, मां ब्रह्मचारिणी, की पूजा होती है।कल हमने मां शैलपुत्री की पूजा की थी। आज की देवी तपस्या और धैर्य की मिसाल हैं। उनकी कहानी सिखाती है कि मेहनत और सब्र का फल जरूर मिलता है।

आज की तारीख और तिथि

इस साल दूसरा नवरात्र सोमवार, 12 अक्टूबर 2026 को पड़ रहा है। यह दिन द्वितीया तिथि का है। नवरात्र का समापन 20 अक्टूबर को दशहरे के साथ होगा। आज घटस्थापना नहीं होती। वह कल हो चुकी है। आज बस कलश के आगे दीया जलाना है और मां की पूजा करनी है।

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ध्यान दें: द्वितीया तिथि का सही समय हर शहर में थोड़ा अलग होता है। पूजा से पहले अपने स्थानीय पंचांग में एक बार देख लें।

कौन हैं मां ब्रह्मचारिणी?

“ब्रह्म” का मतलब है तप। “चारिणी” का मतलब है आचरण करने वाली। यानी तप का आचरण करने वाली देवी। मां ब्रह्मचारिणी का रूप बहुत सादा और शांत है। वे यह नहीं दिखातीं कि ताकत कैसे दिखाई जाए। वे यह बताती हैं कि ताकत कैसे बनाई जाती है।

मां का स्वरूप

अंग कैसा है
वस्त्र सफेद रंग की साड़ी
दाहिना हाथ जप की माला
बायां हाथ कमंडल
वाहन कोई वाहन नहीं, मां पैदल चलती हैं
भाव शांत, तेजस्वी और गंभीर

मां के नंगे पांव यह दिखाते हैं कि तप में सुख-सुविधा की जगह नहीं होती।

मां ब्रह्मचारिणी की कथा

कथा बहुत पुरानी है, लेकिन आज भी दिल को छू जाती है।

जन्म और नारद जी की बात

मां पिछले जन्म में सती थीं। इस जन्म में वे पर्वतराज हिमालय के घर पैदा हुईं। जब वे बड़ी हुईं, तो देवर्षि नारद उनसे मिलने आए। नारद जी ने कहा, “बेटी, तुम्हारा विवाह भगवान शिव से होगा। लेकिन उन्हें पाना आसान नहीं है। इसके लिए कठिन तपस्या करनी पड़ेगी।” मां ने यह बात मन में बिठा ली। उन्होंने तय कर लिया कि शिव जी को ही पति बनाना है।

कठिन तपस्या

मां ने घर छोड़ दिया और तप में लग गईं। कथा के अनुसार:

  • पहले हजार साल उन्होंने सिर्फ फल-फूल खाए।
  • फिर सौ साल तक सिर्फ साग-पत्ते खाए।
  • कई दिन उन्होंने खुले आसमान के नीचे बिताए। धूप, बारिश और ठंड सब सही।
  • फिर उन्होंने सूखे बेलपत्र खाए।
  • आखिर में उन्होंने वह भी छोड़ दिया। बिना अन्न-जल के तप किया।

पत्ते तक छोड़ देने के कारण उनका एक नाम अपर्णा पड़ा। “अपर्णा” का मतलब है, जिसने पत्ता भी न खाया।

तपस्या का फल

तप के कारण मां का शरीर बहुत कमजोर हो गया। तब देवताओं और ऋषियों ने उनकी तपस्या की प्रशंसा की। आकाशवाणी हुई कि “तुम्हारी इच्छा जरूर पूरी होगी।” इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें अपनाया। मां ब्रह्मचारिणी की यह कथा बताती है कि सच्ची लगन कभी बेकार नहीं जाती।

आज इनकी पूजा क्यों होती है?

माना जाता है कि मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से ये बातें मिलती हैं:

  • धैर्य: मुश्किल वक्त में टिके रहने की ताकत।
  • संयम: अपने मन और इच्छाओं पर काबू।
  • ज्ञान: पढ़ाई और समझ में बढ़ोतरी।
  • आत्मविश्वास: अपने लक्ष्य पर भरोसा।

इसीलिए विद्यार्थियों और मेहनत करने वालों के लिए यह दिन खास माना जाता है। मान्यता है कि मां की साधना से स्वाधिष्ठान चक्र मजबूत होता है। इस बात को लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार मानते हैं।

पूजा की सामग्री

सामग्री किसलिए
मां की तस्वीर या मूर्ति पूजा के लिए
रोली, अक्षत (चावल), चंदन तिलक और पूजा के लिए
सफेद या पीले फूल मां को चढ़ाने के लिए
घी का दीपक आरती के लिए
धूप और अगरबत्ती वातावरण शुद्ध करने के लिए
गंगाजल शुद्धि के लिए
रुद्राक्ष या तुलसी की माला मंत्र जाप के लिए
चीनी, मिश्री और पंचामृत भोग के लिए

पूजा की आसान विधि

पहला कदम: स्नान करें
सुबह जल्दी उठें। नहाकर साफ कपड़े पहनें। सफेद या हल्के रंग के कपड़े अच्छे माने जाते हैं।

दूसरा कदम: जगह साफ करें
पूजा की जगह पर गंगाजल छिड़कें। कलश के सामने मां की तस्वीर रखें।

तीसरा कदम: संकल्प लें
हाथ में थोड़ा जल और चावल लें। मन में कहें कि आप श्रद्धा से मां की पूजा कर रहे हैं।

चौथा कदम: मां का ध्यान करें
आंखें बंद करें। मां के शांत और तेजस्वी रूप को याद करें। ध्यान मंत्र पढ़ें।

पांचवां कदम: पूजन करें
मां को रोली, चंदन और अक्षत चढ़ाएं। फिर फूल अर्पित करें। इसके बाद धूप और दीप दिखाएं।

छठा कदम: भोग लगाएं
मां को चीनी, मिश्री या पंचामृत का भोग लगाएं।

सातवां कदम: मंत्र जाप
माला लेकर बीज मंत्र का जाप करें। 108 बार कर सकें तो बहुत अच्छा। न कर सकें तो जितना हो सके उतना करें।

आठवां कदम: आरती करें
अंत में आरती उतारें। फिर प्रसाद सबको बांट दें। साथ ही घर के बड़ों का आशीर्वाद लें।

मां ब्रह्मचारिणी को क्या भोग लगाएं

मां को चीनी और मिश्री बहुत प्रिय मानी जाती हैं। मान्यता है कि इस भोग से लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है।

भोग खास बात
चीनी सबसे प्रिय भोग माना जाता है
मिश्री साफ कटोरी में रखकर चढ़ाएं
पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और चीनी से बनता है
दूध से बनी मिठाई खीर या सफेद बर्फी
फल केला या सेब

ध्यान रहे: भोग बनाते समय साफ-सफाई रखें। लहसुन-प्याज का इस्तेमाल न करें। भोग का कुछ हिस्सा घर के बड़ों को जरूर दें।

मां ब्रह्मचारिणी के मंत्र

बीज मंत्र

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

ध्यान मंत्र

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मंत्र शुद्ध उच्चारण से पढ़ें। न आए तो धीरे-धीरे सीख लें। भाव सबसे जरूरी है।

मां ब्रह्मचारिणी की आरती

जय अंबे ब्रह्मचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता॥
ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो॥
ब्रह्म मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा॥
जय गायत्री वेद की माता।
जो जन जिस दिन तुम्हें ध्याता॥
कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए॥
उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने॥
रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर॥
आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना॥
ब्रह्मचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम॥
भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी॥

क्या करें और क्या न करें

क्या करें क्या न करें
सुबह जल्दी उठकर पूजा करें पूजा में जल्दबाजी न करें
सफेद या हल्के कपड़े पहनें भड़कीले या काले कपड़ों से बचें
शांत मन से मंत्र जाप करें गुस्सा और बहस न करें
बड़ों का सम्मान करें किसी का दिल न दुखाएं
सात्विक भोजन करें लहसुन-प्याज और मांसाहार न खाएं
रोज कलश के आगे दीया जलाएं कलश की जगह बार-बार न बदलें
जरूरतमंद की मदद करें झूठ और बुरे शब्दों से बचें

विद्यार्थियों के लिए खास बातें

अगर आप पढ़ाई कर रहे हैं, तो आज का दिन आपके लिए खास है।

  • सुबह मां के आगे दीया जलाएं।
  • पढ़ाई शुरू करने से पहले दो मिनट शांत बैठें।
  • आज मोबाइल कम चलाएं।
  • अपना लक्ष्य कागज पर लिखें।
  • रोज थोड़ा-थोड़ा पढ़ने का वादा करें।

मां की कथा यही सिखाती है। एक दिन की मेहनत से नहीं, रोज की लगन से बात बनती है।

व्रत रखने वालों के लिए सुझाव

  • दिन भर में फल, दूध और मेवे लेते रहें।
  • खूब पानी पिएं।
  • सेंधा नमक का ही इस्तेमाल करें।
  • ज्यादा तला-भुना न खाएं।
  • तबीयत ठीक न हो, तो डॉक्टर से पूछकर ही व्रत रखें। अपनी सेहत भी जरूरी है।

इस कथा से हम क्या सीखें?

मां ब्रह्मचारिणी की कहानी सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं है। उसमें जिंदगी का पाठ छिपा है।

  • लगन रखें: लक्ष्य बड़ा हो, तो रास्ता लंबा होगा।
  • धैर्य रखें: नतीजे तुरंत नहीं आते।
  • हार न मानें: मां ने हजारों साल तप किया, फिर भी डटी रहीं।
  • सादगी अपनाएं: असली ताकत दिखावे में नहीं, मन की मजबूती में है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. नवरात्र के दूसरे दिन किसकी पूजा होती है?
मां ब्रह्मचारिणी की।

2. मां को कौन सा भोग पसंद है?
चीनी, मिश्री और पंचामृत।

3. मां ब्रह्मचारिणी का वाहन क्या है?
मां का कोई वाहन नहीं है। वे पैदल चलती हुई दिखाई जाती हैं।

4. दूसरे दिन कौन सा रंग पहनना चाहिए?
सफेद रंग शुभ माना जाता है। क्षेत्र और पंचांग के अनुसार कुछ जगह अलग रंग भी बताए जाते हैं। आप अपनी परंपरा के अनुसार चलें।

5. क्या घर में अकेले पूजा की जा सकती है?
बिल्कुल। मां श्रद्धा देखती हैं, भीड़ नहीं।

नवरात्र का दूसरा दिन हमें ठहरना सिखाता है। जल्दबाजी की दुनिया में मां कहती हैं कि सब्र रखो और मेहनत करते रहो। आज थोड़ा समय अपने लिए निकालें। मां के आगे दीया जलाएं। अपने मन की बात उनसे कह दें। मां ब्रह्मचारिणी आपको ज्ञान, धैर्य और हिम्मत दें। आपकी हर मेहनत सफल हो।

जय माता दी! 

नवरात्र का पहला दिन: मां शैलपुत्री की पूजा कैसे करें? घटस्थापना की आसान विधि, भोग, मंत्र और आरती

आज शारदीय नवरात्र का पहला दिन है। घर-घर में माता के स्वागत की तैयारी है। आज मां दुर्गा के पहले रूप, मां शैलपुत्री, की पूजा होती है। आज ही घटस्थापना भी होती है।अगर आप पहली बार पूजा कर रहे हैं, तो घबराइए मत। इस ब्लॉग में सब कुछ आसान भाषा में है।

नवरात्र 2026 की तारीखें

इस साल शारदीय नवरात्र रविवार 11 अक्टूबर से शुरू होकर मंगलवार 20 अक्टूबर तक चलेंगे। घटस्थापना भी 11 अक्टूबर को ही है। 20 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा।

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घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 

मुहूर्त समय

प्रातःकाल घटस्थापना मुहूर्त सुबह 6:19 से 10:11 बजे तक
अभिजित मुहूर्त सुबह 11:44 से दोपहर 12:31 बजे तक

ध्यान रखें: अलग-अलग शहरों में समय थोड़ा बदल जाता है। इसलिए अपने शहर का सही समय स्थानीय पंचांग या पंडित जी से जरूर मिला लें। साथ ही, कुछ पंचांगों के अनुसार इस दिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग भी पड़ रहे हैं, जिन्हें कलश स्थापना के लिए ठीक नहीं माना जाता। इसी वजह से कई लोग अभिजित मुहूर्त में कलश बैठाना पसंद करते हैं। आप अपने पंडित जी की सलाह के अनुसार चलें।

कौन हैं मां शैलपुत्री?

“शैल” का मतलब है पहाड़। “पुत्री” का मतलब है बेटी। यानी पर्वत की बेटी। मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। पिछले जन्म में वे राजा दक्ष की बेटी सती थीं। एक बार दक्ष ने बड़ा यज्ञ किया। उसमें उन्होंने भगवान शिव का अपमान किया। यह सती से सहन नहीं हुआ। उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। अगले जन्म में वे हिमालय के घर जन्मीं। तब उनका नाम पड़ा शैलपुत्री। इन्हें पार्वती और हेमवती भी कहते हैं। बाद में उनका विवाह फिर से भगवान शिव से हुआ।

मां का स्वरूप

  • मां बैल (नंदी) पर सवार होती हैं। इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा भी कहते हैं।
  • उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल है।
  • बाएं हाथ में कमल का फूल है।
  • माथे पर आधा चंद्रमा सजा है।

पहले दिन इनकी पूजा क्यों?

मां शैलपुत्री स्थिरता और मजबूती का प्रतीक हैं। जैसे पहाड़ अडिग रहता है, वैसे ही मां भक्तों को हिम्मत देती हैं। मान्यता है कि इनकी पूजा से मन शांत होता है। घर में सुख-शांति आती है। साथ ही जीवन में आगे बढ़ने की ताकत मिलती है। नवरात्र की शुरुआत इन्हीं से होती है। जैसे किसी भी काम की नींव मजबूत होनी चाहिए, वैसे ही साधना की नींव भी मजबूत होनी चाहिए।

पूजा की सामग्री

पूजा शुरू करने से पहले सब चीजें पास रख लें। बीच में उठना नहीं पड़ेगा।

सामग्री किसलिए
मिट्टी का चौड़ा बर्तन जौ बोने के लिए
साफ मिट्टी और जौ हरियाली (जवारे) के लिए
तांबे या मिट्टी का कलश घटस्थापना के लिए
गंगाजल और साफ जल कलश में भरने के लिए
आम या अशोक के पत्ते (5 या 7) कलश के मुंह पर सजाने के लिए
जटा वाला नारियल कलश के ऊपर रखने के लिए
लाल चुनरी और मौली (कलावा) कलश और नारियल लपेटने के लिए
रोली, चावल (अक्षत), हल्दी तिलक और पूजा के लिए
सुपारी, सिक्का, लौंग-इलायची कलश में डालने के लिए
फूल और माला मां को चढ़ाने के लिए
घी, दीपक, धूप, अगरबत्ती ज्योति और आरती के लिए
मां की तस्वीर या मूर्ति पूजा के लिए
भोग का प्रसाद मां को अर्पित करने के लिए

 

 

घटस्थापना की आसान विधि

पहला कदम: घटस्थापना का मतलब है मां दुर्गा का आह्वान करना। यानी उन्हें अपने घर बुलाना। इसे कलश स्थापना भी कहते हैं। पहला कदम: स्नान और संकल्प सुबह जल्दी उठें। नहा-धोकर साफ कपड़े पहनें। फिर पूजा की जगह पर बैठकर मन में संकल्प लें कि आप पूरे नौ दिन श्रद्धा से पूजा करेंगे।

दूसरा कदम: जगह की सफाई
पूजा की जगह को अच्छे से साफ करें। गंगाजल छिड़कें। यह जगह घर के उत्तर-पूर्व कोने में हो तो अच्छा माना जाता है।

तीसरा कदम: जौ बोना
मिट्टी के बर्तन में थोड़ी साफ मिट्टी बिछाएं। उसमें जौ डालें। ऊपर से फिर थोड़ी मिट्टी डाल दें। हल्का पानी छिड़कें।

चौथा कदम: कलश तैयार करें
कलश पर रोली से स्वास्तिक बनाएं। गले में मौली बांधें। अब उसमें साफ जल भरें। चाहें तो थोड़ा गंगाजल मिला लें। उसमें सुपारी, सिक्का, अक्षत और लौंग डालें।

पांचवां कदम: कलश की स्थापना
कलश के मुंह पर आम के पत्ते लगाएं। उसके ऊपर नारियल रखें। नारियल पर लाल चुनरी लपेटें। अब इस कलश को जौ वाले बर्तन के बीच में रखें।

छठा कदम: दीपक जलाएं
घी का दीपक जलाएं। कई लोग नौ दिन तक अखंड ज्योति जलाते हैं। अगर आप ऐसा कर सकें तो करें। न कर पाएं, तो रोज सुबह-शाम दीया जलाएं।

सातवां कदम: मां शैलपुत्री की पूजा
मां की तस्वीर के आगे रोली, चावल और फूल चढ़ाएं। धूप-दीप दिखाएं। फिर भोग लगाएं और मंत्र पढ़ें।

आठवां कदम: आरती अंत में आरती करें। सबको प्रसाद बांटें।

मां शैलपुत्री को क्या भोग लगाएं

मां को शुद्ध देसी घी बहुत प्रिय है। पहले दिन सफेद चीजों का भोग शुभ माना जाता है।

भोग कैसे चढ़ाएं
शुद्ध देसी घी सीधे मां के चरणों में या दीपक में
दूध की खीर साफ कटोरी में रखकर
सफेद बर्फी या मिठाई थाली में सजाकर
मिश्री छोटी कटोरी में
दूध से बनी कोई भी मिठाई श्रद्धा से

ध्यान रहे: भोग साफ-सफाई से बनाएं। उसमें लहसुन-प्याज बिल्कुल न डालें।

मां शैलपुत्री के मंत्र

पूजा के समय इन मंत्रों का जाप करें। जितना समझ आए, उतना ही पढ़ें। भाव सबसे जरूरी है।

बीज मंत्र

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

ध्यान मंत्र

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

आप चाहें तो 108 बार बीज मंत्र का जाप कर सकते हैं। माला के साथ करेंगे तो गिनती आसान रहेगी।

मां शैलपुत्री की आरती

शैलपुत्री मां बैल असवार।
करें देवता जय जयकार॥
शिव शंकर की प्रिय भवानी।
तेरी महिमा किसी ने न जानी॥
पार्वती तू उमा कहलावे।
जो तुझे सिमरे सो सुख पावे॥
रिद्धि-सिद्धि परवान करे तू।
दया करे धनवान करे तू॥
सोमवार को शिव संग प्यारी।
आरती तेरी जिसने उतारी॥
उसकी सगरी आस पुजा दो।
सगरे दुख तकलीफ मिटा दो॥
घी का सुंदर दीप जला के।
गोला गरी का भोग लगा के॥
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं।
प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं॥
जय गिरराज किशोरी अंबे।
शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे॥
मनोकामना पूर्ण कर दो।
भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो॥

क्या करें और क्या न करें

क्या करें क्या न करें
सुबह जल्दी उठकर नहाएं देर तक सोते न रहें
साफ और हल्के रंग के कपड़े पहनें काले कपड़े पहनने से बचें
घर और पूजा की जगह साफ रखें पूजा स्थल पर गंदगी न रखें
सात्विक भोजन करें लहसुन-प्याज और मांसाहार से दूर रहें
मन शांत और विचार अच्छे रखें गुस्से और झगड़े से बचें
रोज दीया जलाएं कलश को बार-बार न हिलाएं
कन्याओं का सम्मान करें किसी का अपमान न करें

व्रत रखने वालों के लिए कुछ आसान सुझाव

  • दिन में फल, दूध और मेवे लेते रहें।
  • खूब पानी पिएं।
  • सेंधा नमक का ही इस्तेमाल करें।
  • साबूदाना, कुट्टू का आटा और सिंघाड़े का आटा व्रत में चलता है।
  • तबीयत खराब हो, तो डॉक्टर की सलाह जरूर लें। श्रद्धा के साथ अपनी सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी है।

पूजा का असली मतलब

पूजा सिर्फ विधि का नाम नहीं है। असली पूजा मन की सच्चाई में है। अगर किसी वजह से सारी सामग्री न जुटा पाएं, तो परेशान न हों। एक दीया, थोड़े फूल और सच्चे मन की प्रार्थना भी मां स्वीकार कर लेती हैं। मां शैलपुत्री हमें सिखाती हैं कि हालात कैसे भी हों, पहाड़ की तरह डटे रहो।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. नवरात्र के पहले दिन किस देवी की पूजा होती है?
मां शैलपुत्री की।

2. घटस्थापना कब करनी चाहिए?
प्रतिपदा तिथि में, मुहूर्त के समय। ऊपर दिए गए समय देखें और अपने शहर का समय मिला लें।

3. क्या घटस्थापना खुद की जा सकती है?
हां। आप श्रद्धा और सही विधि से खुद कर सकते हैं। चाहें तो पंडित जी से भी करवा सकते हैं।

4. जौ क्यों बोते हैं?
जौ को समृद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। नौ दिन में हरे-हरे जवारे उगना शुभ संकेत समझा जाता है।

5. अगर कलश मुहूर्त में न रख पाएं तो?
उसी दिन प्रतिपदा रहते हुए जितनी जल्दी हो सके, स्थापना कर लें। मन में ग्लानि न रखें।

आखिर में

नवरात्र नौ दिन का त्योहार है। यह अपने भीतर की शक्ति को जगाने का मौका है। आज पहला दिन है। साफ मन से शुरुआत करें।

मां शैलपुत्री आप सब पर कृपा करें। आपके घर में सुख, शांति और खुशहाली बनी रहे।

जय माता दी! 

 

 

नवरात्रि में व्रत कैसे रखें और उद्यापन कैसे करें: एक आसान गाइड

हर साल नवरात्रि आते ही घर में एक अलग ही माहौल बन जाता है। सुबह-सुबह माँ की आरती की आवाज़, रसोई में कुट्टू के आटे की ख़ुशबू और मन में एक सवाल: “इस बार नवरात्रि व्रत ठीक से रख पाऊँगी या नहीं?”

अगर आप पहली बार नवरात्रि व्रत रख रहे हैं, या हर साल रखते हैं पर विधि को लेकर मन में थोड़ी उलझन रहती है, तो यह लेख आपके लिए है। इसमें बिना कठिन शब्दों के व्रत से उद्यापन तक की पूरी बात है। इस साल नवरात्रि 11 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2026 तक है।

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व्रत रखने का असली मतलब क्या है

व्रत सिर्फ़ भूखे रहने का नाम नहीं है। इसका असली भाव है मन, शरीर और खान-पान को शुद्ध रखकर माँ दुर्गा को याद करना। इसलिए अगर कोई पूरा निर्जल व्रत नहीं रख सकता, तो भी श्रद्धा से रखा गया फलाहारी व्रत उतना ही मान्य है।

आप किस तरह का व्रत रख सकते हैं

अपनी सेहत और सुविधा के हिसाब से इनमें से कोई भी तरीका चुन सकते हैं:

व्रत का तरीका क्या होता है किसके लिए ठीक है
पूर्ण उपवास दिन भर अन्न-जल या सिर्फ़ जल पर रहना जो पहले से अभ्यस्त हों और स्वस्थ हों
फलाहारी व्रत फल, दूध, मखाना और व्रत वाले आटे से बना भोजन ज़्यादातर लोगों के लिए सबसे आसान
एक समय भोजन दिन में एक बार व्रत वाला सात्विक खाना कामकाजी लोगों और बुज़ुर्गों के लिए
पहले और आख़िरी दिन का व्रत सिर्फ़ पहले (प्रतिपदा) और आख़िरी दिन व्रत जो नौ दिन नहीं रख सकते

ज़रूरी बात: अगर आप गर्भवती हैं, डायबिटीज़ या ब्लड प्रेशर जैसी कोई समस्या है, या बहुत बुज़ुर्ग हैं, तो व्रत शुरू करने से पहले डॉक्टर से पूछ लें। माँ की भक्ति सेहत की क़ीमत पर नहीं होती।

व्रत की शुरुआत: पहले दिन क्या करें

1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। साफ़ कपड़े पहनें। कई लोग इन दिनों लाल, पीला या उस दिन का शुभ रंग पहनते हैं।

2. पूजा स्थान को साफ़ करें। घर के मंदिर या किसी साफ़-सुथरी जगह पर चौकी रखें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएँ। माँ दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

3. संकल्प लें। हाथ में थोड़ा जल, अक्षत (चावल) और फूल लेकर मन में कहें कि आप किस नियम से और कितने दिन का व्रत रखेंगे। यह बिल्कुल सरल भाषा में हो सकता है, जैसे “माँ, मैं नौ दिन श्रद्धा से व्रत रखूँगा/रखूँगी, मुझे शक्ति देना।”

4. कलश स्थापना (घटस्थापना) करें। यह नवरात्रि की सबसे अहम रस्म है। इसकी सामग्री यह है:

सामग्री कैसे इस्तेमाल करें
मिट्टी का पात्र और जौ मिट्टी में जौ बोएँ, ये नौ दिन में हरे अंकुर बनते हैं
कलश (तांबा या मिट्टी) जल भरकर पात्र के पास रखें
आम के पत्ते और नारियल कलश के ऊपर पत्ते रखकर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें
अखंड ज्योत (वैकल्पिक) नौ दिन जलने वाला दीपक, यदि देखभाल कर सकें
रोली, चावल, फूल, धूप, दीप रोज़ की पूजा के लिए

घटस्थापना का शुभ समय हर साल पंचांग से तय होता है, इसलिए अपने स्थानीय पंडित जी से या किसी भरोसेमंद पंचांग से समय ज़रूर देख लें।

रोज़ की पूजा कैसे करें

पूजा लंबी या जटिल नहीं होनी चाहिए। रोज़ का सीधा-सा क्रम यह है:

  1. सुबह स्नान के बाद दीपक जलाएँ।
  2. उस दिन की देवी को रोली, चावल और फूल चढ़ाएँ।
  3. दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती या अपनी श्रद्धा के अनुसार माँ के मंत्र का पाठ करें।
  4. आरती करें और भोग लगाएँ।
  5. शाम को फिर दीपक जलाकर आरती करें।

जो लोग सप्तशती नहीं पढ़ पाते, वे सिर्फ़ “ॐ दुं दुर्गायै नमः” का जाप भी कर सकते हैं। मन से किया गया छोटा पाठ भी पूरा माना जाता है।

नौ दिनों में किस देवी की पूजा होती है

दिन देवी तारीख (2026)
1 शैलपुत्री 11 अक्टूबर
2 ब्रह्मचारिणी 12 अक्टूबर
3 चंद्रघंटा 13 अक्टूबर
4 कूष्मांडा 14 अक्टूबर
5 स्कंदमाता 15 अक्टूबर
6 कात्यायनी 16 अक्टूबर
7 कालरात्रि 17 अक्टूबर
8 महागौरी 18 अक्टूबर
9 सिद्धिदात्री 19 अक्टूबर

व्रत में क्या खाएँ और क्या नहीं

यहाँ अक्सर सबसे ज़्यादा भ्रम होता है। नीचे की तालिका से सब साफ़ हो जाएगा:

खा सकते हैं न खाएँ
कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, राजगिरा गेहूँ, चावल, दालें और आम अनाज
साबूदाना, समा के चावल (साँवा) प्याज़ और लहसुन
सेंधा नमक साधारण नमक
आलू, लौकी, कद्दू, अरबी, शकरकंद मांस, मछली, अंडा
सभी फल, मखाना, मेवे शराब और तंबाकू
दूध, दही, पनीर, घी बाहर का पैकेट वाला प्रोसेस्ड खाना

एक छोटी सलाह: व्रत में सिर्फ़ तला हुआ खाना न खाएँ। दही, फल और नारियल पानी बीच-बीच में लेते रहें, ताकि पानी की कमी और कमज़ोरी न हो। पानी भरपूर पिएँ।

व्रत के दौरान ये नियम भी निभाएँ

व्रत सिर्फ़ खाने तक सीमित नहीं है। इन बातों का भी ध्यान रखा जाता है:

  • मन में क्रोध, झगड़ा और बुरे विचार न आने दें।
  • सादा और संयमित जीवन जिएँ, ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • घर और पूजा स्थान साफ़ रखें।
  • झूठ न बोलें और किसी का अपमान न करें।
  • ज़रूरतमंद को खाना या दान दें।

कई परिवारों में इन दिनों चमड़े का सामान न पहनने और नाखून-बाल न काटने की भी परंपरा है। यह हर घर और इलाके में थोड़ी अलग हो सकती है, इसलिए अपने परिवार की परंपरा के अनुसार चलें।

उद्यापन क्या होता है और कब करें

उद्यापन का मतलब है व्रत का विधिवत समापन। जैसे परीक्षा पूरी होने पर कोई “धन्यवाद” कहता है, वैसे ही माँ का आभार मानकर व्रत पूरा किया जाता है।

परंपरा के अनुसार उद्यापन अष्टमी या नवमी को किया जाता है। यह आपके घर की परंपरा पर निर्भर करता है कि आप किस दिन करते हैं। 2026 में अष्टमी 18 अक्टूबर और नवमी 19 अक्टूबर को है। फिर दशमी (20 अक्टूबर) को व्रत का पारण होता है।

उद्यापन की विधि

1. सुबह की पूजा और हवन। सुबह स्नान के बाद माँ की पूजा करें। जो लोग हवन कर सकते हैं, वे हवन कुंड में आम की लकड़ी, घी, जौ, तिल और हवन सामग्री से आहुति दें। हवन न कर पाएँ तो घी का दीपक जलाकर विशेष आरती भी की जा सकती है।

2. कन्या पूजन। यह उद्यापन का सबसे ख़ास हिस्सा है।

काम कैसे करें
कन्याओं को बुलाएँ 9 छोटी कन्याएँ (लगभग 2 से 10 साल की) और एक छोटा बालक, जिसे “लंगूर” या बटुक भैरव का रूप माना जाता है
पैर धोएँ आदर से साफ़ जल से उनके पैर धोएँ और आसन पर बिठाएँ
तिलक और चुनरी माथे पर रोली का तिलक लगाएँ, कलाई पर मौली बाँधें और चुनरी दें
भोजन परोसें आमतौर पर पूरी, काले चने और सूजी का हलवा
दक्षिणा और उपहार अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार पैसे, फल, चूड़ियाँ, पेंसिल-कॉपी या कोई छोटा उपहार
आशीर्वाद लें उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें और प्रेम से विदा करें

कन्याओं को देवी का रूप मानकर पूजा जाता है, इसलिए यहाँ दिखावे से ज़्यादा सम्मान और स्नेह मायने रखता है। भोजन ताज़ा और सात्विक रखें।

3. बड़ों का आशीर्वाद और दान। घर के बुज़ुर्गों का आशीर्वाद लें। साथ ही ज़रूरतमंदों को अन्न, कपड़े या अपनी क्षमता के अनुसार दान दें।

4. पारण (व्रत खोलना)। दशमी के दिन, यानी दशहरे पर, पूजा करके व्रत खोलें। पारण हल्के सात्विक भोजन से करें, क्योंकि नौ दिन के बाद शरीर को अचानक भारी खाना पचाने में दिक्कत हो सकती है।

5. जौ और कलश का विसर्जन। जौ के अंकुर, जो नौ दिन में उग चुके होते हैं, उन्हें प्रसाद की तरह परिवार में बाँट सकते हैं या घर में तिजोरी या पूजा स्थान में रख सकते हैं। कलश के जल को घर में छिड़कें या किसी पौधे में डाल दें। पूजा सामग्री को कूड़े में न फेंकें, बल्कि बहते जल में या पेड़ के नीचे श्रद्धा से विसर्जित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सवाल जवाब
अगर बीच में व्रत टूट जाए तो? घबराएँ नहीं। माँ से क्षमा माँगें और अगले दिन से नियम से जारी रखें। भाव सबसे ज़रूरी है।
क्या पीरियड्स में व्रत रख सकते हैं? इस पर अलग-अलग परिवारों की अलग मान्यताएँ हैं। आप व्रत और मन में पाठ-स्मरण जारी रख सकती हैं। पूजा-स्थल से जुड़ी बातों के लिए अपने घर की परंपरा या पंडित जी से पूछ लें।
9 कन्याएँ न मिलें तो? जितनी मिलें उतनी को आदर से भोजन कराएँ, या मंदिर में अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन-दान दें।
क्या नौकरी करने वाले व्रत रख सकते हैं? हाँ, फलाहारी या एक समय भोजन वाला व्रत ऑफ़िस के साथ आसानी से निभ जाता है।

आख़िर में एक बात

नवरात्रि का व्रत “सब कुछ परफ़ेक्ट करने” की परीक्षा नहीं है। कभी सामग्री कम पड़ सकती है, कभी समय चूक सकता है, और यह ठीक है। माँ दुर्गा आपके साफ़ मन और सच्ची श्रद्धा को देखती हैं, सामग्री की लंबी सूची को नहीं।

आप सभी का व्रत सफल हो और माँ का आशीर्वाद आपके घर में सुख, शांति और समृद्धि लाए। जय माता दी!

नोट: पूजा के शुभ मुहूर्त और कुछ रीति-रिवाज़ क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं, इसलिए अपने पंडित जी या स्थानीय पंचांग से समय ज़रूर मिला लें।

नवरात्रि पूजा घर पर कैसे करें? नौ दिनों की आसान विधि

नवरात्रि आते ही घर का माहौल अपने आप बदल जाता है। सुबह-सुबह घंटी की आवाज़, धूप-अगरबत्ती की ख़ुशबू और रसोई से आती व्रत के खाने की महक। बहुत से लोग इसी उलझन में रह जाते हैं कि पूजा कैसे शुरू करें और कहीं कोई गलती न हो जाए।

तो सबसे पहले एक बात। माँ को आपकी सच्ची श्रद्धा चाहिए, कोई परफ़ेक्ट पूजा नहीं। अगर पूरी विधि याद नहीं रहती तो भी चिंता मत कीजिए। नीचे सब कुछ आसान भाषा में, एक-एक कदम करके समझाया है। इस साल नवरात्रि 11 अक्टूबर 2026 से शुरू हो रही है, तो चलिए तैयारी शुरू करते हैं।

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पूजा से पहले क्या-क्या सामान चाहिए

सब कुछ पहले से रख लें, ताकि पूजा के बीच में उठकर भागना न पड़े।

सामान किसलिए
मिट्टी का कलश और उसका ढक्कन घटस्थापना के लिए
जौ और मिट्टी (छोटा बर्तन) जौ बोने के लिए
गंगाजल, साफ़ पानी कलश में भरने के लिए
आम के पत्ते (5 या 7), नारियल, लाल चुनरी या कपड़ा कलश सजाने के लिए
रोली, चावल (अक्षत), मौली (कलावा) तिलक और पूजा के लिए
फूल, माला माँ को चढ़ाने के लिए
दीपक, घी या तेल, बाती आरती और अखंड ज्योति के लिए
धूप, अगरबत्ती, कपूर वातावरण शुद्ध करने के लिए
फल, मिठाई या घर का बना भोग प्रसाद के लिए
माँ दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर पूजा के स्थान पर रखने के लिए

पहला दिन: घटस्थापना कैसे करें

पहला दिन सबसे ख़ास होता है, क्योंकि इसी दिन माँ को घर में बुलाया जाता है।

कदम 1: सफ़ाई। सुबह जल्दी उठकर नहाएँ और पूजा वाली जगह अच्छे से साफ़ करें। साफ़ कपड़े पहनें।

कदम 2: जौ बोएँ। एक चौड़े बर्तन में थोड़ी मिट्टी डालकर जौ फैला दें और हल्का पानी छिड़कें। ये नौ दिन में हरे-हरे अंकुर बन जाते हैं, जिन्हें शुभ माना जाता है।

कदम 3: कलश तैयार करें। कलश में साफ़ पानी और थोड़ा गंगाजल भरें। मुँह पर आम के पत्ते लगाएँ, उन पर ढक्कन रखें और ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें। कलश पर रोली से स्वस्तिक बनाएँ और मौली बाँधें।

कदम 4: स्थापना। कलश को जौ के बर्तन के बीच या उसके पास पूजा स्थल पर रखें। फिर माँ की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

कदम 5: दीपक जलाएँ। माँ के सामने दीपक जलाकर उनका आवाहन करें और हाथ जोड़कर अपनी मनोकामना कहें।

मुहूर्त का ध्यान: घटस्थापना का शुभ समय शहर के हिसाब से थोड़ा बदलता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग या पंडित जी से सही मुहूर्त ज़रूर पूछ लें।

रोज़ की पूजा कैसे करें 

पहले दिन के बाद बाकी आठ दिन रोज़ की पूजा बहुत सरल है।

समय क्या करें
सुबह स्नान के बाद कलश और माँ को प्रणाम करें, दीपक जलाएँ, फूल चढ़ाएँ
पूजा के दौरान माँ के उस दिन वाले रूप का नाम लें और मंत्र पढ़ें
भोग माँ को भोग लगाएँ, फिर परिवार में प्रसाद बाँटें
आरती दुर्गा चालीसा या दुर्गा आरती करें
शाम दीपक जलाएँ, एक बार फिर आरती करें
जौ की देखभाल रोज़ थोड़ा पानी छिड़कें

अगर आप अखंड ज्योति जलाना चाहें तो ध्यान रखें कि वह नौ दिन तक बुझे नहीं। यह ज़रूरी नहीं है। जिन घरों में रोज़ देखभाल करना मुश्किल हो, वे सुबह-शाम का दीपक जलाकर भी पूजा कर सकते हैं।

एक आसान मंत्र जो रोज़ पढ़ा जा सकता है: “ॐ दुं दुर्गायै नमः”। इसे 11 या 21 बार जपना काफ़ी है।

नौ दिन, नौ रूप: किस दिन किसकी पूजा

दिन तारीख माँ का रूप आम तौर पर लगाया जाने वाला भोग
1 11 अक्टूबर शैलपुत्री गाय का घी
2 12 अक्टूबर ब्रह्मचारिणी शक्कर या मिश्री
3 13 अक्टूबर चंद्रघंटा दूध या खीर
4 14 अक्टूबर कूष्मांडा मालपुआ
5 15 अक्टूबर स्कंदमाता केला
6 16 अक्टूबर कात्यायनी शहद
7 17 अक्टूबर कालरात्रि गुड़
8 18 अक्टूबर महागौरी नारियल
9 19 अक्टूबर सिद्धिदात्री हलवा, पूड़ी, चना या तिल

भोग की यह सूची परंपरा और क्षेत्र के हिसाब से थोड़ी अलग हो सकती है। जो आपके घर में चलन में है, वही रखें। और अगर कुछ ना बन पाए तो सिर्फ़ फल या मिश्री का भोग भी माँ स्वीकार करती हैं।

एक छोटी जानकारी: पंचांग के अनुसार इस बार अष्टमी और नवमी दोनों 19 अक्टूबर को पड़ रही हैं। इसलिए आख़िरी दिनों की पूजा और कन्या पूजन का समय पहले से देख लें।

अष्टमी या नवमी: कन्या पूजन

नवरात्रि की सबसे प्यारी रस्म शायद यही है। नौ छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर घर बुलाया जाता है।

  1. कन्याओं के पैर साफ़ पानी से धोएँ और उन्हें आसन पर बैठाएँ।
  2. माथे पर तिलक लगाएँ और कलावा बाँधें।
  3. हलवा, पूड़ी और चने का प्रसाद श्रद्धा से खिलाएँ।
  4. अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार या दक्षिणा दें और पैर छूकर आशीर्वाद लें।

साथ में एक छोटे बालक को भी बैठाने की परंपरा है। उसे भैरव का रूप माना जाता है।

व्रत रखें तो ये बातें याद रखें

  • व्रत की परंपरा हर परिवार में अलग होती है। कोई नौ दिन रखता है, कोई सिर्फ़ पहला और आख़िरी दिन।
  • पानी, दूध, फल, मखाना, साबूदाना और कुट्टू जैसी चीज़ें आम तौर पर खाई जाती हैं।
  • अगर आप बुज़ुर्ग हैं, किसी बीमारी में हैं या दवा ले रहे हैं, तो व्रत के नियम अपनी सेहत देखकर तय करें, और ज़रूरत हो तो डॉक्टर से पूछ लें।
  • माँ भूखे रहने से नहीं, मन की सच्चाई से प्रसन्न होती हैं।

विजयादशमी और विसर्जन

नौवें दिन की पूजा के बाद अगले दिन (इस साल 20 अक्टूबर) विजयादशमी मनाई जाती है। इस दिन जौ के अंकुर परिवार में बाँटे जाते हैं और कलश का जल घर में छिड़का जाता है। पूजा समाप्त करते समय माँ से अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा माँगना न भूलें।

अक्सर लोग नवरात्रि को “बहुत मुश्किल पूजा” समझकर घबरा जाते हैं। सच यह है कि एक दीपक, एक फूल और सच्चे मन से लिया गया माँ का नाम भी काफ़ी है। बाकी सब बस उस भावना को सुंदर बनाने का तरीका है।

आपकी नवरात्रि मंगलमय हो। जय माता दी!

नवरात्रि 2026: तारीख, नौ रंग और महत्व की पूरी जानकारी

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“नवरात्रि” या “नवरात्र” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। “नव” का अर्थ है नौ और “रात्रि” का अर्थ है रात। इस प्रकार इसका शाब्दिक अर्थ है “नौ रातें”। नौ रातों और दस दिनों तक चलने वाला नवरात्रि हिंदू परंपरा के सबसे पवित्र और व्यापक रूप से मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है। यह आमतौर पर शरद ऋतु के महीनों में आता है।v

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इस उत्सव का मूल भाव देवी दुर्गा की भक्ति है। उन्हें शक्ति, यानी सृष्टि की सार्वभौमिक ऊर्जा का स्वरूप माना जाता है, और उनके नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। भारत में साल भर में चार नवरात्रि मनाई जाती हैं: चैत्र नवरात्रि, पौष नवरात्रि, माघ नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि। इनमें महा नवरात्रि, यानी शारदीय नवरात्रि, को सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है।

हिंदू पंचांग के अनुसार यह त्योहार अश्विन मास में मनाया जाता है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार आमतौर पर सितंबर और अक्टूबर में पड़ता है। इस वर्ष नवरात्रि 11 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2026 तक मनाई जाएगी। दसवें और अंतिम दिन दशहरा मनाया जाएगा।

नवरात्रि का महत्व

नवरात्रि का मूल संदेश भारत के सभी प्रमुख त्योहारों की तरह बुराई पर अच्छाई की अंतिम विजय है, हालाँकि इसके पीछे की कथाएँ और मान्यताएँ अलग-अलग हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में यह त्योहार अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में इन दिनों को दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। उत्तरी और पश्चिमी क्षेत्रों में लोग नौ रातों का यह पर्व भगवान राम की राक्षस राजा रावण पर विजय के उपलक्ष्य में मनाते हैं।

परंपरा के अनुसार देवी दुर्गा ने राक्षस महिषासुर से भीषण युद्ध किया और अंत में उसे पराजित किया। यह पर्व उसी विजय के उपलक्ष्य में देवी की आराधना और पूजा के लिए मनाया जाता है, जो अंधकार पर दिव्य प्रकाश की जीत का प्रतीक है। उत्सव की औपचारिक शुरुआत महालया से होती है, जो पर्व का पहला दिन है। यह दिन देवी दुर्गा के आह्वान और स्मरण को समर्पित है और पितृ पक्ष के समापन का भी प्रतीक है, जो पूर्वजों के श्राद्ध का पवित्र पखवाड़ा है।

पर्व के छठे दिन देवी दुर्गा का परिवारों के घरों और भव्य सार्वजनिक पंडालों में विधिवत स्वागत किया जाता है। ये उत्सव आगे के दिनों में दसवें दिन तक चलते हैं, जिसे विजयादशमी कहा जाता है। इस दिन देवी की मूर्ति का जल में विसर्जन किया जाता है। इस दौरान लोग मिलकर पंडाल घूमते हैं, “भोग” नामक पवित्र प्रसाद ग्रहण करते हैं और ज़रूरतमंदों को भोजन बाँटते हैं। यह परोपकार और सद्भावना की भावना का उत्सव है।

उत्तर भारत में नौ दिनों का यह पर्व भगवान राम की रावण पर ऐतिहासिक विजय की स्मृति पर केंद्रित होता है। नौ रातों तक “रामलीला” नामक नाट्य मंचन होते हैं, जिनमें प्राचीन हिंदू महाकाव्य रामायण का नाटकीय रूपांतरण प्रस्तुत किया जाता है। दसवें और अंतिम दिन भगवान राम द्वारा धनुष-बाण से रावण का वध दर्शाया जाता है, और उत्सव का समापन रावण, उसके भाइयों मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतलों के दहन के साथ होता है। इस क्षेत्र के लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं, उपवास रखते हैं और सामूहिक प्रार्थना के लिए एकत्र होते हैं।

भव्य मंच सज्जा, कथा-वाचन, प्राचीन कथाओं का नाट्य मंचन, मंत्रोच्चार, भक्ति प्रार्थनाएँ और डांडिया व गरबा जैसे रंगारंग लोकनृत्य उत्सव की ऊर्जा को जीवंत करते हैं। मित्र और परिवार के लोग एक साथ पंडाल देखने जाते हैं और स्थानीय आयोजनों में भाग लेते हैं। अंतिम दिन उत्सव का समापन या तो देवी की मूर्ति के जल में विसर्जन से होता है, जैसा दुर्गा पूजा में किया जाता है, या फिर पुतला दहन से, जैसा दशहरा में होता है।

नवरात्रि के रंग कैसे तय होते हैं?

नवरात्रि के रंग आम तौर पर हफ़्ते के दिन के हिसाब से तय किए जाते हैं। हर वार का एक रंग माना जाता है और उसी के अनुसार नौ दिनों के रंग बनते हैं। इस बार नवरात्रि रविवार से शुरू हो रही है, इसलिए पहले दिन का रंग नारंगी रखा गया है।

एक बात ज़रूर याद रखें। रंगों की यह परंपरा शास्त्रों का नियम नहीं है। यह नई और क्षेत्रीय परंपरा है, खासकर महाराष्ट्र और गुजरात में, जहाँ महिलाएँ हर दिन उसी रंग के कपड़े पहनती हैं। अलग-अलग कैलेंडरों में कुछ दिनों के रंग अलग भी हो सकते हैं। रंग पहनना आपकी खुशी की बात है, ज़रूरी नहीं। नवरात्रि का असली मकसद श्रद्धा और भक्ति है।

कैलेंडर के अनुसार नवरात्रि के रंग

दिन तिथि (दिनांक) तिथि (पंचांग) देवी दिन का रंग
1 11 अक्टूबर 2026 प्रतिपदा शैलपुत्री नारंगी
2 12 अक्टूबर 2026 द्वितीया ब्रह्मचारिणी सफ़ेद
3 13 अक्टूबर 2026 तृतीया चंद्रघंटा लाल
4 14 अक्टूबर 2026 चतुर्थी कूष्मांडा गहरा नीला
5 15 अक्टूबर 2026 पंचमी स्कंदमाता पीला
6 16 अक्टूबर 2026 षष्ठी कात्यायनी हरा
7 17 अक्टूबर 2026 सप्तमी कालरात्रि स्लेटी
8 18 अक्टूबर 2026 अष्टमी महागौरी बैंगनी
9 19 अक्टूबर 2026 नवमी सिद्धिदात्री मोरपंखी हरा
10 20 अक्टूबर 2026 दशमी विजयादशमी —

 

निष्कर्ष

नवरात्रि 2026 आस्था, परंपरा और उत्सव का सुंदर संगम है। चाहे आप पूरे नौ दिन व्रत रखें, रंगों के कपड़े पहनें या सिर्फ़ माँ का नाम लेकर दिन की शुरुआत करें, सबसे ज़रूरी है सच्चे मन से की गई भक्ति। आप सभी को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!

श्राद्ध क्या है? पितृ पक्ष में श्राद्ध की सही विधि, तिथि और नियम

“श्राद्ध” शब्द “श्रद्धा” से बना है, यानी पूरे सम्मान और विश्वास के साथ किया गया कर्म। अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए जल, भोजन और दान अर्पित करना ही श्राद्ध कहलाता है।

मान्यता है कि जो लोग इस संसार से जा चुके हैं, वे हमारे आशीर्वाद के रूप में हमारे साथ रहते हैं। श्राद्ध के ज़रिए हम उन्हें याद करते हैं और बदले में उनका आशीर्वाद पाते हैं।

पितृ पक्ष कब आता है?

श्राद्ध के लिए सबसे खास समय पितृ पक्ष है। यह लगभग 16 दिनों का होता है और भाद्रपद की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन माह की अमावस्या तक चलता है। हर साल इसकी तारीखें पंचांग के हिसाब से बदलती हैं, इसलिए सही तिथि के लिए अपना स्थानीय पंचांग देख लें।

माना जाता है कि इन दिनों पितर धरती पर अपने परिवार से मिलने आते हैं।

श्राद्ध किस दिन करें?

श्राद्ध उसी तिथि पर किया जाता है, जिस तिथि पर परिवार के सदस्य का निधन हुआ हो। कुछ खास तिथियाँ ये हैं:

तिथि किसके लिए
तिथि के अनुसार जिस तिथि पर निधन हुआ हो
नवमी (मातृ नवमी) माता और परिवार की सुहागिन महिलाओं के लिए
चतुर्दशी दुर्घटना या अचानक हुई मृत्यु वालों के लिए
सर्वपितृ अमावस्या जिनकी तिथि याद न हो, या सभी पूर्वजों के लिए

अगर आपको तिथि याद नहीं है, तो चिंता न करें। सर्वपितृ अमावस्या पर किया गया श्राद्ध सभी पूर्वजों के लिए माना जाता है।

श्राद्ध में क्या-क्या किया जाता है?

कर्म क्या है कैसे करते हैं
तर्पण पूर्वजों को जल अर्पित करना काले तिल और जल हाथ में लेकर नाम लेकर अर्पण करते हैं
पिंड दान चावल, जौ और तिल के पिंड बनाकर अर्पित करना पूर्वजों के नाम से श्रद्धापूर्वक अर्पित करते हैं
ब्राह्मण भोजन योग्य व्यक्ति को भोजन कराना सात्विक भोजन कराकर दान-दक्षिणा देते हैं
पंचबलि पाँच जीवों के लिए भोजन निकालना गाय, कुत्ता, कौआ, देवता और चींटी के लिए
दान ज़रूरतमंदों की मदद अन्न, वस्त्र, जूते-चप्पल, छाता आदि देते हैं

कौए को भोजन देने की परंपरा खास है, क्योंकि कौए को पितरों का संदेशवाहक माना जाता है।

श्राद्ध में क्या करें और क्या न करें?

क्या करें क्या न करें
सुबह स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें लहसुन-प्याज़ वाला तामसिक भोजन न बनाएँ
सात्विक और शुद्ध भोजन बनाएँ शराब और मांसाहार से दूर रहें
खीर, पूड़ी, सब्ज़ी जैसे पितरों के प्रिय व्यंजन बनाएँ किसी का अपमान या झगड़ा न करें
ज़रूरतमंदों को दान दें श्राद्ध के दिनों में नए कपड़े या नई चीज़ों की ख़रीदारी न करें
मन में शांति और श्रद्धा रखें भोजन आने वाले अतिथि या भिखारी को लौटाएँ नहीं

श्राद्ध के प्रमुख तीर्थ

अगर संभव हो, तो कुछ पवित्र स्थानों पर श्राद्ध करना विशेष माना गया है:

  • गया (बिहार): पिंड दान के लिए सबसे प्रसिद्ध स्थान
  • हरिद्वार: गंगा तट पर तर्पण के लिए
  • प्रयागराज: संगम पर श्राद्ध कर्म
  • उज्जैन: शिप्रा नदी के किनारे
  • काशी (वाराणसी): मोक्ष की नगरी

लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि आप इन्हीं जगहों पर जाएँ। घर पर श्रद्धा से किया गया श्राद्ध भी उतना ही मान्य है।

श्राद्ध का असली संदेश

कई लोग श्राद्ध को केवल रीति-रिवाज़ समझ लेते हैं, लेकिन इसके पीछे एक गहरी सीख है:

  1. कृतज्ञता: जिन्होंने हमें जीवन दिया, उन्हें याद रखना
  2. परिवार का जुड़ाव: पूरा परिवार एक साथ बैठकर पूर्वजों को याद करता है
  3. दान और सेवा: भोजन और दान के ज़रिए समाज की मदद
  4. अगली पीढ़ी को संस्कार: बच्चे अपनी जड़ों और परंपराओं को समझते हैं

आज के समय में श्राद्ध कैसे करें?

भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हर कोई विस्तृत विधि नहीं कर पाता। ऐसे में ये सरल उपाय अपनाए जा सकते हैं:

  • पूर्वजों की तस्वीर के सामने दीपक जलाएँ और जल अर्पित करें
  • उनके पसंदीदा व्यंजन बनाकर गाय, कौए या ज़रूरतमंद को खिलाएँ
  • बच्चों को दादा-दादी या परदादा-परदादी की कहानियाँ सुनाएँ
  • किसी गरीब को भोजन या ज़रूरी सामान दान करें

याद रखें, श्राद्ध में दिखावे से ज़्यादा भावना मायने रखती है। सच्चे मन से किया गया छोटा-सा कर्म भी पूर्वजों तक पहुँचता है।

निष्कर्ष

श्राद्ध हमें याद दिलाता है कि हम अकेले नहीं हैं। हमारे पीछे पीढ़ियों का आशीर्वाद, संघर्ष और प्रेम खड़ा है। जब हम श्रद्धा से उन्हें याद करते हैं, तो हम सिर्फ़ उनका ऋण नहीं चुकाते, बल्कि अपने जीवन में भी शांति और संतुलन लाते हैं।

इस पितृ पक्ष में एक पल रुककर अपने पूर्वजों को याद करें, और कहें: “आपने जो दिया, उसके लिए धन्यवाद।”

नोट: श्राद्ध की विधि और मान्यताएँ अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में थोड़ी भिन्न हो सकती हैं। अपने कुल की परंपरा और किसी जानकार पंडित की सलाह ज़रूर लें।