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क्रूर तरीकों से दी जाती थी प्राचीन काल में मौत!

आज हम आपको प्राचीन काल में क्रूर, बर्बर, अमानवीय तरीकों से दी जाने वाली मौत के बारे में बताने जा रहे हैं। जहां मौत का नाम सुनते ही डर लगने लगता है, वहां मौत देने के इन क्रूरतम तरीकों के बारे में जानकर आपका दिल दहल जाएगा। प्राचीन काल में अपराधियों और दुश्मनों को मौत देने के लिए ऐसे तरीके इस्तेमाल किए जाते थे, जिनमें आदमी तिल-तिल करके करोड़ों बार मरता था। प्राचीन काल के इंसानी इतिहास में मौत देने के इनसे ज़्यादा क्रूर, बर्बर, अमानवीय, हिंसक और असहनीय तरीके नहीं हो सकते।

नाव में नरक का अहसास

यह सज़ा प्राचीन फारस (Iran) में दी जाती थी। इसमें अपराधी को एक नाव में बांध दिया जाता था और उसे जबरदस्ती ढेर सारा दूध और शहद पिलाया जाता, ताकि उसे दस्त शुरू हो जाएं। फिर उसके शरीर पर भी दूध-शहद डाल दिया जाता। नाव जंगल के बीच एक तालाब में रहती थी। दूध और शहद कई तरह की चींटियों, कीड़े-मकोड़ों को आकर्षित करता था। इंसान के दस्त से भी ऐसे जीव वहां बड़ी तादाद में जुट जाते। करोड़ों की संख्या में ये कीड़े-मकोड़े उस इंसान को काटने लगते। धीरे-धीरे उसका शरीर सड़ने-गलने लगता। वह भूख-प्यास से बेहाल हो जाता। इस तरह अंतत: तड़प-तड़प कर उसकी मौत हो जाती।

हाथी के पैरों तले रौंदवाना

यह मौत की सज़ा प्राचीन काल में साउथ एशिया और साउथ ईस्ट एशिया में दी जाती थी। इंसान को हाथी के पैरों तले कुचलवाकर मरवा दिया जाता था। यह बड़ी भयंकर मौत होती थी।

तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा देना

यह सज़ा 19वीं सदी तक भारत में प्रचलित थी। अंग्रेजों ने कई हिंदुस्तानियों को इस तरह तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया। इस सज़ा में व्यक्ति के तत्काल चीथड़े उड़ जाते थे और वह तड़पता नहीं था। हमारे ऐसे कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हंसते-हंसते तोप के मुंह पर बंधे थे।

इंसान को आरी से चिरवाना

यह सज़ा मध्यकाल में चीन में प्रचलित थी। इसमें व्यक्ति को सीधा खड़ा करके या उल्टा लटकाकर, दोनों तरह से आरी से चीरा जाता था। सीधा खड़ा करके इंसान को बीच से काट दिया जाता था, जिससे उसकी तुरंत मौत हो जाती। लेकिन उल्टा लटकाने वाला तरीका ज़्यादा दर्दनाक होता था, क्योंकि तब शरीर लिंग से लेकर पेट तक चिर जाता, लेकिन दिमाग एक्टिव रहता था, इसलिए व्यक्ति को भयंकर दर्द का अहसास होता था।

घोड़ों से बांधकर खिंचवाना

यह सज़ा रोमन साम्राज्य में दी जाती थी। इसमें व्यक्ति के हाथ-पैरों को चारों दिशाओं में चार घोड़ों से बांध दिया जाता था। इसके बाद घोड़े विपरीत दिशाओं में ताकत लगाकर चलने लगते। इससे व्यक्ति के हाथ-पैर शरीर से अलग हो जाते और बेहद दर्द और शॉक से उसकी मौत हो जाती। इसके बाद घोड़ों के पीछे बंधे हाथ-पैर शहर में घुमाए जाते, ताकि बाकी लोग डरें।

खौलते कड़ाहे में बिठाकर मारना

यह सज़ा बहुत देशों में प्रचलित थी। इसके लिए कड़ाहे में पानी या तेल भरा जाता और व्यक्ति को बिठाकर नीचे से आग लगा दी जाती। तेल या पानी धीरे-धीरे गर्म होता और व्यक्ति की तड़प बढ़ती जाती। इसका प्रयोग मारने के साथ-साथ टॉर्चर करने और राज़ उगलवाने के लिए भी होता था।

लिंग ची कहलाने वाले क्रूर तरीका

चीन में 1905 तक लिंग ची कहलाने वाले इस क्रूर तरीके से मौत की सज़ा दी जाती थी। लिंग ची के तहत सबसे दुष्ट प्रकार के क्रिमिनल्स को चौराहे पर बांधकर तेज़ धार वाले चाकू से जगह-जगह काटा जाता था। पहले उसकी छाती और जांघों का मांस काटा जाता और फिर नाक, कान, उंगलियां, लिंग आदि काटे जाते। इस प्रक्रिया में सैकड़ों बार चाकू चलाया जाता। मांस के लोथड़े निकाले जाते। इतना सब होने के बाद भी अपराधी मरता नहीं था, तड़पता रहता, तो चाकू से उसका दिल निकाल लिया जाता। अगर शासक को किसी अपराधी पर थोड़ी-बहुत दया आ जाती, तो लिंग ची से पहले उसे अफीम पिला दी जाती थी, ताकि उसे दर्द का अहसास कम हो।

भूखे शेरों के सामने डाल देना

प्राचीन रोम में एम्फीथिएटर और कोलोशियम बनाए गए थे। वहां मनोरंजन की एक्टिविटीज़ होती थीं। इसके लिए अपराधियों को तरह-तरह से मारा जाता था। उन्हें भूखे शेरों के सामने डाल दिया जाता था। ऊपर से बहुत सारे लोग देखते और तालियां बजाते। नीचे शेर उस अपराधी को नोंच डालते।

भट्ठी पर तड़पा-तड़पा कर मारना

यह आग में जलाने से भी ज़्यादा क्रूर है, क्योंकि इसमें धीरे-धीरे तड़पकर मौत होती थी। इसमें भट्ठी जैसी संरचना पर व्यक्ति को लिटाकर नीचे से कोयले जलाए जाते थे। जब कोयलों की आंच बढ़कर इंसान के शरीर तक पहुंचती, तो वह धीरे-धीरे गर्म होकर जलता था।

सांड के भीतर ठूंसकर भूंजना

यह सज़ा एथेंस में दी जाती थी। इसके तहत आदमी को एक मैटल के बने खोखले सांड के भीतर ठूंसकर ढक्कन बंद कर दिया जाता था। उसके बाद नीचे आग जला दी जाती थी। आग में मैटल धीरे-धीरे तपकर लाल हो जाता और अंदर बंद आदमी तड़प-तड़प कर मरता। सांड का मुंह खुला रहता था, जिससे होकर इंसान की चीखें बाहर तक आती रहतीं थी।

बढ़ते बांसों पर बांधकर मारना

प्राचीन काल में यह सज़ा एशिया में प्रचलित थी। बांस जब बढ़ते हैं, तो उनके सिरे नुकीले होते हैं। इन पर लिटाकर अपराधी को बांध दिया जाता था। बांस धीरे-धीरे व्यक्ति के शरीर को छेदते हुए बढ़ते। यही नहीं, वह जल्दी मरे नहीं, इसके लिए अपराधी को खाना-पानी भी दिया जाता था। इससे व्यक्ति की बहुत लंबे समय में तड़प-तड़प कर मौत होती थी।

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