इन आसान उपायों से बढ़ाएं “स्मरण शक्ति”

बालक, किशोर, युवा, प्रौढ़, वृद्ध सबके लिए स्मरण शक्ति का बेहतर होना अति आवश्यक है क्योंकि व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास बेहतर स्मरण शक्ति पर ही निर्भर होता है।

लेकिन वर्तमान में विभिन्न कारणों से लोगों की स्मरण शक्ति कमजोर पड़ जाती है, जिसके फलस्वरूप इसका दुष्परिणाम विभिन्न रूपों में भुगतना पड़ता है। अतः सभी को स्मरण शक्ति को संतोषजनक बनाए रखने पर पूरा ध्यान देना चाहिए।

स्मरण शक्ति को कमजोर करने के लिए कई तरह के कारण व परिस्थितियां उत्तरदायी हो सकती हैं, जिनमें पौष्टिक आहार का अभाव, मानसिक विकार आदि प्रमुख हैं ।

आधुनिक परिवेश में पाश्चात्य जीवनशैली और आहार- विहार संबंधी त्रुटियां स्मरण शक्ति को कमजोर करती हैं। फास्ट फूड व डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ विभिन्न रासायनिक पदार्थों से निर्मित होते हैं, जो शरीर में अम्लता की वृद्धि करके मस्तिष्क को हानि पहुंचाते हैं।

फास्ट फूड से शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी हानि पहुंचती है। स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए सेवन योग्य प्रमुख पदार्थ निम्नलिखित हैं।

सेब : सेब में फास्फोरस और लौह तत्व अधिक मात्रा में होता है। फास्फोरस मस्तिष्क को शक्ति प्रदान करता है और इससे स्मरण शक्ति प्रबल होती है। अतः स्मरण शक्ति में वृद्धि हेतु प्रतिदिन सेब का सेवन करना चाहिए।

तैलीय मछलियाँ : तैलीय मछलियाँ ओमेगा-3 फैटी एसिड का एक बड़ा स्रोत है, जो उन्हें याददाश्त के लिए अच्छे खाद्य पदार्थों में से एक बनाती है। मस्तिष्क का लगभग 60% भाग वसा से बना है, और मस्तिष्क की 50% वसा में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है। ओमेगा-3 मस्तिष्क और तंत्रिका कोशिकाओं के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाता है और याददाश्त को बेहतर बनाता है।

नट्स और बीज : तैलीय मछली की तरह, नट्स और बीजों में भी उच्च स्तर का ओमेगा-3 फैटी एसिड और एंटीऑक्सिडेंट होते हैं, जो उन्हें मस्तिष्क के लिए सबसे अच्छे खाद्य पदार्थों में से एक बनाते हैं। ये विटामिन ई से भरपूर होते हैं, जो बुढ़ापे में मस्तिष्क को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने के लिए जाना जाता है।

अंडे : अंडे कई आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं जो उन्हें याददाश्त के लिए उत्कृष्ट भोजन बनाते हैं। विटामिन बी-6, बी-12 और फोलिक एसिड से भरपूर, अंडे का नियमित सेवन आपके मस्तिष्क को सिकुड़ने से बचा सकता है। इसके अतिरिक्त, अंडे की जर्दी कोलीन का एक बड़ा स्रोत है, जो मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और याददाश्त में सुधार के लिए जाना जाता है।

इसके आलावा इन फ्रूट्स का सेवन करें

गाजर : गाजर का जूस पीने से मानसिक कमजोरी दूर होती हैं और स्मरण शक्ति बढ़ती है।
अनार : अनार के जूस में मिश्री मिलाकर सेवन करें।
आम : आम खाने और दूध पीने से स्मरण शक्ति बेहतर होती है।
आंवला : आंवले का मुरब्बा और दूध पीने से स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है।
नाशपाती : नाशपाती का सेवन करने से मस्तिष्क, हृदय और फेफड़े को बहुत शक्ति मिलती है।
बेलगिरी : बेलगिरी का मुरब्बा खाने से शारीरिक – मानसिक शक्ति बढ़ती है।
गुलाब : गुलाब के फूलों से निर्मित गुलकंद दस-बीस ग्राम की मात्रा में सेवन करके दूध पीएं।

इसके अलावा प्रतिदिन दो-तीन बादाम गिरी पीसकर उसमें पांच ग्राम अश्वगंधा का चूर्ण, शुद्ध घी और शहद मिलाकर सेवन करके ऊपर से दूध पीएं।

पंजाब केसरी से साभार

भगवान शिव के बारे में 35 रहस्यपूर्ण रोचक तथ्य

हिंदू धर्म में भगवान शिव त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) में एक देव हैं। पार्वती के पति शंकर जिन्हें भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है, देवों के देव महादेव माना जाता है।

शंकर जी को संहार का देवता कहा जाता है। शंंकर जी सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं।

यहाँ प्रस्तुत है भगवान शिव के बारे में रोचक और रहस्य से भरपूर 35 तथ्य:

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1. आदिनाथ शिव : – सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें ‘आदिदेव‘ भी कहा जाता है। ‘आदि‘ का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम ‘आदिश‘ भी है।

2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : – शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।

3. भगवान शिव का नाग : – शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।

4. शिव की अर्द्धांगिनी : – शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।

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5. शिव के पुत्र : – शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।

6. शिव के शिष्य : – शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।

7. शिव के गण : – शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है।

8. शिव पंचायत : – भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।

9. शिव के द्वारपाल : – नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।

10. शिव पार्षद : – जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।

11. सभी धर्मों का केंद्र शिव : – शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।

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12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय : – ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।

13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव : – भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।

14. शिव चिह्न : – वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।

15. शिव की गुफा : – शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा ‘अमरनाथ गुफा‘ के नाम से प्रसिद्ध है।

16. शिव के पैरों के निशान : – श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।

रुद्र पद– तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे ‘रुद्र पदम’ कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।

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तेजपुर– असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।

जागेश्वर– उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के पास शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।

रांची– झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर ‘रांची हिल’ पर शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को ‘पहाड़ी बाबा मंदिर‘ कहा जाता है।

17. शिव के अवतार : – वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।

18. शिव का विरोधाभासिक परिवार : – शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।

19. ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।

20.शिव भक्त : – ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।

21.शिव ध्यान : – शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।

22.शिव मंत्र : – दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।

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23.शिव व्रत और त्योहार : – सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।

24. शिव प्रचारक : – भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

25.शिव महिमा : – शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।

26.शैव परम्परा : – दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।

27.शिव के प्रमुख नाम : – शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।

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28.अमरनाथ के अमृत वचन : – शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र‘ एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

29.शिव ग्रंथ : – वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।

30.शिवलिंग : – वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।

31.बारह ज्योतिर्लिंग : – सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी ‘व्यापक ब्रह्मात्मलिंग‘ जिसका अर्थ है ‘व्यापक प्रकाश‘। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।

दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।

32.शिव का दर्शन : – शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

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33.शिव और शंकर : – शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं- शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।

34. देवों के देव महादेव : देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।

35. शिव हर काल में : – भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं। राम के समय भी शिव थे। महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिए थे,।

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जानिए क्यों मनाया जाता है “अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” क्या है इस वर्ष की थीम?

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“अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता बनाने और महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से मनाया जाता है।

हर साल “अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” ​​8 मार्च को दुनिया भर में मनाया जाता है। यह दिन महिला अधिकारों के आंदोलन का प्रतीक है और इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देना है।

“अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” ​​थीम 2024

हर साल महिला दिवस किसी ना किसी थीम पर आधारित होता है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इस बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2024 (IWD 2024) की थीम “महिलाओं में निवेश: प्रगति में तेजी लाएं“ यानी मजबूत भव‍िष्‍य के ल‍िए लैंग‍िक समानता जरूरी है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पहली बार 1996 में एक थीम के साथ मनाया गया था। उस वर्ष संयुक्त राष्ट्र की थीम सेलिब्रेटिंग द पास्ट, “प्लानिंग फॉर द फ्यूचर” थी।

शुरुआत

“अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” ​​1908 में न्यूयॉर्क शहर महिला श्रम आंदोलन के साथ शुरू हुआ। जब लगभग 15,000 महिलाओं ने अपने अधिकारों की मांग के लिए सड़कों पर कदम रखा।

महिलाएं अपने काम के घंटे को कम करने, बेहतर वेतन और वोट के अधिकार की मांग कर रही थीं। महिलाओं के विरोध के लगभग एक साल बाद, सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की घोषणा की। इसके बाद क्लारा ज़ेटकिन द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने का विचार आया।

क्लारा तब यूरोपीय देश डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग ले रही थीं।

सम्मेलन में 17 देशों की लगभग 100 महिलाओं ने भाग लिया। इन सभी महिलाओं ने सर्वसम्मति से क्लारा के प्रस्ताव को मंजूरी दी।

क्लारा ज़ेटकिन ने 1910 में विश्व स्तर पर महिला दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा। पहला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में मनाया गया था लेकिन 1975 में इसे औपचारिक रूप से मान्यता दी गई थी।

 उद्देश्य

“अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” ​​मनाने का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता बनाने के लिए जागरूकता पैदा करना है। महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक भी किया जाना चाहिए।

आज भी कई देशों में महिलाओं को समानता का अधिकार नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में महिलाएं पिछड़ रही हैं। वहीं महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं।

यही नहीं नौकरी में तरक्की के क्षेत्र में भी वे रोजगार के मामले में पिछड़ रहे हैं। 19 वीं शताब्दी में जब महिला दिवस शुरू हुआ, तो महिलाओं ने मतदान का अधिकार प्राप्त किया।

इस प्रकार महिला दिवस देश और दुनिया में मनाया जाता है

“अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” ​​दुनिया भर में विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है। यह दिन अब समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था में महिलाओं की उन्नति के दिन के रूप में मनाया जाता है।

इस दिन भारत में महिलाओं पर आधारित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लोग महिलाओं को शुभकामनाएं और विभिन्न उपहार देते हैं। साथ ही इस अवसर पर नारी शक्ति पुरस्कार दिए जाते हैं।

यह पुरस्कार महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। यह पुरस्कार व्यक्तियों, समूहों, गैर सरकारी संगठनों को दिया जाता है। यह पुरस्कार महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए दिया जाता है।

इस दिन रूस, चीन, कंबोडिया, नेपाल और जॉर्जिया जैसे कई देशों में छुट्टी होती है। चीन में कई महिलाओं को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर काम से आधे दिन की छुट्टी दी जाती है।

इसके अलावा इटली की राजधानी रोम में इस दिन महिलाओं को मिमोसा (चिमिमुई) फूल देने की प्रथा है। कुछ देशों में बच्चे इस दिन अपनी माताओं को उपहार देते हैं इसलिए कई देशों में इस दिन पुरुष अपनी पत्नियों, दोस्तों, माताओं और बहनों को उपहार देते हैं।

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टेलीफोन के आविष्कार अलेक्जेंडर ग्राहम बेल के बारे में रोचक तथ्य

अलेक्जेंडर ग्राहम बेल एक महान वैज्ञानिक और आविष्कारक थे, जो टेलीफोन के विकास पर अपने अग्रणी काम के लिए जाने जाते थे। अलेक्जेंडर ग्राहम बेल का जन्म 3 मार्च 1847 को एडिनबर्ग में हुआ था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही अपने पिता से ही ग्रहण की थी। उनके पिता प्रोफेसर ऐलेक्ज़ैन्डर मेलविल बेल, एक ध्वन्यात्मक विशेषज्ञ थे और उनकी मां एलिजा ग्रेस बेल थीं। उनके दो भाई थे मेलविल जेम्स बेल और एडवर्ड चार्ल्स बेल, जिनकी मृत्यु तपेदिक से हो गई।

10 साल की उम्र में उनका नाम ‘ऐलेक्ज़ैन्डर बेल‘ था, उन्होंने अपने पिता से अपने दो भाइयों की तरह एक मध्य नाम रखने का अनुरोध किया था और उनके 11वें जन्मदिन उनके पिता ने उन्हें ‘ग्राहम’ नाम दिया। करीबी रिश्तेदार और दोस्त उन्हें ‘एलेक’ कहते थे।

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अपने पिता से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्हें स्कॉटलैंड के एडिनबर्घ की रॉयल हाई स्कूल में डाला गया था लेकिन उन्होंने वह स्कूल छोड़ दिया। कुछ समय के बाद उनके अंदर पढ़ाई करने की तीव्र जाग्रति उत्पन्न हुई और तभी से वे घंटो तक पढ़ाई करते रहते थे।

16 साल की उम्र में, बेल ने भाषण के यांत्रिकी का अध्ययन करना शुरू किया। उन्होंने रॉयल हाई स्कूल और एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में अपनी शिक्षा ग्रहण की। 1868 में बेल अपने परिवार के साथ कनाडा चले गए और उसके अगले वर्ष वह संयुक्त राज्य अमेरिका में जाकर बस गए।

यूएस में रहते हुए बेल ने ‘visible speech’ (भाषण ध्वनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतीकों का एक सेट) नामक एक प्रणाली लागू की जिसे उनके पिता ने बधिर बच्चों को पढ़ाने के लिए विकसित किया था। 1872 में उन्होंने बोस्टन में स्कूल ऑफ वोकल फिजियोलॉजी एंड मैकेनिक्स ऑफ स्पीच खोला, जहां बधिर लोगों को बोलना सिखाया जाता था।

26 साल की उम्र में (1873 में ) वह बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ ऑरेटरी में वोकल फिजियोलॉजी और एलोक्यूशन के प्रोफेसर बन गए।

पढ़ाते समय बेल की मुलाकात एक बधिर छात्र मैबेल हब्बर्ड से हुई जिनसे उन्हें प्यार हो गया। इस जोड़े ने 11 जुलाई, 1877 को शादी कर ली। उनके चार बच्चे हुए, जिनमें दो बेटे भी शामिल थे, जिनकी मृत्यु बचपन में ही हो गई थी।

टेलीग्राफ से टेलीफोन तक का रास्ता

बेल ने जब टेलीफोन को इजाद करने के लिए विद्युत संकेतों के साथ प्रयोग करना शुरू किया, तो टेलीग्राफ लगभग 30 वर्षों तक संचार का एक स्थापित साधन था। हालांकि एक बेहद सफल प्रणाली, टेलीग्राफ मूल रूप से एक समय में एक संदेश प्राप्त करने और भेजने के लिए सीमित था।

बेल को ध्वनि की प्रकृति के बारे में व्यापक ज्ञान था, जिसके कारण उन्होंने एक ही समय में एक ही तार पर कई संदेश प्रसारित करने की संभावना पर खोज शुरू की।

Alexander-Graham-Bel

अन्य रोचक तथ्य

  • बेल ने 1873 और 1874 के बीच, थॉमस सैंडर्स और गार्डिनर हबर्ड के वित्तीय समर्थन के साथ “हार्मोनिक टेलीग्राफ” पर काम किया।
  • ग्राहम बेल को 1876 में सबसे पहले काम करने वाले टेलीफोन का आविष्कार करने और 1877 में बेल टेलीफोन कंपनी की स्थापना के लिए जाना जाता है।
  • बेल का नाम उनके नाना के नाम पर रखा गया था। उनके पिता और दादा इंग्लैंड में स्पीच डेवलपमेंट के क्षेत्र में अपने काम के लिए प्रसिद्ध थे, जिसे एलोक्यूशन कहा जाता था।
  • 12 साल की उम्र में बेल ने अपने दोस्त की पारिवारिक अनाज मिल के लिए डी-हॉकिंग मशीन का आविष्कार किया था।
  • बेल की मां और पत्नी दोनों बहरी थीं। इसी कारण ने उन्हें ध्वनिकी के साथ काम करने और तारों पर ध्वनि तरंगों को प्रसारित करने के लिए प्रभावित किया।
  • कहा जाता है कि बेल ने अपनी पहली कॉल अपनी प्रेमिका हेलो को किया था लेकिन यह गलत है। इनकी पत्‍नी का नाम मैबेल हब्बर्ड था। ग्राहम बेल ने अपनी पहली कॉल में अपने असिस्टेंट से हेलो नहीं, “यहां आओ, मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं,” कहा था। हेलो शब्द स्पैनिश के होला से बना है।
  • ग्राहम बेल बचपन से ही ध्वनि विज्ञान में गहरी दिलचस्पी रखते थे, इसलिए उन्होंने एक ऐसा पियानो बनाया, जिसकी मधुर आवाज काफी दूर तक सुनी जा सकती थी। कुछ समय तक वे स्पीच टेक्नोलॉजी विषय के टीचर भी रहे थे। इस दौरान भी उन्होंने अपना प्रयास जारी रखा और एक ऐसे यंत्र को बनाने में सफल हुए, जो न केवल म्यूजिकॅल नोट्स को भेजने में सक्षम था, बल्कि आर्टिकुलेट स्पीच भी दे सकता था। यही टेलीफोन का सबसे पुराना मॉडल था।
  • टेलीफोन की खोज करने के बाद जब लोगों ने इसका इस्तेमाल करना शुरू किया तो वे लोगों से सबसे पहले पूछते थे Are you there। वह ऐसा इसलिए करते थे ताकि वह जान सके की उनकी आवाज दूसरी ओर पहुंच रही है कि नहीं। हालांकि एक बार थॉमसन एडिशन ने Ahoy को गलत सुन लिया और साल 1877 में उन्होंने Hello बोलने का प्रस्ताव रखा।
  • इस प्रस्ताव को पास कराने के लिए थॉमस एडिशन ने पिट्सबर्ग की सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट एंड प्रिंटिंग टेलीग्राफ कंपनी के अध्यक्ष टीबीए स्मिथ को पत्र लिख कर कहा कि टेलीफोन पर पहला शब्द हैलो बोला जाना चाहिए। जब उन्होंने पहली बार फोन किया तो सबसे पहले कहा हैलो। ये उन्हीं की देन है कि आज हम फोन उठाते ही हैलो बोलते हैं।
  • ग्राहम बेल ने 1880 में फोटोफोन नाम की एक डिवाइस बनाई। ये तकनीक प्रकाश की किरणों के ज़रिए आवाज़ को एक जगह से दूसरी जगह भेजती थी। आज की ऑप्टिकल फाइबर केबल ग्राहम बेल के सिद्धांतों पर काम करती है।
  • गोली लगने पर लोगों की जान बचाने के लिए बेल ने एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक मशीन ‘इंडक्शन बैलेंस’ बनाई। इस मशीन से उन्होंने कई पूर्व सैनिकों के जिस्म में छिपी गोलियों की सही लोकेशन पता लगाने में मदद की।
  • 1888 में बेल नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और 1896 से 1904 तक उन्होंने इसके अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
  • अलेक्जेंडर ग्राहम बेल का निधन 2 अगस्त, 1922 को कनाडा के नोवा स्कोटिया में हुआ था तब एक मिनट के लिए अमेरिका और कनाडा में सभी टेलीफोन लाइन को निलंबित कर दिया गया।

मजेदार किस्सा : जब अनुपम खेर ने महेश भट्ट को दिया था श्राप, फिल्म से निकाले जाने के कारण रातों-रात मुंबई छोड़ रहे थे एक्टर

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बॉलीवुड के दिग्गज और वर्सटाइल एक्टर अनुपम खेर ने अपने करियर में 500 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया है। उन्होंने कॉमेडी, विलेन, सीरियस सभी तरह के किरदारों को बखूबी पर्दे पर निभाया है। उनका जन्म 7 मार्च 1955 को शिमला में हुआ था।

आज के लेख में हम आपको बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता से जुड़ा एक किस्सा बताने जा रहे हैं तो चलिए जानते हैं।

अनुपम खेर ने बॉलीवुड के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है। अनुपम पहली बार महेश भट्ट की फिल्म सारांश में नजर आए थे। ये फिल्म सुपरहिट साबित हुई थी। इसकी खास बात ये थी कि इस फिल्म में अनुपम ने एक बूढ़े पिता का किरदार निभाया था और उस वक्त उनकी उम्र केवल 28 साल थी।

Funny story Anupam Kher cursed Mahesh Bhatt

अनुपम ने अपने संघर्ष के बारे में एक इंटरव्यू में कहा था- मैं एनएसडी से पढ़ाई करने के बाद कलाकार बनने के लिए मुंबई आया था। उस वक्त मेरी जेब में 37 रुपये थे। उन दिनों मैं रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर सोया करता था।

अनुपम को फिल्म सारांश में काम मिल गया था लेकिन जब वह इसके लिए तैयार हुए तो महेश भट्ट ने उन्हें फिल्म से निकाल दिया और संजीव कुमार को कास्ट कर लिया।

जब अनुपम को सारांश से हटाए जाने की बात पता चली तो उनका दिल टूट गया। कई सालों से संघर्ष कर रहे अनुपम ने मुंबई छोड़ने का फैसला किया और महेश भट्ट के घर जाकर उन्हें भला-बुरा कहा।

अनुपम खेर ने एक इंटरव्यू में कहा था- मैंने महेश से कहा था कि आप सच्चाई पर फिल्म बना रहे हैं लेकिन आपकी जिंदगी में कोई सच्चाई नहीं है। मैं ब्राह्मण हूँ, तुम्हें श्राप देता हूँ। यह देखकर महेश भट्ट हैरान रह गए और उन्होंने अनुपम को मुंबई छोड़ने से रोक दिया।

सारांश के बाद ‘कर्मा’, ‘तेजाब’, ‘राम लखन’, ‘दिल’, ‘सौदागर’, ‘1942 ए लव स्टोरी’, ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ और ‘हम आपके हैं कौन‘ जैसी सफल फिल्मों में अनुपम खेर का रोल अलग था।

जानिए क्यों कहलाते हैं शिव “अर्धनारीश्वर”

भगवान शिव की पूजा सदियों से हो रही है लेकिन इस बात को बहुत कम लोग ही जानते हैं कि शिव का एक और रूप है जो है अर्धनारीश्वर।

दरअसल शिव ने यह रूप अपनी मर्जी से धारण किया था। वह इस रूप के जरिए लोगों का संदेश देना चाहते थे कि स्त्री और पुरुष समान है।

आइए जानते हैं इस घटना का चक्र कि आखिर किस वजह से भगवान शिव को यह रूप धारण करना पड़ा था।

हिंदू पौराणिक शास्त्र में भगवान उस मानवीय कल्पना का प्रतीक है जो या तो स्वतंत्र शिव के रूप में पूजे जाते हैं।

लिंग पुराण के अनुसार सृष्टि की शुरुआत में एक कमल खिला। उसके अंदर ब्रह्मा बैठे थे। जागरूक होने पर उन्हें अकेलापन महसूस हुआ लेकिन वे इस प्रश्न में उलझ गए कि किसी का साथ पाने के लिए किसी और जीव का निर्माण कैसे कर सकते हैं।

अचानक उन्हें अपनी आंखों के सामने शिव का आभास हुआ। शिव का दाहिना हिस्सा पुरुष का था और बायां हिस्सा स्त्री का।

इससे प्रेरित होकर ब्रह्मा ने अपने आप को दो हिस्सों में बांट दिया। दाएं हिस्से से सभी पुरुष जीव आए और बाएं हिस्से से स्त्री जीव।

नाथ जोगियों के अनुसार जब वे (जोगी) शिवजी से मिलने कैलाश पर्वत पर गए, तब यह देखकर हैरान रह गए कि शिव पार्वती के साथ आलिंगन में इतने मगन थे कि उन्होंने जोगियों की ओर ध्यान तक नहीं दिया।

फिर वे समझ गए कि शिव और पार्वती के आलिंगन को रोकना शरीर के दाएं हिस्से को बाएं हिस्से से अलग करने जैसा होगा इसलिए उन्होंने शिव को प्रणाम कर उन्हें अर्द्धनारीश्वर के रूप में कल्पित किया।

दक्षिण भारत के मंदिरों में शिव की ओर स्नेह से देखता हुआ भृंगी नामक व्यक्ति दिखाई देता है। भृंगी शिव के दूसरे उपासकों से अलग है और बहुत दुर्बल है।

दरअसल उसकी सिर्फ़ हड्डियां नजर आती हैं और उसके दो नहीं, बल्कि तीन पैर हैं। कहते हैं कि भृंगी शिव का परम भक्त था। एक दिन कैलाश पर्वत पर आकर उसने शिव की प्रदक्षिणा करने की इच्छा व्यक्त की।

इस पर पार्वती ने कहा कि भृंगी उनके इर्द-गिर्द भी जाए लेकिन भृंगी तो शिव से इतना मोहित था कि उसे पार्वती के इर्द-गिर्द घूमने की कोई इच्छा नहीं हुई।

इसे देखकर माता पार्वती शिव की गोद में जा बैठीं और इस वजह से भृंगी अब दोनों के इर्द-गिर्द जाने को मजबूर था। लेकिन उसे तो सिर्फ़ शिव की प्रदक्षिणा करनी थी, इसलिए उसने अब सांप का रूप धारण कर शिव और पार्वती के बीच से खिसकने की कोशिश की।

शिव को यह मज़ेदार लगा और पार्वती को अपने शरीर का आधा हिस्सा बनाकर वे अर्द्धनारीश्वर में बदल गए लेकिन भृंगी ने अपनी हठ नहीं छोड़ी। वह कभी चूहे तो कभी मधुमक्खी का रूप लेकर शिव व पार्वती के बीच से जाने की कोशिश करता।

इससे पार्वती इतनी चिढ़ गईं कि उन्होंने भृंगी को श्राप दे दिया कि वह अपनी मां से मिले शरीर के सभी भाग खो देगा। भृंगी के शरीर से तुरंत मांस और खून गायब हो गया। सिर्फ़ हड्डियां बच गईं। वह ज़मीन पर ढेर हो गया।

तब भृंगी पर तरस खाकर शिवजी ने उसे एक तीसरा पैर दे दिया, ताकि वह तिपाई की तरह खड़ा हो सके। यह घटना दर्शाती है कि ईश्वर के स्त्रैण भाग को ना पूजने का क्या खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

वहीं, उत्तर भारत के पहाड़ी इलाक़ों की एक लोककथा के अनुसार जब पार्वती जी ने गंगा को शिवजी के सिर पर देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गईं।

उन्होंने सोचा कि उनके होते हुए शिव किसी और स्त्री को कैसे अपने साथ रख सकते हैं। तब उन्हें शांत करने के लिए शिवजी ने दोनों का शरीर एक कर दिया और इस तरह वे अर्द्धनारीश्वर बन गए।

शिवलिंग पर भूलकर भी न चढ़ाएं ये चीज़े, रूठ जाते है भगवान

भगवान शिव की पूजा के दौरान लोग कभी शिवलिंग पर भांग-धतूरा तो कभी दूध, चंदन और भस्म चढ़ाते हैं। भगवान शिव को बैरागी कहा जाता है, यही वजह है कि उनके शिवलिंग पर कभी भी आम जिन्दगी में इस्तेमाल होने वाली चीजें नहीं चढ़ाई जाती हैं।

अगर आप भी भोलेबाबा के व्रत या उनकी पूजा करने वाले हैं तो भूलकर भी शिवलिंग पर न चढ़ाएं ये चीजें। आज इस पोस्ट के माध्यम से जानते हैं कि वो कौन-कौन सी चीज़े है जो शिवलिंग पर नहीं चढ़ानी चाहिए।

मान्यता है कि हर देवी देवता में चढ़ने वाले तुलसी और सिंदूर शिव को नहीं चढ़ाने चाहिए। ऐसा करने से शिव प्रसन्न होने की जगह पर नाराज हो जाते हैं।

आपको बता दें कि तुलसी मां लक्ष्मी का स्वरूप मानी जाती है यानी श्री विष्णु की अर्धांगिनी। भगवान विष्णु शालिग्राम की पूजा में ही सदैव तुलसी का प्रयोग किया जाता है मगर शिवलिंग पर तुलसी का प्रयोग वर्जित माना गया है।

सिंदूर को श्रृंगार की वस्तु कहा जाता है जोकि सभी देवियों को चढ़ाया जाता है मगर भगवान शिव वैरागी है और उन्हें महाकाल माना जाता है इसलिए सिंदूर शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए।

शिव को अर्पित की गई वस्तु का प्रसाद नहीं लिया जाता, जैसे कि बाकी देवताओं पर चढ़ी चीजों को प्रसाद में लेते हैं।कथाओं के अनुसार एक बार केतकी पुष्प ने ब्रह्मा का झूठ में साथ दिया था जिसे जानकर शिव ने क्रोध में केतकी के पुष्प को श्राप दिया था। तब से इस पुष्प को शिवलिंग में नहीं चढ़ाया जाता हैं।

सभी देवी देवताओं की पूजा में हल्दी या हल्दी चावल का प्रयोग किया जाता हैं मगर कुछ लोगों की मानें तो हल्दी सौभाग्य का प्रतीक होती है तो विनाश के देवता भगवान शिव को यह नहीं अर्पित करनी चाहिए।

भगवान श‌िव ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध क‌िया था। शंख को उसी असुर का प्रतीक माना जाता है, जो भगवान व‌िष्‍णु का भक्त था इसल‌िए व‌िष्णु भगवान की पूजा शंख से होती है लेकिन श‌िव की नहीं।

मार्टिन लूथर किंग के बारे में रोचक तथ्य एवं जानकारी

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मार्टिन लूथर किंग जूनियर अमेरिका के एक पादरी, आन्दोलनकारी (ऐक्टिविस्ट), एवं अफ्रीकी-अमेरिकी नागरिक अधिकारों के संघर्ष के प्रमुख नेता थे।

उन्हें अमेरिका का गांधी भी कहा जाता है। उनके प्रयत्नों के परिणामस्वरूप अमेरिका में मतदान अधिकार अधिनियम पारित हुआ। इस कानून ने अफ्रीकी अमेरिकियों को वोट देने के अपने अधिकार का प्रयोग करने में मदद की।

आज इस पोस्ट में हम जानेगें मार्टिन लूथर किंग के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य एवं जानकारी, चलिए शुरू करते हैं।

जन्म के समय उनका नाम मार्टिन नहीं था

किंग का जन्म 15 जनवरी 1929 को अटलांटा, जॉर्जिया में माइकल किंग जूनियर के रूप में हुआ था। उनके पिता माइकल, अटलांटा के एबेनेज़र बैपटिस्ट चर्च के पादरी थे। वे बैपटिस्ट वर्ल्ड एलायंस के लिए रोम, मिस्र, जेरूसलम और बर्लिन जैसे स्थानों की विदेश यात्रा के दौरान प्रोटेस्टेंट सुधार नेता मार्टिन लूथर के काम से बहुत प्रेरित हुए।

स्टैनफोर्ड में मार्टिन लूथर किंग जूनियर रिसर्च एंड एजुकेशन इंस्टीट्यूट के अनुसार, जब वे 1934 में वापस लौटे, तो उन्होंने अपना और अपने बेटे का नाम माइकल किंग से बदलकर मार्टिन लूथर किंग रखने का फैसला किया।

1957 में मार्टिन लूथर जब 28 वर्ष के थे तब उन्होंने आधिकारिक तौर पर अपने जन्म प्रमाण पत्र पर नाम माइकल किंग जूनियर से बदलकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर कर लिया था।

किंग ने 15 साल की उम्र में कॉलेज शुरू कर दिया था

एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका से किंग की जीवनी के अनुसार, 1944 में किंग ने एक युद्धकालीन कार्यक्रम के तहत अटलांटा के मोरहाउस कॉलेज में प्रवेश किया, जिसमें प्रतिभाशाली हाई स्कूल के छात्रों को प्रवेश दिया गया।

उनका शुरू में नेता बनने का इरादा नहीं किया था, लेकिन पीएच.डी. के लिए अध्ययन करते समय बोस्टन विश्वविद्यालय में, मार्टिन लूथर को धर्मशास्त्री और नागरिक अधिकार नेता हॉवर्ड थुरमन ने मार्गदर्शन दिया था, जिनका उन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा।

मार्टिन लूथर का परिवार

18 जून 1953 में उनकी मुलाकात संगीत की छात्रा और महत्वाकांक्षी गायिका कोरेटा स्कॉट से हुई और उन्होंने उनसे शादी की। उनके चार बच्चे थे: योलान्डा, मार्टिन लूथर किंग III, डेक्सटर स्कॉट और बर्निस।

Interesting facts and information about Martin Luther King
मार्टिन लूथर किंग अपनी पत्नी कोरेटा स्कॉट और बच्चों के साथ

वह ग्रैमी विजेता थे

किंग को 1970 में मरणोपरांत ग्रैमी से सम्मानित किया गया था। उन्होंने 1967 में दिए गए एक उपदेश से रिकॉर्ड किए गए “व्हाई आई ओपोज़ द वॉर इन वियतनाम” के लिए सर्वश्रेष्ठ स्पोकन वर्ड एल्बम का पुरस्कार जीता।

उन्हें पहले “आई हैव ए ड्रीम” और “वी शैल ओवरकम” की रिकॉर्डिंग के लिए स्पोकन-वर्ड श्रेणी में भी ग्रैमी के लिए नामांकित किया गया था।

1958 में भी उन पर पहला हत्या के प्रयास किया गया था

1968 में लोरेन मोटल में उनकी हत्या से लगभग एक दशक पहले भी उन पर हत्या का प्रयास हुआ था। 20 सितंबर, 1958 को 29 वर्षीय किंग न्यूयॉर्क शहर में एक पुस्तक पर हस्ताक्षर कर रहे थे, जब इज़ोला वेयर करी नाम की औरत ने उनसे पूछा, क्या आप मार्टिन लूथर किंग है? जब किंग ने जवाब दिया, “हां,” तो करी ने लेटर ओपनर उनके सीने में घोंप दिया था।

मोंटगोमरी बस बहिष्कार भाषण – मोंटगोमरी, अलबामा, 5 दिसंबर, 1955 को

जब रोजा पार्क्स को सिटी बस में अपनी सीट छोड़ने से इनकार करने के लिए गिरफ्तार किया गया, तो उसने मोंटगोमरी बस बहिष्कार को बढ़ावा दिया और किंग को सार्वजनिक भाषण देने का पहला मौका दिया। इसी भाषण में उन्होंने अपने कुछ प्रसिद्ध विचारों को प्रस्तुत किया, जिनमें अहिंसक विरोध भी शामिल था।

भाषण ने उनको राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया और उन्हें नागरिक अधिकार आंदोलन में सबसे आगे चलने वालों में से एक बना दिया। मोंटगोमरी बस बहिष्कार 381 दिनों तक चला लेकिन अंततः अलबामा में सार्वजनिक बसों पर नस्लीय अलगाव को समाप्त कर दिया गया। इसमें 100 से अधिक अन्य लोगोंको भी गिरफ्तार किया गया था।

मोंटगोमरी बस बहिष्कार के वर्षों बाद रोजा पार्क्स और मार्टिन लूथर किंग जूनियर

किंग के “आई हैव ए ड्रीम” भाषण में 250,000 से अधिक लोग शामिल हुए थे।

अगस्त 1963 में नौकरियों और स्वतंत्रता के लिए वाशिंगटन में मार्च के दौरान दिए गए भाषण को सुनने के लिए दुनिया भर से लोग आए थे। नेशनल कॉन्स्टिट्यूशन सेंटर के अनुसार, जब किंग ने वाशिंगटन, डीसी में अपना प्रसिद्ध “आई हैव ए ड्रीम” भाषण दिया था तब 250,000 से अधिक लोग उपस्थित थे।

किंग को 1964 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था

1964 में समान नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था। वह 35 वर्ष की उम्र में नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे। सम्मान के साथ, उन्हें $54,600 दिए गए थे, जिसे उन्होंने आंदोलन को दान कर दिया था।

सेल्मा, अलबामा, 25 मार्च 1965

मार्च 1965 में मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अफ्रीकी अमेरिकी मतदान अधिकारों के लिए लड़ने के लिए सेल्मा से मोंटगोमरी, अलबामा तक 25,000 लोगों के साथ मार्च किया। मार्च के अंत में मार्टिन लूथर ने ” हमारा ईश्वर आगे बढ़ रहा है ” भाषण दिया, जो नागरिक अधिकार आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

कानूनी और राजनीतिक अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय किंग के भाषण ने आंदोलन को आर्थिक समानता के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। भाषण के अंत में किंग ने कॉल-एंड-रिस्पॉन्स तकनीक का इस्तेमाल किया जिसने इस भाषण को वास्तव में प्रतिष्ठित बना दिया।

किंग महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे

किंग महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे। मदरसा के छात्र के रूप में पढ़ाई के दौरान किंग पहली बार गांधीजी के शांतिपूर्ण तरीकों से परिचित हुए। वह उस व्यक्ति से कभी नहीं मिल पाए जिसके वे इतने बड़े प्रशंसक थे, लेकिन 1959 में वह एक महीने की लंबी यात्रा के लिए भारत आए, जहां वह गांधी के कई रिश्तेदारों से मिले।

Interesting facts and information about Martin Luther King

अन्य तथ्य

  • एक बच्चे के रूप में किंग को बताया गया था कि वह अपने श्वेत मित्र के साथ नहीं खेल सकता क्योंकि काले और श्वेत बच्चों को एक साथ नहीं रहना चाहिए ।
  • मई 1957 में किंग ने वाशिंगटन में तीर्थयात्रा के दौरान अपना प्रसिद्ध “गिव अस द बैलट” भाषण दिया।
  • उनके अंतिम महान भाषण को “आई हैव बीन टू द माउंटेन टॉप” संबोधन के रूप में जाना जाता है और यह 3 अप्रैल, 1968 को उनकी मृत्यु से एक दिन पहले दिया गया था।
  • 4 अप्रैल 1968 को मेम्फिस, टेनेसी में मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या कर दी गई थी। उन्हें जेम्स अर्ल रे ने गोली मार दी थी। कुछ लोगों ने आरोप लगाया था कि किंग की हत्या एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी और रे सिर्फ बलि का बकरा था।
  • किंग का पसंदीदा गाना “टेक माई हैंड, प्रीशियस लॉर्ड” था। यह गाना उनके अंतिम संस्कार में उनकी दोस्त महलिया जैक्सन ने गाया था।
  • अपने जीवन के अंत में किंग ने अपना ध्यान नागरिक अधिकारों से हटकर गरीबी उन्मूलन और वियतनाम युद्ध को रोकने के अभियानों पर केंद्रित कर दिया था।
  • लोरेन मोटल जहां मार्टिन लूथर की हत्या हुई थी, अब राष्ट्रीय नागरिक अधिकार संग्रहालय का स्थान है।
  • उनकी मृत्यु के बाद किंग को 1977 में प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ़ फ़्रीडम और 2004 में कांग्रेसनल गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया।
एक भाषण के दौरान मार्टिन लूथर किंग जूनियर
  • 1983 में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने एक विधेयक पर हस्ताक्षर किए, जिसने मार्टिन लूथर किंग को सम्मानित करने के लिए एक संघीय अवकाश बनाया, लेकिन 2000 तक ऐसा नहीं हुआ क्योंकि कुछ राज्य नई छुट्टी को अपनाने के लिए अनिच्छुक थे, लेकिन वर्ष 2000 के बाद से, सभी 50 राज्यों ने मार्टिन लूथर किंग जूनियर दिवस मनाया है।

महाशिवरात्रि 2024 : 300 साल बाद बन रहा महाशिवरात्रि पर विशेष योग, इन राशियों पर बरसेगी कृपा

महाशिवरात्रि हिन्दुओं और भगवान शिव का एक प्रमुख त्यौहार है। इस वर्ष महाशिवरात्रि पर्व 8 मार्च 2024 को शुक्रवार के दिन है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ।

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ था। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था।

साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से इस महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत सहित पूरी दुनिया में शिवरात्रि का पावन पर्व बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है।

महाशिवरात्रि 2024 शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, 8 मार्च को महाशिवरात्रि के दिन शिव जी की पूजा का समय शाम के समय 06 बजकर 25 मिनट से 09 बजकर 28 मिनट तक है।

300 वर्ष बाद बनेगा त्रिग्रही योग

इस बार महाशिवरात्रि के मौके पर त्रिग्रही योग बन रहा है। यह योग 300 साल बाद बनने जा रहा है। मान्यताओं के अनुसार यह योग विशेष फलदायी है। इस दौरान पांच राशि वाले जातकों पर भगवान शिव की विशेष कृपा बरसेगी।

इस दुर्लभ योग और शुभ अवसर पर भगवान शंकर की पूजा करने से भक्तों को मनवांछित फल की प्राप्ति होगी। महाशिवरात्रि का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है।

मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इस दिन व्रत रखने व विधि पूर्वक पूजा अर्चना करने से जीवन में सुख और समृद्धि आती है।

ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार इस वर्ष शुक्रवार को प्रदोष और शिवरात्रि व्रत एक ही दिन मनाई जाएगी। शुक्र प्रदोष का अपना महत्व है।

गुरुवार सात मार्च को रात्रि 9.46 बजे त्रयोदशी का आगमन हो रहा है, जो शुक्रवार आठ मार्च को रात्रि 7.38 बजे तक रहेगा।

सिंह, कन्या, वृष, मेष, धनु आदि राशि वालों के लिए यह विशेष फलदायी है। महाशिवरात्रि के दिन सुबह आठ बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा।

महाशिवरात्रि के दिन मकर राशि में मंगल और चंद्रमा की युति से चंद्र मंगल योग बन रहा है। इसके साथ ही कुंभ राशि में शुक्र, शनि और सूर्य की युति और मीन राशि में राहु और बुध की युति से त्रिग्रही योग बन रहा है।

ऐसा संयोग कई राशियों के जीवन में खुशियां ला सकता है। इस दिन शहद से अभिषेक करना शुभ होगा।

महाशिवरात्रि पर इन 14 फूलों से करें महादेव को प्रसन्न

महाशिवरात्रि हिंदुओं के सबसे महत्वपूर्ण और शुभ त्योहारों में से एक है जो हर साल फरवरी और मार्च के महीने में आता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह त्यौहार फाल्गुन या माघ महीने के कृष्ण पक्ष के चौदहवें दिन मनाया जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ था। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था।

साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से इस महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत सहित पूरी दुनिया में शिवरात्रि का पावन पर्व बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है।

इस साल 2024 में महाशिवरात्रि 8 मार्च को है। महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त का समय शाम 06 बजकर 25 मिनट से 09 बजकर 28 मिनट तक है।

भगवान भोले नाथ कैसे हों प्रसन्न

महादेव को प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग को जल और दूध से नहलाया जाता है। यदि कोई भक्त सच्ची श्रद्धा से उन्हें सिर्फ एक लोटा पानी भी अर्पित करें, तो भी महादेव प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शिव को प्रसन्न करना बड़ा सरल है।

यदि भक्त उन्हें विभिन्न तरीकों के फूल और पत्तियां अर्पित करते हैं, तब भी महादेव मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। भगवान शिव को फूल बहुत पसंद हैं, इसी तरह भगवान शिव को अलग- अलग फूल चढ़ाने के भी अलग- अलग फायदे है। आइए जानते वो 14 शुभ फूल, जिनसे महादेव होते हैं प्रसन्न।

आंकड़े के फूल

लाल और सफेद आंकड़े के फूलों से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

धतूरे के फूल

धतूरा महादेव को चढ़ाए जाने वाले फूलों में से एक है। धतूरे के फूल से पूजन करने पर संतान प्राप्ति का सुख मिलेगा।

चमेली के फूल

अगर आप गाड़ी खरीदना चाहते है, तो चमेली के फूलों से भोलेनाथ का पूजन करने पर गाड़ी का सुख मिलता है।

बिल्व पत्र

बिल्व पत्र के पेड़ को शिवद्रुम के नाम से भी जाना जाता है। भोलेनाथ को बेलपत्र अर्पित करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

अलसी के फूल

अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है, कई पाप क्षमा होते हैं।

गुड़हल के फूल

गुड़हल फूल भगवान गणेश के साथ ही भगवान शिव के भी प्रिय फूल हैं। गुड़हल के फूल महादेव को अर्पित करने से दुश्मनों का विनाश होता है।

बेला के फूल

बेला के फूलों से भोलेनाथ का पूजन करने पर सुंदर और अच्छा लाइफ पार्टनर मिलेगा।

हरसिंगार के फूल

हरसिंगार के फूलों से महादेव का पूजन करने पर सुख-संपत्ति में वृद्धि होती है।

जूही के फूल

जूही के फूलों से भगवान शिव का पूजन करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती और दरिद्रता भी नहीं रहती।

गुलाब के फूल

आमतौर पर देवी- देवताओं को लाल गुलाब की पंखुड़ियां चढ़ाई जाती है। अगर आप शिव शंकर को लाल गुलाब अर्पित करते हैं, तो धन व समृद्धि बढ़ने लगते हैं।

कनेर के फूल

कनेर के फूलों से भगवान शिव का पूजन करने से मनचाहा धन लाभ होगा।

लाल डंठलवाला धतूरा

लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजन में शुभ माना गया है। यह फूल भोलेनाथ को अर्पित करने से धन की मनोकामना पूरी होती है।

शमी वृक्ष के पत्ते

शमी वृक्ष के पत्तों से महादेव का पूजन करने पर अपार धन-संपदा का आशीष मिलता है।

दूब या दूर्वा

दूब या दूर्वा, यूं तो एक तरह की घास है, पर दूर्वा से भगवान शिव का पूजन करने पर आयु बढ़ती है।