16 अक्टूबर का इतिहास

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16 अक्टूबर का इतिहास

  • 1710 – ब्रिटिश सैनिकों ने पोर्ट रॉयल पर कब्ज़ा किया।
  • 1757 – आस्ट्रिया की सेना ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन पर कब्जा किया।
  • 1793 – फ्रांस की क्रांति के बाद रानी मैरी एंटोनियेट को त्वरित सुनवाई के बाद मौत की सजा दी गई।
  • 1848 – 1 अमेरिकी होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज पेनसिल्वेनिया में खोला गया।
  • 1849 – एवेरी कॉलेज, एलेगेंनी के पेनसिल्वेनिया में स्थापित किया गया।
  • 1872 – यूनिवर्सिटी कॉलेज वेल्स (बाद में ऐबरिस्टविथ विश्वविद्यालय बनने के लिए) ने अपना पहला अकादमिक सत्र शुरू किया।
  • 1905 –  लार्ड कर्जन द्वारा बंगाल का प्रथम विभाजन हुआ।
  • 1915 – ब्रिटेन ने बुल्गारिया के खिलाफ युद्ध की घोषणा की l
  • 1917 – शायर लखनवी का जन्म हुआ। उनका पूरा नाम मुहम्मद हसन पाशा था।
  • 1939 – द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी ने ब्रिटिश क्षेत्र पर पहला हमला किया।
  • 1948 –  भारत की प्रसिद्ध अभिनेत्री और भरतनाट्यम की नृत्यांगना हेमा मालिनी का जन्म हुआ।
  • 1951 – पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की रावलपिड़ी में गोली मारकर हत्या कर दी गई।
  • 1968 – भारतवंशी हरगोविन्द खुराना को दवा और शरीर विज्ञान के लिए चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • 1982 – सोवियत संघ ने भूमिगत परमाणु परीक्षण किया।
  • 1996 – ग्वाटेमाला की राजधानी ग्वाटेमाला सिटी में फुटबाॅल मैच के दौरान स्टेडियम में क्षमता से अधिक लोगों के पहुंचने के कारण मची भगदड़ में 84 लोगों की मौत हुई और 180 से अधिक घायल हुए।
  • 2005 – जी-20 देश वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ में सुधार हेतु एकमत l
  • 2012 -सौर मंडल के बाहर एक नये ग्रह ‘अल्फा सेंचुरी बीबी’ का पता चला।
  • 2013 – दक्षिण पूर्वी एशियाई देश लाओस के पाक्से अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने से कुछ देर पहले लाओ एयरलाइंस के विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने से 49 लोगों की मौत हुई।
  • 2011 – भारतीय मूल के धावक 100 वर्षीय फ़ौजा सिंह ने सबसे अधिक उम्र में टोरंटो वाटरफ्रंट मैराथन पूरा करके नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराया है। उम्र का ‘शतक’ बना चुके फ़ौजा सिंह ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच आठ घंटे से अधिक समय में फिनिश लाइन पार की।

शहद सी मिठास, तलवार सी ताकत: मां कात्यायनी की उपासना और पूजा की पूरी विधि

आज नवरात्र का छठा दिन है। आज मां दुर्गा की छठी शक्ति, मां कात्यायनी, की पूजा होती है। मां का रूप दो बातें एक साथ सिखाता है: मिठास और मजबूती। उनके एक हाथ में कमल है, तो दूसरे में तलवार। इसीलिए उन्हें योद्धा देवी कहा जाता है। यह ब्लॉग मां की पूजा को सरल भाषा में समझाता है। पहली बार पूजा कर रहे हैं, तो भी कोई दिक्कत नहीं होगी।

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छठा नवरात्र कब है

इस साल छठा नवरात्र 16 अक्टूबर, शुक्रवार को पड़ रहा है। यह षष्ठी तिथि है।

ध्यान दें: तिथि और पूजा का सही समय हर शहर में थोड़ा अलग होता है। पूजा से पहले अपने स्थानीय पंचांग या पंडित जी से एक बार मिला लें।

आज की पूजा एक नजर में

बात जानकारी
आज की देवी मां कात्यायनी
नवरात्र का दिन छठा
वाहन सिंह
भुजाएं चार
प्रिय भोग शहद
प्रिय फूल लाल गुलाब, गेंदा, कमल
बीज मंत्र ॐ देवी कात्यायन्यै नमः
दूसरा नाम महिषासुरमर्दिनी

कौन हैं मां कात्यायनी

मां का नाम कात्यायन ऋषि से जुड़ा है। ऋषि ने मां की कठोर तपस्या की थी। वे चाहते थे कि मां उनके घर बेटी बनकर आएं। मां ने उनकी इच्छा पूरी की। इसलिए वे कात्यायनी कहलाईं। जब महिषासुर ने तीनों लोकों में आतंक मचाया, तब देवताओं के तेज से देवी प्रकट हुईं। ऋषि कात्यायन ने सबसे पहले उनकी पूजा की थी। इसी रूप ने महिषासुर का अंत किया।

मां का स्वरूप

स्वरूप खास बात
रंग सुनहरा, चमकदार
सवारी सिंह
दाहिना ऊपरी हाथ अभय मुद्रा, यानी “डरो मत”
दाहिना निचला हाथ वर मुद्रा, यानी आशीर्वाद
बायां ऊपरी हाथ तलवार
बायां निचला हाथ कमल

तलवार बुराई के नाश का संकेत है। कमल पवित्रता का संकेत है।

आज की पूजा क्यों खास मानी जाती है

मान्यता है कि मां कात्यायनी की पूजा से:

  • विवाह में आ रही रुकावटें दूर होती हैं।
  • रिश्तों में प्यार और समझ बढ़ती है।
  • हिम्मत और आत्मविश्वास आता है।
  • डर और नकारात्मक सोच घटती है।

यह मान्यता गोपियों की कथा से आई है। श्रीमद्भागवत के अनुसार, ब्रज की गोपियों ने कृष्ण को जीवनसाथी के रूप में पाने के लिए कात्यायनी व्रत रखा था। उन्होंने यमुना किनारे मिट्टी की मूर्ति बनाकर रोज पूजा की थी। मान्यता यह भी है कि मां की साधना से आज्ञा चक्र मजबूत होता है। यह चक्र माथे के बीच माना जाता है और समझ-बूझ से जुड़ा है। यह श्रद्धा की बात है, आप अपनी आस्था के अनुसार मानें।

पूजा की तैयारी

सामग्री किसलिए
मां की तस्वीर या मूर्ति पूजा के लिए
रोली, चंदन, अक्षत (चावल) तिलक और अर्पण के लिए
लाल गुलाब, गेंदा या कमल मां को चढ़ाने के लिए
घी का दीया आरती के लिए
धूप और अगरबत्ती वातावरण शुद्ध करने के लिए
गंगाजल शुद्धि के लिए
शहद मुख्य भोग
फल, मेवे, मिठाई प्रसाद के लिए
माला मंत्र जाप के लिए

पूजा से पहले सारी सामग्री पास रख लें। बीच में उठना नहीं पड़ेगा।

पूजा की आसान विधि, कदम-दर-कदम

1. स्नान और सफाई
सुबह जल्दी उठें। नहाकर साफ कपड़े पहनें। कई लोग आज लाल या पीले कपड़े शुभ मानते हैं। यह परंपरा के अनुसार बदल सकता है।

2. जगह की शुद्धि
पूजा की जगह पर गंगाजल छिड़कें। कलश के पास मां की तस्वीर रखें।

3. संकल्प
हाथ में जल और चावल लें। मन में कहें कि आप श्रद्धा से मां की पूजा कर रहे हैं।

4. कलश पूजन
पहले कलश पर रोली और अक्षत चढ़ाएं। फिर दीया जलाएं।

5. ध्यान
आंखें बंद करें। सिंह पर सवार, सुनहरे रंग वाली मां का रूप मन में लाएं।

6. अर्पण
मां को तिलक करें। फूल चढ़ाएं। धूप-दीप दिखाएं।

7. भोग
शहद की थोड़ी सी मात्रा साफ कटोरी में रखकर मां को अर्पित करें।

8. मंत्र जाप
माला से मंत्र का जाप करें। कम से कम 11 बार करें।

9. आरती
आरती उतारें। फिर प्रसाद बांट दें।

10. क्षमा प्रार्थना
अंत में हाथ जोड़कर कहें, “मां, पूजा में कोई भूल हुई हो, तो क्षमा करना।”

मां को क्या भोग लगाएं

मां को शहद बहुत प्रिय माना जाता है।

भोग कैसे बनाएं या चढ़ाएं
शहद सीधे कटोरी में
शहद वाला हलवा सूजी भूनकर, चीनी की जगह शहद मिलाएं
मीठा पान कई जगह चढ़ाया जाता है
दूध की मिठाई खीर या बर्फी
फल केला, सेब, अनार

आसान शहद का हलवा:

  1. कड़ाही में घी गरम करें।
  2. सूजी डालकर हल्का सुनहरा भूनें।
  3. गरम पानी या दूध मिलाकर पकाएं।
  4. आंच बंद करके ऊपर से शहद मिलाएं।
  5. मेवे डालकर मां को अर्पित करें।

(शहद को ज्यादा गरम करने से बचें। आंच बंद करके ही मिलाएं।)

मां कात्यायनी के मंत्र

बीज मंत्र

ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥

ध्यान मंत्र

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मंत्र न आए, तो सिर्फ “जय माता दी” या बीज मंत्र बोल लें। भाव सबसे जरूरी है।

मां कात्यायनी की आरती

जय जय अंबे जय कात्यायनी।
जय जगमाता जग की महारानी॥
बैजनाथ स्थान तुम्हारा।
वहावर दाती नाम पुकारा॥
कई नाम हैं कई धाम हैं।
यह स्थान भी तो सुखधाम है॥
हर मंदिर में जोत तुम्हारी।
कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी॥
हर जगह उत्सव होते रहते।
हर मंदिर में भक्त हैं कहते॥
कात्यायनी रक्षक काया की।
ग्रंथि काटे मोह माया की॥
झूठे मोह से छुड़ाने वाली।
अपना नाम जपाने वाली॥
बृहस्पतिवार को पूजा करियो।
ध्यान कात्यायनी का धरियो॥
हर संकट को दूर करेगी।
भंडारे भरपूर करेगी॥
जो भी मां को भक्त पुकारे।
कात्यायनी सब कष्ट निवारे॥

क्या करें और क्या न करें

 क्या करें  क्या न करें
सुबह जल्दी उठकर पूजा करें पूजा में जल्दबाजी न करें
साफ कपड़े पहनें गंदे कपड़ों में पूजा न करें
घर की बेटियों का सम्मान करें किसी महिला का अपमान न करें
सात्विक भोजन करें लहसुन-प्याज और मांसाहार न खाएं
सच बोलें, शांत रहें झगड़ा और कड़वे शब्द न बोलें
जरूरतमंद की मदद करें किसी का दिल न दुखाएं
बड़ों का आशीर्वाद लें बड़ों से बहस न करें

विवाह की इच्छा रखने वालों के लिए

कई लोग इसी भाव से आज मां की पूजा करते हैं। कुछ सीधे सुझाव:

  • साफ मन और श्रद्धा से पूजा करें।
  • मां से अपनी बात प्रेम से कहें।
  • सिर्फ पूजा के भरोसे न बैठें। अपनी तरफ से भी कोशिश करें।
  • माता-पिता से खुलकर बात करें।
  • अपने स्वभाव और सोच को बेहतर बनाने पर ध्यान दें।

मां की कृपा और अपनी कोशिश, दोनों साथ चलें तो बात बनती है।

महिलाओं के लिए संदेश

मां कात्यायनी नारी शक्ति की मिसाल हैं।

  • अपनी बात साफ और हिम्मत से रखिए।
  • गलत के आगे चुप मत रहिए।
  • अपनी सेहत और खुशी का ध्यान रखिए।
  • अपने सपनों को अहमियत दीजिए।

अगर कोई मुश्किल या डर में है, तो मदद मांगना कमजोरी नहीं है। परिवार, दोस्तों या जरूरत पड़ने पर प्रशासन की मदद लीजिए।

व्रत रखने वालों के लिए सुझाव

  • दिन में फल, दूध और मेवे लेते रहें।
  • खूब पानी पिएं।
  • सेंधा नमक ही इस्तेमाल करें।
  • तला-भुना कम खाएं।
  • गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और बीमार लोग डॉक्टर की सलाह से ही व्रत रखें। सेहत सबसे जरूरी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. नवरात्र के छठे दिन किसकी पूजा होती है?
मां कात्यायनी की।

2. मां को कौन सा भोग पसंद है?
शहद।

3. मां को महिषासुरमर्दिनी क्यों कहते हैं?
क्योंकि उन्होंने महिषासुर का अंत किया था।

4. मां की सवारी क्या है?
सिंह।

5. मां को कौन से फूल चढ़ाएं?
लाल गुलाब, गेंदा या कमल।

6. क्या विवाह के लिए पूजा करना जरूरी है?
यह श्रद्धा की बात है। पूजा के साथ अपनी कोशिश भी जारी रखें।

7. क्या घर पर अकेले पूजा हो सकती है?
बिल्कुल। मां श्रद्धा देखती हैं, भीड़ नहीं।

मां कात्यायनी का संदेश सीधा है: दिल में मिठास रखिए, पर जरूरत पड़े तो हिम्मत से खड़े भी होइए। आज मां के आगे दीया जलाइए। शहद का भोग लगाइए। अपने मन की बात उनसे कह दीजिए।   कात्यायनी आपको हिम्मत, खुशी और रिश्तों में मिठास दें।

जय माता दी!

ऋषि की बेटी, देवताओं की ढाल: मां कात्यायनी की पावन कथा

नवरात्र का छठा दिन मां कात्यायनी को समर्पित है। वे मां दुर्गा की छठी शक्ति हैं। मां को योद्धा देवी कहा जाता है। उन्होंने महिषासुर जैसे घमंडी राक्षस का अंत किया था, इसलिए उन्हें महिषासुरमर्दिनी भी कहते हैं। इनकी कथा में तपस्या है, एकता है और नारी शक्ति की जीत है। आइए, इसे आसान भाषा में सुनते हैं।

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छठा नवरात्र कब है

इस साल छठा नवरात्र 16 अक्टूबर, शुक्रवार को है। यह षष्ठी तिथि है।

ध्यान दें: तिथि का सही समय हर शहर और पंचांग में थोड़ा अलग हो सकता है। अपने स्थानीय पंचांग या पंडित जी से एक बार मिला लें।

नाम का मतलब क्या है

शब्द मतलब
कात्यायन एक महान ऋषि
कात्यायनी कात्यायन ऋषि की पुत्री

यानी ऋषि कात्यायन के नाम पर मां का यह नाम पड़ा। मां के और भी नाम हैं।

नाम मतलब
महिषासुरमर्दिनी महिषासुर का अंत करने वाली
योद्धा देवी युद्ध में निपुण देवी
ब्रज की अधिष्ठात्री ब्रज की मुख्य देवी

कथा की शुरुआत: ऋषि कात्यायन की तपस्या

बहुत पुरानी बात है। एक महान ऋषि थे, कात्यायन। उनके पिता भी बड़े ऋषि थे। ऋषि कात्यायन के मन में एक इच्छा थी। वे चाहते थे कि मां दुर्गा उनके घर बेटी बनकर जन्म लें। इस इच्छा को पूरा करने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की। सालों तक साधना की। मां उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं। उन्होंने कहा, “ठीक है। मैं तुम्हारे घर बेटी बनकर आऊंगी।” ऋषि की इच्छा पूरी होने का समय जल्द आने वाला था। उसी समय धरती पर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया।

महिषासुर का आतंक

उस समय एक राक्षस था महिषासुर। वह आधा भैंसा और आधा इंसान जैसा रूप ले सकता था। उसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए। महिषासुर ने अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने कहा, “यह संभव नहीं। कोई और वरदान मांगो।” तब महिषासुर ने चालाकी से कहा, “मेरी मृत्यु किसी पुरुष या देवता के हाथों न हो।” उसे लगता था कि कोई स्त्री उसे क्या हराएगी। ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया। वरदान मिलते ही महिषासुर का घमंड बढ़ गया।

उसने क्या किया नतीजा
देवताओं पर हमला किया देवता हार गए
स्वर्ग पर कब्जा किया इंद्र का सिंहासन छिन गया
ऋषि-मुनियों को सताया यज्ञ और पूजा रुक गई
प्रजा पर अत्याचार किए तीनों लोकों में डर फैल गया

देवताओं की पुकार

परेशान देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, हमें महिषासुर से बचाइए। हम बेघर हो गए हैं।” पूरी बात सुनकर तीनों देवताओं को बहुत क्रोध आया। उनके चेहरों से एक तेज निकला। यह तेज इतना प्रचंड था कि आकाश में फैल गया। फिर दूसरे देवताओं के शरीर से भी तेज निकला। वह भी उसी तेज में मिल गया। सब मिलकर एक विशाल तेज-पुंज बन गया।

देवी का प्रकट होना

यह तेज-पुंज कात्यायन ऋषि के आश्रम में पहुंचा। ऋषि ने उसे प्रणाम किया और उसकी पूजा की। उसी तेज से एक सुंदर और शक्तिशाली देवी प्रकट हुईं। ऋषि कात्यायन ने सबसे पहले उनकी पूजा की थी। इसलिए वे कात्यायनी कहलाईं। इस तरह ऋषि की बेटी पाने की इच्छा भी पूरी हो गई।

देवताओं के उपहार

सभी देवताओं ने देवी को कुछ न कुछ भेंट किया।

किसने दिया क्या दिया
भगवान शिव त्रिशूल
भगवान विष्णु चक्र
इंद्र वज्र और घंटा
वरुण शंख
अग्नि शक्ति (अस्त्र)
हिमालय सिंह की सवारी
विश्वकर्मा कवच और कुल्हाड़ी
अन्य देवता आभूषण, माला और दूसरे अस्त्र

अब देवी हर तरह से तैयार थीं।

महिषासुर से युद्ध

देवी ने तेज आवाज में गर्जना की। उसकी गूंज से तीनों लोक कांप उठे। यह आवाज महिषासुर तक भी पहुंची। वह अपनी विशाल सेना लेकर आया। जैसे ही उसने देवी को देखा, वह चकित रह गया। पर उसका घमंड कम नहीं हुआ। युद्ध शुरू हुआ। महिषासुर बहुत चालाक था। वह बार-बार रूप बदलता रहा।

रूप क्या हुआ
भैंसा देवी ने उसे रोक दिया
सिंह देवी का सिंह उससे भिड़ गया
मनुष्य देवी ने उस पर वार किया
हाथी देवी ने उसकी सूंड काट दी
फिर भैंसा इस बार देवी ने उसे नहीं छोड़ा

कथा के अनुसार यह युद्ध कई दिन चला। आखिर में देवी ने महिषासुर का अंत कर दिया। तीनों लोकों में जयकार गूंज उठी। देवताओं को उनका स्वर्ग वापस मिल गया।

कथा एक नजर में

क्रम घटना
1 ऋषि कात्यायन ने तपस्या की, मां को बेटी रूप में पाने के लिए
2 महिषासुर को वरदान मिला कि कोई पुरुष या देवता उसे नहीं मार सकेगा
3 उसने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया
4 देवता त्रिदेव के पास पहुंचे
5 देवताओं के तेज से देवी प्रकट हुईं
6 ऋषि कात्यायन ने सबसे पहले पूजा की, इसलिए नाम कात्यायनी
7 सभी देवताओं ने अस्त्र-शस्त्र दिए
8 देवी ने महिषासुर का अंत किया

गोपियों और मां कात्यायनी की कथा

मां कात्यायनी की एक और सुंदर कथा श्रीमद्भागवत में मिलती है। ब्रज की गोपियां भगवान कृष्ण को बहुत चाहती थीं। वे चाहती थीं कि कृष्ण उनके जीवनसाथी बनें। इसके लिए उन्होंने कात्यायनी व्रत रखा।

गोपियों ने क्या किया कैसे
सुबह जल्दी उठीं यमुना जी में स्नान किया
मिट्टी की मूर्ति बनाई यमुना के किनारे
रोज पूजा की फूल, धूप और दीप से
प्रार्थना की “हे मां कात्यायनी, कृष्ण हमारे पति बनें”

इसीलिए मां कात्यायनी को ब्रज मंडल की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। इसी कथा से यह मान्यता चली कि मां की पूजा से विवाह में आ रही रुकावटें दूर होती हैं। यह श्रद्धा और परंपरा की बात है। लोग इसे अपनी आस्था के अनुसार मानते हैं।

मां का स्वरूप

स्वरूप क्या सिखाता है
सुनहरा रंग तेज और पवित्रता
सिंह की सवारी निडरता
चार भुजाएं हर दिशा में रक्षा
एक हाथ अभय मुद्रा में “डरो मत, मैं हूं”
एक हाथ वर मुद्रा में भक्तों को आशीर्वाद
एक हाथ में तलवार बुराई के नाश का प्रतीक
एक हाथ में कमल पवित्रता और कोमलता

मां के एक हाथ में तलवार है और दूसरे में कमल। यानी जरूरत पड़े तो सख्ती और बाकी समय कोमलता।

इस कथा से हम क्या सीखें

1. अन्याय के आगे मत झुको
मां ने बुराई को खत्म करने के लिए डटकर लड़ाई लड़ी। सही के लिए खड़े होना जरूरी है।

2. एकता में ताकत है
देवी का जन्म सभी देवताओं के तेज से हुआ। जब सब मिलते हैं, तो बड़ी से बड़ी समस्या हल होती है।

3. घमंड का अंत होता है
महिषासुर बहुत ताकतवर था। पर घमंड में उसने स्त्री की शक्ति को कम आंका। आखिर में एक स्त्री के हाथों ही उसका अंत हुआ।

4. नारी शक्ति को कम मत समझो
यह कथा बताती है कि औरतें सिर्फ कोमल नहीं, बेहद मजबूत भी हैं।

5. सच्ची तपस्या का फल मिलता है
ऋषि कात्यायन की साधना से मां उनकी पुत्री बनीं। सच्ची भक्ति कभी बेकार नहीं जाती।

6. मुश्किल में समझदारी से लड़ें
महिषासुर बार-बार रूप बदलता रहा। पर देवी ने हर बार शांत रहकर उसका सामना किया।

आज की जिंदगी में यह कथा क्यों जरूरी है

आज भी हमारे आसपास कई “महिषासुर” हैं। यानी ऐसी बुराइयां जो घमंड और ताकत के सहारे खड़ी हैं।

  • ऑफिस में कोई गलत व्यवहार करे, तो आवाज उठाइए।
  • घर में किसी के साथ अन्याय हो, तो साथ खड़े होइए।
  • खुद पर भरोसा रखिए। अपनी क्षमता को कम मत आंकिए।
  • मिलकर काम कीजिए। अकेले से ज्यादा ताकत टीम में होती है।

अगर कोई महिला या कोई भी इंसान मुश्किल या डर में है, तो मदद मांगना कमजोरी नहीं है। परिवार, दोस्तों या जरूरत पड़ने पर प्रशासन की मदद जरूर लीजिए।

कथा सुनने के बाद पूजा कैसे करें

  1. सुबह नहाकर साफ कपड़े पहनें।
  2. कलश के पास मां की तस्वीर रखें।
  3. रोली, चंदन और चावल चढ़ाएं।
  4. लाल गुलाब, गेंदा या कमल का फूल अर्पित करें।
  5. घी का दीया जलाएं।
  6. शहद का भोग लगाएं।
  7. मंत्र का जाप करें।
  8. आरती करके प्रसाद बांटें।

बीज मंत्र

ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥

ध्यान मंत्र

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मां को प्रिय भोग

भोग मान्यता
शहद सबसे प्रिय माना जाता है
शहद वाला हलवा सात्विक और स्वादिष्ट
मीठा पान कई जगह चढ़ाया जाता है
दूध की मिठाई शुभ मानी जाती है
फल और मेवे प्रसाद के लिए

डायबिटीज के मरीज शहद का सेवन डॉक्टर से पूछकर ही करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. कात्यायनी कौन हैं?
वे मां दुर्गा का छठा रूप हैं। उन्होंने महिषासुर का अंत किया था।

2. कात्यायनी नाम क्यों पड़ा?
ऋषि कात्यायन ने उनकी सबसे पहले पूजा की और उन्हें अपनी पुत्री माना। इसलिए यह नाम पड़ा।

3. महिषासुर को क्या वरदान मिला था?
कि कोई पुरुष या देवता उसे नहीं मार सकेगा।

4. मां ने महिषासुर को कैसे हराया?
देवताओं के तेज और अस्त्र-शस्त्रों के साथ युद्ध करके। उसके बार-बार रूप बदलने पर भी देवी डटी रहीं।

5. गोपियों ने मां की पूजा क्यों की?
भागवत कथा के अनुसार, उन्होंने कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए कात्यायनी व्रत रखा था।

6. मां का वाहन क्या है?
सिंह, यानी शेर।

7. मां को कौन सा भोग पसंद है?
शहद।

8. क्या घर में अकेले पूजा की जा सकती है?
बिल्कुल। मां श्रद्धा देखती हैं, भीड़ नहीं।

मां कात्यायनी की कथा हमें एक सीधी बात सिखाती है। सच के लिए डटे रहो और अन्याय के आगे कभी मत झुको। आज मां के आगे दीया जलाइए। शहद का भोग लगाइए। अपने मन की बात मां से कह दीजिए। मां कात्यायनी आपको हिम्मत, खुशी और रिश्तों में मिठास दें।

जय माता दी!

15 अक्टूबर का इतिहास 

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15 अक्टूबर का इतिहास

    • 1686 – मुग़ल शासक औरंगजेब ने बीजापुर के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये।
    • 1724 – कार्नेलिस स्टीनोवेन को पुराने कैथोलिक चर्च का पहला पादरी बनाया गया।
    • 1764 – एडवर्ड गिब्बन रोम में बृहस्पति के बर्बाद मंदिर में गंगाकारों के एक समूह को देखा,जिससे उन्हें रोमन साम्राज्य के इतिहास और द हिस्ट्री ऑफ़ द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ द डिवीनेशन पर काम शुरू करने के लिए प्रोत्साहित मिला।
    • 1827 – चार्ल्स डार्विन को मसीह के कॉलेज, कैम्ब्रिज में भर्ती कराया गया।
    • 1866 – कनाडा स्थित फ्रेंच बहुल क्षेत्र क्यूबेक में जबरदस्त आग लगने से 2500 मकान जलकर खाक।
    • 1923 – वर्ष का पांचवा उष्णकटिबंधीय तूफ़ान लीवर्ड द्वीप के उत्तर में आया।
    • 1931 – भारत के 11वें राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जन्म का तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ। उनका पूरा नाम अबुल बाक़िर ज़ैनुल आबेदीन था और वे अब्दुल कलाम के नाम से प्रसिद्ध थे।
    • 1932 – टाटा कंपनी के हवाई जहाज ने अपनी पहली उड़ान भरी थी. भारत सरकार द्वारा अधिग्रहण के बाद यही कंपनी एयर इंडिया कहलाई.
    • 1949 – त्रिपुरा राज्य को भारत में सम्मिलित किया गया।
    • 1958 – अफ्रीकी देश ट्यूनीशिया ने मिस्र के साथ राजनयिक संबंध समाप्त किए।
    • 1964 – सोवियत संघ के नेता निकिता खुर्श्चेव की सेवानिवृति ने पूरे विश्व को चौंका दिया.
    • 1970 – अनवर सदत मिस्त्र के राष्ट्रपति चुने गए।
    • 1978 – सोवियत संघ ने पूर्वी कजाखस्तान क्षेत्र में परमाणु परीक्षण किया।
    • 1988 – उज्वला पाटिल समुद्र के रास्ते विश्व का चक्कर लगाने वाली पहली एशियाई महिला बनी।
    • 1990 – सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया।
    • 1996 – फिजी व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि की पुष्टि करने वाला प्रथम देश बना।
    • 1997 – अरुंधति राय को उनके उपन्यास ‘द गॉड आफ़ स्माल थिंग्स‘ के लिए ब्रिटेन के सबसे प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार के लिए चुना गया।
    • 1998 – ग़रीबी उन्मूलन के लिए भारत की फ़ातिमा बी को संयुक्त राष्ट्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
    • 1999 – चीन ने 12 हज़ार किलोमीटर तक मार करने वाले ‘डी.एफ़.-41 आईसीबीएम’ नामक प्रक्षेपास्त्र का सफल परीक्षण किया, जनरल जोसेफ़ रॉलस्टन नाटो के सर्वोच्च वाइस कमांडर नियुक्त।
    • 2006 – संयुक्त राष्ट्र संघ ने उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाया।
    • 2007 – वर्ष 2007 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार अमेरिका के तीन अर्थशास्त्रियों- लियोनिड हरविक्ज, इरिक मस्किन और रोजर मायरसन को प्रदान किया गया।
    • 2008 – रिजर्व बैंक ने सीआरआर में एक फ़ीसदी की कटौती की घोषणा की। अरविन्द अदिग को उनकी पुस्तक ‘द हाइट टाइगर’ के लिए वर्ष 2008 का बुकर पुरस्कार प्रदान किया गया।
    • 2012 – ब्रिटिश लेखिका हिलेरी मेंटल को उनके उपन्यास “ब्रिंग अप द बडीज़” के लिए मैन बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
    • 2013 – फिलीपीन्स में 7.2 की तीव्रता वाले भूकंप से 215 से अधिक लोगों की मौत।

छह मुख वाले बेटे की मां: स्कंदमाता की पावन कथा, जिसमें ममता भी है और वीरता भी

नवरात्र का पांचवां दिन मां स्कंदमाता को समर्पित है। वे मां दुर्गा की पांचवीं शक्ति हैं। उनके नाम में ही उनकी पहचान छिपी है। स्कंद यानी भगवान कार्तिकेय और माता यानी मां। यानी स्कंद की माता। यह कथा सिर्फ एक देवी की नहीं है। यह एक ऐसी मां की कहानी है जिसने अपने बेटे को प्यार भी दिया और दुनिया बचाने की ताकत भी दी।

Skandamatas-Sacred-katha

नाम का मतलब क्या है

शब्द मतलब
स्कंद भगवान कार्तिकेय का एक नाम
माता मां
स्कंदमाता कार्तिकेय की मां

भगवान कार्तिकेय के और भी कई नाम हैं।

नाम कहां ज्यादा प्रचलित
कार्तिकेय पूरे भारत में
स्कंद, कुमार उत्तर भारत और शास्त्रों में
षण्मुख छह मुखों के कारण
मुरुगन तमिलनाडु और दक्षिण भारत

कथा की शुरुआत: तारकासुर का वरदान

बहुत पुरानी बात है। एक राक्षस था तारकासुर। वह बहुत ताकतवर और बहुत चालाक था। उसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। सालों तक अन्न-जल छोड़कर साधना की। आखिर ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए। तारकासुर ने कहा, “मुझे अमर कर दीजिए।” ब्रह्मा जी ने समझाया, “जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी तय है। कोई और वरदान मांगो।” तारकासुर थोड़ी देर सोचता रहा। फिर उसने एक चालाकी भरी बात कही।

“ठीक है। मेरी मृत्यु सिर्फ शिव जी के पुत्र के हाथों हो।”

तारकासुर ने ऐसा क्यों मांगा

तारकासुर की सोच बहुत सीधी थी।

उसकी सोच मतलब
शिव जी तो गहरी तपस्या में रहते हैं वे कभी विवाह नहीं करेंगे
विवाह नहीं होगा तो पुत्र भी नहीं होगा
पुत्र नहीं होगा तो मुझे कोई हरा नहीं पाएगा

उस समय शिव जी की पत्नी सती अपने प्राण त्याग चुकी थीं। शिव जी गहरे ध्यान में बैठे थे। इसलिए तारकासुर को लगा कि वह लगभग अमर हो चुका है। ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया।

तीनों लोकों में आतंक

वरदान मिलते ही तारकासुर का घमंड आसमान पर पहुंच गया।

  • उसने देवताओं को स्वर्ग से भगा दिया।
  • ऋषि-मुनियों की पूजा और यज्ञ रुकवा दिए।
  • प्रजा पर अत्याचार किए।
  • तीनों लोकों में डर फैल गया।

परेशान देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, हमें इस राक्षस से बचाइए।”

ब्रह्मा जी ने बताया, “इसे सिर्फ शिव जी का पुत्र ही मार सकता है। पहले शिव जी का विवाह होना जरूरी है।”

शिव जी को जगाने की कोशिश

अब देवताओं के सामने एक बड़ी मुश्किल थी। शिव जी तो गहरी समाधि में थे।

उधर सती ने अगला जन्म हिमालय के घर पार्वती के रूप में लिया था। पार्वती बचपन से शिव जी को पाना चाहती थीं।

देवताओं ने सोचा कि शिव जी का ध्यान तोड़ना होगा। इसके लिए उन्होंने कामदेव को भेजा। कामदेव ने शिव जी की समाधि भंग करने की कोशिश की।

शिव जी की आंख खुली। वे बहुत नाराज हुए। कथा के अनुसार, उनके क्रोध से कामदेव भस्म हो गए।

यह देखकर देवता घबरा गए। पर पार्वती जी ने हार नहीं मानी।

पार्वती की तपस्या

पार्वती जी ने तय कर लिया कि वे तप से शिव जी को मनाएंगी। उन्होंने राजमहल छोड़ दिया और जंगल में कठोर तपस्या शुरू कर दी। इस तप की कहानी हम मां ब्रह्मचारिणी की कथा में पढ़ चुके हैं। सालों की साधना के बाद शिव जी प्रसन्न हुए। उन्होंने पार्वती को अपनी अर्धांगिनी स्वीकार किया। दोनों का विवाह हुआ। इसी विवाह की अनोखी बारात की कथा हमने मां चंद्रघंटा के रूप में पढ़ी थी।

स्कंद का जन्म

अब बारी थी उस बालक के जन्म की, जिसका सबको इंतजार था। कार्तिकेय के जन्म की कथा अलग-अलग ग्रंथों में थोड़े अलग रूपों में मिलती है। पर लोकप्रिय कथा कुछ इस तरह है।

क्रम क्या हुआ
पहले शिव जी का तेज बहुत प्रचंड था, जिसे कोई संभाल नहीं सका
फिर वह तेज अग्नि देव और गंगा जी से होता हुआ आगे बढ़ा
उसके बाद वह तेज एक पवित्र सरोवर (सरवण) में पहुंचा
वहां उस तेज से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ
फिर छह कृत्तिकाओं (अप्सराओं) ने उसे पाला
इसीलिए उनका नाम पड़ा कार्तिकेय

छह माताओं ने जब उन्हें दूध पिलाया, तो बालक के छह मुख प्रकट हो गए। इसीलिए वे षण्मुख भी कहलाए।

मां पार्वती की गोद में

बालक को जब मां पार्वती ने देखा, तो उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने उसे अपनी गोद में उठा लिया। उसे गले से लगाया और अपना बेटा स्वीकार किया। उस दिन से मां पार्वती स्कंदमाता कहलाईं। इसी रूप में मां की पूजा होती है। उनकी गोद में छह मुख वाला बालक बैठा होता है। मां के चेहरे पर ममता और हाथों में अभय का आशीर्वाद होता है।

मां ने बेटे को सिर्फ लाड़ नहीं दिया

यह कथा का सबसे खूबसूरत हिस्सा है। मां ने स्कंद को सिर्फ प्यार नहीं किया। उन्होंने उसे मजबूत भी बनाया।

मां ने क्या दिया मतलब
युद्ध की कला ताकि वह राक्षसों से लड़ सके
ज्ञान और विवेक ताकि वह सही-गलत पहचाने
शक्ति और आशीर्वाद ताकि वह हर मुश्किल में डटा रहे
साहस ताकि वह कभी डरे नहीं

स्कंदमाता को विद्यावाहिनी दुर्गा भी इसीलिए कहा जाता है।

सेनापति बने स्कंद

जब कार्तिकेय बड़े हुए, तो देवता उनके पास पहुंचे। उन्होंने कहा, “प्रभु, अब आप ही हमारी सेना का नेतृत्व कीजिए।” कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति बने। विदा के समय मां ने अपने बेटे को आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा, “बेटा, धर्म के रास्ते पर चलना। बुराई के आगे मत झुकना। मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है।”

तारकासुर का अंत

फिर युद्ध शुरू हुआ। एक तरफ घमंडी तारकासुर की विशाल सेना थी। दूसरी तरफ देवताओं की सेना, जिसके सेनापति थे कार्तिकेय। युद्ध बहुत भयंकर था। तारकासुर ने खूब जोर लगाया। पर इस बार उसका सामना शिव जी के पुत्र से था। यही वह घड़ी थी जिसका उसने वरदान में जिक्र किया था। कार्तिकेय ने मां के आशीर्वाद और अपने पराक्रम से तारकासुर का अंत कर दिया। तीनों लोकों में खुशी की लहर दौड़ गई। देवताओं को उनका स्वर्ग वापस मिल गया। ऋषि-मुनि फिर से पूजा-पाठ करने लगे।

मां का स्वरूप

स्वरूप क्या बताता है
गोद में बालक स्कंद मां की ममता
चार भुजाएं हर दिशा में रक्षा
दो हाथों में कमल शुद्धता और शांति
एक हाथ में बालक संतान का पालन-पोषण
एक हाथ अभय मुद्रा में “डरो मत, मैं हूं”
कमल का आसन इसीलिए पद्मासना देवी नाम
सिंह की सवारी निडरता

इस कथा से हम क्या सीखें

1. मां की ममता सबसे बड़ी ताकत है
मां का आशीर्वाद हर मुश्किल में कवच बन जाता है।

2. बच्चे को सिर्फ लाड़ न दें
उसे अच्छे संस्कार दें, ज्ञान दें और मजबूत बनाएं।

3. घमंड हमेशा हारता है
तारकासुर कितना भी ताकतवर था, आखिर में उसका अंत हुआ।

4. सही समय का इंतजार करें
देवताओं ने हड़बड़ी नहीं की। उन्होंने सही समय पर सही कदम उठाया।

5. परिवार की एकता जरूरी है
शिव, पार्वती और कार्तिकेय, तीनों की भूमिका से ही बुराई का अंत हुआ।

आज की जिंदगी में यह कथा क्यों जरूरी है

आज के माता-पिता बच्चों को खूब सुविधाएं देते हैं। पर कई बार बच्चों को मजबूत बनाना भूल जाते हैं। स्कंदमाता की कथा हमें यही याद दिलाती है।

  • बच्चों को प्यार दीजिए। साथ ही अनुशासन भी सिखाइए।
  • उन्हें अच्छी बातें बताइए।
  • उनकी बात ध्यान से सुनिए।
  • उन्हें गलती से सीखना सिखाइए।
  • उनके साथ रोज थोड़ा वक्त बिताइए।

और बच्चों के लिए संदेश यह है कि मां की सीख को हल्के में मत लीजिए। उसी में आपकी ताकत छिपी है।

कथा सुनने के बाद पूजा कैसे करें

  1. सुबह नहाकर साफ कपड़े पहनें।
  2. कलश के पास मां की तस्वीर रखें।
  3. रोली, चंदन और चावल चढ़ाएं।
  4. कमल या पीले फूल अर्पित करें।
  5. घी का दीया जलाएं।
  6. केले का भोग लगाएं।
  7. मंत्र का जाप करें।
  8. आरती करके प्रसाद बांटें।

बीज मंत्र

ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥

ध्यान मंत्र

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. स्कंदमाता कौन हैं?
वे मां दुर्गा का पांचवां रूप हैं। वे भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं।

2. तारकासुर कौन था?
एक शक्तिशाली राक्षस, जिसे वरदान मिला था कि उसकी मृत्यु सिर्फ शिव जी के पुत्र के हाथों होगी।

3. कार्तिकेय के छह मुख क्यों हैं?
कथा के अनुसार, छह कृत्तिकाओं ने उन्हें दूध पिलाया था, इसलिए उनके छह मुख प्रकट हुए।

4. मां को पद्मासना देवी क्यों कहते हैं?
क्योंकि वे कमल के आसन पर बैठती हैं।

5. मां का वाहन क्या है?
सिंह, यानी शेर।

6. मां को कौन सा भोग पसंद है?
केला।

7. यह कथा किन ग्रंथों में मिलती है?
शिव पुराण, स्कंद पुराण और अन्य ग्रंथों में अलग-अलग रूप में।

स्कंदमाता की कथा हमें एक प्यारी सीख देती है। सच्चा प्यार वही है, जो बच्चे को लाड़ भी दे और उसे मजबूत भी बनाए। आज मां के आगे दीया जलाइए। केले का भोग लगाइए। अपने बच्चों और अपनी मां की सलामती की दुआ कीजिए। मां स्कंदमाता आपके घर को ममता, शक्ति और खुशहाली से भर दें।

जय माता दी!

ममता और शक्ति का संगम: मां स्कंदमाता की पूजा विधि, कथा, भोग, मंत्र और आरती

आज नवरात्र का पांचवां दिन है। आज मां दुर्गा की पांचवीं शक्ति, मां स्कंदमाता, की पूजा होती है। इनका नाम ही इनकी पहचान है। स्कंद यानी भगवान कार्तिकेय और माता यानी मां। मां स्कंदमाता का मतलब है, स्कंद की माता। इस रूप में मां की ममता और ताकत, दोनों एक साथ दिखती हैं। एक मां के लिए अपना बच्चा सबसे प्यारा होता है। पर वही मां जरूरत पड़ने पर अपने बच्चे को वीर योद्धा भी बनाती है।

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पांचवां नवरात्र कब है

इस साल पांचवां नवरात्र 15 अक्टूबर, गुरुवार को पड़ रहा है। यह पंचमी तिथि है। गुरुवार का दिन होने से इसका महत्व और बढ़ जाता है।

ध्यान दें: अलग-अलग पंचांगों में तिथि के घटने-बढ़ने से तारीख थोड़ी आगे-पीछे हो सकती है। पूजा से पहले अपने स्थानीय पंचांग या पंडित जी से सही समय जरूर पूछ लें।

आज की पूजा एक नजर में

बात जानकारी
आज की देवी मां स्कंदमाता
नवरात्र का दिन पांचवां
वाहन सिंह (शेर)
भुजाएं चार
गोद में बालक कार्तिकेय (स्कंद)
प्रिय भोग केला
बीज मंत्र ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः

कौन हैं मां स्कंदमाता

मां स्कंदमाता, पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती का वह रूप हैं जिसमें वे भगवान कार्तिकेय की माता हैं। भगवान कार्तिकेय के कई नाम हैं।

नाम कहां ज्यादा प्रचलित
स्कंद उत्तर भारत
कार्तिकेय पूरे भारत में
कुमार शास्त्रों में
षण्मुख दक्षिण भारत
मुरुगन तमिलनाडु

वे देवताओं की सेना के सेनापति माने जाते हैं।

मां का स्वरूप

स्वरूप खास बात
गोद में छह मुख वाले बालक स्कंद
भुजाएं चार
दो हाथों में कमल का फूल
एक हाथ में बालक स्कंद को थामा हुआ
एक हाथ में अभय मुद्रा, यानी “डरो मत”
आसन कमल का फूल
वाहन सिंह
रंग उजला, गोरा और शांत

मां कमल पर विराजमान होती हैं। इसलिए उन्हें पद्मासना देवी भी कहते हैं। भक्त उन्हें विद्यावाहिनी दुर्गा के नाम से भी जानते हैं।

मां स्कंदमाता की कथा

कथा बहुत रोचक है। इसे आसान भाषा में पढ़िए।

तारकासुर का आतंक

बहुत समय पहले की बात है। एक राक्षस था तारकासुर। वह बहुत शक्तिशाली था। उसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। तारकासुर ने अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने कहा, “जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है।” यह सुनकर तारकासुर ने एक चालाकी भरा वरदान मांगा। उसने कहा, “मेरी मृत्यु सिर्फ भगवान शिव के पुत्र के हाथों हो।” तारकासुर को लगता था कि शिव जी तो गहरी तपस्या में डूबे हैं। वे कभी विवाह नहीं करेंगे। जब पुत्र ही नहीं होगा, तो उसे कौन मारेगा? यही सोचकर वह खुद को अजेय मानने लगा। ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया।

देवताओं की चिंता

वरदान पाकर तारकासुर ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। उसने देवताओं को स्वर्ग से भगा दिया। ऋषि-मुनियों की पूजा रुकवा दी। चारों तरफ डर फैल गया। परेशान देवता भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के पास गए। सबको समझ आ गया कि अब सिर्फ शिव जी का पुत्र ही इसे हरा सकता है।

शिव-पार्वती का विवाह

उधर मां पार्वती कठोर तप करके शिव जी को पाना चाहती थीं। मां ब्रह्मचारिणी की कथा में हमने यह पढ़ा था। उनकी तपस्या सफल हुई। शिव जी और पार्वती का विवाह हुआ।

स्कंद का जन्म

इसके बाद कार्तिकेय का जन्म हुआ। उनके जन्म की कथा अलग-अलग ग्रंथों में अलग रूपों में मिलती है। पर सभी का सार यही है कि वे शिव जी के पुत्र थे। उन्हें पालने की जिम्मेदारी मां पार्वती ने संभाली। इसी रूप में वे स्कंदमाता कहलाईं।

मां की ममता और बेटे की ट्रेनिंग

मां ने बेटे को सिर्फ लाड़ नहीं दिया। उन्होंने उसे युद्ध की हर कला सिखाई। उसे शक्ति दी, ज्ञान दिया और अपना आशीर्वाद दिया। फिर समय आया जब देवताओं ने उन्हें अपना सेनापति चुना। मां ने खुद उन्हें युद्ध के लिए विदा किया।

तारकासुर का अंत

युद्ध हुआ। भगवान स्कंद ने बहादुरी से तारकासुर का सामना किया। मां के आशीर्वाद और अपनी ताकत से उन्होंने उसका अंत कर दिया। देवताओं को स्वर्ग वापस मिल गया। तीनों लोकों में फिर से शांति लौट आई।

इस कथा से हम क्या सीखें

सीख मतलब
मां की ममता सबसे बड़ी ताकत है मां का आशीर्वाद हर मुश्किल में साथ देता है
बच्चे को सिर्फ लाड़ न दें उसे मजबूत और समझदार भी बनाएं
सही समय का इंतजार करें देवताओं ने सही समय पर सही उपाय किया
बुराई चाहे जितनी बड़ी हो, हारती जरूर है तारकासुर कितना भी ताकतवर था, अंत में हार गया
परिवार में एकता जरूरी है मां, पिता और पुत्र, सबकी भूमिका थी

पांचवें दिन इनकी पूजा क्यों

मान्यता है कि मां स्कंदमाता की पूजा से:

  • संतान सुख मिलता है। जो दंपति संतान की इच्छा रखते हैं, वे इस दिन खास पूजा करते हैं।
  • बच्चों की रक्षा होती है। मां अपनी संतान की तरह भक्तों की भी रक्षा करती हैं।
  • पढ़ाई और ज्ञान में लाभ होता है। इन्हें विद्यावाहिनी भी कहा जाता है।
  • मन शांत रहता है।
  • घर में सुख-शांति आती है।

मान्यता है कि मां की साधना से विशुद्धि चक्र मजबूत होता है। इसे गले का चक्र माना जाता है और यह बोलचाल से जुड़ा है। इसे अपनी श्रद्धा के अनुसार मानें। कहा जाता है कि मां की पूजा से भगवान कार्तिकेय की भी पूजा हो जाती है। इसलिए एक पूजा में दो लाभ माने जाते हैं।

पूजा की सामग्री

सामग्री किसलिए
मां की तस्वीर या मूर्ति पूजा के लिए
रोली, चंदन और अक्षत (चावल) तिलक और पूजा के लिए
कमल या पीले फूल मां को चढ़ाने के लिए
घी का दीपक आरती के लिए
धूप और अगरबत्ती वातावरण शुद्ध करने के लिए
गंगाजल शुद्धि के लिए
केले मुख्य भोग
फल और मेवे प्रसाद के लिए
मिठाई भोग के लिए
माला मंत्र जाप के लिए

पूजा की आसान विधि

पहला कदम: स्नान करें
सुबह जल्दी उठें और नहाएं। साफ कपड़े पहनें। कई लोग इस दिन सफेद या हल्के रंग के कपड़े पहनना शुभ मानते हैं। यह परंपरा और पंचांग के अनुसार बदल सकता है।

दूसरा कदम: जगह साफ करें
पूजा की जगह पर गंगाजल छिड़कें। कलश के पास मां की तस्वीर रखें।

तीसरा कदम: संकल्प लें
हाथ में जल और चावल लें। मन में कहें कि आप श्रद्धा से मां की पूजा कर रहे हैं।

चौथा कदम: कलश की पूजा करें
सबसे पहले कलश पर रोली और अक्षत चढ़ाएं। फिर उसके पास दीया जलाएं।

पांचवां कदम: मां का ध्यान करें
आंखें बंद करें। मां की गोद में बैठे बालक स्कंद को याद करें। ध्यान मंत्र पढ़ें।

छठा कदम: पूजन करें
मां को रोली, चंदन और अक्षत चढ़ाएं। कमल या पीले फूल अर्पित करें। फिर धूप और दीप दिखाएं।

सातवां कदम: भोग लगाएं
मां को केले का भोग लगाएं।

आठवां कदम: मंत्र जाप
माला लेकर मंत्र का जाप करें। जितना हो सके, उतना करें।

नौवां कदम: आरती करें
अंत में आरती उतारें। प्रसाद सबको बांटें। चाहें तो केले का प्रसाद किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भी दें।

मां स्कंदमाता को क्या भोग लगाएं

मां को केला बहुत प्रिय माना जाता है। इसलिए आज के भोग में केले जरूर रखें।

भोग खास बात
केला सबसे प्रिय भोग माना जाता है
केले की खीर सात्विक और स्वादिष्ट
दूध से बनी मिठाई शुभ मानी जाती है
मेवे बादाम और किशमिश
फल सेब, अनार या पपीता

ध्यान रहे: भोग साफ-सफाई से बनाएं। उसमें लहसुन-प्याज न डालें। प्रसाद का कुछ हिस्सा बच्चों को देना शुभ माना जाता है।

मान्यता है कि केले का भोग लगाने से घर के सदस्यों की सेहत अच्छी रहती है।

मां स्कंदमाता के मंत्र

बीज मंत्र

ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः॥

ध्यान मंत्र

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मंत्र शुद्ध उच्चारण से पढ़ें। न आए तो धीरे-धीरे सीख लें। भाव सबसे जरूरी है।

मां स्कंदमाता की आरती

जय तेरी हो स्कंदमाता।
पांचवां नाम तुम्हारा आता॥
सबके मन की जानन हारी।
जग जननी सबकी महतारी॥
तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं।
हरदम तुझे ध्याता रहूं मैं॥
कई नामों से तुझे पुकारा।
मुझे एक है तेरा सहारा॥
कहीं पहाड़ों पर है डेरा।
कई शहरों में तेरा बसेरा॥
हर मंदिर में तेरे नजारे।
गुण गाएं तेरे भक्त प्यारे॥
भक्ति अपनी मुझे दिला दो।
शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो॥
इंद्र आदि देवता मिल सारे।
करें पुकार तुम्हारे द्वारे॥
दुष्ट दैत्य जब चढ़ कर आए।
तू ही खंडा हाथ उठाए॥
दासों को सदा बचाने आई।
‘चमन’ की आस पुजाने आई॥

क्या करें और क्या न करें

क्या करें क्या न करें
सुबह जल्दी उठकर पूजा करें पूजा में जल्दबाजी न करें
साफ कपड़े पहनें गंदे कपड़ों में पूजा न करें
बच्चों को साथ बिठाएं बच्चों को डांटें नहीं
सात्विक भोजन करें लहसुन-प्याज और मांसाहार न खाएं
मां का सम्मान करें मां या किसी महिला का अपमान न करें
जरूरतमंद को केला या फल दें किसी का दिल न दुखाएं
घर के बड़ों का आशीर्वाद लें बड़ों से बहस न करें

माताओं के लिए खास संदेश

आज का दिन हर मां के लिए खास है। मां स्कंदमाता हमें याद दिलाती हैं कि मां होना एक बड़ी ताकत है।

  • अपने बच्चे को प्यार दीजिए। पर उसे मजबूत बनाना भी मत भूलिए।
  • उसे अच्छी बातें सिखाइए।
  • उसकी बात धैर्य से सुनिए।
  • खुद का भी ध्यान रखिए। थकी हुई मां बच्चे को पूरा प्यार नहीं दे पाती।

और अगर आप अपनी मां के साथ हैं, तो आज उनके पैर छू लीजिए। उनके साथ थोड़ा वक्त बिताइए।

व्रत रखने वालों के लिए सुझाव

  • दिन में फल, दूध और मेवे लेते रहें।
  • केला जरूर खाएं। इससे ताकत मिलती है।
  • खूब पानी पिएं।
  • सेंधा नमक का ही इस्तेमाल करें।
  • ज्यादा तला-भुना न खाएं।
  • गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और बीमार लोग डॉक्टर की सलाह से ही व्रत रखें। सेहत सबसे जरूरी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. नवरात्र के पांचवें दिन किसकी पूजा होती है?
मां स्कंदमाता की।

2. स्कंदमाता का मतलब क्या है?
स्कंद यानी कार्तिकेय की माता।

3. मां का वाहन क्या है?
सिंह, यानी शेर।

4. मां को कौन सा भोग प्रिय है?
केला।

5. मां की कितनी भुजाएं हैं?
चार भुजाएं।

6. मां को पद्मासना देवी क्यों कहते हैं?
क्योंकि वे कमल के आसन पर विराजमान होती हैं।

7. संतान की इच्छा वाले क्या करें?
श्रद्धा से मां की पूजा करें और केले का भोग लगाएं। लेकिन स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए डॉक्टर से सलाह लेना भी जरूरी है।

8. क्या घर में अकेले पूजा की जा सकती है?
बिल्कुल। मां श्रद्धा देखती हैं, भीड़ नहीं।

मां स्कंदमाता की कथा एक सीधी सीख देती है। सच्चा प्यार वही है, जो अपने बच्चे को लाड़ भी दे और मजबूत भी बनाए। आज मां के आगे दीया जलाइए। केले का भोग लगाइए। अपने बच्चों, अपनी मां और पूरे परिवार की खुशहाली की प्रार्थना कीजिए। मां स्कंदमाता आपके घर को सुख, शांति और ममता से भर दें।

जय माता दी!

कलम से माँ दुर्गा तक: जब 13,000 पेनों ने लिया देवी का रूप

कभी सोचा है कि आपका पुराना पेन माँ दुर्गा की मूर्ति बन सकता है? कोलकाता में यही हुआ है। इस दुर्गा पूजा में एक अनोखी कलाकृति चर्चा में है। इसे बनाने में हज़ारों रीसाइकल्ड प्लास्टिक पेन लगे हैं। आइए, इसकी पूरी कहानी आसान भाषा में जानते हैं।

Goddess Durga sculpture from 13,000 recycled plastic pens

क्या है पूरी कहानी

कोलकाता का त्रिधारा सम्मिलानी पूजा पंडाल इस बार सबका ध्यान खींच रहा है। यहाँ लिंक लिमिटेड का राइटिंग ब्रांड पेंटोनिक रीसाइकल्ड प्लास्टिक से बने लगभग 13,000 पेन और उतने ही रिफिल से बनी दुर्गा प्रतिमा पेश कर रहा है। यानी जो चीज़ कागज़ पर शब्द लिखने के काम आती थी, वही अब देवी की मूर्ति का रूप ले चुकी है।

कलाकार कौन हैं

इस इंस्टॉलेशन की सोच और रचना चंद्र नाथ साहा ने की है। लोग उन्हें प्यार से “तिलक” कहते हैं। तिलक ने एक आम और रोज़ काम आने वाली चीज़ को कला में बदल दिया। यही इस काम की सबसे खास बात है।

मूर्ति कितनी बड़ी है

यह कलाकृति लगभग 5.5 फीट ऊँची, 4.5 फीट चौड़ी और 3 फीट गहरी है। आसान शब्दों में, यह एक बड़े इंसान से भी ऊँची है। पास जाकर देखने पर हर पेन अलग दिखता है। दूर से देखने पर सब मिलकर देवी का रूप बना देते हैं।

क्या यह मुख्य प्रतिमा है

नहीं। यह कलाकृति पंडाल की मुख्य दुर्गा प्रतिमा के साथ रखी जाएगी। यानी पूजा की परंपरा अपनी जगह है। उसके साथ यह नई कला भी दर्शकों को देखने को मिलेगी।

इस कला की सबसे बड़ी बात क्या है

सबसे पहली बात है प्लास्टिक को नई ज़िंदगी देना। प्लास्टिक आज हमारी सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। यह आसानी से खत्म नहीं होता। ऐसे में रीसाइकल्ड प्लास्टिक से कला बनाना एक अच्छा संदेश है।

दूसरी बात है परंपरा और आधुनिक सोच का मेल। दुर्गा पूजा बंगाल की पहचान है। यहाँ हर साल कलाकार कुछ नया करते हैं। इस बार पेन से बनी मूर्ति ने इस परंपरा को नया रंग दिया है।

तीसरी बात है आम चीज़ में खास कला। हम पेन को बस काम की चीज़ समझते हैं। लेकिन सही नज़र वाला कलाकार उसमें भी सुंदरता देख लेता है।

दुर्गा पूजा और कला का रिश्ता

दुर्गा पूजा सिर्फ पूजा नहीं है। यह कला का भी बड़ा उत्सव है। कोलकाता में हर साल पंडाल और मूर्तियों में नए प्रयोग होते हैं। कहीं थीम पर पंडाल बनते हैं, तो कहीं अलग-अलग सामान से मूर्तियाँ बनती हैं।

पहले भी कोलकाता में कचरे से दुर्गा प्रतिमा बन चुकी है। एक कलाकार ने पुराने कपड़े, घिसे जूते, टूटे फूलदान और पुराने अखबारों से मूर्ति बनाई थी, ताकि लोगों में रीसाइक्लिंग की जागरूकता बढ़े। इसका मतलब है कि पर्यावरण और आस्था का यह मेल कोलकाता में नया नहीं है। हर साल इसमें कुछ नया जुड़ता जा रहा है।

हमें इससे क्या सीखना चाहिए

इस कलाकृति से कुछ छोटी लेकिन काम की बातें सीखी जा सकती हैं। सबसे पहले, कम इस्तेमाल करें। बार-बार फेंकने वाले पेन की जगह रिफिल वाले पेन लें। दूसरा, दोबारा इस्तेमाल करें। पुराने पेन और डिब्बों से सजावट या क्राफ्ट बनाएँ। तीसरा, प्लास्टिक कचरा अलग रखें और उसे सही जगह दें ताकि वह रीसाइकल हो सके। चौथा, बच्चों को भी कचरे से कला बनाना सिखाएँ। इससे उनमें बचपन से ही पर्यावरण की समझ बनेगी।

माँ दुर्गा शक्ति की देवी हैं। वे बुराई का नाश करती हैं। आज प्लास्टिक का कचरा भी एक बड़ी बुराई बन गया है। ऐसे में पेन से बनी यह मूर्ति हमें याद दिलाती है कि छोटे बदलाव भी बड़ा असर डाल सकते हैं।

13,000 पेन अगर कचरे में जाते, तो बस कचरा बनते। कलाकार के हाथों में आकर वे देवी का रूप बन गए। इस दुर्गा पूजा, आप भी एक छोटा संकल्प लें। प्लास्टिक कम इस्तेमाल करें और चीज़ों को दोबारा काम में लाएँ।

अंधेरे में जलाई पहली रोशनी: मां कूष्मांडा की पावन कथा

नवरात्र का चौथा दिन मां कूष्मांडा को समर्पित है। वे मां दुर्गा की चौथी शक्ति हैं। मां के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपनी हल्की सी मुस्कान से पूरा ब्रह्मांड रच दिया। इसीलिए उन्हें आदिशक्ति और सृष्टि की रचयिता कहा जाता है।आइए, इस कथा को आसान भाषा में शुरू से सुनते हैं।

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नाम का मतलब क्या है

शब्द मतलब
कू थोड़ा
ऊष्मा गर्मी, ऊर्जा
अंड ब्रह्मांड, अंडे जैसा गोला
कूष्मांडा जिसने अपनी थोड़ी सी ऊर्जा से ब्रह्मांड रचा

“कूष्मांड” का एक और मतलब कुम्हड़ा (पेठा या कद्दू) भी है। कहा जाता है कि मां को कुम्हड़े की बलि प्रिय है। इस कारण भी उनका नाम कूष्मांडा पड़ा।

कथा की शुरुआत: जब कुछ भी नहीं था

बहुत पुरानी बात है। तब न धरती थी, न आकाश। न सूरज था, न चांद। न तारे थे, न कोई जीव। चारों तरफ बस गहरा अंधेरा था। कोई हलचल नहीं थी। कोई आवाज नहीं थी। हर तरफ सन्नाटा और खालीपन था। उस अंधेरे में समय भी जैसे रुका हुआ था।

एक मुस्कान और ब्रह्मांड का जन्म

तभी उस अंधेरे में एक दिव्य रोशनी प्रकट हुई। वह रोशनी धीरे-धीरे एक रूप में बदली। वही थीं मां कूष्मांडा। मां ने धीमे से मुस्कुराया। बस उसी एक मुस्कान से सब कुछ बदल गया।

क्रम क्या हुआ
पहले अंधेरा छंटने लगा
फिर रोशनी फैलने लगी
उसके बाद सूरज, चांद और तारे बने
फिर ग्रह और धरती बनी
आखिर में जीवन की शुरुआत हुई

मां ने न कोई औजार लिया, न कोई युद्ध किया। सिर्फ एक मुस्कान से पूरी सृष्टि बन गई। यही उनकी सबसे बड़ी खासियत है।

सूर्य मंडल में निवास

सृष्टि रचने के बाद मां ने रहने के लिए एक अनोखी जगह चुनी। वह जगह थी सूर्य मंडल का भीतरी भाग। सूर्य की गर्मी और तेज इतना है कि वहां कोई नहीं रह सकता। पर मां कूष्मांडा वहां आराम से रहती हैं। मान्यता है कि सूर्य को ऊर्जा और चमक भी मां से ही मिलती है। इसीलिए उनके शरीर की चमक सूर्य जैसी मानी जाती है। इसी वजह से उन्हें सूर्य की अधिष्ठात्री देवी भी कहा जाता है।

मां का स्वरूप

मां का रूप जितना तेजस्वी है, उतना ही शांत भी है।

स्वरूप खास बात
चेहरा हल्की मुस्कान और सुनहरा तेज
सवारी सिंह (शेर)
भुजाएं आठ, इसलिए अष्टभुजा देवी भी कहलाती हैं
सात हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत का कलश, चक्र और गदा
आठवें हाथ में जपमाला
निवास सूर्य मंडल

माना जाता है कि मां के हाथ की जपमाला हर सिद्धि और निधि देने वाली है। यानी वे अपने भक्तों को आगे बढ़ने की ताकत देती हैं।

दूसरी मान्यता: सेहत और उम्र की देवी

कई जगह मां कूष्मांडा की एक और पहचान बताई जाती है। उन्हें सेहत, लंबी उम्र और खुशी देने वाली देवी माना जाता है। कहा जाता है कि मां के हाथ में अमृत का कलश है। यह अमृत जीवन और ऊर्जा का प्रतीक है। इसीलिए लोग बीमारी और कमजोरी से राहत की प्रार्थना भी इसी दिन करते हैं।

सारांश: कथा एक नजर में

बात विवरण
पहले की स्थिति चारों तरफ अंधेरा और सन्नाटा
मां का प्रकट होना दिव्य रोशनी के रूप में
सृष्टि कैसे बनी मां की मंद मुस्कान से
मां कहां रहती हैं सूर्य मंडल के भीतर
मां का वाहन सिंह
मां की भुजाएं आठ
मां को क्या पसंद मालपुआ, कुम्हड़ा

इस कथा से हम क्या सीखें

1. अंधेरे में भी उम्मीद है
जब सब कुछ खत्म लगे, तब भी नई शुरुआत हो सकती है। मां की कथा यही सिखाती है।

2. मुस्कान में बड़ी ताकत है
एक मुस्कान से माहौल बदल सकता है। रिश्ते सुधर सकते हैं। मन हल्का हो सकता है।

3. छोटी शुरुआत से घबराइए मत
ब्रह्मांड भी एक छोटी सी मुस्कान से बना। आपका सपना भी छोटे कदम से शुरू हो सकता है।

4. सृजन करो
कुछ नया बनाना, सीखना और रचना सबसे अच्छा काम है। मां खुद रचयिता हैं।

5. ऊर्जा बांटो
मां ने सूर्य को ऊर्जा दी और सबको जीवन दिया। हमें भी दूसरों के काम आना चाहिए।

आज की जिंदगी में यह कथा क्यों जरूरी है

आज बहुत से लोग तनाव से घिरे हैं। कभी नौकरी की चिंता। कभी पैसों की परेशानी। कभी रिश्तों की उलझन। ऐसे में लगता है कि चारों तरफ अंधेरा है।

मां कूष्मांडा की कथा इसी वक्त काम आती है।

  • अंधेरा कितना भी गहरा हो, एक किरण काफी है।
  • रोज कुछ पल मुस्कुराइए। इससे मन हल्का होता है।
  • नई शुरुआत करने से मत डरिए।
  • सुबह थोड़ी देर धूप में बैठिए। यह मन और सेहत दोनों के लिए अच्छा है।

कथा सुनने के बाद पूजा कैसे करें

अगर आप आज मां की पूजा कर रहे हैं, तो ये आसान स्टेप अपनाएं।

  1. सुबह नहाकर साफ कपड़े पहनें।
  2. कलश के पास मां की तस्वीर रखें।
  3. रोली, चंदन और चावल चढ़ाएं।
  4. लाल फूल, खासकर गुड़हल का फूल अर्पित करें।
  5. घी का दीया जलाएं।
  6. मालपुआ या कुम्हड़े की मिठाई का भोग लगाएं।
  7. मंत्र का जाप करें।
  8. आरती करके प्रसाद बांटें।

बीज मंत्र

ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मां को प्रिय भोग

भोग मान्यता
मालपुआ सबसे प्रिय माना जाता है
कुम्हड़े का पेठा नाम से जुड़ा होने के कारण शुभ
दही और हलवा सादा और सात्विक भोग
फल केला, सेब या अनार

मान्यता है कि मालपुए का भोग लगाने से बुद्धि और निर्णय लेने की ताकत बढ़ती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. मां कूष्मांडा कौन हैं?
वे मां दुर्गा का चौथा रूप हैं। उन्हें सृष्टि की रचयिता और आदिशक्ति माना जाता है।

2. उन्होंने सृष्टि कैसे रची?
कथा के अनुसार, अपनी हल्की सी मुस्कान से।

3. मां कहां रहती हैं?
मान्यता है कि वे सूर्य मंडल के भीतर रहती हैं।

4. मां को अष्टभुजा क्यों कहते हैं?
क्योंकि उनकी आठ भुजाएं हैं।

5. मां का वाहन क्या है?
सिंह, यानी शेर।

6. मां को कौन सा भोग पसंद है?
मालपुआ और कुम्हड़ा (पेठा)।

7. यह कथा किन ग्रंथों में मिलती है?
इसका जिक्र देवी पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में अलग-अलग रूप में मिलता है।

मां कूष्मांडा की कथा हमें एक प्यारी बात सिखाती है। हर बड़ी शुरुआत एक छोटी सी रोशनी और एक हल्की सी मुस्कान से होती है, आज मां के आगे दीया जलाइए। थोड़ी देर आंखें बंद करके शांत बैठिए। फिर मुस्कुराकर नई शुरुआत का संकल्प लीजिए।
मां कूष्मांडा आपको सेहत, ऊर्जा और खुशियां दें।

जय माता दी! 

14 अक्टूबर का इतिहास 

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 14 अक्टूबर का इतिहास 

  • 1240 – दिल्ली की शासक रही रजिया सुल्तान की मौत हुई थी।
  • 1882 – शिमला में पंजाब विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। यह ब्रिटिश उपनिवेशवादी सरकार द्वारा कलकत्ता, मुंबई और मद्रास के बाद स्थापित किया गया भारत का चौथा विश्वविद्यालय था।
  • 1882 – यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब की स्‍थापना हुई।
  • 1956 –  डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने अपने 3,85,000 अनुयायियों के साथ कोचांदा में बौद्ध धर्म स्वीकार किया और
  • 1882 – शिमला में पंजाब विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। यह ब्रिटिश उपनिवेशवादी सरकार द्वारा कलकत्ता, मुंबई और मद्रास के बाद स्थापित किया गया भारत का चौथा विश्वविद्यालय था।
  • 1933 – जर्मनी ने मित्र राष्ट्रों के समूह से बाहर आने की घोषणा की।
  • 1943 – जापान ने फिलीपींस की स्वतंत्रता की घोषणा की।
  • 1948 – इजरायल और मिस्र के बीच जबरदस्त लड़ाई शुरु हुई।
  • 1953 – भारत में संपदा शुल्क अधिनियम प्रभाव में आया।
  • 1964 – आज ही के दिन डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग जूनियर को केवल 35 साल की उम्र में अमेरिकी समाज में रंगभेद के विरुद्ध अहिंसात्मक आंदोलन चलाने के लिए पुरस्कृत किया गया. अमेरिका के जॉर्जिया प्रांत में जन्मे किंग नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति बने।
    1981 – होस्नी मुबारक मिस्र के चौथे राष्ट्रपति बने।
  • 1997 – ब्रिटेन की महारानी ऐलिजाबेथ द्वितीय और प्रिंस फ़िलिप ने अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
  • 1999 – परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सी.टी.बी.टी.) अमेरिकी सीनेट में नामंजूर हुआ।
  • 2000 – संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा पाक समेत 22 देशों में अपने दूतावास बंद किये गए।
  • 2004 – पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ को सेना प्रमुख बनाये रखने वाला विधेयक पारित किया।
  • 2007 – अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने चिकित्सा और कृषि क्षेत्रों में परमाणु प्रौद्योगिकी के प्रयोग के लिए नेपाल को मंजूरी प्रदान की।
  • 2008 – भारतीय रिजर्व बैंक ने म्युचुअल फंड्स की ज़रूरतें पूरी करने के लिए अतिरिक्त 200 अरब रुपये जारी करने की घोषणा की।
  • 2010 – राजधानी दिल्ली में चल रहे 19वें राष्ट्रमंडल खेलों का समापन हुआ।

हल्की सी मुस्कान से रचा ब्रह्मांड: मां कूष्मांडा की पूजा विधि, कथा, भोग, मंत्र और आरती

आज नवरात्र का चौथा दिन है। आज मां दुर्गा की चौथी शक्ति, मां कूष्मांडा, की पूजा होती है।  मां कूष्मांडा की पूजा चौथे दिन होती हैI मान्यता है कि जब कुछ भी नहीं था, तब मां ने अपनी हल्की सी मुस्कान से पूरा ब्रह्मांड रच दिया। इसीलिए उन्हें सृष्टि की आदि शक्ति कहा जाता है।

Maa Kushmanda Cosmic Devotional

चौथा नवरात्र कब है

इस साल चौथा नवरात्र 14 अक्टूबर, बुधवार को पड़ रहा है। यह चतुर्थी तिथि है।

ध्यान दें: तिथि और पूजा का सही समय हर शहर में थोड़ा अलग होता है। अपने स्थानीय पंचांग या पंडित जी से एक बार मिला लें।

आज की पूजा एक नजर में

बात जानकारी
आज की देवी मां कूष्मांडा
नवरात्र का दिन चौथा
वाहन सिंह (शेर)
भुजाएं आठ
प्रिय भोग मालपुआ
प्रिय फूल लाल फूल, खासकर गुड़हल
बीज मंत्र ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः

नाम का मतलब क्या है

नाम तीन शब्दों से मिलकर बना है।

शब्द मतलब
कू थोड़ा
ऊष्मा गर्मी, ऊर्जा
अंड ब्रह्मांड, अंडे जैसा गोला
कूष्मांडा जिसने अपनी थोड़ी सी ऊर्जा से ब्रह्मांड रचा

“कूष्मांड” शब्द का एक और मतलब है, कुम्हड़ा। इसे पेठा या कद्दू भी कहते हैं। कहा जाता है कि मां को कुम्हड़े की बलि प्रिय है। इसीलिए भी उनका नाम कूष्मांडा पड़ा।

मां कूष्मांडा का स्वरूप

मां का रूप बहुत तेजस्वी है। उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती है।

स्वरूप खास बात
सवारी सिंह
भुजाएं आठ, इसलिए अष्टभुजा देवी भी कहलाती हैं
सात हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत से भरा कलश, चक्र और गदा
आठवें हाथ में जपमाला, जो हर सिद्धि और निधि देने वाली मानी जाती है
चेहरा मंद मुस्कान और सुनहरा तेज
निवास सूर्य मंडल के भीतर

माना जाता है कि सूर्य के भीतर रहने की ताकत सिर्फ मां कूष्मांडा में है। इसीलिए उनके शरीर की चमक सूर्य जैसी मानी जाती है।

मां कूष्मांडा की कथा

यह कथा बहुत सुंदर है। इसे आसान भाषा में सुनिए।

जब कुछ भी नहीं था

बहुत समय पहले की बात है। तब न धरती थी, न आकाश। न सूरज था, न चांद। न कोई तारा, न कोई जीव। हर तरफ गहरा अंधेरा था। चारों ओर सन्नाटा ही सन्नाटा था।उस अंधेरे में कोई हलचल नहीं थी। कोई आवाज नहीं थी। बस एक खालीपन फैला हुआ था।

मां की मुस्कान

तब उस अंधकार में एक दिव्य रोशनी प्रकट हुई। वही थीं मां कूष्मांडा।उन्होंने धीरे से मुस्कुराया। बस उसी एक मुस्कान से अंधेरा छंटने लगा। रोशनी फैली। उसी रोशनी से ब्रह्मांड बना। धीरे-धीरे सूरज, चांद, तारे और ग्रह बने। धरती बनी। जीवन की शुरुआत हुई। इसीलिए मां को आदिशक्ति और सृष्टि की रचयिता कहा जाता है।

सूर्य लोक में निवास

ब्रह्मांड बनाने के बाद मां सूर्य मंडल के भीतर जाकर रहने लगीं। कहा जाता है कि वहां की गर्मी और तेज कोई और नहीं सह सकता। लेकिन मां वहां शांति से रहती हैं। सूर्य को ऊर्जा देने वाली भी मां कूष्मांडा ही मानी जाती हैं। उन्हीं की रोशनी से पूरे संसार को जीवन मिलता है।

इस कथा से हम क्या सीखें

सीख मतलब
अंधेरे में भी उम्मीद है जब सब खत्म लगे, तब भी नई शुरुआत हो सकती है
मुस्कान में बड़ी ताकत है एक मुस्कान से माहौल बदल सकता है
शुरुआत छोटी भी हो सकती है एक छोटी सी चिंगारी से भी बड़ा उजाला होता है
सृजन करो बनाना और रचना सबसे बड़ा काम है
ऊर्जा बांटो मां ने सबको जीवन दिया, हमें भी दूसरों के काम आना चाहिए

चौथे दिन इनकी पूजा क्यों

मान्यता है कि मां कूष्मांडा की पूजा से:

  • सेहत सुधरती है। शरीर और मन में ऊर्जा आती है।
  • परेशानियां घटती हैं। नकारात्मक सोच कम होती है।
  • उम्र और यश बढ़ता है।
  • मन में खुशी आती है। चिंता और तनाव घटता है।
  • नई शुरुआत की ताकत मिलती है।

लोगों की मान्यता है कि मां की साधना से अनाहत चक्र मजबूत होता है। यह चक्र प्रेम और करुणा से जुड़ा माना जाता है। इसे अपनी श्रद्धा के अनुसार मानें।

पूजा की सामग्री

सामग्री किसलिए
मां की तस्वीर या मूर्ति पूजा के लिए
रोली, चंदन और अक्षत (चावल) तिलक और पूजा के लिए
लाल फूल, खासकर गुड़हल मां को चढ़ाने के लिए
घी का दीपक आरती के लिए
धूप और अगरबत्ती वातावरण शुद्ध करने के लिए
गंगाजल शुद्धि के लिए
कुम्हड़ा (पेठा) मां को अर्पित करने के लिए
मालपुआ भोग के लिए
दही और हलवा प्रसाद के लिए
फल और मेवे प्रसाद के लिए

पूजा की आसान विधि

पहला कदम: स्नान करें
सुबह जल्दी उठें और नहाएं। साफ कपड़े पहनें। कई लोग इस दिन हरे रंग के कपड़े पहनना शुभ मानते हैं। यह पंचांग और क्षेत्र के अनुसार बदल सकता है, इसलिए अपनी परंपरा का पालन करें।

दूसरा कदम: जगह साफ करें
पूजा की जगह पर गंगाजल छिड़कें। कलश के पास मां की तस्वीर रखें।

तीसरा कदम: संकल्प लें
हाथ में जल और चावल लें। मन में कहें कि आप श्रद्धा से मां की पूजा कर रहे हैं।

चौथा कदम: कलश की पूजा करें
सबसे पहले कलश पर रोली और अक्षत चढ़ाएं। फिर पूजा शुरू करें।

पांचवां कदम: मां का ध्यान करें
आंखें बंद करें। मां के मुस्कुराते चेहरे को याद करें। ध्यान मंत्र पढ़ें।

छठा कदम: पूजन करें
मां को रोली, चंदन और अक्षत चढ़ाएं। लाल फूल अर्पित करें। फिर धूप और दीप दिखाएं।

सातवां कदम: भोग लगाएं
मां को मालपुआ चढ़ाएं। साथ में फल या कुम्हड़ा भी रख सकते हैं।

आठवां कदम: मंत्र जाप
माला लेकर मंत्र का जाप करें। जितना हो सके, उतना करें।

नौवां कदम: आरती करें
अंत में आरती उतारें। प्रसाद सबको बांटें। चाहें तो मालपुआ किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भी दें।

मां कूष्मांडा को क्या भोग लगाएं

मां को मालपुआ बहुत प्रिय माना जाता है। कुम्हड़े की मिठाई, यानी पेठा, भी शुभ मानी जाती है।

भोग खास बात
मालपुआ सबसे प्रिय भोग माना जाता है
कुम्हड़े का पेठा नाम से जुड़ा होने के कारण शुभ
दही और हलवा सादा और सात्विक भोग
फल केला, सेब या अनार
मेवे बादाम और किशमिश

ध्यान रहे: भोग साफ-सफाई से बनाएं। उसमें लहसुन-प्याज न डालें। प्रसाद का कुछ हिस्सा जरूरतमंद को देना शुभ माना जाता है।मान्यता है कि मालपुए का भोग लगाने से बुद्धि और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।

मां कूष्मांडा के मंत्र

बीज मंत्र

ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥

ध्यान मंत्र

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

प्रार्थना मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मंत्र शुद्ध उच्चारण से पढ़ें। न आए तो धीरे-धीरे सीख लें। भाव सबसे जरूरी है।

मां कूष्मांडा की आरती

कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
पिंगला ज्वालामुखी निराली।
शाकंबरी मां भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे।
भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदंबे।
सुख पहुंचाती हो मां अंबे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
मां के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो मां संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तेरे दर्शन कर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर पर शीश झुकाए॥

क्या करें और क्या न करें

क्या करें  क्या न करें
सुबह जल्दी उठकर पूजा करें पूजा में जल्दबाजी न करें
साफ कपड़े पहनें गंदे कपड़े न पहनें
चेहरे पर मुस्कान रखें गुस्सा और कड़वी बातें न करें
सात्विक भोजन करें लहसुन-प्याज और मांसाहार न खाएं
सुबह की धूप में कुछ देर बैठें देर तक सोते न रहें
जरूरतमंद की मदद करें किसी का दिल न दुखाएं
घर के बड़ों का आशीर्वाद लें बड़ों की बात को अनसुना न करें

व्रत रखने वालों के लिए सुझाव

  • दिन में फल, दूध और मेवे लेते रहें।
  • खूब पानी पिएं।
  • सेंधा नमक का ही इस्तेमाल करें।
  • ज्यादा तला-भुना और मीठा न खाएं।
  • सेहत ठीक न हो, तो डॉक्टर की सलाह से ही व्रत रखें। अपना ध्यान रखना भी जरूरी है।

आज की जिंदगी में मां का संदेश

आज बहुत से लोग तनाव और थकान से जूझ रहे हैं। कई बार लगता है कि सब कुछ अंधेरे में है। कोई रास्ता नहीं दिखता।

ऐसे वक्त में मां कूष्मांडा की कथा याद रखिए।

  • अंधेरा कितना भी गहरा हो, एक किरण काफी है।
  • मुस्कुराना सीखिए। यह छोटी चीज बड़ा असर करती है।
  • नई शुरुआत करने से मत डरिए।
  • अपनी ऊर्जा को बेकार की बातों में खर्च मत कीजिए।
  • हर रोज सुबह थोड़ी देर सूरज की रोशनी में बैठिए। इससे मन भी हल्का होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. नवरात्र के चौथे दिन किसकी पूजा होती है?
मां कूष्मांडा की।

2. मां का वाहन क्या है?
सिंह, यानी शेर।

3. मां को कौन सा भोग पसंद है?
मालपुआ। कुम्हड़े या पेठे की मिठाई भी शुभ मानी जाती है।

4. मां को अष्टभुजा देवी क्यों कहते हैं?
क्योंकि उनके आठ हाथ हैं।

5. मां कहां रहती हैं?
मान्यता है कि वे सूर्य मंडल के भीतर रहती हैं।

6. मां को कौन सा फूल प्रिय है?
लाल फूल, खासकर गुड़हल का फूल।

7. क्या घर में अकेले पूजा की जा सकती है?
बिल्कुल। मां श्रद्धा देखती हैं, भीड़ नहीं।

मां कूष्मांडा की कथा हमें एक प्यारी बात सिखाती है। बड़ी शुरुआत अक्सर एक छोटी सी मुस्कान से होती है। आज मां के आगे दीया जलाइए। उन्हें मालपुआ का भोग लगाइए। फिर मुस्कुराकर नई शुरुआत का संकल्प लीजिए। मां कूष्मांडा आपको सेहत, ऊर्जा और खुशियां दें।

जय माता दी!