अशुभ ग्रहों के प्रभाव को शांत करने के उपाय और टोटके

ज्योतिष शास्त्र के अनसार हम सभी के जीवन की घटनाएं ग्रहों के द्वारा संचालित होती हैं। जीवन में आने वाले उतारचढ़ाव और बदलती घटनाएं इस बात का प्रमाण होती हैं कि हम सोचते कुछ और हैं और होता कुछ और है। इसका अर्थ यह है कि एक ऊपरी शक्ति है जो हम सभी के जीवन को नियंत्रित करती है। जीवन के साथ ही हमारी जन्मकुंडली में ग्रहों की स्थिति निर्धारित हो जाती है।

अशुभ ग्रहों के प्रभाव को शांत के उपाय
अशुभ ग्रहों के प्रभाव को शांत के उपाय

सभी ग्रहों की स्थिति हमारे लिए अनुकूल हो ऐसी संभावनाएं बहुत कम बनती हैं। यही वजह है कि सभी को जीवन में कोई न कोई दुख अवश्य होता है। तभी कहा है कि नानक दुखिया सब संसार’ अर्थात यहां पूरी तरह से सुखी कोई नहीं है। इन दुखों, परेशानियों और दिक्कतों को दूर करने के लिए ज्योतिषीय उपायों का सहारा लेना इन दुखों को कम करता है और राहत देता है। हम इस लेख में लाल किताब के कुछ उपाय बताने जा रहे हैं जिन्हें अपनाकर आप अपने ग्रहों की अशुभता को कुछ हद तक दूर करने में सफल रहेंगे।

अशुभ ग्रहों के प्रभाव को शांत के उपाय

  • सूर्य ग्रह की शुभता प्राप्ति के लिए नित्य प्रातः सूर्योदय के बाद आदित्य हृदय स्रोत का पाठ करें। पिता की सेवा, सूर्य देव को जल में रोली और लाल रंग के फूल डाल कर अर्घ्य देना शुभ रहता है। इसके अतिरिक्त स्वर्ण-ताम्र, चीनीगुड़ का दान करने से सूर्य ग्रह प्रसन्न होते हैं। बुजुर्गों और पिता तुल्य व्यक्तियों का सम्मान करें।
  • चंद्र ग्रह की अनुकूलता के लिए भगवान शिव का मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप करें। जट्टा वाला नारियल, सफेद, चंदन, बिल्वपत्र तथा सफेद मिठाई का भोग लगाने से शंकर भगवान प्रसन्न होते हैं। चंद्र ग्रह को प्रसन्न करने के लिए सोमवार के व्रत का पालन करें, सफेद वस्त्र पहनें और माता का आशीर्वाद लें।
  • मंगल ग्रह के लिए राम भक्त हनुमान जी का पूजन चमेली के तेल, केसरी, सिंदूर और शुद्ध घी से पूजन करें। छोटे भाइयों से रिश्ते अच्छे रखें।
  • देवी दुर्गा जी और श्री गणेश जी का पूजन अर्चन करने से बुध ग्रह की अशुभता में कमी होती है। हरे रंग के धान्य पक्षियों को डालें। हरे रंग की सब्जियों व फलों को जरूरतमंदों को दान करें। संभव हो तो तोता पालें। बुधवार का व्रत का पालन करें। छोटी कन्याओं की सेवा करें, आशीर्वाद लें।
  • बुजुर्गों की सेवा एवं ब्राह्मणों की सेवा करने से बृहस्पति ग्रह की अशुभता दूर होती है। किसी धर्म स्थल में धार्मिक पुस्तकें दान करें। चने की दाल व केसर का दान किसी जरूरतमंद को करें। साथ ही केसर का तिलक माथे पर लगाएं। कुल पुरोहित का सम्मान करें।
  • शुक्र ग्रह की अशुभता प्राप्त हो रही हो तो महालक्ष्मी के मंत्र का पाठ करें। साफ वस्त्र पहनें। जीवन साथी का सम्मान करें। गौ माता की सेवा और पूजन करने से भी शुक्र ग्रह की शुभता बढ़ती है। किसी गौशाला में चारा दान करें और भीगी हुई चने की दाल गायों को खिलाएं। कन्याओं को खीर खिलाएं।
  • शनि ग्रह के लिए भगवान शनि देव का मंत्र जाप और पूजन करें। पीपल के पेड़ को प्रातः जल दें और सार्यकाल में सरसों के तेल का दीपक जलाएं। किसी जरूरतमंद को काली उड़द की दाल दान करें। शनिवार के व्रत का पालन करें। जहां तक संभव हो ताऊ और चाचा से रिश्ते मधुर बनाए रखें। शनि देव का अभिषेक सरसों के तेल से करें।
  •  राहू ग्रह भगवान भैरो जी के दर्शन और पूजन करने से प्रसन्न होते हैं। देवी सरस्वती जी के मंत्र जाप से भी राहू ग्रह की अशुभता में कमी होती है। खराब बिजली का सामान घर में न रखें। नाना जी से संबंध बेहतर रखें।
  • केतु ग्रह श्री गणेश जी का पूजन करने से प्रसन्न होते हैं। शनिवार के दिन कुत्तों को तेल लगी रोटी खिलाना शुभफलदायक है। किसी धर्मस्थल पर ध्वजा फहराएं।

विशेष

वैदिक ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार शुभ ग्रहों के रत्न पहने जाते हैं, अशुभ ग्रहों की अशुभता में कमी करने के लिए पूजन, मंत्र, व्रत, हवन और रुद्राक्ष धारण किया जाता है। अधिक अशुभता होने पर संबंधित वस्तुओं के दान किए जाते हैं।

-आचार्य रेखा कल्पदेव

ये भी पढ़ें

बेयर ग्रिल्स के बारे में रोचक तथ्य व जानकारी

ब्रिटिश नागरिक एडवर्ड माइकल ग्रिल्स (Edward Michael Grylls, उपनाम: बेयर; प्रसिद्ध नाम: बेयर ग्रिल्स) का जन्म 7 जून 1974 को इंग्लैंड के लंदन में हुआ था। 4 साल की उम्र तक उनका पालन पोषण उत्तरी आयरलैंड के दोनाघाडी कस्बे में हुआ। इसके बाद उनका परिवार आइलेंड ऑफ वाईट(Isle of Wight) के कस्बे बेम्ब्रिज(Bembridge) चला गया।

निजी जिंदगी

वह कंजर्वेटिव राजनीतिज्ञ सर माइकल ग्रिल्स और उनकी पत्नी लेडी सारा “सैली” के बेटे हैं। ग्रिल्स की एक बहन बड़ी है, लारा फॉसेट, जिसने उन्हें Bear(भालू) उपनाम दिया था जब वे मात्र एक सप्ताह के थे।

बेयर ग्रिल्स एक साहसकर्मी, लेखक और टेलीविज़न प्रस्तोता हैं जोकि डिस्कवरी चैनल पर सन 2006 से 2011 तक प्रसारित मैन वर्सस वाइल्ड(Man Vs. Wild) शो के लिए जाने जाते हैं। इंग्लैंड में यह शो Born Survivor: Bear Grylls नाम से प्रसिद्ध है।

छोटी उम्र में शुरुआत

बेयर ग्रिल्स ने छोटी उम्र से ही अपने पिता के साथ चढ़ाई और समुद्री यात्रा करना शुरू कर दिया था। किशोरावस्था में उन्होंने स्काइडाइव करना सीखा और शॉटोकान कराटे में दूसरी डैन ब्लैक बेल्ट हासिल की।

ग्रिल्स ने 2000 में शारा कैनिंग नाइट से शादी की। उनके तीन बेटे हैं।

बेयर ग्रिल्स के जीवन से जुड़े कुछ अन्य रोचक तथ्य

  • ग्रिल्स ने ब्रिटिश स्पेशल एयर सर्विस (21 SAS) में तीन वर्ष(1994-1997) तक सेवाएं दी हैं। आर्मी में काम करने के दौरान उन्होंने मुश्किल हालातों में बचने की नई तकनीक सीखी। उन्हें SAS आर्मी तब छोडनी पड़ी जब केन्या अपनी पोस्टिंग के दौरान वे एक दुर्घटना का शिकार हो गए। एक उड़ान के दौरान उनका पैराशूट खुल नहीं पाया और उनकी निचली रीढ़ बुरी तरह से टूट गयी। 1,600 फीट (500 मी.) की ऊंचाई से वह पीठ के बल नीचे गिरे थे।
  • बेयर ग्रिल्स रॉयल नेवल रिजर्व(Royal Naval Reserve) सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल हैं।
  • 16 मई 1998 को, ग्रिल्स ने पैराशूटिंग दुर्घटना में तीन हड्डीयां टूटने के महज 18 महीने बाद नेपाल में माउंट एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने के अपने बचपन के सपने को हासिल किया। 23 साल की उम्र में वह इस उपलब्धि को हासिल करने वाले सबसे कम उम्र के ब्रिटिश थे।
  • बेयर ग्रिल्स Man Vs Wild शो में Survival Tips के जरिये सुनसान जंगलों, रेगिस्तानों, बर्फीले निर्जन स्थानों और  बीहड़ों में जिन्दा रहने की तकनीक सिखाते हैं।
  • सन 2005 में बेयर ग्रिल्स ने अपने दो साथियों के साथ 7,600 मीटर की ऊंचाई पर गरम हवा के गुब्बारे के नीचे डिनर करके वर्ल्ड रिकाॅर्ड बनाया। इस मुहिम के लिए प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने 200 से अधिक अधिक पैराशूट जंप किए

    गरम हवा के गुब्बारे के नीचे डिनर करते बेयर ग्रिल्स
    गरम हवा के गुब्बारे के नीचे डिनर करते बेयर ग्रिल्स
  • बेयर ग्रिल्स ने बहुत सी अजीबोगरीब चीजें खाई है जैसे कि याक की आँखें, कीड़े को निगल जाना, जानवर के अंडकोष, मरे हुए जानवर का दिल आदि। पीने की बात करें तो पेय द्रव के लिए मरे जानवर के पेट में से बचे अपशिष्ट पदार्थ को निचोड़ना, हाथी के ताजे मल को निचोड़ना, जानवरों के मूत्र को पीना आदि हैरतअंगेज करतब किए हैं। कभी-कभी तो वे अपने मूत्र को पी जाते है.

    पाइथन को काबू करते बेयर ग्रिल्स
    पाइथन को काबू करते बेयर ग्रिल्स
  • 2008 में बेयर ग्रिल्स ने अंटार्कटिका में स्थित विश्व की सबसे उजाड़ और ऐसी चोटियों पर चढ़कर दिखाया जहाँ उनसे पहले कोई भी व्यक्ति नहीं पहुँच पाया था.
  • डिस्कवरी चैनल पर Man vs. Wild शो  2006 में शुरू किया गया था. इस शो को ब्रिटेन में Born Survivor के नाम से प्रसारित किया जाता है तथा अन्यों देशों में जैसे ऑस्ट्रलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, भारत और अमेरिका में इसे Man vs. Wild के नाम से डिस्कवरी चैनल पर प्रसारित किया जाता है.

    बेयर ग्रिल्स अपने क्रू के साथ
    बेयर ग्रिल्स अपने क्रू के साथ
  • ग्रिल्स कराटे में ब्लैक बेल्ट हैं.
  • ग्रिल्स ने साल 2,000 में शारा ग्रिल्स से शादी की और उनके तीन बेटे हैं.
  • ग्रिल्स बहुत-सी ऐसी जगहों पर गए हैं जहाँ उनसे पहले कोई इंसान नही गया है.
  • बेयर ग्रिल्स का कहना है कि उन्‍होंने सबसे गंदी चीज जो खाई है वह थी बकरे के कच्चे अंडकोष(testicles)
  • ग्रिल्स लगभग दो दर्जन किताबें लिख चुके हैं जोकि एडवेंचर,  पर्वतारोहण, माउंट एवरेस्ट, स्कीइंग, जंगल, सरवाइवल, विषम परिस्थितियों से निपटने आदि के बारे में हैं।
  • बेयर ग्रिल्स की कुल पूंजी 20 लाख डॉलर यानि 1 अरब 42 करोड़ 28 लाख रुपये है। बेयर को एक एपिसोड के लगभग 40000 डॉलर यानि 28 लाख 45 हज़ार रुपये मिलते हैं।

दुनिया की नंबर 1 भाषा मैंडरिन के बारे में रोचक तथ्य

मैंडरिन (also read मंडारिन or मंदारिन) भाषा पूरे विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। सिनो-तिब्बतीयन(Sino-Tibbetean) भाषा-परिवार की मंडारिन दरअसल उत्तरी और दक्षिण-पश्चिमी चीन के अधिकांश क्षेत्रों में बोली जाने वाली चाईनीज़ भाषा की अलग-2 शाखाओं का एक समूह है। यह पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना, चीन गणराज्य (ताइवान) और सिंगापुर में एक आधिकारिक भाषा है।

मैंडरिन भाषामैंडरिन के लिए मूल नाम, पुटोंगहुआ(Putonghua), का शाब्दिक अर्थ है “सामान्य भाषण”। हालांकि ताइवान में लोग इसे गुओयू(Guoyu) यानि “राष्ट्रीय भाषा” कहते हैं। ऐतिहासिक रूप से, इसे गुआनहुआ(Guanhua) भी कहा जाता है जिसका अर्थ है “अधिकारियों का भाषण”। चूंकि मंडारिन उत्तरी चीन में अधिक आम है, इसलिए इसे कभी-कभी बेइफंगहुआ (beifanghua; 北方话) yaani “उत्तरी बोली” के रूप में जाना जाता है।

मंदारिन को चीनी अक्षरों (कभी-कभी “हान वर्ण” कहा जाता है) का उपयोग करते हुए लिखा जाता है जोकि एक प्राचीन सचित्र प्रणाली है जिसमें प्रत्येक प्रतीक एक अलग शब्द का प्रतिनिधित्व करता है। इसके दो मुख्य संस्करण हैं – “पारंपरिक” वर्ण जोकि ताइवान, हांगकांग और मकाऊ में उपयोग किए जाते हैं, और “सरलीकृत” वर्ण जो कि चीन, सिंगापुर और मलेशिया में उपयोग किए जाते हैं।

मैंडरिन – हजारों चित्राक्षर!

यह अनुमान है कि मैंडरिन में आपको एक अखबार पढ़ने के लिए 2 हज़ार से 3 हज़ार चित्राक्षरों को सीखने की आवश्यकता होती है एक अच्छा “शिक्षित” चीनी व्यक्ति लगभग 8,000 चित्राक्षरों के बारे में जानकारी रखता है!

मैंडरिन सीखें अब आसानी सेचूंकि चीनी मैंडरिन विश्व में सबसे अधिक बोली जाती है इसे सीखना एक शानदार अनुभव और कौशल साबित हो सकता है। यह किताब चीनी पढ़ना और लिखना आसान बना सकती है। इसमें 2,349 चीनी अक्षर और 5,000+ युग्म दिये गए हैं।

 

यह भी पढ़ें:

Every year, on the 20th of April, the United Nations celebrate World Chinese Language Day. According to the UN, the purpose of this observance is “to celebrate multilingualism and cultural diversity as well as to promote equal use of all six official languages throughout the Organization.”

With that in mind, here are ten facts about the Chinese language (languages, really) for World Chinese Language Day.

Mandarin Chinese, the most common Chinese dialect, is the most widely spoken language in the world.
There are over 800 million native Mandarin speakers. Around the world, one out of five people speaks the language.

Mandarin is the official language of China. (It’s also referred to as Standard Chinese or Putonghua.) But that doesn’t mean Mandarin is the only language in China. Far from it! While the many varieties of spoken Chinese are often called “dialects,” many of them are different enough to be languages in their own right.

When you look at all of the Chinese languages together, the number of speakers becomes even more staggering: about 1.2 billion native speakers, or around 16% of the world’s population.

While spoken Chinese languages and dialects vary across the country, written Chinese has only slight regional variations.
That’s because the Chinese characters are logograms. They represent words or phrases rather than sounds. As such, they transcend most of the variations in speech found across China. That said, there are some dialectal differences in written Chinese, particularly with Cantonese and Hakka.

Mostly, these differences are apparent in informal writing between friends or online. However, written Cantonese is sometimes used in adverts in Hong Kong, especially in Hong Kong’s Metro.

Chinese writing has over 50,000 characters.
That said, only about 20,000 of them are used today. Meanwhile, it only takes about 2-3,000 characters to read a newspaper.

Most Chinese adults can recognise around 8,000 characters without pulling out a dictionary.

Written Chinese is over 3,000 years old.
The oldest Chinese characters that have been found to date are fragments of characters carved into animal bones and turtle shells from the Shang Dynasty. These bones are called “oracle bones,” and they were used for divination. Soothsayers carved questions into the bones and then burnt them until they cracked. The pattern of the cracks was believed to indicate the answer.

Simplified Chinese is used in mainland China and Singapore.
Simplified Chinese was developed by the Chinese government in the 1950s to encourage literacy.

However, Hong Kong never quite got with the program. They still use the more complicated traditional Chinese character set. Otherwise, formal written Cantonese is quite similar to written Mandarin. However, there may also be some differences in grammar and vocabulary if the document in question is written in informal, colloquial Cantonese.

The Chinese languages are tonal languages.
Mandarin is a tonal language, as are the other languages and dialects used in China. Mandarin has four basic tones and then a fifth neutral tone. Be careful, as getting the tone wrong can change the meaning of a word in ways you wouldn’t expect!

The first Chinese Language Day was held on 12 November 2010.
The date was moved to 20 April in 2011. The 20th of April corresponds with the “Rain of Millet” (Guyu) in the Chinese calendar. As such, it celebrates the legendary Chinese historian Cangjie, who is credited with inventing the Chinese characters. According to the tales, when he did so, “the deities and ghosts cried and the sky rained millet.”

The myths also say he had four eyes and four pupils, but take that with a grain of salt.

Chinese became an official UN language in 1946.
However, it wasn’t used as a working language until 1973 for the General Assembly and 1974 for the UN Security Council.

The following English words come from Chinese:
Brainwashing: a literal translation of the Chinese 洗腦
Catsup: A pidgin English version of the Cantonese 茄汁, which means “tomato sauce.”
Tea: An Anglicised version of the Hokkien 茶
Tycoon: A Sino-Japanese word that means “great nobleman.”
Typhoon: comes from either Hokkien, Cantonese or Mandarin, all of which have similar pronunciations.
Chinese is one of the most difficult languages to learn.
Chinese is one of the most important languages for businesses and individuals alike. Unfortunately, it’s also one of the hardest languages for English speakers to learn.

For example, according to the United States Foreign Service Institute, it takes most English speakers over 2,200 hours of time in a classroom to learn Chinese.

Are you looking for Chinese translation services? Read our beginner’s guide here!

At K International, we can help with quality, reliable Chinese translations that you can feel comfortable with. We’ll ensure the translation is exactly what you need to reach your target audience. Plus, we have an in-house design team ready and waiting to smooth the transition from one language to another. Contact us today – we’d love to hear from you!

कोबरा सांप के बारे में रोचक तथ्य और जानकारी

नाग (इंग्लिश Naja, इंडियन कोबरा, भारतीय नाग) भारतीय उपमहाद्वीप का एक जहरीला सांप है। यद्यपि इसका जहर इंडियन क्रेट जितना घातक नहीं है और यह रसेल्स वाइपर जैसा आक्रामक नहीं है, किन्तु भारत में सबसे अधिक लोग इस सर्प के काटने से मरते हैं क्योंकि यह सभी जगह बहुतायत (अधिक मात्रा) में पाया जाता है। चूहे इसका मुख्य आहार है जिसके कारण यह अक्सर मानव बस्तियों के आसपास, खेतों में एवं शहरी इलाकों के बाहरी भागों में अधिक पाया जाता है।

नाग यानि कोबरा विषैले सांपों की उन प्रजातियों में से एक है जो गर्दन की पसलियों को फैला कर फन या हुड (hood) बनाते हैं। यद्यपि फन कोबरा सांप की विशेषता है लेकिन इसकी विभिन्न प्रजातियां निकटता से संबंधित नहीं हैं। वैसे कोबरा दक्षिणी अफ्रीका से लेकर दक्षिणी एशिया तक और दक्षिण पूर्व एशिया के द्वीपों में पाए जाते हैं।

कोबरा के जहर का कहर

कोबरा एक अंत्यन्त ज़हरीला सांप है जिसके अगले छोटे विष-दाँत जहर उगलते हैं। भारतीय नाग में सिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन (synaptic neurotoxin) और कार्डिओटोक्सिन (cardiotoxin) नामक घातक जहर में शक्तिशाली न्यूरोटॉक्सिन जहर पाया जाता है। यह जहर शिकार के तंत्रिका तंत्र को पंगु बना देता है शरीर को लकवा मार जाता है। इसके काटने से मुंह से झाग निकलने लगता है और आँखों की रोशनी धुंधला जाती है। समय पर उपचार न मिलने पर इसका शिकार अंधा हो जाता है और अंतता मर जाता है।

एक वयस्क नाग की लंबाई 1 मीटर से 1.5 मीटर (3.3 से 4.9 फिट) तक हो सकती है। श्रीलंका की कुछ प्रजातियां लगभग 2.1 मीटर से 2.2 मीटर (6.9 से 7.9 फिट) तक हो जाती हैँ लेकिन यह दुर्लभ है।

अधिकतर लोग कोबरा (नाग) और किंग कोबरा (नागराज) को एक ही सांप समझते हैं लेकिन यह सच नहीं है। नागराज(king cobra) दरअसल भारतीय उपमहाद्वीप में पाये जाने वाला एक सबसे लंबा ज़हरीला सांप है जो मूलरूप से नाग(cobra) प्रजाति से संबन्धित नहीं है।

आगे पढ़ें: इंडियन क्रेट – भारत का सबसे ज़हरीला व घातक सांप

इंडियन क्रेट, भारत का सबसे घातक साइलेंट किलर

इंडियन क्रेट सापों की एक जहरीली प्रजाति है जो भारतीय उपमहाद्वीप में पायी जाती है। भारत के सबसे जहरीले चार सर्पों में से यह सबसे अधिक जहरीला सर्प है। Bungarus fasciatus प्रजाति का इंडियन करैत, कॉमन क्रेट या ब्लू क्रेट के नाम से भी जाना जाता है। सफ़ेद धारियों वाला यह सांप भारत, बांग्लादेश एवं दक्षिणपूर्व एशिया में पाया जाता है।

इंडियन क्रेट सापों की एक जहरीली प्रजाति हैइंडियन क्रेट की औसत लंबाई 0.9 मीटर (3.0 फीट) होती है, लेकिन यह 1.75 मीटर (5 फीट 9 इंच) तक बढ़ सकते हैं। नर करैत की लंबाई अधिक होती है। यह सांप आमतौर पर काले या नीले रंग का होता है, और इसमें लगभग 40 पतली सफ़ेद धारियाँ होती हैं जो शुरुआत में नजर नहीं आती लेकिन इसके बड़े होने के साथ-साथ गहरी होती जाती हैं।

इंडियन क्रेट का भोजन और दिनचर्या

[adinserter block=”35″]क्रेट के मुख्य भोजन में अन्य सांप, ब्लाईंड वर्म(blind worm; Typhlops प्रजाति का सांप) और क्रेट प्रजाति के सांप विशेषकर छोटी उम्र के सांप शामिल होते हैं। यह छोटे स्तनधारियों और कीड़ों, जैसे, चूहे, घोंघे, छिपकली, बिच्छू और मेंढक आदि को भी खाता है। वहीं नन्हें और युवा क्रेट सांप आर्थ्रोपोडस(रेंगने वाले छोटे कीड़े) को अपना शिकार बनाते हैं। क्रेट सांप दिन के समय सुस्त और शांत रहते हैं जबकि रात के समय यह ज्यादा सक्रिय और आक्रामक हो जाते हैं। आमतौर पर यह काटने में रुचि नहीं रखता लेकिन खतरा महसूस होने पर यह आक्रामक हो जाता है और अपने डंक के द्वारा शिकार के शरीर में जहर की अच्छी-ख़ासी मात्रा पहुंचा देता है।

इसलिए कहा जाता है साइलेंट किलर

[adinserter block=”36″]यद्यपि क्रेट निशाचर हैं, इसलिए दिन के उजाले के दौरान मनुष्यों का इससे सामना कम ही होता है; डसने की घटनाएं मुख्य रूप से रात में होती हैं। इंडियन करैत के दांत बेहद बारीक होते हैं और इसके काटने पर कई बार न के बराबर दर्द होता है। इस कारण व्यक्ति को पता ही नहीं चल पाता कि उसे सांप ने काटा है जिस कारण इसके इलाज में देरी हो जाती है। इस खासियत के कारण इस सांप को साइलेंट किलर स्नेक भी कहा जाता है। कॉमन क्रेट के जहर में शक्तिशाली न्यूरोटॉक्सिनस होते हैं, जिनसे मांसपेशियों में लकवा हो जाता है। इसके विष में प्रीसानेप्टिक और पोस्टसिनेप्टिक न्यूरोटॉक्सिन होते हैं, जो आमतौर शिकार के सिनैप्टिक क्लेफ्ट (सूचना-प्रसारण के बिंदु) को प्रभावित करते हैं।

इंडियन क्रेट द्वारा काटने का परिणाम

[adinserter block=”35″]इसके काटने पर आमतौर पर, व्यक्ति को प्रगतिशील पक्षाघात(progressive paralysis) के साथ, पेट में गंभीर ऐंठन की शिकायत होती है। क्रेट के काटने के बाद उपचार न मिलने पर लगभग चार से आठ घंटे में व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। मृत्यु का कारण सामान्य सांस लेने में रुकावट अर्थात् घुटन होती है।

इंडियन क्रेट सापों की एक जहरीली प्रजाति है

काटने के लक्षण

काटने के कुछ लक्षणों में शामिल हैं: काटने के एक से दो घंटे में चेहरे की मांसपेशियों का कसना; देखने या बात करने में असमर्थता आदि। क्रेट के काटने के बाद उपचार न मिलने पर मृत्यु होने की दर 70 से 80 प्रतिशत दर्ज़ की गयी है।

ब्रह्माण्ड से जुड़े कुछ रोचक तथ्य…!!

ब्रह्माण्ड का जन्म एक महाविस्फोट के कारण हुआ है. लगभग बारह से चौदह अरब वर्ष पूर्व संपूर्ण ब्रह्मांड एक परमाण्विक इकाई के रूप में अति-संघनित (compressed) था. उस समय, समय और स्थान जैसी कोई वस्तु अस्तित्व में नहीं थी. लगभग 13.7 अरब वर्ष पूर्व इस महाविस्फोट से अत्यधिक ऊर्जा (energy) का उत्सजर्न (release) हुआ और हर 10-24 सेकंड में यह धमाका दोगुना बड़ा होता गया. यह ऊर्जा इतनी अधिक थी कि इसके प्रभाव से आज तक ब्रह्मांड फैलता ही जा रहा है. इस धमाके के कारण 3 लाख साल बाद पूरा ब्रह्मांड हाइड्रोजन और हीलियम गैस के बादलों से भर गया. इस धमाके के 3 लाख 80 हज़ार साल बाद अंतरिक्ष में सिर्फ फोटोन ही रह गए. इन फोटोन से तारों और आकाशगंगाओं का जन्म हुआ, और बाद में जाकर ग्रहों और हमारी पृथ्वी का जन्म हुआ. यही महाविस्फोट यानी बिग-बैंग का सिद्धांत है.

आइये जानें ब्रह्मांड से जुड़े ऐसे ही रोचक तथ्यों के बारे में…

  • क्या आपको पता है कि जो वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड के बारे में अध्ययन करते है, उसे विज्ञान में खगोलीय विज्ञान (Astronomical) कहा जाता है.
  • खगोल विज्ञान, विज्ञान की एक बहुत ही रोचक और रहस्यमय शाखा माना गया है.
  • ब्रह्माण्ड में सभी ग्रह, तारे, गैलेक्सियाँ (Galeksiya), गैलेक्सियों के बीच के अंतरिक्ष की अंतर्वस्तु, परमाण्विक कण, और सारा पदार्थ और सारी ऊर्जा शामिल हैं.
  • खगोल विज्ञान में बहुत ही दूर स्थित आकाशीय पिंडों का अध्ययन किया जाता है, जिसे समझना बहुत मुश्किल हैं.
  • पिनव्हील गैलेक्सी (Pinwheel Galaxy) को मेसियर 101 भी कहते हैं. पिनव्हील गैलेक्सी, पृथ्वी से 5 करोड़ प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है. यह तस्वीर इस आकाशगंगा की सबसे ज़्यादा विस्तृत तस्वीर है और इसे हब्बल टेलिस्कोप (Hubble Telescope) ने लिया है.
  • खगोल विज्ञान से जुड़े कई सिद्धांत बहु प्रतलित है. जैसे के विशेष तथा साधारण सापेक्षतावाद.
  • ब्रह्माण्ड में अनगिनत भौतिक वस्तुएं मौज़ूद हैं. इसमें ही अरबों तारे, सौर मण्डल और आकाशगंगाएं है, पर यह सिर्फ सारी वस्तुओं का 25 प्रतिशत ही है.
  • ब्रह्माण्ड को मुख्यत इसे तीन अक्ष में मापा जाता है, जैसे कि लंबाई, चौड़ाई और गहराई. तीनो अक्षों को गणितीय शब्दों में x अक्ष, y अक्ष और z अक्ष कहा जाता है.
  • अगर नासा एक पंक्षी को अंतरिक्ष में भेजे, तो वह उड़ नहीं पाएगा और जल्दी ही मर जाएगा, क्योंकि वहां पर उड़ने के लिए बल ही नहीं है.
  • श्याम पदार्थ (dark matter) ब्रह्माण्ड में पाया जाने वाला ऐसा पदार्थ है, जो दिखता नहीं, पर इसके गुरुत्व का प्रभाव ज़रूर पाया गया है. तभी इसे श्याम पदार्थ का नाम दिया गया है.
  • अगर आप 1 मिनट में 100 तारे गिन लें, तो आप 2000 साल में एक पुरी आकाशगंगा गिन देगें.
  • ब्रह्मांण्ड में कुछ आकाशगंगाएं इतनी दूर होती हैं कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने में लाखों साल का समय लेता है.
  • महाविस्फोट सिद्धांत (Big Bang Theory) में बताया गया है कि ब्रह्माण्ड 15 खरब साल में 93 खरब प्रकाश वर्ष तक फैल चुका है.
  • क्या आपको पता है कि सितारे, तारे और उपग्रह सभी एक दूसरे को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं.
  • ब्रह्मांड चारों तरफ से जल, बादल, वायु और आकाश से घिरा हुआ है.
  • आकाशगंगा का व्यास लगभग लाख प्रकाशवर्ष है और इसका प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर होता है.
  • हमारी आकाशगंगा (Galaxy) का नाम मंदाकिनी है, हमारा सौर मण्डल इसी आकाशगंगा में है.
  • ब्रह्माण्ड में द लार्ज मेगालीनिक कलाउड आकाशगंगा (The Large Cloud galaxy Megalinik) सभी आकाशगंगाओं से सबसे ज़्यादा चमकदार है.

ब्रह्मांड का इतिहास एक मिनट की वीडियो में

Also read:-

जानिए कब और क्यों मनाई जाती है हरियाली अमावस्या

श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्या को हरियाली अमावस्या के नाम से जाना जाता है। हरियाली के आगमन के रूप में हरियाली अमावस्या पर्व को मनाते हैं। हरियाली को समर्पित यह त्योहार इस वर्ष 1 अगस्त 2019 को है। प्रकृति और पितृ पर्व हरियाली अमावस्या पर इस बार गुरुपुष्य नक्षत्र के साथ अमृतसिद्धि व सर्वार्थसिद्धि योग का संयोग बन रहा है। सालों बाद दिव्य संयोग में आने वाली अमावस्या पर पितृ कर्म व पौध रोपण करना श्रेष्ठ रहेगा। इस बार हरियाली अमावस्या पर 6 घंटे तक पुष्य नक्षत्र का योग रहेगा।

श्रावण मास में महादेव के पूजन का विशेष महत्व है। इसीलिए हरियाली अमावस्या पर विशेष तौर पर शिवजी का पूजन-अर्चन किया जाता है। यह अमावस्या पर्यावरण के संरक्षण के महत्व व आवश्यकता को भी प्रदर्शित करती है। भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। पर्यावरण को संरक्षित करने की दृष्टि से ही पेड़-पौधों में ईश्वरीय रूप को स्थान देकर उनकी पूजा का विधान बताया गया है।

इस दिन सभी लोग वृक्ष पूजा करने की प्रथा के अनुसार पीपल और तुलसी के पेड़ की पूजा करते हैं। पीपल के वृक्ष की पूजा एवं फेरे किए जाते हैं तथा मालपूए का भोग बनाकर चढ़ाए जाने की शुभ परंपरा है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में पर्वत और पेड़-पौधों में भी ईश्वर का वास बताया गया है। पीपल में त्रिदेवों का वास माना गया है। आंवले के वृक्ष में भगवान श्री लक्ष्मीनारायण का वास माना जाता हैं। हरियाली अमावस्या पर वृक्षारोपण का अधिक महत्व है।

अमावस्या के दिन कई शहरों में हरियाली अमावस्या के मेलों का भी आयोजन किया जाता है। इस कृषि उत्सव को सभी समुदायों के लोग आपस में मिलकर मनाते हैं। एक-दूसरे को गुड़ और धानी की प्रसाद देकर मानसून ऋतु की शुभकामना देते हैं।हरियाली अमावस्या पर क्या करें:-

  • इस दिन स्नानादि करने के पश्तात पीपल अथवा तुलसी के वृक्ष की पूजा कर परिक्रमा करें।
  • इस दिन अपने हल और कृषि यंत्रो का पूजन करने का रिवाज है।
  • गेहूं, ज्वार, चना, मक्का, बाजरा की इस दिन प्रतीक स्वरूप कुछ भाग पर बुवाई करें।
  • इस दिन अपने पितरों की आत्मा को शांति के लिए हवन पूजा पाठ दान दक्षिणा देने का विशेष महत्व है।
  • भूखे और गरीब लोगों को दान-पुण्य के रूप में कुछ भेंट दें।
  • यदि आप सर्पदोष, शनि की दशा और प्रकोप व पितृपीड़ा से परेशान हो, तो हरियाली अमावस्या के दिन शिवलिंग पर जल और पुष्प चढ़ाएं।
  • वेदों के अनुसार आरोग्य प्राप्ति के लिए नीम का पेड़, सुख की प्राप्ति लिए तुलसी का पौधा, संतान प्राप्ति के लिए केले का वृक्ष और धन सम्पदा के लिए आंवले का पौधा लगाएं।
  • स्वच्छ पर्यावरण के लिए बरसों से आ रही प्रथा को निभाने के लिए एक पौधा ज़रुर लगाएं।

यह भी पढ़ें :-

हाथ में मौली धागा बाँधने से होने वाले लाभ

अक्सर पूजा-पाठ करते समय पंडित हमारी कलाई पर लाल रंग का धागा या मौली बांधते हैं. लेकिन हम में से बहुत कम लोग जानते है कि पंडित हमारे हाथों में मौली धागा क्यों बांधते है. हिन्दू धर्म में हर धार्मिक कार्यक्रम में धागा बांधने की विधि होती है. घर में जब भी पूजा होती है, तो पंडित सभी के हाथों में लाल रंग का धागा बांधते हैं. धागा बांधने का भी एक विशेष विधान होता है. इसे यूं ही जब मन करे तब नहीं बांधना चाहिए. आइए जानें मौली धागे से जुड़े कुछ रहस्य, जिन्हें आज विज्ञान ने भी सच साबित किया है.

  • मौली धागा कोई आम धागा नहीं होता हैं. यह विशेष रूप से कच्चे सूत से तैयार किया जाता है. यह कई रंगों से बना होता है, जैसे कि, लाल, काला, पीला, या नारंगी आदि.
  • मौली धागे को हाथ, गले, बाजू और कमर पर बाधा जाता है. धागा बांधने से आपको भगवान ब्रह्मा, विष्णु व् महेश तथा तीनों देवियों लक्ष्मी, पार्वती व् सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है.
  • धागा बांधने से आप हमेशा बुरी नज़र से बचे रहेंगे. मौली धागे को हाथों में बांधने से स्वास्थ्य में भी बरकत होती है.
  • मौली धागे को कलाई पर बांधने से शरीर में वात, पित्त तथा कफ के दोष में सामंजस्य बैठता है.
  • धागा बांधने से रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और लकवा जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है. शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है, इसलिए मौली धागे को हाथ में बांधने से व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक रहता है.
  • शास्त्रों के अनुसार, पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में धागा बांधना चाहिए. विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में धागा बांधने का नियम है. धागा बंधवाते समय जिस हाथ में धागा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए.
  • अगर पर्व के अलावा किसी अन्य दिन धागा बंधवाना चाहते है, तो मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है.
  • यह माना जाता है कि जब भगवान विष्णु ने ब्राह्मण का अवतार धारण किया था, तो उन्होंने राजा बाली के हाथ में लाल रंग का धागा बाधा था. तभी से ही हाथों में मौली धागा बंधवाया जाता है.

Also read:-

Google ने भारत की पहली महिला विधायक मुथुलक्ष्मी रेड्डी पर बनाया डूडल

Google भारत की पहली महिला विधायक डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी के 133वीं जयंती को एक खास Doodle के साथ सेलिब्रेट कर रहा है। डॉ. रेड्डी एक शिक्षक, सर्जन और समाज सुधारक थीं। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सुधार में लगाया। उन्हें देश की पहली महिला विधायक होने का गौरव प्राप्त है। वह एक ऐसी महिला थीं, जिन्होंने अपने समय जो किया, वह किसी महिला के लिए करना असंभव था। आइए आज जानते हैं डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी के बारे में कुछ बातें।

कौन थीं मुथुलक्ष्मी

उनका जन्म 30 जुलाई 1886 में तमिलनाडु (तब मद्रास) में हुआ था। मुथुलक्ष्मी को भी बचपन से ही पढ़ने के लिए काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। मुथु के पिता एस नारायण स्वामी चेन्नई के महाराजा कॉलेज के प्रिंसिपल थे। मुथु की मां चंद्रामाई ने समाज के तानों के बावजूद उन्हें पढ़ने के लिए भेजा। उन्होंने भी मां-बाप को निराश नहीं किया और देश की पहली महिला डॉक्टर बनीं।

डॉ. रेड्डी को सामाजिक असमानता, लिंग आधारित असमानता और लोगों को पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के प्रयासों के लिए भी जाना जाता हैं। वह 1912 में देश की पहली महिला डॉक्टर बनी और मद्रास के सरकारी मातृत्व अस्पताल में पहली महिला सर्जन बनीं।

कम उम्र में होने वाली थी शादी

माता-पिता उनकी शादी छोटी उम्र में ही कर देना चाहते थे, लेकिन डॉ. रेड्डी ने इसका विरोध करते हुए पढ़ाई पूरी करने की बात कही। शुरुआती शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए मद्रास मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। इस कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाली पहली महिला छात्र भी डॉ. रेड्डी ही थीं। यही वह कॉलेज था, जहां उनकी दोस्ती एनी बेसेंट और सरोजिनी नायडू से हुई।

कैंसर अस्पताल की शुरुआत

डॉ. रेड्डी को अपनी बहन की कैंसर से हुई मृत्यु का गहरा सदमा लगा था। इसके बाद उन्होंने साल 1954 में चेन्नई में अद्यार कैंसर इंस्टिट्यूट की शुरुआत की। यह कैंसर अस्पताल अभी भी दुनिया के सबसे सम्मानित कैंसर अस्पतालों में से एक है। यहां हर साल 80,000 से ज़्यादा कैंसर पीड़ितों का इलाज किया जाता है।

किया राजनीति का रुख

कुछ ही सालों में डॉ. रेड्डी ने मेडिकल करियर को छोड़ राजनीति का रुख किया। मद्रास विधानसभा की पहली महिला सदस्य बनने के बाद उन्होंने कम आयु में लड़कियों की शादी रोकने के लिए नियम बनाए। साथ ही उन्होंने समाज में महिलाओं के शोषण के खिलाफ भी अपनी आवाज को बुलंद किया।

पद्म भूषण से सम्मानित

साल 1956 में उन्हें देश की सेवा करने के लिए भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया। समाज की बेहतरी के लिए अपने जीवन को समर्पित करने वाली डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी का 22 जुलाई सन् 1968 को चेन्नई में निधन हो गया था। तमिलनाडु में हर साल उनकी याद में 30 जुलाई को अस्पताल दिवस मनाया जाता है।

यह भी पढ़ें :-

दुनिया के 10 शक्तिशाली युद्ध स्मारक

युद्ध में शहीद हुए लोगों की याद में युद्ध स्मारक बनाए जाते हैं और शहीद हुए सैनिकों का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज़ होता है। आज हम आपको दुनियाभर के कुछ ऐसे स्मारकों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें किसी न किसी युद्ध में मारे गए लोगों की याद में बनाया गया है।

9/11 मेमोरियल

9/11 मेमोरियल अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्थित है। 9 सितंबर 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले में 3000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे। उन लोगों की याद में यह स्मारक स्थल 11 सितंबर, 2011 को खोला गया था।

होलोकॉस्ट मेमोरियल

होलोकॉस्ट मेमोरियल जर्मनी की राजधानी बर्लिन में है और इसे 10 मई 2005 को खोला गया था। जर्मनी के तानाशाह ए़डोल्फ हिटलर ने अपने शासनकाल में 5 लाख सोवियत यहुदियों की नृशंस हत्या कर दी थी। यह स्मारक उन्हीं की याद में बनाया गया है।

मरीन कोर युद्ध स्मारक

मरीन कोर युद्ध स्मारक अमेरिका के वर्जीनिया में स्थित है। इसका निर्माण सन 1775 के युद्ध में मारे गए अमेरिकी समुद्री वाहिनी के सैनिकों को सम्मानित करने के लिए किया गया था।

विमी रिज

यह स्मारक 1917 में हुए विमी रिज के युद्ध में शहीद हुए कनाडा के दस हज़ार से भी ज़्यादा सैनिकों की याद में बनाया गया था। खास बात ये है कि कनाडा का यह युद्ध स्मारक स्थल फ्रांस में बना है और यह स्मारक 26 जुलाई, 1936 को खोला गया था। इस स्मारक को कनाडा के नेशनल विमी मेमोरियल के तौर पर भी जाना जाता है।

राष्ट्रीय स्मारक

यह स्मारक कनाडा में स्थित है और इसे 21 मई 1939 को खोला गया था। इस स्मारक को विभिन्न युद्धों में मारे गए कनाडाई सैनिकों की याद में बनाया गया था। मुख्य रूप से इसे पहले विश्वयुद्ध में मारे गए कनाडाई लोगों की याद में भी बनाया गया था।

तजेन्तिस्ते स्मारक

तजेन्तिस्ते स्मारक हर्जेगोविना और बोस्निया में स्थित है और इसे सन 1947 में बनाया गया था। इस स्मारक को सुत्जेस्का युद्ध में मारे गए 7500 युगोस्लावियन सेना के जवानों को सम्मानित करने के के लिए बनाया गया था।

कोरियाई युद्ध स्मारक

कोरियाई युद्ध स्मारक आर्लिंग्टन में स्थित है। इस स्मारक का निर्माण सन 1995 में किया गया था। इसे कोरियाई युद्ध में मारे गए अमेरिका और सयुंक्त राष्ट्र सेना के छह लाख से भी ज़्यादा सैनिकों की याद में बनवाया गया था।

प्राग राष्ट्रीय स्मारक

यह स्मारक चेक गणराज्य के प्राग में स्थित है और इसे 1948 से 1989 के बीच साम्यवाद युग के पीड़ितों की याद में बनाया गया था। इस स्मारक में साम्यवाद के राजनैतिक कैदियों को श्रद्धांजलि दी गई है।

वियतनाम युद्ध स्मारक

वियतनाम युद्ध स्मारक अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में स्थित है। यह स्मारक 2 एकड़ में फैला है और इसे 13 नवंबर 1982 में खोला गया था। वियतनाम युद्ध में भाग लेने वाले अमेरिकी सशस्त्र बलों को सम्मानित करने के लिए इस स्मारक का निर्माण किया गया था।

चोइंग

यह स्मारक कंबोडिया में स्थित है और इस स्मारक का निर्माण 1998 में किया गया था। इस स्मारक को खमेर रूज शासन के दौरान मारे गए दस लाख से भी ज़्यादा लोगों की याद में बनाया गया था।

यह भी पढ़ें :-