महाशिवरात्रि पर महादेव को प्रसन्न करने के अचूक उपाय

महाशिवरात्रि हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण और शुभ त्योहारों में से एक है जो हर साल फरवरी और मार्च के महीने में आता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह त्यौहार फाल्गुन या माघ महीने के कृष्ण पक्ष के चौदहवें दिन मनाया जाता है।

इस साल 2024 में महाशिवरात्रि 8 मार्च को है। महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त का समय शाम 06 बजकर 25 मिनट से 09 बजकर 28 मिनट तक है।

इस पोस्ट में हम महाशिवरात्रि पर महादेव को प्रसन्न करने के अचूक उपायों के बारे में जानेगें, तो चलिए शुरू करते हैं।

महाशिवरात्री का महत्व

तीनों लोकों के मालिक भगवान शिव के विवाह का दिन यानि महाशिवरात्रि है। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन महाशिवरात्रि पड़ती है। इस दिन भगवान शिव को प्रसन्न कर लेने से सभी मनुष्य की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

महाशिवरात्रि के अवसर पर सारे देवी-देवता एकत्रित होते हैं। इसलिए इसदिन भगवान शिव की कृपा से सभी देवी-देवताओं की कृपा मिलती है और रुके हुए सभी काम पूरे हो जाते हैं। आइए जानते महाशिवरात्रि पर महादेव को प्रसन्न करने के उपाय:

  • भगवान शिव की पूजा करते समय ऊँ महाशिवाय सोमाय नमः मंत्र का जाप करें।
  • जल चढ़ाते समय शिवलिंग को हथेलियों से रगड़ना चाहिए। इस उपाय से किसी की भी किस्मत बदल सकती हैं।
  • नंदी बैल को महादेव का वाहन कह कर पूजा जाता है। इस दिन नंदी बैल को हरा चारा खिलाना चाहिए, इससे धन लाभ और सुख समृद्धि प्राप्त होगी।
  • अगर आप शिवरात्रि पर किसी बिल्व वृक्ष के नीचे खड़े होकर खीर और घी का दान करते हैं, तो आप पर महालक्ष्मी की विशेष कृपा होगी।
  • इस दिन सुबह, दोपहर, शाम और रात इन चारों प्रहर में रुद्राष्टाध्यायी पाठ के साथ भगवान शिव का अलग-अलग पदार्थों जैसे दूध, गंगाजल, शहद, दही या घी से अभिषेक करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।
  • चार पहर दिन में शिवालयों में जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक और बेलपत्र चढ़ाने से महादेव की अनंत कृपा प्राप्त होती है।
  • इस दिन पर्स में लाल रंग का कागज, चावल, पीपल का पत्ता, चांदी का सिक्का और रुद्राक्ष रखने चाहिए।
  • इस दिन भगवान शिव पर शहद चढ़ाने से नौकरी या व्यवसाय में आ रही बाधाएं दूर हो जाएंगी।
  • इस दिन शिवलिंग पर काले तिल चढ़ाने से रोगों से मुक्ति मिलेगी।
  • किसी सुहागन को लाल साड़ी, लाल चूड़ियां, कुमकुम आदि सुहाग का सामान उपहार में दें। इससे वैवाहिक जीवन की समस्याएं दूर हो जाती हैं।
  • मुखी रुद्राक्ष को कुमार कार्तिकेय का स्वरूप माना जाता है। इसलिए इस दिन इस रुद्राक्ष को धारण करने से धन और स्वास्थ्य दोनों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।
  • इस दिन शिवलिंग पर गाय का दूध अर्पित करने से कलह – क्लेश से छुटकारा पाया जा सकता है।
  • इस दिन जरूरतमंद व्यक्ति या गरीबों को दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • इस दिन घर में स्फटिक का शिवलिंग लाकर स्थापित करें और नियमित इसकी पूजा करें। इससे घर में किसी प्रकार के वास्तुदोष का अशुभ प्रभाव नहीं होता है।
  • बिल्वपत्रों पर चंदन से ॐ नमः शिवाय या श्रीराम लिखें। इसके बाद इन पत्तों की माला बनाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं।
  • महाशिवरात्रि के अवसर पर सारे देवी-देवता एकत्रित होते हैं इसलिए अन्य देवताओं की स्तुति भी विशेष फलदायी होती है

कैसे करे महाशिवरात्रि व्रत और पूजा की विधि

  • मिट्टी के लोटे में पानी या दूध भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक-धतूरे के फूल, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ाना चाहिए। अगर आस-पास कोई शिव मंदिर नहीं है, तो घर में ही मिट्टी का शिवलिंग बनाकर उनका पूजन किया जाना चाहिए।
  • शिव पुराण का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र या शिव के पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप इस दिन करना चाहिए। साथ ही महाशिवरात्री के दिन रात्रि जागरण का भी विधान है।
  • शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार शिवरात्रि का पूजन ‘निशीथ काल’ में करना सर्वश्रेष्ठ रहता है। हालाँकि भक्त रात्रि के चारों प्रहरों में से अपनी सुविधानुसार यह पूजन कर सकते हैं।

महाशिवरात्रि 2024: जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त

हर साल फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व आता है, वैसे तो पूरे साल की प्रत्येक माह में  कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को भगवान शंकर को समर्पित मास शिवरात्रि का व्रत किया जाता है लेकिन सालभर में एक बार की जाने वाली फाल्गुन कृष्ण पक्ष की शिवरात्रि का बहुत अधिक महत्व है।

इस दिन व्रत और पूजा करने से युवतियों को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है। बताया जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की चार पहर की विशेष पूजा का महत्व है।

उत्तर भारत में इस दिन को फाल्गुन के महीने के रूप में माना जाता है, जबकि अंग्रेजी महीने में यह दिन फरवरी या मार्च के महीने में आता है।

आज इस पोस्ट में हम जानेंगे इस साल कब है शिवरात्रि और शुभ मुहूर्त। तो आइए जानते हैं।

महाशिवरात्रि 2024 शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, 8 मार्च को महाशिवरात्रि के दिन शिव जी की पूजा का समय शाम के समय 06 बजकर 25 मिनट से 09 बजकर 28 मिनट तक है।

महाशिवरात्रि 2024 चार प्रहर मुहूर्त

  • रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय – शाम 06 बजकर 25 मिनट से रात 09 बजकर 28 मिनट तक
  • रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय – रात 09 बजकर 28 मिनट से 9 मार्च को रात 12 बजकर 31 मिनट तक
  • रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय – रात 12 बजकर 31 मिनट से प्रातः 03 बजकर 34 मिनट तक
  • रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय – प्रात: 03.34 से प्रात: 06:37

महाशिवरात्रि का महत्व

महाशिवरात्रि के दिन भगवान भोलेनाथ की पूजा और व्रत रखने का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन ही भगवान शिव लिंग के स्वरूप में प्रकट हुए थे। इसके अलावा ऐसी भी मान्यता है कि इसी तिथि पर पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था।

महाशिवरात्रि पर अविवाहित कन्याएं पूरे दिन उपवास रखते हुए शिव आराधना में लीन रहती है और भगवान शिव से योग्य वर की प्राप्ति के लिए कामना करती हैं।

महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से सभी तरह के सुख और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। महाशिवरात्रि पर सुबह से ही शिव मंदिरों में शिव भक्तों की भीड़ जुटना प्रारंभ हो जाती है।

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महाशिवरात्रि पूजा का संकल्प

  • महाशिवरात्रि व्रत इस वर्ष त्रयोदशी पर शुरू होगा। इस दिन सुबह उठकर स्नान करें, साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थल को अच्छी तरह से साफ करें।
  • शिव और देवी पार्वती की मूर्तियों को लकड़ी के तख्ते पर रखें और पंचामृत से स्नान कराएं।
  • शिवलिंग को स्नान कराएं और बेल के पत्ते, भांग, धतूरा, फल और मिठाई चढ़ाएं।
  • चंदन की माला से शिव की पूजा करें और मां पार्वती को कुमकुम चढ़ाएं।
  • महाशिवरात्रि पर उपवास करने का संकल्प लें और मंदिर जाकर शिव को जल चढ़ाएं।

‘जटायु नेचर पार्क’ : दुनिया का सबसे बड़ा ‘पक्षी मूर्ति वाला पार्क’

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केरल में कोल्लम जिले के ‘चादयमंगलम‘ गांव में 4 जुलाई, 2018 को खोला गया ‘जटायु नेचर पार्क‘ खूबसूरत वादियों में 65 एकड़ में फैला हुआ है। यहां से आप पहाड़ों के मनोरम दृश्य देख सकते हैं।

यहां स्थापित पौराणिक पक्षी ‘जटायु’ की 200 फुट लंबी, 150 फुट चौड़ी और 70 फुट ऊंची मूर्ति भारत में सबसे बड़ी मूर्तियों में से एक होने के अलावा दुनिया की सबसे बड़ी पक्षी प्रतिमा भी है।

रामायण में जिक्र है कि रावण जब सीता माता को लंका ले जाने का प्रयास कर रहा था, तब जटायु ने उन्हें बचाने की कोशिश की। जटायु ने रावण का साहसपूर्वक मुकाबला किया लेकिन जटायु के बहुत बूढ़ा होने के कारण रावण ने जल्द ही उन्हें हरा दिया।

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रावण ने जटायु के पंख काट दिए थे, जिससे वह ‘चादयमंगलम‘ में चट्टानों पर जा गिरे। श्री राम और लक्ष्मण जब सीता माता की खोज के दौरान मरणासन्न जटायु से मिले तो उन्होंने ही उन्हें रावण के सीता को ले जाने की सूचना दी और बताया कि वह दक्षिण की ओर गया था।

जटायु की मूर्ति उसी पहाड़ी की चोटी पर विराजमान है, जहां उन्होंने श्री राम तथा लक्ष्मण को सूचना देने के बाद अंतिम सांस ली थी। यह विशाल प्रतिमा एक किंवदंती का प्रतिनिधित्व करती है और महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान तथा सुरक्षा की प्रतीक है।

इसे प्रसिद्ध फिल्म निर्माता और मूर्तिकार राजीव आंचल ने डिजाइन किया जो गुरुचंद्रिका बिल्डर्स एंड प्रॉपर्टी प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक भी हैं। यह नेचर पार्क उनका ही विचार था ।

जटायु के आकार की इमारत में है 6 डी थिएटर

इस इमारत में ऑडियो-विजुअल आधारित डिजिटल म्यूजियम व 6डी थिएटर है, जो रामायण के बारे में बताता है। पर्यटक मूर्ति के अंदर से समुद्र तल से 1,000 फुट ऊपर से खूबसूरत नजारे का भी अनुभव ले सकते हैं।

इस मूर्ति को बनाने में 7 साल लगे हैं। कंक्रीट के ढांचे को स्टोन फिनिश दिया गया है। इस इमारत को बनाने में काफी मुश्किलें आईं क्योंकि सभी सामग्रियों को पहाड़ की चोटी पर ले जाना बेहद मुश्किल था ।

एडवेंचर जोन और करीब 20 गेम्स

जटायु नेचर पार्क में एक एडवेंचर सैक्शन भी है। पेंट बॉल, लेजर टैग, तीरंदाजी, राइफल शूटिंग, रॉक क्लाइम्बिंग और बोल्डरिंग जैसी गतिविधियों के लिए यहां कई विकल्प उपलब्ध हैं। पार्क में एक अनूठा आयुर्वेदिक गुफा रिजॉर्ट भी है। यहां आपको मनोरंजन से लेकर रोमांच और आराम तक सब कुछ मिलेगा।

अत्याधुनिक केबल कार

इस नेचर पार्क में यात्रियों के लिए एक अत्याधुनिक रोप-वे की भी सुविधा है। रोपवे पर धीरे-धीरे 1000 फुट की चढ़ाई एक शानदार अनुभव है, जहां से मंत्रमुग्ध कर देने वाले नजारे दिखाई देते हैं।

 

जटायु-राम मंदिर

जटायु प्रतिमा के पास ही एक जटायु-राम मंदिर भी बनाया गया है। यहां करीब ही एक जगह पर पैरों के निशान हैं। मान्यता है कि ये निशान श्री राम के पैरों के हैं।

कैसे पहुंचें

कोल्लम जिला रेल तथा हवाई मार्ग से देश भर से जुड़ा शहर से पार्क तक पहुंचने के लिए बस तथा टैक्सी आदि ली जी सकती है। आगंतुकों को पार्क के शीर्ष तक पहुंचने के लिए केबल कार का इस्तेमाल करना पड़ता है। पार्क में प्रवेश करने के लिए टिकट लेना भी आवश्यक है।

पंजाब केसरी से साभार

इसे ग्रैंड श्राइन : जापान का एक ऐसा अनोखा मंदिर जो हर 20 साल बाद तोड़कर फिर से बनाया जाता है

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जापान के इसे शहर (Ise city) में स्थित इसे ग्रैंड श्राइन मंदिर (Ise Grand Shrine), जिसे इसे जिंगू के नाम से भी जाना जाता है जापान के सबसे पवित्र धर्मस्थलों में से यह एक है।

यह मंदिर शिन्तो (शिंटो) के सबसे पवित्र और सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। (शिंटो धर्म विश्व के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। यह जापान का मूल धर्म है, तथा इसमें कई देवी-देवता हैं, जिनको कामी कहा जाता है) यह मंदिर सौर देवी अमेतरासु (जापानी सूर्य देवी) को समर्पित है।

दरअसल, यह मंदिर दो हिस्सों नाइकू-आंतरिक मंदिर, और गेकू-बाहरी मंदिर में बंटा हुआ है। आंतरिक श्राइन, नाइकू जिसे “कोटाई जिंगु” के रूप में भी जाना जाता है में “अमेतरासु” की पूजा की जाती है और मध्य इसे के दक्षिण में उजी-ताची शहर में स्थित है, जहां वह निवास करती है। मंदिर की इमारतें ठोस सरू की लकड़ी से बनी हैं और इनमें कीलों का उपयोग बिल्कुल भी नहीं नहीं किया गया है।

बाहरी श्राइन, गेकू जिसे “टॉयउके डाइजिंगु” के रूप में भी जाना जाता है नाइकू से लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और कृषि और उद्योग के देवता टॉयौके-ओमिकामी को समर्पित है।

नाइकू और गेकू के अलावा, इसे शहर और आसपास के क्षेत्रों में 123 अतिरिक्त शिंटो मंदिर हैं, उनमें से 91 नाइकू से और 32 गेकू से जुड़े हुए हैं।

इन तीर्थस्थलों की खासियत यह है कि इनको उजी पुल के साथ हर 20 साल में तोड़ दिया जाता है और फिर दोबारा बनाया जाता है। बीते 1300 सालों से यह परंपरा चली आ रही है, जो शिंतो परंपरा से जुड़ी है।

इसे मृत्यु और पुनर्जीवन से जोड़कर देखा जाता है। यह मंदिर निर्माण के कौशल और तकनीक को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का भी एक तरीका है। नए मंदिर का निर्माण पुराने मंदिर के बिल्कुल पास में ही किया जाता है।

इस मंदिर का निर्माण आखिरी बार 2013 में हुआ जो इसकी 62वीं पुनरावृत्ति थी। अब इस मंदिर को साल 2033 में दोबारा तोड़कर बनाया जाएगा।

मंदिर के निर्माण को खास बनाने के लिए ओकिहिकी फेस्टिवल मनाया जाता है। इस त्यौहार के दौरान लोगों द्वारा साइप्रेस के पेड़ों के बड़े-बड़े डंडे लाए जाते हैं।

ये डंडे दो तीर्थस्थलों के आसपास के पवित्र जंगल से काटे गए जापानी सरू के पेड़ों से तैयार किये जाते हैं। इनका उपयोग अंततः नए मंदिर के निर्माण में किया जाता है। नई इमारत के लिए लगभग 10,000 सरू के पेड़ काटे गए हैं। काटे गए इन पेड़ों में से कुछ 200 साल से भी अधिक पुराने होते हैं।

जन्मदिन विशेष : भारत की पहली महिला मुक्केबाज मैरी कोम के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य एवं जानकारी

मंगते चुंगनेइजैंग, जिन्हें आमतौर पर मैरी कॉम के नाम से जाना जाता है विश्व की सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाजों में से एक हैं। मैरी कॉम ने अपनी प्रतिभा और हुनर के दम पर कई मैडल जीतकर इतिहास रचा है। उन्होंने ने केवल इतिहास ही रचा बल्कि भारत को दुनिया के सामने गौरान्वित भी किया है। आइए जानते हैं भारत की पहली महिला मुक्केबाज मैरी कोम के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य।

मैरी कोम का जन्म 1 मार्च 1983 को मणिपुर के कांगथाही गाँव में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। उनकी एक छोटी बहन और एक छोटा भाई भी है मैरी अपने भाई बहनों में सबसे बड़ी हैं।

मैरी कॉम ने अपनी प्राथमिक शिक्षा लोकटक क्रिश्चियन मॉडल स्कूल और सेंट हेवियर स्कूल से पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए वह आदिमजाति हाई स्कूल, इम्फाल गयीं लेकिन परीक्षा में फेल होने के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और फिर राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय से परीक्षा दी।

मैरी कॉम का बचपन बहुत ही संघर्षपूर्ण था। वह स्कूल जाने के साथ साथ अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल भी करती थी। वह अपने माता-पिता की भी मदद करती थी जो खेतों में काम करते थे।

मैरी कॉम की रुचि बचपन से ही एथ्लेटिक्स में थी। स्कूल में उन्होंने वॉलीबॉल, फुटबॉल और एथलेटिक्स सहित सभी प्रकार के खेलों में भाग लिया करती थी। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने कभी भी बॉक्सिंग प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लिया था।

साल 1998 में जब मणिपुर के बॉक्सर डिंग्को सिंह ने जब एशियन गेम्स में गोल्ड मैडल जीता, तब वे उनसे काफी प्रभावित हुईं और उन्होंने बॉक्सिंग में अपने करियर बनाने की ठान ली।

लेकिन एक महिला होने के नाते उनके लिए इसमें करियर बनाना इतना आसान नहीं था, लेकिन मैरी कॉम के शुरु से ही अपने इरादे में दृढ़ रहने की चाह ने आज उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाजों की सूची में शामिल कर दिया है।

दरअसल, मैरी कॉम के पिता और उनके घर वाले उनके बॉक्सिंग के करियर बनाने के बिल्कुल खिलाफ थे। गौरतलब है कि पहले लोग बॉक्सिंग के खेल को पुरुषों का खेल समझते थे। ऐसे में इस फील्ड में करियर बनाना मैरी कॉम के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था।

वहीं दूसरी तरफ परिवार की आर्थित हालत सही नहीं होने की वजह से मैरि कॉम के लिए बॉक्सिंग के क्षेत्र में प्रोफेशनल ट्रेनिंग लेना भी काफी मुश्किल था, लेकिन फौलादी इरादों वाली मैरी कॉम ने आसानी से इन सभी मुसीबतों का सामना कर लिया और विश्व की महान मुक्केबाज के रुप में उभर कर सामने आईं।

बॉक्सिंग के क्षेत्र में अपने करियर बनाने का मन में ठान बैठी मैरीकॉम ने अपने घर वालों को बिना बताए ही ट्रेनिंग लेना शुरु कर दिया था।

वहीं साल 1999 में एक बार मैरीकॉम ने “खुमान लंपक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स” लड़कियों को लड़कों के साथ बॉक्सिंग करते हुए देखा, जिसे देख कर वे काफी प्रेरित हुई और उन्होंने अपने लक्ष्य को किसी भी हाल में पाने का निश्चय कर लिया।

इसके बाद मैरी कॉम ने अपने सपने को सच करने के लिए मणिपुर राज्य के इम्फाल में बॉक्सिंग कोच एम नरजीत सिंह से ट्रेनिंग लेना शुरु कर दिया।

01 अक्टूबर 2014 को इन्होंने विश्व इतिहास रचते हुए एशियाई खेलो में स्वर्ण पदक जीतने के साथ वे भारत के पहली मुक्केबाज बनी।

8 नवंबर 2017 को उन्होंने वियतनाम में हो ची मिन्ह में आयोजित ASBC एशियाई परिसंघ की महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में अभूतपूर्व पाँचवाँ स्वर्ण पदक (48 किलोग्राम) प्राप्त किया।

24 नवंबर 2018 को, उन्होंने 6 बार विश्व चैंपियनशिप जीतने वाली पहली महिला बनकर इतिहास रच दिया, यह उपलब्धि उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित 10 वीं एआईबीए महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में हासिल की।

साल 2001 में मैरी कॉम जब पंजाब में नेशनल गेम्स खेलने के लिए जा रही थी, तभी उनकी मुलाकात ओन्लर से हुई थी। उस समय ओन्लर दिल्ली यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई कर रहे थे। 4 सालों की दोस्ती के बाद 2005 में दोनों ने एक-दूसरे से शादी कर ली। शादी के बाद दोनों को तीन बच्चे हुए। साल 2007 में मैरी कॉम ने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। इसके बाद साल 2013 में फिर से उन्हें एक और बेटा पैदा हुआ।

मां बनने के बाद भी उनके प्रोफेशनल एटिट्यूड में किसी तरह की कोई कमी नहीं आई। मां बनने के बाद उनका जुनून और भी बढ़ गया जिसके चलते उन्होंने वर्ल्ड टाइटल का खिताब हासिल किया।

वह फ्लाईवेट (51 किग्रा) वर्ग में 2012 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाली और भारत के लिए कांस्य पदक जीतने वाली एकमात्र भारतीय महिला हैं। यह पहली बार था जब महिला मुक्केबाजी को ओलंपिक खेल के रूप में पेश किया गया था।

मेरी कोम के जीवन पर आधारित फिल्म ‘मेरी कोम’ को ओमंग कुमार ने बनाया था, जिसे 5 सितम्बर 2014 में रिलीज़ किया गया था। फिल्म में मुख्य भूमिका में प्रियंका चोपड़ा थी, जिसमें उनकी अदाकारी देखने लायक थी।

मैरी कॉम को ओलंपिक पदक जीतने के लिए सरकार से कई नकद पुरस्कार मिले। उन्हें अरुणाचल प्रदेश सरकार और जनजातीय मामलों के मंत्रालय से 10 लाख रुपये, असम सरकार से 20 लाख रुपये, उत्तर पूर्वी परिषद से 40 लाख रुपये और राजस्थान और मणिपुर सरकार से 50 लाख रुपये मिले। उन्हें मणिपुर सरकार से 2 एकड़ ज़मीन भी मिली।

2006 में मैरीकॉम को पद्मश्री, 2009 में उन्हें देश के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से भी नवाजा गया हैं।

‘मैग्नीफिसेंट मैरी’ उपनाम से सम्मानित कॉम को 2003 में अर्जुन पुरस्कार, 2009 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार, 2010 में पद्म श्री और 2013 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है।

2014 में ‘मैरी कॉम’ पर एक जीवनी फिल्म रिलीज हुई थी। इसका निर्माण संजय लीला भंसाली ने किया था और निर्देशन ओमंग कुमार ने किया था। मैरी कॉम की भूमिका निभाई. ऐसा कहा जाता है कि मैरी कॉम के रूप में प्रियंका ने अपनी पूरी जिंदगी में जितनी कमाई की, उससे कहीं ज्यादा कमाई उन्होंने मैरी कॉम के तौर पर एक फिल्म में की।

रोगों से लड़ने की ताकत बढ़ता है “संतरा”

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संतरा खट्टा हो या मीठा, हर किसी का पसंदीदा फल होता है। यह खट्टा-मीठा फल उत्तरी भारत में बहुतायत में पाया जाता है और इसके सेवन से शरीर को स्फूर्ति, पौष्टिकता तथा बल मिलता है।

संतरे में विटामिन ए, बी व सी पाए जाते हैं लेकिन विटामिन सी इसमें सबसे प्रचुर मात्रा में होती है। संतरे को कुछ स्थानों पर ‘नारंगी‘ के नाम से भी जाना जाता है। इस लेख में हम संतरे के औषधीय गुणों के बारे में जानेंगे, चलिए शुरू करते हैं।

  • संतरे के जूस में आयरन तथा कैल्शियम की भी प्रचुर मात्रा होती है। संतरे के रस का सेवन करने से रक्त साफ होता है।
  • संतरे के नियमित सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित होती है। त्वचा कोमल और  मुलायम बनती है। जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है, कब्ज की शिकायत दूर होती है, पाचन शक्ति बढ़ती है, उच्च रक्तचाप कम होता है।

  • सुबह-शाम संतरे का जूस पीने से शरीर में पौष्टिक तत्वों की पूर्ति और कमजोरी दूर होती है। संतरा खाने या संतरे का जूस नियमित पीने से शारीरिक शक्ति बढ़ने के साथ-साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित होती है।
  • प्रतिदिन सुबह या रात को सोते समय एक-दो संतरे खाने या इनका जूस पीने से कब्ज दूर होती है।
  • पेट दर्द, पेट में भारीपन व गैस पीड़ितों के लिए तो संतरा बहुत गुणकारी है।
  • उच्च रक्तचाप में संतरे का रस पीने से रक्तचाप कम होता है।
  • प्रतिदिन 3-4 संतरे खाने से जठराग्नि तेज होती है और आंतों की भी शुद्धि होती है।
  • बुखार से पीड़ित लोगों को संतरे का रस पिलाने से उन्हें ताकत मिलती है और जल्दी ही बुखार से छुटकारा मिल जाता है।
  • सुबह-शाम दोनों समय कम से कम एक-एक संतरे के सेवन से सूखी और खुरदरी त्वचा में एक नई जान आती है और त्वचा कोमल, मुलायम, चमकदार व आकर्षक बनती है।
  • संतरा शरीर में कैल्शियम और विटामिन सी की कमी दूर करता है और इनकी कमी से होने वाली विभिन्न बीमारियों से बचाने में सहायक होता है।
  • छोटे बच्चों के लिए तो संतरा मां के दूध के समान उपयोगी माना गया है। जो बच्चे मां के दूध पर ही आश्रित रहते हैं, उन्हें संतरे का थोड़ा- थोड़ा रस पिलाने से कई रोगों से उनका बचाव होता है और बच्चे हष्ट- पुष्ट होते हैं।
  • संतरे के छिलके भी गुणों के मामले में उतने ही बेमिसाल हैं। संतरे का छिलका कृमिनाशक, विषम ज्वरनाशक और अपचनाशक माना गया है इसलिए ऐसे रोगों में संतरे का छिलका पीस कर खिलाने से रोगी को लाभ मिलता है।
  • संतरे के छिलकों को पीसकर उसमें गुलाब जल मिलाकर चेहरे पर लगाने से दाग- धब्बे मिटते हैं।

आज भी अनसुलझा है ब्लैक होल का रहस्य

ब्रह्मांड न जाने कितने रहस्यों को अपने भीतर छुपाए हुए है जिन्हें आज भी वैज्ञानिक सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हीं रहस्यों में से एक है “ब्लैक होल”।

ब्लैक होल ब्रह्मांड की सबसे रहस्य्मयी चीजों में से एक है। कहा जाता है कि हमें रोज आसमान में दिखने वाला तारा भी अपने अंतिम समय में ब्लैक होल ही बन जाता है। जहां अनंत गहराई और अंधकार के अलावा कुछ नहीं है।

आज इस लेख में हम इसी रहस्य्मयी ब्लैक होल के बारे में बात करने जा रहे हैं, तो चलिए शुरू करते हैं।

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क्या होता है ब्लैक होल?

ब्लैक होल तब बनते हैं जब कोई विशाल तारा मर जाता है और उसका कोर अपने आप ढह जाता है। ब्लैक होल का गुरुत्वाकर्षण इतना प्रबल होता है कि कोई भी चीज़ इससे बच नहीं सकती यहाँ तक कि प्रकाश भी नहीं। इसीलिए उन्हें “ब्लैक होल” कहा जाता है।

जब चीजें ब्लैक होल के बहुत करीब पहुंच जाती हैं, तो वे अंदर खिंच जाती हैं और हमेशा के लिए गायब हो जाती हैं। यह एक विशाल वैक्यूम की तरह है जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को सोख लेता है।

ब्लैक होल अक्सर ज्यादा गर्म गैस और धूल से घिरे होते हैं। कहा जाता है कि इनका निर्माण तब होता है जब विशाल तारे ढहते हैं और शायद अन्य तरीकों से जो अभी भी अज्ञात हैं।

ब्लैक होल के प्रकार

ब्लैक होल एक जैसे नहीं होते? वैज्ञानिकों ने उनके आकार के आधार पर विभिन्न प्रकार के ब्लैक होल की पहचान की है। यहां नासा के अनुसार ब्लैक होल के कुछ प्रकारों का विवरण दिया गया है।

प्राइमर्डियल ब्लैक होल – ये सबसे छोटे प्रकार के ब्लैक होल माने जाते हैं।

तारकीय ब्लैक होल – सबसे सामान्य प्रकार के मध्यम आकार के ब्लैक होल को ‘तारकीय‘ (Stellar) कहा जाता है। एक तारकीय ब्लैक होल (Stellar Black Hole) का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से 20 गुना अधिक हो सकता है। हमारी मिल्की-वे गैलेक्सी के भीतर दर्जनों तारकीय द्रव्यमान वाले ब्लैक होल मौजूद हो सकते हैं।

महाविशाल ब्लैक होल – ये वास्तव में बहुत बड़े होते हैं। एक महाविशाल ब्लैक होल का द्रव्यमान सूर्य से लगभग एक अरब गुना अधिक हो सकता है।

मध्यवर्ती ब्लैक होल – सबसे बड़े ब्लैक होल को ‘सुपरमैसिव‘ (Supermassive Black Hole) कहा जाता है। इन ब्लैक होल का द्रव्यमान एकसाथ 1 मिलियन से भी अधिक सूर्यों के बराबर हो सकता है। अब तक के ज्ञात सबसे विशाल ब्लैक होल्स में से एक TON 618 का द्रव्यमान हमारे सूर्य के द्रव्यमान से 66 बिलियन गुना अधिक है।

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ब्लैक होल के बारे में तथ्य

  • Black Hole को हिंदी में “कृष्ण विवर” के नाम से भी जाना जाता है।
  • कहा जाता है कि अल्बर्ट आइंस्टीन ने ब्लैक होल के अस्तित्व की खोज की थी लेकिन यह गलत है उन्होंने पहली बार 1916 में अपने सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत के साथ ब्लैक होल के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी ।
  • Black Hole शब्द का इस्तेमाल कई साल बाद 1967 में अमेरिकी खगोलशास्त्री जॉन आर्चीबाल्ड व्हीलर द्वारा किया गया था। ब्लैक होल शब्द की उत्पत्ति के दशकों बाद भी ब्लैक होल को केवल सैद्धांतिक वस्तुओं के रूप में जाना जाता रहा है।
  • कार्ल श्वार्ज़चाइल्ड, आइंस्टीन के क्रांतिकारी समीकरणों का उपयोग करने वाले और यह दिखाने वाले पहले व्यक्ति थे कि Black Hole वास्तव में मौजूद हो सकते हैं।
  • किसी तारे के Black Hole बनने के लिए उसका द्रव्यमान हमारे सूर्य से कम से कम 10-20 गुना अधिक होना चाहिए। इसलिए सूर्य एक ब्लैक होल नहीं बन सकता क्योंकि उसके पास event horizon बनाने के लिए पर्याप्त द्रव्यमान नहीं है।
  • पृथ्वी के निकटतम Black Hole को द यूनिकॉर्न (The unicorn) कहा जाता है और यह लगभग 1,500 प्रकाश-वर्ष दूर स्थित है।
  • हालांकि Black Hole का पता लगाना एक मुश्किल काम है लेकिन नासा का अनुमान है कि मिल्की वे में 10 मिलियन से एक बिलियन ब्लैक होल हो सकते हैं।
  • वैज्ञानिक यह पता लगाने के लिए सितारों पर अध्ययन कर रहें हैं कि क्या वे (सितारें) ब्लैक होल के चारों ओर उड़ रहे हैं या परिक्रमा कर रहे हैं। जब एक ब्लैक होल और एक तारा पास-पास होते हैं, तो उच्च-ऊर्जा प्रकाश बनता है।
  • Black Hole को नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता। इसे नई टेक्नोलजी के साथ विशेष उपकरण जैसे जेम्स वैब तथा हबल टेलीस्कोप आदी यह देख सकते हैं ।
  • मिल्की वे के केंद्र में एक ज्ञात सुपरमैसिव ब्लैक होल है जिसका नाम Sagittarius A* रखा गया है। नासा के एक बयान के अनुसार विशाल संरचना सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 4 मिलियन गुना है और पृथ्वी से लगभग 26,000 प्रकाश वर्ष दूर है।
  • Black Hole की पहली तस्वीर 2019 में इवेंट होराइज़न टेलीस्कोप (EHT) द्वारा ली गई थी।
  • हमारे सौर मंडल का निकटतम ज्ञात ब्लैक होल V616 monocerotis है, जिसे A0620-00 के रूप में भी जाना जाता है जो लगभग 3,000 प्रकाश-वर्ष दूर स्थित है और इसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 7 गुना से अधिक है।
  • सबसे बड़े ज्ञात Black Hole को TON 618 कहा जाता है। यह NGC 4889 नामक आकाशगंगा के केंद्र में स्थित है। इसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 66 बिलियन बड़ा है। यह सुपरमैसिव Black Hole अब तक ज्ञात सबसे बड़े ब्लैक होल में से एक है और यह हमारी मिल्की वे आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद Black Hole से लगभग 14 गुना बड़ा है।

खगोलीय घटनाओं को बेहद नजदीक से ट्रैक करने वाली संस्था नासा ने अंतरिक्ष का ‘दानव’ कहे जाने वाले ब्लैक होल की डरावनी आवाज रिकॉर्ड किया है। जिसे सुपरसोनिक साउंड क्वालिटी के साथ सुनने पर इसकी विशालता और भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। ब्लैक होल से आने वाली आवाजें सुनकर आप हैरान रह जाएंगे।

नासा के मुताबिक जब एक ब्लैक होल में कोई सामग्री जाती है तो तेज एक्स-रे लाइट उत्पन्न होती है। इसके बाद ब्लैक होल से ईको (Echo) या गूंज की आवाज सुनाई देती है। ब्लैक होल से निकलने वाली ये आवाजें काफी डरावनी सुनाई पड़ती हैं।

इन आवाजों को ब्लैक होल बायनरीज (Black Hole Binaries) का नाम दिया गया है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि ब्लैक होल का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से 5 से 15 गुना तक अधिक था।

देश के सबसे उम्रदराज प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से जुड़े कुछ अनसुने तथ्य

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भारत के छठे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 को भदेली गांव, बुलसर जिला में हुआ था। मोरारजी देसाई एक भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने 1977 और 1979 के बीच जनता पार्टी द्वारा गठित सरकार का नेतृत्व करते हुए भारत के चौथे प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया।

राजनीति में अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने सरकार में कई महत्वपूर्ण पद संभाले जिनमें शामिल है बॉम्बे राज्य के मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, वित्त मंत्री और भारत के दूसरे उप प्रधान मंत्री। आज इस पोस्ट में हम मोरारजी देसाई से जुड़े कुछ अनसुने तथ्य जानेगें।

तथ्य

  • मोरारजी देसाई का जन्म एक गुजराती परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम रणछोड़जी नागरजी देसाई और माता का नाम वाजियाबेन देसाई था। वह अपने आठ भाई बहनों में सबसे बड़े थे। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे।

  • मोराजी देसाई ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ‘सेंट बुसर हाई स्कूल’ से प्राप्त की थी। इसके बाद तत्कालीन बंबई प्रांत के ‘विल्सन सिविल सेवा’ से वर्ष 1918 में स्नातक की डिग्री हासिल करने बाद उन्होंने 12 वर्षों तक डिप्टी कलेक्टर के रूप में कार्य किया।
  • गोधरा (Godhara) में 1927 में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के बाद ही मोरारजी देसाई ने सरकारी नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल होने का निर्णय कर लिया था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान श्री देसाई को तीन बार जेल भेजा गया।
  • मोरारजी देसाई भारत की स्वतंत्रता से पहले बॉम्बे के गृह मंत्री बने और बाद में 1952 में बॉम्बे के मुख्यमंत्री के रूप में चुने गए।
  • वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से नहीं थे। वह भारतीय राजनीति के इतिहास में 81 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले सबसे उम्रदराज व्यक्ति थे। जो आज भी एक रिकॉर्ड बना हुआ है।
  • उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के शासनकाल में गृह मंत्री और इंदिरा गांधी के शासनकाल में डिप्टी पीएम और वित्त मंत्री के रूप में काम किया था।
  • जब इंदिरा गांधी ने उनसे वित्त विभाग छीन लिया और 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, तो उन्होंने डिप्टी पीएम के पद से इस्तीफा दे दिया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संगठन) का गठन किया, जिसे सिंडिकेट भी कहा जाता था।
  • गुजरात के नव निर्माण आंदोलन का समर्थन करने के लिए उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की थी।
  • आठ वार्षिक और दो अंतरिम बजट के साथ मोरारजी देसाई अब तक सबसे अधिक बजट पेश करने वाले वित्त मंत्री हैं।
  • जब 1968 में भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) का गठन किया गया, तो देसाई ने इसे इंदिरा गांधी का प्रेटोरियन गार्ड माना और प्रधानमंत्री बनने पर इस एजेंसी की सभी गतिविधियों को बंद करने का वादा किया।
  • उन्होंने 24 मार्च 1977 को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली गई। श्री देसाई 24 मार्च 1977 से 28 जुलाई 1979 तक भारत के प्रधानमंत्री थे।
  • उनकी सरकार ने आपातकाल के दौरान संविधान में किए गए कई संशोधनों को रद्द कर दिया और भविष्य की किसी भी सरकार के लिए राष्ट्रीय आपातकाल लागू करना कठिन बना दिया।
  • मोरारजी देसाई ने उस समय के मशहूर टीवी शो ‘सिक्स्टी मिनट्स’ में एक इंटरव्यू में बताया कि वह स्वमूत्र चिकित्सा में विश्वास रखते हैं और इसका अभ्यास भी करते हैं। वह रोजाना एक गिलास अपने मूत्र का सेवन करते हैं।
  • मोरारजी देसाई का 10 अप्रैल 1995 को 99 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस : जाने क्या है इतिहास और उदेश्य

हर साल 28 फरवरी को पूरे देश में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस “रमन प्रभाव” की खोज के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का उद्देश्य है विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों को बताना और दुनिया के सामने रखना है। इस अवसर के माध्यम से युवाओं को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

इसके अलावा समाज में वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत दृष्टिकोण को बढ़ावा देना है। जिससे आने वाली पीढ़ियों को विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल सके और वे इस क्षेत्र में अपना भविष्य बना सके।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2024 के लिए थीम “विकसित भारत के लिए स्वदेशी प्रौद्योगिकियाँ ” रखी गई है।

“रमन प्रभाव” की खोज

सीवी रमन तमिल ब्राह्मण परिवार से आए थे। वह स्कूल और फिर विश्वविद्यालय के एक होनहार छात्र थे। रमन ने संगीत ध्वनियों की भौतिकी का अध्ययन किया और अंततः प्रकाश के बिखरने की घटना का निरीक्षण और विश्लेषण करना शुरू किया।

उन्होंने 1907 से 1933 तक इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस, कोलकाता, पश्चिम बंगाल में काम किया।

यहां उन्होंने भौतिकी के विभिन्न विषयों पर शोध किया था, जिनमें से एक “रमन प्रभाव” भी है, जो भारतीय इतिहास में विज्ञान के क्षेत्र में सबसे बड़ी खोज थी। जिसके लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

1986 में राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार परिषद (एनसीएसटीसी) ने भारत सरकार से 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में नामित करने के लिए कहा था। जिसे सरकार ने स्वीकार कर लिया और पहला राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 28 फरवरी 1987 को मनाया गया था।

क्या है रमन प्रभाव?

रमन प्रभाव स्पेक्ट्रोस्कोपी में एक घटना है जिसे प्रख्यात भौतिक विज्ञानी ने “इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस” कोलकाता की प्रयोगशाला में काम करते समय खोजा था।

रमन प्रभाव अणुओं द्वारा फोटॉन कणों का लचीला प्रकीर्णन है जो उच्च कंपन या घूर्णी ऊर्जा स्तरों को प्रोत्साहित करते हैं। इसे रमन स्कैटरिंग भी कहा जाता है।

सरल शब्दों में यह प्रकाश की तरंगदैर्ध्य में परिवर्तन है जो प्रकाश की किरणों के अणुओं द्वारा विक्षेपित होने के कारण होता है।

जब प्रकाश की एक किरण किसी रासायनिक यौगिक के धूल रहित एवं पारदर्शी नमूने से होकर गुज़रती है तो प्रकाश का एक छोटा हिस्सा आपतित किरण की दिशा से भिन्न अन्य दिशाओं में उभरता है।

इस प्रकिर्णित प्रकाश के अधिकांश हिस्से का तरंगदैर्ध्य अपरिवर्तित रहता है। हालाँकि प्रकाश का एक छोटा हिस्सा ऐसा भी होता है जिसका तरंगदैर्ध्य आपतित प्रकाश के तरंगदैर्ध्य से भिन्न होता है और इसकी उपस्थिति रमन प्रभाव का परिणाम है।

रमन प्रभाव रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी का आधार निर्मित करता है जिसका उपयोग रसायन विज्ञानियों और भौतिकविदों द्वारा सामग्री के बारे में जानकारी प्राप्त करने हेतु किया जाता है।

ये है दुनिया का सबसे बड़ा “डिजिटल कैमरा”

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उत्तरी चिली के मरुस्थल में पहाड़ियों के ऊपर कई विशाल डिश और दूरबीनें लगी हैं। अब यहां दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल कैमरा लगाया जा रहा है, जो सितारों के साथ इंसानी संपर्क में क्रांतिकारी बदलाव कर सकता है।

चिली की वेरा सी रूबिन ऑब्जर्वेटरी के वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वहां लगे टेलीस्कोप में कार के आकार का डिजिटल कैमरा लगाने से ब्रह्मांड के अध्ययन में बड़ी तरक्की हो सकती है।

world's largest digital camera

2025 से होगी शुरुआत

2.8 मीट्रिक टन का कार के आकार का यह डिजिटल कैमरा एक बेहद परिष्कृत और आधुनिक उपकरण है, जिससे ब्रह्मांड के उन कोनों तक भी पहुंचा जा सकेगा, जहां इंसानी नजर पहले कभी नहीं गई।

अमरीकी फंडिंग से तैयार किया गया यह कैमरा 2025 में काम शुरू करेगा, जब 80 करोड़ डॉलर के इस कैमरे से पहली तस्वीर ली जाएगी। हर तीन दिन में यह आसमान का एक चक्कर लगाएगा, जिससे वैज्ञानिकों को विश्लेषण के लिए भरपूर डाटा और तस्वीरें मिलेंगी।

क्रांतिकारी बदलाव की उम्मीद

यह ऑब्जर्वेटरी चिली की राजधानी सैनटिएगो से 560 किलोमीटर उत्तर में सेरो पाचों पहाड़ी पर 2,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसका फायदा चिली को भी होगा, जो अंतरिक्ष अध्ययन का एक बड़ा केंद्र है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली टेलीस्कोपों में से एक-तिहाई यहीं स्थित हैं क्योंकि यहां का आसमान दुनिया में सबसे साफ माना जाता है।

रूबिन ऑब्जर्वेटरी में लगने वाले कैमरे का पहला काम पूरे आसमान की दस साल की समीक्षा करना होगा। इस समीक्षा को ‘लेगी सर्वे ऑफ स्पेस एंड टाइम‘ कहते हैं। उम्मीद है कि इस समीक्षा से करीब 2 करोड़ आकाशगंगाओं, 1.7 अरब सितारों और 60 लाख अन्य अंतरिक्षीय पिंडों के बारे में सूचनाएं मिलेंगी। इससे वैज्ञानिक हमारी आकाशगंगा का भी एक नक्शा बना पाएंगे और डार्क मैटर की और गहराई में जा पाएंगे।

3,200 मैगापिक्सल क्षमता वाला कैमरा

नए कैमरे से 3,200 मैगापिक्सल की तस्वीरें ली जाएंगी यानी यह तस्वीर एक औसत टैलीविजन तस्वीर से लगभग 300 गुना ज्यादा बड़ी होगी। फिलहाल जो दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल कैमरा है, उससे यह तीन गुना ज्यादा शक्तिशाली होगा। इस वक्त दुनिया का सबसे शक्तिशाली कैमरा 870 मैगापिक्सल का हाइपर सुप्रीम कैम है, जो जापान में लगा है।

ऑब्जर्वेटरी के निदेशक स्टीफन हीथकोट बताते हैं, “जब चिली में पहला टैलीस्कोप लगाया गया था तो उसे खच्चर पर लाद कर लाया गया था क्योंकि तब यहां सड़क नहीं थी।’ वेरा सी रूबिन ऑब्जर्वेटरी को अमरीकी खगोलविद पर यह नाम दिया गया है, जिन्होंने डार्क मैटर की खोज की थी।

पंजाब केसरी से साभार