इस लिए लड़कियों से कम भावुक होते हैं लड़के

जैसे कि हम सब जानते है कि ज्यादातर लड़कियों की तुलना में लड़कों का ह्रदय ज्यादा कठोर माना जाता है। लड़कियां लड़कों से ज्यादा भावुक होतीं हैं, और वह छोटी-छोटी बातों पर ही रोने लग जातीं हैं, जबकि लड़के मज़बूत दिल के होते हैं. लेकिन, क्या आपको पता है कि यह दिल का नहीं, दिमाग का मामला होता है। एक नए शोध के अनुसार लड़के अपनी अलग दिमागी संरचना के कारण ही लड़कियों की तुलना में कम भावुक होते हैं।

स्विट्ज़रलैंड की यूनिवर्सिटी बासेल के नौरा मारिया ने बताया है कि, उनको एक रिसर्च से पता चला है कि, किसी व्यक्ति के स्वभाव में भावहीनता व कठोरता का सीधा संबंध दिमाग की अलग-अलग सरंचनाओं से होता है। इस शोध से यह भी पता चला है कि, सामान्य तौर पर विकसित होते लड़कों के दिमाग में एंटीरियर ‘ग्रे मैटर’ ज्यादा होता है|

इससे पहले हुए एक शोध में भी यही कहा गया था. कि, लड़कों और लड़कियों के भावनात्मक स्तर में अंतरका संबंध दिमाग से है। इस शोध के अनुसार लड़कों और लड़कियों के दिमाग में नसों की बनावट अलग-अलग होती है, इसीलिए उनमें चीजों को समझने का तरीका भी अलग-अलग होता है।

अमेरिका की प्रतिष्ठित पत्रिका “प्रोसेडिंग्स ऑफ नैशनल एकैडमी ऑफ साइंसेज” की रिसर्च बताती है कि, महिलाओं और पुरुषों के दिमाग में सबसे बड़ा अंतर है कि, महिलाओं के दिमाग के दोनों हिस्से एक-दूसरे से बेहतर रूप से जुड़े होते हैं। एक हिस्सा आसानी से दूसरे हिस्से तक सूचना पहुंचाता है, जबकि पुरुषों में ऐसा नहीं होता लेकिन, उनके लिए यह कोई मायूसी की खबर नहीं है.बलकि अच्छी बात यह है कि, इसी कारण पुरुष कुछ कामों को बेहतर ढंग से कर पाते हैं।

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मोबाइल कवर का करते हैं इस्तेमाल तो जानिये कैसे फोन को पहुंचता है नुकसान

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स्मार्टफोन खरीदने के बाद यूजर्स मोबाइल कवर जरुर खरीदते हैं। मोबाइल कवर फोन को डैमेज होने से बचाता है। हालांकि, इसके जितने फायदे हैं उतने ही नुकसान भी हैं।

1. डैमेज हो सकता है फोन:

मोबाइल फोन कवर इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इससे फोन डैमेज होने के काफी ज्यादा संभावना होती है। वहीं, अगर यूजर मेटल का केस इस्तेमाल कर रहा है तो उसे फोन से रीमूव करने में काफी समस्या का सामना करना पड़ता है। फोन पर इससे निशान बना जाते हैं और फोन में क्रैक भी आ सकता है।

2. स्क्रीन को हो सकता है नुकसान:

कई बार फोन का केस इतना सक्षम नहीं होता है कि वो फोन को गिरने के बाद टूटने से बचा पाए। ऐसे में फोन केस मोबाइल के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

3. फोन हो सकता है ओवरहीट:

कुछ ऐसे मोबाइल केस होते हैं जो बेकार क्वालिटी के प्लास्टिक से बने होते हैं। इससे फोन की बैटरी पर असर पड़ता है। इससे फोन हीट हो जाता है और उसमें आग लगने की संभावना बढ़ जाती है।

4. सिग्नल को ब्लॉक कर देना:

कुछ स्मार्टफोन केस ऐसे भी होते हैं जो नेटवर्क कनेक्टिविटी पर असर डालते हैं। अगर फोन पर केस लगा होता है तो फोन में नेटवर्क की काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इस तरह की परेशानी ज्यादातर फोन केस के चलते होती है। वहीं, मेटल से बने मोबाइल केसेस में यह परेशानी सबसे ज्यादा आती है।

जानिए क्यों ख़ास है कालका-शिमला रेल मार्ग

जानिए क्यों ख़ास है कालका-शिमला रेल मार्ग

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रेल में सफर करना तो हम सबको ही बहुत अच्छा लगता है. लेकिन, अगर सफर दूर का और पहाड़ियों के बीच का हो तो रेल में सफर करना और भी मज़ेदार बन जाता है | आज हम आपको एक ऐसे रेल मार्ग के बारे में बताने जा रहे हैं, जिस मार्ग में  सफर करने का मज़ा ही कुछ अलग है | जी हां हम बात कर रहे हैं, कालका-शिमला रेल मार्ग की | इस रेलमार्ग की चौड़ाई मात्र दो फुट 6 इंच है, इसी कारण से इस रेल मार्ग का नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स’ में दर्ज है। यहां आने वाले पर्यटकों की पहली पसंद यहां पर चलने वाली ‘खिलौना गाड़ी’ की यात्रा करने की होती है।

कालका-शिमला रेलमार्ग का ऐतिहासिक महत्व यह भी है की, इसका निर्माण अंग्रेजों द्वारा किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि, अंग्रेज इंजीनियरों ने यह रेल मार्ग एक अनपढ़ ग्रामीण भलखु की मदद लेकर बनाया था । कहते हैं कि, वह आगे-आगे कुदाल से निशान लगाता गया, और पीछे अंग्रेज इंजीनियर उसका अनुसरण करते गए।

इस कार्य के लिए उसे 1858 में सम्मानित भी किया गया था। बाद में हिंदुस्तान-तिब्बत राजमार्ग के सर्वेक्षण में भी उसकी सेवाएं ली गई थीं। कालका से शिमला तक का रेलमार्ग 95 किलोमीटर लंबा है। यह यात्रा छ: घंटे में पूरी होती है| शिमला पहुंचने से पहले रेल 102 सुरंगों से गुजरती है।

सबसे बड़ी सुरंग बड़ोग नामक स्थान पर है। इसका नंबर 33 है, और इसकी लंबाई 3752 फुट है। कोटी में नंबर 10 की सुरंग 2276 फुट लंबी है, और तारा देवी के निकट सुरंग नंबर 91 की लंबाई 1615 फुट है। शिमला पहुंचने से पहले रेल 102 सुरंगों से गुजरती है।|

इन सुरंगों में से गुजरते हुए यात्री गहरे रोमांच से भर जाते हैं। यही नहीं, इसके मार्ग में बने पुल भी कलात्मक बनावट वाले हैं। जिनकी संख्या 869 है। एक पुल लोहे का, शेष सभी पुल पत्थरों से बने हैं। कनोह नामक स्थान पर चार मंजिला पुल विशेष आकर्षण लिए पुरे भारत में बहुत प्रसिद्ध है। अनेक योजनाओं और सर्वेक्षणों के बाद इस रेलमार्ग का निर्माण हुआ था। इसे पूरा होने में दस वर्ष का समय लग गया था ।

9 नवंबर 1903 को पहली ‘टॉय ट्रेन’ शिवालिक की वादियों में से गुजरते हुए, बल खाते हुए मस्त चाल से शिमला पहुंची थी। उस वक्त भारत के वायसराय पद पर लॉर्ड कर्जन था | जिसने इस रेलमार्ग के निर्माण कार्य का पूरा जायजा लिया था।

सन् 1932 में इस रेलमार्ग पर 15 यात्रियों को ले जाने वाली रेल कार की सेवा आरंभ की गई थी। 1970 में इसकी क्षमता 21 यात्रियों तक बढ़ा दी गई थी। आजकल कालका-शिमला रेलमार्ग पर पर्यटकों के मद्दे नज़र एक सुपरफास्ट रेल शिवालिक डीलक्स एक्सप्रैस शुरू की गई है। इसे शताब्दी एक्सप्रेस की तरह ही सुविधाओं से सज्जित किया गया है। इस रेल में बीस यात्रियों की क्षमता युक्त पांच सुन्दर कोच लगाए गए हैं।यह रेल शिमला पहुंचने में पांच घंटे का समय लेती है।

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देखिये कैसे लाश की राख से बनता है हीरा

मैक्सिको में होती है मौत की देवी की पूजा

मैक्सिको में मौत की देवी ‘सांता मुएर्ते’ में विश्वास रखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस पंथ में विश्वास रखने वाले केवल मैक्सिको ही नहीं, अब मध्य अमेरिका और कोलम्बिया तक फैल चुके हैं। इनका विश्वास है कि मौत की देवी बीमारी और दुख से उनकी रक्षा करती है।

हालांकि, कैथोलिक चर्च इस मत में विश्वास करने वालों की आलोचना करता है। गत वर्ष मैक्सिको आए पोप फ्रांसिस ने भी इस तरह की रहस्यमयी ताकतों में विश्वास रखने वालों की कड़ी आलोचना की थी।

रहस्यमयी पंथ

कुछ लोग इस रहस्यमयी पंथ की लोकप्रियता बढ़ने को मैक्सिको में अपराध और हिंसा में वृद्धि के साथ भी जोड़ कर देखते हैं और इसे लेकर कई अफवाहें भी फैली हैं जैसे कि मृत्यु की देवी अनुयायियों को अपने वश में कर लेती है।

हालांकि, इस पंथ में विश्वास रखने वाले अधिकतर लोगों का दावा है कि ये सब केवल अफवाहें हैं और यह केवल उनकी आस्था और विश्वास की बात हैं जिसमें कोई बुराई नहीं है।

पुराना पंथ

जानकारों के अनुसार मैक्सिको में ‘सांता मुएर्ते’ में विश्वास रखने का चलन काफी पुराना रहा है क्योंकि इसका संबंध वहां की परम्परा से है। उपनिवेशी काल में स्पेन द्वारा इस देश पर कब्जा कर लेने के साथ यहां कैथोलिक धर्म का आगमन हुआ। फिर भी गुप्त रूप से मौत की देवी में कई लोगों ने अपने विश्वास को जिंदा रखा।

खुल कर होने लगी है पूजा

जहां पहले लोग मौत की देवी के अनुयायी होने की बात को खुल कर स्वीकार नहीं करते थे। वहीं अंतिम कुछ वक्त से वे इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने लगे हैं। बहुत से स्थलों पर इससे जुड़े प्रार्थना स्थल भी खुल गए हैं। अपराधों के लिए कुख्यात तैपितो कस्बे में भी अंतिम 15 वर्षों से एक महिला डोना कुएर्ता ने घर में एक प्रार्थना स्थल बनाया है।

जहां देश ही नहीं विदेशों से भी मृत्यु की देवी के अनुयायी आने लगे हैं। ऐसे प्रार्थना स्थलों में आमतौर पर कंकाल को सजा कर उसकी पूजा की जाती है। माना जाता है मैक्सिको में यह मृत्यु के देवता को समर्पित प्रथम सार्वजनिक प्रार्थना स्थल है। इसलिए इसकी लोकप्रियता सबसे ज्यादा है।

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जन्मदिन विशेष: महेश भट्ट के बारे में कुछ अनसुनी बातें

बॉलीवुड का यही नियम है जो जितना ज्यादा सुर्ख़ियों में रहेगा उतना ही ज्यादा चलेगा, इसीलिए ज्यादातर लोग किसी ना किसी बहाने सुर्ख़ियों में बने रहते हैं। मशहूर निर्देशक महेश भट्ट के बारे में तो आप जानते ही होंगे? कल उनका जन्म दिन है। आइए जानते है उनके जन्म दिन पर उनके के जीवन के बारे में कुछ अनसुनी रोचक बातें:

  • मशहूर फिल्म निर्माता महेश भट्ट का जन्म 20 सितंबर, 1949 को मुंबई में हुआ था। उनके पिता का नाम नानाभाई भट्ट और मां का नाम शिरीन मोहम्‍मद अली है। भट्ट के पिता गुजराती ब्राह्मण थे और उनकी मां गुजराती शिया मुस्लिम थीं।
  • उनकी स्‍कूली पढ़ाई डॉन बोस्‍को हाई स्‍कूल, माटुंगा से हुई थी। स्‍कूल के दौरान ही उन्‍होंने पैसा कमाने के लिए समर जॉब्‍स शुरू कर दी थी। उन्‍होंने प्रोडक्‍ट एडवरटीजमेंट्स भी बनाए।
  • उन्होनें अपने व्यवसाय की शुरूआत निर्देशक राज खोसला के साथ की, उन्होंने 21 वर्ष की आयु में अपनी पहली फिल्म निर्देशित की थी।
  • महेश भट्ट की एक विशेषता रही है कि वह लोगों को बोल्ड कंटेंट वाली ज्यादा फ़िल्में दिखाते हैं। उनकी फिल्मों की तरह उनके जीवन में भी अजब-गजब के रिश्ते बने हुए थे।
  • महेश भट्ट अपने पिता से अलग रहते थे। उनके माता पिता की शादी नहीं हुई थी। महेश भट्ट के पिता हिन्दू और माता मुस्लिम थीं, इसलिए वह दोनों दूर रहते थे।
  • 20 साल के महेश भट्ट का जब अफेयर शुरू हुआ, तब वह  कॉलेज में पढ़ते थे। उनका अफेयर लोरिएन ब्राइट से था। ब्राइट का नाम बाद में किरन भट्ट हो गया। इनके दो बच्‍चे भी हैं- पूजा भट्ट और राहुल भट्ट।
  • लेकिन 1970 के दशक में महेश भट्ट का अफेयर परवीन बॉबी से हो गया था। इस अफेयर की वजह से उनकी पहली शादी ज्‍यादा दिनों तक नहीं टिक पाई।
  • प‍रवीन बॉबी से उनका अफेयर लंबे समय तक नहीं चल पाया और दोनों अलग हो गए।
  • बाद में साल 1986 में महेश भट्ट ने अभिनेत्री सोनी रजदान से शादी कर ली। महेश भट्ट सोनी राजदान से शादी करने के लिए मुस्लिम धर्म अपना लिया।
  • इनकी दो बेटियां हैं: शाहीन भट्ट और आलिया भट्ट। अलिया भट्ट इस समय बॉलीवुड की सबसे जानी-मानी अभिनेत्री हैं।
  • महेश भट्ट अपनी बड़ी बेटी पूजा भट्ट के साथ भी चर्चा में आ चुके हैं। जब एक मैगजीन में अपनी ही बेटी पूजा भट्ट को किस करते हुए उनकी तस्वीर प्रकाशित हुई। एक मैगजीन में अपने इंटव्यू में महेश ने कहा था, अगर पूजा मेरी बेटी नहीं होती, तो मैं उससे शादी कर लेता।
  • महेश भट्ट ने अपनी लव लाइफ को बड़े पर्दे पर उतारने की भी कोशिश की है। जैसे, फिल्म ‘आशिकी’ किरन भट्ट के साथ उनके अफेयर पर बेस्ड थी। यही नहीं, फिल्म ‘वो लम्हें’ की स्टोरी भी महेश भट्ट और परवीन बॉबी के अफेयर पर बेस्ड बताई जाती है।
  • महेश भट्ट अपने करियर में तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। अपने तीन दशक लंबे करियर में लगभग 50 फिल्मों का निर्देशन किया है।
  • ये उनकी कुछ प्रसिध्द फिल्में हैं – मंजिलें और भी हैं, लहू के दो रंग, अर्थ, सारांश, नाम, कब्‍जा, डैडी, आवारगी, जुर्म, आशिकी, स्‍वयं, सर, हम हैं राही प्‍यार के, क्रिमिनल, दस्‍तक, तमन्‍ना, डुप्लिकेट, जख्‍म, कारतूस, संघर्ष, राज, मर्डर, रोग, जहर, कलयुग, गैंग्‍सटर, वो लम्‍हे, तुम मिले, जिस्‍म 2, मर्डर 3 ।

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जापान का अनोखा गिफ्ट कल्चर

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जापान पहुंचने वाले लोगों को अक्सर यह एहसास हो सकता है कि अपने साथ वे पर्याप्त गिफ्ट नहीं लाए हैं। जापान में उपहार देने का चलन केवल नववर्ष या विशेष अवसरों पर ही नहीं, साल भर जारी रहता है। शादियों में, छुट्टियों में या बिजनैस के हिस्से के रूप में ही नहीं, वहां अंतिम क्रिया पर भी उपहार दिए जाते हैं।

विश्व की इस तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में हर कोई एक-दूसरे से उपहार के शिष्टाचार की अपेक्षा करता है। स्वाभाविक है कि जापान की गिफ्ट इंडस्ट्री मालामाल है। गत वर्ष 2 प्रतिशत बढ़ कर इसका बाजार 85 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया।

टोक्यो इंटरनैशनल गिफ्ट शो की प्रवक्ता सुगा इमाई के अनुसार जापान में उपहारों का बाजार बहुत विशाल रूप ले चुका है। इस शो में लोग और कम्पनियां छोटे से लेकर बड़े उपहार के लिए ताजा तरीन विकल्प देख सकती हैं।

गत वर्ष के अंत में ‘ओसेइबो’ गिफ्ट्स की खूब मांग रहीं। ये वे उपहार होते हैं। जिनसे जापानी अच्छे संबंधों के लिए अपने कारोबारी सहयोगियों और परिवार के सदस्यों का आभार व्यक्त करते हैं।

एक बड़ी ट्रांसलेशन एजेंसी में काम करने वाले एक कर्मचारी का कहना था कि नववर्ष के कई दिनों बाद तक भी अपने कारोबारी सहयोगियों से रोज उन्हें डाक में उपहार मिलते रहे। इनमें से ज्यादातर में खाने-पीने की चीजें थीं जिन्हें सभी कर्मचारी आपस में बांट लेते हैं।

जापान में काम करने वाली कई विदेशी कम्पनियां भी अपनी जापानी शाखाओं को गिफ्ट के संबंध में सलाह देती हैं। जैसे कि एक कम्पनी का संदेश था ‘जापान में उपहार देना शिष्टाचार माना जाता है। वे ज्यादा महंगे न हों ताकि प्राप्त करने वाले को संकोच या झिझक न हो और न ही बहुत सस्ता या घटिया होना चाहिए।’

छुट्टियों पर जाने वाले जापानी अक्सर अपने साथ ले जाने के लिए अच्छे उपहारों की तलाश में रहते हैं। परिवार के सदस्य और सहकर्मी लौटने पर उनसे उपहारों की अपेक्षा करते हैं।

अधिकतर लोग जहां जाते हैं वहां से स्थानीय खानपान की चीजें उपहार स्वरूप लाते हैं। शायद इसीलिए जापान में रेलवे स्टेशनों पर यादगारी चीजें बेचने वाली ‘सोवेनियर शॉप्स’ किराना दुकानों जैसी प्रतीत होती हैं।

उपहार खरीदना जिन लोगों को झंझट लगता है तो वहां कुछ स्थानों पर कई कम्पनियां उनके लिए विशेष सेवा प्रदान करती हैं। वे हवाई अड्डों पर या इंटरनैट पर उपहारों का ऑर्डर कर सकते हैं जिन्हें उनके घर पर पहुंचा दिया जाता है।

जापान में उपहार मिलने पर जल्द से जल्द ‘रिटर्न गिफ्ट’ देना विनम्रता प्रदर्शित करता है। ध्यान रखा जाता है कि उसका मूल्य प्राप्त गिफ्ट के लगभग समान हो। जैसे-जैसे जापान के समाज में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है, कुछ नए चलन भी सामने आ रहे हैं। अब औपचारिक उपहारों में कमी और अनौपचारिक उपहारों में वृद्धि देखने को मिल रही है।

चाहे मदर्स डे या ‘फैस्टिवल ऑफ लॉन्जेविटी’ (जब व्यक्ति 60 की उम्र का हो जाता है) का अवसर हो, बुजुर्गों  के लिए उपहारों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है।

यह अन्य चलन युवतियों में दिखाई दे रहा है और जिन्हें अच्छी नौकरी के लिए कड़ी प्रतियोगिता से भी गुजरना पड़ रहा है। वे सफलता पर खुद के लिए भी उपहार लेने लगी हैं और ये उपहार केवल भौतिक चीजें ही नहीं हैं, इनमें होटल में बढ़िया डिनर, स्पा ट्रिप, लग्जरी होटल में रात गुजारने से लेकर हैंग ग्लाइडिंग जैसे खेलों का रोमांच उठाना तक शामिल है।

 

देखिये कैसे लाश की राख से बनता है हीरा

एक अनोखी तकनीक से मृत शरीर को हीरे में बदला जा रहा है। जो कम्पनी यह हीरे बना रही है उसका नाम अलगोरदांज है। इसकी स्थापना रिनाल्डो विल्ली नामक एक व्यक्ति ने की है।

अलगोरदांज का हिन्दी में अर्थ होता है ‘यादें’। इस कम्पनी का यह कारोबार स्विट्जरलैंड, जर्मनी और ऑस्ट्रिया तक फैला हुआ है। अनेक लोग अपने प्रियजनों के निधन के बाद इस अनोखी तकनीक का लाभ लेना पसंद कर रहे हैं।

इस कम्पनी के जरिए कोई भी अपने प्रिय मृत परिजन की यादों को हमेशा के लिए अपने साथ संजोकर रख सकता है। यह कम्पनी मृत शरीर की राख को हीरे में बदल देती है। रिनाल्डो विल्ली जब स्कूल में पढ़ते थे, तब उनको शिक्षक ने सब्जियों की राख को हीरे में बदलने के बारे में बताया था।

तभी से रिनाल्डो के मन में आया कि जैसे सब्जियों की राख से हीरा बनाया जा सकता है। वैसे ही मृत लोगों की राख से भी तो हीरा बनाया जा सकता है। उसने अपने इसी आइडिया पर काम किया और मृत लोगों की राख से सिंथेटिक हीरे को बनाते हुए अपनी कम्पनी की स्थापना कर ली।

यह कम्पनी एक वर्ष में करीब 850 मृत लोगों की राख को हीरे में तबदील कर रही है। एक हीरा तैयार करने के लिए कम्पनी को कम से कम आधा किलो राख की जरूरत होती है।

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ये शैतान पहाड़ी तोते ऐसी-2 शरारतें करते हैं कि आप जान कर दंग रह जायेंगे!

शादीशुदा जावेद अख्तर के प्यार में इस अदाकारा ने तोड़ी थीं सारी हदें, पिता से भी की थी बगावत

शबाना आजमी भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित अभिनेत्रियों में से एक है। शबाना की अदाकारी को आज तक कोई टक्कर नहीं दे पाया है। इस अदाकारा को 5 बार बेस्ट एक्ट्रेस के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है जो एक रिकॉर्ड  है। आइए जानते है शबाना आजमी के जीवन के बारे में कुछ रोचक बातें:

  • शबाना आजमी का जन्म 18 सितंबर 1950 में हुआ था। ये मशहूर कवि कैफी आजमी और थिएटर एक्ट्रेस शौकत आजमी की बेटी हैं। शबाना आजमी का घर का नाम मुन्नी था।
  • शबाना ने अपनी शुरुआती पढ़ाई क़्वीन मैरी स्कूल मुंबई से की है। उन्होंने मनोविज्ञान (Psychology) में स्नातक किया है। उन्होंने स्नातक की डिग्री मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज से ली है। शबाना आजमी ने एक्टिंग का कोर्स फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टिटीयूट ऑफ इंडिया पुणे से किया है।
  • शबाना जितनी पॉपुलर अपनी अदाकारी के लिए रहीं उतनी ही सुर्खियां पर्सनल लाइफ को लेकर बटोरीं। जावेद अख्तर से शादी से पहले शबाना का नाम फिल्म मेकर शेखर कपूर के साथ भी जुड़ा था।
  • 9 दिसंबर, 1984 में जावेद अख्तर से इन्होंने शादी की। जावेद बॉलीवुड स्क्रिप्ट राइटर, कवि और गीतकार हैं। शबाना आजमी जावेद अख्तर की दूसरी पत्नी हैं।
  • जावेद अख्तर की पहली शादी हनी से हुई थी। हनी, जावेद से 10 साल छोटी थीं। उनके दो बच्चे भी थे।
  • 1970 में जावेद अख्तर कैफी आजमी से लिखने की कला सीखते थे। उसी दौरान उनका दिल कैफी आजमी की बेटी शबाना पर आ गया।
  • तब जावेद ने हनी को तलाक देकर शबाना से शादी करने का फैसला लिया। दोनों की शादी में मुश्किलें भी आईं। क्योंकि कैफी आजमी नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी की शादी किसी शादीशुदा आदमी से हो।
  • प्यार के आगे किसी का जोर नहीं चलता। कैफी आजमी का भी नहीं चला और शबाना ने 1984 में जावेद से शादी कर ली।
  • शबाना आजमी ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत वर्ष 1973 में श्याम बेनेगल की फिल्म ‘अंकुर’ से की थी।   इस फिल्म की सफलता ने शबाना आजमी को बॉलिवुड में जगह दिलाने में अहम भूमिका निभाई।  अपनी पहली ही फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुआ।
  • अब तक उन्होंने 100 से भी अधिक फिल्मों में अभिनय किया है, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार और चार बार फिल्मफेयर पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
  • शबाना आजमी एक बहुत ही सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं और वह राज्यसभा का सदस्य रही हैं।
  • शबाना आजमी एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी अपनी खास पहचान बना चुकी हैं। खासतौर पर बच्चों से जुड़े मसलों और एड्स से जुड़े मुद्दों पर बेहद सक्रिय रहती हैं। सांप्रदायिकता के खिलाफ कई प्ले में इन्होंने भाग लिया।

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चीन का शादी बाज़ार

जानिए कैसे हुई आईसक्रीम की खोज

सर्दी का मौसम हो या गर्मी का, ठंडी-ठंडी आइसक्रीम खाना हम सबको अच्छा लगता है| आइये आज हम आपको बताने जा रहे कि कब और कैसे हुई आईसक्रीम की खोज| सर्वप्रथम ईसा पूर्व 618 से 97 के बीच चीन में आईसक्रीम जैसी कोई चीज खाई जाती थी। शांग के राजा टांग के पास 94 ‘आईसमैन’ (आईस क्रीम जैसी चीज बनाने वाले) थे। जो भैंस के दूध, आटे और कपूर से एक आईस क्रीम जैसी चीज़ बनाते थे।

ईसा से 200 साल पूर्व चीन में ही एक तरह की आईस क्रीम का आविष्कार हुआ था, जब दूध और चावल का एक मिश्रण बर्फ में पैक करने से ही जम गया था। माना जाता है, कि रोमन सम्राट पहाड़ की चोटी से ताजा बर्फ लाने के लिए गुलाम भेजते थे, जिसे स्वादिष्ट बना कर परोसा जाता था, जिसे एक तरह की आईस क्रीम भी कहा जा सकता है।

खोजी मार्को पोलो (1254-1324) ने चीन की यात्रा के दौरान आईस क्रीम बनती देखी और सबसे पहले इटली के लोगों को इससे परिचित करवाया। सन् 1533 में इटली की राजकुमारी का विवाह फ्रांस के राजा हैनरी द्वितीय के साथ हुआ था। वह अपने साथ कुछ इतालवी कुक भी ले आई थी, जो जायकेदार बर्फ की रेसिपी बनाना जानते थे।

1660 में पैरिस के एक कैफे ने दूध, क्रीम, मक्खन और अंडे को फेंट कर आईस क्रीम बनाने की रेसिपी को प्रचारित किया था।सन् 1671 में पहली बार ब्रिटेन के शासक चार्ल्स द्वितीय के पास आईस क्रीम पहुंची। वह इससे इतने प्रभावित हुए, कि आईस क्रीम बनाने वाले अपने कुक को इसकी रैसिपी गुप्त रखने के लिए हर महीने 500 पाऊंड देते थे।

सन् 1744 में ऑक्सफोर्ड इंगलिश डिक्शनरी में पहली बार आईसक्रीम शब्द प्रकाशित हुआ।अमेरिका में क्वेकर मूवमैंट के लोग आइस क्रीम लेकर आए जो इंगलैंड से आकर वहां बस गए थे। बाल्टीमोर के दूध के व्यापारी जैकब फसेल ने बड़े पैमाने पर आईस क्रीम का उत्पादन करना शुरू किया था| जिससे आईसक्रीम आम आदमी तक पहुंच गई।

आईसक्रीम सनडे (फलमिश्रित आईस क्रीम) का आविष्कार 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में तब हुआ, जब अमेरिकी शहर इवनस्टोन में संडे यानी रविवार के दिन आईस क्रीम सोडा बेचने पर पाबंदी लग गई थी। इस पाबंदी से बचने के लिए कुछ व्यापारियों ने सोडा को सिरप में बदल दिया, और इस मिष्ठान का नाम संडे के दिन पर’ आईसक्रीम संडे’ रख दिया गया था ।

20वीं सदी के मध्य में रेफ्रीजरेशन तकनीक के विकास से आईस क्रीम की लोकप्रियता और भी बढ़ गई।

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अदभुत विज्ञान – रोचक कहानी पीरियोडिक टेबल की खोज की

हम सबने देखा है कि हर स्कूल की कैमिस्ट्री लैब में दीवारों पर विभिन्न एलीमैंट्स’ (तत्वों) को दर्शाता हुआ, पीरियोडिक टेबल यानी ‘आवर्त सारणी’ का पोस्टर लगा होता है। करीब 150 वर्षों से यह रासायनिक तत्वों के बारे में जानने के लिए एक सरल साधन रहा है।

आइये आज हम इस पोस्ट के माध्यम से पीरियोडिक टेबल के बारे में कुछ रोचक जानकारी शेयर करते हैं। साथ ही यह भी देखते हैं कि पीरियोडिक टेबल की खोज किसने की थी|

पीरियोडिक टेबल periodic table science hindi

दमित्री मेंडेलीव ने पहली बार पहचाना टेबल को

पीरियोडिक टेबल के रूप में तत्वों के वर्गीकरण के लिए जरूरी नियमों की खोज का श्रेय अक्सर ही रूसी रसायनविद् दमित्री मेंडेलीव को दिया जाता है, परंतु ऐसा करने वाले वह अकेले नहीं थे, अन्य वैज्ञानिकों ने इसका पता कुछ साल पहले ही लगा लिया था, परंतु वे दमित्री मेंडेलीव की तरह पहचान नहीं सके।

इनमें से एक वैज्ञानिक अंग्रेज थे, जिनका का नाम रसायनविद् जॉन न्यूलैंड्स था। 1860 के दशक में उन्होंने इस बात पर ध्यान दिलाया था कि, एक जैसे गुणों वाले तत्वों को यदि उनके एटोमिक मास (आणविक भार) के अनुसार वर्गीकृत किया जाए, तो वे एक-दूसरे के करीब रहते हैं।

परंतु अपनी बात को अन्य वैज्ञानिकों के सामने रखते हुए, उन्होंने इस नियम को समझाने के लिए इसकी तुलना संगीत की धुनों से कर दी थी, और जिस पर उनका बहुत मज़ाक उड़ाया गया था, और उनकी बात भी नजरअंदाज कर दी गई थी। जॉन न्यूलैंड्स की खोज को उनसे पहले एक अंग्रेज रसायनविद् विलियम ओडलिंग ने भी पेश किया था, परंतु वह भी इसके प्रति वैज्ञानिकों में रुचि पैदा करने में असफल रहे थे।

इस संबंध में दमित्री मेंडेलीव की सफलता का राज इस बात में छुपा है कि उन्हें यह पता लग गया था कि तत्वों का वर्गीकरण उससे कहीं अधिक जटिल है, जितना कि दूसरों को लगता था। इस वजह से पीरियोडिक टेबल में कुछ कॉलम अन्यों से लम्बे हैं।

उन्होंने यह भी शंका प्रकट की थी कि बीच में कुछ ब्लॉक्स उन तत्वों की वजह से खाली हैं जिनकी तब तक खोज ही नहीं हुई थी। उन्होंने उन अनजान तत्वों के गुणों के बारे में अनुमान लगाने का साहस भी दिखाया था।

बाद में ‘गैलियम’, ‘जर्मेनियम’ तथा ‘स्कैंडियम’ जैसे तत्वों की खोज से उनकी बातों की पुष्टि तो हो हुई ही  और उनका नाम भी 19वीं सदी के महानतम वैज्ञानिकों की सूची में भी हमेशा के लिए दर्ज हो गया।