डॉ. होमी जहांगीर भाभा भारत के प्रमुख दूरदर्शी परमाणु भौतिक वैज्ञानिकों में से एक थे। होमी जे. भाभा ने परमाणु विज्ञान के क्षेत्र में एक शक्तिशाली भारत की कल्पना की थी। उन्होने मुट्ठी भर वैज्ञानिकों की सहायता से मार्च 1944 में नाभिकीय उर्जा पर अनुसन्धान आरम्भ किया।
उन्हें भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। उन्होंने देश के परमाणु कार्यक्रम के भावी स्वरूप की मजबूत नींव रखी जिसके चलते भारत आज विश्व के प्रमुख परमाणु संपन्न देशों की कतार में खड़ा है। उन्हें ‘आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन एटॉमिक एनर्जी प्रोग्राम’ भी कहा जाता है।
इस लेख में हम जानेगें होमी जे. भाभा के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य , तो चलिए जानते हैं।
होमी ने अपनी स्कूली शिक्षा कैथेड्रल और जॉन कॉनन स्कूल, बॉम्बे में की थी। साल 1930 में होमी भाभा ने इंग्लैंड के कैम्ब्रिज से मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री और 1934 में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की थी। साल 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान होमी ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज, (IISc) बैंग्लोर में बतौर रीडर जॉइन किया था।
वह एक चित्रकार, शास्त्रीय संगीत और ओपेरा के प्रेमी होने के साथ-साथ कला और संस्कृति में बहुत रुचि रखते थे।
परमाणु अनुसंधान में जाने से पहले उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की।
उन्होंने नील्स बोह्र ( जोकि एक एक डेनिश भौतिक विज्ञानी थे) के साथ काम किया और क्वांटम सिद्धांत के विकास में एक प्रमुख भूमिका निभाई।
भाभा को मेसन कण की पहचान करने का श्रेय दिया जाता है।
वह 20 अगस्त 1955 में “परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग” पर आयोजित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के पहले अध्यक्ष थे।
वह 2 प्रमुख अनुसंधान संस्थानों “टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च” और “भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर” के संस्थापक, निर्माता और निदेशक थे।
वह चाहते थे कि परमाणु ऊर्जा का उपयोग गरीबी उन्मूलन के लिए किया जाए और उन्होंने दुनिया भर में परमाणु हथियारों को गैरकानूनी घोषित करने की वकालत की।
1954 में, उन्हें परमाणु विज्ञान में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने 1942 में एडम्स पुरस्कार भी जीता था और रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो से सम्मानित हुए। रॉयल सोसाइटी के फ़ेलोशिप पुरस्कार उन व्यक्तियों को दिया जाता है, जिन्होंने ” गणित , इंजीनियरिंग विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान सहित प्राकृतिक ज्ञान के सुधार में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो।
उन्होंने ब्रह्मांडीय विकिरण को बेहतर ढंग से समझने के लिए कैस्केड सिद्धांत विकसित करने के लिए जर्मन भौतिक विज्ञानी वाल्टर हेइटलर के साथ काम किया।
वह अपने काम के प्रति इतने जुनूनी थे कि वह जीवन भर कुंवारे रहे और अपना सारा समय विज्ञान को समर्पित कर दिया।
वह मालाबार हिल्स में मेहरानगीर नाम के एक विशाल औपनिवेशिक बंगले में रहते थे।
24 जनवरी 1996 को माउंट ब्लैंक के पास एक रहस्यमय हवाई दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई।
होमी भाभा की मृत्यु से ठीक 14 दिन पहले भारत के पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री की भी ताशकंद में रहस्यमय मौत हो गई थी।
परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च शौर्य सैन्य अलंकरण (गहना) है जो वीरता और बलिदान के लिए दिया जाता है। ज्यादातर स्थितियों में यह सम्मान मरणोपरांत दिया गया है।
इस पुरस्कार की स्थापना 26 जनवरी 1950 को की गयी थी जब भारत गणराज्य घोषित हुआ था। भारतीय सेना के किसी भी अंग के अधिकारी या कर्मचारी इस पुरस्कार के पात्र होते हैं एवं इसे देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न के बाद सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार समझा जाता है।
अब तक भारत में कुल 21 वीर योद्धाओं को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका डिजाइन किसने तैयार किया था? अगर नहीं जानते तो चलिए जानते हैं इस लेख के माध्यम से:-
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि देश के इस सर्वोच्च सैन्य सम्मान का डिजाइन एक विदेशी महिला ने तैयार किया था। उस महिला का नाम इवा योन्ने लिंडा था और वह स्विट्जरलैंड की रहने वाली थी। इनका जन्म 20 जुलाई 1913 को हुआ था उनकी मां रूसी और पिता हंगरी थे।
उनके पिता पेशे से लाइब्रेरियन थे इसलिए बचपन से ही उन्हें कई किताबें पढ़ने को मिलती रहीं। किताबों के जरिए ही उन्होंने भारतीय सभ्यता को जाना।
1929 में इवा की मुलाकात विक्रम रामजी खानोलकर से हुई। विक्रम इंडियन आर्मी कैडेट के सदस्य थे। वे ब्रिटेन के सेंडहर्स्ट में रॉयल मिलिट्री अकेडमी में ट्रेनिंग के लिए गए थे।
इवा रामजी से शादी करना चाहती थीं लेकिन उनके पिता इस बात के लिए राजी नहीं हुए। लेकिन कुछ सालों बाद इवा भारत आ गईं और 1932 में दोनों ने लखनऊ में मराठी रीति रिवाज के साथ शादी कर ली।
हिंदू धर्म अपनाने के बाद उन्होंने अपना नाम भी बदलकर सावित्री बाई खानोलकर कर लिया। पूरी तरह से इंडियन कल्चर में ढल चुकी सावित्री ने अपना पहनावा भी बदल लिया।
उन्होंने हिंदी, मराठी और संस्कृत भाषा भी सीखी। कुछ समय बाद प्रमोशन पाकर कैप्टन विक्रम मेजर बन गए और उनकी पोस्टिंग पटना में हो गई।
बस यहीं से सावित्री देवी की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। यहां उन्होंने पटना विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और संस्कृतनाटक, वेद, और उपनिषद की शिक्षा ली।
स्वामी रामकृष्ण मिशन का हिस्सा बनकर वह सतसंग, संगीत और नृत्य में निपुण हो गई। तभी उनकी मुलाकात मशहूर उस्ताद पंडित उदय शंकर से हुई और वह उनकी शिष्या बन गईं।
इसी दौरान उन्होंने ‘सेंट्स ऑफ़ महाराष्ट्र‘ और ‘संस्कृत डिक्शनरी ऑफ़ नेम्स‘ नामक दो किताबें भी लिखी जोकि काफी फेमस हुई।
ऐसे मिला परमवीर च्रक डिजाइन करने का मौका
1947 में सरकार द्वारा भारत-पाक युद्ध में साहस दिखाने वाले वीरों को सम्मानित करने के लिए नए पदक पर काम चल रहा था, जिसकी जिम्मेदारी मेजर जनरल हीरा लाल अट्टल को सौंपी गई थी।
उन्होंने इस काम के लिए सावित्री बाई को चुना क्योंकि वो उन्हें ज्ञान का भंडार मानते थे और साथ ही वो एक अच्छी पेंटर व आर्टिस्ट भी थीं।
बहुत मेहनत के बाद उन्होंने अट्टल जी को डिजाइन्स भेजा। इस डिजाइन को उसी समय स्वीकार कर लिया गया। डिजाइन पास होने के बाद उसे रंग-रूप दिया गया।
26 जनवरी 1950 को भारत के पहले गणतंत्र दिवस पर सैनानियों को इससे सम्मानित किया गया। सावित्री बाई द्वारा डिजाइन किया गया परमवीर चक्र सबसे पहले मेजर सोमनाथ शर्मा को प्रदान किया गया था।
कई भारतीय सम्मान किए डिजाइन
परमवीर चक्र को बैंगनी रंग की रिबन की पट्टी 3.5 सेमी व्यास वाले कांस्य धातु की गोलाकार कृति बनाई, जिसके चारों तरफ वज्र के 4 चिह्न, बीच में अशोक की लाट से लिए गए राष्ट्र चिह्न, दूसरी ओर कमलका चिह्न जिसमें हिंदी-अंग्रेजी में परमवीर चक्र लिखा गया था।
उसके बाद सावित्री ने महावीर चक्र, वीर चक्र और अशोक चक्र की डिजाइन भी तैयार किया। विक्रम के इस दुनिया से चले जाने के बाद सावित्री ने अपना जीवन समाज सेवा को समर्पित कर दिया।
1990 में उनकी मृत्यु के समय तक वे रामकृष्ण मिशन का हिस्सा रहीं।
अयोध्या भगवान राम का जन्मस्थान है। त्रेता युग ले लेकर अब तक अयोध्या अपनी ऐतिहासिक और पौराणिक कहानियों, सुंदर मंदिरों, हिंदू महाकाव्य रामायण और विष्णु से जुड़ी किंवदंतियों के लिए प्रसिद्ध है। आध्यात्मिक महत्व का शहर होने के नाते, अयोध्या में घूमने के लिए बहुत सारे सुंदर और प्रसिद्ध मंदिर हैं जो शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने में अपना योगदान देते हैं।
यदि आप अयोध्या घूमने का मन बना रहे हैं तो इन मंदिरों को अपने टूर प्रोग्राम का हिस्सा बना सकते हैं। तो आईये जानते हैं इन प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में जो अयोध्या आने पर आपके स्वागत के लिए तैयार हैं।
राम मंदिर अयोध्या
हिन्दू मान्यता के अनुसार त्रेता युग में भगवान विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम के रूप ने अयोध्या में राजा दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लिया। श्रीराम अपना बचपन अयोध्या में सरयू नदी के पास बिताया था। भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरूषोतम भी कहा जाता है जिनके राज में बाघ और बकरी एक घाट पर पानी पीते थे। इसके मतलब यह भी है कि हर कोई अपनी मर्यादा में रहता था क्योंकि भगवान राम स्वयं मर्यादा पुरूषोतम थे जिन्होंने अपने पिता के वचन के लिए १४ वर्ष वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया। वहीं पत्नी सीता को इसलिए त्याग दिया क्योंकि अयोध्या के एक आम नागरिक ने देवी सीता के चरित्र पर उँगली उठाई थी।
राम जन्मभूमि स्थल 500 सालों तक विवादों में रहा। माना जाता है मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बाँकी ने सन १५२८ में तत्कालीन राम मंदिर को ध्वस्त करके वहाँ पर बाबरी मस्जिद का निर्माण करवा दिया था। तब से लेकर विभिन्न हिंदू और राष्ट्रवादी संगठनों ने राम मंदिर को पुन: स्थापित करने के लिए दशकों तक संघर्ष किया। अंतत: अक्टूबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर बनाने के लिए जमीन को ट्रस्ट को सौंपने का आदेश दिया।
२२ जनवरी २०२४ को भव्य राम मंदिर में भगवान राम के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही यह मंदिर आगंतुको के लिए खुल गया। निर्माण की नागर शैली मैं बना यह मंदिर अपने आप में अनूठा है जिसकी विश्व भर में कोई मिसाल नहीं है। माना जा रहा है कि आस्था प्रेरित पर्यटन के लिहाज़ से यह मंदिर विश्व में नम्बर एक स्थान पर क़ाबिज़ होने वाला है, इसमें जरा भी संदेह नहीं है।
हनुमान गढ़ी, 10वीं शताब्दी में बना एक मंदिर है और साईं नगर के पास स्थित है। यह मंदिर भगवान हनुमान जी को समर्पित है। अयोध्या में राम मंदिर जाने से पहले हनुमान गढ़ी जाना आम बात है, जो इसे शहर के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक बनाता है। किंवदंती के अनुसार, भगवान हनुमान मंदिर के मैदान में रहते थे और दूर से अयोध्या पर नजर रखते थे।
पहाड़ी पर स्थित मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार तक 76 सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। मंदिर परिसर की एक आंतरिक गुफा में भगवान हनुमान और उनकी मां अंजनी की अनगिनत मूर्तियां हैं। हर साल, सैकड़ों भक्त भगवान हनुमान और भगवान राम के जन्म का जश्न मनाने के लिए हनुमान गढ़ी जाते हैं।
नागेश्वरनाथ मंदिर
अयोध्या में नागेश्वरनाथ मंदिर थेरी बाज़ार के ठीक बगल में है। यह मंदिर क्षेत्र के संरक्षक देवता भगवान नागेश्वरनाथ को समर्पित है।
पौराणिक कथा के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण भगवान राम के छोटे बेटे कुश ने करवाया था, जो महाकाव्य रामायण के एक महत्वपूर्ण पात्र थे।
एक बार कुशा ने सरयू नदी में स्नान करते समय अपना ताबीज खो दिया और उसे खोजने की बहुत कोशिश की लेकिन उसके सभी प्रयास विफल रहे।
लेकिन वह ताबीज वास्तव में एक नाग कन्या ने उठाया था जो उस पर मोहित हो गई थी। जब उसने युवा योद्धा को ताबीज लौटाया, तो उसने उसकी सराहना और प्रशंसा जीत ली। क्योंकि नाग कन्या भगवान शिव की प्रबल अनुयायी थी, कुश ने उसकी याद में अयोध्या में नागेश्वर मंदिर बनवाया था।
कनक भवन अयोध्या में राम जन्मभूमि, रामकोट के उत्तर-पूर्व में है। कनक भवन अयोध्या के सबसे बेहतरीन और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि यह भवन भगवान श्री राम से विवाह के तुरंत बाद रानी कैकेयी ने देवी सीता को उपहार में दिया था।
कनक भवन मंदिर अब भगवान राम और सीता के भक्तों के लिए सबसे अच्छे आकर्षणों में से एक है। यह स्थान भक्तों के बीच काफी प्रसिद्ध है। इस मंदिर में हर महीने भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
सुमतिनाथ मंदिर
अयोध्या को न केवल हिंदू बल्कि जैन समुदाय भी तीर्थ के रूप में मानता है। यह मंदिर प्रसिद्ध जैन तीर्थक सुमतिनाथ को समर्पित है। सुमतिनाथ वर्तमान युग (अवसर्पिणी) के पांचवें जैन तीर्थंकर थे। कहा जाता है कि फैजाबाद के नवाब के कोषाध्यक्ष केसरी सिंह ने यहां कुछ जैन तीर्थंकरों के जन्मस्थान की स्मृति में इस मंदिर का निर्माण कराया था। यह जैन समुदाय के लिए अयोध्या में घूमने के लिए सबसे पवित्र स्थानों में से एक है।
राम की पैड़ी सरयू नदी के तट पर घाटों की एक श्रृंखला है। नदी का किनारा विशेष रूप से रोशनी वाली रात में एक उत्कृष्ट परिदृश्य प्रस्तुत करता है। ऐसा कहा जाता है कि ये भक्तों के लिए मंच के रूप में काम करते हैं, जो नदी में डुबकी लगाकर अपने पाप धोने आते हैं।
हमारे देश के मान और गौरव का प्रतीक है तिरंगा। क्या आप जानते हैं कि तिरंगे को किसने तैयार किया था और किस बात को लेकर राष्ट्रपिता को तिरंगे के डिजाइन से नाराजगी थी।
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को इसके वर्तमान स्वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया था।
हमारे लिए तिरंगा बेहद महत्वपूर्ण और गौरव का विषय है। इस नाम के पीछे की वजह इसमें इस्तेमाल होने वाले तीन रंग हैं केसरिया, सफ़ेद और हरा। इसके मौजूदा स्वरूप का विकास भी कई पड़ावों में हुआ है।
अभी जो तिरंगा फहराया जाता है उसे 22 जुलाई 1947 को अपनाया गया था। तिरंगे को आंध्रप्रदेश के पिंगली वेंकैया ने बनाया था। इनकी मौत सन् 1963 में गुमनामी में हुई थी। मौत के 46 साल बाद डाक टिकट जारी करके इनको सम्मान दिया गया था।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि तिरंगे को फहराने के कुछ नियम भी हैं। जैसे किसी मंच पर तिरंगा फहराते समय जब बोलने वाले का मुंह श्रोताओं की तरफ हो तब तिरंगा हमेशा उसके दाहिने तरफ होना चाहिए।
तिरंगे से जुड़े कुछ दिलचस्प तथ्य:-
संसद भवन देश का एकमात्र ऐसा भवन हैं जिस पर एक साथ 3 तिरंगे फहराए जाते हैं।
रांची का पहाड़ी मंदिर भारत का अकेला ऐसा मंदिर है जहां तिरंगा फहराया जाता है। 493 मीटर की ऊंचाई पर देश का सबसे ऊँचा झंडा भी रांची में फहराया गया है।
देश में ‘फ्लैग कोड ऑफ इंडिया‘ (भारतीय ध्वज संहिता) नाम का एक कानून है, जिसमें तिरंगे को फहराने के नियम निर्धारित किए गए हैं। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को जेल भी हो सकती है।
तिरंगा हमेशा कॉटन, सिल्क या फिर खादी का ही होना चाहिए। प्लास्टिक का झंडा बनाने की मनाही है ।
तिरंगे का निर्माण हमेशा रेक्टंगल शेप में ही होगा, जिसका अनुपात 3:2 तय है। वहीं जबकि अशोक चक्र का कोई माप तय नही हैं सिर्फ इसमें 24 तिल्लियां होनी आवश्यक हैं।
सबसे पहले लाल, पीले व हरे रंग की हॉरिजॉन्टल पट्टियों पर बने झंडे को 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क), कोलकाता में फहराया गया था।
झंडे पर कुछ भी बनाना या लिखना गैरकानूनी है।
किसी भी गाड़ी के पीछे, बोट या प्लेन में तिरंगा नहीं लगाया जा सकता और न ही इसका प्रयोग किसी बिल्डिंग को ढकने किया जा सकता है।
किसी भी स्थिति में तिरंगा जमीन पर टच नहीं होना चाहिए। यह इसका अपमान होता है।
तिरंगे को किसी भी प्रकार के यूनिफॉर्म या सजावट में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता।
भारत में बेंगलुरू से 420 किमी स्थित हुबली एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान हैं जो झंडा बनाने का और सप्लाई करने का काम करता है।
किसी भी दूसरे झंडे को राष्ट्रीय झंडे से ऊंचा या ऊपर नहीं लगा सकते और न ही बराबर रख सकते हैं।
29 मई 1953 में भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा सबसे ऊंची पर्वत की चोटी माउंट एवरेस्ट पर यूनियन जैक तथा नेपाली राष्ट्रीय ध्वज के साथ फहराता नज़र आया था। इस समय शेरपा तेनजिंग और एडमंड माउंट हिलेरी ने एवरेस्ट फतह की थी।
आम नागरिकों को अपने घरों या ऑफिस में आम दिनों में भी तिरंगा फहराने की अनुमति 22 दिसंबर 2002 के बाद मिली।
तिरंगे को रात में फहराने की अनुमति सन् 2009 में दी गई।
पूरे भारत में 21 x 14 फीट के झंडे केवल तीन जगह पर ही फहराए जाते हैं। कर्नाटक का नारगुंड किला, महाराष्ट्र का पनहाला किला और मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में स्थित किला।
राष्ट्रपति भवन के संग्रहालय में एक ऐसा लघु तिरंगा हैं, जिसे सोने के स्तंभ पर हीरे-जवाहरातों से जड़ कर बनाया गया है।
भारत के संविधान के अनुसार जब किसी राष्ट्र विभूति का निधन होने और राष्ट्रीय शोक घोषित होने पर कुछ समय के लिए ध्वज को झुका दिया जाता है। लेकिन सिर्फ उसी भवन का तिरंगा झुकाया जाता है जिस भवन में उस विभूति का पार्थिव शरीर रखा है। जैसे ही पार्थिव शरीर को भवन से बाहर निकाला जाता है, वैसे ही ध्वज को पूरी ऊंचाई तक फहरा दिया जाता है।
देश के लिए जान देने वाले शहीदों और देश की महान शख्सियतों को तिरंगे में लपेटा जाता है। इस दौरान केसरिया पट्टी सिर की तरफ और हरी पट्टी पैरों की तरफ होनी चाहिए। शव को जलाने या दफनाने के बाद उसे गोपनीय तरीके से सम्मान के साथ जला दिया जाता है या फिर वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती हैं।
कटे-फटे या रंग उड़े हुए तिरंगे को भी सम्मान के साथ जला दिया जाता है या फिर वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दी जाती है।
भगवान श्री राम को समर्पित अयोध्या राम मंदिर एक हिंदू मंदिर है जिसका निर्माण उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम जन्मभूमि (भगवान श्री राम की जन्मस्थली) पर किया गया है।
मंदिर का उद्घाटन 22 जनवरी, 2024 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था जिसमें दुनिया भर से लाखों भक्त शमिल हुए थे। यह मंदिर भगवान राम से जुड़ी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को दर्शाता है। यह मंदिर हिंदुओं के लिए बहुत महत्व रखता है।
इस लेख में हम आपको अयोध्या राम मंदिर से जुड़े कुछ अद्भुत तथ्य बताने जा रहे हैं, चलिए शुरू करते हैं।
मंदिर के मुख्य वास्तुकार चंद्रकांत बी. सोमपुरा (सीबीएस) हैं, जो गुजरात के मंदिर वास्तुकारों के परिवार से हैं। सोमपुरा परिवार ने भारत और विदेशों में 200 से अधिक मंदिरों का डिजाइन और निर्माण किया है, जिनमें दिल्ली और गांधीनगर में अक्षरधाम मंदिर, लंदन में स्वामीनारायण मंदिर और गुजरात में सोमनाथ मंदिर शामिल हैं। सीबीएस ने मंदिर को नागर शैली में डिजाइन किया है, जिसकी विशेषता गर्भगृह के ऊपर एक केंद्रीय टावर (शिखर) और मंडपों (हॉल) के ऊपर सहायक टावर हैं।
मंदिर का निर्माण
मंदिर का निर्माण उच्च गुणवत्ता वाली सामग्रियों का उपयोग करके किया गया है जो हजारों वर्षों तक टिके रहेंगे। मंदिर की नींव 14 मीटर मोटी रोल्ड कॉम्पैक्ट कंक्रीट से बनी है, जिसमें फ्लाई ऐश धूल और रसायनों से बने कॉम्पैक्ट कंक्रीट की 56 परतें शामिल हैं। मंदिर का चबूतरा कर्नाटक और तेलंगाना के ग्रेनाइट पत्थर से बना है, और दीवारें और खंभे राजस्थान के बांस पहाड़पुर के गुलाबी बलुआ पत्थर से बने हैं। मंदिर के दरवाजे सागौन की लकड़ी से बने हैं और उन पर सोना चढ़ाया गया है।
भारत का सबसे बड़ा मंदिर
मंदिर परिसर 70 एकड़ भूमि में फैला है, जिसे 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को आवंटित किया गया था। मुख्य मंदिर 2.77 एकड़ भूमि पर है, और इसकी लंबाई 380 फीट, 250 फीट चौड़ाई और ऊंचाई 161 फीट है। मंदिर तीन मंजिलों वाला है, जिसमें कुल 392 खंभे और 44 दरवाजे हैं।
मंदिर में पांच मंडप भी हैं, अर्थात् नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना मंडप और कीर्तन मंडप। मंदिर परिसर में एक संग्रहालय, एक पुस्तकालय, एक अनुसंधान केंद्र, एक फूड कोर्ट, एक गेस्ट हाउस और एक राम कथा गैलरी भी शामिल है।
थाईलैंड प्रतिरूप
अयोध्या के राम मंदिर के जैसा थाईलैंड में भी एक ऐसा मंदिर है, जिसे राजा भूमिबोल अदुल्यादेज की दूसरी बेटी राजकुमारी महा चक्री सिरिंधोर्न ने बनवाया था। वह भगवान राम की परम भक्त थी। 2003 में उन्होंने अयोध्या का दौरा किया था जहाँ वह रामायण से प्रेरित हुईं और उन्होंने अपने देश में राम मंदिर की तरह मंदिर बनाने का फैसला किया और इसका नाम धम्मकाया मंदिर रखा। यह मंदिर बैंकॉक के पास पथुम थानी प्रांत में स्थित है और 320 एकड़ क्षेत्र में फैला है। इस मंदिर का डिज़ाइन और संरचना अयोध्या के राम मंदिर के समान है। इसमें भगवान राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियाँ भी हैं।
मंदिर में जमीन से 2000 फीट नीचे दबा हुआ है टाइम कैप्सूल
मंदिर की एक विशेष विशेषता यह है कि यहां एक टाइम कैप्सूल है जो मुख्य मंदिर की जमीन से 2000 फीट नीचे दबा हुआ है। टाइम कैप्सूल एक धातु का सिलेंडर है, जिसमें अयोध्या के इतिहास और भगवान राम के जन्मस्थान के साक्ष्य के बारे में संस्कृत में एक संदेश लिखा है।
संदेश चौपाल संस्कृत में लिखा गया है। यह संस्कृत का संक्षिप्त रूप है जो लंबे वाक्यों को कुछ शब्दों में व्यक्त कर सकता है। टाइम कैप्सूल का उद्देश्य भगवान राम के अस्तित्व और अयोध्या से उनके संबंध के प्रमाण को संरक्षित करना है, ताकि हजारों वर्षों के बाद भी कोई विवाद उत्पन्न न हो।
मंदिर में है राम रसोई
मंदिर परिसर में एक राम रसोई भी है, जो एक सामुदायिक रसोई है। यह आगंतुकों और जरूरतमंदों को मुफ्त भोजन परोसेगी। राम रसोई में एक समय में 10,000 लोगों को खाना खिलाने की क्षमता होगी और यह चौबीसों घंटे काम करेगी।
भोजन, सौर ऊर्जा और बायोगैस का उपयोग करके स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से तैयार किया जाएगा। भोजन शाकाहारी होगा और इसमें पूड़ी, सब्जी, दाल, चावल, खीर और हलवा जैसे व्यंजन शामिल होंगे। राम रसोई आसपास के गांवों और झुग्गियों में भोजन के पैकेट भी वितरित करेगी।
मंदिर परिसर में शहीदों के लिए स्मारक
मंदिर परिसर में उन शहीदों के लिए एक स्मारक बनाया गया है जिन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था। यह बाबरी मस्जिद से भगवान राम के जन्मस्थान को पुनः प्राप्त करने का अभियान था, जो 16 वीं शताब्दी में मुगल सम्राट बाबर द्वारा बनाई गई मस्जिद थी।
इस स्मारक में एक प्रसिद्धि दीवार है, जिस पर शहीदों के नाम और तस्वीरों के साथ-साथ उनकी कहानियां भी प्रदर्शित की गई हैं। यह स्मारक उन शहीदों के लिए श्रद्धांजलि और कृतज्ञता का स्थान होगा, जिन्होंने राम मंदिर के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। स्मारक में भगवान हनुमान की एक मूर्ति भी होगी, जिन्हें भक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता है।
मंदिर का 22 जनवरी, 2024 को एक भव्य उद्घाटन समारोह हुआ था, जिसमें कुछ अद्वितीय तत्व शामिल थे जिसमें दुनिया भर से 155 पवित्र नदियों का जल एकत्रित किया गया था, जिसका उपयोग भगवान राम के जलाभिषेक के लिए किया गया।
समारोह में भारत और विदेश के 2000 तीर्थ स्थलों की मिट्टी भी शामिल की गई थी, जिसका उपयोग मंदिर के भूमि पूजन के लिए किया गया था।
अरुण योगीराज जिन्होंने रामलला की मूर्ति बनाई है
अष्टधातु से बनी है राम की मूर्ति
भगवान राम की मूर्ति आठ धातुओं सोना, चांदी, तांबा, जस्ता, सीसा, टिन, लोहा और पारा से बनाई गई है। इन धातुओं को सामूहिक रूप से अष्टधातु के रूप में जाना जाता है और इनमें दैवीय गुण माने जाते हैं।
राम की मूर्ति का वजन 2100 किलोग्राम होगा और इसे कीमती पत्थरों और रत्नों से सजाया गया है। भगवान राम की यह मूर्ति में अरुण योगीराज द्वारा बनाई गई है।
ज्योतिषीय नक्षत्रों पर आधारित है मंदिर
मंदिर परिसर में एक अनोखा उद्यान है, जो वैदिक ज्योतिष की अवधारणा पर आधारित है। बगीचे में 27 प्रकार के पौधे हैं, जो प्रत्येक 27 नक्षत्रों में से एक का प्रतिनिधित्व करेगा, जो हिंदू ज्योतिष में चंद्र नक्षत्र हैं। पौधों को गोलाकार पैटर्न में व्यवस्थित किया गया है, जिसके बीच में एक फव्वारा है।
बगीचे में एक धूपघड़ी भी है, जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार समय और तारीख बताएगी। यह उद्यान आगंतुकों के लिए ध्यान और सीखने का स्थान होगा, जो अपने नक्षत्र और उसके महत्व को जान सकेंगे।
धरती अपनी धुरी पर करीब 1000 मील प्रति घंटे की रफ्तार से घूमती है। धरती को एक चक्कर पूरा करने में 23 घंटे 56 मिनट और 4.1 सैकेंड लगते हैं। यही वजह है कि धरती के एक भाग पर दिन और दूसरे पर रात होती है। धरती अपनी धूरी पर घूमती रहती है, लेकिन हमें इसका एहसास नहीं होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि हम भी इसके साथ घूमते हैं।
क्या आपने सोचा है कि कभी धरती घूमना बंद कर दे तो क्या होगा ?
धरती घूमना बंद कर दे तो ग्रह पर दिन-रात नहीं होंगे तथा प्रलय जैसे हालात उत्पन्न हो जाएगी। इससे धरती के आधे हिस्से में अधिक गर्मी हो जाएगी और आधे भाग पर सर्दी। इससे जीव-जन्तु प्रभावित होंगे और परिणाम भयानक होंगे। अगर यह घटना घटती है, तो संभावना है कि हर किसी की मौत हो जाए।
धरती की आंतरिक कोर ने घूमना बंद कर दिया है। धरती के नीचे होने वाली हलचल को तब तक महसूस नहीं किया जा सकता, जब तक भूकम्प या किसी ज्वालामुखी विस्फोट से कम्पन न महसूस हो। एक अध्ययन में पता चला है कि धरती की आंतरिक कोर ने साल 2009 में घूमना बंद कर दिया था और सम्भावना है कि अब यह अपने घूमने की दिशा को बदलने जा रही है।
अध्ययन में बताया गया है कि दिन की लंबाई में बदलाव से कोर का घूमना प्रभावित होता है। धरती अपने अक्ष पर घूमने में जितना समय लेती है, उसमें थोड़ा बदलाव हो सकता है। शोधकर्त्ताओं का कहना है कि धूमने का चक्र करीब सात दशक का होता है।
इसका मतलब यह है कि करीब हर 35 साल में यह अपनी दिशा बदल लेती है। इससे पहले 1970 के देशक की शुरुआत में धरती के कोर के घूमने की दिशा में बदलाव हुआ था और अब साल 2040 के मध्य में इसकी दिशा में बदलाव हो सकता है।
धूमने का समय हुआ कम
वहीं एक अन्य रिपोर्ट चौंकाने वाली है कि धरती अब थोड़ा तेज घूम रही है। अब इसे अपना चक्कर पूरा करने में 0.5 मिली सैकेंड कम लग रहा है।
एक रिपोर्ट के अनुसार 24 घंटे में 864600 सैकेंड होते हैं। इतने समय तक धरती अपना एक चक्कर पूरा करती है लेकिन जून 2022 में देखा गया कि इसमें 0.5 मिली सैकेंड की कमी आई है।
8 जनवरी को ‘अर्थ रोटेशन डे’
हर वर्ष 8 जनवरी को ‘अर्थ रोटेशन डे’ मनाया जाता है। दरअसल, 8 जनवरी को फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी लियोन फौकॉल्ट के उस प्रदर्शन को याद किया जाता है, जो उन्होंने साल 1851 में दिखाया था लियोन ने 1851 में मॉडल के जरिए सबसे पहले दर्शाया था कि आखिर धरती अपनी धुरी पर कैसे घूमती है।
दार्शनिकों और वैज्ञानिकों को यह पता लगाने में कई साल लग गए कि धरती सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। 470 ईसा पूर्व के आसपास कुछ यूनानी खगोलविदों ने यह जरूर खोज लिया था कि धरती अपने आप से चलती है और इसे सिद्ध करने के लिए खगोलविदों ने कई प्रयोग भी किए लेकिन तब यूनानी खगोलविदों को यह नहीं पता था कि धरती सूर्य के भी चक्कर लगाती है।
तमाम खोजों और निष्कर्षों के बाद 8 जनवरी, 1851 को लियोन ने सबसे पहली बार एक पैडुलम के साथ वह प्रदर्शन करके बताया कि आखिर धरती अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य के चारों ओर चक्कर किस तरह से लगाती है। बाद में लियोन द्वारा बनाया गया पेंडुलम काफी प्रसिद्ध हो गया और धरती के परिभ्रमण को दिखाने के लिए उसी मॉडल का उपयोग किया जाने लगा।
आज भी दुनियाभर के खगोल विज्ञान से संबंधित कई संग्रहालयों में इसे दिखाया जाता है भारत की नई संसद में भी इसे प्रदर्शित किया गया है।
‘अर्थ रोटेशन डे’ का महत्व इसलिए भी है क्योंकि भौतिक विज्ञानी लियोन फौकाल्ट के उस मॉडल को बच्चों के बीच ज्यादा पसंद किया जाता है। बच्चे भी इस मॉडल को देखकर खगोल विज्ञान के प्रति आकर्षित होते हैं।
पैरिस ने जन्मे लियोन की ज्यादातर शिक्षा घर पर हुई थी। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने मैडीसिन विषय को चुना लेकिन खून देखकर डर लगने के कारण उन्होंने बाद में फिजिक्स को चुना।
अयोध्या राम मंदिर : प्रसिद्ध भारतीय कार डिजाइनर सुधाकर यादव ने हैदराबाद के सुधा कार संग्रहालय में प्रदर्शित अपनी नवीनतम रचना से एक बार फिर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया है।
हैदराबाद स्थित सुधा कार संग्रहालय ने एक कार को राम मंदिर का रूप दिया है। इस कार का निर्माण करने वाले सुधाकर यादव ने कहा, हर कोई अयोध्या नहीं जा सकता, उनके लिए हम अयोध्या को उनके दरवाजे तक ले जाएंगे। 22 फीट लंबी और 16 फीट ऊंची यह कस्टम मेटाडोर कार अयोध्या में श्री राम मंदिर को श्रद्धांजलि अर्पित करती है।
विस्तृत नक्काशी और 10 फुट के झंडे से सजी यह कार पहली बार 18 जनवरी को हैदराबाद की सड़कों पर देखी गई थी और अब इसे 15 फरवरी तक नुमाइश उपभोक्ता प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया है।
उन्होंने अपने कहा, कि मैं अजीब डिजाइन बनाने के लिए जाना जाता हूँ और मुझे सबसे ज्यादा अजीब कारों के लिए गिनीज रिकॉर्ड का खिताब भी मिला है। मैंने क्रिसमस ट्री और गेंद-बॉल के आकार की कार भी बनाई है।
सुभाष चन्द्र बोस (23 जनवरी 1897 – 18 अगस्त 1945) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी तथा सबसे बड़े नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिए, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया था। उनके द्वारा दिया गया “जय हिन्द” का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है।
“तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा” का नारा भी उनका था जो उस समय अत्यधिक प्रचलन में आया। भारतवासी उन्हें नेता जी के नाम से सम्बोधित करते हैं। नेता जी बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में बहुत तेज़ थे।
इस लेख में हम जानेंगे नेताजी से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में, तो चलिए शुरू करते हैं
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा, बंगाल डिविजन के कटक में हुआ था। बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियां और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी 9वीं संतान और 5वें बेटे थे।
नेताजी की प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। इसके बाद उनकी शिक्षा कोलकाता के प्रेजीडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई। इसके बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा (इंडियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया।
1920 में उन्होंने इंग्लैंड में सिविल सर्विस परीक्षा पास की लेकिन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में हिस्सा लेने के लिए उन्होंने जॉब छोड़ दी थी। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वह देश के अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना से वह बहुत ज्यादा विचलित और प्रभावित हुए।
कांग्रेस में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, तो वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। इसलिए नेताजी गांधी जी के विचारों से सहमत नहीं थे। हालांकि, दोनों का मकसद सिर्फ और सिर्फ एक था कि भारत को आजाद कराया जाए। नेताजी का ऐसा मानना था कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए सशस्त्र क्रांति की आवश्यकता है, तो वहीं गांधी अहिंसक आंदोलन में विश्वास करते थे।
साल 1938 में नेताजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित किए गए, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। 1939 के कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी के समर्थन से खड़े पट्टाभी सीतारमैया को हराकर विजय प्राप्त की। इस पर गांधी और बोस के बीच अनबन बढ़ गई, जिसके बाद नेताजी ने खुद ही कांग्रेस को छोड़ दिया।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने साल 1937 में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। दोनों की एक बेटी अनीता हुई, और वर्तमान में वो जर्मनी में अपने परिवार के साथ रहती हैं।
अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने के लिए नेताजी ने 21 अक्टूबर 1943 को ‘आजाद हिंद सरकार‘ की स्थापना करते हुए ‘आजाद हिंद फौज‘ का गठन किया। इसके बाद सुभाष चंद्र बोस अपनी फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा (अब म्यांमार) पहुंचे। यहां उन्होंने नारा दिया ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’
1921 से 1941 के दौरान वो पूर्ण स्वराज के लिए कई बार जेल भी गए थे। उनका मानना था कि अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता नहीं पाई जा सकती। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने सोवियत संघ, नाजी जर्मनी, जापान जैसे देशों की यात्रा की और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सहयोग मांगा।
सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद रेडियो स्टेशन जर्मनी में शुरू किया और पूर्वी एशिया में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया। सुभाष चंद्र बोस मानते थे कि भगवत गीता उनके लिए प्रेरणा का मुख्य जरिया थी।
18 अगस्त, 1945 को ताइपेई में हुई एक विमान दुर्घटना के बाद नेताजी लापता हो गए थे। घटना को लेकर तीन जांच आयोग बैठे, जिसमें से दो जांच आयोगों ने दावा किया कि दुर्घटना के बाद नेताजी की मृत्यु हो गई थी। जबकि न्यायमूर्ति एमके मुखर्जी की अध्यक्षता वाले तीसरे जांच आयोग का दावा था कि घटना के बाद नेताजी जीवित थे। इस विवाद ने बोस के परिवार के सदस्यों के बीच भी मनमुटाव ला दिया था।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में अन्य तथ्य
साल 1942 में नेता जी हिटलर से मिले थे, लेकिन हिटलर के मन में भारत को आज़ाद करवाने के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं थी। हिटलर ने नेताजी को सहायता के लिए कोई स्पष्ट वचन नहीं दिया था।
नेताजी की भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में रैंक 4 थी, लेकिन आज़ादी की जंग में शामिल होने के लिए उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की आरामदेह नौकरी ठुकरा दी थी।
नेताजी को जलियावाला हत्याकांड ने इस कदर विचलित कर दिया था कि वह सब कुछ छोड़कर भारत की आज़ादी के संग्राम में शामिल हो गए।
1943 में बर्लिन में नेताजी ने आज़ाद हिंद रेडियो और फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की थी।
1943 में स्थापित हुए आज़ाद हिंद बैंक ने दस रुपये के सिक्के से लेकर एक लाख रुपये के नोट जारी किये थे, एक लाख रुपये के नोट पर सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर छापी गयी थी।
नेताजी ने ही गांधीजी को राष्ट्रपिता कह कर संबोधित किया था।
नेताजी को 1921 से 1941 के बीच 11 बार भारत की अलग-अलग जेलों में कैद में रखा गया था।
नेताजी का ऐसा मानना था कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए सशक्त क्रांति की आवश्यकता है, लेकिन गांधी जी अहिंसक आंदोलन में विश्वास करते थे।
नेताजी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दो बार अध्यक्ष चुना गया था।
नेताजी की मृत्यु कैसे हुई, यह गुत्थी आज भी अनसुलझी है। उनकी मृत्यु की आज तक कोई पुष्टि नहीं हो सकी। यहां तक कि भारत सरकार भी उनकी मौत के बारे में कुछ नहीं बोलना चाहती।
17 मई 2006 को जस्टिस मुखर्जी कमीशन ने एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें इस बात का जिक्र था कि रंकजी मंदिर में पाई जाने वाली राख नेताजी की नहीं थी। हालांकि इस रिपोर्ट को भारत सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया और यह मामला आज भी एक रहस्य ही है।
जैक रसेल टेरियर अपनी उच्च ऊर्जा, बुद्धिमत्ता और सहनशक्ति के लिए जाने जाते हैं। जैक रसेल को 1800 के दशक में इंग्लैंड में लोमड़ियों का शिकार करने के लिए पाला गया था।
इन्हें पार्सन रसेल टेरियर के नाम से भी जाना जाता है। इस नस्ल के कुत्तों को खेलना-कूदना बहुत पसंद होता है। इन्हें एक जगह पर खाली बैठना बिल्कुल भी पसंद नहीं है। ये हर समय कुछ न कुछ करते रहते हैं।
आकार एवं स्वभाव
इस नस्ल के कुत्ते शांत स्वभाव के होते हैं। इस प्रजाति के कुत्तों को हमेशा ही एक अच्छी कंपनी की तलाश होती है जिनके साथ ये खेल सकें।
जैक रसेल टेरियर के कोट का रंग मुख्यतः सफ़ेद, भूरा और काला होता है। इसका कोट तीन किस्मों में आता है चिकना (smooth), खुरदरा और टूटा हुआ। इन तीन किस्मों में छोटी से मध्यम लंबाई के फर शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, सभी तीन किस्मों में एक डबल कोट होता है, जिसमें मुलायम फर का अंडरकोट होता है।
जैक रसेल टेरियर्स ऊर्जावान कुत्ते हैं जिन्हें पर्याप्त व्यायाम और मानसिक उत्तेजना की आवश्यकता होती है। उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से संतुष्ट रखने के लिए खेलने के समय, सैर और बहुत सारी इंटरएक्टिव गतिविधियों की आवश्यकता होती है।
इनका शरीर हृष्ट पुष्ट होता है और यह 5 फीट ऊंचाई तक छलांग लगा सकते हैं। इस नस्ल के कुत्ते का औसतन कद 9-14 इंच होता है और औसतन भार 5 -7 किलो होता है।
जैक रसेल में शिकार करने की तीव्र इच्छा होती है, इसलिए उन्हें बिल्लियों, खरगोशों जैसे छोटे जानवरों से दूर रखने की सलाह दी जाती है।
भोजन एवं स्वास्थ्य
भोजन की मात्रा कुत्ते की उम्र और उसकी नस्ल पर निर्भर करती है। छोटी नस्लों को बड़ी नस्ल के मुकाबले भोजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है। भोजन उचित मात्रा में दिया जाना चाहिए नहीं तो कुत्ते सुस्त और मोटे हो जाते हैं।
संतुलित आहार जिसमें कार्बोहाइड्रेट्स, फैट, प्रोटीन, विटामिन और ट्रेस तत्व शामिल हैं, पालतू जानवरों को स्वस्थ और अच्छे आकार में रखने के लिए आवश्यक होते हैं। कुत्ते को 6 आवश्यक तत्व जैसे फैट, खनिज, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट्स, पानी और प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
इसके साथ ही इन्हें सारा समय साफ पानी की आवश्यकता होती है। पिल्ले को 29 प्रतिशत प्रोटीन और प्रौढ़ कुत्ते को आहार में 18 प्रतिशत प्रोटीन की जरूरत होती है।
हम उन्हें ये सारे आवश्यक तत्व उच्च गुणवत्ता वाले सूखा भोजन देकर दे सकते हैं। इन्हें दिन में दो बार 1.25-1.75 कप उच्च गुणवत्ता वाला सूखा भोजन देना चाहिए।
यह नस्ल लंबी आयु के साथ स्वस्थ रहने के लिए प्रसिद्ध है। उचित देखभाल मिलने पर जैक रसेल 13 से 16 साल तक जीवित रह सकते हैं। हालाँकि, अन्य नस्ल के कुत्तों की तरह इस नस्ल के कुत्तों में भी कुछ स्वास्थ्य समस्याएं रहती हैं जिनमें वंशानुगत मोतियाबिंद, एक्टोपिया लेंटिस, जन्मजात बहरापन, पटेलर लक्सेशन, गतिभंग, मायस्थेनिया ग्रेविस, लेग-काल्वे-पर्थेस सिंड्रोम और वॉन विलेब्रांड रोग शामिल हो सकते हैं।
सभी नस्लों की तरह इस नस्ल के कुत्तों को भी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। उन्हें करतब दिखाना और जल्दी से नई चीजें सीखना पसंद होता है। वे कठोर या नकारात्मक तरीकों के बजाय सकारात्मक प्रशिक्षण पर बहुत अच्छी प्रतिक्रिया देते हैं।
प्रजजन प्रक्रिया
जैक रसेल टेरियर्स के गर्भधारण की अवधि 60-64 दिनों तक रहती है। ये एक समय में 6 से 8 पिल्लों को जन्म देती है।
भारत में जैक रसेल टेरियर की कीमत
भारत में जैक रसेल टेरियर की कीमत कई कारकों के आधार पर भिन्न होती है। इसमें शमिल है ब्रीडर का लिंग, उम्र, कोट के प्रकार और आकार। भारत में जैक रसेल टेरियर की कीमत 35000 रुपये से शुरू होकर 50,000 रुपये तक हो सकती है।
टॉवर ऑफ़ लंदन (Tower of London) लंदन शहर के बीचोंबीच, टेम्स नदी पर बना एक ऐतिहासिक महल है। लगभग 1,000 साल पुरानी इस इमारत का अतीत खोखलापन और भय से भरा हुआ है।
इस इमारत में मौत, फांसी, हत्या, और अत्याचारों की ऐसी ऐसी वारदातें हुई हैं जिनके बारे में सुन कर किसी की भी रूह कांप जाए। कहा जाता है कि यहां तेरह आत्माएं भटकती रहती हैं।
टॉवर ऑफ़ लंदन
इस भव्य महल का निर्माण सन् 1078 में विलियम द कॉन्करर ने कराया था जो इंग्लैंड का पहला नॉर्मन राजा था। इसके निर्माण में लगे पत्थर फ़्रांस से मंगाए गए थे। इसके परिसर में कई इमारतें हैं। एक समय यह ब्रिटेन का शाही महल था। इसी परिसर में राजसी बंदियों के लिए कारागार भी था।
यह किला अनेक मृत्युदंड तथा हत्याओं का साक्षी रहा है। वर्तमान समय में ब्रिटेन का राजपरिवार इस क़िले में नहीं रहता है लेकिन उनके शाही जवाहरात यहीं सुरक्षित रखे गए हैं।
यहाँ की पूरी कहानी हेनरी अष्ठम से जुड़ी है जिसका जन्म 28 जून सन 1491 में हुआ था। वह एक पराक्रमी और कठोर शासक था।
हेनरी अष्ठम लॉर्ड ऑफ आयरलैंड तथा फ्रांस के साम्राज्य के दावेदार थे। हेनरी हाउस ऑफ ट्युडर के द्वितीय राजा थे, जो कि अपने पिता हेनरी सप्तम के बाद इस पद पर आसीन हुए थे।
हेनरी अष्ठम ने छः विवाह किए थे इसके अलावा उन्हें चर्च ऑफ इंग्लैंड को रोमन कैथलिक चर्च से पृथक करने के लिए भी जाना जाता है। हेनरी की कठोरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने अपनी दूसरी पत्नी को खुद ही मौत की सजा सुना दी थी।
हेनरी की पहली पत्नी एनारान की कैथरीन थी और दूसरी पत्नी मशहूर ऐनी बोलिन थी। हेनरी को एक उत्तराधिकारी यानी की बेटे की जरूरत थी।
ऐनी बोलिन जिसका भूत टावर ऑफ लंदन में भटकता है
उस समय ऐनी बोलिन गर्भवती थी, लेकिन इससे पहले एक बार उनका गर्भपात हो चुका था इसलिए उन्हें डर था कि कहीं इस बार भी कोई ऐसी घटना न घटित हो जाए। लेकिन वही हुआ जिसका डर था। ऐनी का गर्भपात हो गया जिसकी सूचना सुनकर राजा ने ऐनी को मौत की सजा सुना दी और रानी का सिर कलम करवा दिया गया।
ऐनी की मौत के बाद भी हेनरी ने अपनी एक और पत्नी का सिर कलम करवा दिया था। ऐसा माना जाता है कि आज भी ऐनी का भूत टावर ऑफ लंदन में भटकता रहता है।
कहा जाता है कि एक बार टावर के एक चौकीदार ने कुछ ऐसा मंजर देखा था। चौकीदार के अनुसार 12 फरवरी सन 1957 में वह टावर के परिसर में रखवाली कर रहा था तभी उसने टावर के पास किसी सफेद साये को देखा जोकि देखने में एकदम रानी की ही तरह लग रहा था। लेकिन उसका सिर उसके धड़ पर नहीं था बल्कि वो अपने सिर को अपने दायें हाथ में पकड़ी हुई थी।
चौंकाने वाली बता यह थी कि यह वही (12 फरवरी) तारीख थी जब सन 1554 में हेनरी ने अपनी दूसरी रानी लेडी जेन ग्रे का सिर कलम करवाया था।
एक अन्य कहानी के अनुसार लेडी जेन ग्रे का भूत सबसे अधिक बार देखा गया है जो एक युवा लड़की थी, जिसे कैद करने से पहले नौ दिनों के लिए रानी का ताज पहनाया गया था और अंततः 17 साल की उम्र में उसका सिर कलम करवा दिया गया था। ऐसा कहा जाता है कि अक्सर उसे ब्यूचैम्प टॉवर में अपनी कोठरी में बैठे और आधी रात में रोते हुए देखा जा सकता है।
ऐनी बोलिन और जेन ग्रे के अलावा भी अन्य कई लोगों की आत्माओं को इस टावर में देखा गया है। सन 1541 में एक शाही कर्मचारी को मौत की सजा सुनाई गई थी। उस पर आरोप था कि उसने बही खातों के साथ छेड़छाड की थी। इसके लिए उसे कुल्हाड़ी से काट कर मौत के घाट उतार दिया गया। ऐसा माना जाता है कि वो निर्दोष था जिस कारण वो कर्मचारी आज भी इस टावर के प्रशासनिक भवन में देखा जाता है उसका शरीर क्षत विक्षत होता है और उसके हाथ में एक कुल्हाड़ी होती है।
इस टावर में और भी बहुत सारी अजीबोगरीब चीजें देखी गई हैं। यहां जानवरों को बांध कर रखा जाता था और महज मनोरंजन के लिए उन्हें पाला जाता था। ऐसा बताया जाता है कि टावर में एक भालू का भूत भी है। सन 1251 में हेनरी तृतीय को नार्वे के राजा ने उपहार के रूप में एक ध्रुवीय भालू दिया था। कुछ सालों के बाद उसकी मौत हो गई। आज भी टावर के परिसर में इस भालू के साये को घूमते हुए देखा जा सकता है।
एक अन्य अजीबोगरीब घटना के अनुसार कहा जाता है कि टावर के संरक्षक कौवे है। यह सुनकर आपको अजीब लगेगा कि इतनी बड़ी इमारत के संरक्षक भला कौवे कैसे हो सकते हैं। लेकिन यह सत्य है इस टावर की सुरक्षा 8 कौवों के कंधों पर है। ऐसा माना जाता है कि जिस दिन ये कौवे इस टावर को छोड़कर कहीं और चले जायेंगे उस दिन यह टावर अपने आप ही ध्वस्त हो जाएगा।